Wednesday, 8 April 2026

साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा

 साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


लेखकीय भावना के साथ न्याय या निर्देशक का व्यवसायिक रूपांतरण, एक बहुआयामी जटिल प्रश्न रहा है।

साहित्य और सिनेमा के बीच का रिश्ता हमेशा से एक ऐसे पुल की तरह रहा है जिसे पार तो बहुतों ने किया, पर उससे कम ही लोग दर्शकों के मन में वह छबि बना पाए, जो उस दर्शक ने एक पाठक के रूप में स्वयं अपने मन में उपन्यास पढ़कर बनाई थी। एक लेखक और साहित्य-अनुरागी होने के नाते, जब पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था' जैसी कालजयी कहानी या महाकवि जयशंकर प्रसाद की 'कामायनी' के अंशों को फिल्मी पर्दे पर उतरते देखा , तो मन एक अनजानी सी रिक्तता और निराशा से भर जाता है। यह निराशा केवल एक दर्शक की नहीं, बल्कि उस पाठक की है जिसने उन शब्दों के 'प्राण' को अपनी कल्पना में जिया है।

सच तो यह है कि सिनेमा और साहित्य के लक्ष्य एक होकर भी अपनी प्रकृति में पूरी तरह भिन्न हैं। साहित्य जहाँ कल्पना की अनंत आकाशगंगा है,व्यावसायिकता से किंचित परे है ,वहीं सिनेमा उसे कैमरे के लेंस और स्क्रीन के फ्रेम में कैद कर देने वाली एक विवश कला है, जो बॉक्स ऑफिस से जुड़ा हुआ है। किताब में लेखकीय भावों का डिस्टार्शन नहीं होता क्योंकि उसकी प्रस्तुति में सिनेमा की तरह अभिनय , निर्देशन , संपादन ,  लोकेशन , फिल्मांकन, पार्श्व, संगीत , गायन वगैरह  ढेर सारे लोग नहीं होते । 


जब प्रसाद जी लिखते हैं"तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन"तो वह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मानवीय चेतना और श्रद्धा का एक गहन दर्शन है।  फिल्मी धुनों में  ऐसे गीत 'शब्दनाद' और गांभीर्य को खो देते है , जो मूल कृति की आत्मा थी।


 फिल्मकार की कोशिश उसे 'लोकप्रिय' और 'दृश्य-योग्य' बनाने की होती है, जबकि रचना पाठक से एक विशेष मानसिक तैयारी और एकांत की मांग करती है। बाज़ार और बॉक्स ऑफिस की ज़रूरतों ने अक्सर महान कृतियों के मौलिक सौंदर्य की बलि चढ़ाई है।

दशकों से फणीश्वरनाथ रेणु की 'तीसरी कसम' से लेकर अमृता प्रीतम की 'पिंजर', आर.के. नारायण की 'गाइड' और दोस्तोएवस्की की रचनाओं पर आधारित 'साँवरिया' जैसी तमाम साहित्य आधारित फिल्में बनती रही हैं। इनमें से कुछ ने आत्मा को छुआ, तो कुछ केवल बाहरी कलेवर तक सीमित रहीं। 'तीसरी कसम' में जो ग्रामीण संवेदना और हीरामन की निश्छलता उतर पाई, वह शायद इसलिए संभव हुई क्योंकि फिल्म के पीछे शैलेंद्र जैसा कवि-हृदय और रेणु की मिट्टी की समझ थी। इसके विपरीत, जब हम 'देवदास' या 'शतरंज के खिलाड़ी' जैसे रूपांतरणों को देखते हैं, तो द्वंद्व और गहरा हो जाता है। जहाँ सत्यजीत रे प्रेमचंद के व्यंग्य को दृश्यों में ढालने में सफल रहते हैं, वहीं आधुनिक सिनेमा अक्सर शरतचंद्र की उस आंतरिक दरिद्रता और आत्म-पीड़ा को मखमली लिबासों और भव्य झूमरों के नीचे दबा देता है।

 फिल्मकार अक्सर कृति के कथानक (Plot) को तो पकड़ लेते हैं, पर उसके 'उद्देश्य' और उस सूक्ष्म सौंदर्य को चित्रित करने में चूक जाते हैं जिसे लेखक ने शब्दों के बीच की रिक्तियों में छिपाया होता है। दृश्य माध्यम की अपनी माँगें हैं। वहाँ संवादों की गति चाहिए, चकाचौंध चाहिए और एक निश्चित समय सीमा का अनुशासन भी। लेकिन साहित्य के पास वह विलासिता है कि वह पाठक को घंटों एक ही विचार या संवेदना में डूबा रहने दे। यही कारण है कि कुछ विरले उदाहरणों को छोड़ दें, तो अधिकांश फ़िल्मी रूपांतरण मूल कृति के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाते।

