Saturday, 5 June, 2021

आत्म साक्षात्कार

 आत्म साक्षात्कार

प्रतिबिम्ब ‌‍...

विवेक रंजन श्रीवास्तव "विनम्र"      

बंगला नम्बर ए १ , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर , जबलपुर ४८२००८


हर बार एक नया ही चेहरा कैद करता है कैमरा मेरा ...

खुद अपने आप को अब तक

कहाँ जान पाया हूं,  

खुद की खुद में तलाश जारी है

हर बार एक नया ही रूप कैद करता है कैमरा मेरा

प्याज के छिलकों की या

पत्ता गोभी की परतों सा

वही डी एन ए किंतु

हर आवरण अलग आकार में ,

नयी नमी नई चमक लिये हुये

किसी गिरगिट सा,

या शायद केलिडेस्कोप के दोबारा कभी

पिछले से न बनने वाले चित्रों सा  

अक्स है मेरा .

झील की अथाह जल राशि के किनारे बैठा

में देखता हूं खुद का

प्रतिबिम्ब .

सोचता हूं मिल गया मैं अपने आप को

पर

जब तक इस खूबसूरत

चित्र को पकड़ पाऊं

एक कंकरी जल में

पड़ती है

और मेरा चेहरा बदल जाता है

अनंत

उठती गिरती दूर तक

जाती

लहरों में गुम हो जाता हूं मैं .  


कोई बता दो हमारे बारे में हम खुद बताएं भी तो क्या ...


जलाभिषेक गागर से बूंद बूंद ...

बिन्दु रूप परिचय

१९५९ में मण्डला के एक साहित्यिक परिवार में जन्म .

माँ ... स्व दयावती श्रीवास्तव ...सेवा निवृत प्राचार्या

पिता ... प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध ... वरिष्ठ साहित्यकार

पत्नी ... श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव ... स्वतंत्र लेखिका

इंजीनियरिंग की पोस्ट ग्रेडुएट शिक्षा के बाद विद्युत मण्डल में शासकीय सेवा . संप्रति जबलपुर मुख्यालय में मुख्य अभियंता के रूप में सेवारत . परमाणु बिजली घर चुटका जिला मण्डला के प्रारंभिक सर्वेक्षण से स्वीकृति , सहित अनेक उल्लेखनीय लघु पन बिजली परियोजनाओ , १३२ व ३३ कि वो उपकेंद्रो , केंद्रीय प्रशिक्षण केंद्र जबलपुर आदि के निर्माण का तकनीकी गौरव . बिजली का बदलता परिदृश्य , जल जंगल जमीन आदि तकनीकी किताबें . हिन्दी में वैज्ञानिक विषयों पर निरंतर लेखन , हि्ंदी ब्लागिंग .

१९९२ में नई कविताओ की पहली किताब  आक्रोश  तार सप्तक अर्ध शती समारोह में भोपाल मे विमोचित , इस पुस्तक को दिव्य काव्य अलंकरण मिला ..

व्यंग्य की किताबें रामभरोसे , कौआ कान ले गया , मेरे प्रिय व्यंग्य , धन्नो बसंती और बसंत  , बकवास काम की , जय हो भ्रष्टाचार की ,समस्या का पंजीकरण , खटर पटर व अन्य  प्रिंट व किंडल आदि प्लेटफार्म पर .

मिली भगत , एवं लाकडाउन  नाम से  सँयुक्त वैश्विक व्यंग्य संग्रह का संपादन .

व्यंग्य के नवल स्वर , आलोक पौराणिक व्यंग्य का ए टी एम , बता दूं क्या , अब तक 75 , इक्कीसवीं सदी के 131 श्रेष्ठ व्यंग्यकार , 251 श्रेष्ठ व्यंग्यकार ,  निभा आदि संग्रहो में सहभागिता

हिन्दोस्तां हमारा , जादू शिक्षा का नाटक संग्रह चर्चित व म. प्र. साहित्य अकादमी से सम्मानित, पुरस्कृत

पाठक मंच के माध्यम से नियमित पुस्तक समीक्षक

https://e-abhivyakti.com के साहित्य सम्पादक

म प्र साहित्य अकादमी ,पाथेय , मंथन ,वर्तिका , हिन्दी साहित्य सम्मेलन ,  तुलसी साहित्य अकादमी व अनेक साहित्यिक़ संस्थाओं , सामाजिक लेखन के लिये रेड एण्ड व्हाईट सम्मान से सम्मानित .

वर्तिका पंजीकृत साहित्यिक सामाजिक संस्था के संयोजक

टी वी , रेडियो , यू ट्यूब , पत्र पत्रिकाओ में निरंतर प्रकाशन .

ब्लॉग

http://vivekkevyang.blogspot.com

व अन्य ब्लॉग

संपर्क

readerswriteback@gmail.com


और जानना है , तो पढ़िये ...

जो जाना खुद के बारे में मम्मी पापा से ...

कान्हा राष्ट्रीय अभयारण्य के लिये विश्व प्रसिद्ध , गौंड़ , बैगा , आदिवासी बहुल जिले मण्डला में जिला मुख्यालय की बहुउद्देशीय उच्चतर माध्यमिक शाला में साहित्यकार व लोकप्रिय व्याख्याता श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव "विदग्ध" होस्टल वार्डन थे . उनकी पत्नी  श्रीमती दयावती श्रीवास्तव भी मण्डला के ही रानी रामगढ़ उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में व्याख्याता थीं . अपनी कुण्डली में पढ़ा है , भुनसारे प्रातः ५ बजकर २५ मिनट पर , २८.जुलाई.१९५९ को सूर्य रश्मियों के आगमन के साथ ही रिमझिम बरसात के मौसम में इस दम्पति के घर मंडला में विवेक रंजन श्रीवास्तव का जन्म हुआ . मण्डला में तब बिजली आई आई ही थी . घरों में बिजली के नये नये  कनेक्शन हुये थे . मतलब बिजली के लट्टू की सुनहरी रोशन रोशनी से अपना जन्मजात नाता है . बिजली थी तो हमारे जन्म पर तांबे की जाली के एरियल और डायोड लैंम्प वाला बुश बैरन रेडियो खरीदा गया था . आज भी बाकायदा चालू हालात में पत्नी ने उसे ड्राइंग रूम में एंटीक पीस के रूप में सहेज रखा है . कुर्सी पर बैठे हुये एक प्यारे से बच्चे की हार्ड बोर्ड माउन्टेड बडी सी ब्लैक एण्ड व्हाइट फोटो , जो घर पर फोटोग्राफर बुलवाकर खिंचवाई गई थी , घर पर है , जिसमें पेंसिल से निक नेम लिखा हुआ है " गुड्डा ".  जी हाँ , माँ  प्यार से आजीवन मुझे गुड्डा बुलाती रहीं .

विवेक रंजन अपनी उच्चशिक्षित एक बड़ी बहन तथा दो छोटी बहनो के इकलौते भाई हैं . बचपन से ही मेधावी छात्र के रूप में उन्होने अपनी पहचान बनाई .किशोरावस्था आते आते उन पर  माता पिता के साहित्यिक संस्कारो का प्रभाव स्पष्ट दिखने लगा . कक्षा चौथी  में जबलपुर के विद्यानगर स्कूल में जब महात्मा गांधी का पात्र अभिनित किया तो "मोहन" के इस रोल में वे ऐसे डूब गये कि मुख्य अतिथि ने उन्हें वहीं तुरंत ५१ रुपयो का नगद पुरस्कार दिया .लिखने की जरूरत नही कि वर्ष १९६८ में  ५१ रुपये क्या महत्व रखते थे . शायद तभी विवेक रंजन में नाटककार के बीज बोये जा चुके थे . जो आगे चल आज नाटक लेखक के रूप में मुखरित हुये .


अपने होश में ...

