Saturday, 25 April 2026

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भारतीय अभियांत्रिकी परंपरा से वर्तमान

 अभियंता बंधु 2025


सम्पादकीय


भारतीय अभियांत्रिकी  परंपरा से वर्तमान 



“योगः कर्मसु कौशलम्”

अर्थात कर्म में कौशल ही योग है



कभी कभी इतिहास स्वयं को रचने के लिए मनुष्य का सहारा नहीं लेता, बल्कि मनुष्य को अपने साधन के रूप में प्रयोग करता है। भारत की सभ्यता ने यही किया है। जब मानव ने मिट्टी को आकार देना सीखा, तो भारत ने उससे मंदिर गढ़े। जब जल को नियंत्रित करने की आवश्यकता हुई, तो भारत ने नदियों के तट पर सिंचाई की व्यवस्था बनाई। जब पत्थरों से दीवारें बनीं, तो भारत ने उन दीवारों में नक्काशी से कविता लिख दी। यह वह भूमि है जहाँ अभियंत्रण केवल तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन था। यहाँ अभियंता केवल निर्माता नहीं, भगवान विश्वकर्मा के स्वरूप में सृष्टा माने गए।


मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की विकसित सभ्यता आज भी हमें यह सिखाती हैं कि स्वच्छता और जल-प्रबंधन केवल शहरी सुविधा नहीं, बल्कि सभ्यता की रीढ़ हैं। सिंधु घाटी का नगर नियोजन, समकोणीय गलियाँ, कुएँ, स्नानागार , ये सब हमारे पूर्वज अभियंताओं की प्रतिभा का जीवंत प्रमाण हैं। प्राचीन ग्रंथों में भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख उसी गौरव के साथ हुआ है जिस गौरव से कवि वाल्मीकि और ऋषि व्यास का। हर वर्ष हमारी संस्कृति में हम इंजीनियरिंग संस्थानों में विश्वकर्मा पूजन के आयोजन करते आए हैं।भारतीय अभियंत्रण सदैव कला, विज्ञान और आध्यात्म के संगम पर खड़ा रहा है। हमारे मंदिरों की स्थापत्य कला, लोहे के खंभे जो सदियों से जंगरहित खड़े हैं, या फिर अजन्ता की गुफाओं में शिल्प-सौंदर्य ,  सब यह बताते हैं कि हमारे अभियंता केवल साधन बनाने वाले नहीं, जन आत्मा में बसने वाले कलाकार थे।


समय बदला, औपनिवेशिक युग आया। इंजीनियरिंग का अर्थ केवल गणितीय संरचना तक सीमित कर दिया गया। भारत में अभियंत्रण को अंग्रेज़ी पाठशालाओं के माध्यम से नए रूप में ढाला गया। किंतु भारतीय मस्तिष्क अपनी जड़ों से कट नहीं सका। स्वतंत्रता संग्राम के साथ ही एक नए अभियंत्रण युग का आरंभ हुआ , जो आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। रेलवे, सिंचाई परियोजनाएँ, बांध, इस्पात संयंत्र, औद्योगिक नगर , ये सब नवभारत की नींव थे। पंचवर्षीय योजनाओं में अभियंताओं का स्थान उतना ही महत्वपूर्ण था जितना किसी कवि का संस्कृति के निर्माण में होता है। नेहरूजी ने कहा था ,  बड़े बांध आधुनिक भारत के मंदिर हैं। यह कथन भारतीय अभियंताओं के लिए एक आदरांजलि था।

आज भारतीय अभियंता दुनियां के प्रायः प्रत्येक देश में कही न कही महत्वपूर्ण भूमिकाओं में सक्रिय हैं। 


 1920 में ‘इंस्टिट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया)’ की स्थापना हुई। कोलकाता मुख्यालय से  यह वैधानिक संस्था भारतीय अभियंताओं के लिए एक ऐसा साझा मंच बनी, जहाँ तकनीक और चिंतन दोनों का आदान-प्रदान हुआ। उस समय भारत गुलाम था, फिर भी तकनीकी विचार स्वतंत्र थे। इस संस्था ने इंजीनियरिंग के विविध क्षेत्रों सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, केमिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, माइनिंग, एयरोनॉटिकल, और अनेक शाखाओं को एक सूत्र में पिरोया। यह वह संस्था है जिसने तकनीक को केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाया।


भारत में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में तकनीकी लेखन का बड़ा संकट रहा है। ज्ञान यदि भाषा की दीवारों में कैद हो जाए, तो वह सीमित हो जाता है। इसी कमी को पहचानते हुए ‘इंस्टिट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया)’ ने एक सराहनीय पहल की है । तकनीकी लेखन को भारतीय भाषाओं में प्रतिष्ठित करने की यह पहल महत्वपूर्ण है। यही प्रयास ‘अभियंता बंधु’ जैसी वार्षिकी के रूप में साकार हुआ। अभियंता बंधु केवल एक पत्रिका नहीं, तकनीक की अभिव्यक्ति का एक भाषाई आंदोलन है । भारतीय भाषाओं में तकनीकी विचार और अनुभव साझा करने का सकारात्मक आंदोलन।


पूर्व में संस्था द्वारा हिंदी जर्नल अलग से प्रकाशित किया जाता था। अब उसे ‘अभियंता बंधु’ के एकीकृत रूप में विकसित किया गया है, जो अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी और देश की अनेक भाषाओं में अभियंत्रण ज्ञान के प्रसार का माध्यम बन चुका है। यह रूपांतरण केवल स्वरूप परिवर्तन नहीं, बल्कि दृष्टिकोण परिवर्तन है। यह उस भारत का प्रतीक है जो बहुभाषिक होते हुए भी एक विचार में बंधा हुआ है  ‘ज्ञान सभी के लिए’।


हर वर्ष यह दायित्व देश के विभिन्न  केंद्रों को सौंपा जाता है। इस वर्ष यह जिम्मेदारी मध्यप्रदेश राज्य केंद्र को मिली है। यह सौभाग्य भी है और जिम्मेदारी भी। भोपाल केंद्र ने इस दायित्व को अभिनव दृष्टि से निभाया है। केवल लेख संग्रह नहीं किया गया, बल्कि भाषा, क्षेत्र और विचार की विविधता को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया गया है। संपादक मंडल में देश के विभिन्न अंचलों, भिन्न भिन्न भाषा भाषी , भिन्न संकाय के अभियंताओं को सम्मिलित कर एक भारत श्रेष्ठ भारत की भावना को साकार करता संपादक मंडल बनाया गया है।


महामहिम राज्यपाल जी, संस्थान के राष्ट्रीय पदाधिकारीगण, वरिष्ठ अभियंता, शिक्षाविद और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के शुभकामना संदेश इस अंक की गरिमा बढ़ाते हैं। सिविल, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल, कंप्यूटर, एनवायरनमेंटल, और मटेरियल साइंस जैसे विषयों पर अद्यतन शोधपरक लेख इसमें समाहित हैं। प्रत्येक लेख न केवल तकनीकी दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि भारतीय अभियंता की सामाजिक जिम्मेदारी को भी प्रतिध्वनित करता है।


आज का अभियंता केवल मशीनों का निर्माता नहीं, समाज का मार्गदर्शक है। डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी, ग्रीन एनर्जी, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नए क्षेत्रों में अभियंत्रण का स्वरूप बदला है, पर उसका लक्ष्य वही है — मानव जीवन को सहज, सुरक्षित और श्रेष्ठ बनाना। तकनीक अब केवल सुविधा नहीं, उत्तरदायित्व बन चुकी है। जिस युग में पर्यावरणीय संतुलन, सतत विकास और कार्बन न्यूट्रैलिटी जैसे शब्द सामान्य चर्चा का विषय बन गए हैं, उस युग में अभियंताओं का योगदान निर्णायक है।


भारत आज चंद्रयान, अदित्य, जीआईएस, और स्वदेशी ड्रोन तकनीक के साथ अंतरिक्ष से लेकर पृथ्वी की गहराइयों तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। यह केवल तकनीकी वैज्ञानिक उपलब्धियाँ नहीं हैं, यह अभियंत्रण की आत्मा का उत्कर्ष है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे अभियानों में अभियंता अग्रिम पंक्ति के योद्धा हैं।


आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी में अभियंता केवल उपकरणों तक सीमित न रहें, बल्कि समाज की नब्ज को पहचानें। जल, ऊर्जा और कचरे का प्रबंधन केवल योजनाओं का विषय नहीं, जीवन की आवश्यकता है। अभियंत्रण यदि संवेदना से जुड़ जाए तो वह चमत्कार कर सकता है। भोपाल केंद्र इस अंक के माध्यम से यही संदेश देना चाहता है , कि तकनीक का उद्देश्य केवल प्रगति नहीं, बल्कि समन्वित विकास और मानवता है।


अभियंता बंधु का यह अंक विविधता में एकता का प्रतिबिंब है। हिंदी, मराठी, बंगाली, तेलुगु, तमिल, गुजराती, उर्दू, ओडिया, पंजाबी हर भाषा में रचित विचार एक ही स्वर में गूंजते हैं  ‘भारत का अभियंता जागृत है’। यह वह भाव है जो तकनीकी सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र-निर्माण की प्रेरणा देता है।


संस्थान का यह प्रयास इस तथ्य का प्रमाण है कि ज्ञान जब अपनी मातृभाषा में व्यक्त होता है, तो वह जन-जन तक पहुँचता है। इंजीनियरिंग प्रयोगशालाओं से निकलकर जब सामान्य जीवन से जुड़ती है, तभी वह सार्थक होती है। यही भारतीय अभियंत्रण की आत्मा है।


आज जब विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन के युग में प्रवेश कर रहा है, तब भारतीय अभियंता को यह याद रखना चाहिए कि बुद्धिमत्ता का मूल मानवता में है। मशीनें केवल साधन हैं, पर उद्देश्य मनुष्य है। भारत की यही परंपरा रही है । यहाँ तकनीक को कभी हृदय से अलग नहीं किया गया। पत्थर तराशने वाले शिल्पकार हों या सॉफ्टवेयर कोड लिखने वाले अभियंता, दोनों में एक ही चेतना बहती रही है शाश्वत सृजन की।


इस वर्ष का ‘अभियंता बंधु’ उसी सृजन चेतना को प्रणाम करता है। इसमें निहित हर लेख, हर विचार, हर शोध उसी परंपरा का विस्तार है जो हड़प्पा से लेकर चंद्रयान तक फैली है।


हम गर्व से कह सकते हैं कि भारत का अभियंता केवल समय का साक्षी नहीं, भविष्य का निर्माता भी है।


भोपाल केंद्र को यह दायित्व मिला, यह हमारे लिए एक सम्मान है। हम इस अंक को उन सभी अभियंताओं को समर्पित करते हैं जो अपने श्रम, बुद्धि और ईमानदारी से भारत के तकनीकी स्वप्न को साकार कर रहे हैं। यह अंक उन्हें प्रणाम है जो चुपचाप देश की प्रगति की आधारशिला रख रहे हैं ,  पुलों के नीचे, प्रयोगशालाओं में, कारखानों में, और कक्षा-कक्षों में।


इंस्टिट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया) का यह प्रयास न केवल तकनीकी जगत के लिए प्रेरक है, बल्कि समाज को यह विश्वास दिलाता है कि भारत का अभियंता हर चुनौती को अवसर में बदलने की क्षमता रखता है।


हम आशा करते हैं कि यह अंक विचार, शोध और प्रेरणा का स्रोत बनेगा। यह अभियंता समुदाय के साथ-साथ विद्यार्थियों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगा।


अंत में मैं अपने संपादकीय सहयोगियों, लेखकों, अनुवादकों, समीक्षकों और सभी सदस्यों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ जिन्होंने इस अंक को सार्थक बनाया। विशेष रूप से हमारे राज्य केंद्र के अध्यक्ष तथा सचिव जिन्होंने हर मोड पर इस पत्रिका के लिए हर संभव प्रयास किया है।


भारत का अभियंता केवल तकनीक का ज्ञाता नहीं, सृजन का साक्षी है  और अभियंता बंधु उसी सृजन की गाथा है।


– 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

फैलो मेंबर सिविल, 

स्टेट काउंसिंल सदस्य 

एवं 

प्रधान संपादक

अभियंता बंधु वर्ष 2025

Friday, 24 April 2026

प्रस्तावना काव्य अंजली

 प्रस्तावना

काव्य अंजली


जीवन भी एक धातु की तरह है, जिसे अनुभवों की भट्टी में तपना पड़ता है ताकि वह अपने शुद्धतम और चमकदार स्वरूप में हो । मेरे प्रिय मित्र और वरिष्ठ मेटलर्जिकल इंजीनियर, परमानन्द सिन्हा जी ने ताउम्र धातुओं के गुणधर्मों को समझा और उन्हें वांछित आकार दिया।  'काव्य अंजली' के रूप में वे हमारे सामने एक 'भाव-अभियंता' के रूप में प्रस्तुत हैं । उन्होंने शब्दों का ऐसा एलाय तैयार किया है, जो कठोर सत्य की शक्ति भी रखता है और कविता की चमक भी।

एक मेटलर्जिस्ट के पास वह पारखी नज़र होती है जो अयस्क के भीतर छिपे मूल्यवान तत्व को पहचान लेती है। सिन्हा जी ने समाज और जीवन की आपाधापी के बीच से उन बारीक भावनाओं को चुना है, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। उनकी कविताएँ केवल पंक्तियाँ नहीं, बल्कि उनके जीवन के अनुभवों की 'कास्टिंग' और 'फोर्जिंग' हैं।

इस संग्रह में उन्होंने  कुशलता से 

 रिश्तों की डक्टिलिटी , मतलब पुस्तक की कुछ रचनाओं  में वे अपने उन मित्रों की बात करते हैं जो उम्र के साठ-पैठस वाले पड़ाव पर हैं। वे यहाँ समझाते हैं कि कैसे बढ़ती उम्र के साथ रिश्तों में लचीलापन और मज़बूती बनी रहनी चाहिए। पुरुषों के लिए मित्रों के साथ को 'मायका' कहना, उनकी मौलिक सोच का उदाहरण है।

  जब वे व्यक्ति के आंतरिक आत्मविश्वास और भाषा के प्रति प्रेम को रेखांकित करते हैं। तब वे  स्पष्ट हैं कि जीवन व्यापार नहीं, बल्कि एक मधुर साज है, जिसे सही 'ट्यूनिंग' की आवश्यकता होती है।

 उनकी लेखनी में स्टील सी वह मज़बूती दिखती है जो हर राष्ट्रभक्त  हृदय में होनी चाहिए। सावरकर, सुभाष और आज़ाद जैसे महानायकों का स्मरण करते हुए वे देश की एकता को उस फौलाद की तरह देखते हैं जिसे कोई तोड़ नहीं सकता।

परमानन्द जी ने अपनी इस कृति में भावनाओं का 'हीट ट्रीटमेंट' इतनी कुशलता से किया है कि हर कविता पाठक के मन को छूकर उसे वैचारिक आनंद देती है। वे स्वयं कहते हैं कि "अपना विवेक सदा साथ रहे," और यही विवेक उनकी रचनाओं को एक विशेष 'फिनिशिंग' देता है।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि 'काव्य अंजली' का यह साहित्यिक संकलन पाठकों के अंतर्मन को वैसे ही आलोकित करेगा जैसे भट्टी से निकला हुआ ज्योतिर्मय स्वर्ण दीप ।  संग्रह में एक सौ कविताओं को 

धर्म और संस्कृति,

समाज और देश,

साहित्य और नायक तथा

मित्रता और माधुर्य के

चार खंडों में अलग अलग संग्रहित किया गया है। इस अभिनव प्रयास के लिए परमानन्द सिन्हा जी को कोटि-कोटि बधाई।


— विवेक रंजन श्रीवास्तव 

वरिष्ठ समालोचक , व्यंग्यकार 

ई अभिव्यक्ति पोर्टल के मानसेवी हिंदी संपादक 

A 233, old Minal residency, j k road Bhopal 462023

apaniabhivyakti@gmail.com

Mob 7000375798

Thursday, 23 April 2026

चार प्रेम कविताएं

 चार प्रेम कविताएं 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

A 233, old Minal residency, j k road Bhopal 462023

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1


शीर्षक 


एक कविता 

एक नज़्म 

एक गीत 

एक ग़ज़ल हो तुम 

तरन्नुम में ,

और मैं 

महज कुछ शब्द 

बिखरे हुए,

जिन्हें बना दिया है 

नियति ने 

तुम्हारा शीर्षक।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 2. 

खजुराहो के प्रस्तर


खजुराहो के मन्दिर शिखरों से

जब धूप हौले से फिसलती है नीचे,

और उन आलिंगनबद्ध देहों को सहलाती है

तो निर्जीव पाषाण प्रतिमाओ के बीच मौन संवाद समझ पाता हूं मैं, 

हरे लान पर बैठे हुए ।

मेरे और तुम्हारे बीच के 

वे 'अनकहे चैट्स',

जो हमने टाइप तो किए, 

पर कभी 'सेंड' ही नहीं कर पाए, 

शब्द वे, जो ड्राफ्ट ही रह गए ।

लगता है वे सब इन दीवारों की 

प्रस्तर मूर्तियों में सदियों से जाग रहे हैं।

मूर्तिकार ने इनकी आँखों में 

संकोच नहीं , 

उकेरा है शाश्वत निर्मल प्रेम।

हमारी तरह 'ब्लू टिक' का 

इंतज़ार नहीं है, इन्हें

और न ही 'लास्ट सीन' के समय 

को देख कोई मनगढ़ंत अनुमान ।

बस प्रेम का होना ही

शाश्वत सत्य है यहां।

देखता हूँ इन आलिंगनबद्ध 

युगल प्रस्तर मूर्तियों को

तो मुझे अपनी रग रग में

तुम्हारी छुअन की ,पहली

सिहरन का अहसास होता है, 

जिसे इस 'फास्ट-फॉरवर्ड' भागदौड़ में

शायद हम बहुत पीछे कहीं भुला आए हैं।

ये मौन मूर्तियाँ कर रही हैं 

उद्घोषणा सदियों से 

"प्रेम पाप नहीं",

सृष्टि की किताब में सबसे सुंदर कविता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 



 3. 

कोणार्क का चक्र 


सूर्य मंदिर में 

कोणार्क के उस पहिए पर 

समय ठहरा हुआ है,

उन आलिंगनबद्ध जोड़ों के लिए

पत्थरों की वे नृत्य निमग्न मुद्राएं, 

वे बाहुपाश, आगोशी

सांसों का पत्थर में बदल जाना

जैसे किसी बहुत पुरानी 

'प्लेलिस्ट' का सबसे प्यारा गाना

अनवरत 'लूप' पर बज रहा हो।

हम रिश्तों को 'अपडेट' करते हैं, 

सॉफ्टवेयर के 'वर्जन' बदलते हैं,

पर वे प्रस्तर शिल्प

चिर नवीन हैं, 

उतने ही पवित्र जितने कल थे।

हाँ ! देह का विसर्जन नहीं, 

देह का उत्सव है , कोणार्क शिल्प।

लगता है , तुम्हारा मेरा मिलना भी

किसी ऐसे ही प्राचीन मंदिर की योजना का कोई हिस्सा था।

खंडहर नहीं हैं, गवाह हैं, ये ,

जब दुनिया केवल शोर से भर जाएगी,

जब प्रेम, प्रदर्शन बस रह जाएगा 

एक 'इमोजी' तक सिमट जाएगा,

तब भी ये पत्थर कहते रहेंगे खुली सभा में 

"प्रेम देह से होकर 

आत्मा तक जाने वाला अनंत 

चक्र है।"


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 4. 

