Wednesday, 11 February 2026

कहानी मन का भूगोल

 कहानी 

मन का भूगोल 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


नीलगीरि की धुंधली पहाड़ियों के बीच बसे 'सोनपुर' गाँव में जब मिस्टर ग्रजबेक अपनी नौ साल की बेटी रोजी के साथ आए, तो ग्रामीणों के लिए वे किसी दूसरी दुनिया के प्राणी थे। ग्रजबेक साहब यहाँ शांति और प्रेम का संदेश फैलाने आए थे, लेकिन गाँव वालों के लिए उनकी भाषा, ऊँचा कद , आंखों का नीला रंग , और वेशभूषा एक ऐसी दीवार थी , जिसे पार करना आसान न था। ग्रामीण उन्हें सम्मान से देखते, पर एक दूरी बनाए रखते थे।

लेकिन इस दीवार को तोड़ा रोजी ने ।

 रोजी, जो किसी उन्मुक्त उड़ती परी सी चंचल थी। जहाँ गाँव की मुनिया, लाली और चंपा अपने नन्हे हाथों से छोटी-छोटी साड़ियाँ सँभालती हुई पगडंडियों पर चलती थीं, वहीं रोजी अपने फूले हुए रंग-बिरंगे फ्रॉक और सुनहरी जुल्फों के साथ किसी सपने जैसी लगती थी। शुरू में गाँव की बच्चियाँ उसे दूर से ही कौतुक भरी नज़रों से देखतीं। वे फ्रॉक के घेरे को देखतीं और रोजी उनकी साड़ी के करीने को, पर शब्दों की कमी और संकोच के कारण दोनों पक्ष मौन रहते, केवल आँखें और मुस्कान ही बातें करती थीं।

एक सुनहरी दोपहर, जब सूरज की किरणें ऊँचे देवदार के पेड़ों से छनकर मैदान में आ रही थीं, सन्नाटे को रोजी की फुटबॉल की 'टप-टप' ने तोड़ दिया। रोजी अकेले ही मैदान में गेंद के साथ जूझ रही थी। झाड़ियों के पीछे छिपी मुनिया और उसकी सहेलियों की आँखों में गेंद को छूने की तीव्र ललक थी। रोजी ने यह भाँप लिया। उसने एक शरारती मुस्कान के साथ गेंद को ज़ोर से मुनिया की तरफ लुढ़का दिया।

पलों में ही सारा संकोच धुआं हो गया। मुनिया ने अपनी सूती साड़ी का पल्ला कमर में मजबूती से खोंसा और नंगे पैर ही गेंद पर एक ज़ोरदार किक मारी। खेल शुरू हो चुका था। अब वहाँ न कोई विदेशी था, न कोई देहाती। धूल में सनी मुनिया की साड़ी और पसीने से भीगा रोजी का कीमती फ्रॉक, दोनों एक ही मिट्टी के रंग में रंग चुके थे। गिरना, संभलना, एक-दूसरे को हाथ पकड़कर उठाना और गोल होने पर साथ में ठहाके लगाना । इस शोर में वह भाषा सुनाई दे रही थी जो सदियों पुरानी है और जिसे सीखने के लिए किसी किताब की ज़रूरत नहीं होती।

मिस्टर ग्रजबेक दूर खड़े यह दृश्य देख रहे थे। उनकी आँखों में नमी और होंठों पर एक गहरी संतुष्टि थी। उन्हें अहसास हुआ कि जो संदेश वे उपदेशों से देना चाहते थे, उनकी बेटी ने उसे एक खेल में साकार कर दिया था। शाम ढलते-ढलते पहाड़ियों पर गोधूलि की लालिमा छा गई। रोजी और गाँव की बच्चियाँ एक पत्थर पर साथ बैठी थीं। रोजी ने मुनिया के बालों में एक जंगली फूल टाँक दिया और मुनिया ने अपनी पोटली से भुना हुआ मक्का निकाल कर बड़े प्यार से रोजी के मुँह में डाल दिया।

रोजी के लिए वह पॉपकॉर्न था ।

पहाड़ की ठंडी हवा में एक शाश्वत सत्य तैर रहा था कि इन्सान की आत्मा का कोई अलग भूगोल नहीं होता। लिबास और भाषा की परतें उतरते ही नीचे जो हृदय मिलता है, वह सबके साथ मिलकर धड़कना चाहता है। 


हम ऊपर से चाहे कितने ही भिन्न क्यों न दिखें, प्रेम और अपनत्व की भूख हमें एक ही सूत्र में पिरोए रखती है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव

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