Tuesday 23 October 2012

देखन मे छोटे लगे घाव करें गंभीर- हरेराम समीप के हाइकू


पुस्तक समीक्षा
देखन मे छोटे लगे घाव करें गंभीर- हरेराम समीप के हाइकू

कृति - बूढा सूरज (हाइकू कवितायें)
कवि - हरेराम समीप
प्रकाषक - पुस्तक बैंक, फरीदाबाद
पृष्ठ - 104
मूल्य - 195-
समीक्षक- विवेक रजंन श्रीवास्तव, संयोजक पाठक मंच
ओ.बी.11 एमपीर्इबी कालोनी रामपुर जबलपुर

न्यूनतम शब्दो मे अधिकमत बात कहने की दक्षता ही कविता की परिभाषा है। विषेष रूप से जब वह कविता जापान जैसे देष से हो जहा वृक्षो के भी बोनसार्इ बनाये जाते है तो हाइकू शैली मे कविता को अभिव्यकित मिलती है। साहित्य विष्वव्यापी होता है। वह किसी एक देष या भाषा की धरोहर मात्र हो ही नही सकता। जापानी भाषा की विधा हाइकू की वैषिवक लोकप्रियता ने यह तथ्य सि़द्ध कर दिया है। भारतीय भाषाओ मे सर्वप्रथम 1919 मे गुरूवर रवीन्द्र नाथ टैगौर ने हाइकू का परिचय करवाया था। फिर 1959 मे हिंदी हाइकू की चर्चा का श्रेय अज्ञेय को जाता है। जवाहर लाल नेहरू विष्वविधालय दिल्ली के जापानी भाषा के प्राध्यापक सत्यभूषण वर्मा ने भारत मे हाइकू सृजन को वैषिवक साहितियक प्रतिष्ठा दिलवार्इ।
जिस प्रकार गजल के मूल मे परवर दिगार के प्रति रूमानियत की अभिव्यकित है। ठीक उसी के समानान्तर हाइकू मे बौद्ध दर्षन तथा प्रकृति के प्रति सौदंर्य चेतना का प्रवाह रहा है। समय के साथ-साथ एवं रचनाकारो की प्रयोग धर्मिता के चलते हाइकू की भाव पक्ष की यह अनिवार्यता पीछे छूटती गर्इ। किंतु तीन पकिंतयो मे पांच सात पांच मात्राओ का स्थूल अनुषासन  आज भी हाइकू की विषेषता है।
हरे राम समीप जनवादी रचनाकार है। वे विगत लंबे समय से जवाहर लाल नेहरू स्मारक निधि तीन मूर्ति भवन मे सेवारत है। उन्हें संत कबीर राष्ट्रीय षिखर सम्मान, हरियाणा साहित्य अकादमी पुस्तक पुरस्कार, फिराक गोरखपुरी सम्मान जैसे अनेक सृजन सम्मान प्राप्त हो चुके है। स्वाभाविक ही है कि उनके वैषिवक परिदृष्य एवं राष्ट्रीय चिंतन का परिवेष उनकी कविताओ मे भी परिलक्षित होगा। उदाहरण स्वरूप यह हाइकू देखे-
किताबें रख
बस इतना कर
पढ ले दिल
वसुधैव कुटुम्बक का भारतीय ध्येय और भला क्या है, या फिर,
गलीचे बुने
फिर भी मिले उन्हे
नंगी जमीन

हिंदी एवं उदर्ू भाषाओ पर हरे राम समीप का समान अधिकार है। अत: उनके हाइकू मे उदर्ू भाषा के शब्दो का प्रयोग सहज ही मिलता है।
पहने फिरे
फरेब के लिबास
कीमती लोग
    या
शराफत ने
कर रखा है मेरा
जीना हराम

