Friday 30 November 2007

कम्प्यूटर से सीखे जीवन जीने की कला

चिन्तन
कम्प्यूटर से सीखे जीवन जीने की कला
विवेक रंजन श्रीवास्तव
Jabalpur (M.P.) 482008 India

ई मेल vivek1959@yahoo.co.in
blog http://vivekkikavitaye.blogspot.com

जीवन अमूल्य है !इसे सफलता पूर्वक जीना भी एक कला है ! किस तरह जिया जावे कि एक सुखद ,शांत , सद्भावना पूर्ण जीवन जीते हुये , समय की रेत पर हम अपने अमिट पदचिन्ह छोड सकें ? यह सतत अन्वेषण का रोचक विषय रहा है ! अनेकानेक आध्यात्मिक गुरु यही आर्ट आफ लिविग सिखाने में लगे हुये हैं !
आज हमारे परिवेश में यत्र तत्र हमें कम्प्यूटर दिखता है ! यद्यपि कम्प्यूटर का विकास हमने ही किया है किन्तु लाजिकल गणना में कम्प्यूटर हमसे बहुत आगे निकल चुका है ! समय के साथ बने रहने के लिये बुजुर्ग लोग भी आज कम्प्यूटर सीखते दिखते हैं ! मनुष्य में एक अच्छा गुण है कि हम सीखने के लिये पशु पक्षियों तक से प्रेरणा लेने में नहीं हिचकते ! विद्यार्थियों के लिये काक चेष्टा , श्वान निद्रा , व बको ध्यानी बनने के प्रेरक श्लोक हमारे पुरातन ग्रंथों में हैं !
समय से तादात्म्य स्थापित किया जावे तो हम अब कम्प्यूटर से भी जीवन जीने की कला सीख सकते हैं ! हमारा मन ,शरीर, दिमाग भी तो ईश्वरीय सुपर कम्प्यूटर से जुडा हुआ एक पर्सनल कम्प्यूटर जैसा संस्करण ही तो है ! शरीर को हार्डवेयर व आत्मा को सिस्टम साफ्टवेयर एवं मन को एप्लीकेशन साफ्टवेयर की संज्ञा दी जा सकती है ! उस परम शक्ति के सम्मुख इंसानी लघुता की तुलना की जावे तो हम सुपर कम्प्यूटर के सामने एक बिट से अधिक भला क्या हैं ? अपना जीवन लक्ष्य पा सकें तो शायद एक बाइट बन सकें !आज की व्यस्त जिंदगी ने हमें आत्म केंद्रित बना रखा है पर इसके विपरीत "इंटरनेट" वसुधैव कुटुम्बकम् के शाश्वत भाव की अविरल भारतीय आध्यात्मिक धारा का ही वर्तमान स्वरूप है ! यह पारदर्शिता का श्रेष्ठतम उदाहरण है ! स्व को समाज में समाहित कर पारस्परिक हित हेतु सदैव तत्पर रखने का परिचायक है !
जिस तरह हम कम्प्यूटर का उपयोग प्रारंभ करते समय रिफ्रेश का बटन दबाते हैं , जीवन के दैननंदिनी व्यवहार में भी हमें एक नव स्फूर्ति के साथ ही प्रत्येक कार्य करने की शैली बनाना चाहिये ! कम्प्यूटर हमारी किसी बी कमांड की अनसुनी नहीं करता किंतु हम पत्नी , बच्चों , अपने अधिकारी की कितनी ही बातें टाल जाने की कोशिश में लगे रहते हैं , जिनसे प्रत्यक्ष या परोक्ष , खिन्नता ,कटुता पैदा होती है व हम अशांति को न्योता देते हैं ! क्या हमें कम्प्यूटर से प्रत्येक को समुचित रिस्पांस देना नहीं सीखना चाहिये ?
समय समय पर हम अपने पी.सी. की डिस्क क्लीन करना व्यर्थ की फाइलें व आइकन डिलीट करना नहीं भूलते , उसे डिफ्रिगमेंट भी करते हैं ! यदि हम रोजमर्रा के जीवन में भी यह साधारण सी बात अपना लेंवे और अपने मानस पटल से व्यर्थ की घटनायें हटाते रहें तो हम सदैव सबके प्रति सदाशयी व्यवहार कर पायेंगे , इसका प्रतिबिम्ब हमारे चेहरे के कोमल भावों के रूप में परिलक्षित होगा ,जैसे हमारे पी.सी. का मनोहर वालपेपर !
कम्प्यूटर पर ढ़ेर सारी फाइलें खोल दें तो वे परस्पर उलझ जाती हैं , इसी तरह हमें जीवन में भी रिशतो की घालमेल नहीं करना चाहिये , घर की समस्यायें घर में एवं कार्यालय की उलझने कार्यालय में ही निपटाने की आदत डालकर देखिये , आपकी लोकप्रियता में निश्चित ही वृद्धि होगी !
हाँ एक बात है जिसे हमें जीवन में कभी नहीं अपनाना चाहिये , वह है किसी भी उपलब्धि को पाने का शार्ट कट ! कापी ,कट पेस्ट जैसी सुविधायें कम्प्यूटर की अपनी विशेषतायें हैं ! जीवन में ये शार्ट कट भले ही त्वरित क्षुद्र सफलतायें दिला दें पर स्थाई उपलब्धियां सच्ची मेहनत से ही मिलती हैं !