अंततः, साहित्य एक व्यक्तिगत यात्रा है और सिनेमा एक टीम प्रस्तुति का  सामूहिक अनुभव। किसी भी कालजयी रचना का जो 'शब्दनाद' हमारी अंतरात्मा में गूँजता है, उसे पर्दे के कोलाहल में तलाशना शायद एक कठिन अपेक्षा है। सिनेमा साहित्य का अनुवाद करने की कोशिश तो कर सकता है, लेकिन वह उसकी गरिमा और गांभीर्य का पूर्ण विकल्प कभी नहीं बन सकता। जब भी कोई फिल्मकार किसी महान कृति को हाथ लगाता है, तो वह केवल एक कहानी नहीं उठाता, बल्कि वह उन हज़ारों पाठकों की स्मृतियों और भावनाओं को चुनौती देता है जिन्होंने उस कहानी को अपने भीतर जिया है। अफ़सोस कि अक्सर इस चुनौती में फिल्मकार अपनी तकनीक से तो जीत जाता है, पर संवेदना के धरातल पर प्रायः हार जाता है। 

जिस तरह अनुवादक को मूल लेखक की आत्मा में परकाया प्रवेश कर उसके भाव पकड़ने होते हैं, उससे भी अधिक दुष्कर कार्य साहित्य का फिल्मांकन है, क्योंकि यहां सारी टीम को रचना की आत्मा में परकाया प्रवेश करना वांछित होता है। 

— विवेक रंजन श्रीवास्तव

Tuesday, 7 April 2026

कहानी गर्व गाथा

 कहानी 

गर्व गाथा

लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव


मिलिट्री अकादमी का वह विशाल परेड ग्राउंड... जनवरी की गुनगुनी धूप स्टेडियम के सीने पर कुछ इस तरह उतर रही थी, मानो आकाश स्वयं अपनी स्वर्ण-रश्मियों से देश के प्रहरियों का राजतिलक कर रहा हो। हवा में बूटों की खनक और कड़क कलफ लगी वर्दियों की सरसराहट के बीच एक अनकही बेचैनी और भारी प्रतीक्षा थी। सबकी निगाहें उस मंच पर टिकी थीं, जहाँ से आज शौर्य का एक नया अध्याय घोषित होना था।

सारी परेड के साथ ही मेजर अंजलि अपनी 'सेरेमोनियल ड्रेस' में अविचल खड़ी थीं। उनकी रीढ़ में सेना का अनुशासन था, पर सीने के भीतर एक बहन का हृदय हज़ारों अश्वों की गति से धड़क रहा था। उनका भाई राघव जिसे बचपन में उन्होंने जाने कितनी बार गोद में संभाला था, शौर्य पदक का सबसे बड़ा दावेदार था । उसने आपरेशन सिंदूर में दुश्मन के घर में घुसकर न केवल अपने मिशन को सफल अंजाम दिया था , वहां से अपने घायल साथियों को बचाकर लौटने का कमाल जो किया था ।


अचानक लाउडस्पीकर पर गूँजी उस गंभीर आवाज़ ने फिजा में प्राण फूँक दिए,  "लेफ्टिनेंट राघव ... 'ऑपरेशन सिंदूर' में अदम्य साहस के लिए... शत्रु की भीषण गोलाबारी के बीच अपने मिशन डिस्ट्रॉय मिलिटेंट को पूरा कर , चार घायल साथियों को सुरक्षित वापस निकाल लाने हेतु उन्हें 'शौर्य चक्र' से सम्मानित किया जाता है।

सारा परेड ग्राउंड हर्ष में डूब गया।  

घोषणा समाप्त होते ही वह दृश्य उपस्थित हुआ जिसने अकादमी के इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया। अंजलि ने सैन्य गरिमा और बहन के लाड़ को एकाकार करते हुए, बिना एक पल गँवाए राघव को अपनी मज़बूत भुजाओं में भरा और उन्हें अपने कंधों पर उठा लिया। तालियों की गड़गड़ाहट ने आसमान को छू लिया। सैनिकों की एड़ियाँ एक साथ चटककर जैसे इस अभिनव सम्मान को सलामी दे रही थीं।


माइक से घोषणा हुई,  लेफ्टिनेंट राघव को उनके अनुभव साझा करने हेतु मंच पर आमंत्रित किया गया। 


 राघव जब मंच पर पहुँचे, तो उनकी आँखों में नमी थी पर मस्तक गर्व से उन्नत था।

राघव ने माइक संभाला। पूरा मैदान पिन-ड्रॉप साइलेंस में डूब गया। उनकी आवाज़ में एक ठहरी हुई गंभीरता थी, 

"उस रात 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान जब दुश्मन की मशीनगनें आग उगल रही थीं और बारूद की गंध ने साँस लेना दूभर कर रखा था, तब दो घंटे तक मौत हमसे बस चंद फुट की दूरी पर खड़ी मुस्कुरा रही थी। एक पल को लगा कि शायद आज जिंदगी का वह आखिरी पन्ना लिखा जाएगा जिसे दादाजी 'सिपाही की अधूरी दास्तान' कहते थे। पर तभी मुझे अपने उन चार घायल साथियों की सिसकियाँ सुनाई दीं, जो अपनी आखिरी साँसों में भी मुझ पर भरोसा टिकाए हुए थे।"

राघव ने एक क्षण का विराम लिया और सामने खड़ी अपनी माँ और पिता की ओर देखा। 

" हमारी टुकड़ी अपने मिशन को सफलता पूर्वक अंजाम दे चुकी थी ,  मैंने सोचा, अगर मैं आज शहीद हो गया, तो मेरी वीरता केवल यादों में सिमट जाएगी। पर अगर मैं लड़कर लौट आया, तो मैं अपने देश की आँखों में वह चमक देख पाऊँगा जो जीत से आती है। मैंने मौत से नहीं, जीवन से आँखें मिलाईं। मैंने तय किया कि मैं मरूँगा नहीं, बल्कि अपने जवानों को ज़िंदा लेकर घर लौटूंगा। क्योंकि असली विजय तिरंगे में लिपट कर लौटने में नहीं, बल्कि तिरंगे को आसमान की ऊँचाइयों तक फहराते रहने में है।"