कबीर से प्रभावित समीप जी लिखते है
चाक पे रखे
गिली मिटटी, सोचू मैं
गढूं आज क्या
   और
कैसा सफर
जीवन भर चला
घर न मिला
अंग्रेजी को देवनागरी मे अपनाते हुये भी उनके अनेक हाइकू बहुत प्रभावोत्पादक है।
हो गए रिष्ते
पेपर नेपकिन
यूज एंड थ्रो
    या
निगल गया
मोबाइल टावर
प्यारी गौरैया
कुल मिलाकर बूढा सूरज मे संकलित हरेराम समीप के हाइकू उनकी सहज अभिव्यकित से उपजे है। वे ऐसे चित्र है जिन्हें हम सब रोज सुबह के अखबार मे या टीवी न्यूज चैनलो मे रोज पढते और देखते है किंतु कवि के अनदेखा कर देते है। किंतु उनके संवदेनषील मन ने परिवेष के इन विविध विषयो को सूक्ष्म शब्दो मे अभिव्यक्त किया है। संकलन मे कुल 450 हाइकू संग्रहित है। सभी एक दूसरे से श्रेष्ठ है। पुस्तक का शीर्षक बूढा सूरज जिस हाइकू पर केनिद्रत है वह इस तरह है।
बूढा सूरज
खदेडे अंधियारे
अन्ना हजारे
वर्तमान सामाजिक सिथति मे अन्ना हजारे के लिये इससे बेहतर भला और क्या उपमा दी जा सकती है। कवि से और भी अनेक सूत्र स्वरूप हाइकू की अपेक्षा हिंदी जगत करता है। समीप जी ने गजले, कहानिया और कवितायें भी लिखी है पर हाइकू मे उन्होने जो कर दिखाया है उसके लिये यही कहा जा सकता है कि देखन मे छोटे लगे घाव करें गंभीर. समीप जी ने अपने अनुभवो के सागर को हाइकू के छोटे से गागर में सफलता पूर्वक ढ़ाल दिया है .