Sunday 25 November 2007

दीपावली आई और चली गई । शुभकामना संदेशो का आदान प्रदान भी हुआ !

दीपावली आई और चली गई । शुभकामना संदेशो का आदान प्रदान भी हुआ !
कुछ संदेश ऐसे भी मिले जो कुछ सोचने को प्रेरित करते हैं ! प्रस्तुत हैं ऐसी ही शुभकामनायें ! आपकी प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा के साथ०००००
विवेक रंजन श्रीवास्तव
Jabalpur (M.P.) 482008 India

ई मेल vivek1959@yahoo.co.in
blog http://vivekkikavitaye.blogspot.com


काँपती दिये की लौ
देती है संदेश
राजनीति के खेल में
बरबाद नहो जाये देश

सियासत में आया
फिर तुगलक का साया
पूरब में लालू
उत्तर में माया
बदल गई फिर परिभाषा

फिर झूठ हुआ सम्मानित
अन्तिम विजय असत्य की
फिर सत्य हुआ अपमानित

कोई फिर रहा है भूखा और नंगा
कहीं बह रही है सोने की गंगा

किसी को मिलता है लाखों का वेतन
किसी को रुलाता है पेंशन का टेंशन
लक्ष्मी मैया कर रहीं
यह कैसा ड्रांइंग डिसवर्शन

ऐसे नाजुक विव्हल क्षण में
दीपावली की शुभकामना और अभिनंदन

००००००००००००० द्वारा ० सूर्य प्रकाश श्रीवास्तव
मोबा० ९१ ९८९३२५८९९२
जिला विधिक सहायता अधिकारी जबलपुर

ऐसी ही एक और मंगल कामना ०००

आओ चलें अंधकार से प्रकाश की ओर
महलों से कुटियों की ओर
शहरों से गावों की ओर

ताकि हम जान सकें कि
हमारे ही कितने बन्धु
हैं अशिक्षित असहाय और अस्वस्थ

और हम इनके लिये कर सकें
शिक्षा और संस्कार की व्यवस्था
जुटा सकें भोजन व स्वास्थ्य सुविधा
ला सकें पानी और प्रकाश उनके जीवन में

तभी सार्थक होगा
दीपावली मनाना
मानव जीवन पाना


००००००००००००० द्वारा ० प्रहलाद गुप्ता
मोबा० ९१ ९४२५३२३३४७
जबलपुर

गाँव में गली का
बोहराओं में अली का
पर्वों में दीपावली का महत्व है

भीलों में तीर का
मीठे में खीर का
वीरों में महावीर का महत्व है

बोली में वाणी का
प्यासो में पानी का
नगरों में संस्कारधानी का महत्व है

बिजली में तार का
पति पत्नी में प्यार का
जन्म दिन में उपहार का महत्व है

डिण्डोरी में बैगा चेतु का
ग्रहों में राहु केतु का
सेतु में राम सेतु का महत्व है

००००००००००००० द्वारा ० नारायण गुप्ता
मोबा० ९१ ९४२५४१०७८५
जबलपुर

Thursday 8 November 2007

वेब पर हम

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Monday 22 October 2007

राम जाने कि क्यों राम आते नहीं !

