Friday, 7 September, 2018

गोपालराम गहमरी

मण्डला के नर्मदा तट पर गोपालराम गहमरी ने रचे थे हिंदी के पहले जासूसी उपन्यास

विवेक रंजन श्रीवास्तव
ए १ ,शिला कुन्ज , रामपुर , जबलपुर
मो ७०००३७५७९८


        दुनियां में नर्मदा ही एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की परम्परा है . यही नर्मदा मण्डला नगरी की तीन ओर से परिक्रमा करती है . नदी के एक तट पर मण्डला नगर है ,  नर्मदा से बंजर नदी के संगम पर खड़ा बुर्ज और किला है तो दूसरे तट पर महाराजपुर उपनगर है जहाँ मालगुजार चौधरी मुन्नालाल व जगन्नाथ चौधरी जी का भव्य महलनुमा प्रांगण है , मंदिर हैं . मण्डला के विश्व प्रसिद्ध जंगलो , नदी तट के प्राकृतिक दृश्य लेखकीय  मन में रचनाओ का स्फुरण करते हैं . मण्डला से कोई 20 किलोमीटर की दूरी पर नर्मदा तट पर ही गौड राजाओ का रामनगर  किला है व पास ही सुप्रसिद्ध करिया पहाड़ है , इस पहाड़ की विशेषता यह है कि लगभग 900 मीटर उँचे पहाड़ी पर सारे पत्थर पंचकोणीय 3 से 4 मीटर लम्बी बीम के आकार के हैं , ये पत्थर किसी भी मिट्टी से जुड़े नही हैं , अर्थात ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने काले पत्थरो की बीम बनवा कर उनका बेतरतीब संग्रह कर रखा हो पर यह प्राकृतिक है . गोपाल राम गहमरी जी का एक उपन्यास है " करिया पहाड़ " निश्चित ही यह इस पहाड़ से अभिप्रेरित पृष्ठभूमि पर लिखी हुई रचना है . मधुपुरी भी मण्डला के पास ही एक गांव है , गहमरी जी का एक उपन्यास "मधुपुरी के चोर" है . उनकी रचनाओ पर मण्डला का प्रभाव  अलग विस्तृत शोध का विषय है .जिस पर कार्य किये जाने की जरूरत है . मैं मूलतः मण्डला का निवासी हूं . हमारा परिवार मण्डला के पुराने कुछ  पढ़े लिखे परिवारो में से है . मेरे घर महलात के निकट ही श्री राम अग्रवाल पुस्तकालय है ,मैं इसका सदस्य था अपने बचपन में मैंने वहां खूब किताबें पढ़ी हैं ,उन दिनो उसका संचालन श्री गिरिजा शंकर अग्रवाल करते थे . उनसे मैंने स्व गोपालराम गहमरी जी के मण्डला में ही हिन्दी के पहले जासूसी उपन्यास लेखन का संस्मरण सुना था . शायद मैने तब गहमरी जी की कोई किताब पढ़ी भी थी . अतः जब गहमर के इस आयोजन में मुझे सम्मानित करने का प्रस्ताव आया तो मैं गहमर जी के विषय में और जानने की इच्छा से मना नही कर सका यद्यपि सामान्यतः मैं सम्मानो से दूर ही रहता हूं .
        कहा जाता है कि  एक बार सन् 1882 में मुन्नालाल जी चौधरी अपने एक रिश्तेदार के यहाँ गहमर गये थे. वहां पर गोपालराम नाम के एक बालक से उनकी मुलाकात हुई.  बालक की प्रतिभा से प्रभावित होकर चौधरी जी उसे अपने साथ  महाराजपुर ले आए . महाराजपुर आने के पहले गोपालराम जी मातृ-पितृविहीन हो चुके थे क्योंकि उन्होंने अपने उपन्यास 'सास पतोहू' (1899) में  लिखा है कि बड़े लोगों के मुँह से बेटा या बेटी शब्द सुनते कैसा मीठा लगता है . चौधरी जी से उन्हें पितृवत संरक्षण मिला. गहमरी जी का कार्य महाराजपुर में जगन्नाथ चौधरी को पढ़ाना था , और मुन्नालाल जी के कार्य में सहयोग करना था.  