विवके रंजन श्रीवास्तव

Tuesday 4 September 2012

14 sept HINDI DIVAS PER VISHESH


तकनीक के माध्यम के रूप मे हिंदी की उपयुक्तता

विवेक रंजन श्रीवास्तव, 
ओ.बी. 11 एमपीईबी कालोनी 
रामपुर जबलपुर 

राष्ट्र की प्रगति मे तकनीकज्ञो का महत्वपूर्ण स्थान होता है। सच्ची प्रगति के लिये इंजीनियर का राष्ट्र की मूल धारा से जुडा होना अत्यंत आवष्यक है। आज तकनीकी का माध्यम अंग्रेजी हैै। इस तरह अपने अभियंताओं पर अंग्रेजी थोप कर हम उन्हें न केवल जन सामान्य से एवं उनकी समस्याओं से दूर कर रहे है वरन अपने अभियंताओं एवं वैज्ञानिको को पष्चिमी राष्ट्रो का रास्ता भी दिखा रहे है। 
अंग्रेजी क्यो! के जवाब मे कहा जाता है कि यदि हमने अंग्रेजी छोड दी तो हम दुनिया से कट जायेगें। किंतु क्या रूस, जर्मनी, फ्रंास, जापान, चीन इत्यादि देष वैज्ञानिक प्रगति मे किसी से पीछे है। क्या ये राष्ट्र  विष्व के कटे हुये है। इन राष्ट्रो मे तो तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी षिक्षा उनके अपनी राष्ट्रभाषा मे होती है। अंग्रेजी मे नहीं। 
वास्तव मे विष्व संपर्क के लिये केवल कुछ बडे राष्ट्रीय संस्थान एवं केवल कुछ वैज्ञानिक व अभियंता ही जिम्मेदार होते है जो उस स्तर तक पहुचंते पहुंचते आसानी से अंग्रेजी साीख सकते हेै। किंतु हम व्यर्थ ही सारे विद्यार्थियों को उनके अमूल्य 6 वर्ष एक सर्वथा नई भाषा सीखेने मे व्यस्त रखते है। दुनिया के अन्य राष्ट्रो की तुलना मे भारत से कही अधिक संख्या मे इंजीनियर्स तथा वैज्ञानिक विदेषो मे जाकर बस जाते है। इस पलायन का एक बहुत बडा कारण उनका अंग्रेजी मे प्रषिक्षण भी है। 
हिंदी को कठिन बताने के लिये प्रांय रेल के लिये लौेहपथगामनी जैसे शब्देा के गिने चुने उदाहरण लिये जाते है। हिंदी ने सदा से दूसरी भाषाओ को आत्मसात किया है। अतः ऐसे कुछ शब्द नागरी लिपि मे लिखते हुये हिंदी मे यथावत अपनाये  जा सकते है। हिंदी शब्द तकनीक के लिये यदि अंग्रेजी वर्णमाला का प्रयोग करे तो हम अंग्रेजी अनुवाद टेक्नीक के बहुत निकट है। इसी तरह संत के लिये सेंट, अंदर के लिये अंडर, नियर के लिये निकट जैसे ढेरो उदाहरण है। शब्दो की उत्पत्ति के विवाद मे न पडकर यह कहना उचित है कि हिंदी क्लिष्ट नही है। 
हमने एक गलत धारणा बना रही है कि नई तकनीक के जनक पष्चिमी देष ही  होते है। यह सही नही है। पुरातन ग्रंथो मे भारत विष्व गुरू के दर्जे पर था। हमारे वैज्ञानिको एवं तकनीकज्ञो मे नवीन अनुसंधान करने की क्षमता है। तब प्रष्न उठता है कि क्यो हम अंग्रेजी ही अपनाये। क्यो न हम दूसरो की अन्वेषित तकनीक के अनुकरण की जगह अपनी क्षेत्रीय स्थितियों के अनुरूप स्वंय की जरूरतो के अनुसार स्वंय अनुसंधान करे जिससे उसे सीखने के लिये दूसरो को हिंदी अपनाने की आवष्यकता महसूस हो। 
जब अत्याधुनिक जटिल कार्य करने वाले कप्यूटरर्स की चर्चा होती है तो आम आदमी की भी उनमे सहज रूचि होती है एवं वह भी उनकी कार्यप्रणाली समझना चाहता है। किंतु भाषा का माध्यम बीच मे आ जाता है और जन सामान्य वैज्ञानिक प्रयोगो को केवल चमत्कार समझ कर अपनी जिज्ञासा शांत कर लेता है। इसकी जगह यदि इन प्रयोगो की विस्तृत जानकारी देकर हम लोगो की जिज्ञासा को और बढा सके तो निष्चित ही नये नये अनुसंधान को बढावा मिलेगा। इतिहास गवाह है कि अनेक ऐसे खोजे हो चुकी है जो विज्ञान के अध्येताओ ने नही किंतु आवष्यकता के अनुरूप अपनी जिज्ञासा के अनुसार जनसामान्य ने की है। 
यह विडंबना है कि ग्रामीण विकास के लिये विज्ञान जैसे विषयो पर अंग्रेजी मे बडी बडी संगोष्ठिया तो होती है किंतु इनमे जिनके विकास की बाते होती है वे ही उसे समझ नही पाते। मातृभाषा मे मानव जीवन के हर पहलू पर बेहिचक भाव व्यक्त करने की क्षमता होती है। क्योंकि बचपन से ही व्यक्ति मातृभाषा मे बोलता पढता लिखता और समझता है। फिर विज्ञान या तकनीक ही मातृभाषा मे नही समझ सकता ऐसा सोचना नितांत गलत है। 
आज हिंदी अपनाने की प्रक्रिया का प्रांरभ एक 10 -20 पन्नो की त्रैमासिक या छैमाही पत्रिका के प्रारंभ से होता है जो दो चार अंको के बाद साधनो के अभाव मे बंद हो जाती है। यदि हम हिंदी अपनाने के इस कार्य के प्रति ऐसे ही उदासीन रहे तो भावी पीढिया हमे क्षमा नही करेगी। हिंदी अपनाने के महत्व पर भाषण देकर या हिंदी परिषद के कार्यक्रमो मे हिंदी दिवस मनाकर हिंदी के प्रति हमारे कर्तव्यो की इतिश्री नही हो सकती। हमे सच्चे अर्थो मे प्रयोग के स्तर पर हिंदी को अपनाना होगा। तभी हम मातृभाषा हिंदी को उसके सही मुकाम पर पहुंचा पायेगें। 
हिंदी ग्रथ अकादमी हिंदी मे तकनीकी साहित्य छापती है। बडी बडी प्रदर्षनिया इस गौरव के साथ लगाई जाती है कि हिंदी मे तकनीकी साहित्य उपलब्ध है। किंतु इन ग्रंथो का कोई उपयोग नही करता। यहाॅ तक की इन पुस्तको के दूसरे संस्करण तक छप नही पाते। क्योंकि विष्वविद्यालयो मे तकनीकी का माध्यम अंग्रेजी ही है। यह स्थिति निराषाजनक है। हिंदी को प्रांय सामम्प्रदायिकता क्षेत्रीयता एवं जातीयता के रंग मे रंगकर निहित स्वार्थेो वाले राजनैतिक लोग भाषाई धु्रवीकरण करके अपनी रोटिया सेकते नजर आते है। हमे एक ही बात ध्यान मे रखनी है कि हम हिंदुस्तानी है। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है यदि राष्ट्रीयता की मूल भावना से हिंदी को अपनाया जावेगा तो यही हिंदी राष्ट्र की अखंडता और विभिन्नता मे एकता वाली हमारी संस्कृति के काष्मीर के कन्याकुमारी तक फैले विभिन्न रूपो को परस्पर पास लाने मे समर्थ होगी। 
यही हिंदी भारतीय ग्रामो के सच्चे उत्थान के लिये नये विज्ञान और नई तकनीक को जनम देगी। हमे चाहिये कि एक निष्ठा की भावना से कृतसंकल्प होकर व्यवहारिक दृष्टिकोण से हिंदी को अपनाने मे जुट जावे। अंग्रेजी के इतने गुलाम मत बनिये कि कल जब आप हिंदी की मांग करने निकले तो चिल्लाये कि वी वांट हिंदी। 