भोरमदेव की छांव 


मैकल पर्वत श्रृंखला के साए में, 

भोरमदेव की उन दीवारों पर

उकेरी गई ,मिथुन मूर्तियाँ , 

मुझे हमारी ,

पहली 'कॉफी डेट' की याद दिलाती हैं।

वही झिझक, 

वही नसों में दौड़ती बिजली,

और वही मौन

जो बिन बोले सब कुछ कह देता था। रेतीले पत्थर की प्रतिमाएं 

नहीं हैं बस शिल्प के आभूषणों से सजी धजी, ये सुसज्जित हैं 

प्रेम के शाश्वत संदेश से।

इनके चेहरों पर जो दीप्ति है,

वह 'इंस्टाग्राम फिल्टर' की 

मोहताज नहीं है।

वह लावण्य मौलिक है ।

सोचता हूँ,

हज़ारों साल पहले उस शिल्पी ने 

जब एक अनगढ़ पत्थर पर 

छेनी चलाई होगी,

तो आख़िर कैसे उकेरी होगी यह 

बिल्कुल तुम सी सुगठित नव यौवना 

तुम जरूर रही होगी, तब भी 

और देखा होगा उस शिल्पी ने तुम्हें 

कहीं लुक छिप कर ।

जरूर मैं ही रहा होऊंगा 

वह कलाकार 

क्योंकि 

तुमने ही तो दिया है 

तुम्हारे सर्वस्व पर सिर्फ मुझे अधिकार ।

पुनर्जन्म पर भरोसा हो रहा है मुझे 

भोरमदेव के परिसर में यह 

मूरत देखकर ।

पत्थर अमर हो गए हैं ये 

प्रेम करते हुए,

क्यों हम जीते-जी पत्थर हुए जा रहे हैं।

छोड़ो भी अब नाराजगी

आओ, हम भी एकाकर हो जाएँ,

प्रेम में समर्पण, हारना नहीं है। 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

A 233, old Minal residency, j k road Bhopal 462023

apaniabhivyakti@gmail.com

Mob 7000375798


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 संक्षिप्त परिचय ...

 विवेक रंजन श्रीवास्तव ,वरिष्ठ व्यंग्यकार, स्वतंत्र लेखक ( हिंदी व अंग्रेजी )


२८ जुलाई १९५९ में मण्डला के एक साहित्यिक परिवार में जन्म .

माँ ... स्व दयावती श्रीवास्तव ...सेवा निवृत प्राचार्या

पिता ...स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध ... वरिष्ठ साहित्यकार, कवि अनुवादक

पत्नी ... श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव ... स्वतंत्र लेखिका


इंजीनियरिंग की पोस्ट ग्रेडुएट शिक्षा के बाद विद्युत मण्डल में शासकीय सेवा से मुख्य अभियंता के रूप में सेवा निवृत्त. 


 परमाणु बिजली घर चुटका जिला मण्डला के प्रारंभिक सर्वेक्षण से स्वीकृति तक , अनेक उल्लेखनीय लघु पन बिजली परियोजनाओ , १३२ व ३३ कि वो उपकेंद्रो , केंद्रीय प्रशिक्षण केंद्र जबलपुर ISO प्रमाणित आदि के निर्माण का तकनीकी गौरव .


किताबें 

बिजली का बदलता परिदृश्य ,

 जल जंगल जमीन आदि तकनीकी किताबें . 

हिन्दी में वैज्ञानिक विषयों पर निरंतर लेखन ,

2005 से हिन्दी ब्लागिंग .


१९९२ में नई कविताओ की पहली किताब आक्रोश तार सप्तक अर्ध शती समारोह में भोपाल मे विमोचित , इस पुस्तक को दिव्य काव्य अलंकरण मिला ..


व्यंग्य की किताबें रामभरोसे , 

कौआ कान ले गया , 

मेरे प्रिय व्यंग्य , 

धन्नो बसंती और बसंत , बकवास काम की , 

जय हो भ्रष्टाचार की ,

समस्या का पंजीकरण , खटर पटर, 

चूं चूं की खोज

 व अन्य प्रिंट व किंडल आदि प्लेटफार्म पर .


समस्या का समाधान का अंग्रेजी अनुवाद किंडल पर सुलभ


मिली भगत ,

चटपटे शरारे एवं लाकडाउन नाम से सँयुक्त वैश्विक व्यंग्य संग्रहों का संपादन .


सामूहिक संग्रहों में भागीदारी 

व्यंग्य के नवल स्वर , आलोक पौराणिक व्यंग्य का ए टी एम ,

 बता दूं क्या , 

अब तक 75 , 

इक्कीसवीं सदी के 131 श्रेष्ठ व्यंग्यकार , 

251 श्रेष्ठ व्यंग्यकार , निभा 

व्यंग्य के रंग 

आदि अनेक संग्रहो में सहभागिता


भगत सिंह ,

उधमसिंह ,

रानी दुर्गावती 

पहला आदिवासी रॉबिनहुड टंट्या भील 

आदि महान विभूतियों,

मध्यप्रदेश की पुरातात्विक धरोहर

 पर चर्चित किताबें लिखीं हैं


नाटक की पुस्तकें... जलनाद नाटक संग्रह विश्ववाणी से राष्ट्रिय स्तर पर पुरस्कृत , 

हिन्दोस्तां हमारा , 

जादू शिक्षा का नाटक संग्रह चर्चित व म. प्र. साहित्य अकादमी से सम्मानित, तथा पुरस्कृत


पाठक मंच के माध्यम से नियमित पुस्तक समीक्षक

https://e-abhivyakti.com के साहित्य सम्पादक


म प्र साहित्य अकादमी ,

पाथेय 

मंथन ,

वर्तिका , 

हिन्दी साहित्य सम्मेलन , तुलसी साहित्य अकादमी व अनेक साहित्यिक़ संस्थाओं , से सम्मानित


 सामाजिक लेखन के लिये रेड एण्ड व्हाईट सम्मान से राज्यपाल से सम्मानित .


वर्तिका पंजीकृत साहित्यिक सामाजिक संस्था के राष्ट्रीय संयोजक


टी वी ,

रेडियो , 

यू ट्यूब , 

पत्र पत्रिकाओ में निरंतर प्रकाशन .

वैश्विक एक्सपोजर एवं भागीदारी

ब्लॉग

http://vivekkevyang.blogspot.com व अन्य ब्लॉग


संपर्क...

ए २३३ , ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी , भोपाल , म प्र , ४६२०२३

मो ७०००३७५७९८

apaniabhivyakti@gmail.com

इन दिनों लंदन प्रवास पर हैं

Monday, 20 April 2026

श्री परमानंद सिन्हा की काव्य कृति आकांक्षा की भूमिका

 भूमिका


साहित्य में काव्य की सार्थकता केवल शब्दों के चयन या तुकबंदी में नहीं, बल्कि उन जीवन मूल्यों में निहित होती है जो समाज को संबल प्रदान करते हैं। कविता , अभिव्यक्ति की सर्वाधिक प्राचीन विधा है।  कंठस्थ रहने में सुगमता एवं साहित्य के कलात्मक सौंदर्य के चलते बरसों से काव्य,  साहित्य के शिखर पर है। एक रचनाकार जब अपनी अनुभूतियों को कागज़ पर उतारता है, तो वह स्वयं को व्यक्त ही नहीं करता, बल्कि अपने युग की धड़कनों को स्वर देता है।

 'आकांक्षा' काव्य संग्रह इसी उदात्त परंपरा का निर्वहन करता है, जहाँ कविता मनोरंजन की परिधि से बाहर निकलकर आत्म-चिंतन और नैतिक बोध का माध्यम बनती है। काव्य मूल्यों की कसौटी पर यह संग्रह इसलिए खरा उतरता है क्योंकि इसमें सत्य की कटुता और संवेदना की कोमलता का अद्भुत संतुलन है। जब मैं इन कविताओं से गुजरा  तो मैंने पाया कि रचनाकार मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज रायपुर के सहपाठी , वहां मेरे प्रारंभिक साहित्यिक सफर के सहयात्री भाई परमानंद सिन्हा जी ने जीवन के प्रति एक सकारात्मक और मूल्यपरक दृष्टिकोण अपनाया है, जो आज के अस्थिर परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक तथा महत्वपूर्ण है।


इस संग्रह की समालोचना करते हुए यह स्पष्ट होता है कि कवि ने अपनी रचनाओं में भाव और यथार्थ का जो शाश्वत तथ्यों का ताना-बना बुना है, वह अत्यंत सुदृढ़ है। उदाहरण के लिए, 


सुगंधित फूलों के संग,

काटें भी तो बेशुमार है।

खुशियों की नदी बहती है,

पर दुख भी तो अपार है।


 इसी प्रकार,  कवि की लेखनी मर्म स्पर्शी हो जाती है,  वे लिखते हैं


अंधियारे को देखा पिघलते हुये, 

रवि की किरणों को मचलते हुये। 

शीतल सुखद थी, सुबह की बयार, 

पंछी उड़ चले, चह चहाते हुये। 


इन पंक्तियों में छायावादी गीत चेतना परिलक्षित होती है। जो प्रकृति परिवेश का शाब्दिक चित्र बनाती है।


एक मिजाज के गीत एक खंड में संजोकर उन्होंने पाठकों के लिए अलग अलग गुलदस्ते एक साथ प्रस्तुत किए हैं। 

लंबे अंतराल में मनोभावों को शब्दों में प्रस्तुत कविताओं को संग्रह के अंतिम स्वरूप में प्रकाशित कर एक विशद साहित्यिक , संपादन का उनका प्रयास स्तुत्य है। 


संग्रह के काव्य विधान, शैली और भाषा की बात करें तो इसमें एक सहज प्रवाह और माधुर्य है जो पाठक को अंत तक बांधे रखता है। कवि ने क्लिष्ट और बोझिल शब्दावली के स्थान पर ऐसी सुगम भाषा का प्रयोग किया है जो जनमानस से सीधे संवाद करती है। उनकी शैली वर्णनात्मक होते हुए भी प्रतीकों और बिंबों से इस प्रकार सजी हुई है कि कविता पढ़ते समय दृश्य जीवंत हो उठते हैं। 

यहाँ उपमा और रूपक अलंकारों का प्रयोग किसी कृत्रिम साज-सज्जा की तरह सायास नहीं, बल्कि भावों की तीव्रता बढ़ाने के लिए स्वाभाविक रूप से हुआ है। 

छंदों की गति और लय  में एक आंतरिक संगीत है, जो इन रचनाओं को केवल पढ़ने योग्य ही नहीं, बल्कि गुनगुनाने योग्य भी बनाता है। शिल्प और कथ्य का यह सामंजस्य श्री परमानंद सिन्हा जी के काव्य संग्रह 'आकांक्षा' को एक विशिष्ट साहित्यिक पहचान दिलाता है।

अंततः, 'आकांक्षा' काव्य संग्रह कवि की आंतरिक यात्रा और उनके जीवन की  अनुभूतियों का वह निचोड़ है जो समाज के लिए उनकी अप्रतिम भेंट सिद्ध होगा । इस काव्य कृति के माध्यम से कवि ने अपनी रचनात्मकता का जो परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। मैं रचनाकार से यह मंगलमयी आशा करता हूँ कि भविष्य में भी उनकी लेखनी इसी प्रकार सा+हित के  रचनात्मक लोक कल्याणी मार्ग पर प्रशस्त रहेगी। पाठकों को उनसे यह अपेक्षा रहेगी कि वे मानवीय संवेदनाओं के और भी सूक्ष्म धरातलों को अपनी लेखनी से स्पर्श करेंगे और समाज में व्याप्त जड़ता को तोड़ने के लिए निरंतर सृजनरत रहेंगे।  यह साहित्यिक यात्रा निरंतर पल्लवित हो और 'आकांक्षा' पाठकों के हृदय में अपना स्थायी स्थान बनाए, यही मेरी हार्दिक मनोकामना है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

वरिष्ठ समालोचक, व्यंग्यकार 

भोपाल

Wednesday, 8 April 2026

साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा

 साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


लेखकीय भावना के साथ न्याय या निर्देशक का व्यवसायिक रूपांतरण, एक बहुआयामी जटिल प्रश्न रहा है।

साहित्य और सिनेमा के बीच का रिश्ता हमेशा से एक ऐसे पुल की तरह रहा है जिसे पार तो बहुतों ने किया, पर उससे कम ही लोग दर्शकों के मन में वह छबि बना पाए, जो उस दर्शक ने एक पाठक के रूप में स्वयं अपने मन में उपन्यास पढ़कर बनाई थी। एक लेखक और साहित्य-अनुरागी होने के नाते, जब पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था' जैसी कालजयी कहानी या महाकवि जयशंकर प्रसाद की 'कामायनी' के अंशों को फिल्मी पर्दे पर उतरते देखा , तो मन एक अनजानी सी रिक्तता और निराशा से भर जाता है। यह निराशा केवल एक दर्शक की नहीं, बल्कि उस पाठक की है जिसने उन शब्दों के 'प्राण' को अपनी कल्पना में जिया है।

सच तो यह है कि सिनेमा और साहित्य के लक्ष्य एक होकर भी अपनी प्रकृति में पूरी तरह भिन्न हैं। साहित्य जहाँ कल्पना की अनंत आकाशगंगा है,व्यावसायिकता से किंचित परे है ,वहीं सिनेमा उसे कैमरे के लेंस और स्क्रीन के फ्रेम में कैद कर देने वाली एक विवश कला है, जो बॉक्स ऑफिस से जुड़ा हुआ है। किताब में लेखकीय भावों का डिस्टार्शन नहीं होता क्योंकि उसकी प्रस्तुति में सिनेमा की तरह अभिनय , निर्देशन , संपादन ,  लोकेशन , फिल्मांकन, पार्श्व, संगीत , गायन वगैरह  ढेर सारे लोग नहीं होते । 


जब प्रसाद जी लिखते हैं"तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन"तो वह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मानवीय चेतना और श्रद्धा का एक गहन दर्शन है।  फिल्मी धुनों में  ऐसे गीत 'शब्दनाद' और गांभीर्य को खो देते है , जो मूल कृति की आत्मा थी।


 फिल्मकार की कोशिश उसे 'लोकप्रिय' और 'दृश्य-योग्य' बनाने की होती है, जबकि रचना पाठक से एक विशेष मानसिक तैयारी और एकांत की मांग करती है। बाज़ार और बॉक्स ऑफिस की ज़रूरतों ने अक्सर महान कृतियों के मौलिक सौंदर्य की बलि चढ़ाई है।

दशकों से फणीश्वरनाथ रेणु की 'तीसरी कसम' से लेकर अमृता प्रीतम की 'पिंजर', आर.के. नारायण की 'गाइड' और दोस्तोएवस्की की रचनाओं पर आधारित 'साँवरिया' जैसी तमाम साहित्य आधारित फिल्में बनती रही हैं। इनमें से कुछ ने आत्मा को छुआ, तो कुछ केवल बाहरी कलेवर तक सीमित रहीं। 'तीसरी कसम' में जो ग्रामीण संवेदना और हीरामन की निश्छलता उतर पाई, वह शायद इसलिए संभव हुई क्योंकि फिल्म के पीछे शैलेंद्र जैसा कवि-हृदय और रेणु की मिट्टी की समझ थी। इसके विपरीत, जब हम 'देवदास' या 'शतरंज के खिलाड़ी' जैसे रूपांतरणों को देखते हैं, तो द्वंद्व और गहरा हो जाता है। जहाँ सत्यजीत रे प्रेमचंद के व्यंग्य को दृश्यों में ढालने में सफल रहते हैं, वहीं आधुनिक सिनेमा अक्सर शरतचंद्र की उस आंतरिक दरिद्रता और आत्म-पीड़ा को मखमली लिबासों और भव्य झूमरों के नीचे दबा देता है।

 फिल्मकार अक्सर कृति के कथानक (Plot) को तो पकड़ लेते हैं, पर उसके 'उद्देश्य' और उस सूक्ष्म सौंदर्य को चित्रित करने में चूक जाते हैं जिसे लेखक ने शब्दों के बीच की रिक्तियों में छिपाया होता है। दृश्य माध्यम की अपनी माँगें हैं। वहाँ संवादों की गति चाहिए, चकाचौंध चाहिए और एक निश्चित समय सीमा का अनुशासन भी। लेकिन साहित्य के पास वह विलासिता है कि वह पाठक को घंटों एक ही विचार या संवेदना में डूबा रहने दे। यही कारण है कि कुछ विरले उदाहरणों को छोड़ दें, तो अधिकांश फ़िल्मी रूपांतरण मूल कृति के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाते।

अंततः, साहित्य एक व्यक्तिगत यात्रा है और सिनेमा एक टीम प्रस्तुति का  सामूहिक अनुभव। किसी भी कालजयी रचना का जो 'शब्दनाद' हमारी अंतरात्मा में गूँजता है, उसे पर्दे के कोलाहल में तलाशना शायद एक कठिन अपेक्षा है। सिनेमा साहित्य का अनुवाद करने की कोशिश तो कर सकता है, लेकिन वह उसकी गरिमा और गांभीर्य का पूर्ण विकल्प कभी नहीं बन सकता। जब भी कोई फिल्मकार किसी महान कृति को हाथ लगाता है, तो वह केवल एक कहानी नहीं उठाता, बल्कि वह उन हज़ारों पाठकों की स्मृतियों और भावनाओं को चुनौती देता है जिन्होंने उस कहानी को अपने भीतर जिया है। अफ़सोस कि अक्सर इस चुनौती में फिल्मकार अपनी तकनीक से तो जीत जाता है, पर संवेदना के धरातल पर प्रायः हार जाता है। 

जिस तरह अनुवादक को मूल लेखक की आत्मा में परकाया प्रवेश कर उसके भाव पकड़ने होते हैं, उससे भी अधिक दुष्कर कार्य साहित्य का फिल्मांकन है, क्योंकि यहां सारी टीम को रचना की आत्मा में परकाया प्रवेश करना वांछित होता है। 

— विवेक रंजन श्रीवास्तव

Tuesday, 7 April 2026

कहानी गर्व गाथा

 कहानी 

गर्व गाथा

लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव


मिलिट्री अकादमी का वह विशाल परेड ग्राउंड... जनवरी की गुनगुनी धूप स्टेडियम के सीने पर कुछ इस तरह उतर रही थी, मानो आकाश स्वयं अपनी स्वर्ण-रश्मियों से देश के प्रहरियों का राजतिलक कर रहा हो। हवा में बूटों की खनक और कड़क कलफ लगी वर्दियों की सरसराहट के बीच एक अनकही बेचैनी और भारी प्रतीक्षा थी। सबकी निगाहें उस मंच पर टिकी थीं, जहाँ से आज शौर्य का एक नया अध्याय घोषित होना था।

सारी परेड के साथ ही मेजर अंजलि अपनी 'सेरेमोनियल ड्रेस' में अविचल खड़ी थीं। उनकी रीढ़ में सेना का अनुशासन था, पर सीने के भीतर एक बहन का हृदय हज़ारों अश्वों की गति से धड़क रहा था। उनका भाई राघव जिसे बचपन में उन्होंने जाने कितनी बार गोद में संभाला था, शौर्य पदक का सबसे बड़ा दावेदार था । उसने आपरेशन सिंदूर में दुश्मन के घर में घुसकर न केवल अपने मिशन को सफल अंजाम दिया था , वहां से अपने घायल साथियों को बचाकर लौटने का कमाल जो किया था ।


