Thursday, 27 August, 2020

बुन्देली की बात

 बुंदेली और स्व डॉ पूरनचंद श्रीवास्तव जी जैसे बुंदेली विद्वानो की सुप्रतिष्ठा जरूरी  

 .. विवेक रंजन श्रीवास्तव , शिला कुंज , नयागांव ,जबलपुर ४८२००८

ईसुरी बुंदेलखंड के सुप्रसिद्ध लोक कवि हैं ,उनकी रचनाओं में ग्राम्य संस्कृति एवं सौंदर्य का चित्रण है। उनकी ख्‍याति फाग के रूप में लिखी गई रचनाओं के लिए सर्वाधिक है,  उनकी रचनाओं में बुन्देली लोक जीवन की सरसता, मादकता और सरलता और रागयुक्त संस्कृति की रसीली रागिनी से जन मानस को मदमस्त करने की क्षमता है।

बुंदेली बुन्देलखण्ड में बोली जाती है। यह कहना कठिन है कि बुंदेली कितनी पुरानी बोली हैं लेकिन ठेठ बुंदेली के शब्द अनूठे हैं जो सादियों से आज तक प्रयोग में आ रहे हैं। बुंदेलखंडी के ढेरों शब्दों के अर्थ बंगला तथा मैथिली बोलने वाले आसानी से बता सकते हैं। प्राचीन काल में राजाओ के परस्पर व्यवहार में  बुंदेली में पत्र व्यवहार, संदेश, बीजक, राजपत्र, मैत्री संधियों के अभिलेख तक सुलभ  है। बुंदेली में वैविध्य है, इसमें बांदा का अक्खड़पन है और नरसिंहपुर की मधुरता भी है। वर्तमान बुंदेलखंड क्षेत्र में अनेक जनजातियां निवास करती थीं। इनमें कोल, निषाद, पुलिंद, किराद, नाग, सभी की अपनी स्वतंत्र भाषाएं थी, जो विचारों अभिव्यक्तियों की माध्यम थीं। भरतमुनि के नाट्य शास्‍त्र में भी बुंदेली बोली का उल्लेख मिलता है .  सन एक हजार ईस्वी में बुंदेली पूर्व अपभ्रंश के उदाहरण प्राप्त होते हैं। जिसमें देशज शब्दों की बहुलता थी। पं॰ किशोरी लाल वाजपेयी, लिखित हिंदी शब्दानुशासन के अनुसार हिंदी एक स्वतंत्र भाषा है, उसकी प्रकृति संस्कृत तथा अपभ्रंश से भिन्न है। बुंदेली प्राकृत शौरसेनी तथा संस्कृत जन्य है।  बुंदेली की अपनी चाल,  प्रकृति तथा वाक्य विन्यास की अपनी मौलिक शैली है। भवभूति उत्तर रामचरित के ग्रामीणों की भाषा विंध्‍येली प्राचीन बुंदेली ही थी। आशय मात्र यह है कि बुंदेली एक प्राचीन , संपन्न , बोली ही नही परिपूर्ण लोकभाषा है . आज भी बुंदेलखण्ड क्षेत्र में घरो में बुंदेली खूब बोली जाती है . क्षेत्रीय आकाशवाणी केंद्रो ने इसकी मिठास संजोई हुयी हैं .

ऐसी लोकभाषा के उत्थान , संरक्षण व नव प्रवर्तन का कार्य तभी हो सकता है जब क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों ,संस्थाओ , पढ़े लिखे विद्वानो के  द्वारा बुंदेली में नया रचा जावे . बुंदेली में कार्यक्रम हों . जनमानस में बुंदेली के प्रति किसी तरह की हीन भावना न पनपने दी जावे , वरन उन्हें अपनी माटी की इस सोंधी गंध , अपनापन ली हुई भाषा के प्रति गर्व की अनुभूति हो . प्रसन्नता है कि बुंदेली भाषा परिषद , गुंजन कला सदन , वर्तिका जैसी संस्थाओ ने यह जिम्मेदारी उठाई हुई है . प्रति वर्ष १ सितम्बर को स्व डा पूरन चंद श्रीवास्तव जी के जन्म दिवस के सु अवसर पर बुंदेली पर केंद्रित अनेक आयोजन गुंजन कला सदन के माध्यम से होते हैं .

आवश्यक है कि बुंदेली के विद्वान लेखक , कवि , शिक्षाविद स्व पूरन चंद श्रीवास्तव जी के व्यक्तित्व , विशाल कृतित्व से नई पीढ़ी को परिचय कराया जाते रहे . जमाना इंटरनेट का है . इस कोरोना काल में सास्कृतिक  आयोजन तक यू ट्यूब , व्हाट्सअप ग्रुप्स व फेसबुक के माध्यम से हो रहे हैं , किंतु बुंदेली के विषय में , उसके लेकको , कवियों , साहित्य के संदर्भ में इंटरनेट पर जानकारी नगण्य है .