कक्षा छठवीं के विवेक रंजन के लेखक होने के प्रमाण मौजूद हैं , सरायपाली उच्चतर माध्यमिक शाला की शालेय पत्रिका "उन्मेष" में प्रकाशित मेरे लेख की कतरन मौजूद है . कक्षा आठवीं की बोर्ड परीक्षा में  मेरिट में स्थान मिला . हाईस्कूल की शिक्षा के लिये ग्रामीण प्रतिभावान छात्रवृत्ति मिली .  रायपुर अभियांत्रिकी महाविद्यालय से सिविल इजीनियरिंग में बी ई की परीक्षा आनर्स के साथ उत्तीर्ण की . कालेज की पत्रिका आलोक का लगातार संपादन , आकाशवाणी रायपुर के युववाणी कार्यक्रम में विज्ञान कथाओ की प्रस्तुतियां की . तत्कालीन युववाणी प्रभारी लक्ष्मेंद्र चौपड़ा जी थे . बाद के दिनों में रायपुर , जबलपुर व भोपाल के आकाशवाणी केन्द्रो से भी प्रसारण हुये . तभी से रेडियो रूपक भी लिख रहे हैं .स्मरण है रायपुर आकाशवाणी से १९७८ में युववाणी के  पहले प्रसारण के लिये  ३० रुपये का चैक प्राप्त हुआ था . पुरानी बातें मन में हुलास भर देतीं है . मेरी परिचर्चायें रायपुर के अखबारों महाकौशल , देशबन्धु और नवभारत आदि में छपा करती थीं , स्व अजीत जोगी तब जिलाधीश रायपुर थे , वे मूलतः मेकेनिकल इंजीनियर थे और उनकी पत्नी श्रीमती रेणु जोगी डाक्टर थीं . मैंने अजीत जोगी जी का साक्षात्कर किया था .  बाद में उन्हें अपने होस्टल डे पर अतिथि के रूप में भी बुलाया था . मंच संचालन मैं ही कर रहा था . कालेज की सांस्कृतिक गतिविधियो से जुड़े ही रहता था .इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के स्टूडेंट चेप्टर व कालेज के फोटोग्राफी क्लब का अध्यक्ष भी रहा .  वे दिन थे जब डार्करूम में लाल लाइट में सिल्वर आयोडाइड से फिल्म धोई जाती थी . मुझे फोटोग्राफी में अनेक पुरस्कार भी मिले . उद्यानकी में भी रुचि है . बागवानी का शौक रहा , मेरे बनाये ४० वर्ष पुराने बरगद , पीपल आदि बोनसाई अभी भी मेरे बगीचे में मुझसे बातें करते हैं .


इंजीनियर विवेक ...

बी ई के तुरंत बाद फाउंडेशन इंजीनियरिंग में मौलाना आजाद रीजनल कालेज  भोपाल से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की . तुरंत ही १९८१ में मध्यप्रदेश विद्युत मण्डल में सहायक इंजीनियर के रूप में अपनी सेवायें प्रारंभ की थीं .सर्वे व अनुसंधान विभाग में इस युवा इंजीनियर ने अनेक लघु पन बिजली परियोजनाओ सहित १९८४ में परमाणु बिजलीघर चुटका की प्रारंभिक फिजिबिलिटी तैयार की , उल्लेखनीय है कि अब मण्डला जिले में यह महत्वपूर्ण बिजली परियोजना स्वीकृत हो चुकी है .  भीमगढ़ तथा चरगांव जटलापुर लघु पन बिजली परियोजनायें अभी तक लगातार विद्युत उत्पादन कर रही हैं . मेरा मानना है कि शिक्षा जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है , सेवारत रहते हुये मैंने इंदिरा गांधी ओपन यूनिवर्सिटी  से मैनेजमेंट मे डिप्लोमा , ब्यूरो आफ इनर्जी एफिशियेंसी से  इनर्जी मैनेजर की उपाधियां अर्जित की हैं . अब सेवानिवृति की कगार पर मुख्य अभियंता हूं .

दो से चार हाथ ...

  विवाह वरिष्ठ कवि स्व वासुदेव प्रसाद खरे की पुत्री स्वतंत्र लेखिका श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव से २२ जनवरी १९८७ को हुआ . जीवन संगीनी ने साहित्य यात्रा को और आगे बढ़ाया . पिता की भूमिका में भी सफल हैं ,  बच्चे इंजीनियर अनुव्रता एक प्रतिष्ठित मल्टी नेशनल संस्थान में दुबई में मैनेजर हैं , बेटी अनुभा ने लंदन स्कूल आफ इकानामिक्स से ला की पढ़ाई की है तथा वे ला एशोसियेट के रूप में कार्यरत हैं , बेटा अमिताभ भारत सरकार के एक मात्र प्रतिष्ठित विज्ञान संस्थान , इण्डियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस बैंगलोर से पढ़कर , न्यूयार्क यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेज्युएशन के बाद न्यूयार्क में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक है .

देश से बाहर भी ...

मेरा मानना है कि पर्यटन साहित्य का जनक होता है क्योकि देशाटन से अनुभव संसार समृद्ध होता है . मुझे भारत के शीर्ष जम्मू काश्मीर , हिमालय की बर्फ आच्छादित पर्वत श्रंखला के साथ सिक्किम पूर्वांचल , से कन्या कुमारी के लहराते समुद्र तक , कोलकोता के हावड़ा ब्रिज से मुम्बई के समुद्र सेतु  , गोवा के पश्चिम तट तक पर्यटन के अनेक अवसर मिले . श्रीलंका , भूटान , दुबई , अबूधाबी , अमेरिका में न्यूयार्क , वाशिंगटन , नियाग्रा फाल्स तक घूमने का सौभाग्य मिला है  . ढ़ेर से चित्र और डायरी नोट्स , रचना रूप में मुखरित होने के लिये मौके की तलाश में हैं .

गूगल में ढ़ूंढ़ा खुद को ...

भले मोहल्ले में कोई न जानता हो पर दुनियाभर में अपना नाम सर्च कर लो गूगल पर तो 1 सेकेंड में बहुत सा मिल जाएगा . वर्ष २००५ से ही जब हिन्दी ब्लाग बहुत नया था , हिन्दी में नियमियित ब्लागिंग कर रहा हूं .  व्यंग्य , कविता , व तकनीकी विषयो पर मेरे ब्लाग लोकप्रिय हैं . वेबदुनिया जो हिन्दी का सबसे पुराना पोर्टल है उसके सहित  अनेक अखबारो , बी बी सी , रेडियो डायचेवेली हिन्दी आदि के सामूहिक ब्लाग्स में भी लिखा . दुनिया की पहली ब्लागजीन "ब्लागर्स पार्क" थी . जिसमें ब्लाग पर प्रकाशित सामग्री में से चुनिंदा रचनायें पत्रिका के रूप में प्रकाशित की जाती थीं . इस पत्रिका के संपादक मण्डल का मानद सदस्य रहा .  हिन्दी ब्लागिंग पर कई कार्यशालायें करके अनेक युवा लेखको को ब्लाग जगत से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया है , ज्ञानवाणी से हिन्दी ब्लागिंग  पर  मेरी वार्ता बहुत सराही गई है . मुझे आर्कुट की याद है .   ब्लागस ,फेसबुक और अब ट्वीटर की माइक्रो ब्लागिंग से इंस्टाग्राम , लिंक्डिन सोशल मीडीया कि स्व संपादित दुनियां , फेक ई मेल आई डी का , लाईक , कमेंट , हैकिंग वाला संसार भी मजेदार है . बोलकर  , स्केन कर या बिना स्याही के पेन से मोबाईल स्क्रीन पर लिखना टेकसेवी होने के मजे बडे हैं .

अभिव्यक्ति का माध्यम कलम , कैमरा और कभी वीडीयो भी ...

        सुरभि टीवी सीरियल में मण्डला के जीवाश्मो पर मेरी लघु फिल्म का प्रसारण हुआ . हैलो बहुरंग में मेरी निर्मित लघु फिल्मो के लिये  युवा फिल्मकार का सम्मान भी मिला . किताबें  जल जंगल और जमीन , बिजली का बदलता परिदृश्य , कान्हा अभयारण्य परिचायिका , "रानी दुर्गावती" व "मण्डला परिचय" पर  तैयार फोल्डर पाठको में पसंद किये गये  . जिला पुरातत्व समिति मण्डला में सदस्य रहे . इंजीनियर होते हुये साहित्यकार के रूप में जटिल वैज्ञानिक विषयो पर सहज जन भाषा हिन्दी में नियमित अपनी कलम चलाई है  . म. प्र.  साहित्य अकादमी की पाठक मंच योजना के मण्डला व जबलपुर शहर में लम्बे समय तक सक्रिय संयोजक रहा .   मण्डला  में हिन्दी साहित्य समिति मण्डला , साहित्य विकास परिषद एवं तुलसी मानस परिषद के सचिव के रूप में निरंतर सक्रिय रहा .  अभियान के साथ कई राष्ट्रीय स्तर के सफल आयोजन किये .      

