Sunday, 1 February 2026

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के विकास में प्रवासी साहित्यकारों का योगदान

 *  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के विकास में प्रवासी साहित्यकारों का योगदान


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


प्रबुद्ध रचनाकार ( मूलतः भारतीय  किंतु प्रायः लंदन , दुबई और न्यूयॉर्क में)




हिंदी, जो भारत की राजभाषा और देश के बहुत बड़े भूभाग की जनभाषा है, अपनी सीमाओं को लांघकर अब एक वैश्विक भाषा के रूप में स्वीकार की जा रही है। हिंदी की इस विकास यात्रा में जहां बॉलीवुड, भारतीय अर्थव्यवस्था और डिजिटल प्रसार का योगदान है, वहीं एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्थायी योगदान प्रवासी साहित्यकारों का भी है। विश्व के विभिन्न कोनों में बसे ये रचनाकार न सिर्फ हिंदी को जीवित रख रहे हैं, बल्कि उसे नए विषयों, नई शैलियों और अंतरराष्ट्रीय संवेदना से समृद्ध करके उसके वैश्विक विकास को गति और गरिमा प्रदान कर रहे हैं। इसमें दो तरह के साहित्यकार हैं पहले वे भारतीय जो अपने बच्चों के संग विदेश जा बसे हैं, दूसरे वे  विदेशी मूल के लोग जो हिंदी सीखकर नवाचारी लेखन कर रहे हैं।


प्रवासी साहित्य यानी 'डायस्पोरा लिटरेचर' उस साहित्य को कहते हैं जो मूल देश से दूर, किसी अन्य देश में बस गए लेखकों द्वारा रचा जाता है। हिंदी प्रवासी साहित्य की शुरुआत मुख्यतः उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में फिजी, मॉरिशस, सूरीनाम, त्रिनिदाद जैसे देशों में गिरमिटिया मजदूरों के रूप में गए भारतीयों की संतानों के साहित्य से होती है। उत्तर-द्वितीय विश्वयुद्ध काल में, विशेषकर 1960 के दशक के बाद से, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, मध्य-पूर्व आदि देशों में पढ़ने, काम करने या बसने गए भारतीय मूल के लेखकों के योगदान को स्वीकार किया जाना वांछित है । जिन्होंने हिंदी में सृजन जारी रखा और उसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई।




 अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के विकास में प्रवासी साहित्यकारों के बहुआयामी योगदान ..


प्रवासी साहित्यकार विदेशी धरती पर हिंदी के सबसे प्रत्यक्ष और प्रभावी प्रतिनिधि हैं। उनकी रचनाएँ, उनके द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन, गोष्ठियाँ, पत्रिकाएँ और वेबसाइट्स स्थानीय लोगों को हिंदी भाषा और उसके माध्यम से व्यक्त होने वाली भारतीय संस्कृति, इतिहास, दर्शन और समकालीन सरोकारों से सीधे परिचित कराते हैं। यह अनौपचारिक प्रचार-प्रसार अत्यंत प्रभावी होता है।


 भारत में भी विदेश के प्रति अतिरिक्त अनुराग के चलते प्रवासी रचनाकारों तथा उनके लिखित साहित्य को हाथों हाथ लिया जाता है। कई संस्थान प्रवासी रचनाकारों को सम्मान प्रदान करते हैं।


    सांस्कृतिक पुल का निर्माण: 


प्रवासी रचनाकार भारतीय मूल्यों, परंपराओं, त्योहारों और जीवन दृष्टि को अपनी रचनाओं में पिरोते हैं। साथ ही, वे विदेशी समाज के साथ भारतीय समाज के टकराव, समन्वय और आत्मसातीकरण की जटिल प्रक्रियाओं को भी चित्रित करते हैं। इससे दोनों संस्कृतियों के बीच एक साहित्यिक पुल का निर्माण होता है।