दूर खड़ी माँ रेखा अपने आँचल से गर्व के आँसू पोंछ रही थीं। पास ही खड़े कर्नल सूर्यप्रताप 

 की वर्दी पर लगे पदक आज सूर्य की रोशनी में अधिक दीप्तिमान हो रहे थे। उनका गला रुँध गया था। यह उस पिता का संतोष था जिसका बेटा 'लड़कर' और 'जीतकर' लौटा था।


तीन वर्ष बाद...

वही परेड ग्राउंड, वही सुनहरी धूप। पर इस बार परिदृश्य बदला हुआ था। राघव अब कैप्टन थे। आज वे स्वयं किसी के कंधे पर सवार नहीं थे, बल्कि उन्होंने एक युवा लेफ्टिनेंट, विक्रम को अपने कंधों पर उठा रखा था। विक्रम ने एक जलती हुई बस्ती से तीन मासूम नागरिकों को जान पर खेलकर आग से  बचाकर   सुरक्षित  निकाला था।

पास में खड़े विक्रम के पिता, जो एक साधारण किसान थे, अपनी फटी बिवाइयों वाले हाथों से आँखों की नमी पोंछ रहे थे। राघव ने विक्रम को नीचे उतारा और उन के हाथों को चूमते हुए कहा, "बाबूजी, मुस्कुराएं,  आपका बेटा आज एक विजेता बनकर घर लौटेगा। यही इस वर्दी की सबसे बड़ी जीत है।"

लेफ्टिनेंट कर्नल बन चुकी अंजलि गर्व से शौर्य के अभिषेक की इस परंपरा को आगे बढ़ते देख रही थीं। उन्होंने मन ही मन दोहराया"वीरता का वास्तविक उत्सव शहादत के शोक में नहीं, बल्कि शौर्य के जीवंत उल्लास में है।"

 परेड ग्राउंड पर बना वह चित्र मात्र एक परिवार की कहानी नहीं थी। वह हर उस भारतीय घर की नई प्रतिज्ञा थी जहाँ वर्दी को केवल कफ़न नहीं, बल्कि शान का लिबास माना जाता है। वह एक ऐसी चेतना बन चुकी थी, जहाँ हम शहीदों को नमन तो करते हैं, पर अपने जीवित वीरों को कंधों पर उठाकर यह उद्घोष करते हैं कि, सैनिक की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका वह जीवन है, जो उसने अपने देश के गौरव को अपनी आँखों से देखने के लिए बचा कर रखा है।


— विवेक रंजन श्रीवास्तव

Monday, 2 March 2026

भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र

 भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र


विवेक रंजन श्रीवास्तव


हिंदी ललित निबंध के संसार में पंडित विद्यानिवास मिश्र एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से मिट्टी की सोंधी गंध और वेदों की ऋचाओं को एक साथ पिरोया है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने जिस ललित निबंध की आधारशिला रखी थी, मिश्र जी ने उसे अपने अद्भुत पांडित्य और लोक-अनुभवो को शब्दों से एक विशाल प्रासाद में परिवर्तित कर दिया। उनका लेखन केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस अविरल धारा का प्रवाह है, जो गाँवों की पगडंडियों से होती हुई दर्शन के शिखर तक पहुँचती है।

उनके निबंध अनुभूति और शिल्प का संगम हैं।

मिश्र जी के निबंधों का 'ललित' पक्ष उनके आत्मपरक दृष्टिकोण में निहित है। उनके निबंधों में 'मैं' का अहंकार नहीं, बल्कि 'मैं' की आत्मीयता घुली होती है। जब वे 'कदम की फूली डाल' या 'आम्र-मंजरी' की बात करते हैं, तो वे केवल प्रकृति का वर्णन नहीं कर रहे होते, बल्कि वे पाठक को अपने साथ उस संवेदन-धरातल पर ले जाते हैं जहाँ तर्क पीछे छूट जाता है और केवल प्रवाही रसात्मकता शेष रहती है।

उनकी असाधारण स्मृतयो का रोचक वर्णन लालित्य की बहुत बड़ी विशेषता है। वे वर्तमान की किसी छोटी-सी घटना जैसे बारिश की बूंदों का गिरना , को भी निबंध में इतिहास और पुराणों की महान परंपराओं से जोड़ देते हैं। उनके लेखन में शब्द 'अर्थ' ही नहीं देते, बल्कि 'ध्वनि' और 'दृश्य' भी पैदा करते हैं। उनके निबंधों में एक प्रकार की 'तरलता' है, जो पाठक के मन में किसी पुराने राग की तरह गूंजती रहती है।

