कहानी
लाकडाउन में डाउनलोड हुए रिश्ते
विवेक रंजन श्रीवास्तव
मैरीलैंड अमेरिका में , छोटी पर सजीव टाउनशिप से ऑपरेट होती थी वह अमेरिकन सॉफ्टवेयर कंपनी जहां थोड़ा सा स्टाफ था, पर दुनियां भर की शिपिंग कंपनियों के सर्वर वहां से सर्व किए जाते थे। कम ही भारतीय थे इस कंपनी में पर जो थे बड़े जिम्मेदार पदों पर थे । अखिलेश और प्रमिला दोनों ही भारतीय थे , इसलिए एक दूसरे को जानते थे। अनायास लॉकडाउन की सुनसान शामों में जब पूरी दुनिया थम सी गई थी, अखिलेश और प्रमिला के बीच एक नई दुनिया बसने लगी थी। शुरुआत तो महज विदेश में बसे दो भारतीय , सह कर्मियों की सहमति से सहूलियत भरा साथ था - एक ही भाषा बोलने वाले, एक जैसा शाकाहारी खाना पसंद करने वाले। पर धीरे-धीरे वह छोटा सा अपार्टमेंट उनकी दुनिया बनता चला गया।
अखिलेश जब पहली बार प्रमिला के हाथ का बना राजमा चावल खा रहा था, तो उसकी आँखों में घर के स्वाद की झलक चमक आई थी - "सालों हो गए माँ के हाथ का स्वाद भूले हुए।" प्रमिला ने मुस्कुराकर कहा था , "खाना तो बस बहाना है, असली भूख तो घर की यादों की होती है।"
वे दोनों शारीरिक रूप से एकदम अलग थे अखिलेश सामान्य देह यष्टी का, छरहरा , युवक , प्रमिला थोड़ी भारी-भरकम, मजबूत। पर एक अपार्टमेंट में बंद जैसे-जैसे दिन बीते, उन्होंने पाया कि शरीर के बाहरी खोल से कहीं गहरे, वे दोनों एक ही तरह के थे । दोनों के भीतर एक अधूरापन था जो विदेश की इस निर्जन भूमि में और गहरा हो गया था।
एक शाम जब अखिलेश बुखार से तप रहा था, प्रमिला ने पूरी रात उसके सिर पर पानी की पट्टी रखी।
कंपनी में काम ठप्प सा था , वर्क फ्राम होम, पर लगभग नो वर्क। दूसरे दिन जब प्रमिला की नौकरी जाने का अव्यक्त डर उसे सता रहा था, अखिलेश ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा "हम दोनों साथ हैं, कोई बात नहीं।"
फिर वह रात आई जब बारिश की फुहारें खिड़की से टकरा रही थीं और दोनों एक ही सोफे पर बैठे कोई बोल्ड अंग्रेजी फिल्म देख रहे थे। अचानक सब कुछ बदल गया। कोई योजना नहीं थी, कोई इरादा नहीं। बस दो अकेले दिल एक दूसरे की गर्माहट में सिमट गए। सुबह जब आँख खुली तो दोनों की आँखों में एक सवाल था , शर्म, डर, पर एक अजीब सी सुकून वाली शांति भी थी ।
अगले कुछ दिन अजीब से बीते। फिर एक रात रसोई में खड़े-खड़े अखिलेश ने कहा , "प्रमिला, मैं चाहता हूँ कि हमारा रिश्ता वैध हो। तुम्हारे बिना अब इस देश में मेरा कोई घर नहीं।"
शादी छोटी-सी हुई, बस चार लोग। पर जब वे वीडियो कॉल पर घर वालों से बात कर रहे थे, तो प्रमिला की माँ रोने लगी , "बेटी, तूने तो हमें बताया तक नहीं!" अखिलेश के पिता ने धैर्य से समझौता करते हुए आशीष देते हुए कहा "बेटा, वहाँ तो तुम दोनों ही एक दूसरे के परिवार हो।"
आज जब वे उस शहर के दूसरे छोर पर अपने छोटे से अपार्टमेंट में रहते हैं, तो प्रमिला अक्सर कहती है "वो लॉकडाउन हमारे लिए अभिशाप नहीं, वरदान बनकर आया था। उसने हमें सिखाया कि प्यार शरीर की बनावट नहीं, दिलों का मेल होता है।"
और अखिलेश मुस्कुराकर कहता है "और ये भी कि सबसे स्वादिष्ट खाना वो होता है जो दिल से बनाया जाए।" दोनों की हँसी कमरे में गूँज उठती है, जैसे उस कोरोना काल की उदासी को भी हरा देने का इरादा रखती हो।" लाकडाउन में डाउनलोड हुए रिश्ते में नए फूल खिल आए।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
7000375798
ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी
जे के रोड भोपाल
462023
No comments:
Post a Comment