कहानी
गर्व गाथा
लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव
मिलिट्री अकादमी का वह विशाल परेड ग्राउंड... जनवरी की गुनगुनी धूप स्टेडियम के सीने पर कुछ इस तरह उतर रही थी, मानो आकाश स्वयं अपनी स्वर्ण-रश्मियों से देश के प्रहरियों का राजतिलक कर रहा हो। हवा में बूटों की खनक और कड़क कलफ लगी वर्दियों की सरसराहट के बीच एक अनकही बेचैनी और भारी प्रतीक्षा थी। सबकी निगाहें उस मंच पर टिकी थीं, जहाँ से आज शौर्य का एक नया अध्याय घोषित होना था।
सारी परेड के साथ ही मेजर अंजलि अपनी 'सेरेमोनियल ड्रेस' में अविचल खड़ी थीं। उनकी रीढ़ में सेना का अनुशासन था, पर सीने के भीतर एक बहन का हृदय हज़ारों अश्वों की गति से धड़क रहा था। उनका भाई राघव जिसे बचपन में उन्होंने जाने कितनी बार गोद में संभाला था, शौर्य पदक का सबसे बड़ा दावेदार था । उसने आपरेशन सिंदूर में दुश्मन के घर में घुसकर न केवल अपने मिशन को सफल अंजाम दिया था , वहां से अपने घायल साथियों को बचाकर लौटने का कमाल जो किया था ।
अचानक लाउडस्पीकर पर गूँजी उस गंभीर आवाज़ ने फिजा में प्राण फूँक दिए, "लेफ्टिनेंट राघव ... 'ऑपरेशन सिंदूर' में अदम्य साहस के लिए... शत्रु की भीषण गोलाबारी के बीच अपने मिशन डिस्ट्रॉय मिलिटेंट को पूरा कर , चार घायल साथियों को सुरक्षित वापस निकाल लाने हेतु उन्हें 'शौर्य चक्र' से सम्मानित किया जाता है।
सारा परेड ग्राउंड हर्ष में डूब गया।
घोषणा समाप्त होते ही वह दृश्य उपस्थित हुआ जिसने अकादमी के इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया। अंजलि ने सैन्य गरिमा और बहन के लाड़ को एकाकार करते हुए, बिना एक पल गँवाए राघव को अपनी मज़बूत भुजाओं में भरा और उन्हें अपने कंधों पर उठा लिया। तालियों की गड़गड़ाहट ने आसमान को छू लिया। सैनिकों की एड़ियाँ एक साथ चटककर जैसे इस अभिनव सम्मान को सलामी दे रही थीं।
माइक से घोषणा हुई, लेफ्टिनेंट राघव को उनके अनुभव साझा करने हेतु मंच पर आमंत्रित किया गया।
राघव जब मंच पर पहुँचे, तो उनकी आँखों में नमी थी पर मस्तक गर्व से उन्नत था।
राघव ने माइक संभाला। पूरा मैदान पिन-ड्रॉप साइलेंस में डूब गया। उनकी आवाज़ में एक ठहरी हुई गंभीरता थी,
"उस रात 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान जब दुश्मन की मशीनगनें आग उगल रही थीं और बारूद की गंध ने साँस लेना दूभर कर रखा था, तब दो घंटे तक मौत हमसे बस चंद फुट की दूरी पर खड़ी मुस्कुरा रही थी। एक पल को लगा कि शायद आज जिंदगी का वह आखिरी पन्ना लिखा जाएगा जिसे दादाजी 'सिपाही की अधूरी दास्तान' कहते थे। पर तभी मुझे अपने उन चार घायल साथियों की सिसकियाँ सुनाई दीं, जो अपनी आखिरी साँसों में भी मुझ पर भरोसा टिकाए हुए थे।"
राघव ने एक क्षण का विराम लिया और सामने खड़ी अपनी माँ और पिता की ओर देखा।
" हमारी टुकड़ी अपने मिशन को सफलता पूर्वक अंजाम दे चुकी थी , मैंने सोचा, अगर मैं आज शहीद हो गया, तो मेरी वीरता केवल यादों में सिमट जाएगी। पर अगर मैं लड़कर लौट आया, तो मैं अपने देश की आँखों में वह चमक देख पाऊँगा जो जीत से आती है। मैंने मौत से नहीं, जीवन से आँखें मिलाईं। मैंने तय किया कि मैं मरूँगा नहीं, बल्कि अपने जवानों को ज़िंदा लेकर घर लौटूंगा। क्योंकि असली विजय तिरंगे में लिपट कर लौटने में नहीं, बल्कि तिरंगे को आसमान की ऊँचाइयों तक फहराते रहने में है।"
दूर खड़ी माँ रेखा अपने आँचल से गर्व के आँसू पोंछ रही थीं। पास ही खड़े कर्नल सूर्यप्रताप
की वर्दी पर लगे पदक आज सूर्य की रोशनी में अधिक दीप्तिमान हो रहे थे। उनका गला रुँध गया था। यह उस पिता का संतोष था जिसका बेटा 'लड़कर' और 'जीतकर' लौटा था।
तीन वर्ष बाद...
वही परेड ग्राउंड, वही सुनहरी धूप। पर इस बार परिदृश्य बदला हुआ था। राघव अब कैप्टन थे। आज वे स्वयं किसी के कंधे पर सवार नहीं थे, बल्कि उन्होंने एक युवा लेफ्टिनेंट, विक्रम को अपने कंधों पर उठा रखा था। विक्रम ने एक जलती हुई बस्ती से तीन मासूम नागरिकों को जान पर खेलकर आग से बचाकर सुरक्षित निकाला था।
पास में खड़े विक्रम के पिता, जो एक साधारण किसान थे, अपनी फटी बिवाइयों वाले हाथों से आँखों की नमी पोंछ रहे थे। राघव ने विक्रम को नीचे उतारा और उन के हाथों को चूमते हुए कहा, "बाबूजी, मुस्कुराएं, आपका बेटा आज एक विजेता बनकर घर लौटेगा। यही इस वर्दी की सबसे बड़ी जीत है।"
लेफ्टिनेंट कर्नल बन चुकी अंजलि गर्व से शौर्य के अभिषेक की इस परंपरा को आगे बढ़ते देख रही थीं। उन्होंने मन ही मन दोहराया"वीरता का वास्तविक उत्सव शहादत के शोक में नहीं, बल्कि शौर्य के जीवंत उल्लास में है।"
परेड ग्राउंड पर बना वह चित्र मात्र एक परिवार की कहानी नहीं थी। वह हर उस भारतीय घर की नई प्रतिज्ञा थी जहाँ वर्दी को केवल कफ़न नहीं, बल्कि शान का लिबास माना जाता है। वह एक ऐसी चेतना बन चुकी थी, जहाँ हम शहीदों को नमन तो करते हैं, पर अपने जीवित वीरों को कंधों पर उठाकर यह उद्घोष करते हैं कि, सैनिक की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका वह जीवन है, जो उसने अपने देश के गौरव को अपनी आँखों से देखने के लिए बचा कर रखा है।
— विवेक रंजन श्रीवास्तव