vivek ranjan shrivastava

Wednesday 29 August 2012


नाम करेगा रोशन , जग में तेरा राजदुलारा ...
जबलपुर क्राइस्ट चर्च से वर्ष २०१० में १२ की परीक्षा पास करके , आई आई टी में सेलेक्शन होने के बाद भी अमिताभ श्रीवास्तव ने विज्ञान में अभिरुचि के चलते भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर का बी एस कोर्स ज्वाइन किया . किशोर वैज्ञानिक के रूप में देश के चुनिंदा १०० बच्चो का चयन प्रति वर्ष आई आई एस सी में होता है . वहां जल्दी ही अमिताभ ने पहले २ बच्चो में अपना स्थान बना लिया . २००६ से प्रति वर्ष किसी न किसी एशियन देश में किशोर युवा वैज्ञानिको का एक कैम्प हो रहा है . अब तक ताइवान , बाली , इणडोनेशिया , मुम्बई भारत सहित कोरिया में यह वार्षिक आयोजन  हो चुका है . इस वर्ष २४ अगस्त से १ सितम्बर तक ६ वां एशियन साइंस कैम्प जेरूसलम इजराइल में चल रहा है . जिसमें नोबल पुरस्कार से सम्मानित वैज्ञनिक बच्चो से सीधा संवाद कर रहे हैं . आयोजन के उद्घाटन के अवसर पर इजराइल के राष्ट्रपति ने प्रीति भोज में आशा व्यक्त की कि आगामी समय में विज्ञान ही दुनिया को परस्पर जोड़ने का कार्य करेगा . भारत के सर्वोच्च विज्ञान संस्थानो से कुल २९ बच्चे किशोर वैज्ञानिक के रूप में इस अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सेदारी कर रहे हैं . अमिताभ श्रीवास्तव इस विज्ञान सम्मेलन में आई आई एस सी के प्रतिनिधि के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं . अमिताभ म. प्र. पूर्वी क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी में अतिरिक्त अधीक्षण इंजीनियर मण्डला के श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव व कल्पना श्रीवास्तव के सुपुत्र हैं , वे वरिष्ठ कवि प्रो सी बी श्रीवास्तव के नाती हैं .

Friday 10 August 2012

पं. रामेश्वर गुरू कलम से ही नहीं मैदानी कार्यो से भी आम आदमी के प्रतिनिधी पत्रकार


पं. रामेश्वर गुरू  कलम से ही नहीं मैदानी कार्यो से भी आम आदमी के प्रतिनिधी पत्रकार

....विवेक रंजन श्रीवास्तव
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर
मो ९४२५८०६२५२