राम जाने कि क्यों राम आते नहीं !

प्रो सी॑ बी श्रीवास्तव विदग्ध
c-6 , M.P.S.E.B. Colony Rampur ,
Jabalpur (M.P.) 482008
मोबा ०९४२५४८४४५२
हो रहा आचरण का निरंतर पतन राम जाने कि क्यों राम आते नहीं !
हैं जहाँ भी कहीं हैं दुखी साधुजन लेके उनकोशरण क्यों बचाते नहीं !
है सिसकती अयोध्या दुखी नागरिक कट गये चित्रकूटों के रमणीक वन
स्वर्णमृग चर रहे दण्डकारण्य को पंचवटियों में बढ़ गया है अपहरण
घूमते हैं असुर साधु के वेश में अहिल्याये कई फिर बन गईं हैं शिला
सारी दुनियाँ में फैला अनाचार है रुकता दिखता नहीं ये बुरा सिलसिला
हो रहा गाँव नगरों में सीता हरण राम जाने कि क्यों राम आते नहीं !
सारे आदर्श बस सुनने पढ़ने को हैं आचरण में अधिकतर है मनमानियां
जिसकी लाठी है उसकी ही भैंस है राजनेताओं में दिखती हैं नादानियां
स्वप्न में भी न सोचा जो होता है वो हर समस्या उठाती नये प्रश्न कई
मान मिलता है कम समझदार को भीड नेताओं की इतनी है बढ़ गई
हर जगह डगमगा गया है संतुलन राम जाने कि क्यों राम आते नहीं !
बढ़ती जाती है कलह हर जगह बेवजह नेह सद्भाव पडते दिखाई नहीं
एकता प्रेम विश्वास हैं अधमरे आदमियत आदमी से हुई गुम कहीं
स्वार्थ सिंहासनों पर आसीन है कोई समझता नहीँ किसी की व्यथा
मिट गई रेखा लक्षमण ने खींची थी जो राम जाने कि क्यों राम आते नहीं !

Wednesday 17 October 2007

श्री चित्रगुप्त देवेश


ॐ श्री चित्रगुप्त देवेश जय हो श्री चित्रगुप्त स्वामी.................सुखदाता तुम , दुखत्राता तुम , प्रभु अन्तरयामीब्रम्ह देव के मानस सुत तुम , काया से उभरे जग का लेखा जोखा रखते कलम दवात धरे समदर्शी निष्पक्छ विचारक शांत न्यायकारी विमल दृष्टि ,ग्यानी , गुन सागर जग के हितकारि ॐ श्री चित्रगुप्त देवेश जय हो श्री चित्रगुप्त स्वामी...............चिर अविनाशी , घट घट वासी जन जन के स्वामी हर मन की इच्छा के ग्याता , वरदाता नामी रखते प्रभु तुम छण छण हर जन जीवन का लेखा छुपी न तुमसे कभी किसी की ,गुप्त चित्त रेखा ॐ श्री चित्रगुप्त देवेश जय हो श्री चित्रगुप्त स्वामी...............वीतराग तुम तुम्हें परम प्रिय ,सत्य न्याय शिक्छा सदा शांति प्रिय सात्विक भक्तों की करते रक्छा भक्ति भाव से मिल हम करते पूजन आराधन करो देव स्वीकार , सफल हो तन मन धन साधनॐ श्री चित्रगुप्त देवेश जय हो श्री चित्रगुप्त स्वामी...............कृपा करो प्रभु हर कुल में नित सुख समृद्धि पले हो सदभाव हरेक के मन में , प्रेमल ज्योति जले दूर अँधेरा हो हर घर से , आश किरन छाये दुःखो से तपता जीवन पा आशीष मुस्काये ॐ श्री चित्रगुप्त देवेश जय हो श्री चित्रगुप्त स्वामी................