महाराजपुर में ही रहकर गहमर जी ने बंगला उपन्यासों का अनुवाद हिन्दी में किया . चौधरी जी के रिकार्ड में अभी भी उनके द्वारा किया हुआ पत्र-व्यवहार, अनुवाद कार्य संबंधी लेखा-जोखा मौजूद है.  यहीं पर रहते हुए केहरपुर निवासी पंडित बालमुकुन्द परोहित से गहमरी जी का परिचय हुआ. पुरोहित जी उस समय सागर में तहसीलदार थे. गहमरी जी ने अपना उपन्यास 'सास पतोहू' पुरोहित जी को ही समर्पित किया है.  महाराजपुर के चौधरी बाड़ा में रहते हुए गहमरी जी ने 'शोणितचक', 'घटना घटाटोप', 'माधवीकंकण' उपन्यासों की रचना की. इसी समय मंडल महाराजपुर में 'कंठ कोकिला' नामक साहित्यिक संस्था का गठन हुआ, जिसमें बाबू जगन्नाथ प्रसाद मिश्र, पं. लोचनप्रसाद पाण्डेय, पं. रेवाशंकर चौबे, गोपाल कवि, सेठ भद्देलाल जी अग्रवाल, चौधरी जगन्नाथ प्रसाद के साथ गहमरी जी भी सदस्य थे.  उस समय गहमरी जी के द्वारा अनेक नाटक भी अनुदित किए गए जिसमें 'विद्या विनोद' (1892), 'देशदशा' (1892), 'यौवनयोगिनी' (1893), 'दादा और मैं' (1893), 'चित्रागंदा' (1895) तथा 'वग्रूवाहन' एवं 'जैसे को तैसा' आदि प्रमुख हैं . सामाजिक उपन्यासों में 'चतुरचंचला' (1893), 'भानुमति' (1884), 'नये बाबू', 'सास पतोहू', 'देवरानी-जेठानी दो बहन', 'तीन पतोहू', 'गृहलक्ष्मी', 'ठन-ठन गोपाल' आदि उपन्यासों से गहमरी जी ने विशेष प्रसिध्दि पाई. गहमरी जी ने इन उपन्यासों को मण्डला के रायबहादुर जगन्नाथ चौधरी को समर्पित किया था.  जगन्नाथ चौथरी द्वारा लिखित 'हरिशचन्द्र' नाटक महाराजपुर में ही खेला गया था , निश्चित ही उसके लेखन में गहमर जी का साथ प्रेरक रहा होगा .  1866 से 1882 तक गहमरी जी का कार्यक्षेत्र महाराजपुर ही रहा. गहमरीजी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे.  वे कवि, अनुवादक, उपन्यासकार, निबंधकार, नाटककार, कहानीकार के रूप में जाने जाते थे.  आपने मुम्बई के बेकेटेश्वरी प्रेस में भी काम किया था। आप राजा रामपाल के आमंत्रण पर कालाकांकर भी गये थे। आपने महाराजपुर में रहते हुए मेरठ से प्रकाशित होने वाले 'साहित्य सरोज' पत्रिका का सम्पादन किया था और वहीं से आपने पहला जासूसी ढंग का मासिक-पत्र 'गुप्तकथा' नाम से निकाला था.  फिर आप पाटन आ गये थे. 1897 में पुन: मुम्बई गये थे . 1899 में कोलकाता जाकर 'भारत मित्र' का स्थानापन्न संपादक बन कार्य किया था . 1900 में गहमर लौटे और अंत तक 'जासूस' नामक पत्रिका का सम्पादन करते रहे.गोपालराम गहमरी ने लगभग 64  मौलिक जासूसी उपन्यास लिखे , अनूदित उपन्यासों को  मिला दें तो यह संख्या 200  पहुंच जाती है . यदि गहमरी जी के साहित्य के अध्ययन के बाद कोई शोधार्थी समुचित दृष्टि के साथ मण्डला का भ्रमण करे तो गहमरी जी के साहित्य पर मण्डला के परिवेश के प्रभाव का आकलन नई खोज कर सकता है . 

