Friday 1 July 2016

जलाशयो , वाटर बाडीज , शहरो के पास नदियो को ऊंचा नही गहरा किया जावे

जल संग्रह गहरा हो ऊंचा नहीं

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र
अधीक्षण अभियंता सिविल, म प्र पू क्षे विद्युत वितरण कम्पनी
फैलो आफ इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर ४८२००८
फोन ०७६१२६६२०५२


            पानी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है . सारी सभ्यतायें नैसर्गिक जल स्रोतो के तटो पर ही विकसित हुई हैं . बढ़ती आबादी के दबाव में , तथा ओद्योगिकीकरण से पानी की मांग बढ़ती ही जा रही है . इसलिये भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है और परिणाम स्वरूप जमीन के अंदर पानी के स्तर में लगातार गिरावट होती जा रही है . नदियो पर हर संभावित प्राकृतिक स्थल पर बांध बनाये गये हैं . बांधो की ऊंचाई को लेकर अनेक जन आंदोलन हमने देखे हैं . बांधो के दुष्परिणाम भी हुये , जंगल डूब में आते चले गये और गांवो का विस्थापन हुआ . बढ़ती पानी की मांग के चलते जलाशयों के बंड रेजिंग के प्रोजेक्ट जब तब बनाये जाते हैं . अब समय आ गया है कि जलाशयो , वाटर बाडीज , शहरो के पास नदियो  को ऊंचा नही गहरा किया जावे .
            यांत्रिक सुविधाओ व तकनीकी रूप से विगत दो दशको में हम इतने संपन्न हो चुके हैं कि समुद्र की तलहटी पर भी उत्खनन के काम हो रहे हैं . समुद्र पर पुल तक बनाये जा रहे हैं बिजली और आप्टिकल सिग्नल केबल लाइनें बिछाई जा रही है . तालाबो , जलाशयो की सफाई के लिये जहाजो पर माउंटेड ड्रिलिंग , एक्सकेवेटर , मडपम्पिंग मशीने उपलब्ध हैं . कई विशेषज्ञ कम्पनियां इस क्षेत्र में काम करने की क्षमता सम्पन्न हैं .मूलतः इस तरह के कार्य हेतु किसी जहाज या बड़ी नाव , स्टीमर पर एक फ्रेम माउंट किया जाता है जिसमें मथानी की तरह का बड़ा रिग उपकरण लगाया जाता है , जो जलाशय की तलहटी तक पहुंच कर मिट्टी को मथकर खोदता है , फिर उसे मड पम्प के जरिये जलाशय से बाहर फेंका जाता है . नदियो के ग्रीष्म काल में सूख जाने पर तो यह काम सरलता से जेसीबी मशीनो से ही किया जा सकता है . नदी और बड़े नालो मे भी  नदी की ही चौड़ाई तथा लगभग एक किलोमीटर लम्बाई में चम्मच के आकार की लगभग दस से बीस मीटर की गहराई में खुदाई करके रिजरवायर बनाये जा सकते हैं . इन वाटर बाडीज में नदी के बहाव का पानी भर जायेगा , उपरी सतह से नदी का प्रवाह भी बना रहेगा जिससे पानी का आक्सीजन कंटेंट पर्याप्त रहेगा . २ से ४ वर्षो में इन रिजरवायर में धीरे धीरे सिल्ट जमा होगी जिसे इस अंतराल पर ड्रोजर के द्वारा साफ करना होगा . नदी के क्षेत्रफल में ही इस तरह तैयार जलाशय का विस्तार होने से कोई भी अतिरिक्त डूब क्षेत्र जैसी समस्या नही होगी . जलाशय के पानी को पम्प करके यथा आवश्यकता उपयोग किया जाता रहेगा .
            अब जरूरी है कि अभियान चलाकर बांधो में जमा सिल्ट ही न निकाली जाये वरन जियालाजिकल एक्सपर्टस की सलाह के अनुरूप  बांधो को गहरा करके उनकी जल संग्रहण क्षमता बढ़ाई जाने के लिये हर स्तर पर प्रयास किये जायें . शहरो के किनारे से होकर गुजरने वाली नदियो में ग्रीष्म ‌‌काल में जल धारा सूख जाती है , हाल ही पवित्र क्षिप्रा के तट पर संपन्न उज्जैन के सिंहस्थ के लिये क्षिप्रा में नर्मदा नदी का पानी पम्प करके डालना पड़ा था . यदि क्षिप्रा की तली को गहरा करके जलाशय बना दिया जावे  तो उसका पानी स्वतः ही नदी में बारहो माह संग्रहित रहा आवेगा  .             इस विधि से बरसात के दिनो में बाढ़ की समस्या से भी किसी हद तक नियंत्रण किया जा  सकता है . इतना ही नही गिरते हुये भू जल स्तर पर भी नियंत्रण हो सकता है क्योकि गहराई में पानी संग्रहण से जमीन रिचार्ज होगी , साथ ही जब नदी में ही पानी उपलब्ध होगा तो लोग ट्यूब वेल का इस्तेमाल भी कम करेंगे . इस तरह दोहरे स्तर पर भूजल में वृद्धि होगी . नदियो व अन्य वाटर बाडीज के गहरी करण से जो मिट्टी , व अन्य सामग्री बाहर आयेगी उसका उपयोग भी भवन निर्माण , सड़क निर्माण तथा अन्य इंफ्रा स्ट्रक्चर डेवलेपमेंट में किया जा सकेगा . वर्तमान में इसके लिये पहाड़ खोदे जा रहे हैं जिससे पर्यावरण को व्यापक स्थाई नुकसान हो रहा है , क्योकि पहाड़ियो की खुदाई करके पत्थर व मुरम तो प्राप्त हो रही है पर इन पर लगे वृक्षो का विनाश  हो रहा है , एवं पहाड़ियो के खत्म होते जाने से स्थानीय बादलो से होने वाली वर्षा भी प्रभावित हो रही है .
            नदियो की तलहटी की खुदाई से एक और बड़ा लाभ यह होगा कि इन नदियो के भीतर छिपी खनिज संपदा का अनावरण सहज ही हो सकेगा . छत्तीसगढ़ में महानदी में स्वर्ण कण   मिलते हैं ,तो कावेरी के थले में प्राकृतिक गैस , इस तरह के अनेक संभावना वाले क्षेत्रो में विषेश उत्खनन भी करवाया जा सकता है .
            पुरातात्विक महत्व के अनेक परिणाम भी हमें नदियो तथा जलाशयो के गहरे उत्खनन से मिल सकते हैं , क्योकि भारतीय संस्कृति में आज भी अनेक आयोजनो के अवशेष  नदियो में विसर्जित कर देने की परम्परा हम पाले हुये हैं . नदियो के पुलो से गुजरते हुये जाने कितने ही सिक्के नदी में डाले जाने की आस्था जन मानस में देखने को मिलती है . निश्चित ही सदियो की बाढ़ में अपने साथ नदियां जो कुछ बहाकर ले आई होंगी उस इतिहास को अनावृत करने में नदियो के गहरी करण से बड़ा योगदान मिलेगा .
            पन बिजली बनाने के लिये अवश्य ऊँचे बांधो की जरूरत बनी रहेगी , पर उसमें भी रिवर्सिबल रिजरवायर , पम्प टरबाईन टेक्नीक से पीकिंग अवर विद्युत उत्पादन को बढ़ावा देकर गहरे जलाशयो के पानी का उपयोग किया जा सकता है .
            मेरे इस आमूल मौलिक  विचार पर भूवैज्ञानिक , राजनेता , नगर व ग्राम स्थानीय प्रशासन , केद्र व राज्य सरकारो को तुरंत कार्य करने की जरुरत है , जिससे महाराष्ट्र जैसे सूखे से देश बच सके कि हमें पानी की ट्रेने न चलानी पड़े , बल्कि बरसात में हर क्षेत्र की नदियो में बाढ़ की तबाही मचाता जो पानी व्यर्थ बह जाता है तथा साथ में मिट्टी बहा ले जाता है वह नगर नगर में नदी के क्षेत्रफल के विस्तार में ही गहराई में साल भर संग्रहित रह सके और इन प्राकृतिक जलाशयो से उस क्षेत्र की जल आपूर्ति वर्ष भर हो सके.