    भौगोलिक विस्तार: प्रवासी लेखकों ने हिंदी को न्यूयॉर्क, लंदन, टोरंटो, सिडनी, दुबई, टोक्यो जैसे महानगरों तक पहुँचाया है। इन शहरों में हिंदी की साहित्यिक गतिविधियाँ, पत्र-पत्रिकाएँ और लेखक समूह सक्रिय हैं, जो हिंदी को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित कर रहे हैं।


    भाषा की जीवंतता का संरक्षण: विदेशी परिवेश में, जहाँ अंग्रेजी या अन्य स्थानीय भाषाओं का दबदबा है, हिंदी में सृजनात्मक लेखन करना अपने आप में भाषा के प्रति प्रतिबद्धता और उसे जीवंत रखने का संघर्ष है। यह प्रयास हिंदी को केवल भारत तक सीमित न रहने देकर उसे वैश्विक भाषा बनाने में सहायक सिद्ध हो रहा है।


लेखन की विषयवस्तु में नवाचार और विस्तार:


    द्वंद्व और अस्तित्व की खोज , प्रवासी साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है । 'प्रवासी चेतना' मूल देश और नए देश के बीच फटे हुए मन, अस्मिता की तलाश, सांस्कृतिक अलगाव, पीढ़ीगत अंतराल (विशेषकर प्रवासी माता-पिता और उनकी विदेश में पली-बढ़ी संतानों के बीच), नस्लीय भेदभाव और एक नई पहचान गढ़ने के संघर्ष को व्यक्त करती है। यह विषयवस्तु हिंदी साहित्य में एक नया और गहन आयाम जोड़ती है, जो भारत में रचे जा रहे साहित्य में सीमित रूप से ही उपलब्ध हो सकता था।


   वैश्विक परिप्रेक्ष्य: प्रवासी लेखकों का दृष्टिकोण और अभिव्यक्ति का कैनवास स्वाभाविक रूप से अधिक वैश्विक होता है। वे भारतीय मुद्दों जैसे राजनीति, सामाजिक समस्याएँ, पर्यावरण को एक अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में देखते और प्रस्तुत करते हैं। साथ ही, वे वैश्विक घटनाओं युद्ध, आतंकवाद, आर्थिक संकट, प्रवासन नीतियाँ पर हिंदी में टिप्पणी करते हैं, जिससे हिंदी पाठकों का दृष्टिकोण विस्तृत होता है।


    नए जीवन-मूल्यों और चुनौतियों का चित्रण: विदेश में रहते हुए प्रवासियों को जिन सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है , एकाकीपन, वृद्धावस्था में सहारे का अभाव, लैंगिक भूमिकाओं में बदलाव, सांस्कृतिक रूढ़ियों से मुक्ति और नए सिरे से जीवन की शुरुआत आदि,  ये सब प्रवासी साहित्य के प्रमुख विषय बने हैं, जो हिंदी साहित्य की परिधि को विस्तृत करते हैं।


   भाषाई सम्मिश्रण या मिक्सिंग , फ्यूजन :


 प्रवासी लेखक अक्सर अपनी रचनाओं में हिंदी के साथ अंग्रेजी या अन्य स्थानीय भाषा के शब्दों का प्राकृतिक रूप से प्रयोग करते हैं।  साहित्यिक शैली और प्रस्तुति में प्रयोगधर्मिता उनके द्विभाषी जीवन की वास्तविकता को दर्शाता है और हिंदी को एक लचीली, समावेशी भाषा के रूप में प्रस्तुत करता है, जो नए शब्दों और अभिव्यक्तियों को आत्मसात कर सकती है।


    विधाओं में विविधता: प्रवासी लेखकों ने न सिर्फ कविता, कहानी, उपन्यास जैसी पारंपरिक विधाओं में, बल्कि यात्रा वृतांत, संस्मरण, निबंध, डायरी लेखन, ब्लॉग विदेशी छंद जैसे सेनेट, हाइकु, टांका आदि को हिंदी में स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।