अचानक लाउडस्पीकर पर गूँजी उस गंभीर आवाज़ ने फिजा में प्राण फूँक दिए,  "लेफ्टिनेंट राघव ... 'ऑपरेशन सिंदूर' में अदम्य साहस के लिए... शत्रु की भीषण गोलाबारी के बीच अपने मिशन डिस्ट्रॉय मिलिटेंट को पूरा कर , चार घायल साथियों को सुरक्षित वापस निकाल लाने हेतु उन्हें 'शौर्य चक्र' से सम्मानित किया जाता है।

सारा परेड ग्राउंड हर्ष में डूब गया।  

घोषणा समाप्त होते ही वह दृश्य उपस्थित हुआ जिसने अकादमी के इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया। अंजलि ने सैन्य गरिमा और बहन के लाड़ को एकाकार करते हुए, बिना एक पल गँवाए राघव को अपनी मज़बूत भुजाओं में भरा और उन्हें अपने कंधों पर उठा लिया। तालियों की गड़गड़ाहट ने आसमान को छू लिया। सैनिकों की एड़ियाँ एक साथ चटककर जैसे इस अभिनव सम्मान को सलामी दे रही थीं।


माइक से घोषणा हुई,  लेफ्टिनेंट राघव को उनके अनुभव साझा करने हेतु मंच पर आमंत्रित किया गया। 


 राघव जब मंच पर पहुँचे, तो उनकी आँखों में नमी थी पर मस्तक गर्व से उन्नत था।

राघव ने माइक संभाला। पूरा मैदान पिन-ड्रॉप साइलेंस में डूब गया। उनकी आवाज़ में एक ठहरी हुई गंभीरता थी, 

"उस रात 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान जब दुश्मन की मशीनगनें आग उगल रही थीं और बारूद की गंध ने साँस लेना दूभर कर रखा था, तब दो घंटे तक मौत हमसे बस चंद फुट की दूरी पर खड़ी मुस्कुरा रही थी। एक पल को लगा कि शायद आज जिंदगी का वह आखिरी पन्ना लिखा जाएगा जिसे दादाजी 'सिपाही की अधूरी दास्तान' कहते थे। पर तभी मुझे अपने उन चार घायल साथियों की सिसकियाँ सुनाई दीं, जो अपनी आखिरी साँसों में भी मुझ पर भरोसा टिकाए हुए थे।"

राघव ने एक क्षण का विराम लिया और सामने खड़ी अपनी माँ और पिता की ओर देखा। 

" हमारी टुकड़ी अपने मिशन को सफलता पूर्वक अंजाम दे चुकी थी ,  मैंने सोचा, अगर मैं आज शहीद हो गया, तो मेरी वीरता केवल यादों में सिमट जाएगी। पर अगर मैं लड़कर लौट आया, तो मैं अपने देश की आँखों में वह चमक देख पाऊँगा जो जीत से आती है। मैंने मौत से नहीं, जीवन से आँखें मिलाईं। मैंने तय किया कि मैं मरूँगा नहीं, बल्कि अपने जवानों को ज़िंदा लेकर घर लौटूंगा। क्योंकि असली विजय तिरंगे में लिपट कर लौटने में नहीं, बल्कि तिरंगे को आसमान की ऊँचाइयों तक फहराते रहने में है।"

दूर खड़ी माँ रेखा अपने आँचल से गर्व के आँसू पोंछ रही थीं। पास ही खड़े कर्नल सूर्यप्रताप 

 की वर्दी पर लगे पदक आज सूर्य की रोशनी में अधिक दीप्तिमान हो रहे थे। उनका गला रुँध गया था। यह उस पिता का संतोष था जिसका बेटा 'लड़कर' और 'जीतकर' लौटा था।


तीन वर्ष बाद...

वही परेड ग्राउंड, वही सुनहरी धूप। पर इस बार परिदृश्य बदला हुआ था। राघव अब कैप्टन थे। आज वे स्वयं किसी के कंधे पर सवार नहीं थे, बल्कि उन्होंने एक युवा लेफ्टिनेंट, विक्रम को अपने कंधों पर उठा रखा था। विक्रम ने एक जलती हुई बस्ती से तीन मासूम नागरिकों को जान पर खेलकर आग से  बचाकर   सुरक्षित  निकाला था।

पास में खड़े विक्रम के पिता, जो एक साधारण किसान थे, अपनी फटी बिवाइयों वाले हाथों से आँखों की नमी पोंछ रहे थे। राघव ने विक्रम को नीचे उतारा और उन के हाथों को चूमते हुए कहा, "बाबूजी, मुस्कुराएं,  आपका बेटा आज एक विजेता बनकर घर लौटेगा। यही इस वर्दी की सबसे बड़ी जीत है।"

लेफ्टिनेंट कर्नल बन चुकी अंजलि गर्व से शौर्य के अभिषेक की इस परंपरा को आगे बढ़ते देख रही थीं। उन्होंने मन ही मन दोहराया"वीरता का वास्तविक उत्सव शहादत के शोक में नहीं, बल्कि शौर्य के जीवंत उल्लास में है।"

 परेड ग्राउंड पर बना वह चित्र मात्र एक परिवार की कहानी नहीं थी। वह हर उस भारतीय घर की नई प्रतिज्ञा थी जहाँ वर्दी को केवल कफ़न नहीं, बल्कि शान का लिबास माना जाता है। वह एक ऐसी चेतना बन चुकी थी, जहाँ हम शहीदों को नमन तो करते हैं, पर अपने जीवित वीरों को कंधों पर उठाकर यह उद्घोष करते हैं कि, सैनिक की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका वह जीवन है, जो उसने अपने देश के गौरव को अपनी आँखों से देखने के लिए बचा कर रखा है।


— विवेक रंजन श्रीवास्तव

Monday, 2 March 2026

भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र

 भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र


विवेक रंजन श्रीवास्तव


हिंदी ललित निबंध के संसार में पंडित विद्यानिवास मिश्र एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से मिट्टी की सोंधी गंध और वेदों की ऋचाओं को एक साथ पिरोया है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने जिस ललित निबंध की आधारशिला रखी थी, मिश्र जी ने उसे अपने अद्भुत पांडित्य और लोक-अनुभवो को शब्दों से एक विशाल प्रासाद में परिवर्तित कर दिया। उनका लेखन केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस अविरल धारा का प्रवाह है, जो गाँवों की पगडंडियों से होती हुई दर्शन के शिखर तक पहुँचती है।

उनके निबंध अनुभूति और शिल्प का संगम हैं।

मिश्र जी के निबंधों का 'ललित' पक्ष उनके आत्मपरक दृष्टिकोण में निहित है। उनके निबंधों में 'मैं' का अहंकार नहीं, बल्कि 'मैं' की आत्मीयता घुली होती है। जब वे 'कदम की फूली डाल' या 'आम्र-मंजरी' की बात करते हैं, तो वे केवल प्रकृति का वर्णन नहीं कर रहे होते, बल्कि वे पाठक को अपने साथ उस संवेदन-धरातल पर ले जाते हैं जहाँ तर्क पीछे छूट जाता है और केवल प्रवाही रसात्मकता शेष रहती है।

उनकी असाधारण स्मृतयो का रोचक वर्णन लालित्य की बहुत बड़ी विशेषता है। वे वर्तमान की किसी छोटी-सी घटना जैसे बारिश की बूंदों का गिरना , को भी निबंध में इतिहास और पुराणों की महान परंपराओं से जोड़ देते हैं। उनके लेखन में शब्द 'अर्थ' ही नहीं देते, बल्कि 'ध्वनि' और 'दृश्य' भी पैदा करते हैं। उनके निबंधों में एक प्रकार की 'तरलता' है, जो पाठक के मन में किसी पुराने राग की तरह गूंजती रहती है।

लोक और शास्त्र का अनूठा अद्वैत

विद्यानिवास मिश्र के लेखन की  विशिष्टता है ।उनके निबंधों में लोक और शास्त्र का समन्वय है। जहाँ एक ओर वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और पाणिनी के व्याकरण की सूक्ष्मताओं से परिचित थे, वहीं दूसरी ओर उनके हृदय में लोक-गीतों और ग्रामीण अंचल की स्मृतियाँ रची-बसी थीं। उनके निबंधों में उपनिषदों के सूत्र और कबीर की साखियाँ एक ही धरातल पर आकर संवाद करती हैं। वे अक्सर कहते थे कि भारत की आत्मा महलों में नहीं, बल्कि उन लोरियो में सुरक्षित है जो एक माँ अपने बच्चे को सुलाते समय गाती है।

 

मिश्र जी की कृतियाँ कालजयी हैं। उनमें तथ्यात्मक वैचारिक विस्तार है। ये निबंध भारतीय जीवन-दर्शन के कोश बन गए हैं। उनका निबंध संग्रह 'तुम चंदन हम पानी' भक्ति और समर्पण की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार 'आँगन का पंछी और बनजारा मन' में उन्होंने मनुष्य की उस छटपटाहट को स्वर दिया है जो एक ओर अपनी जड़ों , आँगन से बँधना चाहता है और दूसरी ओर अनंत ज्ञान की खोज में 'बनजारा' बनकर भटकना चाहता है।


उनका सबसे चर्चित निबंध 'मेरे राम का मुकुट भीग रहा है' आधुनिक हिंदी साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है। एक संगीत कार्यक्रम से देर रात घर लौटते अपने पुत्र और अतिथि कन्या की प्रतीक्षा में बैठी एक माँ की ममतामयी चिंता को उन्होंने जिस प्रकार कौशल्या की राम के प्रति चिंता से जोड़ा, वह अद्भुत है। यह निबंध प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि जब तक इस देश में 'मुकुट के भीगने' अर्थात, संस्कृति और मर्यादा के संकट की चिंता जीवित है, तब तक हमारी संवेदनाएँ मृत नहीं हो सकती ।


कुशल संपादक और पत्रकारिता के प्रतिमान


पंडित जी का संपादन कर्म उनके लेखन जितना ही प्रभावशाली था। उन्होंने 'नवभारत टाइम्स' जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादक के रूप में हिंदी पत्रकारिता को एक नई गरिमा और वैचारिक गहराई प्रदान की। उनके संपादन में भाषा की शुद्धता और वैचारिक प्रखरता का विशेष ध्यान रखा जाता था। उन्होंने 'साहित्य अमृत' पत्रिका के माध्यम से नए रचनाकारों को एक मंच दिया और साहित्यिक पत्रकारिता के उच्च मानक स्थापित किए। वे मानते थे कि समाचार केवल सूचना नहीं होते  बल्कि उनकी प्रस्तुति ऐसी हो जिससे वो समाज के मानस को संस्कारित करने का माध्यम बने।

 पंडित विद्यानिवास मिश्र का अवदान यह है कि उन्होंने हिंदी निबंध को रूखेपन और कोरे बौद्धिक विलाप से बाहर निकाला। उन्होंने सिद्ध किया कि परंपरा जड़ नहीं होती, बल्कि वह एक बहती हुई नदी है जो नए युग के साथ मिलकर अपना मार्ग बनाती है। आज के वैश्वीकरण के दौर में, जब व्यक्ति अपनी पहचान खो रहा है, मिश्र जी का साहित्य हमें पुनः अपनी मिट्टी की सुगंध और अपने संस्कारों के उजियारे की ओर ले जाता है। वे आजीवन एक ऐसे 'सांस्कृतिक यात्री' बने रहे, जिनकी यात्रा का गंतव्य भारत की शाश्वत मेधा की खोज था।

विवेक रंजन श्रीवास्तव

Thursday, 12 February 2026

समकालीन विषयों पर व्यंग्य का प्रतिवेदन भूमिका सतीश श्रीवास्तव के व्यंग्य संग्रह पर

 भूमिका


समकालीन विषयों पर व्यंग्य का प्रतिवेदन


व्यंग्य साहित्य मानवीय चेतना का वह दर्पण है, जिसमें समाज अपने सबसे विद्रूप, विरोधाभासी और असुविधाजनक चेहरों का यथार्थ देखता है। यह विधा सदियों से सत्ता, समाज और व्यक्ति , तीनों को कटघरे में खड़ा करते हुए भी उनके विनाश की नहीं, वरन् उनके परिष्कार की अभिलाषा रखती आई है।


कबीर के तीक्ष्ण व्यंग्य-दोहों से लेकर परसाई, शरद जोशी, हरिशंकर व्यास और वर्तमान पीढ़ी तक व्यंग्य का मूल स्वर यही रहा है कि हँसी के सहारे हम अपनी दुर्बलताओं, पाखंडों और भ्रांतियों से आमना-सामना कर सकें। अकबर इलाहाबादी ने अपनी शायरी में समाज को यही आईना दिखाया था।


सूचना विस्फोट, उपभोक्तावाद और तकनीकी वर्चस्व के इस युग में व्यंग्य साहित्य की अनिवार्यता और भी बढ़ गई है। मीडिया, सोशल मीडिया और आडंबरपूर्ण भाषा प्रयोग ने यथार्थ को जितना सँवारा है, उतना ही धुँधला भी किया है। हम स्वयं को सुधारने के बजाय दर्पण साफ करने में उलझे हैं। ऐसे समय में सच्चा व्यंग्य उस धुंध को चीरकर सत्य के उन असुविधाजनक किंतु अनिवार्य पक्षों को उजागर करता है। वह स्मरण कराता है कि आवश्यकता आईना साफ करने की नहीं, स्वयं को निखारने की है।


समकालीन व्यंग्य के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है, वह महज क्षणिक मनोरंजन का माध्यम न रह जाए, अपितु समय की पकड़ और मानवीय संवेदना का समन्वय करते हुए अपनी सार्थकता सिद्ध करे। व्यंग्य यदि केवल चुटकुला बनकर रह जाए, तो वह साहित्य नहीं रहता , और यदि केवल आक्रोश बनकर सिमट जाए, तो पाठक से उसका संवाद समाप्त हो जाता है।


व्यंग्य का भविष्य तभी दीप्तिमान रहेगा, जब तक लेखक समय की नब्ज़ पर हाथ रखकर रचना करता रहेगा, और पाठक हँसते हुए भी अंतःकरण में कहीं एक हल्की-सी चुभन अनुभव करता रहेगा। आने वाले वर्षों में डिजिटल माध्यम, नवीन मंच, श्रव्य-दृश्य प्रस्तुतियाँ, सब व्यंग्य की भाषा और शिल्प में नवीन संभावनाओं का संचार कर रहे हैं। किंतु मूल तत्व वही रहेगा, ईमानदार दृष्टि, मानवीय करुणा और अभिव्यक्ति की कलात्मक मारक क्षमता। जो व्यंग्य व्यक्ति वध की प्रवृत्ति से ऊपर उठकर प्रवृत्ति विमर्श करता है, वही आने वाले समय का प्रामाणिक और सामाजिक रूप से अनुशंसनीय दस्तावेज़ सिद्ध होगा।


व्यंग्य के इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में यदि हम सतीश चंद्र श्रीवास्तव के व्यंग्य संग्रह ‘भरा नहीं जो भाव से…’ को देखें, तो स्पष्ट हो जाता है कि लेखक केवल हँसाने के लिए नहीं, वरन् विचार के लिए बाध्य करने के लिए लिख रहे हैं। गाजीपुर की मिट्टी से निकलकर विधि, हिन्दी और तकनीकी सेवा के त्रिवेणी-संगम से गुज़रा यह रचनाकार आम आदमी और व्यवस्था, दोनों को अंतर्दृष्टि से जानता , समझता है। उसके पास अभिव्यक्ति का कौशल है, भाषा पर अधिकार है, शब्दों का सामर्थ्य है। परिणामतः उनके व्यंग्य न तो निरा कल्पना-विलास हैं, न ही मात्र शिकायत-पत्र; वे समय के लेखकीय प्रतिवेदन हैं।


शीर्षक रचना ‘भरा नहीं जो भाव से…’ से लेकर ‘मामला 90 डिग्री का…’, ‘आता माझी सटकली…’, ‘मेरा तो कुछ भी नहीं…’, ‘चिंता न करें मेघराज’ तक, संग्रह के बत्तीस व्यंग्यों की पाठकीय यात्रा ‘सिंहासन बत्तीसी’ की तरह ही प्रत्येक रचना में उस मनुष्य को पकड़ती है, जो भीड़ में खोते-खोते अचानक अपने चेहरे को पहचानने लगता है। यहाँ हास्य केवल मनोरंजन नहीं है, यह मनुष्य के अंतस में जमी जड़ता पर एक मार्मिक आघात है। मुस्कान के बहाने आत्मचिंतन की ओर धकेलने वाली यह शैली अपने आप में सार्थक है। भाषा लोक मुहावरों, दैनंदिन संवाद, फिल्मी संकेतों और तकनीकी शब्दावली से बुनी गई है, फिर भी प्रतीक-विधान में कथ्य को खोलती है। यही कारण है कि पाठक को लगता है , ये बातें किसी दूरस्थ लेखक ने नहीं, वरन् घर-परिवार और कार्यालय में रोज़ सुनने-बोलने वाले अपने ही किसी सजन ने कही हैं।


इन रचनाओं का शिल्प भी उल्लेखनीय है। कहीं संस्मरण का आभास, कहीं रिपोर्ताज शैली, तो कहीं संवाद-प्रधान कथ्य , और सबके भीतर एक स्थायी व्यंग्य दृष्टि, जो घटनाओं के पृष्ठ में छिपी मानसिकता को सूक्ष्मता से उद्घाटित करती है। चिकित्सा व्यवस्था, प्रशासनिक लापरवाही, तकनीकी जुगाड़, संबंधों में स्वार्थ-साधन, और ‘मैं तो कुछ भी नहीं’ कहकर सब कुछ हड़प लेने वाली मानसिकता, इन सब पर लेखक का कटाक्ष तीक्ष्ण है, पर भाषा कहीं भी विषाक्त नहीं होती। यह उनकी विशिष्ट उपलब्धि है। वे व्यक्ति पर नहीं, प्रवृत्ति पर प्रहार करते हैं , यही व्यंग्य की नैतिक भूमिका है, जो इस संग्रह को मात्र ‘व्यंग्य-संकलन’ से ऊपर उठाकर एक साहित्यिक दस्तावेज़ का दर्जा देती है।


इस पुस्तक की सबसे बड़ी सामर्थ्य इसकी संवादधर्मी शैली है। लेखक बार-बार पाठक से प्रश्न करता है, उसे साथ लेकर चलता है, और प्रत्येक प्रसंग की परिणति पर मानो उसे आईना थमा देता है , “अब तुम ही बताओ, मामला सच में 90 डिग्री का है या नहीं?” यह शैली इन व्यंग्यों को मंच, रेडियो, दृश्य-माध्यम और गंभीर पाठ, तीनों स्तरों पर समान रूप से प्रभावी बनाती है।


व्यंग्य साहित्य की दिशा, दशा और भविष्य की चर्चा के बीच सतीश चंद्र श्रीवास्तव का यह संग्रह यह आश्वस्ति देता है कि संवेदनशील, अनुभव-संपन्न और शिल्प-सचेत रचनाकार की उपस्थिति में हिन्दी व्यंग्य न केवल जीवित है, वरन् अपने समय का साक्षी और समीक्षक दोनों बना हुआ है। यह पुस्तक उनका द्वितीय व्यंग्य-संग्रह है, जो प्रथम संग्रह ‘मतलब अपना साध रे बंदे’ से दो कदम आगे का प्रस्थान है।


