लघुकथा
"पासवर्ड"
विवेक रंजन श्रीवास्तव
स्क्रीन पर तीसरी बार फिर वह संदेश फिर उभर आया “गलत पासवर्ड.”
शरद बाबू ने चश्मा ठीक किया, उँगलियाँ धीमे धीमे कुंजियों पर चलीं, पर मन डगमगा गया।
पासवर्ड कभी लिख कर नहीं रखना चाहिए, जानते हुए भी इसी समस्या से बचने के लिए वे अपनी डायरी में पासवर्ड लिख लिया करते हैं। सावधानी के लिए बस किस अकाउंट का पासवर्ड है यह याददाश्त पर छोड़ रखा है, लेकिन फिर भी गड़बड़ हो ही जाती है।
नोटबुक के वे पन्ने पलटे हर जगह दर्ज अंक, प्रतीक और अंग्रेजी के छोटे बड़े अक्षर । मेल , बैंकों के अकाउंट , वाई फाई , नेटलिक्स , पेंशन ऐप वगैरह वगैरह के ढेर सारे विस्मृत, गड्डम गड्ड होते पासवर्ड अब प्रायः उन्हें चिढ़ाते लगे हैं।
वे कमरे की छत देखते सोच रहे थे, अपने पुराने दिन जब उनकी याददाश्त का ऑफिस में सब लोहा मानते थे, उन्हें दस अंकों के मोबाइल नंबर तक जबानी याद रहते थे, जिन्हें वे जेब में मोबाइल होते हुए भी ऑफिस के लैंडलाइन से डायल कर लिया करते थे, शायद पैसे बचाने ।
उन्हें खीजता देख ,बेटा हँसकर बोला, “पापा, इतनी दिक्कत है तो पासवर्ड मैनेजर एप रख लीजिए।”
शरद बाबू मुस्करा कर रह गए ।
रिटायरमेंट को पांच महीने भर तो हुए हैं।
पहले समय पीछे भागता था, अब वे उसके पीछे दौड़ रहे हैं।
पत्नी ने रसोई से पुकारा“ओटीपी आया क्या?”
स्क्रीन पर छह अंकों का नंबर चमका… फिर एस एम एस ही गुम हो गया, सेशन टाइम आउट हो चुका था।
शरद बाबू ने लंबी साँस ली, लैपटॉप बंद किया।
खिड़की से छनती धूप में धूल के कण चमक रहे थे, जैसे यादें कमरे में घुसी आ रही हों , रोशनी की एक बीम की तरह।
उनके होंठों पर स्मित मुस्कान थी,
“नया पासवर्ड बनाना है..
bHULNANAHI@1
विवेक रंजन श्रीवास्तव
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