लोक और शास्त्र का अनूठा अद्वैत

विद्यानिवास मिश्र के लेखन की  विशिष्टता है ।उनके निबंधों में लोक और शास्त्र का समन्वय है। जहाँ एक ओर वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और पाणिनी के व्याकरण की सूक्ष्मताओं से परिचित थे, वहीं दूसरी ओर उनके हृदय में लोक-गीतों और ग्रामीण अंचल की स्मृतियाँ रची-बसी थीं। उनके निबंधों में उपनिषदों के सूत्र और कबीर की साखियाँ एक ही धरातल पर आकर संवाद करती हैं। वे अक्सर कहते थे कि भारत की आत्मा महलों में नहीं, बल्कि उन लोरियो में सुरक्षित है जो एक माँ अपने बच्चे को सुलाते समय गाती है।

 

मिश्र जी की कृतियाँ कालजयी हैं। उनमें तथ्यात्मक वैचारिक विस्तार है। ये निबंध भारतीय जीवन-दर्शन के कोश बन गए हैं। उनका निबंध संग्रह 'तुम चंदन हम पानी' भक्ति और समर्पण की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार 'आँगन का पंछी और बनजारा मन' में उन्होंने मनुष्य की उस छटपटाहट को स्वर दिया है जो एक ओर अपनी जड़ों , आँगन से बँधना चाहता है और दूसरी ओर अनंत ज्ञान की खोज में 'बनजारा' बनकर भटकना चाहता है।


उनका सबसे चर्चित निबंध 'मेरे राम का मुकुट भीग रहा है' आधुनिक हिंदी साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है। एक संगीत कार्यक्रम से देर रात घर लौटते अपने पुत्र और अतिथि कन्या की प्रतीक्षा में बैठी एक माँ की ममतामयी चिंता को उन्होंने जिस प्रकार कौशल्या की राम के प्रति चिंता से जोड़ा, वह अद्भुत है। यह निबंध प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि जब तक इस देश में 'मुकुट के भीगने' अर्थात, संस्कृति और मर्यादा के संकट की चिंता जीवित है, तब तक हमारी संवेदनाएँ मृत नहीं हो सकती ।


कुशल संपादक और पत्रकारिता के प्रतिमान


पंडित जी का संपादन कर्म उनके लेखन जितना ही प्रभावशाली था। उन्होंने 'नवभारत टाइम्स' जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादक के रूप में हिंदी पत्रकारिता को एक नई गरिमा और वैचारिक गहराई प्रदान की। उनके संपादन में भाषा की शुद्धता और वैचारिक प्रखरता का विशेष ध्यान रखा जाता था। उन्होंने 'साहित्य अमृत' पत्रिका के माध्यम से नए रचनाकारों को एक मंच दिया और साहित्यिक पत्रकारिता के उच्च मानक स्थापित किए। वे मानते थे कि समाचार केवल सूचना नहीं होते  बल्कि उनकी प्रस्तुति ऐसी हो जिससे वो समाज के मानस को संस्कारित करने का माध्यम बने।

 पंडित विद्यानिवास मिश्र का अवदान यह है कि उन्होंने हिंदी निबंध को रूखेपन और कोरे बौद्धिक विलाप से बाहर निकाला। उन्होंने सिद्ध किया कि परंपरा जड़ नहीं होती, बल्कि वह एक बहती हुई नदी है जो नए युग के साथ मिलकर अपना मार्ग बनाती है। आज के वैश्वीकरण के दौर में, जब व्यक्ति अपनी पहचान खो रहा है, मिश्र जी का साहित्य हमें पुनः अपनी मिट्टी की सुगंध और अपने संस्कारों के उजियारे की ओर ले जाता है। वे आजीवन एक ऐसे 'सांस्कृतिक यात्री' बने रहे, जिनकी यात्रा का गंतव्य भारत की शाश्वत मेधा की खोज था।

विवेक रंजन श्रीवास्तव

Thursday, 12 February 2026

समकालीन विषयों पर व्यंग्य का प्रतिवेदन भूमिका सतीश श्रीवास्तव के व्यंग्य संग्रह पर

 भूमिका


समकालीन विषयों पर व्यंग्य का प्रतिवेदन


व्यंग्य साहित्य मानवीय चेतना का वह दर्पण है, जिसमें समाज अपने सबसे विद्रूप, विरोधाभासी और असुविधाजनक चेहरों का यथार्थ देखता है। यह विधा सदियों से सत्ता, समाज और व्यक्ति , तीनों को कटघरे में खड़ा करते हुए भी उनके विनाश की नहीं, वरन् उनके परिष्कार की अभिलाषा रखती आई है।


कबीर के तीक्ष्ण व्यंग्य-दोहों से लेकर परसाई, शरद जोशी, हरिशंकर व्यास और वर्तमान पीढ़ी तक व्यंग्य का मूल स्वर यही रहा है कि हँसी के सहारे हम अपनी दुर्बलताओं, पाखंडों और भ्रांतियों से आमना-सामना कर सकें। अकबर इलाहाबादी ने अपनी शायरी में समाज को यही आईना दिखाया था।


सूचना विस्फोट, उपभोक्तावाद और तकनीकी वर्चस्व के इस युग में व्यंग्य साहित्य की अनिवार्यता और भी बढ़ गई है। मीडिया, सोशल मीडिया और आडंबरपूर्ण भाषा प्रयोग ने यथार्थ को जितना सँवारा है, उतना ही धुँधला भी किया है। हम स्वयं को सुधारने के बजाय दर्पण साफ करने में उलझे हैं। ऐसे समय में सच्चा व्यंग्य उस धुंध को चीरकर सत्य के उन असुविधाजनक किंतु अनिवार्य पक्षों को उजागर करता है। वह स्मरण कराता है कि आवश्यकता आईना साफ करने की नहीं, स्वयं को निखारने की है।