विश्वास है, ‘भरा नहीं जो भाव से…’ पाठक को हँसी भी देगा और हँसी के तुरंत बाद एक मार्मिक, अनिवार्य मौन भी—और यही किसी भी सच्चे व्यंग्य की सबसे बड़ी सफलता है।


मैं इस संग्रह को पाठकों के सकारात्मक प्रतिसाद की हार्दिक कामना करता हूँ।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

वरिष्ठ व्यंग्यकार एवं समालोचक

साहित्य संपादक, ‘ई-अभिव्यक्ति’

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी सम्मानित

मिनाल रेजिडेंसी, भोपाल

इन दिनों न्यूयॉर्क में

readerswriteback@gmail.com

Wednesday, 11 February 2026

कहानी मन का भूगोल

 कहानी 

मन का भूगोल 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


नीलगीरि की धुंधली पहाड़ियों के बीच बसे 'सोनपुर' गाँव में जब मिस्टर ग्रजबेक अपनी नौ साल की बेटी रोजी के साथ आए, तो ग्रामीणों के लिए वे किसी दूसरी दुनिया के प्राणी थे। ग्रजबेक साहब यहाँ शांति और प्रेम का संदेश फैलाने आए थे, लेकिन गाँव वालों के लिए उनकी भाषा, ऊँचा कद , आंखों का नीला रंग , और वेशभूषा एक ऐसी दीवार थी , जिसे पार करना आसान न था। ग्रामीण उन्हें सम्मान से देखते, पर एक दूरी बनाए रखते थे।

लेकिन इस दीवार को तोड़ा रोजी ने ।

 रोजी, जो किसी उन्मुक्त उड़ती परी सी चंचल थी। जहाँ गाँव की मुनिया, लाली और चंपा अपने नन्हे हाथों से छोटी-छोटी साड़ियाँ सँभालती हुई पगडंडियों पर चलती थीं, वहीं रोजी अपने फूले हुए रंग-बिरंगे फ्रॉक और सुनहरी जुल्फों के साथ किसी सपने जैसी लगती थी। शुरू में गाँव की बच्चियाँ उसे दूर से ही कौतुक भरी नज़रों से देखतीं। वे फ्रॉक के घेरे को देखतीं और रोजी उनकी साड़ी के करीने को, पर शब्दों की कमी और संकोच के कारण दोनों पक्ष मौन रहते, केवल आँखें और मुस्कान ही बातें करती थीं।

एक सुनहरी दोपहर, जब सूरज की किरणें ऊँचे देवदार के पेड़ों से छनकर मैदान में आ रही थीं, सन्नाटे को रोजी की फुटबॉल की 'टप-टप' ने तोड़ दिया। रोजी अकेले ही मैदान में गेंद के साथ जूझ रही थी। झाड़ियों के पीछे छिपी मुनिया और उसकी सहेलियों की आँखों में गेंद को छूने की तीव्र ललक थी। रोजी ने यह भाँप लिया। उसने एक शरारती मुस्कान के साथ गेंद को ज़ोर से मुनिया की तरफ लुढ़का दिया।

पलों में ही सारा संकोच धुआं हो गया। मुनिया ने अपनी सूती साड़ी का पल्ला कमर में मजबूती से खोंसा और नंगे पैर ही गेंद पर एक ज़ोरदार किक मारी। खेल शुरू हो चुका था। अब वहाँ न कोई विदेशी था, न कोई देहाती। धूल में सनी मुनिया की साड़ी और पसीने से भीगा रोजी का कीमती फ्रॉक, दोनों एक ही मिट्टी के रंग में रंग चुके थे। गिरना, संभलना, एक-दूसरे को हाथ पकड़कर उठाना और गोल होने पर साथ में ठहाके लगाना । इस शोर में वह भाषा सुनाई दे रही थी जो सदियों पुरानी है और जिसे सीखने के लिए किसी किताब की ज़रूरत नहीं होती।

मिस्टर ग्रजबेक दूर खड़े यह दृश्य देख रहे थे। उनकी आँखों में नमी और होंठों पर एक गहरी संतुष्टि थी। उन्हें अहसास हुआ कि जो संदेश वे उपदेशों से देना चाहते थे, उनकी बेटी ने उसे एक खेल में साकार कर दिया था। शाम ढलते-ढलते पहाड़ियों पर गोधूलि की लालिमा छा गई। रोजी और गाँव की बच्चियाँ एक पत्थर पर साथ बैठी थीं। रोजी ने मुनिया के बालों में एक जंगली फूल टाँक दिया और मुनिया ने अपनी पोटली से भुना हुआ मक्का निकाल कर बड़े प्यार से रोजी के मुँह में डाल दिया।

रोजी के लिए वह पॉपकॉर्न था ।

पहाड़ की ठंडी हवा में एक शाश्वत सत्य तैर रहा था कि इन्सान की आत्मा का कोई अलग भूगोल नहीं होता। लिबास और भाषा की परतें उतरते ही नीचे जो हृदय मिलता है, वह सबके साथ मिलकर धड़कना चाहता है। 


हम ऊपर से चाहे कितने ही भिन्न क्यों न दिखें, प्रेम और अपनत्व की भूख हमें एक ही सूत्र में पिरोए रखती है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव

Monday, 2 February 2026

कहानी बर्फ में धूप

 कहानी

 बर्फ में धूप

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


डॉक्टर राजिंदर कुमार अपने टोरंटो स्थित अपार्टमेंट की खिड़की से बाहर देख रहे थे। कनाडा की सफेद, चुभती ठंड शीशे के पार दुनिया को जमा देना चाहती थी। सब कुछ बर्फ़ से ढका था। गाड़ियाँ, पेड़, सड़क, दिख रहे थे तो बर्फ पर कदमों के निशान। यह एकांगी, निस्तब्ध सफेद सुंदरता थी, जिसमें उनकी आत्मा की गूँज खो जाती थी। अंदर, हीटर की समान गरमाहट थी, सरकारी पेंशन की नियमितता थी, स्वास्थ्य सेवाओं का भरोसा भी था , एक आत्मनिर्भर, पूर्ण दुनिया, जो अचानक बहुत खोखली लगने लगी थी।


उनकी नज़र सोफे के पास टंगे एक फोटो फ्रेम पर टिक गई। पंजाब के अपने गाँव 'चमकपुर' की एक पुरानी तस्वीर। गर्मी की दोपहर, नहर का पानी चमक रहा है, खेतों में हरियाली लहरा रही है, और दूर, गुरुद्वारे का निशान साहब, चमक रहा है। यह वह गाँव था जिसे उन्होंने पचास साल पहले, डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ आने के बाद छोड़ा था। फिर संघर्ष, फिर सपना, बेहतर जीवन, बेहतर कमाई। राकेश कौर उनके साथ थीं, उनका प्यार , उनका सहारा था। कनाडा आने का फैसला साथ में किया था ,नए सिरे से शुरुआत करने का जोश। राकेश ने ही इस अपार्टमेंट को घर बनाया था, पंजाबी मसालों की खुशबू से, गुरबाणी के शब्दों से, उनकी मंजिल को गर्मजोशी से सराबोर कर दिया था।


पर पाँच साल पहले, राकेश चली गईं , एकाएक, दिल का दौरा पड़ने से। उनके साथ वह धूप भी चली गई जो कनाडा की सबसे अधिक ठंडक में भी धूप से ज़्यादा गर्म प्यार का अहसास थी। राजिंदर अकेले रह गए। इसी अकेलेपन ने, रिटायरमेंट के बाद, उन्हें फिर से जड़ों की तलाश में चमकपुर ने बुला लिया।


लेकिन गाँव बदल चुका था। नहर अब कंक्रीट की नाली थी। पुराने पेड़ कट चुके थे। चौपाल की जगह एक 'यूथ क्लब' ने ले ली थी, जहाँ लड़के मोबाइल पर बिजी रहते। रिश्तेदार मिले, पर उनकी बातचीत का केंद्र बिंदु अक्सर यही होता"कनाडा में तो बहुत पैसा है न?", "हमारे बेटे के लिए वीजा स्पॉन्सर कर दो।" उस 'अपनेपन' की तलाश, जो राजिंदर की यादों में कैद था, वह हवा हो चुकी थी।


एक दिन, स्थानीय 'शब्द साधना साहित्य परिषद' के सचिव, श्री ओमप्रकाश शर्मा, उनसे मिले। बड़े आदर से, फूलमाला पहनाकर।

ओमप्रकाश ने कहा "डॉक्टर साहब! आप तो विदेश से आए हुए साहित्य के महान पारखी हैं! हम आपके नाम पर एक 'राजिंदर कुमार साहित्य रत्न सम्मान' शुरू करना चाहते हैं। देश की सेवा का यह पुनीत अवसर है।"

राजिंदर ने खुश होकर कहा , "ज़रूर, यह तो बहुत अच्छी बात है। मैं कैसे मदद कर सकता हूँ?"

ओमप्रकाश अपनी योजना सफल समझ मुस्कुराते हुए बोले "बस एक छोटी सी संस्थागत फीस है... तीन लाख रुपये। हमारे पास आपका चेक स्वीकार करने की सुविधा भी है।"


राजिंदर का दिल बिना कहे एक पल में काफी कुछ समझ गया । यह पहला झटका नहीं था। कई 'संस्थाओं' के फोन आ चुके थे। उनके 'विदेशी' होने ने, उनकी साहित्यिक रुचि को एक 'लेन-देन' में बदल दिया था। उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। लेकिन फोन आते रहे। कभी सुबह, कभी रात। एक तरफ पंजाब की वह याद, दूसरी तरफ इस तरह की मांगों से उपजी विरक्ति।


और फिर वह दिन आया। भारत में सुबह के दस बजे थे, धूप फैलने का वक्त। पर टोरंटो में अँधेरी, बर्फ़ीली रात के दो बजे थे। फोन की कर्कश घंटी ने नींद तोड़ दी।

अनजान आवाज़, "नमस्ते डॉक्टर साहब, मैं 'काव्य भारती' से बोल रहा हूँ। आपको 'वैश्विक पंजाबी रत्न' से सम्मानित किया जाएगा। बस कुछ प्रबंध खर्च..."

राजिंदर ने फोन काट दिया। उनकी नींद उचट गई थी। वह खिड़की के पास गए। बाहर, एक निर्मम, खामोश बर्फ़बारी जारी थी। उन्हें लगा जैसे वह खुद दो टुकड़ों में बँट गए हैं। एक टुकड़ा यहाँ, इस बर्फीली नियमितता में फँसा हुआ तो दूसरा टुकड़ा, उस चमकपुर में भटक रहा है जो अब है पर बचा ही नहीं। वह न तो यहाँ के थे, न वहाँ के। एक 'विभक्ति' उनके भीतर घर कर गई।


कई रातों की मानसिक जद्दोजहद के बाद, एक सुबह, जब पहली किरण बर्फ पर पड़ी और सब कुछ हीरे की तरह जगमगा उठा, तो एक शांति उन पर छा गई। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। यह दृश्य उनका था। यह ठंड उन्होंने झेली थी। यहाँ उन्होंने दाँत दर्द से तड़पते मरीजों को राहत दी थी। यहीं राकेश उनके साथ थीं। "प्रारब्ध," उन्होंने धीरे से कहा, "यही हमारी कर्मभूमि बना दी गई। यहाँ हमारा दाना-पानी रहा। अब यही घर है।"


उसी दिन उन्होंने अपनी वसीयत लिखी। कोई भव्यता नहीं। सादगी से। इलेक्ट्रिक भट्टी में शवदाह। और फिर... उनकी चुटकी भर राख नियाग्रा प्रपात के उफनते, गर्जते जल में प्रवाहित कर दी जाए। वह शक्तिशाली, अनंत प्रवाह, जो सब कुछ अपने में समा लेता है । उनकी जीवन यात्रा, उनकी यादें, उनका पंजाब और उनका कनाडा, सब कुछ एक हो जाए।


और एक अंतिम निर्देश, टोरंटो के ही एक गुरुद्वारे में, 'डॉ. राजिंदर कुमार एंड राकेश कौर साहित्य संवाद' नाम से एक वार्षिक कोष स्थापित किया जाए। बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी फीस के, सिर्फ़ शब्दों के लिए, विश्व हिंदी साहित्य के लिए।


डॉक्टर राजिंदर कुमार ने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखा। बर्फ अब भी गिर रही थी। पर अब वह उसकी खामोशी में एक संगीत सुन पा रहे थे। यह उनकी ख़ामोशी थी। यह उनका घर था। और इस बार, देर रात फोन बजने से उनकी नींद उचटने वाली नहीं थी , वे वसीयत कर चुके थे।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

लघु कथा रियल सांता

 लघु कथा 

रियल सांता 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


रात के ठंड भरे अंधेरे में कॉल बेल की आवाज आई। दरवाजा खोला तो सामने एक दुबला सा लड़का खड़ा था। पीठ पर थैला, चेहरे पर पसीना और आंखों में एक जल्दी साफ नजर आ रही थी। उसने पैकेट आगे बढ़ाया और बोला सर आपका ऑर्डर। पैकेट लेकर मैंने दरवाजा बंद कर लिया। भीतर मेज पर रख पैकेट खोला , पिज्जा की भाप मेरे चेहरे से टकराई । टीवी पर चल रही किसी क्रिसमस फिल्म में सांता बच्चों के लिए उपहार रख रहा था। बच्चे सो रहे थे। चिमनी के नीचे सांता के लिए दूध और चाकलेट कटोरी में सजे थे।


मैंने सोचा अभी अभी जो लड़का गया वह ही तो असली सांता है। उसके थैले में हर किसी के लिए खुशी है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसके आने का इंतजार कोई कविता में नहीं लिखता और उसके लिए कोई कटोरी सजाकर दूध और टोस्ट नहीं रखता।


मैं बाहर लपका , उसकी बाइक सड़क के मोड़ पर ओझल हो चुकी थी। मेरे हाथ में गरम पिज्जा था और मन में एक ठंडी सी टीस। क्या कभी हमने इन सच्चे सांता के लिए कोई रिटर्न गिफ्ट रखा है। क्या कभी उनके लिए भी दूध और चाकलेट सजाए हैं। या हम उन्हें सिर्फ डिलीवरी नोटिफिकेशन समझकर स्वाइप कर देते हैं।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

श्रद्धासुमन : नमन ज्ञानरंजन

 श्रद्धासुमन : नमन ज्ञानरंजन 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से 


ज्ञानरंजन हिंदी कहानी के उस युग के प्रवर्तक स्वर हैं जिन्होंने “आम आदमी” को कथा का केंद्र बनाया। उन्होंने हमारे भीतर बसने वाले मौन, असहमति और पीढ़ियों के फासले को इतने स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त किया कि उनकी कहानियाँ समय की डायरी बन गईं। वे दैहिक जीवन से दुनिया छोड़ गए हैं। सबको किसी न किसी दिन जाना ही होता है, किन्तु वे अपने शब्द संवाद में और हमारे संस्मरणों में चिर जीवी बने रहेंगे। 

उन्होंने पहल में मुझे स्थान दिया था, उनके निवास पर जाकर उनसे मिलने के अवसर आए , उनकी सादगी के चित्र सजीव हो रहे हैं। रेलवे प्लेटफार्म पर, किसी समारोह में अनायास कई बार मिले , चरण स्पर्श करने का यत्न करते ही कंधे पकड़ लेते थे।

नमन ज्ञानरंजन 🙏

उनकी लेखनी में कोई कृत्रिमता नहीं थी । उनकी सोच जीवन के छोटे क्षणों में बड़े अर्थ खोजती थी। उनकी कहानी ‘पिता’ याद आ रही है। ऐसी कहानियाँ हमें अपने घर के भीतर झाँकने को विवश करती हैं । उस कमरे तक जहाँ पिता और पुत्र हृदय से नहीं, संकोच से बात करते हैं। समाज जैसे-जैसे ‘तरक्की’ की दौड़ में बढ़ा, पिता का अनुभव ‘अप्रासंगिक’ माना जाने लगा है । यही त्रासदी उनकी कथा पिता का महत्त्वपूर्ण बिंदु है।  

ज्ञानरंजन के निधन के साथ हिंदी कथा साहित्य ने अपना एक साक्षी खो दिया। किंतु उनकी कहानियों का असर जीवित रहने वाला है। वे हमें यह याद दिलाती हैं कि तकनीक या आधुनिकता से नहीं, मनुष्यता से ही पीढ़ियाँ जुड़ी रहती हैं।  

००००

नीचे मैं उनकी कहानी पिता का जो कथानक स्मरण है दे रहा हूं । 

 उसी भाव को पिता पुत्र की वर्तमान पीढ़ी पर अधिरोपित कर श्रद्धांजलि स्वरूप एक नई कहानी लिख कर उन्हें समर्पित करता हूँ।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


ज्ञानरंजन की कहानी — “पिता” का कथा सार


कहानी ‘पिता’ में एक वृद्ध व्यक्ति अपने बेटे के पास शहर आता है। बेटा अब एक आधुनिक, व्यवस्थित, व्यस्त जीवन में है। वह पिता का आदर करता है, पर उस आदर में वह आत्मीयता नहीं नियम और दूरी है।  

पिता छोटे कस्बे के, सहज और भावुक व्यक्ति हैं। शहर की ठंडी दीवारों में उन्हें अपनेपन की जगह नहीं मिलती। टीवी, फ़ोन, ऑफिस की बातें और ‘मॉडर्न’ रहन-सहन के बीच पिता धीरे धीरे खुद को असहज महसूस करने लगते हैं। कहीं कुछ कहना चाहते हैं, पर शब्द नहीं ढूँढ पाते।  

रात को वे बेटे को सोते देखते हैं और सोचते हैं , “यह अब मेरे बस का नहीं रहा।”  

यह वाक्य पूरी कहानी का सार है। “पिता” केवल एक निजी संबंध की कहानी नहीं, बल्कि पीढ़ी के सोच परिवर्तन की कहानी है।  

यह उस मौन पीढ़ी की कथा है जो समझ तो सब जाती है, पर कह नहीं पाती। और उस नई पीढ़ी की भी, जो सुन तो लेती है, पर समझना भूल गई है।  

कहानी का वातावरण अत्यंत सूक्ष्म है । बेटे की व्यस्तता, पिता की निस्तब्धता, घर की ठंडी हवा, और उनके भीतर का अकेलापन । सब मिलकर एक अदृश्य संवाद रचते हैं। 

पुत्र पिता को नई सुविधाओं से आराम पहुंचाना चाहता है, पर आत्म संतोषी पिता को वह पसंद नहीं। 

एक दिन पुत्र खिड़की से देखता है कि पिता खटिया बाहर निकाल कर गर्मी से बचाव के लिए उस पर पानी छिड़क रहे हैं, किन्तु वह चाह कर भी कुछ कर नहीं सकता ।

ज्ञानरंजन का यह शिल्प आज भी पीढ़ीगत विमर्श का जीवंत प्रतीक है।  

०००००


भाव रूपांतरित कथा 


“वाया वीडियो कॉल”

(ज्ञानरंजन की कहानी “पिता” का समकालीन पुनराख्यान)


लेखक : विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से 


हवाई जहाज की खिड़की से नीचे झिलमिलाती बर्फ़ दिख रही थी। बूढ़े पिता ने कौतूहल से उस परतदार सफेदी को देखा । जैसे किसी पुराने समय की चिट्ठियाँ अब बर्फ़ बनकर फैल गई हों।  

वह पहली बार बेटे के देश जा रहे थे,न्यूयॉर्क। बेटे ने महीनों पहले कहा था, “आपको देखे ज़माना हो गया, अब आ जाइए कुछ दिनों को।” टिकिट भेज रहा हूं।


पिता की पीढ़ी के पास अनुभव के समय का सरोवर था । धीरे बहता, विचार करता, जमा होता। बेटे की पीढ़ी के पास समय नहीं, बस “शेड्यूल” था । हर मुलाकात मोबाइल पर ‘कैलेंडर एंट्री’ में दर्ज।  


एयरपोर्ट से घर तक बेटे ने गाड़ी में स्पॉटिफ़ाई पर कोई अंग्रेज़ी गाना लगाया, बीच-बीच में मोबाइल स्क्रीन पर नज़र डालता रहा। पिता खिड़की से बाहर देखते रहे। वही दृश्य जो उन्होंने कई बार कल्पना में देखे थे, उँची इमारतें, चौड़ी सड़कों का स्वप्निल अनुशासन। पर भीतर एक हल्की उदासी उठ रही थी, जिस पर वे विजय प्राप्त करने का भरपूर प्रयास करते , खिड़की से देखते बेटे से पूछते पर बेटे का मोबाइल नोटिफिकेशन, चौराहे के सिग्नल उसे उनसे उन्मुक्त बात करने से रोक देते । 


घर पहुँचे तो बेटे ने रोबोटिक आवाज़ से कहा, “Alexa, लाइट ऑन करो।”  

पिता मुस्कुरा दिए, यह नई दुनिया थी, जहाँ चाय तक आवाज़ से बनती थी और रिश्ते इमोजी से जताए जाते थे।  


रात को, जब बेटा लैपटॉप पर देर तक काम करता रहा, पिता ने चुपचाप खिड़की से बाहर देखा , बर्फ़ गिर रही थी।  

उन्हें याद आया, कैसे कभी गाँव में वह बेटे के लिए स्वयं घोडा बन जाते थे, और वह दौड़ में सबसे आगे निकलने का सपना देखा करता था। अब वही बेटा ऐसी दौड़ में था जिसका अंत किसी को नहीं पता।  


अगली सुबह कॉफी के साथ पिता बोले, 

“तुम्हें कभी अपने बचपन का घर याद आता है?”  