स्व पूरन चंद श्रीवास्तव जी का जन्म १ सितम्बर १९१६ को ग्राम रिपटहा , तत्कालीन जिला जबलपुर अब कटनी में हुआ था . कायस्थ परिवारों में शिक्षा के महत्व को हमेशा से महत्व दिया जाता रहा है , उन्होने अनवरत अपनी शिक्षा जारी रखी , और पी एच डी की उपाधि अर्जित की .वे हितकारिणी महाविद्यालय जबलपुर से जुड़े रहे और विभिन्न पदोन्तियां प्रापत करते हुये प्राचार्य पद से १९७६ में सेवानिवृत हुये . यह उनका छोटा सा आजीविका पक्ष था . पर इस सबसे अधिक वे मन से बहुत बड़ साहित्यकार थे . बुंदेली लोक भाषा उनकी अभिरुचि का प्रिय विषय था . उन्होंने बुंदेली में और बुंदेली के विषय में खूब लिखा . रानी दुर्गावती बुंदेलखण्ड का गौरव हैं . वे संभवतः विश्व की पहली महिला योद्धा हैं जिनने रण भूमि में स्वयं के प्राण न्यौछावर किये हैं . रानी दुर्गावती पर श्रीवास्तव जी का खण्ड काव्य बहु चर्चित महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है . भोंरहा पीपर उनका एक और बुंदेली काव्य संग्रह है . भूगोल उनका अति प्रिय विषय था और उन्होने भूगोल की आधा दर्जन पुस्तके लिखि , जो शालाओ में पढ़ाई जाती रही हैं . इसके सिवाय अपनी लम्बी रचना यात्रा में पर्यावरण , शिक्षा पर भी उनकी किताबें तथा विभिन्न साहित्यिक विषयों पर स्फुट शोध लेख , साक्षात्कार , अनेक प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओ में प्रकाशन आकाशवाणी से प्रसारण तथा संगोष्ठियो में सक्रिय भागीदारी उनके व्यक्तित्व के हिस्से रहे हैं . मिलन , गुंजन कला सदन , बुंदेली साहित्य परिषद , आंचलिक साहित्य परिषद जैसी अनेकानेक संस्थायें उन्हें सम्मानित कर स्वयं गौरवांवित होती रही हैं . वे उस युग के यात्री रहे हैं जब आत्म प्रशंसा और स्वप्रचार श्रेयस्कर नही माना जाता था , एक शिक्षक के रूप में उनके संपर्क में जाने कितने लोग आते गये और वे पारस की तरह सबको संस्कार देते हुये मौन साधक बने रहे .

उनके कुछ चर्चित बुंदेली  गीत उधृत कर रहा हूं ...


कारी बदरिया उनआई....... ️

 कारी बदरिया उनआई,  हां काजर की झलकार ।

सोंधी सोंधी धरती हो गई,  हरियारी मन भाई,खितहारे के रोम रोम में,  हरख-हिलोर समाई ।ऊम झूम सर सर-सर बरसै,  झिम्मर झिमक झिमकियाँ ।लपक-झपक बीजुरिया मारै,  चिहुकन भरी मिलकियां ।रेला-मेला निरख छबीली-  टटिया टार दुवार,कारी बदरिया उनआई,हां काजर की झलकार ।

औंटा बैठ बजावै बनसी,  लहरी सुरमत छोरा ।  अटक-मटक गौनहरी झूलैं,  अमुवा परो हिंडोरा ।खुटलैया बारिन पै लहकी,  त्योरैया गन्नाई ।खोल किवरियाँ ओ महाराजा  सावन की झर आई  ऊँचे सुर गा अरी बुझाले,  प्रानन लगी दमार,कारी बदरिया उनआई,  हां काजर की झलकार ।

मेंहदी रुचनियाँ केसरिया,  देवैं गोरी हाँतन ।हाल-फूल बिछुआ ठमकावैं  भादों कारी रातन ।माती फुहार झिंझरी सें झमकै  लूमै लेय बलैयाँ-घुंचुअंन दबक दंदा कें चिहुंकें,  प्यारी लाल मुनैयाँ ।हुलक-मलक नैनूँ होले री,  चटको परत कुँवार,कारी बदरिया उनआई,  हाँ काजर की झलकार ।

इस बुंदेली गीत के माध्यम से उनका पर्यावरण प्रेम स्पष्ट परिलक्षित होता है .


इसी तरह उनकी  एक बुन्देली कविता में जो दृश्य उनहोंने प्रस्तुत किया है वह सजीव दिखता है .

बिसराम घरी भर कर लो जू...-------------

बिसराम घरी भर कर लो जू, झपरे महुआ की छैंयां,ढील ढाल हर धरौ धरी पर,  पोंछौ माथ पसीना ।तपी दुफरिया देह झांवरी,  कर्रो क्वांर महीना ।भैंसें परीं डबरियन लोरें,   नदी तीर गई गैयाँ ।बिसराम घरी भर कर लो जू,  झपरे महुआ की छैंयां ।

सतगजरा की सोंधी रोटीं,  मिरच हरीरी मेवा ।खटुवा के पातन की चटनी,  रुच को बनों कलेवा ।करहा नारे को नीर डाभको,  औगुन पेट पचैयाँ ।बिसराम घरी भर कर लो जू,  झपरे महुआ की छैंयां ।

लखिया-बिंदिया के पांउन उरझें,  एजू डीम-डिगलियां ।हफरा चलत प्यास के मारें,  बात बड़ी अलभलियां ।दया करो निज पै बैलों पै,  मोरे राम गुसैंयां ।बिसराम घरी भर कर लो जू,  झपरे महुआ की छैंयां ।


 वे बुन्देली लोकसाहित्य एवं भाषा विज्ञान के विद्वान थे . सीता हरण के बाद श्रीराम की मनः स्थिति को दर्शाता उनका एक बुन्देली गीत यह स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त है कि राम चरित मानस के वे कितने गहरे अध्येता थे .