Tuesday 16 October 2007

राम जाने कि क्यों राम आते नहीं

हो रहा आचरण का निरंतर पतन ,
राम जाने कि क्यों राम आते नहींहै
सिसकती अयोध्या दुखी
देके उनको देके शरण क्यों बचाते नहीं ?
..................अनुगुंजन से

मेघदूतम् का श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद


महाकवि कालीदास कृत मेघदूतम् का श्लोकशः हिन्दी
द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
संस्कृत
सुखमुपगतं दुःखमेकान्ततोवानीचैर्गच्छिति उपरिचदशा चक्रमिक्रमेण
अनुवाद
किसको मिला सुख सदा या भला दुःखदिवस रात इनके चरण चूमते हैंसदा चक्र की परिधि की भाँति क्रमशःजगत में ये दोनों रहे घूमते हैं...................मेघदूतम् हिन्दी पद्यानुवाद से अंश

धर्म तो प्रेम का दूसरा नाम है


धर्म तो प्रेम का दूसरा नाम है ,
प्रेम को कोई बंधन नहीं चाहिये
सच्ची पूजा तो होती है मन से जिसे
आरती धूप चंदन नहीं चाहिये

हंस वाहिनी वीण वादिनी शारदे


शुभवस्त्रे हंस वाहिनी वीण वादिनी शारदे ,
संसार को अवलंब दे आधार दे !
रही घर घर निरंतर आज धन की साधना ,
स्वारथ के चंदन अगरु से अर्चना आराधना
आतम वंचित मन सशंकित विश्व बहुत उदास है
,चेतना जग की जगा मां वीण की झंकार दे !

हम सबकी माँ भारत माता


हिमगिरि शोभित सागर सेवितसुखदा गुणमय गरिमा वालीसस्य श्यामला शांति दायिनीपरम विशाला वैभवशाली ॥प्राकृत पावन पुण्य पुरातनसतत नीती नय नेह प्रकाशिनिसत्य बन्धुता समता करुणास्वतंत्रता शुचिता अभिलाषिणि ॥ग्यानमयी युग बोध दायिनीबहु भाषा भाषिणि सन्मानीहम सबकी माँ भारत मातासुसंस्कार दायिनि कल्यानी ॥

Thursday 11 October 2007

राम सेतु ध्वँस परियोजना सेतुसमुद्रम पर !


राम सेतु ध्वँस परियोजना सेतुसमुद्रम पर !
प्रो सी॑ बी श्रीवास्तव विदग्ध
C-6 , M.P.S.E.B. Colony Rampur ,
Jabalpur (M.P.) 482008
मोबा ०९४२५४८४४५२
भारत सुन्दर देश है मन मोहक परिवेश !
कण कण इसका दे रहा आध्यात्मिक सँदेश !
अनुपम है सँसार मेँ इसका रूप विधान !
देव भूमि विख्यात यह मानव का वरदान !
सभी दिशाओँ का इसे सहज प्राप्त प्रतिसाद !
वायु गगन जल यँहाँ के हरते सकल विषाद !
हिम गिरि देता जल इसे उदधि विमल वातास !
ॠषि मेधाओँ ने रचा है इसका इतिहास !
सँतोषी हैँ नागरिक कर्मठ यहाँ किसान !
सबके मन की भावना जीवन का कल्याण !
रहे मित्र इसके सदा सभी पडोसी देश !
पहुँचाता जिन तक रहा यह धार्मिक उपदेश !
जब जब असुरोँ ने किया यहाँ कहीँ उत्पात !
सदाचार ने हो प्रकट उसका किया निपात !
स्वर्ण द्वीप लँका मेँ था रावण निशिचर राज !
बुद्धिमान हो भी रहा करता रहा अराज !
सेतु बँध कर के वहाँ पहुँचे तब श्री राम !
जो थे मर्यादा पुरुष आदर्शोँ के धाम !
लँका तक निर्माण कर लघु द्वीपोँ पर सेतु !
रामेश्वर से राम गये सीता रक्षा हेतु !
जनमानस की आस्था का यह सेतु महान !
राजनीति पर आज की स्वार्थ लिप्त बेइमान !
ओछी दृष्टि लिये हुये करते हैँ हर काम!
बेशर्मी से कह रहे कहाँ हुये थे राम !
तोड सेतु की भूमि को जल पथ का निर्माण
करने को तैयार हैँ बिन सोचे परिणाम !!
जगह जगह पर हो रहा प्रकृति सँग खिलवाड !
सभी स्वार्थवश कर रहे लेकर कोई आड !
इससे जन हित की जगह दिखता बडा विनाश !
राजनीति से उठ चला लोँगोँ का विश्वास !!
अच्छा हो सदबुद्धि देँ नेताओँ को राम !
जिससे होँ सब कर्म शुभ होँ न कोई बदनाम !!