Sunday 24 April 2016

धार्मिक पर्यटन की हमारी सांस्कृतिक विरासत

धार्मिक पर्यटन की हमारी सांस्कृतिक विरासत

विवेक रंजन श्रीवास्तव
OB 11, विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर म.प्र.
फोन ०७६१ २६६२०५२, ०९४२५८०६२५२
vivek1959@yahoo.co.in


       
        देश भर में द्वादश ज्योतिर्लिंग स्थापित  हैं . १ गुजरात काठियावाड़ में श्री सोमनाथ ,२ श्री शैल पर श्री मल्लिकार्जुन , ३ उज्जैन में श्री महाकाल , ४ मध्यप्रदेश में ही ॐकारेश्वर ,५ झारखण्ड में श्री वैद्यनाथ ,६ महाराष्ट्र में डाकिनी नामक स्थान में श्री भीमशङ्कर , ७ तमिलनाडु में सेतुबंध पर श्री रामेश्वर, ८ गुजरात दारुकावन में श्रीनागेश्वर, ९  उत्तर प्रसाद वाराणसी  में श्री विश्वनाथ,  १० नासिक महाराष्ट्र में गौतमी ,गोदावरी के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर,  ११ उत्तराखण्ड  हिमालय पर केदारखंड में श्री केदारनाथ और १२ महाराष्ट्र औरंगाबाद में श्री घुश्मेश्वर नामक भगवान शंकर के ये स्वरूप विराजित हैं .प्रत्येक  हिंदू जीवन में कम से कम एक बार इन ज्योतिर्लिंगो के दर्शन को  लालायित रहता है . और इस तरह वह शुद्ध धार्मिक मनो भाव से जीवन काल में कभी न कभी इन तीर्थ स्थलो का पर्यटन करता है .
        इसी तरह ५१ शक्तिपीठ भारत भूमि पर यत्र तत्र फैले हुये हैं .मान्यता है कि जब भगवान शंकर को यज्ञ में निमंत्रित न करने के कारण सती देवी माँ ने यज्ञ अग्नि में स्वयं की आहुति दे दी थी तो क्रुद्ध भगवान शंकर उनके शरीर को लेकर घूमने लगे और सती माँ के शरीर के विभिन्न हिस्से भारतीय उपमहाद्वीप पर जिन  विभिन्न स्थानो पर गिरे वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई . प्रत्येक स्थान पर भगवान शंकर के भैरव स्वरूप की भी स्थापना है .शक्ति का अर्थ माता का वह रूप जिसकी पूजा की जाती है तथा भैरव का मतलब शिवजी का वह अवतार जो माता के इस रूप के स्वांगी है . ये स्थान हैं  1.किरीट शक्तिपीठ, पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के तट लालबाग कोट पर स्थित है।  यहां सती माता का किरीट यानी शिराभूषण या मुकुट गिरा था। यहां की शक्ति विमला अथवा भुवनेश्वरी तथा भैरव संवर्त हैं। 2. कात्यायनी शक्तिपीठ वृन्दावन, मथुरा के भूतेश्वर में स्थित है कात्यायनी वृन्दावन शक्तिपीठ जहां सती का केशपाश गिरा था। यहां की शक्ति देवी कात्यायनी हैं तथा भैरव भूतेश है। 3. करवीर शक्तिपीठ महाराष्ट्र के कोल्हापुर में स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का त्रिनेत्र गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव क्रोधशिश हैं। यहां महालक्ष्मी का निज निवास माना जाता है। 4. श्री पर्वत शक्तिपीठ  इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतान्तर है कुछ विद्वानों का मानना है कि इस पीठ का मूल स्थल लद्दाख है, जबकि कुछ का मानना है कि यह असम के सिलहट में है जहां माता सती का दक्षिण तल्प यानी कनपटी गिरा था। यहां की शक्ति श्री सुन्दरी एवं भैरव सुन्दरानन्द हैं। 5. विशालाक्षी शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश, वाराणसी के मीरघाट पर स्थित है , शक्तिपीठ जहां माता सती के दाहिने कान के मणि गिरे थे। यहां की शक्ति विशालाक्षी तथा भैरव काल भैरव हैं। 6. गोदावरी तट शक्तिपीठ आंध्रप्रदेश के कब्बूर में गोदावरी तट पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता का वामगण्ड यानी बायां कपोल गिरा था। यहां की शक्ति विश्वेश्वरी या रुक्मणी तथा भैरव दण्डपाणि हैं। 7. शुचीन्द्रम शक्तिपीठ  , तमिलनाडु, कन्याकुमारी के त्रिसागर संगम स्थल पर स्थित है यह शुची शक्तिपीठ, जहां सती के उफध्र्वदन्त ,मतान्तर से पृष्ठ भागद्ध गिरे थे। यहां की शक्ति नारायणी तथा भैरव संहार या संकूर हैं। 8. पंच सागर शक्तिपीठ का कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है लेकिन यहां माता का नीचे के दान्त गिरे थे। यहां की शक्ति वाराही तथा भैरव महारुद्र हैं। 9. ज्वालामुखी शक्तिपीठ , हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में स्थित है . जहां सती की जिह्वा गिरी थी। यहां की शक्ति सिद्धिदा व भैरव उन्मत्त हैं। 10. भैरव पर्वत शक्तिपीठ  इस शक्तिपीठ को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कुछ  गुजरात के गिरिनार के निकट भैरव पर्वत को तो कुछ मध्य प्रदेश के उज्जैन के निकट क्षीप्रा नदी तट पर वास्तविक शक्तिपीठ मानते हैं, जहां माता का उर्ध्र्व ओष्ठ गिरा है। यहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण हैं। 11. अट्टहास शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के लाबपुर में स्थित है। जहां माता का अध्रोष्ठ यानी नीचे का होंठ गिरा था। यहां की शक्ति पफुल्लरा तथा भैरव विश्वेश हैं।12. जनस्थान शक्तिपीठ
महाराष्ट्र नासिक के पंचवटी में स्थित है , यहां माता की ठुड्डी गिरी थी। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव विकृताक्ष हैं। 13. कश्मीर शक्तिपीठ जम्मू-कश्मीर के अमरनाथ में स्थित है यह शक्तिपीठ जहां माता का कण्ठ गिरा था। यहां की शक्ति महामाया तथा भैरव त्रिसंध्येश्वर हैं। 14. नन्दीपुर शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है यह पीठ, जहां देवी की देह का कण्ठहार गिरा था। यहां कि शक्ति निन्दनी और भैरव निन्दकेश्वर हैं . 15. आंध्रप्रदेश  के कुर्नूल के पास है श्री शैल शक्तिपीठ, जहां माता की ग्रीवा गिरी था। यहां की शक्ति महालक्ष्मी तथा भैरव संवरानन्द अथव ईश्वरानन्द हैं। 16. पश्चिम बंगाल के बोलपुर में है नलहटी शक्तिपीठ, जहां माता की उदरनली गिरी थी। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव योगीश हैं। 17. मिथिला शक्तिपीठ इसका निश्चित स्थान अज्ञात है। स्थान को लेकर मन्तारतर है तीन स्थानों पर मिथिला शक्तिपीठ को माना जाता है, वह है नेपाल के जनकपुर, बिहार के समस्तीपुर और सहरसा, जहां माता का वाम स्कंध् गिरा था। यहां की शक्ति उमा या महादेवी तथा भैरव महोदर हैं . 18. रत्नावली शक्तिपीठ, इसका निश्चित स्थान अज्ञात है, बंगाज पंजिका के अनुसार यह तमिलनाडु के चेन्नई में कहीं स्थित है रत्नावली शक्तिपीठ जहां माता का दक्षिण स्कंध् गिरा था। यहां की शक्ति कुमारी तथा भैरव शिव हैं। 19. अम्बाजी शक्तिपीठ गुजरात गूना गढ़ के गिरनार पर्वत के  शिखर पर देवी अम्बिका  का भव्य विशाल मन्दिर है, जहां माता का उदर गिरा था। यहां की शक्ति चन्द्रभागा तथा भैरव वक्रतुण्ड है। ऐसी भी मान्यता है कि गिरिनार पर्वत के निकट ही सती का उध्र्वोष्ठ गिरा था, जहां की शक्ति अवन्ती तथा भैरव लंबकर्ण है। 20. जालंध्र शक्तिपीठ पंजाब के जालंधर में स्थित है , जहां माता का वामस्तन गिरा था। यहां की शक्ति त्रिापुरमालिनी तथा भैरव भीषण हैं।.21. रामागरि शक्तिपीठ इस शक्ति पीठ की स्थिति को लेकर भी विद्वानों में मतान्तर है। कुछ उत्तर प्रदेश के चित्रकूट तो कुछ मध्य प्रदेश के मैहर में मानते हैं, जहां माता का दाहिना स्तन गिरा था। यहा की शक्ति शिवानी तथा भैरव चण्ड हैं। 