अकल-विकल हैं प्रान राम के----------------

अकल-विकल हैं प्रान राम के  बिन संगिनि बिन गुँइयाँ ।फिरैं नाँय से माँय बिसूरत,  करें झाँवरी मुइयाँ ।

पूछत फिरैं सिंसुपा साल्हें,  बरसज साज बहेरा ।धवा सिहारू महुआ-कहुआ,  पाकर बाँस लमेरा ।

वन तुलसी वनहास माबरी,  देखी री कहुँ सीता ।दूब छिछलनूं बरियारी ओ,  हिन्नी-मिरगी भीता ।

खाई खंदक टुंघ टौरियाँ,   नादिया नारे बोलौ ।घिरनपरेई पंडुक गलगल,  कंठ - पिटक तौ खोलौ  ।ओ बिरछन की छापक छंइयाँ,  कित है जनक-मुनइयाँ ?अकल-विकल हैं प्रान राम के  बिन संगिनि बिन गुँइयाँ ।

उपटा खांय टिहुनिया जावें,  चलत कमर कर धारें ।थके-बिदाने बैठ सिला पै,  अपलक नजर पसारें ।

मनी उतारें लखनलाल जू,  डूबे घुन्न-घुनीता ।रचिये कौन उपाय पाइये,  कैसें म्यारुल सीता ।

आसमान फट परो थीगरा,  कैसे कौन लगावै ।संभु त्रिलोचन बसी भवानी,  का विध कौन जगावै ।कौन काप-पसगैयत हेरें,  हे धरनी महि भुंइयाँ ।अकल-विकल हैं प्रान राम के  बिन संगिनि बिन गुँइयाँ ।


बुंदेली भाषा का भविष्य नई पीढ़ी के हाथों में है , अब वैश्विक विस्तार के सूचना संसाधन कम्प्यूटर व मोबाईल में निहित हैं , समय की मांग है कि स्व डा पूरन चंद श्रीवास्तव जैसे बुंदेली के विद्वानो को उनका समुचित श्रेय व स्थान , प्रतिष्ठा मिले व बुंदेली भाषा की व्यापक समृद्धि हेतु और काम किया जावे .

विवेक रंजन श्रीवास्तव  

Sunday, 5 July, 2020

अकाब --/ प्रबोध गोविल , पुस्तक चर्चा


पुस्तक समीक्षा
अकाब
उपन्यास
लेखक प्रबोध कुमार गोविल
दिशा प्रकाशन दिल्ली
मूल्य २०० रु
पृष्ठ १२८

हिन्दी में समसामयिक मुद्दो पर कम ही उपन्यास  लिखे जा रहे हैं . ऐसे समय में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर पर अलकायदा के हमले के संदर्भ को लेकर कहानी बुनते हुये , ग्लोबल विलेज बनती दुनियां से पात्र चयन कर "अकाब" लिखा गया है . जिसमें जापान से प्रारंभ नायक की यात्रा , न्यूयार्क और जम्मू काश्मीर तक का सफर करती है . एक मूलतः जापानी मसाज बाय के जीवन परिदृश्य को  कहानी में बखूबी उतारा गया है . भाषा रोचक है .वर्णन इस तरह है कि पाठक के सम्मुख घटना चित्र खिंचता चला जाता है .  वैश्विक परिदृश्य में उन्मुक्त फिल्मी सितारा स्त्री के चरित्र का वर्णन सजीव है .
न्यूयार्क शहर का वर्णन करते हुये लेखक लिखता है " पत्थरो के साम्राज्य में शीशे जड़कर सभ्यता की पराकाष्ठा मिट्टी को भुलाये बैठी थी " कांक्रीट के नये जंगलो के संदर्भ में यह वर्णन दुबई से लेकर मुम्बई और न्यूयार्क से लेकर टोकियो तक खरा है . पर लिखने का यह सामर्थ्य तभी संभव है जब लेखक ने स्वयं विश्व भ्रमण किया हो  और भीतर तक महानगरो में गुमशुदा मिट्टी को महसूसा हो . इसी तरह वे लिखते हैं " चंद्रमा इन बिल्डिगो के गुंजलक के बीच ताक झांककर ही दिख पाता था . शहर आसमान के चांद का मोहताज भी नहीं था . जिसने भी बहुमंजिला इमारतो में रुपहली बिजली की चमक दमक देखी है वह इन शब्दो के भावार्थ समझ सकता है . जिस उपन्यास के पात्रो के नाम तनिष्क , मसरू ओस्से , आसानिका , सेलिना और शेख साहब, जान अल्तमश  हों , आप समझ सकते हैं उसकी कहानी वैश्विक कैनवास पर ही लिखी  होगी .प्रबोध एक जगह लिखते हैं " एसिया के कुछ देशों की प्रवृत्ति थी कि यहां यूरोप या अमेरिका के देशों में स्थापित मूल्य ज्यादा प्रामाणिक माने जाते हैं . " यह लेखक का अनुभूत यथार्थ जान पड़ता है . ट्विन टावर पर अलकायदा के हमले के संदर्भ में वर्णन है " विश्व की दो सभ्यताओं के बीच वैमनस्य की पराकाष्ठा के इस हादसे में हजारों लोगों ने अपनी जान बेवजह गंवाई . " स्टेच्यू आफ लिबर्टी के शहर में हुआ यह संकीर्ण मानसिकता का हमला सचमुच सभ्यता पर पोती गई कालिख थी . आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक जनमत इसी हमले के बाद बन सका है .  काश्मीर में नायक को मसरू ओस्से की पूर्व में कभी भी न मिली हुयी पत्नी व बेटी से मिल जाना कहानी की नाटकीयता है .मसाज प्रक्रिया के उन्मुक्त वर्णन में बरती गई साब्दिक शालीनता उपन्यास के साहित्यिक स्तर को बनाये रखती है . अस्तु उपन्यास का विन्यास , कथा , रोचक है .  उपन्यास एक बार पठनीय है . लेखक व दिशा प्रकाशन इसके लिये बधाई के पात्र हैं  . मैं दिशा प्रकाशन के मधुदीप जी से लम्बे समय से सुपरिचित हूं . अकाब पक्षी का प्रतीक विमानो के लिये किया गया है , वे ही विमान जो दूरीयो को घण्टो में समेटकर सारी पृ्थ्वी को जोड़ रहे हैं पर जिनका इस्तेमाल ओसामा बिन लादेन ने ट्विन टावर पर हमले के लिये किया था .
vivek ranjan shrivastava