बेटे ने हँसकर कहा, “डैड, अब तो सब कुछ क्लाउड में है, लगता है यादें भी।”  

पिता ने मुस्कुराहट में अपनी भावनाएं छिपा ली।  

बेटे की पत्नी और बच्चे कोई 6 घंटे की ड्राइव पर रहते हैं, शाम को वीडियो कॉल पर बेटा अपनी पत्नी और बच्चों को दिखा रहा था “ भारत से दादाजी आए हैं।”  

पिता स्क्रीन पर झुके बच्चों को देख मुस्कुराए। उन्हें लगा, अब हर रिश्ता “वाया वीडियो कॉल” है निकट मगर असम्पृक्त।  


रात में बेटे ने पास आकर धीमे से उनका हाथ दबाते हुए कहा, “डैड, मुझे पता है आप सोचते हैं मैं दूर चला गया हूँ।”  

पिता ने उसकी ओर देखा बोले “नहीं बेटा! 

पर जो वे नहीं बोले वह था "दूरी केवल मीलों से नहीं, संवाद और मौन से भी मापी जाती है।”  

कुछ देर बाद धीरे से बोले, “देखो, बाहर अब भी बर्फ़ गिर रही है, पर कोई आवाज़ नहीं होती।”  


बेटा चुप था। दोनों ने खिड़की से बाहर की ओर देखा।  

शायद वही मौन अब दोनों पीढ़ियों के बीच था , सफेद, सुंदर और बर्फ़ सा ठंडा।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

कहानी विदाउट पेपर्स

 कहानी 

  विदाउट पेपर्स


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


लॉस एंजेल्स में उस सुबह की धूप, कार्लोस के छोटे से अपार्टमेंट के फर्श पर एक सुनहरी चौखट बना रही थी, मानो प्रकाश स्वयं उसके जीवन की स्थिरता की गवाही देने की असफल कोशिश कर रहा हो। वह अपनी मेज़ पर झुका, एक नए आर्किटेक्चरल ड्राफ्ट की मीनार को अंतिम स्पर्श दे रहा था, जब दरवाज़े पर हुई उस दस्तक ने उसके समूचे अस्तित्व की नींव हिला दी। "ICE, हियर, दरवाज़ा खोलो!" यह आवाज़ उसके सुरक्षित संसार में किसी विस्फोट की तरह गूँजी। बाहर खड़े वर्दी के साथ गन धारी अधिकारियों की पथराई निगाहें और ऑफिसर मिलर के हाथ में थमे वे ठंडे काग़ज़ कार्लोस के बीस साल के 'अमेरिकी जीवन' के लिए मृत्युदंड की तरह लग रहे थे।

उस ठिठके हुए पल में, कार्लोस का मन समय की परतों को चीरता हुआ बीस साल पीछे चला गया। उसे वह मकई के रंग का घर याद आया जहाँ खुशबू का एक अनोखा संगम हुआ करता था, उसकी माँ एलेना द्वारा फिलीपीन लुल्लाबी गाते हुए बनाया गया सोंधा 'पैन्सिट' और पिता एंटोनियो के मेक्सिकन 'कोरिदोस' की धुन पर लपेटे गए 'तमालेस'। दो अलग महाद्वीपों के सपने लॉस एंजेल्स की इसी धूप में मिलकर एक हुए थे। कार्लोस यहीं जन्मा, यहीं पला, पर बारह साल की उम्र की एक बरसाती रात ने सब उजाड़ दिया। एक कार दुर्घटना ने न केवल उसके माता-पिता को छीन लिया, बल्कि एक अनाथ किशोर की पहचान को उन सरकारी फाइलों के ढेर में दफन कर दिया, जहाँ भावनाएं दम तोड़ देती हैं और सिर्फ 'पेपर स्टेटस' जीवित रहता है। 


वे दिन थे जब अमेरिका स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी के प्रिंसिपल्स पर खुले दिल से सबको अपना लेता था। तब न ही किसी सरकारी अधिकारी ने उसकी कोई मदद किसी पेपर वर्क में की , और न ही वर्षों उससे कभी कोई पूछताछ हुई । वह विदाउट पेपर्स ही ससम्मान बना रहा है।

सुबह स्कूल, दोपहर पुस्तकालय और शाम को पिता के पुराने रेस्तराँ में बर्तन धोते हुए उसने अपनी लकीरें खुद खींचीं। उसने आर्किटेक्चर की पढ़ाई की, अपनी प्रतिभा से ऊँची इमारतों के नक्शे बनाए और आज वह डाउनटाउन एलए की एक प्रतिष्ठित फर्म में अच्छा इंप्लॉई था। वह हर साल ईमानदारी से टैक्स भरता था, उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी था। वह इस शहर की हर गली, हर मोड़ और हर बदलते मौसम का गवाह था। 


अफसोस, ICE मतलब यू.एस. इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट के कानून की आँखें अचानक जाग गई, अंधी आँखों के लिए कार्लोस सिर्फ एक 'अनडॉक्यूमेंटेड' केस था। एक ऐसा इंसान जिसे काग़ज़ों की कमी ने उसकी अपनी ही मिट्टी में पराया बना दिया था।


डिटेंशन सेंटर की सलाखों के पीछे बैठा कार्लोस अपनी आत्मा पर खिंचती लकीरों को महसूस कर रहा था। उसे बचपन की वह बात याद आई जब उसने अपनी मिश्रित पहचान पर सवाल किया था और पिता ने कहा था, "तुम फिलीपीनी भी हो, मेक्सिकन भी हो और अमेरिकन भी।" पर आज उसी त्रयी का एक हिस्सा उसे निर्दयता से नकार रहा था। 

अदालत का मंजर किसी डरावने तमाशे जैसा था। उसके वकील की दलीलें, प्रोफेसर जेम्सन की गवाही और उसकी मित्र माया की सिसकियाँ , सब उस जज की बर्फीली खामोशी के सामने निरर्थक थीं। 

"मैं सहानुभूति रखता हूँ," "पर कानून काग़ज़ों से चलता है, और आपके पास कोई कागजी दस्तावेज़ नहीं हैं जो आपको इस देश के नागरिक होने का हकदार बना सकें।"जज के शब्दों में कानून की रोबोटिक गूँज थी।

आई सी ई कानूनन गलत नहीं थी , जज साहब सही थे । सही है कि कार्लोस इस मिट्टी में रचा बसा बढ़ा था , लेकिन वह गलत था , उसके पास कागजी नागरिकता नहीं थी । 

विदाउट पेपर्स कार्लोस ने विदाई के उन तीस दिनों में अपने जीवन को एक छोटे से सूटकेस में समेट लिया। अपने अपार्टमेंट की हर चीज़ को अलविदा कहते हुए उसे लगा जैसे वह अपने अतीत को दफना रहा हो। वह पुराना गिटार जिस पर पिता ने उसे पहला सुर सिखाया था, और माँ का लाया वह रेशमी पारंपरिक कपड़ा, ये ही अब उसकी कुल यादगार संपत्ति थे। हवाईअड्डे की खिड़की से उसने आखिरी बार उस स्काईलाइन को देखा जिसे उसने कभी अपनी पहली स्केचबुक में उकेरा था। उसने फिलीपींस जाने का फैसला किया था, शायद माँ की जन्मभूमि उसे कोई कोना दे दे, पर उसका दिल चिल्लाकर कह रहा था कि उसकी मातृभूमि तो इसी हवा और इन्हीं सड़कों में बसी थी।

जहाज के टेक-ऑफ करते ही कार्लोस ने अपनी स्केचबुक खोली। अंतिम पन्ने पर उसने एक ऐसी इमारत का खाका खींचा था जिसकी कोई सरहद नहीं थी "संग्रहालय वैश्विक हृदय का।" नीचे उसने कांपते हाथों से लिखा। 


 विवेक रंजन श्रीवास्तव

मुट्ठी बंद ख्वाहिशें .. कहानी

 वैश्विक कहानी 


मुट्ठी बंद ख्वाहिशें

विवेक रंजन श्रीवास्तव 

इन दिनों न्यूयार्क में 


लंदन की ठंडी, कोहरे से लिपटी सुबह थी। अनीता अपने स्टूडियो अपार्टमेंट की खिड़की से बाहर नीरस, धुँधली इमारतों को निहार रही थी। उसकी मुट्ठी बंद थी, और उसकी हथेली में एक छोटा-सा, कपड़े का मुलायम खरगोश का पंजा दबा हुआ था। 'रैबिट्स फुट' या 'क्रॉसफिश' कहलाने वाली यह चीज़, उसकी नानी द्वारा उसे दिया गया एक ताबीज था, जो कथित रूप से बदकिस्मती को दूर भगाता था। आज, दस साल बाद, अपने पहले सोलो आर्ट एक्जीबिशन के दिन, उसे इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत महसूस हो रही थी।


अनीता का सफर कोलकाता की तंग गलियों से शुरू हुआ था, जहाँ उसके पिता एक स्कूल टीचर थे और माँ एक साधारण गृहिणी। उनकी ज़िंदगी एक पूरी तरह प्रिडिक्टेबल रूटीन में बंधी हुई थी, लेकिन अनीता की ख्वाहिशें आकाश को छूने वाली थीं। वह चित्रकार बनना चाहती थी। एक ऐसी कलाकार, जिसके कैनवास पर भावनाओं के रंग दुनिया को दिखाई दें। लेकिन उस घर में, जहाँ 'सुरक्षित भविष्य' शब्द सबसे महत्वपूर्ण थे, कला एक शौक थी, करियर नहीं।


उसकी मुट्ठी में उस समय पहली बार एक ख्वाहिश ने जन्म लिया, जब उसने छिप-छिपकर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट्स में दाखिले के लिए फॉर्म भरा। स्वीकृति आई तो घर में एक भूचाल आ गया। "तुम्हारी उम्र हो गई है शादी की," उसकी माँ ने आँसू बहाते हुए कहा था। " फाइन आर्ट्स की ये सब बातें छोड़ो।" लेकिन अनीता अड़ी रही। उसकी मुट्ठी और भी कस गई। उसने न सिर्फ़ JNU में दाखिला लिया, बल्कि छात्रवृत्ति जीतकर लंदन के प्रतिष्ठित स्लेड स्कूल ऑफ फाइन आर्ट में पोस्ट-ग्रेजुएशन के लिए जगह बना ली।


लंदन आना एक और संघर्ष था। यहाँ की ठंडक सिर्फ़ मौसम की नहीं थी, बल्कि उसके परिवेश के लोगों के दिलों में भी उसे दिखती थी। उसे अपनी पहचान के सवालों से जूझना पड़ा। वह न तो पूरी तरह भारतीय रह गई थी, न ही ब्रिटिश बन पाई थी। उसकी कला में यह द्वंद्व साफ़ झलकता था। उसके कैनवास पर मधुबनी की लकीरें पिकासो के क्यूबिज़्म से टकराती थीं। कुछ प्रोफेसर उसे 'एक्जॉटिक' कहते, तो कुछ 'अनरेज़ोल्ड'। उसकी मुट्ठी, उसकी असुरक्षा और जिद का प्रतीक, मुट्ठी हमेशा बंद रहती।


एक दिन, एक आर्ट क्रिटिक, एडवर्ड, उसके स्टूडियो में उसे ढूंढता हुआ आया। बूढ़ा, लेकिन नज़रों में एक अद्भुत चमक। उसने अनीता के कैनवास देखे, जहाँ रंगों के ज़रिए एक अधूरेपन, एक तलाश का भाव था।

"तुम्हारी कला में एक दर्द है," एडवर्ड ने कहा, "लेकिन वह दर्द तुम्हारा अपना खुद का नहीं लगता। लगता है जैसे तुम अपने कैनवस पर दूसरों के दर्द की एकेडमिक नकल कर रही हो।"

अनीता चिढ़ गई। "आप क्या जानते हैं मेरे दर्द के बारे में?"

एडवर्ड ने मुस्कुराते हुए कहा, "शायद नहीं। लेकिन इतना जानता हूँ कि असली कला तब जन्म लेती है, जब तुम अपनी मुट्ठी खोल देते हो। डर लगता है कि सब कुछ छूट जाएगा, लेकिन उसी में मुक्ति है।"


यह बात अनीता के दिल में उतर गई। उसने अपने कैनवास के सामने बैठकर, पहली बार अपने दिल की सारी उलझनें, सारे डर, सारी ख्वाहिशें उड़ेल दीं। वह दिन उसकी कला का टर्निंग पॉइंट था।


और आज, उसकी सोलो एक्जीबिशन का दिन था। गैलरी में उसके कैनवास लगे थे, जो अब सिर्फ़ तकनीक का नमूना नहीं, बल्कि एक कलाकार की वैश्विक नजरिए वाली अभिव्यक्ति का आईना थे। एक पेंटिंग में एक लड़की की आकृति थी, जिसकी मुट्ठी बंद थी, और उसकी हथेली से रंगों की एक चमकदार लकीर निकल कर अनंत में विलीन हो रही थी। दूसरे कैनवास पर कोलकाता की गलियाँ और लंदन की सड़कें एक-दूसरे में समा रही थीं ।


भीड़ उमड़ पड़ी थी। आलोचक, कलाप्रेमी, संग्रहकर्ता। सब उसकी कला की सराहना कर रहे थे। तभी उसने देखा, दरवाज़े पर दो परिचित चेहरे खड़े हैं, उसके माता-पिता, हैरान और गर्व से भरे हुए। उसकी माँ की आँखों में आँसू थे। अनीता की साँस रुक सी गई। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि वे आएंगे।


उसकी माँ ने उसे गले लगाया और फुसफुसाया, "माफ़ करना बेटा, हम तुम्हारे सपनों को समझ नहीं पाए। तुमने जो किया, वह बहुत हिम्मत का काम है।"

उसके पिता ने बिना कुछ कहे, उसके सिर पर हाथ रख दिया। उनकी आशीष भरी चुप्पी में हज़ार शब्द छिपे थे।


अनीता ने महसूस किया कि उसकी मुट्ठी, जो सालों से ख्वाहिशों, डर और जिद से बंधी हुई थी, अब धीरे-धीरे खुल रही थी। उसने अपनी हथेली देखी। खरगोश का पंजा अब भी वहाँ था, लेकिन अब वह उसे कसकर नहीं पकड़े थी , बल्कि हल्के से थामे हुए थी।


एडवर्ड ने आकर कहा, "देखा, मैंने कहा था न? मुट्ठी खोलो, तो दुनिया तुम्हारी हथेली में आ जाती है।"


उस रात, जब गैलरी खाली हो गई, अनीता अकेली खड़ी थी। उसने अपनी एक पेंटिंग देखी, जहाँ उसकी बंद मुट्ठी से निकलती रंगीन लकीर अब एक विशाल, चमकते सूरज में तब्दील हो रही थी। उसका कैनवास दुनियां को समेटने को आतुर था । इंडो यूरोपियन फ्यूजन के उसके चित्र उसकी मौलिकता थे ।


उसे एहसास हुआ कि ख्वाहिशें कभी खत्म नहीं होतीं। वह अब भी और बहुत कुछ पाना चाहती थी। लेकिन अब वह डरती नहीं थी। क्योंकि उसे पता चल गया था कि ख्वाहिशों की असली ताकत उन्हें मुट्ठी में बंद करके नहीं, बल्कि उन्हें आज़ाद करके, हकीकत में बदलने में है।


मुट्ठी बंद ख्वाहिशें अब खुली हथेली के सपने बन चुकी थीं। और यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

+91 7000375798

लाकडाउन में डाउनलोड हुए रिश्ते.. कहानी

 

कहानी

लाकडाउन में डाउनलोड हुए रिश्ते 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


   मैरीलैंड अमेरिका में , छोटी पर सजीव टाउनशिप से ऑपरेट होती थी वह अमेरिकन सॉफ्टवेयर कंपनी जहां थोड़ा सा स्टाफ था, पर दुनियां भर की शिपिंग कंपनियों के सर्वर वहां से सर्व किए जाते थे। कम ही भारतीय थे इस कंपनी में पर जो थे बड़े जिम्मेदार पदों पर थे । अखिलेश और प्रमिला दोनों ही भारतीय थे , इसलिए एक दूसरे को जानते थे। अनायास लॉकडाउन की सुनसान शामों में जब पूरी दुनिया थम सी गई थी, अखिलेश और प्रमिला के बीच एक नई दुनिया बसने लगी थी। शुरुआत तो महज विदेश में बसे दो भारतीय , सह कर्मियों की सहमति से सहूलियत भरा साथ था - एक ही भाषा बोलने वाले, एक जैसा शाकाहारी खाना पसंद करने वाले। पर धीरे-धीरे वह छोटा सा अपार्टमेंट उनकी दुनिया बनता चला गया।


अखिलेश जब पहली बार प्रमिला के हाथ का बना राजमा चावल खा रहा था, तो उसकी आँखों में घर के स्वाद की झलक चमक आई थी - "सालों हो गए माँ के हाथ का स्वाद भूले हुए।" प्रमिला ने मुस्कुराकर कहा था , "खाना तो बस बहाना है, असली भूख तो घर की यादों की होती है।"


वे दोनों शारीरिक रूप से एकदम अलग थे अखिलेश सामान्य देह यष्टी का, छरहरा , युवक , प्रमिला थोड़ी भारी-भरकम, मजबूत। पर एक अपार्टमेंट में बंद जैसे-जैसे दिन बीते, उन्होंने पाया कि शरीर के बाहरी खोल से कहीं गहरे, वे दोनों एक ही तरह के थे । दोनों के भीतर एक अधूरापन था जो विदेश की इस निर्जन भूमि में और गहरा हो गया था।