22. वैद्यनाथ शक्तिपीठ झारखण्ड के गिरिडीह, देवघर स्थित है वैद्यनाथ हार्द शक्तिपीठ, जहां माता का हृदय गिरा था। यहां की शक्ति जयदुर्गा तथा भैरव वैद्यनाथ है। एक मान्यतानुसार यहीं पर सती का दाह-संस्कार भी हुआ था। 23. वक्त्रोश्वर शक्तिपीठ माता का यह शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के सैन्थया में स्थित है जहां माता का मन गिरा था। यहां की शक्ति महिषासुरमदिनी तथा भैरव वक्त्रानाथ हैं। 24. कण्यकाश्रम कन्याकुमारी शक्तिपीठ तमिलनाडु के कन्याकुमारी के तीन सागरों हिन्द महासागर, अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी के संगम पर स्थित है कण्यकाश्रम शक्तिपीठ, जहां माता का पीठ मतान्तर से उध्र्वदन्त गिरा था। यहां की शक्ति शर्वाणि या नारायणी तथा भैरव निमषि या स्थाणु हैं। 25. बहुला शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के कटवा जंक्शन के निकट केतुग्राम में स्थित है बहुला शक्तिपीठ, जहां माता का वाम बाहु गिरा था। यहां की शक्ति बहुला तथा भैरव भीरुक हैं। 26. उज्जयिनी शक्तिपीठ मध्य प्रदेश के उज्जैन के पावन क्षिप्रा के दोनों तटों पर स्थित है उज्जयिनी शक्तिपीठ। जहां माता की कुहनी गिरी था। यहां की शक्ति मंगल चण्डिका तथा भैरव मांगल्य कपिलांबर हैं। 27. मणिवेदिका शक्तिपीठ , राजस्थान के पुष्कर में स्थित है मणिदेविका शक्तिपीठ, जिसे गायत्री मन्दिर के नाम से जाना जाता है यहीं माता की कलाइयां गिरी थीं। यहां की शक्ति गायत्री तथा भैरव शर्वानन्द हैं। 28. प्रयाग शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में स्थित है। यहां माता की हाथ की अंगुलियां गिरी थी। लेकिन, स्थानों को लेकर मतभेद है इसे यहां अक्षयवट, मीरापुर और अलोपी स्थानों गिरा माना जाता है। तीनों शक्तिपीठ की शक्ति ललिता हैं तथा भैरव भव है। 29. विरजाक्षेत्रा, उत्कल शक्तिपीठ , उड़ीसा के पुरी और याजपुर में माना जाता है जहां माता की नाभि गिरी थी . यहां की शक्ति  विमला तथा भैरव जगन्नाथ पुरुषोत्तम हैं। 30. कांची शक्तिपीठ , तमिलनाडु के कांचीवरम् में स्थित है माता का कांची शक्तिपीठ, जहां माता का कंकाल गिरा था। यहां की शक्ति देवगर्भा तथा भैरव रुरु हैं। 31. कालमाध्व शक्तिपीठ इस शक्तिपीठ के बारे कोई निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है। परन्तु, यहां माता का वाम नितम्ब गिरा था। यहां की शक्ति काली तथा भैरव असितांग हैं। 32. शोण शक्तिपीठ मध्य प्रदेश के अमरकंटक के नर्मदा मन्दिर में शोण शक्तिपीठ है। यहां माता का दक्षिण नितम्ब गिरा था। एक दूसरी मान्यता यह है कि  बिहार के सासाराम का ताराचण्डी मन्दिर ही शोण तटस्था शक्तिपीठ है। यहां सती का दायां नेत्र गिरा था ऐसा माना जाता है। यहां की शक्ति नर्मदा या शोणाक्षी तथा भैरव भद्रसेन हैं। 33. कामाख्या शक्तिपीठ कामगिरि असम गुवाहाटी के कामगिरि पर्वत पर स्थित है यह शक्तिपीठ, जहां माता की योनि गिरी था। यहां की शक्ति कामाख्या तथा भैरव उमानन्द हैं। 34. जयन्ती शक्तिपीठ मेघालय के जयन्तिया पहाडी पर स्थित है, जहां माता का वाम जंघा गिरा था। यहां की शक्ति जयन्ती तथा भैरव क्रमदीश्वर हैं। 35. मगध् शक्तिपीठ बिहार की राजधानी पटना में स्थित पटनेश्वरी देवी को ही शक्तिपीठ माना जाता है जहां माता का दाहिना जंघा गिरा था। यहां की शक्ति सर्वानन्दकरी तथा भैरव व्योमकेश हैं। 36. त्रिस्तोता शक्तिपीठ , पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी के शालवाड़ी गांव में तीस्ता नदी पर स्थित है त्रिस्तोता शक्तिपीठ, जहां माता का वामपाद गिरा था। यहां की शक्ति भ्रामरी तथा भैरव ईश्वर हैं। 37. त्रिपुरी सुन्दरी शक्तित्रिपुरी पीठ त्रिपुरा के राध किशोर ग्राम में स्थित है त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ, जहां माता का दक्षिण पाद गिरा था। यहां की शक्ति त्रिपुर सुन्दरी तथा भैरव त्रिपुरेश हैं। 38 . विभाष शक्तिपीठ , पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के ताम्रलुक ग्राम में स्थित है विभाष शक्तिपीठ, जहां माता का वाम टखना गिरा था। यहां की शक्ति कापालिनी, भीमरूपा तथा भैरव सर्वानन्द हैं। 39. देवीकूप पीठ कुरुक्षेत्र शक्तिपीठ  हरियाणा के कुरुक्षेत्र जंक्शन के निकट द्वैपायन सरोवर के पास स्थित है , जिसे श्रीदेवीकूप भद्रकाली पीठ के नाम से भी जाना जाता है।  यहां माता के  दहिने चरण (गुल्पफद्ध) गिरे थे। यहां की शक्ति सावित्री तथा भैरव स्थाणु हैं। 40. युगाद्या शक्तिपीठ, क्षीरग्राम शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बर्दमान जिले के क्षीरग्राम में स्थित है, यहां सती के दाहिने चरण का अंगूठा गिरा था। यहां की शक्ति जुगाड़या और भैरव क्षीर खंडक है। 41. विराट का अम्बिका शक्तिपीठ राजस्थान के गुलाबी नगरी जयपुर के वैराटग्राम में स्थित है विराट शक्तिपीठ, जहाँ सती के 'दायें पाँव की उँगलियाँ' गिरी थीं।। यहां की शक्ति अंबिका तथा भैरव अमृत हैं। 42. कालीघाट शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल, कोलकाता के कालीघाट में कालीमन्दिर के नाम से प्रसिद्ध यह शक्तिपीठ, जहां माता के दाएं पांव की अंगूठा छोड़ 4 अन्य अंगुलियां गिरी थीं। यहां की शक्ति कालिका तथा भैरव नकुलेश हैं। 43. मानस शक्तिपीठ तिब्बत के मानसरोवर तट पर स्थित है मानस शक्तिपीठ, जहां माता की दाहिनी हथेली का निपात हुआ था। यहां की शक्ति  दाक्षायणी तथा भैरव अमर हैं। 44. लंका शक्तिपीठ , श्रीलंका में स्थित है . जहां माता का नूपुर गिरा था। यहां की शक्ति इन्द्राक्षी तथा भैरव राक्षसेश्वर हैं। लेकिन, वह निश्चित स्थान ज्ञात नहीं है कि श्रीलंका के किस स्थान पर गिरे थे। 45. गण्डकी शक्तिपीठ नेपाल में गण्डकी नदी के उद्गम पर स्थित है गण्डकी शक्तिपीठ, जहां सती के दक्षिणगण्ड(कपोल) गिरा था। यहां शक्ति `गण्डकी´ तथा भैरव `चक्रपाणि´ हैं। 6. गुह्येश्वरी शक्तिपीठ नेपाल के काठमाण्डू में पशुपतिनाथ मन्दिर के पास ही स्थित है गुह्येश्वरी शक्तिपीठ है, जहां माता सती के दोनों जानु (घुटने) गिरे थे। यहां की शक्ति `महामाया´ और भैरव `कपाल´ हैं। 7. हिंगलाज शक्तिपीठ पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान प्रान्त में स्थित है माता हिंगलाज शक्तिपीठ, जहां माता का ब्रह्मरन्ध्र (सर का ऊपरी भाग) गिरा था। यहां की शक्ति कोट्टरी और भैरव भीमलोचन है। 8. सुगंध शक्तिपीठ  , देश के खुलना में सुगंध नदी के तट पर स्थित है उग्रतारा देवी का शक्तिपीठ, जहां माता का नासिका गिरा था। यहां की देवी सुनन्दा है तथा भैरव त्रयम्बक हैं।49. बंग्लादेश भवानीपुर के बेगड़ा में  करतोया नदी के तट पर स्थित है करतोयाघाट शक्तिपीठ, जहां माता का वाम तल्प गिरा था। यहां देवी अपर्णा रूप में तथा शिव वामन भैरव रूप में वास करते हैं।50. चट्टल शक्तिपीठ बंग्लादेश के चटगांव  में स्थित है चट्टल का भवानी शक्तिपीठ, जहां माता का दाहिना बाहु यानी भुजा गिरा था। यहां की शक्ति भवानी  तथा भेरव चन्द्रशेखर हैं।51. यशोर शक्तिपीठ बांग्लादेश के जैसोर खुलना में स्थित है माता का  यशोरेश्वरी शक्तिपीठ, जहां माता का बायीं हथेली गिरा था। यहां शक्ति यशोरेश्वरी तथा भैरव चन्द्र हैं।