Sunday, 19 January, 2020


गाडरवाड़ा में चेतना का राष्ट्रीय पुस्तक पुरस्कार आयोजन

शक्कर नदी के तट पर बसा , ओशो की जन्मभूमि , अरहर दाल और गुड़ उत्पादन के लिए प्रसिद्ध गाडरवाड़ा शहर साहित्य के लिए भी सुप्रसिद्ध है । चेतना संस्था के युवा साथी श्री कुशलेन्द्र श्रीवास्तव , श्री विजय बेशर्म , नरेन्द्र श्रीवास्तव , व टीम ने राष्ट्रीय स्तर पर किताबों के लिए पुरस्कार समारोह का आयोजन किया ।
विवेक रंजन श्रीवास्तव मुख्य अतिथि के रुप मे सम्मानित किये गए ।   सिमट रही शक्कर नदी को पुनः उर्जित करने का सुझाव मुख्य अतिथि ने दिया , जिसे व्यापक सराहना मिली । आयोजन में साहित्य भी भेंट किया गया , जो महत्वपूर्ण रहा , माला , शाल तो प्रत्येक कार्यक्रम में लिए दिए जाते ही हैं । श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव की कृति अनुगुंजन सबको भेंट स्वरूप प्रदान की गई ।

Sunday, 29 December, 2019

किताबों का सफर नामा

वर्ष 1994 में मेरी पहली नई कविता की  किताब आई थी "आक्रोश " .

इसके बाद लगातार विभिन्न सांस्कृतिक साहित्यिक कार्यक्रमों के आयोजनों से जुड़ा रहा . महिष्मति महोत्सव , फ़िल्म स्टार नाइट जैसे भव्य  आयोजन सफलता पूर्वक हुए , रेवा तरंग , दिव्य नर्मदा जैसी  स्मारिकाएँ व पत्रिकाएं सम्पादन से जुड़ा रहा ।

2000 में कान्हा पर एक काफी टेबल बुक  आई।

2006 में व्यंग्य की किताब " रामभरोसे "  आई। पुरस्कृत हुई।

2007 में नाटक संग्रह " हिन्दोस्तां हमारा " आया ।साहित्य अकादमी ने रु31000 का हरिकृष्ण प्रेमी सम्मान इसके लिए दिया ।

2009 में व्यंग्य संग्रह " कौआ कान ले गया " छपा । इसे भी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ ।

वर्ष 2013 में किताब "  बिजली का बदलता परिदृश्य '  प्रकाशित हुआ ।बाद में  इसका दूसरा संस्करण भी छपा ।

2015 में "मेरे प्रिय व्यंग्य लेख"  सीरीज में मेरी किताब भी छपी ।

2015 में ही "जल जंगल और जमीन " जयपुर से छपी। स्कूलों में खूब खरीदी गई ।

इस बीच कुछ E बुक्स डेली हंट एप पर  भी आईं ।
अनेक सामूहिक संग्रहो में समय समय पर कुछ न कुछ मित्र बुलाकर छापते रहे हैं।
उसी प्रकाशक ने मांगकर 2015  में ही  मेरा पुरस्कार प्राप्त नाटक "  जादू शिक्षा का" छापा ।

2019 में रवीना प्रकाशन दिल्ली के चन्द्रहास जी से परिचय हुआ , सुपरिणाम रहा , वैश्विक व्यंग्य संग्रह " मिली भगत ".

अब 2020 में आने को है मेरा व्यंग्य संग्रह " खटर पटर ".










Friday, 13 December, 2019

एक 2010 की पोस्ट , शायद आज भी प्रासंगिक
संस्थान की प्रगति के लिये जबाबदार कौन... नेतृत्व ? या नीतियां ?   


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

लेखक को नवोन्मेषी वैचारिक लेखन के लिये राष्ट्रीय स्तर पर  रेड एण्ड व्हाइट पुरुस्कार मिल चुका है 

ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर 
9425806252


कारपोरेट मैनेजर्स की पार्टीज में चलने वाला जसपाल भट्टी का लोकप्रिय व्यंग है , जिसमें वे कहते हैं कि किसी कंपनी में सी एम डी के पद पर भारी भरकम पे पैकेट वाले व्यक्ति की जगह एक तोते को बैठा देना चाहिये , जो यह बोलता हो कि "मीटिंग कर लो" , "कमेटी बना दो" या  "जाँच करवा लो ". यह सही है कि सामूहिक जबाबदारी की मैनेजमेंट नीति के चलते शीर्ष स्तर पर इस तरह के निर्णय लिये जाते हैं , पर विचारणीय है कि  क्या कंपनी नेतृत्व से कंपनी की कार्यप्रणाली में वास्तव में  कोई प्रभाव नही पड़ता ?भारतीय परिवेश में यदि शासकीय संस्थानो के शीर्ष नेतृत्व पर दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि नौकरी की उम्र के लगभग अंतिम पड़ाव पर , जब मुश्किल से एक या दो बरस की नौकरी ही शेष रहती है , तब व्यक्ति संस्थान के शीर्ष पद पर पहुंच पाता है .रिटायरमेंट के निकट  इस उम्र के टाप मैनेजमेंट की मनोदशा यह होती है कि किसी तरह उसका कार्यकाल अच्छी तरह निकल जाये , कुछ लोग अपने निहित हितो के लिये पद का दोहन करने की कार्य प्रणाली अपनाते हैं , कुछ शांति से जैसा चल रहा है वैसा चलने दिया जावे और अपनी पेंशन पक्की रखी जावे की नीति पर चलते हैं . वे नवाचार को अपनाकर विवादास्पद बनने से बचते हैं . कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो मनमानी करने पर उतर आते हैं , उनकी सोच यह होती है कि कोई उनका क्या कर लेगा ?  उच्च पदों पर आसीन ऐसे लोग अपनी सुरक्षा के लिये राजनैतिक संरक्षण ले लेते हैं , और यहीं से दबाव में गलत निर्णय लेने का सिलसिला चल पड़ता है .भ्रष्टाचार के किस्से उपजते हैं . जो भी हो हर हालत में नुकसान तो संस्थान का ही होता है .
 इन स्थितियों से बचने के लिये सरकार की दवा स्वरूप सरकारी व अर्धसरकारी संस्थानो का नेतृत्व आई ए एस अधिकारियों को सौंप दिया जाता है . संस्थान के वरिष्ठ अधिकारियों में यह भावना होती है कि ये नया लड़का हमें भला क्या सिखायेगा ? युवा आई ए एस अधिकारी को निश्चित ही स्स्थान से कोई भावनात्मक लगाव नही होता , वह अपने कार्यकाल में कुछ करिश्मा कर अपना स्वयं का नाम कमाना  चाहता है , जिससे जल्दी ही उसे कही और बेहतर पदांकन मिल सके . जहां तक भ्रष्टाचार के नियंत्रण का प्रश्न है , स्वयं रेवेन्यू डिपार्टमेंट जो आई ए एस अधिकारियों का मूल विभाग है , पटवारी से लेकर उपर तक भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा अड्डा है , फिर भला आई ए एस अधिकारियों के नेतृत्व से किसी संस्थान में भ्रष्टाचार नियंत्रण कैसे संभव है ? आई ए एस अधिकारियों को प्रदत्त असाधारण अधिकारों , उनके लंबे विविध पदों पर संभावित सेवाकाल के कारण , संस्थान के आम कर्मचारियों में भय का वातावरण व्याप्त हो जाता है . मसूरी के आई ए एस अधिकारियों के ट्रेनिंग स्कूल की , अंग्रेजो के समय की एक चर्चित ट्रेनिंग यह है कि एक कौए को मारकर टांग दो , बाकी स्वयं ही डर जायेंगे , मैने अनेक बेबस कर्मचारियों को इसी नीति के चलते बेवजह प्रताड़ित होते हुये देखा है , जिन्हें बाद में न्यायालयों से मिली विजय इस बात की सूचक है कि भावावेश में शीर्ष नेतृत्व ने गलत निर्णय ही लिया था . मजेदार बात है कि हमारे वर्तमान सिस्टम में शीर्ष नेतृत्व द्वारा लिये गये गलत निर्णयो हेतु उन्हे किसी तरह की कोई सजा का प्रवधान ही नही है . ज्यादा से ज्यादा उन्हें उस पद से हटा कर एक नया वैसा ही पद किसी और संस्थान में दे दिया जाता है . इसके चलते अधिकांश आई ए एस अधिकारियों की अराजकता सर्वविदित है . सरकारी संस्थानो के सर्वोच्च पदो पर आसीन लोगो का कहना यह होता है कि उनके जिम्में तो केवल इम्प्लीमेंटेशन का काम है नितिगत फैसले तो मंत्री जी लेते हैं , इसलिये वे कोई रचनात्मक परिवर्तन नही ला सकते . 
कार्पोरैट जगत के निजी संस्थानो की बात करें तो वहां हम पाते हैं कि मध्यम श्रेणी के संस्थानो में मालिक की मोनोपाली व वन मैन शो हावी है , पढ़े लिखे टाप मैनेजर भी मालिक या उसके बेटे की चाटुकारिता में निरत देखे जाते हैं . एम एन सी अपनी बड़ी साइज के कारण कठनाई में हैं . शीर्ष नेतृत्व अंतर्राष्ट्रीय बैठकों , आधुनिकीकरण , नवीनतम विज्ञापन ,संस्थान को  प्रायोजक बनाने , शासकीय नीतियों में सेध लगाकर लाभ उठाने में ही ज्यादा व्यस्त दिखता है .वर्तमान युग में किसी संस्थान की छबि बनाने , बिगाड़ने में मीडीया का रोल बहुत महत्वपूर्ण है , हमने देखा है कि रेल मंत्रालय में लालू यादव ने अपने समय में खूब नाम कमाया , कम से कम मीडिया में उनकी छबि एक नवाचारी मंत्री की रही . आई सी आई सी आई के शीर्ष नेतृत्व में परिवर्तन से उस संस्थान के दिन बदलते भी हमने देखा है .शीर्ष नेतृत्व हेतु आई आई एम जैसे संस्थानो में जब कैम्पस सेलेक्शन होते हैं तो जिस भारी भरकम पैकेज के चर्चे होते हैं वह इस बात का द्योतक है कि शीर्ष नेतृत्व कितना महत्वपूर्ण है .  किसी संस्थान में काम करने वाले लोग तथा  संस्थान की परम्परागत कार्य प्रणाली भी उस संस्थान  के सुचारु संचालन व प्रगति के लिये बराबरी से जबाबदार होते हैं . कर्मचारियों के लिये पुरस्कार , सम्मान की नीतियां उनका उत्साहवर्धन करती हैं .कर्मचारियों की आर्थिक व ईगो नीड्स की प्रतिपूर्ती औद्योगिक शांति के लिये बेहद जरूरी है ,  नेतृत्व इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है .