एक शाम जब अखिलेश बुखार से तप रहा था, प्रमिला ने पूरी रात उसके सिर पर पानी की पट्टी रखी। 

कंपनी में काम ठप्प सा था , वर्क फ्राम होम, पर लगभग नो वर्क। दूसरे दिन जब प्रमिला की नौकरी जाने का अव्यक्त डर उसे सता रहा था, अखिलेश ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा "हम दोनों साथ हैं, कोई बात नहीं।"


फिर वह रात आई जब बारिश की फुहारें खिड़की से टकरा रही थीं और दोनों एक ही सोफे पर बैठे कोई बोल्ड अंग्रेजी फिल्म देख रहे थे। अचानक सब कुछ बदल गया। कोई योजना नहीं थी, कोई इरादा नहीं। बस दो अकेले दिल एक दूसरे की गर्माहट में सिमट गए। सुबह जब आँख खुली तो दोनों की आँखों में एक सवाल था , शर्म, डर, पर एक अजीब सी सुकून वाली शांति भी थी ।


अगले कुछ दिन अजीब से बीते। फिर एक रात रसोई में खड़े-खड़े अखिलेश ने कहा , "प्रमिला, मैं चाहता हूँ कि हमारा रिश्ता वैध हो। तुम्हारे बिना अब इस देश में मेरा कोई घर नहीं।"


शादी छोटी-सी हुई, बस चार लोग। पर जब वे वीडियो कॉल पर घर वालों से बात कर रहे थे, तो प्रमिला की माँ रोने लगी , "बेटी, तूने तो हमें बताया तक नहीं!" अखिलेश के पिता ने धैर्य से समझौता करते हुए आशीष देते हुए कहा "बेटा, वहाँ तो तुम दोनों ही एक दूसरे के परिवार हो।"


आज जब वे उस शहर के दूसरे छोर पर अपने छोटे से अपार्टमेंट में रहते हैं, तो प्रमिला अक्सर कहती है "वो लॉकडाउन हमारे लिए अभिशाप नहीं, वरदान बनकर आया था। उसने हमें सिखाया कि प्यार शरीर की बनावट नहीं, दिलों का मेल होता है।"


और अखिलेश मुस्कुराकर कहता है "और ये भी कि सबसे स्वादिष्ट खाना वो होता है जो दिल से बनाया जाए।" दोनों की हँसी कमरे में गूँज उठती है, जैसे उस कोरोना काल की उदासी को भी हरा देने का इरादा रखती हो।" लाकडाउन में डाउनलोड हुए रिश्ते में नए फूल खिल आए। 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

7000375798

ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी 

जे के रोड भोपाल 

462023

Sunday, 1 February 2026

अमेरिका में भारत

 अमेरिका में भारत 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


अमेरिका में भारत की उपस्थिति किसी एक घटना, स्मारक या एक प्रवासी समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समय के साथ निर्मित एक विस्तृत सांस्कृतिक, वैचारिक और सामाजिक परिदृश्य है। यह उपस्थिति कभी किसी उद्यान में स्थापित प्रतिमा के रूप में दिखाई देती है, कभी विश्वविद्यालय के सभागार में दिए गए व्याख्यानों में, कभी प्रयोगशालाओं में साझा शोध के रूप में और कभी किसी छोटे शहर के सांस्कृतिक केंद्र में बजते तबले या गूंजते भजन में।


न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के नॉर्थ लॉन गार्डन में स्थापित महात्मा गांधी का बस्ट इस उपस्थिति का एक सशक्त प्रतीक है। दिसंबर 2022 में भारत के विदेश मंत्री और संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा अनावरण किया गया यह बस्ट संयुक्त राष्ट्र परिसर में गांधी की पहली स्थायी प्रतिमा है। यह तथ्य विशेष ध्यान देने योग्य है कि गांधी स्वयं कभी अमेरिका नहीं आए, फिर भी भारत के बाहर उनकी सर्वाधिक प्रतिमाएं और स्मारक जिस देश में हैं, वह अमेरिका ही है। यह स्थिति किसी औपचारिक कूटनीतिक निर्णय से अधिक उस वैचारिक स्वीकृति का परिणाम है, जो अमेरिकी समाज ने गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को लेकर विकसित की है। अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन से लेकर शांति आंदोलनों में महात्मा गांधी के विचारों की छाया स्पष्ट देखी जा सकती है।


यदि अमेरिका और भारत के वैचारिक संबंधों की ऐतिहासिक शुरुआत को देखा जाए तो स्वामी विवेकानंद की 1893 की शिकागो यात्रा एक निर्णायक क्षण के रूप में सामने आती है। वर्ल्ड्स पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन्स में दिया गया उनका संबोधन केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि पश्चिमी दुनिया के लिए भारतीय दर्शन का औपचारिक परिचय था। धार्मिक सहिष्णुता, सार्वभौमिकता और मानव एकता पर आधारित उनका दृष्टिकोण अमेरिकी श्रोताओं के लिए नया भी था और आकर्षक भी। इसके बाद विवेकानंद ने अमेरिका के विभिन्न नगरों में प्रवास कर वेदांत दर्शन का प्रचार किया, शिष्यों को दीक्षा दी और संस्थागत रूप से वेदांत सोसाइटियों की नींव रखी। न्यूयॉर्क राज्य के थाउजेंड आइलैंड पार्क में उनकी साधना से जुड़ा स्मारक आज भी इस बात का प्रमाण है कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा ने अमेरिकी भूमि पर स्थायी जड़ें जमा ली हैं।


बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में प्रवासी भारतीय समुदाय ने अमेरिका में जिस तरह अपनी पहचान बनाई, उसने अमेरिका में भारत की छवि को एक नया आयाम दिया। आज अमेरिका में भारतीय मूल की आबादी पचास लाख से अधिक है और यह समुदाय शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, सूचना प्रौद्योगिकी, व्यापार और सार्वजनिक जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है। यह केवल आर्थिक सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास की भी कहानी है। भारतीय समुदाय ने अपने त्योहारों, भाषाओं, कलाओं और सामाजिक मूल्यों को संरक्षित रखते हुए उन्हें अमेरिकी सामाजिक ताने बाने में इस तरह पिरोया है कि वे अलग थलग नहीं, बल्कि सहभागी बन गए हैं। कुछ राज्यों की अमेरिकी सरकार ने दीपावली पर अवकाश की शुरुआत की है।


अमेरिका के अनेक राज्यों में स्थापित इंडिया कम्युनिटी सेंटर और कल्चरल सेंटर इस सांस्कृतिक आत्मविश्वास के जीवंत उदाहरण हैं। कैलिफोर्निया के मिलपीटस स्थित इंडिया कम्युनिटी सेंटर हो या न्यू जर्सी, यूटा और न्यूयॉर्क के सांस्कृतिक केंद्र, ये सभी आधुनिक चौपालों की तरह काम करते हैं। यहां योग कक्षाओं के साथ साथ बच्चों के लिए भाषा शिक्षण, संगीत और नृत्य की कक्षाएं, वरिष्ठ नागरिकों के लिए कार्यक्रम और बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक उत्सव आयोजित होते हैं। इन केंद्रों में दूसरी और तीसरी इंडियन डायस्पोरा पीढ़ी यह सीखती है कि भारतीय होना और अमेरिकी होना परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक दूसरे को एक साथ समृद्ध करने वाली पहचानें हैं।


अमेरिका के हिंदू मंदिर, जैन मंदिर और गुरुद्वारे भी केवल पूजा स्थल नहीं रह गए हैं। वे सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों के केंद्र बन चुके हैं। आरती के बाद शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति, त्योहारों के अवसर पर नाटक और भजन, भाषा कक्षाएं और सामुदायिक चर्चा सभाएं इन स्थलों को एक व्यापक सामाजिक मंच में बदल देती हैं। इस प्रक्रिया में भारतीय परंपरा धार्मिक दायरे से बाहर निकलकर सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का अंग बन जाती है। इस्कॉन , अक्षरधाम , कुछ भारतीय प्रवचन कर्ता गुरु अमेरिका में अनेक स्थानों पर महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। 


महात्मा गांधी के साथ साथ डॉ भीमराव आंबेडकर की प्रतिमाएं भी अमेरिका में भारत की वैचारिक उपस्थिति को रेखांकित करती हैं। मैरीलैंड में स्थापित आंबेडकर की विशाल प्रतिमा सामाजिक न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों की उस परंपरा को सामने लाती है, जो भारत और अमेरिका दोनों लोकतंत्रों की साझा विरासत है। यह संकेत करती है कि अमेरिका में भारत केवल आध्यात्मिक या सांस्कृतिक प्रतीकों तक सीमित नहीं, बल्कि आधुनिक लोकतांत्रिक चिंतन का भी प्रतिनिधि है।


अमेरिकी संग्रहालयों में भारतीय कला और इतिहास की उपस्थिति इस कथा का एक और महत्वपूर्ण अध्याय है। न्यूयॉर्क का मेट्रोपोलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट और सैन फ्रांसिस्को का एशियन आर्ट म्यूजियम भारतीय मूर्तिकला, चित्रकला और वस्त्र कला के समृद्ध संग्रहों के माध्यम से भारत को एक दृश्य पाठशाला की तरह प्रस्तुत करते हैं। इन दीर्घाओं में भारत केवल अतीत की सभ्यता नहीं, बल्कि जीवंत सौंदर्य परंपरा के रूप में दिखाई देता है, जो आधुनिक कला संवादों से भी जुड़ती है।


सांस्कृतिक प्रतीकों से आगे बढ़कर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत और अमेरिका की साझेदारी अमेरिका में भारत की एक कम दिखाई देने वाली, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण उपस्थिति है। इंडो यूएस साइंस एंड टेक्नोलॉजी फोरम, संयुक्त स्वच्छ ऊर्जा अनुसंधान केंद्र और अंतरिक्ष विज्ञान में इसरो और नासा के सहयोग ने दोनों देशों के वैज्ञानिक समुदायों को गहराई से जोड़ा है। प्रयोगशालाओं में काम करते भारतीय इंजीनियरिंग विशेषज्ञ और अमेरिकी वैज्ञानिक यह साबित करते हैं कि यह संबंध केवल अतीत या संस्कृति पर आधारित नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण में भी साझेदार है।

अमेरिका के मॉल्स में सहज ही मेड इन इंडिया कपड़े तथा अन्य वस्तुओं की उपलब्धता है। 

इन सभी तथ्यों को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि " अमेरिका में भारत" कोई एकरेखीय कहानी नहीं है। यह गांधी और विवेकानंद से शुरू होकर प्रवासी समुदाय, सांस्कृतिक केंद्रों, मंदिरों, संग्रहालयों और प्रयोगशालाओं तक निरंतर फैलती एक बहुआयामी यात्रा है। एक ओर दुनिया का सबसे पुराना आधुनिक लोकतंत्र और दूसरी ओर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, दोनों के बीच यह संवाद कभी विचारों के आदान प्रदान के रूप में सामने आता है, कभी सांस्कृतिक उत्सवों में और कभी साझा वैज्ञानिक परियोजनाओं में।


अमेरिका में भारत इसीलिए केवल स्मृति नहीं, बल्कि एक जीवित अनुभव है। यह अनुभव हर उस स्थान पर मौजूद है जहां भारतीय मूल्य, विचार और रचनात्मकता अमेरिकी समाज के साथ संवाद करती है और उसे समृद्ध करती है। यही संवाद इस पारस्परिक सम्बन्ध को निरंतर गतिशील और भविष्य उन्मुख बनाता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के विकास में प्रवासी साहित्यकारों का योगदान

 *  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के विकास में प्रवासी साहित्यकारों का योगदान


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


प्रबुद्ध रचनाकार ( मूलतः भारतीय  किंतु प्रायः लंदन , दुबई और न्यूयॉर्क में)




हिंदी, जो भारत की राजभाषा और देश के बहुत बड़े भूभाग की जनभाषा है, अपनी सीमाओं को लांघकर अब एक वैश्विक भाषा के रूप में स्वीकार की जा रही है। हिंदी की इस विकास यात्रा में जहां बॉलीवुड, भारतीय अर्थव्यवस्था और डिजिटल प्रसार का योगदान है, वहीं एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्थायी योगदान प्रवासी साहित्यकारों का भी है। विश्व के विभिन्न कोनों में बसे ये रचनाकार न सिर्फ हिंदी को जीवित रख रहे हैं, बल्कि उसे नए विषयों, नई शैलियों और अंतरराष्ट्रीय संवेदना से समृद्ध करके उसके वैश्विक विकास को गति और गरिमा प्रदान कर रहे हैं। इसमें दो तरह के साहित्यकार हैं पहले वे भारतीय जो अपने बच्चों के संग विदेश जा बसे हैं, दूसरे वे  विदेशी मूल के लोग जो हिंदी सीखकर नवाचारी लेखन कर रहे हैं।


प्रवासी साहित्य यानी 'डायस्पोरा लिटरेचर' उस साहित्य को कहते हैं जो मूल देश से दूर, किसी अन्य देश में बस गए लेखकों द्वारा रचा जाता है। हिंदी प्रवासी साहित्य की शुरुआत मुख्यतः उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में फिजी, मॉरिशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद जैसे देशों में गिरमिटिया मजदूरों के रूप में गए भारतीयों की संतानों के साहित्य से होती है। उत्तर-द्वितीय विश्वयुद्ध काल में, विशेषकर 1960 के दशक के बाद से, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, मध्य-पूर्व आदि देशों में पढ़ने, काम करने या बसने गए भारतीय मूल के लेखकों के योगदान को स्वीकार किया जाना वांछित है । जिन्होंने हिंदी में सृजन जारी रखा और उसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई।




 अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के विकास में प्रवासी साहित्यकारों के बहुआयामी योगदान ..


प्रवासी साहित्यकार विदेशी धरती पर हिंदी के सबसे प्रत्यक्ष और प्रभावी प्रतिनिधि हैं। उनकी रचनाएँ, उनके द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन, गोष्ठियाँ, पत्रिकाएँ और वेबसाइट्स स्थानीय लोगों को हिंदी भाषा और उसके माध्यम से व्यक्त होने वाली भारतीय संस्कृति, इतिहास, दर्शन और समकालीन सरोकारों से सीधे परिचित कराते हैं। यह अनौपचारिक प्रचार-प्रसार अत्यंत प्रभावी होता है।


 भारत में भी विदेश के प्रति अतिरिक्त अनुराग के चलते प्रवासी रचनाकारों तथा उनके लिखित साहित्य को हाथों हाथ लिया जाता है। कई संस्थान प्रवासी रचनाकारों को सम्मान प्रदान करते हैं।


    सांस्कृतिक पुल का निर्माण: 


प्रवासी रचनाकार भारतीय मूल्यों, परंपराओं, त्योहारों और जीवन दृष्टि को अपनी रचनाओं में पिरोते हैं। साथ ही, वे विदेशी समाज के साथ भारतीय समाज के टकराव, समन्वय और आत्मसातीकरण की जटिल प्रक्रियाओं को भी चित्रित करते हैं। इससे दोनों संस्कृतियों के बीच एक साहित्यिक पुल का निर्माण होता है।


    भौगोलिक विस्तार: प्रवासी लेखकों ने हिंदी को न्यूयॉर्क, लंदन, टोरंटो, सिडनी, दुबई, टोक्यो जैसे महानगरों तक पहुँचाया है। इन शहरों में हिंदी की साहित्यिक गतिविधियाँ, पत्र-पत्रिकाएँ और लेखक समूह सक्रिय हैं, जो हिंदी को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित कर रहे हैं।


    भाषा की जीवंतता का संरक्षण: विदेशी परिवेश में, जहाँ अंग्रेजी या अन्य स्थानीय भाषाओं का दबदबा है, हिंदी में सृजनात्मक लेखन करना अपने आप में भाषा के प्रति प्रतिबद्धता और उसे जीवंत रखने का संघर्ष है। यह प्रयास हिंदी को केवल भारत तक सीमित न रहने देकर उसे वैश्विक भाषा बनाने में सहायक सिद्ध हो रहा है।


लेखन की विषयवस्तु में नवाचार और विस्तार:


    द्वंद्व और अस्तित्व की खोज , प्रवासी साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है । 'प्रवासी चेतना' मूल देश और नए देश के बीच फटे हुए मन, अस्मिता की तलाश, सांस्कृतिक अलगाव, पीढ़ीगत अंतराल (विशेषकर प्रवासी माता-पिता और उनकी विदेश में पली-बढ़ी संतानों के बीच), नस्लीय भेदभाव और एक नई पहचान गढ़ने के संघर्ष को व्यक्त करती है। यह विषयवस्तु हिंदी साहित्य में एक नया और गहन आयाम जोड़ती है, जो भारत में रचे जा रहे साहित्य में सीमित रूप से ही उपलब्ध हो सकता था।


   वैश्विक परिप्रेक्ष्य: प्रवासी लेखकों का दृष्टिकोण और अभिव्यक्ति का कैनवास स्वाभाविक रूप से अधिक वैश्विक होता है। वे भारतीय मुद्दों जैसे राजनीति, सामाजिक समस्याएँ, पर्यावरण को एक अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में देखते और प्रस्तुत करते हैं। साथ ही, वे वैश्विक घटनाओं युद्ध, आतंकवाद, आर्थिक संकट, प्रवासन नीतियाँ पर हिंदी में टिप्पणी करते हैं, जिससे हिंदी पाठकों का दृष्टिकोण विस्तृत होता है।


    नए जीवन-मूल्यों और चुनौतियों का चित्रण: विदेश में रहते हुए प्रवासियों को जिन सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है , एकाकीपन, वृद्धावस्था में सहारे का अभाव, लैंगिक भूमिकाओं में बदलाव, सांस्कृतिक रूढ़ियों से मुक्ति और नए सिरे से जीवन की शुरुआत आदि,  ये सब प्रवासी साहित्य के प्रमुख विषय बने हैं, जो हिंदी साहित्य की परिधि को विस्तृत करते हैं।


   भाषाई सम्मिश्रण या मिक्सिंग , फ्यूजन :


 प्रवासी लेखक अक्सर अपनी रचनाओं में हिंदी के साथ अंग्रेजी या अन्य स्थानीय भाषा के शब्दों का प्राकृतिक रूप से प्रयोग करते हैं।  साहित्यिक शैली और प्रस्तुति में प्रयोगधर्मिता उनके द्विभाषी जीवन की वास्तविकता को दर्शाता है और हिंदी को एक लचीली, समावेशी भाषा के रूप में प्रस्तुत करता है, जो नए शब्दों और अभिव्यक्तियों को आत्मसात कर सकती है।


    विधाओं में विविधता: प्रवासी लेखकों ने न सिर्फ कविता, कहानी, उपन्यास जैसी पारंपरिक विधाओं में, बल्कि यात्रा वृतांत, संस्मरण, निबंध, डायरी लेखन, ब्लॉग विदेशी छंद जैसे सेनेट, हाइकु, टांका आदि को हिंदी में स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।


  अब डिजिटल माध्यमों पर नई विधाओं (जैसे माइक्रो-ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया कविता) में भी सक्रियता से लिखा जा रहा है। यह हिंदी साहित्य की अभिव्यक्ति के तरीकों को समृद्ध करता है।


