Thursday 15 February 2007

मण्डला के प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ने किया महाकवि कालीदास के ग्रँथों का हिन्दी पद्यानुवाद

मण्डला के प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ने किया महाकवि कालीदास के ग्रँथों का हिन्दी पद्यानुवाद
मण्डला . नि.प्र. , भारतीय संस्कृति में आत्म प्रशंसा को शालीनता के विपरीत आचरण माना गया है , यही कारण है कि जहाँ विदेशी लेखकों के आत्म परिचय सहज सुलभ हैं ,वहीं कवि कुल शिरोमणी महाकवि कालिदास जैसे भारतीय मनीषीयों के ग्रँथ तो सुलभ हैं किन्तु इनकी जीवनी दुर्लभ हैं ! महाकवि कालिदास की विश्व प्रसिद्ध कृतियों मेघदूतम् , रघुवंशम् , कुमारसंभवम् , अभिग्यानशाकुन्तलम् आदि ग्रंथों में संस्कृत न जानने वाले पाठको की भी गहन रुचि है ! ऐसे पाठक अनुवाद पढ़कर ही इन महान ग्रंथों को समझने का प्रयत्न करते हैं ! किन्तु अनुवाद की सीमायें होती हैं ! अनुवाद में काव्य का शिल्प सौन्दर्य नष्ट हो जाता है ! ई बुक्स के इस समय में भी प्रकाशित पुस्तकों को पढ़ने का आनंद अलग ही है ! मण्डला के प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी ने महाकवि कालीदास कृत मेघदूतम् के समस्त १२१ मूल संस्कृत श्लोकों का एवं रघुवंश के सभी १९ सर्गों के लगभग १७०० मूल संस्कृत श्लोकों का श्लोकशः हिन्दी गेय छंद बद्ध भाव पद्यानुवाद कर हिन्दी के पाठको के लिये अद्वितीय कार्य किया है ! उदाहरण स्वरूप मेघदूतम् हिन्दी पद्यानुवाद से एक श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक
कस्यात्यन्तं सुखमुपगतं दुःखमेकान्ततोवा
नीचैर्गच्छिति उपरिचदशा चक्रमिक्रमेण ॥
हिन्दी अनुवाद
किसको मिला सुख सदा या भला दुःख
दिवस रात इनके चरण चूमते हैं
सदा चक्र की परिधि की भाँति क्रमशः
जगत में ये दोनों रहे घूमते हैं

प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव अपनी विभिन्न कृतियों मुक्तक मंजूषा हिन्दी छंदबद्ध १०८ देश प्रेम के गेय गीत वतन को नमन नैतिक कथायें ईशाराधन अनुगुंजन आदि पुस्तकों हेतु सुपरिचित हैं !
धर्म तो प्रेम का दूसरा नाम है , प्रेम को कोई बंधन नहीं चाहिये
सच्ची पूजा तो होती है मन से जिसे आरती धूप चंदन नहीं चाहिये
................प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव की.मुक्तक मंजूषा से


हिमगिरि शोभित सागर सेवित
सुखदा गुणमय गरिमा वाली
सस्य श्यामला शांति दायिनी
परम विशाला वैभवशाली ॥
प्राकृत पावन पुण्य पुरातन
सतत नीती नय नेह प्रकाशिनि
सत्य बन्धुता समता करुणा
स्वतंत्रता शुचिता अभिलाषिणि ॥
ग्यानमयी युग बोध दायिनी
बहु भाषा भाषिणि सन्मानी
हम सबकी माँ भारत माता
सुसंस्कार दायिनि कल्यानी ॥


................प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव की वतन को नमन से अंश


हो रहा आचरण का निरंतर पतन , राम जाने कि क्यों राम आते नहीं
है सिसकती अयोध्या दुखी नागरिक देके उनको देके शरण क्यों बचाते नहीं ?
..................प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव की अनुगुंजन से

शुभवस्त्रे हंस वाहिनी वीण वादिनी शारदे ,
डूबते संसार को अवलंब दे आधार दे !
हो रही घर घर निरंतर आज धन की साधना ,
स्वार्थ के चंदन अगरु से अर्चना आराधना !
आत्म वंचित मन सशंकित विश्व बहुत उदास है ,
चेतना जग की जगा मां वीण की झंकार दे !
.............................प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव की ईशाराधन से