राजीव दीक्षित  भारतीय सोच के एक सुप्रसिद्ध विचारक हैं , व्यवस्था सुधारने के प्रसंग में वे कहते हैं कि यदि कार खराब है तो उसमें किसी भी ड्राइवर को बैठा दिया जाये , कार तभी चलती है जब उसे  धक्के लगाये जावें .  प्रश्न उठता है कि किसी संस्थान की प्रगति के लिये , उसके सुचारु संचालन के लिये सिस्टम कितना जबाबदार है ?हमने देखा है कि विगत अनेक चुनावों में पक्ष विपक्ष की अनेक सरकारें बनी पर आम जनता की जिंदगी में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नही आ सके . लोग कहने लगे कि सांपनाथ के भाई नागनाथ चुन लिये गये . कुछ विचारक  भ्रष्टाचार जैसी समस्याओ को  लोकतंत्र की विवशता बताने लगे हैं , कुछ इसे वैश्विक सामाजिक समस्या बताते हैं  .कुछ इसे लोगो के नैतिक पतन से जोड़ते हैं . आम लोगो ने तो भ्रष्टाचार के सामने घुटने टेककर इसे स्वीकार  ही कर लिया है , अब चर्चा इस बात पर नही होती कि किसने भ्रष्ट तरीको  से गलत पैसा ले लिया , चर्चा यह होती है कि चलो इस इंसेटिव के जरिये काम तो सुगमता से हो गया . निजि संस्थानों में तो भ्रष्टाचार की एकांउटिग के लिये अलग से सत्कार राशि , भोज राशि , गिफ्ट व्यय आदि के नये नये शीर्ष तय कर दिये गये हैं .सेना तक में भ्रष्टाचार के उदाहरण देखने को मिल रहे हैं . क्या इस तरह की नीति स्वयं संस्थान और सबसे बढ़कर देश  की प्रगति हेतु समुचित है ?
विकास में विचार एवं नीति का महत्व सर्वविदित है , इस सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को हमने जनप्रतिनिधियों को सौंप रखा है .एक ज्वलंत समस्या बिजली की है इसे ही लें ,  आज सारा देश बिजली की कमी से जूझ रहा है , परोक्ष रूप से इससे देश की सर्वांगीण प्रगति बाधित हुई है . बिजली , रेल की ही तरह राष्ट्रव्यापी सेवा व आवश्यकता है बल्कि रेल से कहीं बढ़कर है , फिर क्यों उसे टुकड़े टुकड़े में अलग अलग बोर्ड , कंपनियों के मकड़ जाल में उलझाकर रखा गया है , क्यों राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय विद्युत सेवा जैसी कोई व्यवस्था अब तक नही  बनाई गई ? समय से भावी आवश्यकताओ का सही पूर्वानुमान लगाकर  क्यों नये बिजली घर नही बनाये गये ? इसका कारण बिजली व्यवस्था का खण्ड खण्ड होना ही है , जल विद्युत निगम अलग है , तापबिजली निगम अलग, परमाणु बिजली अलग , तो वैकल्पिक उर्जा उत्पादन अलग हाथों में है, उच्चदाब वितरण , निम्नदाब वितरण अलग हाथों में  है .एक ही देश में  हर राज्य में बिजली दरों व बिजली प्रदाय की  स्थितयों में व्यापक विषमता है . केंद्रीय स्तर पर  राष्ट्रीय सुरक्षा व आतंकी गतिविधियों के समन्वय में जिस तरह की कमियां उजागर हुई हैं ठीक उसी तरह बिजली के मामले में भी  केंद्रीय समन्वय का सर्वथा अभाव है . जिसका खामियाजा हम सब भोग रहे हैं .नियमों का परिपालन केवल अपने संस्थान के हित में किये जाने की परंपरा गलत है . यदि शरीर के सभी हिस्से  परस्पर सही समन्वय से कार्य न करे तो हम नही चल सकते , विभिन्न विभागों की परस्पर राजस्व , भूमि या अन्य लड़ाई के कितने ही प्रकरण न्यायालयों में हैं ,जबकि यह  एक जेब से दूसरे में रुपया रखने जेसा ही है . इस जतन में कितनी सरकारी उर्जा नष्ट हो रही है , ये तथ्य विचारणीय है .  पर्यावरण विभाग के   शीर्ष नेतृत्व के रूपमें टी एन शेषन जैसे अधिकारियों ने  पर्यावरण की कथित रक्षा के लिये तत्काकलीन पर्यावरणीय नीतियों की आड़ में बोधघाट परियोजना जैसी जल विद्युत उत्पादन  परियोजनाओ को तब अनुमति नही दी ,निश्चित ही इससे  उन्होने स्वयं अपना नाम तो कमा लिया पर इससे बिजली की कमी का जो सिलसिला प्रारंभ  हुआ वह अब तक थमा नही है . बस्तर के जंगल सुदूर औद्योगिक महानगरों का प्रदूषण किस स्तर तक दूर कर सकते हैं यह अध्ययन का विषय हो सकता है ,पर  हां यह स्पष्ट दिख रहा है कि आज विकास की किरणें न पहुंच पाने के कारण ये जंगल नक्सली गतिविधियो का केंद्र बन चुके हैं .  आम आदमी भी सहज ही समझ सकता है कि प्रत्येक क्षेत्र का संतुलित , विकास होना चाहिये . पर हमारी नीतियां यह नही समझ पातीं .  मुम्बई जैसे नगरो में जमीन के भाव आसमान को बेध रहे हैं .प्रदूषण की समस्या , यातायात का दबाव बढ़ता ही जा रहा है . आज देश में जल स्त्रोतो  के निकट नये औद्योगिक नगर बसाये जाने की जरूरत है , पर अभी इस पर कोई काम नही हो रहा ! 
आवश्यकता है कि कार्पोरेट जगत , व सरकारी संस्थान अपनी सोशल रिस्पांस्बिलिटि समझें व देश के सर्वांगीण हित में नीतियां बनाने व उनके इम्प्लीमेंटेशन में शीर्ष नेतृत्व राजनेताओ के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपनी भूमिका निर्धारित करें , देश के विभिन्न संस्थानों की प्रगति देश की प्रगति की इकाई है . 