वर्ष १९५० का दशक , तब जबलपुर एक छोटा शहर था। कुल दो कालेज थे। विश्वविद्यालय नहीं था। तब शहर के साहित्य के केंद्र में पं. भवानी प्रसाद तिवारी तथा रामेश्वर गुरू थे।शहर के अन्य व्यक्ति जो बहुत अध्ययनशील तथा रचनाशील थे, वे थे बाबू रामानुजलाल श्रीवस्तव ऊंट’ , नाटककार बाबू गोविंद दास , सुभद्रा कुमारी चौहान भी थी, जिनका बड़ा रौब-दाब था। परसाई जी व अन्य युवा लेखक व पत्रकार इन सुस्थापित व्यक्तित्वो से संपर्क में रहकर अपनी कलम को दिशा दे रहे थे. पं रामेश्वर गुरु ने पत्रकारिता के शिक्षक की भूमिका भी इन नये लेखको के लिये स्वतः ही अव्यक्त रूप से निभाई .
‘अमृत बाजार पत्रिका’ दैनिक समाचार पत्र के प्रतिनिधि के रूप में पं रामेश्वर गुरू
वर्ष १९४६ में पं. रामेश्वर गुरू जी जबलपुर के प्रतिष्ठित क्राइस्ट चर्च के हाई स्कूल में अध्यापक थे पर साथ ही वे आजीवन एक सजग पत्रकार भी रहे । उनकी पत्रकारिता में भी रचनात्मक गुण थे। अपने लेखन से ‘अमृत बाजार पत्रिका’ दैनिक समाचार पत्र के प्रतिनिधि के रूप में उन्होने जबलपुर की सकारात्मक छबि राष्ट्रीय स्तर पर बनाई .
प्रहरी के संपादक  
वर्ष १९४७ मे तिवारी जी और गुरू जी के संपादकत्व में ‘प्रहरी’ साप्ताहिक पत्र जबलपुर से निकला। यह तरूण समाजवादियों का पत्र था और प्रखर था। इसी पत्र में परसाई उपनाम से हरिशंकर परसाई जी की  पहली रचना छपी . परसाई जी ने अपने संस्मरण में लिखा है कि  प्रहरी के माध्यम से ही  गुरू जी से उनका परिचय हुआ। वे उनके घर जाने लगे। उनके निकट जाने पर परसाई जी को मालूम हुआ कि गुरू जी कितने अध्ययनशील साहित्य प्रेमी और रचनाकार थे।
प्रहरी’ में वे नियमित लिखते थे। गंभीर भी, आलोचनात्मक भी और व्यंग्यात्मक भी। उनकी भाषा बहुत प्रखर और बहुत जीवंत थी। वे ‘प्रहरी’ में इस प्रतिभा के साथ बहुत धारदार लेख लिखते थे। उनके लेखों में  गहरी संवेदना होती थी। वे गरीबों, शोषितों के पक्षधर थे। इस वर्ग के लोगों पर उनके रेखाचित्र बहुत संवेदनपूर्ण और बहुत मार्मिक है। दूसरी तरफ़ वे सत्ता और उच्चवर्ग की आत्मकेंद्रित जीवन शैली के विरोधी थे। सत्ता चाहें राजनैतिक हो या आर्थिक या साहित्यिक- उस पर वे प्रहार करते थे। घातक प्रव्रत्तियों में लिप्त बड़े व्यक्तियों पर वे बिना किसी डर के बहुत कटु प्रहार करते थे।
पं. रामेश्वर गुरू का व्यंग काव्य
‘प्रहरी’ में वे व्यंग्य काव्य भी लिखते थे जिसका शीर्षक था- बीवी चिम्पो का पत्र। यह हर अंक में छपता था और लोग इसका इंतजार करते थे। उसी पत्र में ‘राम के मुख से’ कटाक्ष भी वे लिखते थे।
पं. रामेश्वर गुरू का बाल साहित्य
‘प्रहरी’ में एक पृष्ठ बच्चों के लिए होता था। उसे गुरू जी संपादित करते थे और इसमें लिखते भी थे। यह पृष्ठ सुदन और मुल्लू के नाम से जाता था। "सुदन" पं भवानी प्रसाद तिवारी जी का घर का नाम था और "मुल्लू" गुरू जी का। गुरू जी बाल साहित्य में बहुत रूचि लेते थे और उन्होंने बच्चों के लिए नाटक भी लिखे थे। ‘प्रहरी’ की फ़ाइलों में उनका लिखा ढेर सारा बाल साहित्य है, जिसके संकलन तैयार किये जाने चाहिये .
‘वसुधा’ मासिक पत्रिका में सहयोग
पं. रामेश्वर गुरू का बहुत महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्य ‘वसुधा’ मासिक पत्रिका का पौने तीन वर्षों तक प्रकाशन था। इस पत्रिका में सहयोग सबका था, पर ‘वसुधा’ तब बिखरे हुए प्रगतिशील साहित्यकारों की पत्रिका थी।गुरू जी बौद्धिक भी थे और भावुक भी। वे छायावादी युग के थे, मगर छायावादी कविताएं उन्होंने नहीं लिखी। वे दूसरे प्रकार के कवि थे। माखनलाल चतुर्वेदी का प्रभाव उन पर था, पर वह प्रभाव प्यार, मनुहार, राग का नहीं, राष्ट्र्वाद का था। भाषा श्री माखनलाल जी से प्रभावित थी। कवि भवानी प्रसाद मिश्र उनके अभिन्न मित्र थे। कुछ प्रभाव उनका भी रहा होगा। गुरू जी की कविताओं पर न निराला का प्रभाव है, न पंत का। इस मामले में वे सर्वथा स्वतंत्र थे। उनकी कविताओं में देश प्रेम, सुधारवादिता, और जनवादिता है। वे संवेदनशील थे और गरीब शोषित वर्ग के प्रति उनकी स्थाई सहानुभूति थी। वे इस वर्ग के संघर्ष, अभाव और दुख पर कविताएं लिखते थे। वे उदबोधन काव्य भी लिखते थे। तरूणों का, मजदूरों का, संघर्ष और परिवर्तन के लिए आव्हान अपनी कविताओं में वे करते थे।
उनकी शब्द-सामर्थ्य बहुत थी और वे मुहावरों के धनी  थे। वे बहुत अच्छी बुंदेली जानते थे और उनकी बुंदेली कविताएं बहुत अच्छी है। व्यंग्य काव्य अकसर वे बुंदेली में लिखते थे।