वागवर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगत: पितरौ वन्दे पार्वतीपरÜवरौ ।।
जग के माता - पिता जो , पार्वती -ंउचय षिव नाम
षब्द - अर्थ सम एक जों , उनको विनत प्रणाम ।। 1 ।।
ô सूर्यप्रभवो वंष: ô चाल्पविषया मति: ।
तितिर्षZुर्दस्तरं मोहाìपेनािस्म सागरम् ।।
कहॉं सूर्य कुल का विभव , कहॉं अल्प मम ज्ञान
छोटी सी नौका लिये सागर - तरण समान ।। 2 ।।
मन्द: कवियष: प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम् ।
प्रांषुलभ्ये फले लोभादुद्वाहुरिव वामन : ।।
मूढ़ कहा जाये न कवि , हो न कहीं उपहास
बौना जैसे भुज उठा धरे दूर फल आस ।। 3 ।।



महाकवि कालीदास कृत रघुवंशम् का श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
समस्त १९ सर्ग लगभग ४०० पृष्ठ लगभग १७०० श्लोक हेतु उन्हें प्रकाशक चाहिये ! रघुवंशम् से अंश इस तरह है
शासन हर वर्ष कालिदास समारोह के नाम पर करोंडों रूपये व्यय कर रहा है ! जन हित में इन अप्रतिम कृतियों को आम आदमी के लिये संस्कृत में रुचि पैदा करने हेतु सी डी में तैयार इन पुस्तकों को इलेक्र्टानिक माध्यमों से दिखाया जाना चाहिये ! जिससे यह विश्व स्तरीय कार्य समुचित सराहना पा सकेगा !

उनका पता है
प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
विवेक सदन , नर्मदा गंज , मण्डला म.प्र. भारत पिन ४८१६६१
फो 0761 2662052 , मोबाइल 09425484452

खूब लडी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

सुभद्रा कुमारी चौहान की कथा दृष्टी
विवेक रंजन श्रीवास्तव
विवेक सदन , नर्मदा गंज , मण्डला
म.प्र. भारत पिन ४८१६६१
फोन ०७६४२ २५००६८ ,
मोबाइल ९१ ९४२५१६३९५२
email vivek1959@yahoo.co.in
visit my web page http//www.vikasprakashan.blogspot.com
संदर्भ
# ०६.०८.१९७६ को २५ पैसे का डाक टिकिट जारी करते समय भारत सरकार द्वारा प्रसारित प्रथम दिवस आवरण पत्र के साथ संकलित सामग्री
# कर्मवीर प्रेस जबलपुर से प्रकाशित सुभद्रा कुमारी चौहान के कहानी संग्रह बिखरे मोती द्वितीय आवृति मूल्य रू १.५०
# झांसी की रानी , स्वराज संस्थान भोपाल मूल्य रू २५.०० वर्ष २००४
# पुस्तक क्रांतिकारी साहित्यकार सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा सुमित मोहन , प्रकाशक कृष्नकांत ब्रदर्स मथुरा वर्ष २००५, मूल्य रू १५०.००