राम सेतु ध्वँस परियोजना सेतुसमुद्रम पर !


राम सेतु ध्वँस परियोजना सेतुसमुद्रम पर !
प्रो सी॑ बी श्रीवास्तव विदग्ध
C-6 , M.P.S.E.B. Colony Rampur ,
Jabalpur (M.P.) 482008
मोबा ०९४२५४८४४५२
भारत सुन्दर देश है मन मोहक परिवेश !
कण कण इसका दे रहा आध्यात्मिक सँदेश !
अनुपम है सँसार मेँ इसका रूप विधान !
देव भूमि विख्यात यह मानव का वरदान !
सभी दिशाओँ का इसे सहज प्राप्त प्रतिसाद !
वायु गगन जल यँहाँ के हरते सकल विषाद !
हिम गिरि देता जल इसे उदधि विमल वातास !
ॠषि मेधाओँ ने रचा है इसका इतिहास !
सँतोषी हैँ नागरिक कर्मठ यहाँ किसान !
सबके मन की भावना जीवन का कल्याण !
रहे मित्र इसके सदा सभी पडोसी देश !
पहुँचाता जिन तक रहा यह धार्मिक उपदेश !
जब जब असुरोँ ने किया यहाँ कहीँ उत्पात !
सदाचार ने हो प्रकट उसका किया निपात !
स्वर्ण द्वीप लँका मेँ था रावण निशिचर राज !
बुद्धिमान हो भी रहा करता रहा अराज !
सेतु बँध कर के वहाँ पहुँचे तब श्री राम !
जो थे मर्यादा पुरुष आदर्शोँ के धाम !
लँका तक निर्माण कर लघु द्वीपोँ पर सेतु !
रामेश्वर से राम गये सीता रक्षा हेतु !
जनमानस की आस्था का यह सेतु महान !
राजनीति पर आज की स्वार्थ लिप्त बेइमान !
ओछी दृष्टि लिये हुये करते हैँ हर काम!
बेशर्मी से कह रहे कहाँ हुये थे राम !
तोड सेतु की भूमि को जल पथ का निर्माण
करने को तैयार हैँ बिन सोचे परिणाम !!
जगह जगह पर हो रहा प्रकृति सँग खिलवाड !
सभी स्वार्थवश कर रहे लेकर कोई आड !
इससे जन हित की जगह दिखता बडा विनाश !
राजनीति से उठ चला लोँगोँ का विश्वास !!
अच्छा हो सदबुद्धि देँ नेताओँ को राम !
जिससे होँ सब कर्म शुभ होँ न कोई बदनाम !!

Tuesday 9 October 2007

राम से भारत का सम्मान जुडा है


राम से भारत का सम्मान जुडा है !
प्रो सी॑ बी श्रीवास्तव विदग्ध
o b 11 , M.P.S.E.B. Colony Rampur ,
Jabalpur (M.P.) 482008
मोबा ०९४२५४८४४५२
राम की गाथा चरित्र व जीवन से आदर्श महान जुडा है !
राम के नाम से धर्म नहीं जन जीवन का मन प्राण जुडा है !
राम का सौम्य स्वभाव स्नेह सुशीलता निर्मल पावन गंगा !
राम से संस्कृति का यश गान है भारत का सम्मान जुडा है !

राम तो है एक शाश्वत चेतन तत्व कभी भी जो म्लान नहीँ है !
राम की मानस मूर्ति सशस्त है अक्छय है म्रियमाण नहीँ है !
राम का नाम सदा सुखधाम है जन जन हित नित दीप प्रकाशित !
ऐसे श्री राम से जिसको हो विरोध वो हो कुछ भी इंसान नहीँ है !

राम है बुध्दि विवेक सनेह दया तप त्याग की उज्ज्वल मूरत !
एक विनम्र विवेकी उदार सनेही स्वरूप की सात्विक सूरत !
राम को बाँध न पाई कभी कोई धर्म या देश विशेष की सीमा
भारत दक्छिण पूर्वी एशिया विश्व में व्याप्त है राम की कीरत !!