पं. रामेश्वर गुरू  मैदानी कार्यो से भी जनता के प्रतिनिधी पत्रकार
पं. रामेश्वर गुरू ने जनता के प्रतिनिधी पत्रकार की भूमिका न केवल कलम से वरन अपने मैदानी कार्यो से भी निभाई है .  सुभद्राकुमारी चौहान की प्रतिमा की स्थापना नगर निगम कार्यालय के सामनेवाले लान में उन्होने ही  कराई। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के अभिनंदन में समारोह आयोजित किया। चिकित्सक और राजनीतिज्ञ डा. डिसिल्वा की स्मृति में उन्होंने डिसिल्वा रतन श्री माध्यमिक विद्यालय की  स्थापना कराई। वे जब शहर के मेयर बने, तब महात्मा गांधी और पंडित मदनमोहन मालवीय की आदमकद प्रतिमाओं की स्थापना उन्होने करवाई। अपने मित्र प्रसिद्ध पत्रकार हुकुमचंद नारद की स्मृति में उन्होंने विक्टोरिया अस्पताल में विश्राम-कक्ष भी बनवाया।
इस तरह पं. रामेश्वर गुरू  ने पत्रकारिता के वास्तविक मायने और आदर्श हमारे सामने रखे हैं , जिनके अनुसार पत्रकारिता केवल स्कूप स्टोरी या सनसनी फैलाना नही वरन समाज और लोकतंत्र के चौथे  स्तंभ के रूप में जनहितकारी सशक्त भूमिका का निर्वहन है .

Saturday 4 August 2012

लव मैरिज या अरेंज्ड मैरिज ?


लव मैरिज या अरेंज्ड मैरिज ?


लव तो हो ही जाता है , दो युवाओ में .

पर शादी केवल लव ही तो नही है !

सक्सेजफुल शादी के लिये .

लव के साथ जरूरी होता है ,

कमिटमेंट भी . फेथ भी . म्युचुएल रिस्पेक्ट भी .

अब परिवार नहीं होते बहुत बड़े ,

भाई बहिन , माँ पिता से

जो प्रगाढ़ रिलेशन होते हैं ,लड़के या लड़की के ,

वे शादी के बाद भी बने रहें ,

इसलिये जरूरी होता है एडजसमेंट भी , शादी में.

मतलब अरेंज्ड लव मैरिज हो

या
अरेंज्ड मैरिज तब की जाये

जब एक दूसरे को समझने लगें पार्टनर्स

चैटिंग से , मीटिंग से और मोबाइल पर लम्बी लम्बी बातों से

मतलब शादी हो तब , जब हो जाये  लव !

Friday 4 May 2012

खण्ड खण्ड मत करो इसे घर तो यह मेरा है !

