नाटक
अमृत घट
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ए १ , शिला कुंज , नयागांव , जबलपुर ४८२००८
मो ७०००३७५७९८
vivekranjan.vinamra@gmail.com
कलाकार दल व संसाधन
नांदी पाठ हेतु पुरुष वाचक स्वर व स्त्री वाचक स्वर
प्रोजेक्टर व बैकग्राउंड पर्दा जिस पर यथा वर्णित फिल्मांकित दृश्यो का उपयोग किया जावेगा .
१ सूत्रधार हरे गाउन में सुसज्जित समुद्र
२ सुदर्शन चक्रधारी मुकुट वस्त्राभूषण में सुसज्जित भगवान विष्णु ,
३ मुकुट वस्त्राभूषण में सुसज्जित देवता गण ,
४ राक्षसी वेशभूषा में सज्जित राक्षस दल,
५ राक्षसी वेशभूषा में सज्जित दैत्य प्रमुख ,
६ धन्वन्तरि वैद्य समुचित वेशभूषा में ,
७ विश्वमोहिनी स्वरूप में सुसज्जित युवती .
नेपथ्य स्वर में नांदी पाठ
पुरुष स्वर ... हम सबमें सदैव सात्विक व आसुरी वृत्तियां उपस्थित होती हैं . यह हम पर निर्भर है कि हम उनमें से किसका और कैसे रचनात्मक उपयोग करते हैं , तथा अपने जीवन को सकारात्मक दिशा दे पाते हैं . पौराणिक आख्यानो में मानवीय प्रवृत्तियो का लाक्षणिक प्रदर्शन मिलता है .समुद्र मंथन में धन की देवी लक्ष्मी व जीवन के अमरत्व तथा समाप्ति के संजीवन रसों अमृत व विष सहित १४ रत्नों के प्रादुर्भाव की कथा वर्णित है . बिना धन के आज जीवन संभव ही नही दिखता किंतु जीवन का परम सुख व उद्देश्य धन नही, संतोष है .
स्त्री स्वर .. समुद्र मंथन से लक्ष्मी व अमृतघट प्राप्त करने के पौराणिक कथानक का यह नाट्य प्रदर्शन देवत्व व आसुरी वृत्तियो का प्रदर्शन है . काश दार्शनिक विवेचना कर इस कथानक से हम अमृत जीवन संदेश समझ सकें .
पर्दा उठता है ......
फोकस लाइट में हरे गाउन में सूत्रधार समुद्र का एक ओर से मंच पर प्रवेश , बैकग्राउंड में लहरो के उमड़ घुमड़ क्रंदन की ध्वनि
सूत्रधार ... मैं क्षीर सागर हूं . अथाह जल राशि . मुझ में अमृत , विष , वारुणी , लक्ष्मी , जैसे १४ महा तत्व सहित न जाने क्या क्या समाहित हैं . जल रंग हीन, गंध हीन होता है . जल का स्वयं का कोई आकार नहीं होता . यह वही आकार ले लेता है जिस पात्र में इसे रखा जाता है .पानी को किसी एक ही पात्र में चाकू से काटकर भी विभाजित नही किया जा सकता . इस तरह जल संस्कृतियो के परस्पर घुल मिल जाने की प्रक्रिया का द्योतक है .
आईये घड़ी को उल्टा घुमायें और आप सबको ले चलें उस पौराणिक लाक्षणिक कथा के दृश्य तक जहां मेरा मंथन करके देवताओ के अमरत्व के लिये अमृत प्राप्त किया गया था .
दूसरी ओर से फोकस लाइट में सुदर्शन चक्रधारी भगवान विष्णु का मंच पर प्रवेश पीछे पीछे देवता दल का मंच पर आगमन
विष्णु ... हे देवताओ ! अमृत प्राप्ति के लिये मन्दराचल पर्वत को मथानी तथा वासुकी नाग को नेती बना कर समुद्र मंथन करना होगा . मैने योजना बना ली है इसके लिये हमें दैत्यो की शक्ति का भी बुद्धिमत्ता से उपयोग करना पड़ेगा ,उन्हें निमंत्रित किया भी जा चुका है. स्वयं मैं कच्छप अवतार लेकर मन्दराचल पर्वत को अपनी पीठ पर रखकर उसका आधार बन जाउंगा . वासुकी नाग को रस्सी की तरह नेति बनाने पर उसके कष्ट को मुझे हरना होगा .मैं इसके लिये उसे गहन निद्रा में सुला रहा हूं . हे देवताओ ! आप लोग वासुकी को मुख की ओर से पकड़िये .