  अब डिजिटल माध्यमों पर नई विधाओं (जैसे माइक्रो-ब्लॉगिंग, सोशल मीडिया कविता) में भी सक्रियता से लिखा जा रहा है। यह हिंदी साहित्य की अभिव्यक्ति के तरीकों को समृद्ध करता है।


    प्रस्तुतिकरण में आधुनिकता: डिजिटल युग में प्रवासी लेखक अक्सर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स, ई-पत्रिकाओं, सोशल मीडिया और ऑडियो-विजुअल माध्यमों का उपयोग करके अपनी रचनाओं को प्रस्तुत करने में अग्रणी रहे हैं। करोना काल ने गूगल मीट, फेसबुक लाइव, यू ट्यूब  आदि से  हिंदी साहित्य को नए पाठक वर्ग तक पहुँचाने में मदद की है।


साहित्यिक संस्थाओं और प्रकाशन का विकास:


    किताबों ,पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन साहित्य को स्थाई स्वरूप देते हैं।प्रवासी लेखकों ने विदेशी धरती पर हिंदी की अनेक महत्वपूर्ण पत्रिकाओं की स्थापना की और संचालित किया है।


  'इन्हें भी जोड़े व मुझे वर्ड फाइल भेज दें - प्रमुख प्रवासी पत्रिकाओं यथा भारत से प्रकाशित गर्भनाल, प्रवासी जगत, प्रवासी चेतना; नीदरलैंडस से प्रकाशित साहित्य का विश्व रंग; कनाडा से प्रकाशित हिंदी चेतना, साहित्य कुंज, हिंदी एब्रॉड एवं वसुधा; अमेरिका से प्रकाशित विश्वा, सौरभ, सेतु, ई-कल्पना एवं अनन्य; न्यूजीलैंड से प्रकाशित भारत दर्शन; ब्रिटेन से प्रकाशित पुरवाई, आधुनिक साहित्य व लेखनी; सिंगापुर से प्रकाशित सिंगापुर संगम आदि आदि प्रिंट , ई मीडिया माध्यमों  पर  न सिर्फ प्रवासी बल्कि भारत के रचनाकारों के लिए भी परस्पर संवाद का एक महत्वपूर्ण मंच बनीं हुई हैं। इन्होंने हिंदी साहित्य की निरंतरता और प्रवासी रचनाओं के प्रकाशन को सुनिश्चित किया है।


लेखक संगठन और गोष्ठियाँ: विभिन्न देशों में हिंदी लेखक संघ, हिंदी समितियाँ और साहित्यिक मंच सक्रिय हैं। भारतीय दूतावास भी हिंदी रचनाकारों को जोड़कर आयोजन कर रहे हैं। ये संस्थाएँ कवि सम्मेलनों, गोष्ठियों, सेमिनारों और कार्यशालाओं का आयोजन करके साहित्यिक वातावरण बनाए हुए हैं। इससे नए लेखकों को प्रोत्साहन मिलता है । ये हिंदी साहित्य को क्षेत्रीय सामुदायिक गतिविधि से जोड़ती दिखती हैं।


    प्रकाशन की सुविधा: प्रवासी लेखकों ने कई छोटे-बड़े प्रकाशन गृह भी स्थापित किए हैं या स्थानीय प्रकाशकों को हिंदी साहित्य छापने के लिए प्रेरित किया है, जिससे प्रवासी रचनाओं के प्रकाशन का मार्ग प्रशस्त हुआ है। आर्थिक रूप से प्रवासी साधन सम्पन्न हैं अतः वे भारत में भी बड़े प्रकाशकों से सहज ही छप रहे हैं।


शैक्षणिक और बौद्धिक योगदान:


    विदेश में हिंदी शिक्षण में कई प्रवासी साहित्यकार योगदान कर रहे हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों में वे हिंदी भाषा और साहित्य पढ़ाते हैं। वे न केवल भाषा सिखाते हैं बल्कि हिंदी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक शैक्षणिक विषय के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उनके शोध और आलोचनात्मक लेखन से हिंदी साहित्य को नए सैद्धांतिक ढांचों में समझने का अवसर मिलता है।