 रचना प्रक्रिया ... मन से कवि , स्वभाव से व्यंग्यकार  

मूलतः व्यंग्य , लेख , विज्ञान विषयक लेख , बाल नाटक ,विज्ञान कथा , कविता , समीक्षा आदि मेरी अभिव्यक्ति की प्रमुख विधायें हैं . मैंने नाटक संवाद शैली में ही लिखे हैं . विज्ञान कथायें वर्णनात्मक शैली की हैं . व्यंग्य की कुछ रचनायें मिश्रित तरीके से अभिव्यक्त हुई हैं . व्यंग्य रचनायें प्रतीको और संकेतो की मांग करती हैं . मैं सरलतम भाषा , छोटे वाक्य विन्यास , का प्रयोग करता हूं . उद्देश्य यह होता है कि बात पाठक तक आसानी से पहुंच सके . जिस विषय पर लिखने का मेरा मन बनता है , उसे मन में वैचारिक स्तर पर खूब गूंथता हूं , यह भी पूर्वानुमान लगाता हूं कि वह रचना कितनी पसंद की जावेगी . मेरी रचनायें कविता या कहानी भी नितांत कपोल कल्पना नही होती .मेरा मानना है कि कल्पना की कोई प्रासंगिकता वर्तमान के संदर्भ में अवश्य ही होनी चाहिये . मेरी अनेक रचनाओ में धार्मिक पौराणिक प्रसंगो का चित्रण मैंने वर्तमान संदर्भो में किया है . रचना को मन में परिपक्व होने देता हूं , सामान्यतः अकेले घूमते हुये , अधनींद में , सुबह बिस्तर पर , वैचारिक स्तर पर सारी रचना का ताना बाना बन जाता है फिर जब मूड बनता है तो सीधे कम्प्यूटर पर लिख डालता हूं . आजकल कागज पर हाथ से मेरा लिखा हुआ कम ही है . मेरा मानना है कि किसी भी विधा का अंतिम ध्येय उसकी उपयोगिता होनी चाहिये .यह बिल्कुल सही है कि रचना आत्म सुख देती है , किन्तु उसमें समाज कल्याण अंतर्निहित होना ही चाहिये अन्यथा रचना निरर्थक रह जाती है . समाज की कुरीतियो , विसंगतियो पर प्रहार करने तथा पाठको का ज्ञान वर्धन व उन्हें सोचने के लिये ही वैचारिक सामग्री देना मेरा ध्येय होता है .मेरी रचना का विस्तार कई बार अमिधा में सीधे सीधे जानकारी देकर होता है , तो कई बार प्रतीक रूप से पात्रो का चयन करता हूं . कुछ बाल नाटको में मैने नदी ,पहाड़ ,वृक्षो को बोलता हुआ भी रचा है . मुझे लगता है अभिव्यक्ति की विधा तथा विषय के अनुरूप इस तरह का चयन कई बार आवश्यक होता है , जब जड़ पात्रो को चेतन स्वरूप में वर्णित करना पड़ता है . रचना की संप्रेषणीयता संवाद शैली से बेहतर बन जाती है इसलिये यह प्रक्रिया भी अनेक बार अपनानी पड़ती है .मैं समझता हूं कि कोई भी रचना जितनी छोटी हो उतनी बेहतर होती है ,न्यूनतम शब्दों में अधिकतम वैचारिक विस्तार दे सकना रचना की सफलता माना जा सकता है .  विषय का परिचय , विस्तार और उपसंहार ऐसा किया जाना चाहिये कि प्रवाहमान भाषा में सरल शब्दो में पाठक उसे समझ सकें .नन्हें पाठको के लिये लघु रचना , किशोर और युवा पाठको के लिये किंचित विस्तार पूर्वक तथ्यात्मक तर्को के माध्यम से रचना जरूरी होती है .

शीर्षक जो प्रवेश द्वार होते हैं रचना का ..

मेरी अधिकांश रचनाओ के शीर्षक रचना पूरी हो जाने के बाद ही चुने गये हैं . एक ही रचना के कई शीर्षक अच्छे लगते हैं . कभी  रचना के ही किसी वाक्य के हिस्से को शीर्षक बना देता हूं . शीर्षक ऐसा होना जरूरी लगता है जिसमें रचना की पूरी ध्वनि आती हो .

व्यंग्य लेखन के लिए विषय...

  मैं सायास बहुत कम लिखता हूं , कोई विषय भीतर ही भीतर पकता रहता है और कभी सुबह सबेरे अभिव्यक्त हो लेता है तो मन को सुकून मिल जाता है . विषय और व्यंग्य दोनो एक दूसरे के अनुपूरक हैं , विषय उद्देश्य है और व्यंग्य माध्यम . मुझे लगता है कि कोई रचना कभी भी फुल एण्ड फाइनल परफेक्ट हो ही नही सकती , खुद के लिखे को जब भी दोबारा पढ़ो कुछ न कुछ तो सुधार हो ही जाता है .  चित्र का कैनवास बड़ा होना चाहिये , व्यक्ति गत मतभेद के छोटे से टुकड़े पर क्या  कालिख पोतनी .  व्यंग्य की ताकत का इस्तमाल बड़ा होना चाहिये .

शब्दो के धागे कितने लम्बे हों रचना के चरखे पर ...

मैं लघुकथा या बाल कथा ५०० शब्दों तक समेट लेता हूं , वहीं आम पाठको के लिये विस्तार से २५०० शब्दों में भी लिखता हूं . संपादक की मांग के अनुरूप भी रचना का विस्तार जरूरी होता है . व्यंग्य की अभिव्यक्ति क्षमता असीम है पर एक व्यंग्य लेख की शब्द सीमा १००० से १५०० शब्द पर्याप्त लगती है . कम्प्यूटर पर लिखने का लाभ यह मिलता है कि एक क्लिक पर पता चल जाता है कि कितने शब्द लिखे जा चुके है . कई बार तो पाठको की या संपादक की मांग पर वांछित विषय पर वांछित शब्द सीमा में लिखना पड़ा है . मैंने पाया है कि अनेक बार अखबार की खबरों को पढ़ते हुये या रेडियो सुनते हुये कथानक का मूल विचार मन में कौंधता है , जो एक नई रचना बुन देता है .

पठन पाठन और लेखन , समीक्षा , संपादन ...

व्यंग्य सर्वाधिक प्रिय है . नियमित पठन पाठन करता हूं , हर सप्ताह किसी पढ़ी गई किताब की परिचयात्मक संक्षिप्त चर्चा भी कर लेता हूं . नाटक के लिये मुझे साहित्य अकादमी से पुरस्कार मिल चुका है . बाल नाटको की पुस्तके आ गई हैं . इस सबके साथ ही बाल विज्ञान कथायें लिखी हैं  . कविता तो एक प्रिय विधा है ही .पुस्तक मेलो में शायद अधिकाधिक बिकने वाला साहित्य आज बाल साहित्य ही है . बच्चो में अच्छे संस्कार देना हर माता पिता की इच्छा होती है , जो भी माता पिता समर्थ होते हैं , वे सहज ही बाल साहित्य की किताबें बच्चो के लिये खरीद देते हैं . यह और बात है कि बच्चे अपने पाठ्यक्रम की पुस्तको में इतना अधिक व्यस्त हैं कि उन्हें इतर साहित्य के लिये समय ही नही मिल पा रहा .आज अखबारो के साहित्य परिशिष्ट ही आम पाठक की साहित्य की भूख मिटा रहे हैं .पत्रिकाओ की प्रसार संख्या बहुत कम हुई है .मैं साप्ताहिक रूप से किसी किताब की समीक्षा लंबे समय से कर रहा हूं . चयनित ६५ समीक्षाओ की मेरी एक किताब बातें किताबों की किंडल पर सुलभ है , इसका प्रिंट वर्शन आने को प्रेस में है . विभागीय पत्रिका विद्युत ब्रम्होति का लंबे समय तक  संपादन किया , मेरे संपादन में इसे पुरस्कार भी मिला अन्य कई पत्रिकाओ का संपादन अतिथि संपादक के रूप में भी जब तब किया .  वेब पोर्टल नई पीढ़ी को साहित्य सुलभ कर रहे हैं . किन्तु मोबाईल पर पढ़ना सीमित होता है , हार्ड कापी में किताब पढ़ने का आनन्द ही अलग होता है .  शासन को साहित्य की खरीदी करके पुस्तकालयो को समृद्ध करने की जरूरत है .  साहित्य मुझे विरासत में मिला है .मेरे पूज्य पिताजी प्रो चित्रभूषण श्रीवास्तव विदग्ध हिन्दी संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान हैं . माँ की भी किताबें प्रकाशित हैं , पत्नी कल्पना स्वतंत्र लेखिका हैं , वे मेरी हर रचना की प्रथम श्रोता होती हैं . उनकी प्रेरणा से मेरा उत्साह निरंतर बना रहता है . मेरी किशोरावस्था मण्डला में मां नर्मदा के तट पर , मेकल पर्वतो के सुरम्य जंगलो के परिवेश में बीती है . मुझे याद है हाईस्कूल पूरा करते करते मैंने जिला पुस्तकालय मण्डला , व श्रीराम अग्रवाल पुस्तकालय मण्डला की लगभग सारी साहित्यिक किताबें पढ़ डाली थी . तरन्नुम में पढ़ी जाती श्रंगार की कवितायें सुनने देर रात तक कवि सम्मेलनो और मुशायरों में बैठा रहा हूं .