देवता ... हे भगवन आप यह क्या कह रहे हैं , मंथन के लिये वासुकी को मुंह से पकड़ने का अर्थ सीधे ही हमारा काल ग्रस्त होने को न्यौता न होगा क्या भगवन ?
विष्णु .. हे देवताओ ! समुद्र मंथन हेतु आपका सामना मूढ़ राक्षसो से है . आपको अभी ही नही आगे भी अनेक बार साम, दाम , दण्ड, भेद की नीति से मेरे बताये मार्ग पर ही चलना होगा . तभी हम अपना मन्तव्य पूर्ण कर पायेंगे . अतः तर्क कुतर्क किये बिना आप वही कीजीये जो मैं बहुत सोच विचार कर योजना पूर्ण तरीके से कह रहा हूं . फिलहाल बिना समय व्यर्थ किये , आप सब वासुकी के मुंह की ओर बढ़िये , राक्षस गण पहुंचते ही होंगे .
बैकग्राउंड पर्दे पर प्रोजेक्टर की मदद से समुद्र मंथन का दृश्य .
राक्षस दल का गदा लहराते हुये , जोर जोर से हंसते हुये दर्शको की ओर से मंच पर प्रवेश होता है .
देवताओ को वासुकी नाग के मुख की ओर बढ़ता देखकर विपरीत बुद्धि वाले दैत्य परस्पर मंत्रणा करते हैं . राक्षस दल की खुसुर पुसुर
एक राक्षस .. हे दैत्य राज ! वासुकी नाग को मुख की ओर से पकड़ने में अवश्य कुछ न कुछ लाभ होगा, तभी देवता उस ओर बढ़ रहे हैं .
दैत्य प्रमुख ... गरजते हुये ... हे देवताओं ! हम दैत्य किसी भी शक्ति में आपसे कम नहीं हैं, फिर हमें वासुकी की पूंछ पकड़ने के लिये क्यों कहा जा रहा है ? हम मुँह की ओर ही स्थान लेंगे.
विष्णु .. हे दैत्य राज ! आप अकारण ही समुद्र मंथन प्रारंभ होने से पहले ही क्यों नाराज हो रहे हैं आप लोग ही वासुकी को मुंह की ओर से पकड़ लीजीये , इसमें भला देवताओ को क्या आपत्ति हो सकती है ?
देवता मुस्कराते हुये कनखियो से भगवान विष्णु की ओर देखते हुये वासुकी नाग के पूँछ की ओर का स्थान ले लेते हैं .
सूत्रधार ... समुद्र मंथन आरम्भ हुआ और भगवान कच्छप की एक लाख योजन चौड़ी पीठ पर मन्दराचल पर्वत को देवताओ व राक्षसो द्वारा घुमाया जाने लगा . समुद्र मंथन में सर्वप्रथम जल से हलाहल विष पात्र बाहर आया . उस विष की ज्वाला से सभी प्रकृति जलने लगी .
नेपथ्य से स्त्री स्वर .. इस विपदा से निपटने के लिये सभी ने मिलकर भगवान शंकर की प्रार्थना की. सब के आव्हान पर भगवान महादेव ने उस विष पात्र को हथेली पर रख कर पी लिया , किन्तु उसे कण्ठ से नीचे नहीं उतरने दिया. उस कालकूट विष के प्रभाव से ही शिव जी का कण्ठ नीला पड़ गया है .
सूत्रधार .... इसीलिये महादेव जी को नीलकण्ठ भी कहते हैं। विष के प्रभाव से शिव जी का मस्तिष्क गरम हो गया , तब देवताओ ने उनके सिर पर ठंडे जल से अभिषेक किया .आज भी इसीलिये शिवलिंग पर पानी चढ़ाने की परम्परा बनी हुई है .
नेपथ्य से स्त्री स्वर... शिव जी के विषपान के समय थोड़ा सा विष पृथ्वी पर टपक गया जिसे साँप, बिच्छू आदि विषैले जन्तुओं ने ग्रहण कर लिया. भगवान शंकर द्वारा विष पान कर लेने के पश्चात् फिर से समुद्र मंथन प्रारम्भ हुआ. दूसरा रत्न कामधेनु गाय निकली जिसे ऋषियों को भेंट कर दिया गया.