    प्रस्तुतिकरण में आधुनिकता: डिजिटल युग में प्रवासी लेखक अक्सर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स, ई-पत्रिकाओं, सोशल मीडिया और ऑडियो-विजुअल माध्यमों का उपयोग करके अपनी रचनाओं को प्रस्तुत करने में अग्रणी रहे हैं। करोना काल ने गूगल मीट, फेसबुक लाइव, यू ट्यूब  आदि से  हिंदी साहित्य को नए पाठक वर्ग तक पहुँचाने में मदद की है।


साहित्यिक संस्थाओं और प्रकाशन का विकास:


    किताबों ,पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन साहित्य को स्थाई स्वरूप देते हैं।प्रवासी लेखकों ने विदेशी धरती पर हिंदी की अनेक महत्वपूर्ण पत्रिकाओं की स्थापना की और संचालित किया है।


  'इन्हें भी जोड़े व मुझे वर्ड फाइल भेज दें - प्रमुख प्रवासी पत्रिकाओं यथा भारत से प्रकाशित गर्भनाल, प्रवासी जगत, प्रवासी चेतना; नीदरलैंडस से प्रकाशित साहित्य का विश्व रंग; कनाडा से प्रकाशित हिंदी चेतना, साहित्य कुंज, हिंदी एब्रॉड एवं वसुधा; अमेरिका से प्रकाशित विश्वा, सौरभ, सेतु, ई-कल्पना एवं अनन्य; न्यूजीलैंड से प्रकाशित भारत दर्शन; ब्रिटेन से प्रकाशित पुरवाई, आधुनिक साहित्य व लेखनी; सिंगापुर से प्रकाशित सिंगापुर संगम आदि आदि प्रिंट , ई मीडिया माध्यमों  पर  न सिर्फ प्रवासी बल्कि भारत के रचनाकारों के लिए भी परस्पर संवाद का एक महत्वपूर्ण मंच बनीं हुई हैं। इन्होंने हिंदी साहित्य की निरंतरता और प्रवासी रचनाओं के प्रकाशन को सुनिश्चित किया है।


लेखक संगठन और गोष्ठियाँ: विभिन्न देशों में हिंदी लेखक संघ, हिंदी समितियाँ और साहित्यिक मंच सक्रिय हैं। भारतीय दूतावास भी हिंदी रचनाकारों को जोड़कर आयोजन कर रहे हैं। ये संस्थाएँ कवि सम्मेलनों, गोष्ठियों, सेमिनारों और कार्यशालाओं का आयोजन करके साहित्यिक वातावरण बनाए हुए हैं। इससे नए लेखकों को प्रोत्साहन मिलता है । ये हिंदी साहित्य को क्षेत्रीय सामुदायिक गतिविधि से जोड़ती दिखती हैं।


    प्रकाशन की सुविधा: प्रवासी लेखकों ने कई छोटे-बड़े प्रकाशन गृह भी स्थापित किए हैं या स्थानीय प्रकाशकों को हिंदी साहित्य छापने के लिए प्रेरित किया है, जिससे प्रवासी रचनाओं के प्रकाशन का मार्ग प्रशस्त हुआ है। आर्थिक रूप से प्रवासी साधन सम्पन्न हैं अतः वे भारत में भी बड़े प्रकाशकों से सहज ही छप रहे हैं।


शैक्षणिक और बौद्धिक योगदान:


    विदेश में हिंदी शिक्षण में कई प्रवासी साहित्यकार योगदान कर रहे हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों में वे हिंदी भाषा और साहित्य पढ़ाते हैं। वे न केवल भाषा सिखाते हैं बल्कि हिंदी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक शैक्षणिक विषय के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उनके शोध और आलोचनात्मक लेखन से हिंदी साहित्य को नए सैद्धांतिक ढांचों में समझने का अवसर मिलता है।


    लोक भाषा और अनुवाद कार्य: प्रवासी लेखक अक्सर द्विभाषी या बहुभाषी होते हैं। वे हिंदी साहित्य को विदेशी भाषाओं में और विदेशी साहित्य को हिंदी में अनूदित करके सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देते हैं। इससे हिंदी साहित्य को वैश्विक पाठक मिलते हैं और हिंदी पाठकों को विश्व साहित्य से परिचित होने का मौका मिलता है।


प्रवासी साहित्यकारों का मार्ग सरल नहीं है। उन्हें अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।   प्रकाशन और वितरण की समस्या: विदेशों में हिंदी पुस्तकों का प्रकाशन महँगा है और भारत से पुस्तकें मँगवाना या वितरित करना कठिन एवं खर्चीला होता है ।  पाठक वर्ग का सीमित होना: विदेशों में हिंदी पढ़ने-समझने वालों की संख्या सीमित है, जिससे पाठकीय प्रतिक्रिया और प्रोत्साहन का अभाव रहता है।


  सांस्कृतिक अलगाव का खतरा: लंबे समय तक विदेश में रहने से मूल संस्कृति और भाषा के प्रति सूक्ष्म अलगाव पैदा हो सकता है, जिसका प्रभाव रचना पर पड़ सकता है।


   पीढ़ीगत भाषाई अंतराल: दूसरी-तीसरी पीढ़ी के प्रवासियों के लिए हिंदी को सृजनात्मक स्तर पर थामे रखना एक बड़ी चुनौती है।


  मुख्यधारा में पहचान की कठिनाई: कभी-कभी भारत की साहित्यिक मुख्यधारा में प्रवासी साहित्य को उचित स्थान और मान्यता मिलने में समय लगता है। डिजिटल क्रांति ,  इंटरनेट, ई-पुस्तकें, ऑनलाइन पत्रिकाएँ, सोशल मीडिया, ब्लॉग्स और ऑडियो-विजुअल प्लेटफॉर्म्स ने प्रकाशन और वितरण की बाधाओं को काफी हद तक दूर कर दिया है। भविष्य की संभावनाएँ उज्ज्वल हैं।  प्रवासी लेखक इनका भरपूर उपयोग कर रहे हैं।


  भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव के साथ-साथ हिंदी की माँग भी बढ़ रही है। विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी पाठ्यक्रमों का विस्तार हो रहा है। दूसरी-तीसरी पीढ़ी के कई प्रतिभाशाली युवा, जो द्विभाषी हैं, हिंदी में रचनात्मक लेखन को नए रूपों में आगे बढ़ा रहे हैं।


बढ़ता सहयोग , विश्वविद्यालय स्तर पर आदान प्रदान, भारत और विदेशों के साहित्यकारों, प्रकाशकों और संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ रहा है, जिससे प्रवासी साहित्य को अधिक पहचान मिल रही है।


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के विकास में प्रवासी साहित्यकारों का योगदान अतुलनीय और बहुआयामी है। वे केवल भाषा को बचाए रखने वाले संरक्षक ही नहीं, बल्कि उसे नए विषयों, नई संवेदनाओं और नए प्रयोगों से समृद्ध करने वाले नवोन्मेषक भी हैं। उन्होंने हिंदी को एक वैश्विक भाषा के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनकी रचनाएँ प्रवासी भारतीयों के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक अनुभवों का अद्वितीय दस्तावेज हैं, जो हिंदी साहित्य की विषयवस्तु को अभूतपूर्व विस्तार देती हैं। डिजिटल युग में उनकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। निस्संदेह, हिंदी के वैश्विक मानचित्र पर अपना गौरवशाली स्थान बनाने में प्रवासी साहित्यकारों का लेखनीय संघर्ष और सृजनात्मक ऊर्जा एक निर्णायक कारक रही है और भविष्य में भी रहेगी। वे हिंदी को 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना को साकार करते हुए वास्तव में विश्वभाषा बनाने की दिशा में अग्रसर हैं।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


संप्रति 


A233, old Minal residency j K road Bhopal Madhya Pradesh 


Bhopal 


462023


Mo +917000375798

बाल कथा तिरंगे फुग्गो का गुच्छा

 बाल कथा 

तिरंगे फुग्गो का गुच्छा

विवेक रंजन श्रीवास्तव



 आज गणतंत्र दिवस था . सारे बच्चे धुली , प्रेस की हुई यूनीफार्म में सुबह सुबह ही स्टेडियम के प्रांगण में एकत्रित हो चुके थे . 

 तिरंगे झण्डे की छाया में खडे , बंद गले का जोधपुरी सूट पहने , सफेद टोपी लगाये गर्व से सीना फुलाये हुये मुख्य अतिथि ने परेड की सलामी ली . उद्घोषणा हुई आकाश की असीम उंचाईयों तक तिरंगे का संदेश पहुंचाने के लिये गैस के गुब्बारे "बंच आफ ट्राई कलर बैलून्स" .. तिरंगे फुग्गो का गुच्छा

छोड़ कर हर्ष व्यक्त किया जावेगा . सजी सुंदर दो लडकियों ने केसरिया , सफेद , हरे गुब्बारो के गुच्छे मुख्य अतिथि की ओर बढ़ाये . 

 शौर्य , देश भक्ति और साहस के प्रतीक ढ़ेर सारे केसरिया गुब्बारों के धागे कुछ लम्बे थे और इस तरह गुच्छे में केसरिया फुग्गे सबसे ऊपर इठला रहे थे .  

  सफेद गुब्बारो के धागे कुछ छोटे थे . उद्घोषक की भाषा में सफेद रंग के ये गुब्बारे शांति , सदभावना और समन्वय को प्रदर्शित करते थे . इन्हीं सफेद गुब्बारो में एक गुब्बारा गहरे नीले रंग का भी बंधा हुआ था . यह तिरंगे के अशोक चक्र की अनुकृति के रुप में गुच्छे में बंधा था . वही अशोक चक्र जो सारनाथ के अशोक स्तंभ से तिरंगे में समाहित किया गया है . यह चक्र राष्ट्र की गतिशीलता , समय के साथ प्रगति तथा अविराम बढ़ते रहने को दर्शाता है . 

 गुच्छे में सबसे नीचे हरे रंग के खूब सारे फुग्गे थे . देश के कृषि प्रधान होने , विकास और उर्वरता के प्रतीक है तिरंगे का हरा रंग .  

 मुस्कुराते हुये मुख्य अतिथि जी ने तिरंगे फुग्गो का गुच्छा हवा में उड़ा दिया . फोटोग्राफर अपने कैमरे को फुग्गों पर फोकस करने लगा . बच्चो ने तालियां बजाई . लैंस जूम कर , आकाश में गुब्बारो के गुम होते तक जितनी बन पड़ी उतनी फोटो खींच ली गईं . कल के अखबारो में समाचार के साथ ये आकर्षक फोटो छपेंगी . नीले आसमान के बैकग्राउंड में , सूरज की सुनहली धूप के साथ , बंच आफ ट्राई कलर बैलून्स इन स्काई की फोटो वाली खबर हर किसी के मन में देशभक्ति का जज्बा पैदा कर देती है . ओजस्वी उद्घोषणा होती है " झंडा उंचा रहे हमारा , विजयी विश्व तिरंगा प्यारा " तो सचमुच स्टेडियम में उपस्थित हर किसी का सीना गर्व से थोड़ा बहुत जरूर फूल जाता है . 

 एक दूसरे से बातें करते गैस के केसरिया , सफेद और हरे गुब्बारे , गणतंत्र दिवस की खुशियां समेटे ऊपर और ऊपर , नीले आकाश में उड़ चले . 

 नीले गुब्बारे ने कहा कि कौन से अदृश्य हाथ हैं जो तिरंगे के प्रतीक हम गुब्बारों को अलग अलग अपनी मर्जी से उड़ाना चाहता है ?  

 केसरिया गुब्बारे ने कहा कि संविधान में केवल अधिकार नहीं कर्तव्य भी तो दर्ज हैं . दरअसल देश का जन गण मन तो वह है , जहां फारूख रामायणी अपनी शेरो शायरी के साथ राम कथा कहते हैं . जहां मुरारी बापू के साथ ओस्मान मीर , गणेश और शिव वंदना गाते हैं . हरा गुब्बारा बोला फिल्म बैजू बावरा का भजन सुना है न भैया , "मन तड़पत हरि दर्शन को आज" . उसने बतलाया कि इस अमर गीत के संगीतकार नौशाद जी थे . गीत शकील बदायूंनी जी ने लिखा है , तथा गायक मोहम्मद रफी हैं . तिरंगे ने कभी भी इन संगीत के महारथियों से उनके धर्म नही पूछे . 

  आसमान के अनंत सफर पर तिरंगे फुग्गों के गुच्छे को जैसे ही तेज हवा के थपेड़े ने अलग अलग करना चाहा हरे सफेद और केसरिया फुग्गो ने एक दूसरे के धागों को संभाल लिया . और वे संग संग शांति , अविराम प्रगति और विकास का संदेशा लिये कुछ और ऊपर उड चले . 

 नीचे स्टेडियम के आयोजन में बच्चे ड्रिल कर रहे थे , और बैंड धुन बजा रहा था "इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के" .

‍‍... विवेक रंजन श्री

वास्तव

नाटक स्थिति नियंत्रण में है !

 


नाटक

स्थिति नियंत्रण में है !

देश की कानून व्यवस्था पर व्यंग , डी पी एस लखनऊ के कल्चरल सैल के आग्रह पर विशेष रूप से लिखित


लेखक

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र

A १ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

०९४२५८०६२५२


कलाकारः

1. आम आदमी (सूत्रधार) सामान्य कपड़ो में

२ आम महिला साड़ी में

३ इंस्पैक्टर खाकी वर्दी में

४ एक युवा लड़की भड़कीली पोशाक में

८ गले में रंगीन रूमाल डाले हुये गली के शोहदे २ लड़के

५ अखबार का लिबास पहने हुये ..अखबार के रूप में एक लड़का

६ टी वी चैनल का पत्रकार ..हाथो में माइक लिये हुये

७ आतंकवादी की सूरत में एक लड़का

८ भीड़ से दो लड़के


सामग्री

1. एक स्कूल का घंटा

2 एक बैग में बम

३ एक स्टूल

स्थलः सडक के किनारे कोई चैराहे का नुक्कड


सूत्रधार आम आदमी … घंटा बजाते हुये ….टन टन टन ….. लो हो गई अदालतो की गर्मी की छुट्टियां ! सुप्रिम कोर्ट में ६० हजार प्रकरण लंबित हैं ! ४४ लाख प्रकरण देश के विभिन्न हाई कोर्टो में और लगभग तीन करोड़ प्रकरण निचली अदालतो में पेंडिंग हैं . और हो गई अदालतो की महीने भर की छुट्टियां ! अब जज साहबान गर्मी मनाने बच्चो बीबी के साथ पहाड़ों पर जायेंगे !


आम महिला ……… .अंग्रेजो की गुलामी के दिनो की याद है ? तब एसी , कूलर बिजली के पंखे नही होते थे … तब गर्मियो में पूरी राजधानी ही पहाड़ो पर शिफ्ट कर दी जाती थी … क्योकि अंग्रेजो को गरमी बर्दाश्त नहीं होती थी . गर्मियो की छुट्टियां अंग्रेजो की ही देन है जिसे अदालतें आज भी ज्यो का त्यों ढ़ो रही हैं , ठीक वैसे ही जैसे अदालतो की अंग्रेजी और खास गैर हिन्दी भाषा .


सूत्रधार आम आदमी .. अरे कोई तो बता दो इन जज साहब को कि जस्टिस डिलेयेड इज जस्टिस डिनायड . अब कब तक कानून आंखो पर पट्टी बांधे अंधा बना रहेगा ? कब तक न्याय पेशी दर पेशी बरसों पकता रहेगा जैसे बीरबल की खिचड़ी ! देश के राष्ट्रीय ला संस्थानो से पाँच साला एल एल बी कोर्स के पढ़े लिखे होनहार युवाओ में संभावना की कौंध नजर आती है , पर वे भी कारपोरेट जगत की हाई पैकेज वाली चकाचौंध से प्रभावित हैं और उन्हें इस चमक से बचाने के कोई प्रयास भी नही हो रहे . यहाँ आज न्याय की रक्षा करने वाले बैरिस्टर कम और कानून के लूप होल में से मल्टी नेशनल्स के लिये मोटी रकम निकालने वाले कारपोरेट ला विशेषज्ञ अधिक बन रहे हैं .

अदालतो में आज भी वही ईवनिंग क्लासेज से ला किये हुये वकील ही काम कर रहे हैं , हर पेशी में मिलने वाली फीस में फैसले से ज्यादा रुचि होना उनकी परिस्थितियो की मजबूरी है .

इंस्पैक्टर ….. क्या हो हल्ला मचा रखा है ..अदालतें बंद हैं महीने भर को , तो क्या है ..तुम्हें पता नही है क्या कि जस्टिस हरीड इज जस्टिस बरीड ! और श्रीमान आम आदमी तुम्हें क्या , जवान उठाई और पटक दी , लगे सरकार को कोसने ! तुम इतना तक नही जानते कि न्याय की देवी ने आंखो पर पट्टी इसलिये नहीं बांधी है कि कानून अंधा है , बल्कि इसलिये बांधी है क्यो कि कानून के लिये सब बराबर हैं ! कानून सबूत मागता है , वह तुम्हारी तरह भावनाओ से बहकता नही है ..सबूत ढ़ूंढ़ने के लिये पुलिस है , प्रशासन है , सबूत पेश करने के लिये काले कोट में वकील हें … .अदालतें कम हैं तो क्या हुआ …केस ज्यादा हैं तो क्या हुआ …सब ठीक ठाक ही है … स्थिति नियंत्रण में है !

इंस्पैक्टर बैठ जाता है .


युवा लड़की भड़कीली पोशाक में इतराते हुये …कुछ किताबें लिये हुये , मोबाइल पर बात करते प्रवेश करती है .


गले में रंगीन रूमाल डाले हुये गली के शोहदे लड़के उसे छेड़ते हुये …ओय होय !! ………. चलती क्या खंडाला !


लड़की …. सैंडिल उतारकर लड़को की ओर मुखातिब होकर …. मैं आजाद देश की प्रगतिशील लड़की हूं ! लड़को से हर दौड़ में एक कदम आगे , मुझे छेड़ते हो !


इंस्पैक्टर ….दौड़कर लड़की का हाथ पकड़कर ..हाथ ऊंचे उठाते हुये…… कानून महिलाओ के साथ है .


सूत्रधार आम आदमी…. देश प्रगति कर रहा है , पश्चिमी देशो की बराबरी कर रहा है नारी की पूजा अब पिछड़ेपन की बातें हैं . अब हमने पत्रिका के पन्नो पर नारी देह को विज्ञापनो में परोसने में प्रगति के सूत्र ढ़ूढ़ निकालें है . मुन्नी बदनाम हुई और शीला की जवानी जैसे फिल्मी गीतो ने राष्ट्रीय लोकप्रियता के रिकार्ड बनाये हैं , सेंसर से स्वीकृत ऐसी फिल्मो को हम ही बाक्स आफिस पर हिट कर रहे हैं .समाज ने ऐसी व्यवस्था को स्वीकार कर लिया है कि एक क्लिक पर चंद रुपयो के लिये स्त्री स्वयं सारे बंधनो से मुक्त हो रही है .


आम महिला ………हर बरस देश में लगभग २० से २५ हजार … बलात्कार के प्रकरण पुलिस रिकार्ड में दर्ज हो रहे हैं , और पुलिस के बड़े बूढ़ो का कहना है कि इससे कहीं ज्यादा घटनायें आन रिकार्ड आती ही नही है ….. देश की राजधानी तक में लड़कियो के साथ तरह तरह से बत्ततमीजियां हो रही हैं . तंदूर में जिंदा जला दी गई लड़कियां . लड़कियो के शरीर के टुकड़े टुकड़े करके सूटकेस में भरकर फेका तक है दंरदियो ने . ८ साल से ६० साल तक की स्त्री ही नही , नन्ही सी बच्ची भी सैक्स वृत्ति जनित अपराधो से बच नही पा रही ! ळड़कियो की खरीद फरोख्त हो रही है ..कैसे हब्शी युग में जा पहुंचे हैं हम ? पुलिस थानो में भी महिलायें असुरक्षित हैं .