    लोक भाषा और अनुवाद कार्य: प्रवासी लेखक अक्सर द्विभाषी या बहुभाषी होते हैं। वे हिंदी साहित्य को विदेशी भाषाओं में और विदेशी साहित्य को हिंदी में अनूदित करके सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देते हैं। इससे हिंदी साहित्य को वैश्विक पाठक मिलते हैं और हिंदी पाठकों को विश्व साहित्य से परिचित होने का मौका मिलता है।


प्रवासी साहित्यकारों का मार्ग सरल नहीं है। उन्हें अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।   प्रकाशन और वितरण की समस्या: विदेशों में हिंदी पुस्तकों का प्रकाशन महँगा है और भारत से पुस्तकें मँगवाना या वितरित करना कठिन एवं खर्चीला होता है ।  पाठक वर्ग का सीमित होना: विदेशों में हिंदी पढ़ने-समझने वालों की संख्या सीमित है, जिससे पाठकीय प्रतिक्रिया और प्रोत्साहन का अभाव रहता है।


  सांस्कृतिक अलगाव का खतरा: लंबे समय तक विदेश में रहने से मूल संस्कृति और भाषा के प्रति सूक्ष्म अलगाव पैदा हो सकता है, जिसका प्रभाव रचना पर पड़ सकता है।


   पीढ़ीगत भाषाई अंतराल: दूसरी-तीसरी पीढ़ी के प्रवासियों के लिए हिंदी को सृजनात्मक स्तर पर थामे रखना एक बड़ी चुनौती है।


  मुख्यधारा में पहचान की कठिनाई: कभी-कभी भारत की साहित्यिक मुख्यधारा में प्रवासी साहित्य को उचित स्थान और मान्यता मिलने में समय लगता है। डिजिटल क्रांति ,  इंटरनेट, ई-पुस्तकें, ऑनलाइन पत्रिकाएँ, सोशल मीडिया, ब्लॉग्स और ऑडियो-विजुअल प्लेटफॉर्म्स ने प्रकाशन और वितरण की बाधाओं को काफी हद तक दूर कर दिया है। भविष्य की संभावनाएँ उज्ज्वल हैं।  प्रवासी लेखक इनका भरपूर उपयोग कर रहे हैं।


  भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव के साथ-साथ हिंदी की माँग भी बढ़ रही है। विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी पाठ्यक्रमों का विस्तार हो रहा है। दूसरी-तीसरी पीढ़ी के कई प्रतिभाशाली युवा, जो द्विभाषी हैं, हिंदी में रचनात्मक लेखन को नए रूपों में आगे बढ़ा रहे हैं।


बढ़ता सहयोग , विश्वविद्यालय स्तर पर आदान प्रदान, भारत और विदेशों के साहित्यकारों, प्रकाशकों और संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ रहा है, जिससे प्रवासी साहित्य को अधिक पहचान मिल रही है।


अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के विकास में प्रवासी साहित्यकारों का योगदान अतुलनीय और बहुआयामी है। वे केवल भाषा को बचाए रखने वाले संरक्षक ही नहीं, बल्कि उसे नए विषयों, नई संवेदनाओं और नए प्रयोगों से समृद्ध करने वाले नवोन्मेषक भी हैं। उन्होंने हिंदी को एक वैश्विक भाषा के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनकी रचनाएँ प्रवासी भारतीयों के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक अनुभवों का अद्वितीय दस्तावेज हैं, जो हिंदी साहित्य की विषयवस्तु को अभूतपूर्व विस्तार देती हैं। डिजिटल युग में उनकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। निस्संदेह, हिंदी के वैश्विक मानचित्र पर अपना गौरवशाली स्थान बनाने में प्रवासी साहित्यकारों का लेखनीय संघर्ष और सृजनात्मक ऊर्जा एक निर्णायक कारक रही है और भविष्य में भी रहेगी। वे हिंदी को 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना को साकार करते हुए वास्तव में विश्वभाषा बनाने की दिशा में अग्रसर हैं।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


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