सूत्रधार ....फिर उच्चैःश्रवा अश्व निकला जिसे दैत्यराज बलि ने रख लिया. तदोपरांत ऐरावत हाथी जल मंथन से प्रगट हुआ जिसे देवराज इन्द्र ने ग्रहण किया. और
ऐरावत के पश्चात् कौस्तुभमणि समुद्र से निकली उसे विष्णु भगवान ने ले लिया.
नेपथ्य से स्त्री स्वर ... फिर कल्पवृक्ष निकला और रम्भा नामक अप्सरा निकली. इन दोनों को देवलोक में स्थान दिया गया.
सूत्रधार ..आगे फिर समु्द्र मंथन से लक्ष्मी जी प्रगट हुईं . लक्ष्मी जी ने स्वयं बढ़कर भगवान विष्णु के गले में जयमाल डालकर उनका वरण कर लिया. उसके बाद वारुणी कन्या के रूप में प्रकट हई , जिसे दैत्यों ने ग्रहण किया. फिर एक के पश्चात एक चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष तथा शंख निकले और अन्त में धन्वन्तरि वैद्य अमृत घट लेकर प्रकट हुये.
आमोद संगीत
दृश्य ...
धन्वन्तरि वैद्य अमृत का घट लेकर मंच पर प्रकट होते हैं .. धन्वन्तरि के हाथ से अमृतघट को दैत्यों ने छीन लिया और उसके लिये आपस में ही लड़ने लगे।
सूत्रधार .... देवताओं के पास दुर्वासा के श्राप से इतनी शक्ति नहीं रह गई कि वे दैत्यों से लड़कर उस अमृत को ले सकें इसलिये वे निराश खड़े हुये दैत्यो को आपस में लड़ता हुआ देख रहे थे . देवताओं की निराशा को देखकर भगवान विष्णु ने तत्काल मोहिनी रूप में प्रगट हुये .
मंच पर विश्वमोहनी का नृत्य करते हुये तीक्ष्ण नयनो से देखते हुये प्रवेश ..
सूत्रधार ..विश्वमोहिनी रूप को इस तरह सम्मुख देखकर दैत्य तथा देवताओं की तो बात ही क्या, स्वयं ब्रह्मज्ञानी, कामदेव को भस्म कर देने वाले, भगवान शंकर भी मोहित होकर उनकी ओर बार-बार निहारने लगे.
दैत्यों ने उस नवयौवना सुन्दरी विश्वमोहिनी को अपनी ओर आते हुये देखा तो वे अपना सारा झगड़ा भूल कर उसी सुन्दरी की ओर कामासक्त होकर एकटक देखने लगे.
दैत्य प्रमुख ... "हे सुन्दरी! तुम कौन हो ? लगता है कि हमारे झगड़े को देखकर उसका निपटारा करने के लिये ही हम पर कृपा कटाक्ष कर रही हो.आओ सुभगे ! तुम्हारा स्वागत है. हमें अपने सुन्दर कर कमलों से यह अमृतपान कराओ।"
विश्वमोहिनी... "हे दानव राज और देवताओ ! आप सब महर्षि कश्यप जी के पुत्र होने के कारण भाई-भाई हैं फिर भी परस्पर लड़ते क्यों हैं . मैं तो एक स्वेच्छाचारिणी स्त्री हूँ. बुद्धिमान लोग ऐसी स्त्री पर कभी विश्वास नहीं करते . फिर हे असुरों ! तुम कैसे मुझ पर विश्वास करके अमृत पान करवाने का आग्रह कर रहे हो ? अच्छा यही है कि तुम सब स्वयं मिलजुल कर अमृतपान कर लो "
सूत्रधार ..विश्वमोहिनी के ऐसे नीति कुशल वचन सुन कर उन कामान्ध दैत्यो, दानवों और असुरों को उस पर और भी विश्वास हो गया.