खण्ड खण्ड मत करो इसे घर तो यह मेरा है ! माननीय सुप्रिम कोर्ट ने उ. प्र. में बिना वास्तविक सर्वे के ही , राजनैतिक हितो के लिये आदिम जनजाति तथा अनुसूचित जनजाति के सरकारी कर्मचारियो को विभागीय पदोन्नति में निरंतर आरक्षण का लाभ देने के सरकारी फैसले को गलत निरूपित किया है . माननीय न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिये संसद में कानून लाने की राजनैतिक चर्चा सरगर्मी पर है .देश की यह स्थिति बहुत खेदजनक है . जब संविधान बनाया गया था तब क्या इसी तरह के आरक्षण की कल्पना की गई थी ? क्या स्वयं बाबा साहब अंबेडकर यह नही चाहते थे कि दलित वर्ग के भारतीय नागरिक भी बराबरी से देश की मूल धारा में शामिल हों ? क्या ६५ सालो से लगातार आरक्षण के मुद्दे का राजनैतिक उपयोग नही हो रहा है ? क्या जातिगत आरक्षण के आधार पर आवश्यकता से अधिक ऊपर उठे हुये दलित वर्ग को आज समाज में बेवजह हीन भावना का शिकार नही बनना पड़ता ! क्या इस तरह के एक्सलेरेटेड प्रमोशन के चलते सारे सरकारी विभागो के शीर्ष पदो पर कम दक्ष लोगो का बोलबाला नही हो गया है ? जिसके चलते सही निर्णयो की जगह राजनैतिक , व्यक्तिगत हितो वाले निर्णय नहीं हो रहे हैं ? इस सारी प्रक्रिया से देश क्या सवर्णो के प्रतिभावान व्यक्तियो को कुंठित नही कर रहा है ? क्या हम इस व्यवस्था से एक नये वर्ग संघर्ष को जन्म नही दे रहे हैं ? ऐसे ढ़ेर से सवाल हर बुद्धिजीवी के मन में कौंध रहे हैं . पर ये सारे प्रश्न , अनुत्तरित हैं ! किसी नेता में यह साहस नही है कि वह सत्य को सही तरीके से प्रस्तुत कर जनता को विश्वास में लेकर देश को घुटन से बचावे . जो संगठन आरक्षण के विरोध में सामने आ रहे हैं वे केवल प्रतिक्रिया में उपजते हैं , उनके भी अपने निहित स्वार्थ मात्र हैं . किसी को उस आदर्श की रत्ती भर भी चिंता नही है जो संविधान की मूल भावना है . संविधान देश के प्रत्येक नागरिक को जाति , धर्म , वर्ग , क्षेत्रीयता से हटकर बराबरी का दर्जा देता है , पर जिस तरह का शासन देश में चल रहा है , क्या उसके चलते आज से सौ बरस बाद भी ऐसी आदर्श बराबरी की कल्पना हम आप कर सकते हैं ? क्षुद्र स्वार्थो के चलते राज्य विखण्डित किये जा रहे हैं , सरकारी तंत्र में नये नये विभाग , निगम , मण्डल और कंपनियां बनाकर अपने लोग बैठाये जा रहे हैं ! उपर से तुर्रा यह है कि राजनेता ऐसी हर विखण्डन की कार्यवाही को विकास से जोड़कर जनहित में बताते हैं , और हम सब मौन सुनने को बाध्य हैं . लोकतंत्र के नाम पर सरकारें बनाने , सरकारें चलाने के लिये छोटे छोटे दल राजनैतिक सौदेबाजी , निगोशियेशन , पैकेज डील को सही निरूपित कर रहे हैं ! यदि कोई बाबा रामदेव या केजरीवाल की तरह संसद में बैठे लोगो के विरुद्ध कोई अंगुली भी उठाता है तो ये ही लोकतंत्र के पुजारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को तिलांजली देकर उसके विरुद्ध हर संभव जांच प्ररंभ करने को भी सही सिद्ध करने से बाज नही आते . मैं केवल एक तटस्थ शुद्ध भारतीय नागरिक की हैसियत से सोचने की अपील करना चाहता हूं , जब आप यह भूलकर कि आप किस जाति , संप्रदाय या पार्टी के हैं , विशाल हृदय और सार्वभौमिक दृष्टि से सोचकर नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत पर मनन करेंगे तो आप भी वही निर्णय लेंगे जिसकी झलक सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले में ध्वनित होती है . यह सही है कि न्यायालयीन फैसला संवैधानिक और नियमो की धाराओ , उपधाराओ में बंधा हो सकता है , पर एक कानून न जानने वाला मेरे जैसा साधारण देश प्रेमी नागरिक यही कहेगा कि आरक्षण से खण्ड खण्ड मत करो इसे , घर तो यह मेरा है ! विवेक रंजन श्रीवास्तव

Thursday 29 March 2012

कुछ भी कहो बाइक वाले लड़के होते स्मार्ट हैं !!