समकालीन व्यंग्य के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है, वह महज क्षणिक मनोरंजन का माध्यम न रह जाए, अपितु समय की पकड़ और मानवीय संवेदना का समन्वय करते हुए अपनी सार्थकता सिद्ध करे। व्यंग्य यदि केवल चुटकुला बनकर रह जाए, तो वह साहित्य नहीं रहता , और यदि केवल आक्रोश बनकर सिमट जाए, तो पाठक से उसका संवाद समाप्त हो जाता है।


व्यंग्य का भविष्य तभी दीप्तिमान रहेगा, जब तक लेखक समय की नब्ज़ पर हाथ रखकर रचना करता रहेगा, और पाठक हँसते हुए भी अंतःकरण में कहीं एक हल्की-सी चुभन अनुभव करता रहेगा। आने वाले वर्षों में डिजिटल माध्यम, नवीन मंच, श्रव्य-दृश्य प्रस्तुतियाँ, सब व्यंग्य की भाषा और शिल्प में नवीन संभावनाओं का संचार कर रहे हैं। किंतु मूल तत्व वही रहेगा, ईमानदार दृष्टि, मानवीय करुणा और अभिव्यक्ति की कलात्मक मारक क्षमता। जो व्यंग्य व्यक्ति वध की प्रवृत्ति से ऊपर उठकर प्रवृत्ति विमर्श करता है, वही आने वाले समय का प्रामाणिक और सामाजिक रूप से अनुशंसनीय दस्तावेज़ सिद्ध होगा।


व्यंग्य के इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में यदि हम सतीश चंद्र श्रीवास्तव के व्यंग्य संग्रह ‘भरा नहीं जो भाव से…’ को देखें, तो स्पष्ट हो जाता है कि लेखक केवल हँसाने के लिए नहीं, वरन् विचार के लिए बाध्य करने के लिए लिख रहे हैं। गाजीपुर की मिट्टी से निकलकर विधि, हिन्दी और तकनीकी सेवा के त्रिवेणी-संगम से गुज़रा यह रचनाकार आम आदमी और व्यवस्था, दोनों को अंतर्दृष्टि से जानता , समझता है। उसके पास अभिव्यक्ति का कौशल है, भाषा पर अधिकार है, शब्दों का सामर्थ्य है। परिणामतः उनके व्यंग्य न तो निरा कल्पना-विलास हैं, न ही मात्र शिकायत-पत्र; वे समय के लेखकीय प्रतिवेदन हैं।


शीर्षक रचना ‘भरा नहीं जो भाव से…’ से लेकर ‘मामला 90 डिग्री का…’, ‘आता माझी सटकली…’, ‘मेरा तो कुछ भी नहीं…’, ‘चिंता न करें मेघराज’ तक, संग्रह के बत्तीस व्यंग्यों की पाठकीय यात्रा ‘सिंहासन बत्तीसी’ की तरह ही प्रत्येक रचना में उस मनुष्य को पकड़ती है, जो भीड़ में खोते-खोते अचानक अपने चेहरे को पहचानने लगता है। यहाँ हास्य केवल मनोरंजन नहीं है, यह मनुष्य के अंतस में जमी जड़ता पर एक मार्मिक आघात है। मुस्कान के बहाने आत्मचिंतन की ओर धकेलने वाली यह शैली अपने आप में सार्थक है। भाषा लोक मुहावरों, दैनंदिन संवाद, फिल्मी संकेतों और तकनीकी शब्दावली से बुनी गई है, फिर भी प्रतीक-विधान में कथ्य को खोलती है। यही कारण है कि पाठक को लगता है , ये बातें किसी दूरस्थ लेखक ने नहीं, वरन् घर-परिवार और कार्यालय में रोज़ सुनने-बोलने वाले अपने ही किसी सजन ने कही हैं।


इन रचनाओं का शिल्प भी उल्लेखनीय है। कहीं संस्मरण का आभास, कहीं रिपोर्ताज शैली, तो कहीं संवाद-प्रधान कथ्य , और सबके भीतर एक स्थायी व्यंग्य दृष्टि, जो घटनाओं के पृष्ठ में छिपी मानसिकता को सूक्ष्मता से उद्घाटित करती है। चिकित्सा व्यवस्था, प्रशासनिक लापरवाही, तकनीकी जुगाड़, संबंधों में स्वार्थ-साधन, और ‘मैं तो कुछ भी नहीं’ कहकर सब कुछ हड़प लेने वाली मानसिकता, इन सब पर लेखक का कटाक्ष तीक्ष्ण है, पर भाषा कहीं भी विषाक्त नहीं होती। यह उनकी विशिष्ट उपलब्धि है। वे व्यक्ति पर नहीं, प्रवृत्ति पर प्रहार करते हैं , यही व्यंग्य की नैतिक भूमिका है, जो इस संग्रह को मात्र ‘व्यंग्य-संकलन’ से ऊपर उठाकर एक साहित्यिक दस्तावेज़ का दर्जा देती है।