vivek ranjan shrivastava

Tuesday, 19 November, 2019

पाठक मंच जरूरी

स्तम्भ  अपना प्रदेश

 प्रदेश में मप्र संस्कृति परिषद साहित्य अकादमी के पाठक मंच पुनः सक्रिय करने जरूरी


उन्नीस सौ नब्बे के दशक में तत्कालीन  म प्र सरकार ने  युवाओ को साहित्य से जोड़ने के लिये मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के तत्वावधान में प्रदेश में पाठक मंच योजना का अभिनव प्रारंभ किया था ।

म. प्र. साहित्य अकादमी की प्रतिनिधि इकाई के रूप में व एक सृजनात्मक स्थानीय
संस्था के रूप में प्रदेश के विभिन्न अंचलो में मानसेवी साहित्य प्रेमियो के संयोजन में प्रदेश में जगह जगह पाठक मंच सक्रिय हैं.

अकादमी की पाठक मंच योजना देश में इस तरह की पहली अभिन्न योजना है . समकालीन , चर्चित व महत्वपूर्ण किताबो तथा महत्व पूर्ण पत्र पत्रिकाओ पर इन पाठक मंचो में चर्चा के माध्यम से पाठको तथा लेखको को वैचारिक अभिव्यक्ति का सुअवसर सुलभ होता है . पाठक मंच संयोजको का एक वार्षिक सम्मेलन भी आयोजित किया जाता है .

पाठक मंच की यह योजना पिछली सरकार के समय भी पूरी सक्रियता से जारी रही ।
वर्तमान युग इलेक्ट्रानिक संसाधनो से भरा हुआ है , ऐसे समय में पठनीयता का स्वाभाविक अभाव है . किन्तु पाठक मंच पुस्तक संस्कृति को बचाये रखने का बड़ा काम कर रहे थे ।

प्रदेश की वैचारिक साहित्यिक सांस्कृतिक अस्मिता का परिदृश्य बनाये रखने व नव लेखन को सकारात्मक दिशा देने के लिए पाठक मंच आवश्यक हैं ।

विगत एक वर्ष से नई सरकार में पाठक मंच की यह सर्वथा महत्वपूर्ण योजना ठप्प है । अतः  साहित्य के व्यापक हित में अविलंब प्रदेश के पाठक मंचो को पुनः सक्रिय करने की जरूरत है ।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

