नुक्कड़ नाटक
“गीला-सूखा -हरा नीला "
विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल
( हास्य, व्यंग्य, लोकगीत और संवादों से भरपूर)
समय: 35–40 मिनट
दर्शक वर्ग: आमजन, विद्यार्थी, नगरवासी, कॉलोनी, शहर व ग्रामीण क्षेत्र
उद्देश्य: गीला-सूखा कचरा पृथक्करण के प्रति जन-जागरूकता
पात्रों की सूची (10-12 कलाकार)
1. गब्बर भाई – कचरा लापरवाह
2. चम्पा काकी – जागरूक मोहल्ले वाली
3. चीकू – स्कूल का बच्चा
4. कचरा – कल्पनात्मक पर्यावरण-रक्षक
5. बबलू भैया – आलसी, मज़ाक उड़ाने वाला
6. नगर निगम बाबू
7. स्वच्छता रक्षक दल (3) – समूह जो गीत-नृत्य में भाग लेते हैं
8. नाटक सूत्रधार (1) – कहानी को आगे बढ़ाने वाला
9. भीड़/पड़ोसी/अतिरिक्त पात्र – संवाद में सहभागिता के लिए
-
दृश्य 1: मोहल्ले का चौक परिचय और स्थिति की स्थापना (10 मिनट)
(ढोलक/मंजीरे के साथ, मंच पर प्रवेश)
गीत – उद्घाटन (स्वच्छ भारत धुन में)
चलो रे चलो, गली-गली,
स्वच्छता की अलख जगा दो गली गली ...
नीले डब्बे में रिसाइकिल कचरा
हरे डब्बे में बायो कचरा
छांट के डालो गली गली
सूत्रधार (संजीदा स्वर में) "कहानी है उस मोहल्ले की, जहाँ कचरा भगवान से भी ज़्यादा पूजा जाता है...
नहीं-नहीं, साफ़ करने को नहीं... सब कुछ एक साथ खिचड़ी बनाकर फेंकने को!"
(गब्बर भाई एक बड़ी थैली लटकाए आते हैं)
गब्बर:
"अरे हटो सब! ये देखो, पिज्जा का डिब्बा, केले का छिलका, बासी पराठा और टूटी चप्पल , सब साथ में , अपना घर साफ अपन फुर्सत, अब जाने सफाई कर्मचारी , टैक्स भी तो देते हैं हम भरपूर। गीला-सूखा क्या होता है, ये तो रईसों की बीमारी है!"
(बबलू भैया ठहाका लगाते हैं)
बबलू:
"कचरे का भी धर्म होता है क्या? जो तुम लोग अमीर गरीब , जात-पात में कचरा बाँट रहे हो?" कचरे को स्टेटस मान रहे हो।
(चम्पा काकी झाड़ू लेकर आती हैं)
काकी:
"रे बबुआ, यही तो ज्ञान की बात है!
कचरे को अगर समझदारी से संभालो, तो वही सोना बनता है!"
बायो डिग्रेडेबल कचरा सब्जी के छिलके वगैरह जायेंगे हरी डस्ट बिन में ।
और सूखा कचरा रिसाइकिल किया जाता है नीली डस्ट बिन से ।
---
दृश्य 2: टकराव और संवाद – हास्य व तर्क (10 मिनट)
चीकू:
"गब्बर चाचा, स्कूल में सिखाया गया कि हरा डिब्बा गीले कचरे के लिए है, नीला सूखे के लिए।
अगर आप सब मिलाकर फेंकोगे, तो रीसायकल कैसे होगा?"
गब्बर (हँसते हुए):
"रीसायकल हो या साइकिल , मुझे क्या फ़र्क पड़ता है?"
(बबलू मज़ाक उड़ाता है):
"अरे चीकू, तुम तो धरती बचाने चले हो। पहले मोहल्ला तो बचा लो!"
(तभी स्वच्छता रक्षक दल एंट्री करता है – लोकधुन पर गाते हुए)
गीत (ढोलक पर)
"अरे भैया गब्बर सुन ले बात,
गंदगी से होए हर दिन घात।
गीला और सूखा अलग जो कर,
होगी स्वच्छता घर-घर !"
--
दृश्य 3:
कचरा का आगमन – रूपक और चेतावनी (8 मिनट)
(धुएँ, रोशनी और तेज़ आवाज़ों के साथ कचरा का प्रवेश – डरावना रूप)
कचरा :
"मैं कचरा हूं – तुमने मुझे इकट्ठा कर-कर के राक्षसी बना दिया है।
देखो, नदियाँ काली हो रही हैं, ज़मीन में जहर घुल रहा है!
अब भी समय है – गीला-सूखा अलग करो!"
(गब्बर काँपता है)
गब्बर
"हे कचरा , क्षमा करिए!
अब मैं जान गया कि यही असली धर्म है –
कचरे को सही जगह डालना अच्छा कर्म है !"
-
दृश्य 4: नगर निगम की योजना और समाधान शिविर (6 मिनट)
(नगर निगम बाबू मंच पर आते हैं – फाइलें हाथ में)
निगम बाबू:
"नगर निगम अब हर मोहल्ले में दो डिब्बे देगा – हरा और नीला।
जो परिवार गीला-सूखा कचरा सही से छांटकर देगा, उन्हें कर में छूट और सम्मान मिलेगा।
स्कूल, कॉलोनी और मोहल्लों में ‘कचरा योद्धा’ बनाए जा रहे हैं!"
(चीकू और अन्य बच्चे खुशी से ताली बजाते हैं)
---
दृश्य 5: नाटकीय परिवर्तन – सबका संकल्प (6 मिनट)
गब्बर:
"मैंने अब तय किया है
न सिर्फ़ खुद गीला सूखा कचरा अलग करूँगा, बल्कि सबको समझाऊँगा!"
(बबलू भी लज्जित होकर हाथ जोड़ता है)
बबलू:
"मैंने मज़ाक उड़ाया, अब मदद करूंगा!"
(पूरे मोहल्ले वाले एक सुर में)
"अब नहीं होगी गंदगी – अब होगी समझदारी!"
---
समापन गीत (2 मिनट):
"गीला-सूखा अलग करेंगे,
सबको जागरूक हम करेंगे।
कचरे को भी देंगे सम्मान,
बने स्वच्छ भारत महान!"
अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए कचरे को अलग अलग कलर के डस्टबिन में इकट्ठा करें तो इससे कचरा प्रबंधन, निस्तारण में अभूतपूर्व सहयोग हो जाए ।
---
विशेष निर्देशन के लिए सुझाव:
मंच पर हरे व नीले रंग के बड़े डस्टबिन रखें।
गीतों के बीच तालियाँ, लोक वाद्य (ढोलक, झांझ) का प्रयोग हो।
"कचरा" के दृश्य में धुआँ, साउंड इफेक्ट और विशेष प्रकाश का प्रयोग प्रभावी रहेगा।
नाटक के अंत में जनता से गीला सूखा कचरा अलग रखने की शपथ दिलाई जा सकती है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल
No comments:
Post a Comment