Saturday, 18 August, 2018

पठनीयता के अभाव को चुनौती देती म.प्र. संस्कृति परिषद की पाठक मंच योजना एक सर्वथा नवाचारी प्रयास

म. प्र. साहित्य अकादमी के नवाचारी साहित्यिक प्रयास
विवेक रंजन श्रीवास्तव
संयोजक , पाठक मंच , जबलपुर
किस तरह कोई समर्पित व्यक्ति अपने नेतृत्व व नीति से किसी संस्था को नया स्वरूप दे सकता है यह श्री मनोज श्रीवास्तव प्रमुख सचिव संस्कृति म. प्र. एवं श्री उमेश कुमार सिंह निदेशक साहित्य अकादमी भोपाल के नेतृत्व ने सिद्ध कर दिखाया है . युवाओ को साहित्य से जोड़ने के लिये अकादमी प्रदेश में जगह जगह पहुंचकर क्षेत्रीय साहित्यकारो की जयंतियो के आयोजन करने के नवाचारी प्रयास कर रही है . अकादमी ने साहित्यिक कैलेण्डर बना कर वर्ष भर के साहित्यकारो की जयंतियो , पुण्य तिथियो व आयोजनो की ओर जन सामान्य का ध्यानाकर्षण किया . सोशलमीडिया का रचनात्मक उपयोग करते हुये व्हाट्सअप ग्रुप , फेसबुक पेज आदि नवीनतम इलेक्ट्रानिक संसाधनो के माध्यमो से अकादमी की गतिविधियो को विश्व व्यापी स्तर पर साहित्य प्रेमियो के बीच त्वरित रूप से पहुंचाने का अभिनव कार्य भी किया जा रहा है .
म. प्र. साहित्य अकादमी की प्रतिनिधि इकाई के रूप में व एक सृजनात्मक स्थानीय
संस्था के रूप में प्रदेश के विभिन्न अंचलो में साहित्य प्रेमियो के संयोजन में जगह जगह पाठक मंच सक्रिय हैं. अकादमी की पाठक मंच योजना देश में इस तरह की पहली अभिन्न योजना है . समकालीन , चर्चित व महत्वपूर्ण किताबो तथा महत्व पूर्ण पत्र पत्रिकाओ पर इन पाठक मंचो में चर्चा के माध्यम से पाठको तथा लेखको को वैचारिक अभिव्यक्ति का सुअवसर सुलभ होता है . पाठक मंच संयोजको का एक वार्षिक सम्मेलन भी आयोजित किया जाता है .
पहली बार साहित्यिक पत्रिकाओ के संपादको का वैचारिक सम्मेलन भोपाल में जनवरी २०१८ के प्रथम सप्ताह में आयोजित किया जा रहा है . इससे पहले साहित्यिक संस्थाओ के पदाधिकारियो का राज्यस्तरीय सम्मेलन भी भोपाल में आयोजित किया गया जो अपनी तरह का पहला आयोजन था जिसमें विभिन्न क्षेत्रो की साहित्यिक संस्थाओ के प्रतिनिधियो ने परस्पर वैचारिक विमर्श किया .
अंतर्राष्ट्रीय साहित्य संवाद के आयोजन भी प्रति वर्ष हो रहे हैं .
वर्तमान युग इलेक्ट्रानिक संसाधनो से भरा हुआ है , ऐसे समय में पठनीयता
का स्वाभाविक अभाव है . किन्तु अकादमी की पत्रिका साक्षात्कार जिस तरह ठीक समय पर पाठको तक नियमित रूप से पहुंच रही है , व राष्ट्र की वैचारिक साहित्यिक सांस्कृतिक अस्मिता का परिदृश्य निर्मित कर रही है उससे नव लेखन को सकारात्मक दिशा मिली है . अकादमी की टीम इन नवाचारी प्रयोगो से साहित्य जगत में चेतना जगाने के लिये बधाई की पात्र है .


पाठक मंच जबलपुर में कौशल किशोर की पुस्तक महर्षि अरविन्द घोष पर व्यापक चर्चा ......

विगत दिवस जबलपुर पाठक मंच ने सत्साहित्य प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित किताब "महर्षि अरविन्द घोष" पर चर्चा गोष्ठी का आयोजन पुस्तकालय में किया गया . किताब के परिप्रेक्ष्य में बोलते हुये वरिष्ठ कवि व अनुवादक प्रो सी बी श्रीवास्तव विदग्ध ने इसे महर्षि जी के विषय में केवल परिचयात्मक छोटी किताब बताया . उन्होने कहा कि पुस्तक में महर्षि के जीवन के सागर को गागर में भरने का प्रयास किया गया है इसलिये अनेक महत्वपूर्ण घटनाओ को स्पर्श मात्र करते हुये लेखक निकल गया है . महर्षि के प्रारंभिक जीवन , इंग्लैंड में व्यतीत उनका समय , बडौदा में उनके कार्य , बंगाल में किया गया राष्ट्रवादी योगदान , पांडीचेरी , मीरा रिचर्ड का साथ , आदि बिंदुओ पर लेखक ने थोड़ी थोड़ी बातें रखी है . युवाओ में महरंषि के प्रति कौतुहल जगाने का काम पुस्तक कर सकती है .
 फोटो संलग्न------ मनोज श्रीवास्तव एवं श्री उमेश सिंह व पुस्तक महर्षि अरविंद घोष
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तुम जरा चुपचाप रहना।
.......जयप्रकाश श्रीवास्तव