         तरह  भारत के चार दिशाओ के चार महत्वपूर्ण मंदिर पूर्व में सागर तट पर  भगवान जगन्नाथ का मंदिर पुरी, दक्षिण में रामेश्‍वरम, पश्चिम में भगवान कृृण की द्वारका और उत्तर में बद्रीनाथ की चारधाम यात्रा भी धार्मिक पर्यटन का अनोखा उदाहरण है .  इन मंदिरों को 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य ने एक सूत्र में पिरोया था। इसके अतिरिक्त हिमालय पर स्थित छोटा चार धाम  में बद्रीनाथ के अलावा केदारनाथ शिव मंदिर, यमुनोत्री एवं गंगोत्री देवी मंदिर शामिल हैं। यह चारों धाम हिंदू धर्म में अपना अलग और महत्‍वपूर्ण स्‍थान रखते हैं। बीसवीं शताब्दि के मध्‍य में हिमालय की गोद में बसे इन चारों तीर्थस्‍थलों को छोटा' विशेषण दिया गया जो आज भी यहां बसे इन देवस्‍थानों को परिभाषित करते हैं। छोटा चार धाम के दर्शन के लिए 4,000 मीटर से भी ज्‍यादा ऊंचाई तक की चढ़ाई करनी होती है। यह डगर कहीं आसान तो कहीं बहुत कठिन है।