संयोजक , पाठक मंच जबलपुर

 ए 1, शिला कुंज रामपुर जबलपुर 482008

मो 7000375798

Friday, 7 September, 2018

गोपालराम गहमरी

मण्डला के नर्मदा तट पर गोपालराम गहमरी ने रचे थे हिंदी के पहले जासूसी उपन्यास

विवेक रंजन श्रीवास्तव
ए १ ,शिला कुन्ज , रामपुर , जबलपुर
मो ७०००३७५७९८


        दुनियां में नर्मदा ही एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की परम्परा है . यही नर्मदा मण्डला नगरी की तीन ओर से परिक्रमा करती है . नदी के एक तट पर मण्डला नगर है ,  नर्मदा से बंजर नदी के संगम पर खड़ा बुर्ज और किला है तो दूसरे तट पर महाराजपुर उपनगर है जहाँ मालगुजार चौधरी मुन्नालाल व जगन्नाथ चौधरी जी का भव्य महलनुमा प्रांगण है , मंदिर हैं . मण्डला के विश्व प्रसिद्ध जंगलो , नदी तट के प्राकृतिक दृश्य लेखकीय  मन में रचनाओ का स्फुरण करते हैं . मण्डला से कोई 20 किलोमीटर की दूरी पर नर्मदा तट पर ही गौड राजाओ का रामनगर  किला है व पास ही सुप्रसिद्ध करिया पहाड़ है , इस पहाड़ की विशेषता यह है कि लगभग 900 मीटर उँचे पहाड़ी पर सारे पत्थर पंचकोणीय 3 से 4 मीटर लम्बी बीम के आकार के हैं , ये पत्थर किसी भी मिट्टी से जुड़े नही हैं , अर्थात ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने काले पत्थरो की बीम बनवा कर उनका बेतरतीब संग्रह कर रखा हो पर यह प्राकृतिक है . गोपाल राम गहमरी जी का एक उपन्यास है " करिया पहाड़ " निश्चित ही यह इस पहाड़ से अभिप्रेरित पृष्ठभूमि पर लिखी हुई रचना है . मधुपुरी भी मण्डला के पास ही एक गांव है , गहमरी जी का एक उपन्यास "मधुपुरी के चोर" है . उनकी रचनाओ पर मण्डला का प्रभाव  अलग विस्तृत शोध का विषय है .जिस पर कार्य किये जाने की जरूरत है . मैं मूलतः मण्डला का निवासी हूं . हमारा परिवार मण्डला के पुराने कुछ  पढ़े लिखे परिवारो में से है . मेरे घर महलात के निकट ही श्री राम अग्रवाल पुस्तकालय है ,मैं इसका सदस्य था अपने बचपन में मैंने वहां खूब किताबें पढ़ी हैं ,उन दिनो उसका संचालन श्री गिरिजा शंकर अग्रवाल करते थे . उनसे मैंने स्व गोपालराम गहमरी जी के मण्डला में ही हिन्दी के पहले जासूसी उपन्यास लेखन का संस्मरण सुना था . शायद मैने तब गहमरी जी की कोई किताब पढ़ी भी थी . अतः जब गहमर के इस आयोजन में मुझे सम्मानित करने का प्रस्ताव आया तो मैं गहमर जी के विषय में और जानने की इच्छा से मना नही कर सका यद्यपि सामान्यतः मैं सम्मानो से दूर ही रहता हूं .
        कहा जाता है कि  एक बार सन् 1882 में मुन्नालाल जी चौधरी अपने एक रिश्तेदार के यहाँ गहमर गये थे. वहां पर गोपालराम नाम के एक बालक से उनकी मुलाकात हुई.  बालक की प्रतिभा से प्रभावित होकर चौधरी जी उसे अपने साथ  महाराजपुर ले आए . महाराजपुर आने के पहले गोपालराम जी मातृ-पितृविहीन हो चुके थे क्योंकि उन्होंने अपने उपन्यास 'सास पतोहू' (1899) में  लिखा है कि बड़े लोगों के मुँह से बेटा या बेटी शब्द सुनते कैसा मीठा लगता है . चौधरी जी से उन्हें पितृवत संरक्षण मिला. गहमरी जी का कार्य महाराजपुर में जगन्नाथ चौधरी को पढ़ाना था , और मुन्नालाल जी के कार्य में सहयोग करना था.  महाराजपुर में ही रहकर गहमर जी ने बंगला उपन्यासों का अनुवाद हिन्दी में किया . चौधरी जी के रिकार्ड में अभी भी उनके द्वारा किया हुआ पत्र-व्यवहार, अनुवाद कार्य संबंधी लेखा-जोखा मौजूद है.  यहीं पर रहते हुए केहरपुर निवासी पंडित बालमुकुन्द परोहित से गहमरी जी का परिचय हुआ. पुरोहित जी उस समय सागर में तहसीलदार थे. गहमरी जी ने अपना उपन्यास 'सास पतोहू' पुरोहित जी को ही समर्पित किया है.  महाराजपुर के चौधरी बाड़ा में रहते हुए गहमरी जी ने 'शोणितचक', 'घटना घटाटोप', 'माधवीकंकण' उपन्यासों की रचना की. इसी समय मंडल महाराजपुर में 'कंठ कोकिला' नामक साहित्यिक संस्था का गठन हुआ, जिसमें बाबू जगन्नाथ प्रसाद मिश्र, पं. लोचनप्रसाद पाण्डेय, पं. रेवाशंकर चौबे, गोपाल कवि, सेठ भद्देलाल जी अग्रवाल, चौधरी जगन्नाथ प्रसाद के साथ गहमरी जी भी सदस्य थे.  उस समय गहमरी जी के द्वारा अनेक नाटक भी अनुदित किए गए जिसमें 'विद्या विनोद' (1892), 'देशदशा' (1892), 'यौवनयोगिनी' (1893), 'दादा और मैं' (1893), 'चित्रागंदा' (1895) तथा 'वग्रूवाहन' एवं 'जैसे को तैसा' आदि प्रमुख हैं . सामाजिक उपन्यासों में 'चतुरचंचला' (1893), 'भानुमति' (1884), 'नये बाबू', 'सास पतोहू', 'देवरानी-जेठानी दो बहन', 'तीन पतोहू', 'गृहलक्ष्मी', 'ठन-ठन गोपाल' आदि उपन्यासों से गहमरी जी ने विशेष प्रसिध्दि पाई. गहमरी जी ने इन उपन्यासों को मण्डला के रायबहादुर जगन्नाथ चौधरी को समर्पित किया था.  जगन्नाथ चौथरी द्वारा लिखित 'हरिशचन्द्र' नाटक महाराजपुर में ही खेला गया था , निश्चित ही उसके लेखन में गहमर जी का साथ प्रेरक रहा होगा .  1866 से 1882 तक गहमरी जी का कार्यक्षेत्र महाराजपुर ही रहा. गहमरीजी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे.  वे कवि, अनुवादक, उपन्यासकार, निबंधकार, नाटककार, कहानीकार के रूप में जाने जाते थे.  आपने मुम्बई के बेकेटेश्वरी प्रेस में भी काम किया था। आप राजा रामपाल के आमंत्रण पर कालाकांकर भी गये थे। आपने महाराजपुर में रहते हुए मेरठ से प्रकाशित होने वाले 'साहित्य सरोज' पत्रिका का सम्पादन किया था और वहीं से आपने पहला जासूसी ढंग का मासिक-पत्र 'गुप्तकथा' नाम से निकाला था.  फिर आप पाटन आ गये थे. 1897 में पुन: मुम्बई गये थे . 1899 में कोलकाता जाकर 'भारत मित्र' का स्थानापन्न संपादक बन कार्य किया था . 1900 में गहमर लौटे और अंत तक 'जासूस' नामक पत्रिका का सम्पादन करते रहे.गोपालराम गहमरी ने लगभग 64  मौलिक जासूसी उपन्यास लिखे , अनूदित उपन्यासों को  मिला दें तो यह संख्या 200  पहुंच जाती है . यदि गहमरी जी के साहित्य के अध्ययन के बाद कोई शोधार्थी समुचित दृष्टि के साथ मण्डला का भ्रमण करे तो गहमरी जी के साहित्य पर मण्डला के परिवेश के प्रभाव का आकलन नई खोज कर सकता है .