सुनते हैं
दीवारों के भी कान हैं
तुम जरा चुपचाप रहना।

कह न देना
भूलकर भी
क्षणिक से सुख की कथा
मत सुनाना
चाहकर भी
अपने इस मन की व्यथा
हमको तो
दुख का मिला वरदान है
सुखों की पदचाप सुनना।

पीढ़ियों से
ढो रहे हैं
विरासत मजदूर वाली
झूठ लगती
है सचाई
बदलती तकदीर वाली
हर तरफ
फैला हुआ श्मशान है
मना है संताप करना।

प्रति-बंधित
हो गई हैं
सब की सब आलोचनाएं
जी रही हैं
प्रकंपित हो
मौन बहरी कामनाएं
रास्तों पर
उनका ही गुणगान है
व्यर्थ पश्चाताप करना।

म. प्र. साहित्य अकादमी की अभिनव पुरस्कार योजना


Wednesday, 13 December, 2017

.सकारात्मक सपने .... SAMIKSHA

कृति ...सकारात्मक सपने
लेखिका ...अनुभा श्रीवास्तव प्रकाशक ... डायमण्ड पाकेट बुक्स दिल्ली
साहित्य अकादमी म प्र. संस्कृति परिषद के सहयोग से प्रकाशित
मूल्य ...११० रु
पृष्ठ .. १२४
युवा लेखिका ने समय समय पर यत्र तत्र विभिन्न विषयो पर युवा सरोकारो के स्फुट आलेख लिखे , जिनमें से शाश्वत मूल्यो के आलेखो को प्रस्तुत पुस्तक में संग्रहित कर प्रकाशित किया गया है . खूशी की तलाश , आपदा प्रबंधन , कन्या भ्रूण हत्या , स्थाई चरित्र निर्माण हेतु नैतिकता की आवश्यकता , कम्प्यूटर से जीवन जीने की कला सीखने की प्रेरणा , देश बनाने की जबाबदारी युवा कंधों पर , कचरे के खतरे , धार्मिक पर्यटन की विरासत , आरक्षण धर्म और संस्कृति , आम सहमति से समस्याओ का स्थाई निदान , कागज जलाना मतलब पेड जलाना , भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई , तोड़ फोड़ राष्ट्रीय अपव्यय , शब्द मरते नहीं , कैसे हो गांवो का विकास , मुखिया मुख सो चाहिये , गर्व है सेना और संविधान पर , कार्पोरेट जगत और हिन्दी , संचार क्रांति , भ्रष्टाचार के विरुद्ध लडाई , महिलायें समाज की धुरी , जीवन और मूल्य जैसे समसामयिक विषयो पर आज के युवा मन के विचारो को प्रतिबिंबित करते छोटे छोटे सारगर्भित तथ्यपूर्ण आलेखो में अभिव्यक्त किया गया है . लेख विषय की सहज अभिव्यक्ति करते हैं व मानसिक भूख शांत करते हैं . किताब प्रमुख बुक स्टोर्स पर उपलब्ध है ,  sales@dpb.in से या डायमण्ड पाकेट बुक्स ओखला इंडस्ट्रियल स्टेट दिल्ली २० से मंगवाई जा सकती है . पुस्तक पढ़ने योग्य है ,वैचारिक स्तर पर  संदर्भ हेतु संग्रहणीय भी है . युवाओ हेतु विषेश रूप से बहुउपयोगी है .