        इन देव स्थलो के अतिरिक्त हमारी संस्कृति में नदियो के संगम स्थलो पर मकर संक्रांति पर , चंद्र ग्रहण व सूर्यग्रहण के अवसरो पर नदियो में , कार्तिक मास में नदियो में पवित्र स्नान की भी परम्परायें हैं . हरिद्वार , प्रयाग , नासिक तथा उज्जैन में १२ वर्षो के अंतराल पर आयोजित होते कुंभ के मेले तो मूलतः स्नान से मिलने वाली शारीरिक तथा मानसिक  शुचिता को ही केंद्र में रखकर निर्धारित किये जाने के विलक्षण उदाहरण हैं .
        स्नान का महत्व निर्विवाद है ,शुद्धता और पवित्रता के लिये प्रतिदिन प्रातः काल हम नहाते हैं .हमारी शरीर से निकलते पसीने व वातावरण के सूक्ष्म कण , धूल इत्यादि से त्वचा पर जो  मैल व गंध का जो आवरण बन जाता है वह साफ पानी से नहाने से निकल जाता है और त्वचा को स्निग्धता तथा स्फूर्ति मिलती है , इस भौतिक स्चच्छता का हमारे मन पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, शरीर की थकान मिट जाती है  . हमारे रोमकूप खुल जाते हैं , जिससे त्वचा का सौंदर्य भी बढ़ता है आंतरिक स्फूर्ति का संचरण होता है .  इसीलिये ठंड के दिनो में सनबाथ, स्टीमबाथ, लिया जाता है तो गर्मियों में टब बाथ का महत्व है .आयुर्वेद में भोजन के तुरंत बाद स्नान वर्जित कहा गया है .  मकर संक्रांति पर पंचकर्म और मिट्टी, उबटन, तरह तरह के साबुन बाडी वाश आदि से जल स्नान का प्रचलन हमारी संस्कृति का हिस्सा है . योग में शरीर के आंतरिक अंगों को शुद्ध करने के लिए  शंख प्रक्षालन, नेती, नौलि, धौती, कुंजल, गजकरणी, गणेश क्रिया, अंग संचालन आदि अनेक विधियां बताई जाती हैं . गर्म पानी से नहाने पर रक्त-संचार पहले कुछ उतेजित होता है किन्तु बाद में मंद पड़ जाता है, लेकिन ठंडे पानी से नहाने पर रक्त-संचार पहले मंद पड़ता है और बाद में उतेजित होता है जो कि अधिक लाभदायक है।
        आज देश में राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन चलाया जा रहा है , स्वयं प्रधानमंत्री जी बार बार नागरिको में स्चच्छता के संस्कार रोपने का कार्य विशाल स्तर पर करते दिख रहे हैं . ऐसे समय  में स्नान को केंद्र में रखकर ही  कुंभ जैसा महा पर्व मनाया जा रहा है . जो हजारो वर्षो से हमारी संस्कृति का हिस्सा है . पीढ़ीयों से जनमानस की धार्मिक भावनायें और आस्था कुंभ स्नान से जुड़ी हुई हैं .  प्रश्न है कि क्या कुंभ स्नान को मेले का स्वरूप देने के पीछे केवल नदी में डुबकी लगाना ही हमारे मनीषियो का उद्देश्य रहा होगा ? इस तरह के आयोजनो को नियमित अंतराल पर निर्ंतर स्वस्फूर्त आयोजन करने की व्यवस्था बनाने का निहितार्थ समझने की आवश्यकता है . आज तो लोकतात्रिक शासन है हमारी ही चुनी हुई सरकारें हैं पर कुंभ के मेलो ने तो पराधीनता के युग भी देखे हैं , आक्रांता बादशाहों के समय में भी कुंभ संपन्न हुये हैं और इतिहास गवाह है कि तब भी तत्कालीन प्रशासनिक तंत्र को इन भव्य आयोजनो का व्यवस्था पक्ष देखना ही पड़ा .
        वास्तव में कुंभ स्नान शुचिता का प्रतीक है , शारीरिक और मानसिक शुचिता का . जो साधुसंतो के अखाड़े इन मेलो में एकत्रित होते हैं वहां सत्संग होता है , गुरु दीक्षायें दी जाती हैं . इन मेलों के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नयन के लिये जनमानस तरह तरह के व्रत , संकल्प और प्रयास करता है . धार्मिक यात्रायें होती हैं . लोगों का मिलना जुलना , वैचारिक आदान प्रदान हो पाता है . धार्मिक पर्यटन हमारी संस्कृति की विशिष्टता है . पर्यटन  नये अनुभव देता है साहित्य तथा नव विचारो को जन्म देता है ,  हजारो वर्षो से अनेक आक्रांताओ के हस्तक्षेप के बाद भी भारतीय संस्कृति अपने मूल्यो के साथ इन्ही मेलों समागमो से उत्पन्न अमृत उर्जा से ही अक्ष्ण्य बनी हुई है .
       

विवेक रंजन श्रीवास्तव




Thursday 11 December 2014

साहित्य अकादमी द्वारा विविध-विधाओं के राष्ट्रीय-प्रादेशिक पुरस्कार घोषित

हरिकृष्ण प्रेमी पुरस्कार के लिये श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव-जबलपुर की कृति 'हिंदोस्तां हमारा' के लिये