किसी भी मनुष्य का व्यक्तित्व एवं उसका बौद्धिक विकास , उसके परिवेश , देश , काल ,परिस्थिति के अनुरूप होता है ! सुभद्रा कुमारी चौहान एक साथ ही प्रगतिशील नारी , गृहणी , मां , कवि , लेखिका , स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , जननेत्री व राजनेता थीं ! वे जमीन से जुडी हुई थीं , अतः उनके अनुभवों का संसार अति विशाल था ! यही कारण है कि उनके साहित्य में कहीं भी नाटकीयता व बनावटीपन नहीं है वरन् वह हृदय स्पर्शी अभिव्यक्ति बन पडा है ! उनका जन्म १९०४ में इलाहाबाद के निकट निहालपुर नामक गांव में रामनाथसिंह के जमींदार परिवार में हुआ था ! इतिहास विद जानते हैं कि बीसवीं सदी के प्रारंभ में भारतीय समाज में जातिगत , वर्गगत , धर्मगत , लिंगगत रूढ़ीयां अपने चरम पर थीं ! बाल विवाह की परम्परा थी ! इन कुरीतियों के विरुद्ध ही सुभद्रा कुमारी चौहान की कथा दृष्टी भी केंद्रित थी ! बहुमुखी व्यक्तित्व के चलते व दुर्भाग्यवश असमय मृत्यु के कारण उन्होंने बहुत अधिक नहीं लिखा है , पर जो कुछ भी लिखा है वह सब का सब मर्मस्पर्शी , उद्देश्यपूर्ण व शाश्वत बन कर हिन्दी साहित्य की धरोहर के रूप में सुप्रतिष्ठित है!
सुभद्रा कुमारी चौहान की खूब लडी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी , हिन्दी के सर्वाधिक पढ़े व गाये गये गीतों में से एक है ! यह गीत स्वयं में गीत से अधिक वीर गाथा की एक सच्ची कहानी ही है ! जिसमें कवियत्री ने रानी लक्छमीबाई के जीवन के सारे घटना क्रम को एक पद्यात्मक कहानी के रूप में इस सजीवता से प्रस्तुत किया है कि पाठक या श्रोता वीर रस से भाव विभोर हो उठता है ! यह रचना उनकी पहचान बन गई है !
बिखरे मोती उनका पहला कहानी संग्रह है , इसमें भग्नावशेष, होली , पापीपेट , मंझलीरानी , परिवर्तन , द्रष्टिकोण , कदम के फूल , किस्मत , मछुये की बेटी , एकादशी , आहुती , थाती , अमराई , अनुरोध , व ग्रामीणा कुल १५ एक दूसरे से बढ़कर कहानियां हैं ! इन कहानियों की भाषा सरल बोलचाल की भाषा है ! अधिकांश कहानियां नारी विमर्श पर केंद्रित हैं!
सुभद्रा कुमारी चौहान के समूचे साहित्य की सफलता जिस आधारभूत तथ्य पर केंद्रित है , वह मेरे पास उपलब्ध बिखरे मोती कहानी संग्रह की प्रति पर एक मित्र के द्वारा दूसरे को पुस्तक भेंट करते हुये की गई टिप्पणी है! जो इन कहानियों की लोकप्रियता , उपयोगिता व आम पाठक का साहित्य अनुराग प्रदर्शित करती है ! आज कितने पाठक स्वयं पुस्तकें खरीद कर पढ़ते हैं ? भेंट करना तो बाद की बात है ! ऍसी रुचिकर हृदय स्पर्शी कितनी कहानियां लिखी जा रहीं है कि वे पाठकों के बीच चर्चा का विषय बन जावें ?उनकी कहानियां कृत्रिम , सप्रयास लिखी नहीं लगती ! वे तो आसपास से ही उठाई गई विषय वस्तु की तरतीब से प्रस्तुती ही हैं !
उन्मादिनी शीर्षक से उनका दूसरा कथा संग्रह १९३४ में छपा ! इस में उन्मादिनी , असमंजस , अभियुक्त , सोने की कंठी , नारी हृदय , पवित्र ईर्ष्या , अंगूठी की खोज , चढ़ा दिमाग , व वेश्या की लडकी कुल ९ कहानियां हैं ! इन सब कहानियो का मुख्य स्वर पारिवारिक सामाजिक परिदृश्य ही है!
सीधे साधे चित्र सुभद्रा कुमारी चौहान का तीसरा व अंतिम कथा संग्रह है ! इसमें कुल १४ कहानियां हैं ! रूपा , कैलाशी नानी , बिआल्हा , कल्याणी , दो साथी , प्रोफेसर मित्रा , दुराचारी व मंगला ८ कहानियों की कथावस्तु नारी प्रधान पारिवारिक सामाजिक समस्यायें हैं ! हींगवाला , राही , तांगे वाला , एवं गुलाबसिंह कहानियां राष्टीय विषयों पर आधारित हैँ
सुभद्रा कुमारी चौहान ने कुल ४६ कहानियां लिखी , और अपनी व्यापक कथा दृष्टी से वे एक अति लोकप्रिय कथाकार के रूप में हिन्दी साहित्य जगत में सुप्रतिष्ठत हैं !
विवेक रंजन श्रीवास्तव