Thursday 15 February 2007

मण्डला के प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ने किया महाकवि कालीदास के ग्रँथों का हिन्दी पद्यानुवाद

मण्डला के प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ने किया महाकवि कालीदास के ग्रँथों का हिन्दी पद्यानुवाद
मण्डला . नि.प्र. , भारतीय संस्कृति में आत्म प्रशंसा को शालीनता के विपरीत आचरण माना गया है , यही कारण है कि जहाँ विदेशी लेखकों के आत्म परिचय सहज सुलभ हैं ,वहीं कवि कुल शिरोमणी महाकवि कालिदास जैसे भारतीय मनीषीयों के ग्रँथ तो सुलभ हैं किन्तु इनकी जीवनी दुर्लभ हैं ! महाकवि कालिदास की विश्व प्रसिद्ध कृतियों मेघदूतम् , रघुवंशम् , कुमारसंभवम् , अभिग्यानशाकुन्तलम् आदि ग्रंथों में संस्कृत न जानने वाले पाठको की भी गहन रुचि है ! ऐसे पाठक अनुवाद पढ़कर ही इन महान ग्रंथों को समझने का प्रयत्न करते हैं ! किन्तु अनुवाद की सीमायें होती हैं ! अनुवाद में काव्य का शिल्प सौन्दर्य नष्ट हो जाता है ! ई बुक्स के इस समय में भी प्रकाशित पुस्तकों को पढ़ने का आनंद अलग ही है ! मण्डला के प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जी ने महाकवि कालीदास कृत मेघदूतम् के समस्त १२१ मूल संस्कृत श्लोकों का एवं रघुवंश के सभी १९ सर्गों के लगभग १७०० मूल संस्कृत श्लोकों का श्लोकशः हिन्दी गेय छंद बद्ध भाव पद्यानुवाद कर हिन्दी के पाठको के लिये अद्वितीय कार्य किया है ! उदाहरण स्वरूप मेघदूतम् हिन्दी पद्यानुवाद से एक श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक
कस्यात्यन्तं सुखमुपगतं दुःखमेकान्ततोवा
नीचैर्गच्छिति उपरिचदशा चक्रमिक्रमेण ॥
हिन्दी अनुवाद
किसको मिला सुख सदा या भला दुःख
दिवस रात इनके चरण चूमते हैं
सदा चक्र की परिधि की भाँति क्रमशः
जगत में ये दोनों रहे घूमते हैं

प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव अपनी विभिन्न कृतियों मुक्तक मंजूषा हिन्दी छंदबद्ध १०८ देश प्रेम के गेय गीत वतन को नमन नैतिक कथायें ईशाराधन अनुगुंजन आदि पुस्तकों हेतु सुपरिचित हैं !
धर्म तो प्रेम का दूसरा नाम है , प्रेम को कोई बंधन नहीं चाहिये
सच्ची पूजा तो होती है मन से जिसे आरती धूप चंदन नहीं चाहिये
................प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव की.मुक्तक मंजूषा से


हिमगिरि शोभित सागर सेवित
सुखदा गुणमय गरिमा वाली
सस्य श्यामला शांति दायिनी
परम विशाला वैभवशाली ॥
प्राकृत पावन पुण्य पुरातन
सतत नीती नय नेह प्रकाशिनि
सत्य बन्धुता समता करुणा
स्वतंत्रता शुचिता अभिलाषिणि ॥
ग्यानमयी युग बोध दायिनी
बहु भाषा भाषिणि सन्मानी
हम सबकी माँ भारत माता
सुसंस्कार दायिनि कल्यानी ॥


................प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव की वतन को नमन से अंश


हो रहा आचरण का निरंतर पतन , राम जाने कि क्यों राम आते नहीं
है सिसकती अयोध्या दुखी नागरिक देके उनको देके शरण क्यों बचाते नहीं ?
..................प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव की अनुगुंजन से

शुभवस्त्रे हंस वाहिनी वीण वादिनी शारदे ,
डूबते संसार को अवलंब दे आधार दे !
हो रही घर घर निरंतर आज धन की साधना ,
स्वार्थ के चंदन अगरु से अर्चना आराधना !
आत्म वंचित मन सशंकित विश्व बहुत उदास है ,
चेतना जग की जगा मां वीण की झंकार दे !
.............................प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव की ईशाराधन से