साहित्य विचार देता है ...

  साहित्य , अपनी भूमिका स्वयं निर्धारित करता रहा है . कोई भी काम विचार के बिना नही होता .  . कभी पत्रिकाओ का बोलबाला था , अब ई प्लेटफार्म बढ़ गये हैं , जिनने पत्रिकाओ को स्थानापन्न कर दिया है . ई बुक्स आ रही हैं , पर आज भी प्रकाशित किताबो और साहित्य का महत्व निर्विवाद है . साहित्य हमेशा से राजाश्रय की चाह रखता है , क्योंकि विचार अमूल्य जरूर होते हैं , पर उसका मूल्य कोई चुकाना नही चाहता . सरकार को साहित्यिक विस्तार की गतिविधियो को और बढ़ाने की जरूरत है .मैं  देखता हूं , नई पीढ़ी छपना तो चाहती है , पर स्वयं पढ़ना नही चाहती . इससे वैचारिक परिपक्वता का अभाव दिखता है . जब १०० लेख पढ़ें तब एक लिखें , देखिये फिर कैसे आप हाथों हाथ लिये जाते हैं . गूगल त्वरित जानकारी तो दे सकता है , ज्ञान नही .  ज्ञान मौलिक होता है , नई पीढ़ी में मैं इसी मौलिकता को देखना चाहता हूं . समय के साथ पुराने रचनाकारो को नये लेखक खो कर स्थानापन्न कर देते हैं , जीवन निरंतरता का ही दूसरा नाम है . अपनी रचनाओ के जरिये ही कबीर , परसाई , शरद जोशी , त्यागी जी आज भी जिंदा हैं तो ऐसा मौलिक मूल्यवान शाश्वत लेखन आज भी हो सकता है , यह हमारे लिये खुला चैलेंज है . साहित्य के माध्यम से हम सब एक इंद्रधनुषी वैश्विक बेहतर समय रच सकें मेरी यही कामना है .

समकालीन व्यंग्य पर ...

  मैने बचपन में एक कविता लिखी थी जो संभवतः धर्मयुग में बाल स्तंभ में छपी भी थी " बिल्ली बोली म्यांऊ म्यांऊ , मुझको भूख लगी है नानी दे दो दूध मलाई खाऊं,....   अब तो जिसका बहुमत है चलता है उसका ही शासन . चूहे राज कर रहे हैं ... बिल्ली के पास महज एक वोट है , चूहे संख्याबल में ज्यादा हैं . व्यंग्य ही क्या देश , दुनियां , समाज हर जगह जो मूल्यों में पतन दृष्टिगोचर हो रहा है उसका कारण यही है कि बुरी मुद्रा, अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर रही है .मानवीय प्रवृत्तियां स्वार्थ के चलते रूप बदल बदल कर व्याप्त हैं , भारत ही क्या विश्व में और यही विसंगतियां  व्यंग्य का टार्गेट हैं . व्यंग्य के टार्गेट्स पूरे भारत में कोरोना की तरह पसरे हुए हैं जो म्यूटेशन करके तरह तरह के रूपों में हमें परेशान कर रहे है .राजनीती जीवन के हर क्षेत्र में हावी है . हम स्वयं चार नमूनो में से किसी को स्वयं अपने ऊपर हुक्म गांठने के लिये चुनने की व्यवस्था के हिस्से हैं . असीमित अधिकारो से राजनेता का बौराना अवश्य संभावी है , यहीं विसंगतियो का जन्म होता , और व्यंग्य का प्रतिवाद भी उपजने को विवश होता है . अखबार जो इन दिनो संपादकीय पन्नो पर व्यंग्य के पोषक बने हुये हैं , समसामयिक राजनैतिक व्यंग्य को तरजीह देते हैं . और देखादेखी व्यंग्यकार राजनीतिक व्यंग्य की ओर आकर्षित होता है . मैं राजनैतिक व्यंग्यो में भी मर्यादा , इशारो और सीधे नाम न लिये जाने का पक्षधर हूं .

व्यंग्य नाटक ...

  नुक्कड़ नाटक इन दिनो लोकप्रिय विधा है . और व्यंग्य नाटको की व्यापक संभावना इसी क्षेत्र में अधिक दिखती है . लेखको का नाटक लेखन के प्रति लगाव दर्शको के प्रतिसाद पर निर्भर होता है . जबलपुर में हमारे विद्युत मण्डल परिसर में भव्य तरंग प्रेक्षागृह है , जिसमें प्रति वर्ष न्यूनतम २ राष्ट्रीय स्तर के नाट्य समारोह होते हैं , सीजन टिकिट मिलना कठिन होता है . बंगाल , महाराष्ट्र , दिल्ली में भी नाटक के प्रति चेतना अपेक्षाकृत अधिक है . यह जरूर है कि यह क्षेत्र उपेक्षित है , पर व्यापक संभावनायें भी हैं .हिन्दी नाटको के क्षेत्र में बहुत काम होना चाहिये . नाटक प्रभावी दृश्य श्रव्य माध्यम है . पिताश्री बताते हैं कि जब वे छोटे थे तो  नाटक मंडलियां हुआ करती थीं जो सरकस की तरह शहरों में घूम घूम कर नाटक , प्रहसन प्रस्तुत किया करती थीं . जल नाद मेरा एक लम्बा नाटक है. जो जल के महत्व पौराणिक मिथको पर केंद्रित है .

अविश्वसनीय समय ...

कौआ कान ले गया मेरा संग्रह था . जिसकी भूमिका वरिष्ठ व्यंग्य पुरोधा हरि जोशी जी ने लिखी थी . उसमें कौवा कान ले गया शीर्षक व्यंग्य के आधार पर ही संग्रह का नाम रखा था .अफवाहो के बाजार को दंगाई हमेशा से अपने हित में बदलते रहे हैं , अब तकनीक ने यह आसान कर दिया है , पर अब तकनीक ही उन्हें बेनकाब करने के काम भी आ रही है . व्यंग्यकार की सब सुनने लगें तो फिर बात ही क्या है , पर फिर भी हमें आशा वान बने रहकर सा हित लेखन करते रहना होगा . निराश होकर कलम डालना हल नही है . लोगों को उनके मफलर में छिपे कान का अहसास करवाने के लिये पुरजोर लेखन जारी रहेगा . अजब समय है आज जब तक एक खबर पर भरोसा करो प्रति पक्ष से उसका सप्रमाण खंडन आ जाता है . अतः आज अपने विवेक को जागृत रखना बहुत जरूरी है . मेरी किताब "समस्या का समाधान व अन्य व्यंग्य " की भूमिका डा ज्ञान चतुर्वेदी जी ने लिखी , उन्होने लिखा है कि व्यंग्यकार को अपनी विधा को गंभीरता से बरतना चाहिये , मेरी रचनाओ में उन्हें वह गंभीरता मिली , मैं इस से मुग्ध हूं .

हास्य और व्यंग्य ...