Thursday, 6 July, 2017

कैसे रुके ब्रेन ड्रेन

देश से युवा वैज्ञानिको का विदेश पलायन एक बड़ी समस्या है . इजराइल जैसे छोटे देश में स्वयं के इनोवेशन हो रहे हैं किन्तु हमारे देश में हम ब्रेन ड्रेन की समस्या से जूझ रहे हैं . मेरा मानना है कि छोटे छोटे क्षेत्रो में मौलिक खोज को बढ़ावा  दिया जाना जरूरी है . वैश्विक स्तर की शिक्षा प्राप्त करके भी युवाओ को देश लौटना बेहद जरूरी है . इसके लिये देश में उन्हें विश्वस्तरीय सुविधायें व रिसर्च का वातावरण देश में ही दिया जाना आवश्यक है . और उससे भी पहले दुनिया की नामी युनिवर्सिटीज में कोर्स पूरा करने के लिये आर्थिक मदद भी जरूरी है . वर्तमान में ज्यादातर युवा बैंको से लोन लेकर विदेशो में उच्च शिक्षा हेतु जा रहे हैं , उस कर्ज को वापस करने के लिये मजबूरी में ही उन्हें उच्च वेतन पर विदेशी कंपनियो में ही नौकरी करनी पड़ती है , फिर वे वही रच बस जाते हैं .
जरूरी है कि इस दिशा में चिंतन मनन ,और जरूरी निर्णय तुरन्त लिए जावें

Thursday, 2 March, 2017

नई शुरुवात करने का पर्व होली

परस्पर  वैमनस्य भूल कर नई शुरुवात करने का पर्व होली


विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १ , शिलकुन्ज , विद्युत मण्डल कालोनी नयागांव  , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

9425806252, 70003757987

              हमारे मनीषियो द्वारा समय समय पर पर्व और त्यौहार मनाने का प्रचलन ॠतुओ के अनुरूप मानव मन को बहुत समझ बूझ कर निर्धारित किया गया है .जब ठंड समाप्त होने लगती है , गेंहूं चने की  नई फसल आने को होती है , मौसम में आम की बौर की महक की  मस्ती छाने लगती है , बाग बगीचो में , जंगलो तक में टेसू व अन्य फूल खिले होते हैं तब फागुन की पूर्णिमा की रात लकड़ियों व उपलों से बनी  होली का  विधिवत पूजन कर ,गुझिया पपड़ी आदि पकवानों का  भोग लगा कर होलिका दहन किये जाने की परम्परा है . इस बहाने लोग एकत्रित होते हैं , उत्सवी माहौल में नाचने गाने मिलने मिलाने और किंचित पनपी परस्पर कुंठायें व वैमनस्य भूल कर नई शुरुवात करने के अवसर उत्पन्न होते हैं . दूसरी सुबह लोग रंग गुलाल लगा कर खुशियां साझा करते हैं .

              सारी दुनिया की विभिन्न सभ्यताओ में  रंगो से मन का उल्लास प्रगट किया जाता है होली की ही तरह रंगो के तथा अग्नि जलाने के अनेक त्यौहार विश्व के अलग अलग भूभाग पर अलग अलग समय में अलग अलग नामो से मनाये जाते हैं , जो किंचित सभ्यताओ के मिलन या परस्पर प्रभाव जनित हो सकते हैं  किन्तु यह तथ्य है कि होली भारत का अति प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता था .  वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव भी कहा जाता है. यह पर्व अधिकांशतः उत्तरी  भारत में प्रमुखता से  मनाया जाता है .

              होली मनाये जाने का उल्लेख  कई पुरातन  पुस्तकों में भी मिलता है जैसे जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र  , नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों  में भी होली का वर्णन मिलता है . प्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने  अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का उल्लेख किया है .  भारत के अनेक मुसलमान कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होली का त्यौहार केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते थे . अकबर और जोधा  तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के  होली खेलने का वर्णन मिलता है . अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है. वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था. अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे. मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है.  प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर होलिका दहन व रंग खेलने के चित्र देखने मिलते हैं.  विजयनगर की राजधानी हंपी के १६वी शताब्दी के एक चित्र फलक पर  राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दम्पत्ति को होली के रंग में रंगते हुए दिखाया गया है.

              संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है .  श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है. अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली तथा कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं.  कालिदास रचित ऋतुसंहार में पूरा एक सर्ग ही 'वसन्तोत्सव' को अर्पित है. भारवि, माघ और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसन्त की खूब चर्चा की है.  चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का वर्णन है. भक्तिकाल और रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है. आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन कवि बिहारी, केशव, घनानंद आदि अनेक कवियों को होली वर्णन  प्रिय रहा है . 