भोपाल : गुरूवार, दिसम्बर 11, 2014, 17:24 IST
 
साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद् भोपाल द्वारा विभिन्न विधा में प्रकाशित श्रेष्ठ कृतियों के लिए वर्ष 2011 एंव 2012 के पुरस्कार की घोषणा कर दी गई है।
अखिल भारतीय स्तर के पुरस्कार में 10 लेखक के लिए 51 हजार के मान से 51 लाख, प्रादेशिक पुरस्कार में 17 लेखक के लिए 31 हजार के मान से 5.27 लाख और 18 विभिन्न पाण्डुलिपि के लिए प्रति पाण्डुलिपि 10 हजार के मान से 1.80 लाख की राशि दी जायेगी।
अखिल भारतीय पुरस्कारों में वर्ष 2011 माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार के लिये डॉ. प्रभा दीक्षित-कानपुर की कृति 'स्त्री अस्मिता के सवाल', मुक्तिबोध पुरस्कार के लिये डॉ. बीना बुदकी-जम्मू की कृति 'शरणार्थी', वीरसिंह देव पुरस्कार के लिये श्री अशोक जमनानी-होशंगाबाद की कृति 'खम्मा', रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार के लिये डॉ.प्रमोद शर्मा-नागपुर की कृति 'समकालीन कविता का समीकरण' और भवानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार के लिये श्री सुरेश शुक्ल-लखनऊ की कृति 'गंगा से ग्लोमा तक' चयनित हुई हैं।
वर्ष 2012 के अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार के लिये डॉ. रामेश्वर पाण्डेय-रीवा की कृति 'उत्तर आधुनिक तथा अन्य निबंध', मुक्तिबोध पुरस्कार के लिये श्री बाबूराम त्रिपाठी-वाराणसी की कृति 'एक सुबह और मिल जाती', वीरसिंह देव पुरस्कार के लिये श्रीमती स्नेह ठाकुर की कृति 'कैकेयी', रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार के लिये श्री कृष्ण मुरारी मिश्रा की कृति 'आद्य बिम्ब और साहित्यालोचन' और भवानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार श्री चंद्रसेन विराट-इंदौर की कृति 'ओ, गीत के गरूड़' अखिल भारतीय पुरस्कार के लिये चयनित हुई हैं।
वर्ष 2011 के प्रादेशिक पुरस्कारों में पं. बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' पुरस्कार के लिये डॉ. देवेन्द्र दीपक-भोपाल की कृति 'संत रविदास की राम कहानी', सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार के लिये श्री मधुर कुलश्रेष्ठ-गुना 'अनंत की तलाश में', श्रीकृष्ण सरल पुरस्कार के लिये डॉ. प्रेम भारती-भोपाल की कृति 'निबंध देह गंध', नंददुलारे वाजपेयी पुरस्कार के लिये डॉ. आरती दुबे-भोपाल की कृति 'हिन्दी के श्रेष्ठ गीत समीक्षक' और हरिकृष्ण प्रेमी पुरस्कार के लिये कोई कृति पुरस्कार योग्य नहीं पाई गई। इसी श्रेणी में राजेन्द्र अनुरागी पुरस्कार के लिये डॉ. कान्ति कुमार जैन-सागर की कृति 'बैकुंठपुर में बचपन', दुष्यंत कुमार पुरस्कार के लिये श्री बसंत सकरगाए-भोपाल की कृति 'निगहबानी में फूल', ईसुरी पुरस्कार के लिये श्री अनूप अशेष-सतना की कृति 'दोपहर' और जहूर बख्श के लिये पुरस्कार सुश्री अल्पना शर्मा-भोपाल की कृति 'खिलौनों की खुशबू' का चयन किया गया है।
वर्ष 2012 के प्रादेशिक पुरस्कारों में पं. बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' पुरस्कार के लिये सुश्री शरद सिंह-सागर की कृति 'कस्बाई सिमोन', सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार के लिये सुश्री पद्मा शर्मा-शिवपुरी की कृति 'जल समाधि एवं अन्य कहानियाँ', श्रीकृष्ण सरल पुरस्कार के लिये डॉ. अनामिका तिवारी-जबलपुर की कृति 'बूँद', नंददुलारे वाजपेयी पुरस्कार के लिये प्रो. बी.एल. आच्छा-उज्जैन की कृति 'आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यास', हरिकृष्ण प्रेमी पुरस्कार के लिये श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव-जबलपुर की कृति 'हिंदोस्तां हमारा', राजेन्द्र अनुरागी पुरस्कार के लिये डॉ. लक्ष्मीनारायण शोभन-गुना की कृति 'कही अनकही', दुष्यंत कुमार पुरस्कार के लिये श्री मनोहर मनु-नरसिंहगढ़ की कृति 'आँचल गीला हो जाएगा', ईसुरी पुरस्कार के लिये डॉ. जगदीश प्रसाद रावत की कृति 'जगदीश्वर की चौकड़ियाँ' को दिया जायेगा। 'जहूर बख्श' पुरस्कार श्रेणी में कोई कृति पुरस्कार योग्य नहीं पाई गई।
वर्ष 2011 एवं 2012 में प्रदेश के लेखक की पहली कृति की प्रकाशन योजना में 'मैं भारत हूँ' श्री लोकेन्द्र सिंह राजपूत-ग्वालियर, 'पूजा के पुष्प' श्री राकेश सिंहासने-बालाघाट, 'समझ के दायरे में' श्री भुवनेश्वर उपाध्याय-सेवढ़ा, 'अनुगूँज' श्री मनीष श्रीवास्तव-भोपाल, 'खिलता बचपन' श्री अखिल शर्मा-मुरैना, 'नदी की धार सी संवेदनाएँ' श्री रोहित रूसिया-छिन्दवाड़ा, 'मन के मनक' सुश्री द्रोपदी चंदनानी-भोपाल, 'चाहते हैं फिर से' श्री नीलेश कुमार कालभोर-खंडवा, 'जाते हुए पतझड़ को देख कर' डॉ. किशोर सोनवाले लांजी, 'ढेंचू-ढेंचू' श्री आशीष सोनी-नरसिंहपुर, 'शिकवा ईश्वर से' सुश्री कीर्ति झगेकर-भोपाल, 'इंसानी टकसाल' श्री कलीमउद्दीन शेख-इंदौर, 'कहानी संकलन' श्री रामबरन शर्मा-मुरैना, 'नीर-क्षीर' डॉ. साधना बलवटे-भोपाल, 'नारी अस्मिता पर बलिदान-'दामिनी' श्रीमती सीमा निगम-उज्जैन, 'विचार गति' श्री राजू बी आठनेरे-बैतूल, 'कालिदास की सौंदर्य शास्त्रीय शब्दावली का निर्वचन' डॉ. सिद्धार्थ सोमकुंवर-भोपाल और 'बदलते रिश्ते' श्री कैलाश भूरिया-धार की पांडुलिपि प्रकाशन सहायता अनुदान के लिए स्वीकृत हुई हैं।

Tuesday 10 December 2013

केवल पक्ष या विपक्ष नही मुद्दो पर वैचारिक एकता ..लोकतंत्र की जरूरत

केवल पक्ष या  विपक्ष नही मुद्दो पर वैचारिक एकता ..लोकतंत्र की जरूरत

विवेक रंजन  श्रीवास्तव ‘विनम्र
ओ.बी. 11, एमपीईबी कालोनी
रामपुर, जबलपुर (मप्र)  मो. 9425806252