इस पुस्तक की सबसे बड़ी सामर्थ्य इसकी संवादधर्मी शैली है। लेखक बार-बार पाठक से प्रश्न करता है, उसे साथ लेकर चलता है, और प्रत्येक प्रसंग की परिणति पर मानो उसे आईना थमा देता है , “अब तुम ही बताओ, मामला सच में 90 डिग्री का है या नहीं?” यह शैली इन व्यंग्यों को मंच, रेडियो, दृश्य-माध्यम और गंभीर पाठ, तीनों स्तरों पर समान रूप से प्रभावी बनाती है।


व्यंग्य साहित्य की दिशा, दशा और भविष्य की चर्चा के बीच सतीश चंद्र श्रीवास्तव का यह संग्रह यह आश्वस्ति देता है कि संवेदनशील, अनुभव-संपन्न और शिल्प-सचेत रचनाकार की उपस्थिति में हिन्दी व्यंग्य न केवल जीवित है, वरन् अपने समय का साक्षी और समीक्षक दोनों बना हुआ है। यह पुस्तक उनका द्वितीय व्यंग्य-संग्रह है, जो प्रथम संग्रह ‘मतलब अपना साध रे बंदे’ से दो कदम आगे का प्रस्थान है।


विश्वास है, ‘भरा नहीं जो भाव से…’ पाठक को हँसी भी देगा और हँसी के तुरंत बाद एक मार्मिक, अनिवार्य मौन भी—और यही किसी भी सच्चे व्यंग्य की सबसे बड़ी सफलता है।


मैं इस संग्रह को पाठकों के सकारात्मक प्रतिसाद की हार्दिक कामना करता हूँ।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

वरिष्ठ व्यंग्यकार एवं समालोचक

साहित्य संपादक, ‘ई-अभिव्यक्ति’

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी सम्मानित

मिनाल रेजिडेंसी, भोपाल

इन दिनों न्यूयॉर्क में

readerswriteback@gmail.com

Wednesday, 11 February 2026

कहानी मन का भूगोल

 कहानी 

मन का भूगोल 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


नीलगीरि की धुंधली पहाड़ियों के बीच बसे 'सोनपुर' गाँव में जब मिस्टर ग्रजबेक अपनी नौ साल की बेटी रोजी के साथ आए, तो ग्रामीणों के लिए वे किसी दूसरी दुनिया के प्राणी थे। ग्रजबेक साहब यहाँ शांति और प्रेम का संदेश फैलाने आए थे, लेकिन गाँव वालों के लिए उनकी भाषा, ऊँचा कद , आंखों का नीला रंग , और वेशभूषा एक ऐसी दीवार थी , जिसे पार करना आसान न था। ग्रामीण उन्हें सम्मान से देखते, पर एक दूरी बनाए रखते थे।

लेकिन इस दीवार को तोड़ा रोजी ने ।

 रोजी, जो किसी उन्मुक्त उड़ती परी सी चंचल थी। जहाँ गाँव की मुनिया, लाली और चंपा अपने नन्हे हाथों से छोटी-छोटी साड़ियाँ सँभालती हुई पगडंडियों पर चलती थीं, वहीं रोजी अपने फूले हुए रंग-बिरंगे फ्रॉक और सुनहरी जुल्फों के साथ किसी सपने जैसी लगती थी। शुरू में गाँव की बच्चियाँ उसे दूर से ही कौतुक भरी नज़रों से देखतीं। वे फ्रॉक के घेरे को देखतीं और रोजी उनकी साड़ी के करीने को, पर शब्दों की कमी और संकोच के कारण दोनों पक्ष मौन रहते, केवल आँखें और मुस्कान ही बातें करती थीं।

एक सुनहरी दोपहर, जब सूरज की किरणें ऊँचे देवदार के पेड़ों से छनकर मैदान में आ रही थीं, सन्नाटे को रोजी की फुटबॉल की 'टप-टप' ने तोड़ दिया। रोजी अकेले ही मैदान में गेंद के साथ जूझ रही थी। झाड़ियों के पीछे छिपी मुनिया और उसकी सहेलियों की आँखों में गेंद को छूने की तीव्र ललक थी। रोजी ने यह भाँप लिया। उसने एक शरारती मुस्कान के साथ गेंद को ज़ोर से मुनिया की तरफ लुढ़का दिया।

पलों में ही सारा संकोच धुआं हो गया। मुनिया ने अपनी सूती साड़ी का पल्ला कमर में मजबूती से खोंसा और नंगे पैर ही गेंद पर एक ज़ोरदार किक मारी। खेल शुरू हो चुका था। अब वहाँ न कोई विदेशी था, न कोई देहाती। धूल में सनी मुनिया की साड़ी और पसीने से भीगा रोजी का कीमती फ्रॉक, दोनों एक ही मिट्टी के रंग में रंग चुके थे। गिरना, संभलना, एक-दूसरे को हाथ पकड़कर उठाना और गोल होने पर साथ में ठहाके लगाना । इस शोर में वह भाषा सुनाई दे रही थी जो सदियों पुरानी है और जिसे सीखने के लिए किसी किताब की ज़रूरत नहीं होती।