हाय ! कुछ भी कहो बाइक वाले लड़के होते स्मार्ट हैं !!
विवेक रंजन श्रीवास्तव
९४२५८०६२५२
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , जबलपुर
बात उन दिनो की है जब मैं भोपाल में एमएसीटी में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था ,कालेज की उम्र का तकाजा था कि लड़कियो के कमेंट भीड़ में भी बहुत साफ सुनाई पड़ते थे . एमएसीटी की पहाड़ी से नीचे उतरकर हम प्रायः शाम को न्यूमार्केट में टाइमपास करते थे . मुझे आज भी वह आवाज और वह सुंदर चेहरा याद है , मैं अपने मित्र के साथ बाइक पर तेज रफ्तार से निकला , लड़कियो का एक ग्रुप भी पैदल जा रहा था , पीछे से एक लड़की की आवाज आई ..".हाय ! कुछ भी कहो बाइक वाले लड़के होते स्मार्ट हैं !!" मैने पलट कर देखा वे हमारे ही विषय में बातें कर रही थी , और एक सुंदर लड़की का कमेंट था यह .
दूसरी घटना अभी २५ बरस बाद की है . सनडे का दिन था , हम मजे में लंच ले कर उठे ही थे कि मोबाइल बजा . रिलांयस वर्ल्ड एक्जाम सेंटर से फोन था , मेरे बेटे का कम्प्यूटर ओलमंपियाड का एक्जाम था , हमें बिल्कुल याद नही थी . एक्जाम सेंटर से फोन आया कि रिपोर्टिंग टाइम हो चुका है ! अभी तक मेरा बेटा "अमिताभ" वहाँ पहुंचा क्यो नही है ? हम शाक्ड थे ! मैंने तुरंत बाईक निकाली , बेटा जैसे कपड़ो में था उसे वैसे ही बैठाकर निकल पड़ा , सिग्नल की परवाह नही , बेटे को ढ़ाड़स भी बधाता जा रहा था , आंखे सड़क पर २०० मीटर आगे देख रही थी ...शायद मैने अब तक की सबसे तेज ड्राइविंग की उस दिन , कालेज वाले दिनो से भी तेज ! लगभग ५ मिनट बाद ही हम , घर से कोई ५ किमी दूर एक्जाम सेंटर पर थे , जो बीच बाजार , जबलपुर की माडल रोड पर है . बेटा परीक्षा में भीतर गया , तो रिसेप्शनिस्ट ने मुस्कराते हुये उससे कहा "बाइक वाले लड़के होते स्मार्ट हैं !!" ..मुझे एकदम से अपने कालेज के दिनो वाली घटना याद हो आयी .
बाद में जब रिजल्ट आया तो बेटे ने उस ओलंपियाड में प्रदेश में टाप भी किया .

Friday 23 March 2012

समय ही इनके प्रयासो का मूल्यांकन करेगा

हिन्दी ब्लागिंग के विगत वर्ष ....

पारिवारिक साहित्यिक संस्कारो के चलते लिखना छपना तो स्कूल के दिनो से ही प्रारंभ हो गया था , २००५ में हिन्दी ब्लागिंग प्रारंभ कीhttp://vivekkenamaskar.blogspot.in/ और दुनिया से सीधे जुड़ गया . मजा आता था ,न ही संपादक जी की कैंची चल पाती थी, न तो छपने के लिये इंतजार करना होता था , और संपादक के खेद सहित वापसी के लिफाफे का तो डर ही नही था .

ब्लाग विथ ए मिशन http://nomorepowertheft.blogspot.com/ भी चल रहा है .
ब्लाग एग्रीगेटर , ब्लागवाणी , नारद जी के सौजन्य से घण्टे दो घण्टो में ढ़ेर सी प्रतिक्रियायें भी आ जाती थीं .

फिर मैने वेब दुनिया पर भी ब्लागिंग की http://duniyagolhai.mywebdunia.com/

. ग्रुप ब्लागो में भी लिखा , कई कई जगह http://bhadas.blogspot.in/
.
मित्रो के साथ मिलकर दिव्य नर्मदा http://divyanarmada.blogspot.in/जैसी साहित्यिक पत्रिका भी ब्लाग पर बना डाली .

पर इन दिनो जो मजा जागरण जंक्शन पर आ रहा है वह नयापन लिये हुये है . कमी बस इतनी है कि अब तक ब्लाग लेखन पर पारिश्रमिक की कोई व्यवस्था नही है , मतलब जो घर बेचे आपनो चले हमारे साथ ....
हमारे जैसे सैकड़ो धुनी इस हिन्दी सेवा में लगे ही हैं . समय ही इनके प्रयासो का मूल्यांकन करेगा .