        दिल्ली में आये वर्तमान जनादेश तथा ऐसे ही पिछले अनेक खण्डित चुनाव परिणामो से वर्तमान संवैधानिक प्रावधानो में संशोधन की जरूरत लगती है .  सरकार बनाने के लिये बड़ी पार्टी के मुखिया को नही वरन चुने गये सारे प्रतिनिधियो के द्वारा उनमें आपस में चुने गये मुखिया को बुलाया जाना चाहिये . आखिर हर पार्टी के चुने गये प्रतिनिधि  भले ही उनके क्षेत्र  के वोटरों के बहुमत से चुने जाते हैं किन्तु हारे हुये प्रतिनिधि को भी तो जनता के ही वोट मिलते हैं , और इस तरह वोट प्रतिशत की दृष्टि से हर पार्टी की सरकार में भागीदारी उचित लगती है .
                कोई भी सभ्य समाज नियमों से ही चल सकता है। जनहितकारी नियमों को बनाने और उनके परिपालन को सुनिश्चित करने के लिए शासन की आवश्यकता होती है। राजतंत्र, तानाशाही, धार्मिक सत्ता या लोकतंत्र, नामांकित जनप्रतिनिधियों जैसी विभिन्न शासन प्रणालियों में लोकतंत्र ही सर्वश्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि लोकतंत्र में आम आदमी की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित होती है एवं उसे भी जन नेतृत्व करने का अधिकार होता है। भारत में हमने लिखित संविधान अपनाया है। शासन तंत्र को विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका के उपखंडो में विभाजित कर एक सुदृढ लोकतंत्र की परिकल्पना की है। विधायिका लोकहितकारी नियमों को कानून का रूप देती है। कार्यपालिका उसका अनुपालन कराती है एवं कानून उल्लंघन करने  पर न्यायपालिका द्वारा दंड का प्रावधान है। विधायिका के जनप्रतिनिधियों का चुनाव आम नागरिको के सीधे मतदान के द्वारा किया जाता है किंतु हमारे देश में आजादी के बाद के अनुभव के आधार पर , मेरे मत में इस चुनाव के लिए पार्टीवाद तथा चुनावी जीत के बाद संसद एवं विधानसभाओं में पक्ष विपक्ष की राजनीति ही लोकतंत्र की सबसे बडी कमजोरी के रूप में सामने आई है।
                सत्तापक्ष कितना भी अच्छा बजट बनाये या कोई अच्छे से अच्छा जनहितकारी कानून बनाये विपक्ष उसका विरोध करता ही है। उसे जनविरोधी निरूपित करने के लिए तर्क कुतर्क करने में जरा भी पीछे नहीं रहता। ऐसा केवल इसलिए हो रहा है क्योंकि वह विपक्ष में है। हमने देखा है कि वही विपक्षी दल जो विरोधी पार्टी के रूप में जिन बातो का सार्वजनिक विरोध करते नहीं थकता था , जब सत्ता में आया तो उन्होनें भी वही सब किया और इस बार पूर्व के सत्ताधारी दलो ने उन्हीं तथ्यों का पुरजोर विरोध किया जिनके कभी वे खुले समर्थन में थे। इसके लिये लच्छेदार शब्दो का मायाजाल फैलाया जाता है। ऐसा बार-बार लगातार हो रहा है। अर्थात हमारे लोकतंत्र में यह धारणा बन चुकी है कि विपक्षी दल को सत्ता पक्ष का विरोध करना ही चाहिये . शायद इसके लिये स्कूलो से ही ,  वादविवाद प्रतियोगिता की जो अवधारणा बच्चो के मन में अधिरोपित की जाती है वही जिम्मेदार हो .  वास्तविकता यह होती है कि कोई भी सत्तारूढ दल सब कुछ सही या सब कुछ गलत नहीं करता । सच्चा  लोकतंत्र तो यह होता कि मुद्दे के आधार पर पार्टी निरपेक्ष वोटिंग होती, विषय की गुणवत्ता के आधार पर बहुमत से निर्णय लिया जाता , पर ऐसा हो नही रहा है .
               अन्ना हजारे या बाबा रामदेव किसी पार्टी या किसी लोकतांत्रिक संस्था के निर्वाचित जनप्रतिनिधी नहीं है किंतु इन जैसे तटस्थ मनिषियों को जनहित एवं राष्ट्रहित के मुद्दो पर अनशन तथा भूख हडताल जैसे आंदोलन करने पड रहे है एवं समूचा शासनतंत्र तथा गुप्तचर संस्थायें इन आंदोलनों को असफल बनाने में सक्रिय है। यह लोकतंत्र की बहुत बडी विफलता है। अन्ना हजारे या बाबा रामदेव को तो देश व्यापी जनसमर्थन भी मिल रहा है । मेरा मानना  यह है कि आदर्श लोकतंत्र तो यह होता कि मेरे जैसा कोई साधारण एक व्यक्ति भी यदि देशहित का एक सुविचार रखता तो उसे सत्ता एवं विपक्ष का खुला समर्थन मिल सकता .
                इन अनुभवो से यह स्पष्ट होता है कि हमारी संवैधानिक व्यवस्था में सुधार की व्यापक संभावना है .  दलगत राजनैतिक धु्व्रीकरण एवं पक्ष विपक्ष से उपर उठकर मुद्दों पर आम सहमति या बहुमत पर आधारित निर्णय ही विधायिका के निर्णय हो ऐसी सत्ताप्रणाली के विकास की जरूरत है . इसके लिए जनशिक्षा को बढावा देना तथा आम आदमी की राजनैतिक उदासीनता को तोडने की आवश्यकता दिखती है। जब ऐसी व्यवस्था लागू होगी तब किसी मुद्दे पर कोई 51 प्रतिशत या अधिक जनप्रतिनिधि एक साथ होगें तथा किसी अन्य मुद्दे पर कोई अन्य दूसरे 51 प्रतिशत से ज्यादा जनप्रतिनिधि , जिनमें से कुछ पिछले मुद्दे पर भले ही विरोधी रहे हो साथ होगें तथा दोनों ही मुद्दे बहुमत के कारण प्रभावी रूप से कानून बनेगें.
        क्या हम निहित स्वार्थो से उपर उठकर ऐसी आदर्श व्यवस्था की दिशा में बढ सकते है एवं संविधान में इस तरह के संशोधन कर सकते है. यह खुली बहस का एवं व्यापक जनचर्चा का विषय है जिस पर अखबारो , स्कूल, कालेज, बार एसोसियेशन, व्यापारिक संघ, महिला मोर्चे, मजदूर संगठन आदि विभिन्न विभिन्न मंचो पर खुलकर बाते होने की जरूरत हैं , जिससे इस तरह के जनमत के परिणामो पर पुनर्चुनाव की अपेक्षा मुद्दो पर आधारित रचनात्मक सरकारें बन सकें जिनमें निर्दलीय जन प्रतिनिधियो की कथित खरीद फरोख्त घोड़ो की तरह न हो बल्कि वे मुद्दो पर अपनी सहमति के आधार पर सरकार का सकारात्मक हिस्सा बन सकें .