मिस्टर ग्रजबेक दूर खड़े यह दृश्य देख रहे थे। उनकी आँखों में नमी और होंठों पर एक गहरी संतुष्टि थी। उन्हें अहसास हुआ कि जो संदेश वे उपदेशों से देना चाहते थे, उनकी बेटी ने उसे एक खेल में साकार कर दिया था। शाम ढलते-ढलते पहाड़ियों पर गोधूलि की लालिमा छा गई। रोजी और गाँव की बच्चियाँ एक पत्थर पर साथ बैठी थीं। रोजी ने मुनिया के बालों में एक जंगली फूल टाँक दिया और मुनिया ने अपनी पोटली से भुना हुआ मक्का निकाल कर बड़े प्यार से रोजी के मुँह में डाल दिया।

रोजी के लिए वह पॉपकॉर्न था ।

पहाड़ की ठंडी हवा में एक शाश्वत सत्य तैर रहा था कि इन्सान की आत्मा का कोई अलग भूगोल नहीं होता। लिबास और भाषा की परतें उतरते ही नीचे जो हृदय मिलता है, वह सबके साथ मिलकर धड़कना चाहता है। 


हम ऊपर से चाहे कितने ही भिन्न क्यों न दिखें, प्रेम और अपनत्व की भूख हमें एक ही सूत्र में पिरोए रखती है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव

Monday, 2 February 2026

कहानी बर्फ में धूप

 कहानी

 बर्फ में धूप

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


डॉक्टर राजिंदर कुमार अपने टोरंटो स्थित अपार्टमेंट की खिड़की से बाहर देख रहे थे। कनाडा की सफेद, चुभती ठंड शीशे के पार दुनिया को जमा देना चाहती थी। सब कुछ बर्फ़ से ढका था। गाड़ियाँ, पेड़, सड़क, दिख रहे थे तो बर्फ पर कदमों के निशान। यह एकांगी, निस्तब्ध सफेद सुंदरता थी, जिसमें उनकी आत्मा की गूँज खो जाती थी। अंदर, हीटर की समान गरमाहट थी, सरकारी पेंशन की नियमितता थी, स्वास्थ्य सेवाओं का भरोसा भी था , एक आत्मनिर्भर, पूर्ण दुनिया, जो अचानक बहुत खोखली लगने लगी थी।


उनकी नज़र सोफे के पास टंगे एक फोटो फ्रेम पर टिक गई। पंजाब के अपने गाँव 'चमकपुर' की एक पुरानी तस्वीर। गर्मी की दोपहर, नहर का पानी चमक रहा है, खेतों में हरियाली लहरा रही है, और दूर, गुरुद्वारे का निशान साहब, चमक रहा है। यह वह गाँव था जिसे उन्होंने पचास साल पहले, डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ आने के बाद छोड़ा था। फिर संघर्ष, फिर सपना, बेहतर जीवन, बेहतर कमाई। राकेश कौर उनके साथ थीं, उनका प्यार , उनका सहारा था। कनाडा आने का फैसला साथ में किया था ,नए सिरे से शुरुआत करने का जोश। राकेश ने ही इस अपार्टमेंट को घर बनाया था, पंजाबी मसालों की खुशबू से, गुरबाणी के शब्दों से, उनकी मंजिल को गर्मजोशी से सराबोर कर दिया था।


पर पाँच साल पहले, राकेश चली गईं , एकाएक, दिल का दौरा पड़ने से। उनके साथ वह धूप भी चली गई जो कनाडा की सबसे अधिक ठंडक में भी धूप से ज़्यादा गर्म प्यार का अहसास थी। राजिंदर अकेले रह गए। इसी अकेलेपन ने, रिटायरमेंट के बाद, उन्हें फिर से जड़ों की तलाश में चमकपुर ने बुला लिया।


लेकिन गाँव बदल चुका था। नहर अब कंक्रीट की नाली थी। पुराने पेड़ कट चुके थे। चौपाल की जगह एक 'यूथ क्लब' ने ले ली थी, जहाँ लड़के मोबाइल पर बिजी रहते। रिश्तेदार मिले, पर उनकी बातचीत का केंद्र बिंदु अक्सर यही होता"कनाडा में तो बहुत पैसा है न?", "हमारे बेटे के लिए वीजा स्पॉन्सर कर दो।" उस 'अपनेपन' की तलाश, जो राजिंदर की यादों में कैद था, वह हवा हो चुकी थी।


एक दिन, स्थानीय 'शब्द साधना साहित्य परिषद' के सचिव, श्री ओमप्रकाश शर्मा, उनसे मिले। बड़े आदर से, फूलमाला पहनाकर।

ओमप्रकाश ने कहा "डॉक्टर साहब! आप तो विदेश से आए हुए साहित्य के महान पारखी हैं! हम आपके नाम पर एक 'राजिंदर कुमार साहित्य रत्न सम्मान' शुरू करना चाहते हैं। देश की सेवा का यह पुनीत अवसर है।"

राजिंदर ने खुश होकर कहा , "ज़रूर, यह तो बहुत अच्छी बात है। मैं कैसे मदद कर सकता हूँ?"