इंस्पैक्टर … लेकिन जनता बिलकुल कनफ्यूज न हो ..महिला थाने बनाये गये हैं . निर्भया फंड आबंटित हो चुका है . दामिनी की कुर्बानी बेकार नही गई है . जनता जाग गई है , …धीरे से…. अब हम सो सकते हैं .. सारी जस्ट फार जोक ! स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है ! और इसका प्रमाण भी है .. लाखो लड़कियां अपने घरो से दूर उच्च शिक्षा ले रही हैं , नौकरियां कर रही हैं , रोज बसों , मैट्रो में ट्रेवल कर रही हैं . रात की पारी में दफ्तरो कारखानो में पुरुषो के कंधो से कंधे मिलाकर काम कर रहीं हैं , देश की प्रगति में अपना योगदान दे रहीं हैं . है ना स्थिति नियंत्रण में !

इंस्पैक्टर बैठ जाता है .


अखबार का लिबास पहने हुये ..अखबार के रूप में एक लड़का गोल घुमता हुआ भीड़ के बीच से केंद्र में प्रवेश करता है …. आज की ताजा खबर ! साइबर क्राइम ब्रांच ने पकड़ा मंत्री जी के विरुद्ध टिप्पणी करने वालो को ! सोशल मीडिया पर सरकार की होगी नजर ….

सूत्रधार आम आदमी…. फेसबुक पर की गई एक बौद्धिक टिप्पणी या एक कार्टून तो मंत्री जी को नागवार गुजरते हैं और इस साइबर क्राइम को रोकने सारा तंत्र सक्रिय हो जाता है , पर सरकार उस दहशत गर्द को कभी नही पकड़ पाती जिसकी फैलाई अफवाहो से दक्षिण भारत से सारे पूर्वोत्तर राज्यो के कामकाजी लोगो को बेवजह पलायन करना पड़ा और सरकार के नुमांइदो को बयान देना पड़ा था कि स्थिति नियंत्रण में है !


आम महिला …… अभिव्यक्ति का अधिकार हमारा मौलिक संवैधानिक अधिकार है . सोशल मीडिया पर यह सरकारी पहरेदारी कितनी सही कितनी गलत है ? कोई बतायेगा ! अगली बार फिर से कम्प्यूटर के जरिये कोई अफवाह कोई दहशत कोई आतंक न फैले ,आतंकवादियो को मदद न मिले इंटरनेट से . ई मनी के इस समय में देश की अर्थ व्यवस्था ही जाम न हो जावे हैकिंग से … इसके लिये जरूरी है कि इंटरनेट पर नियंत्रण हो , ई मेल एड्रेस का पंजीकरण लागू किया जावे .


सूत्रधार आम आदमी…. इंटरनेट ने देश से भ्रष्टाचार मिटाने में और कानून व्यवस्था लागू करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है . चाहे रेल रिजर्वेशन हो , सरकारी योजनाओ के अनुदान हों , बिलों के भुगतान हों हमें जहां इस आधुनिक संसाधन का व्यापक जनहित में बेहतर इस्तेमाल सुनिश्चित करना होगा वहीं यह भी देखना होगा कि दूषित सामग्री वाली पोर्न साइट्स हमारी नई पीढ़ी को दिग्भ्रमित न कर सकें .


इंस्पेक्टर … जनता की ओर मुखातिब होकर …अरे साहबान आप इन बेचारे सूत्रधार को केवल नुक्कड़ नाटक का सूत्र ही संभालने दें . आप जरा भी चिंतित न हों . इस देश की कानून व्यवस्था को संभालने के लिये इस देश में अब भी पुलिस है ! मैं हूं ! बड़े बड़े आई पी एस , आई ए एस अफसर हैं …लाल बत्तियो की गाड़ियो पर सवार बड़े बड़े मंत्री हैं ! स्थिति नियंत्रण में हैं !

इंस्पैक्टर बैठ जाता है .


टी वी चैनल का पत्रकार ..हाथो में माइक लिये हुये प्रवेश करता है . ब्रेकिंग न्यूज ! नक्सलवादियो ने फिर किया बारूदी सुरंगो का विस्फोट . परिवर्तन यात्रा पर बड़ा हमला . कई घायल .


सूत्रधार आम आदमी …महात्मा गांधी को देश के नेताओं ने आजादी के बाद अपने-अपने ढंग से उपयोग किया है . उनकी सफेद खादी राजनेताओ की यूनीफार्म बन गई है , जिसे पहनकर वे हर संभव काले कारनामे कर रहे हैं . कोई गांधी की लाठी ले भागा है और उसे भांजकर छल बल से वोट बटोर रहा है . कोई उनके राम के नाम को भुना कर वोटो में तब्दील कर रहा है . शपथ लेने ,अनशन करने और विदेशी अतिथियो को घुमाने के लिये गांधी को राष्ट्रपिता बनाकर उनकी एक संगमरमरी समाधि बना दी गई है . गांधीवाद दम तोड़ चुका है . जहां हमारी सीमायें विदेशी आतंक से बुरी तरह प्रभावित हैं वहीं देश के भीतरी हिस्सो में भी आतंकवादी जब तब कानून व्यवस्था एजेंसियो के तालमेल में अभाव के चलते छोटी बड़ी वारदातें करने में सफल हो रहे हैं . सीरियल बम विस्फोट की कई घटनायें देश के कई शहरो में घट चुकी हैं . देश की आजादी का जश्न हो या गणतंत्र दिवस का भव्य आयोजन हर बार जैसे सुरक्षा बलो की अग्नि परीक्षा होती दिखती है .


आम महिला … विदेशी आतंक के साथ ही आंतरिक आतंक नक्सलवाद की शक्ल में अपनी जड़ें जमा चुका है . राज्यो की सीमावर्ती क्षेत्रो में , आदिवासी बहुल इलाकों में नक्सल गतिविधियां चरम पर हैं . प्रत्येक घटना के ठीक बाद मंत्री जी के शांति बनाये रखने के खोखले बयान , जाँच करके वास्तविक दोषी को सजा दिलाये जाने के आश्वासन आम नागरिको के लिये विश्वसनीय नही रह गये हैं . मानवाधिकार संगठनों के आंदोलन , राजनैतिक पार्टयो के बंद , इन सब से आम नागरिक ऊब चुका है .


इंस्पेक्टर … टी वी के हर बुलेटिन में इन कड़वे सच को ब्रेकिंग न्यूज के रूप में देखकर भी , हर सुबह अखबार की सुर्खियो में देश के ऐसे बदसूरत हालात चाय की घूंट के साथ पीते हुये भी , जनता एक सुखद भविष्य की कामना में चार लगभग समान राजनैतिक ठग चेहरो में से किसी एक को वोट देकर चुनती ही है . लोकतंत्र कायम है और दुनिया के दूसरे देशो से कही बेहतर है . स्थिति नियंत्रण में है . हर घटना हमें एक शिक्षा देती है , बेहतर समन्वय से , बेहतर व्यवस्था से देश का प्रशासन हर नागरिक को पूरी सुरक्षा देने को प्रतिबद्ध है .


तभी भीड़ के एक हिस्से में हलचल मचती है , और भीड़ से दो युवक एक आतंकवादी को पकड़ कर केंद्र में लाते हैं . इंस्पेक्टर साहब संभालिये इसे यह संदिग्ध आदमी यहां यह बैग छोड़कर भाग रहा था . इंस्पेक्टर बैग खोलकर देखता है और बम निकालता है .

इंस्पेक्टर … आतंकवादी को कालर से पकड़कर , अच्छा तो तुम यहां बम विस्फोट करना चाहते थे . पर मेरे देश के नौजवानो ने कर दी ना तुम्हारी कोशिश नाकाम .शाबास नौजवानो !


सभी कलाकार हाथ जोड़कर मानव श्रंखला बनाकर आतंकवादी को गोल घेरे में ले लेते हैं .

इंस्पेक्टर …स्टूल पर खड़े होकर

दोस्तो ! अकेली सरकार कुछ नही कर सकती . हम सब को ऐसे ही चौकस रहना होगा . जब तक हम सतर्क हैं और अपने अपने परिवेश , अपने घर के आस पास , सार्वजनिक स्थलो पर चौकन्ने हैं तब तक


कोई भी अपराधी सफल नही हो सकता . इस देश की सवा अरब की आबादी ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है . क्लोज सर्किट कैमरो की निगरानी , ढ़ेर सी पुलिस से बढ़कर है हमारी परस्पर संवेदना , जागरुखता , सामयिक , तात्कालिक बुद्धि से उठाया गया छोटा सा कदम . प्रायः भगदड़ से होने वाली दुर्घटनाओ का मूल कारण किसी एक व्यक्ति द्वारा नियमो को तोड़कर जल्दबाजी मचाना होता है . जरूरी है कि भीड़ में हम सब संयम से काम लें कतार में कार्य करें . कानून आपके साथ है , पर आपको भी कानून का साथ देना होगा . उठाईगिर , पिक पाकेट या यौन अपराधी तक समाज की सतर्कता से कभी भी उसके मकसद में कामयाब नही हो सकता . सड़क दुर्घटना में पीड़ित के प्रति हमारी संवेदनशील त्वरित कार्यवाही उसकी जान बचा सकती है . आइये संकल्प करें कि केवल सरकारी तंत्र को दोष देने के बजाय हम अपनी सोच बदलेंगें और घर बाहर अपने कान , नाक , आंखे खुली रखकर पुलिस की हर संभव सहायता करेंगे . क्योकि बढ़ती आबादी के दबाव में हमारे इसी प्रयास से रहेगी स्थिति नियंत्रण में .



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vivek ranjan shrivastava



आत्म कथ्य


    ये दुनिया एक रंगमंच है . हम सब छोटे बड़े कलाकार और परमात्मा शायद सबका निर्देशक है जिसके इशारो पर हम उठते गिरते परदे और प्रकाश व ध्वनि के तेज कम होते नियंत्रण के साथ अपने अपने चरित्र को जी रहे हैं . जो कलाकार जितनी गम्भीरता से अपना किरदार निभाता है , दुनिया उसे उतने लम्बे समय तक याद रखती है .

    एक लेखक की दृष्टि से सोचें तो अपनी भावनाओ को अभिव्यक्त करने की अनेक विधाओ में से नाटक एक श्रेष्ठ विधा है . कविता न्यूनतम शब्दो में अधिकतम कथ्य व्यक्त कर देती है ,किन्तु संप्रेषण तब पूर्ण होता है जब पाठक के हृदय पटल पर कविता वे दृश्य रच सकें जिन्हें कवि व्यक्त करना चाहता है . वहीं नाटक चूंकि स्वयं ही दृश्य विधा है अतः लेखक का कार्य सरल हो जाता है , फिर लेखक की अभिव्यक्ति को निर्देशक तथा नाटक के पात्रो का साथ भी मिल जाता है . किन्तु आज फिल्म और मनोरंजन के अन्य अनेक आधुनिक संसाधनो के बीच विशेष रूप से हिन्दी में नाटक कम ही लिखे जा रहे हैं . एकांकी , प्रहसन , जैसी नाट्य विधायें लोकप्रिय हुई हें . इधर रेडियो रूपक की एक नई विधा विकसित हुई है जिसमें केवल आवाज के उतार चढ़ाव से अभिनय किया जाता है . नुक्कड़ नाटक भी नाटको की एक अति लोकप्रिय विधा है . प्रदर्शन स्थल के रूप में किसी सार्वजनिक स्थल पर एक घेरा, दर्शकों और अभिनेताओं का अंतरंग संबंध और सीधे-सीधे दर्शकों की रोज़मर्रा की जिंद़गी से जुड़े कथानकों, घटनाओं और नाटकों का मंचन, यह नुक्कड़ नाटको की विशेषता है .

    हिन्दी सिनेमा में अमोल पालेकर , फारूख शेख , शबाना आजमी जैसे अनेक कलाकार मूलतः नाट्य कलाकार ही रहे हैं . किन्तु नाट्य प्रस्तुतियो के लिये सुविधा संपन्न मंचो की कमी , नाटक से जुड़े कलाकारो को पर्याप्त आर्थिक सुविधायें न मिलना आदि अनेकानेक कारणो से देश में सामान्य रूप से हिन्दी नाटक आज दर्शको की कमी से जूझ रहा है . लेकिन मैं फिर भी बहुत आशान्वित हूं , क्योकि सब जगह हालात एक से नही है . जबलपुर में ही तरंग जैसा प्रेक्षागृह , विवेचना आदि नाट्य संस्थाओ के समारोहो में दर्शको से खचाखच भरा रहता है . सच कहूं तो नाटक के लिये एक वातावरण बनाने की जरूरत होती है .जबलपुर में यह वातावरण बनाया गया है . यहाँ नाटक अभिजात्य वर्ग में अति लोकप्रिय विधा है . सरकारें नाट्य संस्थाओ को अनुदान दे रहीं हैं .हर शहर में नाटक से जुड़े , उसमें रुचि रखने वाले लोगो ने संस्थायें या इप्टा अर्थात इंडियन पीपुल थियेटर एसोशियेशन जैसी १९४३ में स्थापित राष्ट्रीय संस्थाओ की क्षेत्रीय इकाइयां स्थापित की हुई हैं . और नाट्य विधा पर काम चल रहा है . वर्कशाप के माध्यम से नये बच्चो को अभिनय के प्रति प्रेरित किया जा रहा है . पश्चिम बंगाल व महाराष्ट्र में अनेक निजी व संस्थागत नाट्य गृह संचालित हैं , दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय , भोपाल में भारत भवन आदि सक्रिय संस्थाये इस दिशा में अपनी भूमिका का निर्वाह कर रही हैं .नाटक के विभिन्न पहलुओ पर पाठ्यक्रम भी संचालित किये जा रहे हैं . 

    जरूरत है कि नाटक लेखन को और प्रोत्साहित किया जावे क्योकि आज भी जब कोई थियेटर ग्रुप कोई प्ले करना चाहता है तो उन्ही पुराने नाटको को बार बार मंचित करना पड़ता है .नाटक लेकन पर कार्यशालाओ के आयोजन किये जाने चाहिये , मेरे पास कई शालाओ के शिक्षको के फोन आते हैं कि वे विशेष अवसरो पर नाटक करवाना चाहते हैं पर उस विषय का कोई नाटक नही मिल रहा है , वे मुझसे नाटक लिखने का आग्रह करते हैं , मैं बताऊ मेरे अनेक नाटक ऐसी ही मांग पर लिखे गये हैं . मेरे नाटक पर इंटरनेट के माध्यम से ही संपर्क करके कुछ छात्रो ने फिल्मांकन भी किया है . संभावनायें अनंत हैं . आगरा में हुये एक प्रयोग का उल्लेख जरूरी है , यहां १७ करोड़ के निवेश से अशोक ओसवाल ग्रुप ने एक भव्य नाट्यशाला का निर्माण किया है , जहां पर "मोहब्बत दि ताज" नामक नाटक का हिन्दी व अंग्रेजी भाषा में भव्य शो प्रति दिन वर्षो से जारी है , जो पर्यटको को लुभा रहा है . अर्थात नाटको के विकास के लिये सब कुछ सरकार पर ही नही छोड़ना चाहिये समाज सामने आवे तो नाटक न केवल स्वयं संपन्न विधा बन सकता है वरन वह लोगो के मनोरंजन , आजीविका और धनोपार्जन का साधन भी बन सकता है .  

   

परिचय

......... विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र 


मूलतः व्यवसाय से इंजीनियर पर गंभीर व्यंगकार , हिन्दी में नाटक ,कविता , तकनीकी लेखन , वैचारिक लेख हेतु जाना पहचाना देश व्यापी नाम .

 २००५ से हिन्दी ब्लाग में सतत सक्रिय 


जन्म २८.०७.१९५९ , मंडला म.प्र.


शिक्षा बी ई सिविल एन आई टी रायपुर से 

   पोस्ट ग्रेजुयेशन फाउंडेशन इंजीनियरिंग एम ए सी टी भोपाल से

   इंदिरा गांधी ओपन युनिवर्सिटी दिल्ली के चार्टर बैच से मैनेजमेंट में उपाधि 

  मैनेजर ब्यूरो आफ इनर्जी एफिशियेंसी 


  

शासकीय सेवा   

पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कम्पनी जबलपुर में प्रमुख सिविल संकाय अतिरिक्त मुख्य अभियंता सिविल के रूप में सेवारत 

विभिन्न पदो पर कार्य करते हुये अनेक महत्वपूर्ण योजनाओ को मूर्त रूप दिया 

निर्माणाधीन परमाणु बिजलीघर चुटका जिला मण्डला की प्रजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने , निर्मित हो चुकी व सफलता पुर्वक वर्षो से चल रही लघु पन बिजली परियोजना भीमगढ़ , चरगांव आदि की प्रोजेक्ट रिपोर्ट व हाईड्रोलाजी तैयार करने के महत्वपूर्ण कार्य 


कंपनी के जन संपर्क अधिकारी के रूप में सफलता पूर्वक कार्य निर्वहन

कंपनी की गृह पत्रिका विद्युत ब्रह्मेति का संपादन 

देश की पहली ब्लागजीन ब्लागर्स पार्क का संपादन 


प्रकाशित किताबें , ई मीडिया पर भी डेली हंट मोबाईल एप सहित पुस्तकें सुलभ 

             रामभरोसे व्यंग संग्रह

          मेरे प्रिय व्यंग लेख

          कौआ कान ले गया व्यंग संग्रह

   धन्नो बसंती और बसंत व्यंग संग्रह 

             हिंदोस्ता हमारा नाटक संग्रह

             जादू शिक्षा का नाटक

              जल जंगल और जमीन

         बिजली का बदलता परिदृश्य

आकाशवाणी व दूरदर्शन से अनेक प्रसारण , रेडियो रूपक लेखन .

उपलब्धियाँ 

    हिंदोस्तां हमारा नाटक संग्रह को ३१००० रु का साहित्य अकादमी हरिकृष्ण प्रेमी पुरस्कार

     रेड एण्ड व्हाइट १५००० रु का राष्टीय पुरुस्कार सामाजिक लेखन हेतु

     रामभरोसे व्यंग संग्रह को राष्टीय पुरुस्कार दिव्य अलंकरण

    कौआ कान ले गया व्यंग संग्रह को कैलाश गौतम राष्ट्रीय सम्मान

    जादू शिक्षा का नाटक को ५००० रु कासेठ गोविंद दास कादम्बरी राष्ट्रीय सम्मान

    म. प्र. शासन का ५००० रु का प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जादू शिक्षा का नाटक को

    खटीमा उत्तरांचल स्थित बाल कल्याण संस्थान द्वारा विशेष रूप से बाल रचना हेतु सम्मानित

        सुरभि टीवी सीरियल में मण्डला के जीवाश्मो पर फिल्म का प्रसारण , युवा फिल्मकार सम्मान

वर्तिका पंजीकृत संस्था के प्रांतीय अध्यक्ष , 

प्रणाम मध्यप्रदेश के आंचलिक संयोजक 

साहित्य अकादमी के पाठक मंच संयोजक के रूप में निरन्तर साहित्य सेवा 



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