यह व्यंग्यकार की व्यक्तिगत रुचि , विषय का चयन , और लेखन के उद्देश्य पर निर्भर है . हास्य प्रधान रचना करना भी सबके बस की बात नही होती . कई तो अमिधा से ही नही निकल पाते , व्यंजना और लक्षणा का समुचित उपयोग ही व्यंग्य कौशल है . करुणा व्यंग्य को हथियार बना कर प्रहार करने हेतु प्रेरित करती ही है .हर रचनाकार पहले कवि ही होता है , प्रत्यक्ष न भी सही , भावना से तो कवि हुये बिना विसंगतियां नजर ही नही आती . मेरा पहला कविता संग्रह १९९२ में आक्रोश आया था , जो तारसप्तक अर्धशती समारोह में १९९२ में विमोचित हुआ था  .आज भी पुरानी फिल्में देखते हुये मेरे आंसू निकल आते हैं , मतलब मैं तो शतप्रतिशत कवि हुआ . ये और बात है कि जब मैं व्यंग्यकार होता हूं तो शत प्रतिशत व्यंग्यकार ही होता हूं .

व्यंग्य विधा पर प्रश्न चिन्ह ...

  मेरी मूल धारा में व्यंग्य १९८१ से है .व्यंग्य के वर्तमान परिदृश्य पर दूरदर्शन भोपाल में एक चर्चा में मैंने तर्क सहित स्थापित किया था कि व्यंग्य अब विधा के रूप में सुस्थापित है . किसी भी विधा में व्यंग्य का प्रयोग उस विधा को और भी मुखर , व अभिव्यक्ति हेतु सहज बना देता है .  बहस तो हर विधा को लेकर की जा सकती है , ललित निबंध को ही ले लीजीये , जिसे विद्वान स्वतंत्र विधा नही मानते थे , यह हम व्यंग्यकारो का दायित्व है कि हम इतना अच्छा व भरपूर लिखें कि आलोचक स्वीकारें कि व्यंग्य उनकी समझ में स्वतंत्र विधा है .व्यंग्य लेखन में क्या नही होना चाहिये यह  सवाल भी किया जाता है ,  सीधा सा उत्तर है कि  व्यक्तिगत कटाक्ष नही होना चाहिये , इसकी अपेक्षा व्यक्ति की गलत प्रवृति पर मर्यादित अपरोक्ष प्रहार व्यंग्य का विषय बनाया जा सकता है . व्यंग्य में सकारात्मकता को समर्थन की संभावना ढ़ूंढ़ना जरूरी लगता है . जैसे  लाकडाउन में सोनू सूद के द्वारा किये गये जन हितैषी कार्यो के समर्थन में  प्रयोगधर्मी व्यंग्य लेख हो सकता है .

व्यंग्य में नये संभावना सोपान ...

आवश्यकता है कि व्यंग्य में गुणवत्ता आधार बने .नवाचार हो . मेरे एक व्यंग्य का हिस्सा है जिसमें मैंने लिखा है कि जल्दी ही साफ्टवेयर से व्यंग्य लिखे जायेंगे . यह बिल्कुल संभव भी है . १९८६ के आस पास मैने लिखा था " ऐसे तय करेगा शादियां कम्प्यूटर " आज हम देख रहे हैं कि ढ़ेरो मेट्रोमोनियल साइट्स सफलता से काम कर रही हैं . अपनी सेवानिवृति के बाद आप सब के सहयोग से मेरा मन है कि साफ्टवेयर जनित व्यंग्य पर कुछ ठोस काम कर सकूं . आप विषय डालें ,शब्द सीमा डालें लेखकीय भावना शून्य हो सकता है , पर कम्प्यूटर जनित व्यंग्य तो बन सकता है .व्यंग्य के मानकों में  अपरोक्ष प्रहार , हास्य , करुणा , पंच , भाषा , शैली , विषय प्रवर्तन , उद्देश्य , निचोड़ , बहुत कुछ हो सकता है जिस पर बढ़ियां व्यंग्य की स्केलिंग की जा सकती है । मन्तव्य यह कि मजा भी आये , शिक्षा भी मिले  , जिस पर प्रहार हो वह तिलमिलाए भी तो बढिया व्यंग्य कहा जा सकता है .

लांघेगा कोई स्थापित ऊंचाईयां ...

एक नही अनेक  अपनी अपनी तरह से व्यंग्यार्थी बने हुये हैं , पुस्तकें आ रही हैं , पत्रिकायें आ रही हैं , लिखा जा रहा है , पढ़ा जा रहा है शोध हो रहे हैं , नये माध्यमो की पहुंच वैश्विक है , परसाई जी की त्वरित पहुंच वैसी नही थी जैसी आज संसाधनो की मदद से हमारी है . प्रायः बातें होती हैं कि परसाई या शरद जोशी की ऊंचाई तक आज कोई पहुंच ही नही सकता . मैं सोचता हूं ऐसा क्यो मानना कि कोई परसाई जी तक नही पहुंच सकता , जिस दिन कोई वह ऊंचाई छू लेगा परसाई जी की आत्मा को ही सर्वाधिक सुखानुभुति होगी .

ज्यादा लिख डाला देर रात हो रही है , अब बस खुद से शेष बातें फिर कभी .

विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १ , शिला कुंज , नयागांव , जबलपुर , ४८२००८

Sunday, 21 March, 2021

बाढ़ से बचाव के लिये नदियां गहरी की जावें

 बाढ़ से बचाव के लिये नदियां गहरी की जावें  

विवेक रंजन श्रीवास्तव विनम्र

 मुख्य अभियंता सिविल, म प्र पू क्षे विद्युत वितरण कम्पनी
फैलो आफ इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स
A १ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर जबलपुर ४८२००८
फोन 7000375798