(लेखक को विभिन्न सामाजिक विषयों पर लेखन के लिए राष्ट्रीय स्तर के अनेक पुरस्कार मिल चुके है)

Sunday 8 December 2013

समाचार

वर्तिका के राष्ट्रीय पुरस्कार घोषित

वर्तिका , जबलपुर की सक्रिय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्था है . २२ दिसम्बर १३ को संस्था २९ वें स्थापना दिवस समारोह का आयोजन रानीदुर्गावती संग्रहालय के सभागार भंवरताल जबलपुर में  कर रही है . इस अवसर पर साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान हेतु राष्ट्रीय तथा स्थानीय स्तर पर पुरस्कार दिये जाने हेतु नामांकन आमंत्रित किये गये थे . एक उच्चस्तरीय चयन समिति ने वरिष्ठ साहित्यकार तथा साहित्य मनीषि प्रो चित्रभूषण श्रीवास्तव विदग्ध की अध्यक्षता में निर्णय लेकर इस वर्ष के पुरस्कारो की घोषणा कर दी है .
स्वर्ग विभा वेबसाइट की संस्थापिका डा तारा सिंग मुम्बई को इस वर्ष का साज जबलपुरी लाइफटाइम वर्तिका अवार्ड दये जाने की घोषणा की गई है . साहित्य अकादमी के निदेशक डा त्रिभुवन नाथ शुक्ल भोपाल को रामेश्वर शुक्ल अंचल अलंकरण ,  श्री संजीव सलिल जबलपुर को कामता प्रसाद गुरू अलंकरण  के अतिरिक्त दिल्ली के श्री जाली अंकल , हैदराबाद के ब्लागर व कवि श्री विजय सपट्टी , नोयडा की सुश्री सखी सिह , भोपाल के श्री अनवर इस्लाम , जबलपुर के श्री कुंवर प्रेमिल एवं श्रीमती लक्ष्मी शर्मा को सम्मानित किया जावेगा . इसके अतिरिक्त वर्तिका की श्रीमती सुनीता मिश्रा  को श्रीमती दयावती श्रीवास्तव शिक्षा वर्तिका अलंकरण तथा दीपक तिवारी को वर्तिका सम्मान प्रदान किया जावेगा .
वर्तिका ने अभिनव पहल करते हुये सक्रिय साहित्यिक संस्थाओ को भी सम्मानित करने का निर्णय लिया है और इस वर्ष यह सम्मान गुंजन कला सदन के संस्थापक श्री ओंकार श्रीवास्तव को दिये जाने का निर्णय सर्व सम्मति से लिया गया है .
वर्तमान परिदृश्य में साहित्यकारो की भूमिका विषय पर होगी संगोष्ठी
अलंकरण  समारोह रविवार २२ दिसम्बर २०१३ को संध्या ६ बजे से आयोजित किया जा रहा है . समारोह के मुख्य अतिथि श्री मनु श्रीवास्तव आई ए एस अध्यक्ष एवं प्रबंध संचालक पावर मैनेजमेंट होंगे . कार्यक्रम की अध्यक्षता हेतु कालिदास अकादमी के पूर्व निदेशक डा कृष्णकांत चतुर्वेदी तथा  विशिष्ट अतिथि के रूप में श्रीमती प्रज्ञा ॠचा श्रीवास्तव आई पी एस , आई जी ने सहमति प्रदान की है .
समारोह के पहले चरण में दोपहर १ बजे से वर्तमान परिदृश्य में साहित्यकारो की भूमिका विषय पर  संगोष्ठी होगी जिसकी अध्यक्षता प्रो सी बी श्रीवास्तव विदग्ध करेंगे तथा मुख्य वक्ता के रूप में श्री राजेन्द्र चंद्रकांत राय व्यक्तव्य देंगे. विवेक रंजन श्रीवास्तव , अध्यक्ष , वर्तिका , ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर ४८२००८ को संगोष्ठी में वाचन हेतु आलेख भेजे जा सकते हैं .

Wednesday 13 November 2013

वर्तिका के वार्षिकोत्सव में लाइफटाईम एचीवमेंट अवार्ड तथा संस्थाओ को पुरस्कार हेतु नामांकन आमंत्रित

समाचार

वर्तिका के वार्षिकोत्सव में लाइफटाईम एचीवमेंट अवार्ड तथा संस्थाओ को पुरस्कार हेतु नामांकन आमंत्रित

वर्तिका , जबलपुर की सक्रिय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्था है . २२ दिसम्बर १३ को संस्था वार्षिकोत्सव आयोजित कर रही है . इस अवसर पर साहित्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान हेतु लाइफटाईम एचीवमेंट अवार्ड दिये जाना प्रस्तावित है . इस हेतु साहित्य प्रेमियो से प्रकाशित किताबो या अन्य साक्ष्य सहित नामांकन आमंत्रित हैं . नामांकन हेतु कोई शुल्क नहीं है . नामांकन स्वयं या कोई भी साहित्य प्रेमी कर सकता है .नामांकन की अंतिम तिथि ७ दिसम्बर २०१३ तक है . नामांकन सादे कागज पर स्वयं का तथा नामांकित व्यक्ति या संस्था का पूर्ण विवरण लिखते हुये निम्न पते पर भेजें .
विवेक रंजन श्रीवास्तव , अध्यक्ष , वर्तिका , ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर ४८२००८ . ईमेल vivekranjan.vinamra@gmail.com .  जिन्हें अवार्ड हेतु चुना जावेगा उनसे किसी तरह का कोई भी शुल्क नही लिया जावेगा .
इसी तरह साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय संस्थाओ को भी पुरस्कृत करने की योजना है , जिसके लिये अलग से नामंकन आमंत्रित हैं . वर्तिका की एक उच्चस्तरीय चयन समिति प्राप्त नामांकनो तथा स्वप्रेरित व्यक्तियो व संस्थाओ के योगदान के आधार पर अवार्ड का निर्णय करेगी .  विश्वविद्यालयीन स्तर के सुयोग्य पेनल की चयन समिति बनाई गई है . जो दिसम्बर १३ के दूसरे सप्ताह के प्रारंभ में चयन की घोषणा करेगी .

Monday 14 October 2013

१० से १२ जनवरी २०१४ को चेन्नई में तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन

१० से १२ जनवरी २०१४ को चेन्नई में तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का भव्य आयोजन किया जा रहा है . आयोजन में जीवनोपलब्धि सम्मान , कृतियो पर , राजभाषा व पत्रकारिता पर , शिक्षा विद सम्मान हिन्दी प्राध्यापक व शिक्षक सम्मान तथा प्रचारक पुरस्कार भि दिये जावेंगे .
विदेशो में हिन्दी का स्वरूप , नारी के प्रति पुरुषो का नजरिया , कामकाजी माताओ के बच्चो की समस्यायें जैसे विषयो पर वैचारिक सत्र होंगे .
कहानी पाठन तथा कवि सम्मेलन भी आयोजित किया जावेगा .

आयोजन हेतु हार्दिक शुभकामनायें . ...
संपर्क madhu.dhawan13@yahoo.com