दैत्य प्रमुख .. हे सुन्दरी! तुम्हारे सुन्दर चेहरे को देखकर और नीति कुशल संभाषण सुनकर ही हमें तुम पर भरोसा हो रहा है. तुम जिस प्रकार बाँटोगी हम उसी प्रकार अमृतपान कर लेंगे. तुम ये घट ले लो और हम सब को अमृत पान करवाने का कष्ट करो "
विश्वमोहिनी ... अमृत घट लेते हुये .... हे देवताओं ! और हे दैत्यों ! आप सबने अपने अगाध श्रम व बुद्धि कौशल से समुद्र मंथन जैसा असाधारण कार्य संपन्न किया है , और यह अमृत घट प्राप्त किया है . आपने मुझे अमृत पान करवाने की जिम्मेदारी सौंपी है ,यह मेरे लिये गौरव का विषय है .मेरा आग्रह है कि आप दोनो ओर पंक्ति बद्ध होकर शांति पूर्वक बैठने की कृपा करें जिससे निर्विघ्न रूप से और परम आनंद से आप अमृतपान कर सकें और आपको अमरत्व प्राप्त हो .
दैत्य व देवता अलग अलग पंक्तियो में बैठ जाते हैं . विश्वमोहिनी एक बार दैत्यों को अपने कटाक्ष से देखती और जैसे ही कामांध मदहोश दैत्य ऊपर की ओर आहें भरता मुंह करता वह सामने की पंक्ति में विराजे देवताओं को क्रमिक रूप से अमृतपान कराने लगती . दैत्य उनके कटाक्ष से मदहोश होकर लुढ़कने लगते हैं .
सूत्रधार... सारे देवता अमृत पान कर लेते हैं , किन्तु उनके बीच पहुंच कर एक दैत्य ने भी धोखे से अमृत पान कर लिया . भगवान विष्णु का ध्यान जैसे ही इस ओर गया उन्होने उसका धड़ सर से काट दिया , किन्तु वह तो अमृत पान कर चुका था अतः उसी स्वरूप में उस दैत्य के दोनो टुकड़े आज भी जिन्दा है . केतु का सिर नही है और राहु का धड़ नही है . इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है . भारतीय ज्योतिष के अनुसार ये ही छाया ग्रह सूर्य व चंद्रमा को अवसर मिलते ही ग्रस लेते हैं , जिससे सूर्य ग्रहण व चंद्रग्रहण होने की परिकल्पना की गई है .
धीरे धीरे प्रकाश मद्धिम किया जाता है और परदा गिरता है .
नेपथ्य से स्त्री स्वर ..
समाज में व्याप्त आसुरी वृत्तियां बलवती होकर जब तब मोहिनी रुप स्त्रियों पर कुदृष्टि डालती दिखती हैं .
हर कोई अमर होने की आकांक्षा करता है . समय की रेत पर अपने पदचिन्ह छोड़ जाने के लिये सभी सदैव व्यग्र रहते है . बड़े बड़े किले , राजमहल , भवन शायद इसीलिये बनाये जाते हैं , कि मृत्यु के बाद भी लोग इन स्मारकों के माध्यम से उनके निर्माताओ को याद करें .
दरअसल कोई दिन स्वर्णिम या काला नही होता अपने कर्मो से ही किसी तिथी को सुनहरे अक्षरो से लिखा जा सकता है या हम कुकर्मो से उस पर कालिख पोत सकते हैं . थोड़ी सी दार्शनिक विवेचना करें तो नाटक में देवताओं का चरित्र व्यक्ति के मन में उपजती इच्छाओं को प्रदर्शित करता है, दैत्य हमारी नकारात्मक इच्छाओं और अंतर्निहित बुराइयों के प्रतीक हैं. मस्तिष्क को महासागर के रूप में समझा जा सकता है . विचार और भावनाओ की लहरों के अथाह जल में ही हमारा व्यक्तित्व व सिद्धियां छिपी हुई हैं . मंथन के लिये प्रयुक्त मंदार पर्वत, अर्थात मन और विचार जिनकी एकाग्रता से ही हम जीवन संयोजन कर मोहिनीरूप के भटकाव से बचते हुये ही यश अर्चन का अमृत प्राप्त कर सकते हैं . आईये संकल्प लें और जीवन को भौतिकता के भटकाव से बचाते हुये अमरत्व की निश्चित आध्यात्मिक दिशा पाने के लिये नित नया मन मंथन करें .
मंच पर कलाकार दल उपस्थित होता है , सूत्रधार दर्शको से उनका परिचय करवाता है तथा नाटक के लेखक का नाम उधृत करता है .
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vivek ranjan shrivastava
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