            पानी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है . सारी सभ्यतायें नैसर्गिक जल स्रोतो के तटो पर ही विकसित हुई हैं . बढ़ती आबादी के दबाव में , तथा ओद्योगिकीकरण से पानी की मांग बढ़ती ही जा रही है . इसलिये भूजल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है और परिणाम स्वरूप जमीन के अंदर पानी के स्तर में लगातार गिरावट होती जा रही है . नदियो पर हर संभावित प्राकृतिक स्थल पर बांध बनाये गये हैं . बांधो की ऊंचाई को लेकर अनेक जन आंदोलन हमने देखे हैं . बांधो के दुष्परिणाम भी हुये , जंगल डूब में आते चले गये और गांवो का विस्थापन हुआ . बढ़ती पानी की मांग के चलते जलाशयों के बंड रेजिंग के प्रोजेक्ट जब तब बनाये जाते हैं .
रहवासी क्षेत्रो के अंधाधुन्ध सीमेंटीकरण , पालीथिन के व्यापक उपयोग तथा कचरे के समुचित डिस्पोजल के अभाव में , हर साल तेज बारिश के समय या बादल फटने की प्राकृतिक घटनाओ से शहर , सड़कें बस्तियां लगातार डूब में आने की घटनायें बढ़ी हैं . विगत वर्षो में चेन्नई , केरल की बाढ़ हम भूले भी न थे कि इस साल पटना व अन्य तटीय नगरो में गंगा जी घुस आई . मध्यप्रदेश के गांधी सागर बांध का पावर हाउस समय रहते बांध के पानी की निकासी के अभाव में डूब गया .
बाढ़ की इन समस्याओ के तकनीकी समाधान क्या हैं . नदियो को जोड़ने के प्रोजेक्टस अब तक मैदानी हकीकत नही बन पाये हैं . चूंकि उनमें नहरें बनाकर बेसिन चेंज करने होंगे , पहाड़ो की कटिंग , सुरंगे बनानी पड़ेंगी , ये सारे प्रोजेक्टस् बेहद खर्चीले हैं , और फिलहाल सरकारो के पास इतनी अकूत राशि नही है .  फिर बाढ़ की त्रासदी के इंजीनियरिंग समाधान क्या हो सकते हैं ?
अब समय आ गया है कि जलाशयो ,वाटर बाडीज , शहरो के पास नदियो  को ऊंचा नही गहरा किया जावे .यांत्रिक सुविधाओ व तकनीकी रूप से विगत दो दशको में हम इतने संपन्न हो चुके हैं कि समुद्र की तलहटी पर भी उत्खनन के काम हो रहे हैं . समुद्र पर पुल तक बनाये जा रहे हैं बिजली और आप्टिकल सिग्नल केबल लाइनें बिछाई जा रही है . तालाबो , जलाशयो की सफाई के लिये जहाजो पर माउंटेड ड्रिलिंग , एक्सकेवेटर , मडपम्पिंग मशीने उपलब्ध हैं . कई विशेषज्ञ कम्पनियां इस क्षेत्र में काम करने की क्षमता सम्पन्न हैं .मूलतः इस तरह के कार्य हेतु किसी जहाज या बड़ी नाव , स्टीमर पर एक फ्रेम माउंट किया जाता है जिसमें मथानी की तरह का बड़ा रिग उपकरण लगाया जाता है , जो जलाशय
की तलहटी तक पहुंच कर मिट्टी को मथकर खोदता है , फिर उसे मड पम्प के जरिये जलाशय से बाहर फेंका जाता है . नदियो के ग्रीष्म काल में सूख जाने पर तो यह काम सरलता से जेसीबी मशीनो से ही किया जा सकता है . नदी और बड़े नालो मे भी  नदी की ही चौड़ाई तथा लगभग एक किलोमीटर लम्बाई में चम्मच के आकार की लगभग दस से बीस मीटर की गहराई में खुदाई करके रिजरवायर बनाये जा
सकते हैं . इन वाटर बाडीज में नदी के बहाव का पानी भर जायेगा , उपरी सतह से नदी का प्रवाह भी बना रहेगा जिससे पानी का आक्सीजन कंटेंट पर्याप्त रहेगा . २ से ४ वर्षो में इन रिजरवायर में धीरे धीरे सिल्ट जमा होगी जिसे इस अंतराल पर ड्रोजर के द्वारा साफ करना होगा . नदी के क्षेत्रफल में ही इस तरह तैयार जलाशय का विस्तार होने से कोई भी अतिरिक्त डूब क्षेत्र जैसी समस्या नही होगी . जलाशय के पानी को पम्प करके यथा आवश्यकता उपयोग किया जाता रहेगा .
            अब जरूरी है कि अभियान चलाकर बांधो में जमा सिल्ट ही न निकाली जाये वरन जियालाजिकल एक्सपर्टस की सलाह के अनुरूप  बांधो को गहरा करके उनकी जल संग्रहण क्षमता बढ़ाई जाने के लिये हर स्तर पर प्रयास किये जायें . शहरो के किनारे से होकर गुजरने वाली नदियो में ग्रीष्म ‌‌काल में जल धारा सूख जाती है , हाल ही पवित्र क्षिप्रा के तट पर संपन्न उज्जैन के सिंहस्थ के लिये क्षिप्रा में नर्मदा नदी का पानी पम्प करके डालना पड़ा था . यदि क्षिप्रा की तली को गहरा करके जलाशय बना दिया जावे  तो उसका पानी स्वतः ही नदी में बारहो माह संग्रहित रहा आवेगा  .इस विधि से बरसात के दिनो में बाढ़ की समस्या से भी किसी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है . इतना ही नही गिरते हुये भू जल स्तर पर भी नियंत्रण हो सकता है क्योकि गहराई में पानी संग्रहण से जमीन रिचार्ज होगी , साथ ही जब नदी में ही पानी उपलब्ध होगा तो लोग ट्यूब वेल का इस्तेमाल भी कम करेंगे . इस तरह दोहरे स्तर पर भूजल में वृद्धि होगी . नदियो व अन्य वाटर बाडीज के गहरी करण से जो मिट्टी , व अन्य सामग्री बाहर आयेगी उसका उपयोग भी भवन निर्माण , सड़क निर्माण तथा अन्य इंफ्रा स्ट्रक्चर डेवलेपमेंट में किया जा सकेगा . वर्तमान में इसके लिये पहाड़ खोदे जा रहे हैं जिससे पर्यावरण को व्यापक स्थाई नुकसान हो रहा है , क्योकि पहाड़ियो की खुदाई करके पत्थर व मुरम तो प्राप्त हो रही है पर इन पर लगे वृक्षो का विनाश  हो रहा है , एवं पहाड़ियो के खत्म होते जाने से स्थानीय बादलो से होने वाली वर्षा भी
प्रभावित हो रही है .
            नदियो की तलहटी की खुदाई से एक और बड़ा लाभ यह होगा कि इन नदियो के भीतर छिपी खनिज संपदा का अनावरण सहज ही हो सकेगा . छत्तीसगढ़ में महानदी में स्वर्ण कण   मिलते हैं ,तो कावेरी के थले में प्राकृतिक गैस , इस तरह के अनेक संभावना वाले क्षेत्रो में विषेश उत्खनन भी करवाया जा सकता है .
            पुरातात्विक महत्व के अनेक परिणाम भी हमें नदियो तथा जलाशयो के गहरे उत्खनन से मिल सकते हैं , क्योकि भारतीय संस्कृति में आज भी अनेक आयोजनो के अवशेष  नदियो में विसर्जित कर देने की परम्परा हम पाले हुये हैं . नदियो के पुलो से गुजरते हुये जाने कितने ही सिक्के नदी में डाले
जाने की आस्था जन मानस में देखने को मिलती है . निश्चित ही सदियो की बाढ़ में अपने साथ नदियां जो कुछ बहाकर ले आई होंगी उस इतिहास को अनावृत करने में नदियो के गहरी करण से बड़ा योगदान मिलेगा .
            पन बिजली बनाने के लिये अवश्य ऊँचे बांधो की जरूरत बनी रहेगी , पर उसमें भी रिवर्सिबल रिजरवायर , पम्प टरबाईन टेक्नीक से पीकिंग अवर विद्युत उत्पादन को बढ़ावा देकर गहरे जलाशयो के पानी का उपयोग किया जा सकता है .
            मेरे इस आमूल मौलिक  विचार पर भूवैज्ञानिक , राजनेता , नगर व ग्राम स्थानीय प्रशासन , केद्र व राज्य सरकारो को तुरंत कार्य करने की जरुरत है , जिससे महाराष्ट्र जैसे सूखे से देश बच सके कि हमें पानी कीट्रेने न चलानी पड़े , बल्कि बरसात में हर क्षेत्र की नदियो में बाढ़ की तबाही मचाता जो पानी व्यर्थ बह जाता है तथा साथ में मिट्टी बहा ले जाता है वह नगर नगर में नदी के क्षेत्रफल के विस्तार में ही गहराई में साल भर संग्रहित रह सके और इन प्राकृतिक जलाशयो से उस क्षेत्र की जल आपूर्ति वर्ष भर हो सके.



Wednesday, 16 December, 2020

पुस्तक चर्चा , तिष्यरक्षिता

 