वागवर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगत: पितरौ वन्दे पार्वतीपरÜवरौ ।।
जग के माता - पिता जो , पार्वती -ंउचय षिव नाम
षब्द - अर्थ सम एक जों , उनको विनत प्रणाम ।। 1 ।।
ô सूर्यप्रभवो वंष: ô चाल्पविषया मति: ।
तितिर्षZुर्दस्तरं मोहाìपेनािस्म सागरम् ।।
कहॉं सूर्य कुल का विभव , कहॉं अल्प मम ज्ञान
छोटी सी नौका लिये सागर - तरण समान ।। 2 ।।
मन्द: कवियष: प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम् ।
प्रांषुलभ्ये फले लोभादुद्वाहुरिव वामन : ।।
मूढ़ कहा जाये न कवि , हो न कहीं उपहास
बौना जैसे भुज उठा धरे दूर फल आस ।। 3 ।।



महाकवि कालीदास कृत रघुवंशम् का श्लोकशः हिन्दी पद्यानुवाद द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
समस्त १९ सर्ग लगभग ४०० पृष्ठ लगभग १७०० श्लोक हेतु उन्हें प्रकाशक चाहिये ! रघुवंशम् से अंश इस तरह है
शासन हर वर्ष कालिदास समारोह के नाम पर करोंडों रूपये व्यय कर रहा है ! जन हित में इन अप्रतिम कृतियों को आम आदमी के लिये संस्कृत में रुचि पैदा करने हेतु सी डी में तैयार इन पुस्तकों को इलेक्र्टानिक माध्यमों से दिखाया जाना चाहिये ! जिससे यह विश्व स्तरीय कार्य समुचित सराहना पा सकेगा !

उनका पता है
प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव
विवेक सदन , नर्मदा गंज , मण्डला म.प्र. भारत पिन ४८१६६१
फो 0761 2662052 , मोबाइल 09425484452

खूब लडी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

सुभद्रा कुमारी चौहान की कथा दृष्टी
विवेक रंजन श्रीवास्तव
विवेक सदन , नर्मदा गंज , मण्डला
म.प्र. भारत पिन ४८१६६१
फोन ०७६४२ २५००६८ ,
मोबाइल ९१ ९४२५१६३९५२
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संदर्भ
# ०६.०८.१९७६ को २५ पैसे का डाक टिकिट जारी करते समय भारत सरकार द्वारा प्रसारित प्रथम दिवस आवरण पत्र के साथ संकलित सामग्री
# कर्मवीर प्रेस जबलपुर से प्रकाशित सुभद्रा कुमारी चौहान के कहानी संग्रह बिखरे मोती द्वितीय आवृति मूल्य रू १.५०
# झांसी की रानी , स्वराज संस्थान भोपाल मूल्य रू २५.०० वर्ष २००४
# पुस्तक क्रांतिकारी साहित्यकार सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा सुमित मोहन , प्रकाशक कृष्नकांत ब्रदर्स मथुरा वर्ष २००५, मूल्य रू १५०.००