              राधा कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम का निष्पादन कवियो ने किया है .  सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएँ लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं. आधुनिक हिंदी कहानियों में प्रेमचंद की राजा हरदोल, प्रभु जोशी की अलग अलग तीलियाँ, तेजेंद्र शर्मा की एक बार फिर होली, ओम प्रकाश अवस्थी की होली मंगलमय हो तथा स्वदेश राणा की हो ली में होली के अलग अलग रूपो के वर्णन देखने को मिलते हैं . भारतीय फ़िल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों को प्रमुखता व सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है .

              वैष्णव व शैव संप्रदायो ने होली की व्याख्या अपने अपने इष्ट के अनुरूप कर ली थी . होलिका  दहन की प्रह्लाद की सुप्रसिद्ध कथा के अतिरिक्त यह पर्व  राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जोड़ कर मनाया जाता है तो दूसरी ओर शैव संप्रदाय का  मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं .


              वर्तमान स्वरूप में होली का त्योहार सार्वजनिक उत्सव के रूप में ही अधिक लोकप्रिय हो चला है . मोहल्लो के चौराहो , क्लबो , सोसायटियो में सार्वजनिक मैदानो या  पर युवको की टोलियां सार्वजनिक चंदे से होली का झंडा गाड़कर उसके चारो और लकड़ियां लगाकर और होलिका व प्रहलाद की मूर्तियां सजाकर विद्युत प्रकाश से रंगबिरंगी सजावट कर डी जे पर गीत संगीत बजाकर होलीका दहन का आयोजन करते हैं .पारम्परिक रूप से गांवो में  भरभोलिए जलाने की भी परंपरा है.भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है, इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है.  एक माला में सात भरभोलिए होते हैं. होली में आग लगाने से पहले इस माला को बहने भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है.  रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है . इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए.  इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है.  होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है. कटते जंगलो को बचाने और व्यर्थ जलाई जाती लकड़ी के अपव्यय को रोकने के लिये इस वर्ष गोबर के कंडो की ही होली जलाने की अपील नेताओ द्वारा की जती दिख रही है यह शुभ संकेत है , हमेशा से हिन्दू परम्परायें समय के साथ नव परिवर्तन को स्वीकारती आई हैं यह परिवर्तन भी पर्यावरण की रक्षा हेतु उठाया जा रहा एक स्वागतेय कदम है .


              होली से अगला दिन धूलिवंदन कहलाता है ,  इस दिन लोग गुलाल और  रंगों से खेलते हैं.  सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं.  गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं .  इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं.  बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं.  सारा समाज होली के रंग में रंगकर एक-सा बन जाता है .  रंग खेलने के बाद देर दोपहर तक लोग नहाते हैं और शाम को नए वस्त्र पहनकर सबसे मिलने जाते हैं.  प्रीति भोज तथा गाने-बजाने , कविताओ , हास्य विनोद के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।

घरों में गुझिये , खीर, पूरी कचौड़ी , दही बड़े  आदि विभिन्न व्यंजन बनाये जाते हैं,  भांग और ठंडाई इस पर्व के विशेष पेय होते हैं .

            

              स्थानीय परम्पराओ के साथ होली का पर्व मनाने में विभिन्नता परिलक्षित होती है . ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती है.  बरसाने की लठमार होली काफ़ी प्रसिद्ध है. इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं.  इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन में भी १५ दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है.  कुमाऊँ की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियाँ होती हैं.  हरियाणा की धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा है .  बंगाल की दोल जात्रा चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है ,  जलूस निकलते हैं और गाना बजाना भी साथ रहता है. महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेलने, गोवा के शिमगो में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा पंजाब के होला मोहल्लाशक्ति प्रदर्शन तो  तमिलनाडु की कमन पोडिगई मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंतोतसव है .  मणिपुर में  योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है,  दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के लिए होली सबसे बड़ा पर्व है, छत्तीसगढ़ की होरी में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है और मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है . भगोरिया , जो होली का ही एक रूप है.  बिहार का फगुआ जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है और नेपाल की होली में धार्मिक व सांस्कृतिक रंग दिखाई देता है। इसी प्रकार विभिन्न देशों में बसे प्रवासियों तथा धार्मिक संस्थाओं जैसे इस्कॉन या वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में अलग अलग प्रकार से होली के श्रंगार व उत्सव मनाने की परंपरा है .प्रत्येक परम्परा में आंतरिक उत्साह को  प्रगट करने की शैली की विविधता भले ही हो पर मूल स्वरूप में होली कृष्ण लीला से जोड़ते हुये , प्रकृति से तादात्म्य बिठाते हुये उल्लास मनाने का पर्व है .


विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १ , शिलकुन्ज , विद्युत मण्डल कालोनी नयागांव  , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

9425806252, 70003757987

Friday, 1 July, 2016

जलाशयो , वाटर बाडीज , शहरो के पास नदियो को ऊंचा नही गहरा किया जावे

जल संग्रह गहरा हो ऊंचा नहीं

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
अधीक्षण अभियंता सिविल, म प्र पू क्षे विद्युत वितरण कम्पनी
फैलो आफ इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर ४८२००८
फोन ०७६१२६६२०५२


            पानी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है . सारी सभ्यतायें नैसर्गिक जल स्रोतो के तटो पर ही विकसित हुई हैं . बढ़ती आबादी के दबाव में , तथा ओद्योगिकीकरण से पानी की मांग बढ़ती ही जा रही है . इसलिये भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है और परिणाम स्वरूप जमीन के अंदर पानी के स्तर में लगातार गिरावट होती जा रही है . नदियो पर हर संभावित प्राकृतिक स्थल पर बांध बनाये गये हैं . बांधो की ऊंचाई को लेकर अनेक जन आंदोलन हमने देखे हैं . बांधो के दुष्परिणाम भी हुये , जंगल डूब में आते चले गये और गांवो का विस्थापन हुआ . बढ़ती पानी की मांग के चलते जलाशयों के बंड रेजिंग के प्रोजेक्ट जब तब बनाये जाते हैं . अब समय आ गया है कि जलाशयो , वाटर बाडीज , शहरो के पास नदियो  को ऊंचा नही गहरा किया जावे .
            यांत्रिक सुविधाओ व तकनीकी रूप से विगत दो दशको में हम इतने संपन्न हो चुके हैं कि समुद्र की तलहटी पर भी उत्खनन के काम हो रहे हैं . समुद्र पर पुल तक बनाये जा रहे हैं बिजली और आप्टिकल सिग्नल केबल लाइनें बिछाई जा रही है . तालाबो , जलाशयो की सफाई के लिये जहाजो पर माउंटेड ड्रिलिंग , एक्सकेवेटर , मडपम्पिंग मशीने उपलब्ध हैं . कई विशेषज्ञ कम्पनियां इस क्षेत्र में काम करने की क्षमता सम्पन्न हैं .मूलतः इस तरह के कार्य हेतु किसी जहाज या बड़ी नाव , स्टीमर पर एक फ्रेम माउंट किया जाता है जिसमें मथानी की तरह का बड़ा रिग उपकरण लगाया जाता है , जो जलाशय की तलहटी तक पहुंच कर मिट्टी को मथकर खोदता है , फिर उसे मड पम्प के जरिये जलाशय से बाहर फेंका जाता है . नदियो के ग्रीष्म काल में सूख जाने पर तो यह काम सरलता से जेसीबी मशीनो से ही किया जा सकता है . नदी और बड़े नालो मे भी  नदी की ही चौड़ाई तथा लगभग एक किलोमीटर लम्बाई में चम्मच के आकार की लगभग दस से बीस मीटर की गहराई में खुदाई करके रिजरवायर बनाये जा सकते हैं . इन वाटर बाडीज में नदी के बहाव का पानी भर जायेगा , उपरी सतह से नदी का प्रवाह भी बना रहेगा जिससे पानी का आक्सीजन कंटेंट पर्याप्त रहेगा . २ से ४ वर्षो में इन रिजरवायर में धीरे धीरे सिल्ट जमा होगी जिसे इस अंतराल पर ड्रोजर के द्वारा साफ करना होगा . नदी के क्षेत्रफल में ही इस तरह तैयार जलाशय का विस्तार होने से कोई भी अतिरिक्त डूब क्षेत्र जैसी समस्या नही होगी . जलाशय के पानी को पम्प करके यथा आवश्यकता उपयोग किया जाता रहेगा .