पुस्तक चर्चा
तिष्यरक्षिता
खण्ड काव्य
कवि डा संजीव कुमार
पृष्ठ १३२ , मूल्य २०० रु
IASBN 9789389856859
वर्ष २०२०
इंडिया नेटबुक्स , नोयडा
चर्चाकार ..विवेक रंजन श्रीवास्तव , शिला कुंज ,
नयागांव ,जबलपुर ४८२००८
डा संजीव कुमार के नव प्रकाशित खण्ड काव्य तिष्यरक्षिता को समझने के लिये हमें तिष्यरक्षिता की कथा की किंचित पृष्ठभूमि की जानकारी जरूरी है . इसके लिये हमें काल्पनिक रूप से अवचेतन में स्वयं को चक्रवर्ती सम्राट अशोक के समय में उतारना होगा . अर्थात  304 बी सी ई से  232 बी सी ई की कालावधि , आज से कोई 2300 वर्षो पहले . तब के देश , काल , परिवेश , सामाजिक परिस्थितियो की समझ तिष्यरक्षिता के व्यवहार की नैतिकता व कथा के ताने बाने की किंचित जानकारी  लेखन के उद्देश्य व काव्य के साहित्यिक आनंद हेतु आवश्यक है .  
ऐतिहासिक पात्रो पर केंद्रित अनेक रचनायें हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं . तिष्यरक्षिता , भारतीय मौर्य राजवंश के महान चक्रवर्ती सम्राट अशोक की पांचवी पत्नी थी . जो मूलतः सम्राट की ही चौथी पत्नी असन्ध मित्रा की परिचारिका थी . उसके सौंदर्य से प्रभावित होकर अशोक ने आयु में बड़ा अंतर होते हुये भी उससे विवाह किया था . पाली साहित्य में उल्लेख मिलता है कि तिष्यरक्षिता बौद्ध धर्म की समर्थक नहीं थी .  वह स्वभाव से अत्यंत कामातुर थी .
अशोक की तीसरी पत्नी पद्मावती का पुत्र  कुणाल था . जिसकी  आँखें बहुत सुंदर थीं . सम्राट अशोक ने अघोषित रूप से कुणाल को अपना उत्तराधिकारी मान लिया था . कुणाल तिष्यरक्षिता का समवयस्क था . उसकी आंखो पर मुग्ध होकर उसने उससे प्रणय प्रस्ताव किया . किंतु कुणाल ने उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया .  तिष्यरक्षिता अपने सौंदर्य के इस अपमान  को भुला न सकी .  जब एक बार अशोक बीमार पड़ा तब तिष्यरक्षिता ने उसकी  सेवा कर उससे मुंह मांगा वर प्राप्त करने का वचन  ले लिया . एक बार तक्षशिला में विद्रोह होने पर जब कुणाल उसे दबाने के लिए भेजा गया तब तिष्यरक्षियता ने अपने वरदान में सम्राट, अशोक की राजमुद्रा प्राप्तकर तक्षशिला के मंत्रियों को कुणाल की आँखें निकाल लेने तथा उसे मार डालने की मुद्रांकित आज्ञा लिख भेजी .  इस हेतु अनिच्छुक मंत्रियों ने जनप्रिय कुणाल की आँखें तो निकलवा ली परंतु उसके प्राण छोड़ दिए .  अशोक को जब इसका पता चला तो उसने तिष्यरक्षिता को दंडस्वरूप जीवित जला देने की आज्ञा दी .
त्रिया चरित्र की यही कथा खण्ड काव्य का रोचक कथानक है . जिसमें इतिहास , मनोविज्ञान , साहित्यिक कल्पना सभी कुछ समाहित करते हुये डा संजीव कुमार ने पठनीय , विचारणीय , मनन करने योग्य , प्रश्नचिन्ह खड़े करता खण्ड काव्य लिखा है . उन्होने अपनी वैचारिक उहापोह को अभिव्यक्त करने के लिये  अकविता को विधा के रूप में चुना है .तत्सम शब्दो का प्रवाहमान प्रयोग कर  १६ लम्बी भाव अकविताओ में मनोव्यथा की सारी कथा बड़ी कुशलता से कह डाली है .
कुछ पंक्तियां उधृत करता हूं
क्रोध भरी नारी
होती है कठिन ,
और प्रतिशोध के लिये
 वह ठान ले , तो
परिणाम हो सकते हैं
महाभयंकर .
वह हो प्रणय निवेदक तो
कुछ भी कर सकती है वह  
क्रोध में प्रतिशोध में
या
यूं तो मनुष्य सोचता है
मैं शक्तिमान
मैं सुखशाली
मैं मेधामय
मैं बलशाली
पर सत्य ही है
जीवन में कोई कितना भी
सोचे मन में सब नियति का है
निश्चित विधान .

     राम के समय में रावण की बहन सूर्पनखा , पौराणिक संदर्भो में अहिल्या की कथा , गुरू पत्नी पर मोहित चंद्रमा की कथा , कृष्ण के समय में महाभारत के अनेकानेक विवाहेतर संबंध , स्त्री पुरुष संबंधो की आज की मान्य सामाजिक नैतिकता पर प्रश्नचिन्ह हैं . दूसरी ओर वर्तमान स्त्री स्वातंत्र्य के पाश्चात्य मापदण्डो में भी सामाजिक बंधनो को तोड़ डालने की उत्श्रंखलता इस खण्ड काव्य की कथा वस्तु को प्रासंगिक बना देती है . पढ़िये और स्वयं निर्णय कीजीये की तिष्यरक्षिता कितनी सही थी कितनी गलत . उसकी शारीरिक भूख कितनी नैतिक थी कितनी अनैतिक . उसकी प्रतिशोध की भावना कुंठा थी या स्त्री मनोविज्ञान ? ऐसे सवालो से जूझने को छोड़ता कण्ड काव्य लिखने हेतु डा संजीव बढ़ाई के सुपात्र हैं .

 चर्चाकार ..विवेक रंजन श्रीवास्तव , शिला कुंज ,
नयागांव ,जबलपुर ४८२००८

Thursday, 27 August, 2020

बुन्देली की बात

 बुंदेली और स्व डॉ पूरनचंद श्रीवास्तव जी जैसे बुंदेली विद्वानो की सुप्रतिष्ठा जरूरी  

 .. विवेक रंजन श्रीवास्तव , शिला कुंज , नयागांव ,जबलपुर ४८२००८

ईसुरी बुंदेलखंड के सुप्रसिद्ध लोक कवि हैं ,उनकी रचनाओं में ग्राम्य संस्कृति एवं सौंदर्य का चित्रण है। उनकी ख्‍याति फाग के रूप में लिखी गई रचनाओं के लिए सर्वाधिक है,  उनकी रचनाओं में बुन्देली लोक जीवन की सरसता, मादकता और सरलता और रागयुक्त संस्कृति की रसीली रागिनी से जन मानस को मदमस्त करने की क्षमता है।

बुंदेली बुन्देलखण्ड में बोली जाती है। यह कहना कठिन है कि बुंदेली कितनी पुरानी बोली हैं लेकिन ठेठ बुंदेली के शब्द अनूठे हैं जो सादियों से आज तक प्रयोग में आ रहे हैं। बुंदेलखंडी के ढेरों शब्दों के अर्थ बंगला तथा मैथिली बोलने वाले आसानी से बता सकते हैं। प्राचीन काल में राजाओ के परस्पर व्यवहार में  बुंदेली में पत्र व्यवहार, संदेश, बीजक, राजपत्र, मैत्री संधियों के अभिलेख तक सुलभ  है। बुंदेली में वैविध्य है, इसमें बांदा का अक्खड़पन है और नरसिंहपुर की मधुरता भी है। वर्तमान बुंदेलखंड क्षेत्र में अनेक जनजातियां निवास करती थीं। इनमें कोल, निषाद, पुलिंद, किराद, नाग, सभी की अपनी स्वतंत्र भाषाएं थी, जो विचारों अभिव्यक्तियों की माध्यम थीं। भरतमुनि के नाट्य शास्‍त्र में भी बुंदेली बोली का उल्लेख मिलता है .  सन एक हजार ईस्वी में बुंदेली पूर्व अपभ्रंश के उदाहरण प्राप्त होते हैं। जिसमें देशज शब्दों की बहुलता थी। पं॰ किशोरी लाल वाजपेयी, लिखित हिंदी शब्दानुशासन के अनुसार हिंदी एक स्वतंत्र भाषा है, उसकी प्रकृति संस्कृत तथा अपभ्रंश से भिन्न है। बुंदेली प्राकृत शौरसेनी तथा संस्कृत जन्य है।  बुंदेली की अपनी चाल,  प्रकृति तथा वाक्य विन्यास की अपनी मौलिक शैली है। भवभूति उत्तर रामचरित के ग्रामीणों की भाषा विंध्‍येली प्राचीन बुंदेली ही थी। आशय मात्र यह है कि बुंदेली एक प्राचीन , संपन्न , बोली ही नही परिपूर्ण लोकभाषा है . आज भी बुंदेलखण्ड क्षेत्र में घरो में बुंदेली खूब बोली जाती है . क्षेत्रीय आकाशवाणी केंद्रो ने इसकी मिठास संजोई हुयी हैं .

ऐसी लोकभाषा के उत्थान , संरक्षण व नव प्रवर्तन का कार्य तभी हो सकता है जब क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों ,संस्थाओ , पढ़े लिखे विद्वानो के  द्वारा बुंदेली में नया रचा जावे . बुंदेली में कार्यक्रम हों . जनमानस में बुंदेली के प्रति किसी तरह की हीन भावना न पनपने दी जावे , वरन उन्हें अपनी माटी की इस सोंधी गंध , अपनापन ली हुई भाषा के प्रति गर्व की अनुभूति हो . प्रसन्नता है कि बुंदेली भाषा परिषद , गुंजन कला सदन , वर्तिका जैसी संस्थाओ ने यह जिम्मेदारी उठाई हुई है . प्रति वर्ष १ सितम्बर को स्व डा पूरन चंद श्रीवास्तव जी के जन्म दिवस के सु अवसर पर बुंदेली पर केंद्रित अनेक आयोजन गुंजन कला सदन के माध्यम से होते हैं .

आवश्यक है कि बुंदेली के विद्वान लेखक , कवि , शिक्षाविद स्व पूरन चंद श्रीवास्तव जी के व्यक्तित्व , विशाल कृतित्व से नई पीढ़ी को परिचय कराया जाते रहे . जमाना इंटरनेट का है . इस कोरोना काल में सास्कृतिक  आयोजन तक यू ट्यूब , व्हाट्सअप ग्रुप्स व फेसबुक के माध्यम से हो रहे हैं , किंतु बुंदेली के विषय में , उसके लेकको , कवियों , साहित्य के संदर्भ में इंटरनेट पर जानकारी नगण्य है .