किसी भी मनुष्य का व्यक्तित्व एवं उसका बौद्धिक विकास , उसके परिवेश , देश , काल ,परिस्थिति के अनुरूप होता है ! सुभद्रा कुमारी चौहान एक साथ ही प्रगतिशील नारी , गृहणी , मां , कवि , लेखिका , स्वतंत्रता संग्राम सेनानी , जननेत्री व राजनेता थीं ! वे जमीन से जुडी हुई थीं , अतः उनके अनुभवों का संसार अति विशाल था ! यही कारण है कि उनके साहित्य में कहीं भी नाटकीयता व बनावटीपन नहीं है वरन् वह हृदय स्पर्शी अभिव्यक्ति बन पडा है ! उनका जन्म १९०४ में इलाहाबाद के निकट निहालपुर नामक गांव में रामनाथसिंह के जमींदार परिवार में हुआ था ! इतिहास विद जानते हैं कि बीसवीं सदी के प्रारंभ में भारतीय समाज में जातिगत , वर्गगत , धर्मगत , लिंगगत रूढ़ीयां अपने चरम पर थीं ! बाल विवाह की परम्परा थी ! इन कुरीतियों के विरुद्ध ही सुभद्रा कुमारी चौहान की कथा दृष्टी भी केंद्रित थी ! बहुमुखी व्यक्तित्व के चलते व दुर्भाग्यवश असमय मृत्यु के कारण उन्होंने बहुत अधिक नहीं लिखा है , पर जो कुछ भी लिखा है वह सब का सब मर्मस्पर्शी , उद्देश्यपूर्ण व शाश्वत बन कर हिन्दी साहित्य की धरोहर के रूप में सुप्रतिष्ठित है!
सुभद्रा कुमारी चौहान की खूब लडी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी , हिन्दी के सर्वाधिक पढ़े व गाये गये गीतों में से एक है ! यह गीत स्वयं में गीत से अधिक वीर गाथा की एक सच्ची कहानी ही है ! जिसमें कवियत्री ने रानी लक्छमीबाई के जीवन के सारे घटना क्रम को एक पद्यात्मक कहानी के रूप में इस सजीवता से प्रस्तुत किया है कि पाठक या श्रोता वीर रस से भाव विभोर हो उठता है ! यह रचना उनकी पहचान बन गई है !
बिखरे मोती उनका पहला कहानी संग्रह है , इसमें भग्नावशेष, होली , पापीपेट , मंझलीरानी , परिवर्तन , द्रष्टिकोण , कदम के फूल , किस्मत , मछुये की बेटी , एकादशी , आहुती , थाती , अमराई , अनुरोध , व ग्रामीणा कुल १५ एक दूसरे से बढ़कर कहानियां हैं ! इन कहानियों की भाषा सरल बोलचाल की भाषा है ! अधिकांश कहानियां नारी विमर्श पर केंद्रित हैं!
सुभद्रा कुमारी चौहान के समूचे साहित्य की सफलता जिस आधारभूत तथ्य पर केंद्रित है , वह मेरे पास उपलब्ध बिखरे मोती कहानी संग्रह की प्रति पर एक मित्र के द्वारा दूसरे को पुस्तक भेंट करते हुये की गई टिप्पणी है! जो इन कहानियों की लोकप्रियता , उपयोगिता व आम पाठक का साहित्य अनुराग प्रदर्शित करती है ! आज कितने पाठक स्वयं पुस्तकें खरीद कर पढ़ते हैं ? भेंट करना तो बाद की बात है ! ऍसी रुचिकर हृदय स्पर्शी कितनी कहानियां लिखी जा रहीं है कि वे पाठकों के बीच चर्चा का विषय बन जावें ?उनकी कहानियां कृत्रिम , सप्रयास लिखी नहीं लगती ! वे तो आसपास से ही उठाई गई विषय वस्तु की तरतीब से प्रस्तुती ही हैं !
उन्मादिनी शीर्षक से उनका दूसरा कथा संग्रह १९३४ में छपा ! इस में उन्मादिनी , असमंजस , अभियुक्त , सोने की कंठी , नारी हृदय , पवित्र ईर्ष्या , अंगूठी की खोज , चढ़ा दिमाग , व वेश्या की लडकी कुल ९ कहानियां हैं ! इन सब कहानियो का मुख्य स्वर पारिवारिक सामाजिक परिदृश्य ही है!
सीधे साधे चित्र सुभद्रा कुमारी चौहान का तीसरा व अंतिम कथा संग्रह है ! इसमें कुल १४ कहानियां हैं ! रूपा , कैलाशी नानी , बिआल्हा , कल्याणी , दो साथी , प्रोफेसर मित्रा , दुराचारी व मंगला ८ कहानियों की कथावस्तु नारी प्रधान पारिवारिक सामाजिक समस्यायें हैं ! हींगवाला , राही , तांगे वाला , एवं गुलाबसिंह कहानियां राष्टीय विषयों पर आधारित हैँ
सुभद्रा कुमारी चौहान ने कुल ४६ कहानियां लिखी , और अपनी व्यापक कथा दृष्टी से वे एक अति लोकप्रिय कथाकार के रूप में हिन्दी साहित्य जगत में सुप्रतिष्ठत हैं !
विवेक रंजन श्रीवास्तव