ओमप्रकाश अपनी योजना सफल समझ मुस्कुराते हुए बोले "बस एक छोटी सी संस्थागत फीस है... तीन लाख रुपये। हमारे पास आपका चेक स्वीकार करने की सुविधा भी है।"


राजिंदर का दिल बिना कहे एक पल में काफी कुछ समझ गया । यह पहला झटका नहीं था। कई 'संस्थाओं' के फोन आ चुके थे। उनके 'विदेशी' होने ने, उनकी साहित्यिक रुचि को एक 'लेन-देन' में बदल दिया था। उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। लेकिन फोन आते रहे। कभी सुबह, कभी रात। एक तरफ पंजाब की वह याद, दूसरी तरफ इस तरह की मांगों से उपजी विरक्ति।


और फिर वह दिन आया। भारत में सुबह के दस बजे थे, धूप फैलने का वक्त। पर टोरंटो में अँधेरी, बर्फ़ीली रात के दो बजे थे। फोन की कर्कश घंटी ने नींद तोड़ दी।

अनजान आवाज़, "नमस्ते डॉक्टर साहब, मैं 'काव्य भारती' से बोल रहा हूँ। आपको 'वैश्विक पंजाबी रत्न' से सम्मानित किया जाएगा। बस कुछ प्रबंध खर्च..."

राजिंदर ने फोन काट दिया। उनकी नींद उचट गई थी। वह खिड़की के पास गए। बाहर, एक निर्मम, खामोश बर्फ़बारी जारी थी। उन्हें लगा जैसे वह खुद दो टुकड़ों में बँट गए हैं। एक टुकड़ा यहाँ, इस बर्फीली नियमितता में फँसा हुआ तो दूसरा टुकड़ा, उस चमकपुर में भटक रहा है जो अब है पर बचा ही नहीं। वह न तो यहाँ के थे, न वहाँ के। एक 'विभक्ति' उनके भीतर घर कर गई।


कई रातों की मानसिक जद्दोजहद के बाद, एक सुबह, जब पहली किरण बर्फ पर पड़ी और सब कुछ हीरे की तरह जगमगा उठा, तो एक शांति उन पर छा गई। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। यह दृश्य उनका था। यह ठंड उन्होंने झेली थी। यहाँ उन्होंने दाँत दर्द से तड़पते मरीजों को राहत दी थी। यहीं राकेश उनके साथ थीं। "प्रारब्ध," उन्होंने धीरे से कहा, "यही हमारी कर्मभूमि बना दी गई। यहाँ हमारा दाना-पानी रहा। अब यही घर है।"


उसी दिन उन्होंने अपनी वसीयत लिखी। कोई भव्यता नहीं। सादगी से। इलेक्ट्रिक भट्टी में शवदाह। और फिर... उनकी चुटकी भर राख नियाग्रा प्रपात के उफनते, गर्जते जल में प्रवाहित कर दी जाए। वह शक्तिशाली, अनंत प्रवाह, जो सब कुछ अपने में समा लेता है । उनकी जीवन यात्रा, उनकी यादें, उनका पंजाब और उनका कनाडा, सब कुछ एक हो जाए।


और एक अंतिम निर्देश, टोरंटो के ही एक गुरुद्वारे में, 'डॉ. राजिंदर कुमार एंड राकेश कौर साहित्य संवाद' नाम से एक वार्षिक कोष स्थापित किया जाए। बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी फीस के, सिर्फ़ शब्दों के लिए, विश्व हिंदी साहित्य के लिए।


डॉक्टर राजिंदर कुमार ने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखा। बर्फ अब भी गिर रही थी। पर अब वह उसकी खामोशी में एक संगीत सुन पा रहे थे। यह उनकी ख़ामोशी थी। यह उनका घर था। और इस बार, देर रात फोन बजने से उनकी नींद उचटने वाली नहीं थी , वे वसीयत कर चुके थे।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

लघु कथा रियल सांता

 लघु कथा 

रियल सांता 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


रात के ठंड भरे अंधेरे में कॉल बेल की आवाज आई। दरवाजा खोला तो सामने एक दुबला सा लड़का खड़ा था। पीठ पर थैला, चेहरे पर पसीना और आंखों में एक जल्दी साफ नजर आ रही थी। उसने पैकेट आगे बढ़ाया और बोला सर आपका ऑर्डर। पैकेट लेकर मैंने दरवाजा बंद कर लिया। भीतर मेज पर रख पैकेट खोला , पिज्जा की भाप मेरे चेहरे से टकराई । टीवी पर चल रही किसी क्रिसमस फिल्म में सांता बच्चों के लिए उपहार रख रहा था। बच्चे सो रहे थे। चिमनी के नीचे सांता के लिए दूध और चाकलेट कटोरी में सजे थे।


मैंने सोचा अभी अभी जो लड़का गया वह ही तो असली सांता है। उसके थैले में हर किसी के लिए खुशी है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसके आने का इंतजार कोई कविता में नहीं लिखता और उसके लिए कोई कटोरी सजाकर दूध और टोस्ट नहीं रखता।


मैं बाहर लपका , उसकी बाइक सड़क के मोड़ पर ओझल हो चुकी थी। मेरे हाथ में गरम पिज्जा था और मन में एक ठंडी सी टीस। क्या कभी हमने इन सच्चे सांता के लिए कोई रिटर्न गिफ्ट रखा है। क्या कभी उनके लिए भी दूध और चाकलेट सजाए हैं। या हम उन्हें सिर्फ डिलीवरी नोटिफिकेशन समझकर स्वाइप कर देते हैं।


विवेक रंजन श्रीवास्तव