Saturday, 10 January 2026

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: संस्कृति से संविधान तक, (मानस का धोबी के कहने से मां सीता के त्याग का प्रसंग)

 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: संस्कृति से संविधान तक, (मानस का धोबी के कहने से मां सीता के त्याग का प्रसंग)


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से 


रामायण के उत्तरकांड में धोबी द्वारा सीता माता की पवित्रता पर उठाया गया प्रश्न भारतीय संस्कृति में आम आदमी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्राचीन जड़ों को रेखांकित करता है। यह प्रसंग राम राज्य को प्रजातांत्रिक आदर्श के रूप में स्थापित करता है, जहाँ एक साधारण धोबी भी सर्वोच्च सत्ता के समक्ष अपनी असहमति व्यक्त कर सकता है। 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) इसी परंपरा का आधुनिक प्रतिबिंब है, जो नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है।

 रामचरितमानस में यह प्रसंग प्रजामत को राजा के ऊपर बताता है। राम राज्य का यही स्वरूप इसे आदर्श बनाता है, जहाँ प्रजा की स्वतंत्र अभिव्यक्ति राज्यनीति का आधार बन जाती है।

हमारी संस्कृति रामायण, महाभारत और पुराणों से समृद्ध है, जहाँ वेदों-उपनिषदों में सत्यवचन और असहमति को धर्म का अभिन्न अंग माना गया। धोबी का सामान्य कथन महारानी सीता जी को वनवास का कारण बनने वाला प्रसंग दर्शाता है कि रामराज्य में अभिव्यक्ति वर्ग, जाति या पद से बंधी नही थी, बल्कि लोककल्याण का साधन थी। राम का "प्रजाहित सर्वोपरि" सिद्धांत प्रजा की वाणी को सम्मान देता है, जो हमारी संस्कृति में लोकतंत्र की प्राचीनता प्रमाणित करता है। 


भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) प्रत्येक नागरिक को बोलने, लिखने, कला सिनेमा सोशल मीडिया आदि से विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता देता है। धोबी की भाँति आज कोई भी साधारण नागरिक सत्ता की आलोचना कर सकता है। विपक्ष का कार्य तो सत्ता की नीतियों की समालोचना ही है।

संविधान सभा की बहसों में रामराज्य का उल्लेख हुआ, जहाँ इसे स्वतंत्रता समता प्रजासेवा का प्रतीक माना गया। राम का प्रजा मत को प्राथमिकता देना संविधान की प्रस्तावना में निहित "विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" से मेल खाता है।  

रामराज्य में अभिव्यक्ति का सांस्कृतिक विधान हमारे संविधान में अधिकार के रूप में सभी नागरिकों के लिए है । जिसकी रक्षा न्यायालय साक्ष्य परीक्षण कर करता है। रामराज्य व्यक्तिपरक था, जहाँ राम की मर्यादा प्रजा वाणी को प्राथमिकता देती थी, जबकि भारतीय संविधान संस्थागत है, जो न्यायपालिका द्वारा संरक्षित होता है। दोनों का उद्देश्य , लोककल्याण है। 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से सामाजिक सुधार एक प्रक्रिया बना रहता है। राजा राम , प्रजा मत के प्रति संवेदनशील थे, ठीक वैसे ही जैसे अपना संविधान असहमति को लोकतंत्र का स्रोत मानता है।


समकालीन प्रासंगिकता और चुनौतियाँ


आज सोशल मीडिया पर नागरिक राम राज्य के धोबी की भाँति सरकार की आलोचना कर सकते हैं, और संविधान इस मौलिक अधिकार को संरक्षित करता है। राम प्रसंग सिखाता है कि शासक को प्रजा मत सुनना और उसका सम्मान करना चाहिए। फेक न्यूज़ या घृणा भाषण जैसी चुनौतियों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध राम की मर्यादा से प्रेरित हो सकते हैं। यह सांस्कृतिक विरासत संविधान को मजबूत बनाती है, जहाँ अभिव्यक्ति लोकतंत्र की रीढ़ है। इस तरह राम राज्य का धोबी प्रसंग हमारी संस्कृति की गहन परंपरा को संविधान से जोड़ता है। यह स्मरण कराता है कि सच्चा शासन प्रजा की स्वतंत्र वाणी से पुष्ट होता है, जो राम से लेकर आधुनिक भारत तक अटल बना हुआ है। भारत के पराधीनता काल में मुगल साम्राज्य में और फिर अंग्रेजी शासन में नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निरंतर नियंत्रण रहा पर आजाद भारत में संविधान ने इसे पुनः स्थापित किया है, अब इसे बनाए रखना नागरिकों की कर्तव्य निष्ठा है, क्योंकि स्वतंत्रता के स्वच्छंदता में बदलते ही सरकारों को सामाजिक हित में इन अधिकारों पर कर्फ्यू, इंटरनेट बाधित करना , आपातकाल लगाना , जैसे अप्रिय कदम जन हित में उठाने के लिए बाध्य होना पड़ता है, जिसका प्रावधान भी संविधान में है। अतः अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता नागरिकों के विवेक पर ही बनी रह सकती है, यह तथ्य हर बदलती पीढ़ी

को समझना आवश्यक है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

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