            अब जरूरी है कि अभियान चलाकर बांधो में जमा सिल्ट ही न निकाली जाये वरन जियालाजिकल एक्सपर्टस की सलाह के अनुरूप  बांधो को गहरा करके उनकी जल संग्रहण क्षमता बढ़ाई जाने के लिये हर स्तर पर प्रयास किये जायें . शहरो के किनारे से होकर गुजरने वाली नदियो में ग्रीष्म ‌‌काल में जल धारा सूख जाती है , हाल ही पवित्र क्षिप्रा के तट पर संपन्न उज्जैन के सिंहस्थ के लिये क्षिप्रा में नर्मदा नदी का पानी पम्प करके डालना पड़ा था . यदि क्षिप्रा की तली को गहरा करके जलाशय बना दिया जावे  तो उसका पानी स्वतः ही नदी में बारहो माह संग्रहित रहा आवेगा  .             इस विधि से बरसात के दिनो में बाढ़ की समस्या से भी किसी हद तक नियंत्रण किया जा  सकता है . इतना ही नही गिरते हुये भू जल स्तर पर भी नियंत्रण हो सकता है क्योकि गहराई में पानी संग्रहण से जमीन रिचार्ज होगी , साथ ही जब नदी में ही पानी उपलब्ध होगा तो लोग ट्यूब वेल का इस्तेमाल भी कम करेंगे . इस तरह दोहरे स्तर पर भूजल में वृद्धि होगी . नदियो व अन्य वाटर बाडीज के गहरी करण से जो मिट्टी , व अन्य सामग्री बाहर आयेगी उसका उपयोग भी भवन निर्माण , सड़क निर्माण तथा अन्य इंफ्रा स्ट्रक्चर डेवलेपमेंट में किया जा सकेगा . वर्तमान में इसके लिये पहाड़ खोदे जा रहे हैं जिससे पर्यावरण को व्यापक स्थाई नुकसान हो रहा है , क्योकि पहाड़ियो की खुदाई करके पत्थर व मुरम तो प्राप्त हो रही है पर इन पर लगे वृक्षो का विनाश  हो रहा है , एवं पहाड़ियो के खत्म होते जाने से स्थानीय बादलो से होने वाली वर्षा भी प्रभावित हो रही है .
            नदियो की तलहटी की खुदाई से एक और बड़ा लाभ यह होगा कि इन नदियो के भीतर छिपी खनिज संपदा का अनावरण सहज ही हो सकेगा . छत्तीसगढ़ में महानदी में स्वर्ण कण   मिलते हैं ,तो कावेरी के थले में प्राकृतिक गैस , इस तरह के अनेक संभावना वाले क्षेत्रो में विषेश उत्खनन भी करवाया जा सकता है .
            पुरातात्विक महत्व के अनेक परिणाम भी हमें नदियो तथा जलाशयो के गहरे उत्खनन से मिल सकते हैं , क्योकि भारतीय संस्कृति में आज भी अनेक आयोजनो के अवशेष  नदियो में विसर्जित कर देने की परम्परा हम पाले हुये हैं . नदियो के पुलो से गुजरते हुये जाने कितने ही सिक्के नदी में डाले जाने की आस्था जन मानस में देखने को मिलती है . निश्चित ही सदियो की बाढ़ में अपने साथ नदियां जो कुछ बहाकर ले आई होंगी उस इतिहास को अनावृत करने में नदियो के गहरी करण से बड़ा योगदान मिलेगा .
            पन बिजली बनाने के लिये अवश्य ऊँचे बांधो की जरूरत बनी रहेगी , पर उसमें भी रिवर्सिबल रिजरवायर , पम्प टरबाईन टेक्नीक से पीकिंग अवर विद्युत उत्पादन को बढ़ावा देकर गहरे जलाशयो के पानी का उपयोग किया जा सकता है .
            मेरे इस आमूल मौलिक  विचार पर भूवैज्ञानिक , राजनेता , नगर व ग्राम स्थानीय प्रशासन , केद्र व राज्य सरकारो को तुरंत कार्य करने की जरुरत है , जिससे महाराष्ट्र जैसे सूखे से देश बच सके कि हमें पानी की ट्रेने न चलानी पड़े , बल्कि बरसात में हर क्षेत्र की नदियो में बाढ़ की तबाही मचाता जो पानी व्यर्थ बह जाता है तथा साथ में मिट्टी बहा ले जाता है वह नगर नगर में नदी के क्षेत्रफल के विस्तार में ही गहराई में साल भर संग्रहित रह सके और इन प्राकृतिक जलाशयो से उस क्षेत्र की जल आपूर्ति वर्ष भर हो सके.