स्व पूरन चंद श्रीवास्तव जी का जन्म १ सितम्बर १९१६ को ग्राम रिपटहा , तत्कालीन जिला जबलपुर अब कटनी में हुआ था . कायस्थ परिवारों में शिक्षा के महत्व को हमेशा से महत्व दिया जाता रहा है , उन्होने अनवरत अपनी शिक्षा जारी रखी , और पी एच डी की उपाधि अर्जित की .वे हितकारिणी महाविद्यालय जबलपुर से जुड़े रहे और विभिन्न पदोन्तियां प्रापत करते हुये प्राचार्य पद से १९७६ में सेवानिवृत हुये . यह उनका छोटा सा आजीविका पक्ष था . पर इस सबसे अधिक वे मन से बहुत बड़ साहित्यकार थे . बुंदेली लोक भाषा उनकी अभिरुचि का प्रिय विषय था . उन्होंने बुंदेली में और बुंदेली के विषय में खूब लिखा . रानी दुर्गावती बुंदेलखण्ड का गौरव हैं . वे संभवतः विश्व की पहली महिला योद्धा हैं जिनने रण भूमि में स्वयं के प्राण न्यौछावर किये हैं . रानी दुर्गावती पर श्रीवास्तव जी का खण्ड काव्य बहु चर्चित महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ है . भोंरहा पीपर उनका एक और बुंदेली काव्य संग्रह है . भूगोल उनका अति प्रिय विषय था और उन्होने भूगोल की आधा दर्जन पुस्तके लिखि , जो शालाओ में पढ़ाई जाती रही हैं . इसके सिवाय अपनी लम्बी रचना यात्रा में पर्यावरण , शिक्षा पर भी उनकी किताबें तथा विभिन्न साहित्यिक विषयों पर स्फुट शोध लेख , साक्षात्कार , अनेक प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओ में प्रकाशन आकाशवाणी से प्रसारण तथा संगोष्ठियो में सक्रिय भागीदारी उनके व्यक्तित्व के हिस्से रहे हैं . मिलन , गुंजन कला सदन , बुंदेली साहित्य परिषद , आंचलिक साहित्य परिषद जैसी अनेकानेक संस्थायें उन्हें सम्मानित कर स्वयं गौरवांवित होती रही हैं . वे उस युग के यात्री रहे हैं जब आत्म प्रशंसा और स्वप्रचार श्रेयस्कर नही माना जाता था , एक शिक्षक के रूप में उनके संपर्क में जाने कितने लोग आते गये और वे पारस की तरह सबको संस्कार देते हुये मौन साधक बने रहे .

उनके कुछ चर्चित बुंदेली  गीत उधृत कर रहा हूं ...


कारी बदरिया उनआई....... ️

 कारी बदरिया उनआई,  हां काजर की झलकार ।

सोंधी सोंधी धरती हो गई,  हरियारी मन भाई,खितहारे के रोम रोम में,  हरख-हिलोर समाई ।ऊम झूम सर सर-सर बरसै,  झिम्मर झिमक झिमकियाँ ।लपक-झपक बीजुरिया मारै,  चिहुकन भरी मिलकियां ।रेला-मेला निरख छबीली-  टटिया टार दुवार,कारी बदरिया उनआई,हां काजर की झलकार ।

औंटा बैठ बजावै बनसी,  लहरी सुरमत छोरा ।  अटक-मटक गौनहरी झूलैं,  अमुवा परो हिंडोरा ।खुटलैया बारिन पै लहकी,  त्योरैया गन्नाई ।खोल किवरियाँ ओ महाराजा  सावन की झर आई  ऊँचे सुर गा अरी बुझाले,  प्रानन लगी दमार,कारी बदरिया उनआई,  हां काजर की झलकार ।

मेंहदी रुचनियाँ केसरिया,  देवैं गोरी हाँतन ।हाल-फूल बिछुआ ठमकावैं  भादों कारी रातन ।माती फुहार झिंझरी सें झमकै  लूमै लेय बलैयाँ-घुंचुअंन दबक दंदा कें चिहुंकें,  प्यारी लाल मुनैयाँ ।हुलक-मलक नैनूँ होले री,  चटको परत कुँवार,कारी बदरिया उनआई,  हाँ काजर की झलकार ।

इस बुंदेली गीत के माध्यम से उनका पर्यावरण प्रेम स्पष्ट परिलक्षित होता है .


इसी तरह उनकी  एक बुन्देली कविता में जो दृश्य उनहोंने प्रस्तुत किया है वह सजीव दिखता है .

बिसराम घरी भर कर लो जू...-------------

बिसराम घरी भर कर लो जू, झपरे महुआ की छैंयां,ढील ढाल हर धरौ धरी पर,  पोंछौ माथ पसीना ।तपी दुफरिया देह झांवरी,  कर्रो क्वांर महीना ।भैंसें परीं डबरियन लोरें,   नदी तीर गई गैयाँ ।बिसराम घरी भर कर लो जू,  झपरे महुआ की छैंयां ।

सतगजरा की सोंधी रोटीं,  मिरच हरीरी मेवा ।खटुवा के पातन की चटनी,  रुच को बनों कलेवा ।करहा नारे को नीर डाभको,  औगुन पेट पचैयाँ ।बिसराम घरी भर कर लो जू,  झपरे महुआ की छैंयां ।

लखिया-बिंदिया के पांउन उरझें,  एजू डीम-डिगलियां ।हफरा चलत प्यास के मारें,  बात बड़ी अलभलियां ।दया करो निज पै बैलों पै,  मोरे राम गुसैंयां ।बिसराम घरी भर कर लो जू,  झपरे महुआ की छैंयां ।


 वे बुन्देली लोकसाहित्य एवं भाषा विज्ञान के विद्वान थे . सीता हरण के बाद श्रीराम की मनः स्थिति को दर्शाता उनका एक बुन्देली गीत यह स्पष्ट करने के लिये पर्याप्त है कि राम चरित मानस के वे कितने गहरे अध्येता थे .

अकल-विकल हैं प्रान राम के----------------

अकल-विकल हैं प्रान राम के  बिन संगिनि बिन गुँइयाँ ।फिरैं नाँय से माँय बिसूरत,  करें झाँवरी मुइयाँ ।

पूछत फिरैं सिंसुपा साल्हें,  बरसज साज बहेरा ।धवा सिहारू महुआ-कहुआ,  पाकर बाँस लमेरा ।

वन तुलसी वनहास माबरी,  देखी री कहुँ सीता ।दूब छिछलनूं बरियारी ओ,  हिन्नी-मिरगी भीता ।

खाई खंदक टुंघ टौरियाँ,   नादिया नारे बोलौ ।घिरनपरेई पंडुक गलगल,  कंठ - पिटक तौ खोलौ  ।ओ बिरछन की छापक छंइयाँ,  कित है जनक-मुनइयाँ ?अकल-विकल हैं प्रान राम के  बिन संगिनि बिन गुँइयाँ ।

उपटा खांय टिहुनिया जावें,  चलत कमर कर धारें ।थके-बिदाने बैठ सिला पै,  अपलक नजर पसारें ।

मनी उतारें लखनलाल जू,  डूबे घुन्न-घुनीता ।रचिये कौन उपाय पाइये,  कैसें म्यारुल सीता ।

आसमान फट परो थीगरा,  कैसे कौन लगावै ।संभु त्रिलोचन बसी भवानी,  का विध कौन जगावै ।कौन काप-पसगैयत हेरें,  हे धरनी महि भुंइयाँ ।अकल-विकल हैं प्रान राम के  बिन संगिनि बिन गुँइयाँ ।


बुंदेली भाषा का भविष्य नई पीढ़ी के हाथों में है , अब वैश्विक विस्तार के सूचना संसाधन कम्प्यूटर व मोबाईल में निहित हैं , समय की मांग है कि स्व डा पूरन चंद श्रीवास्तव जैसे बुंदेली के विद्वानो को उनका समुचित श्रेय व स्थान , प्रतिष्ठा मिले व बुंदेली भाषा की व्यापक समृद्धि हेतु और काम किया जावे .

विवेक रंजन श्रीवास्तव  

Sunday, 5 July, 2020

अकाब --/ प्रबोध गोविल , पुस्तक चर्चा


पुस्तक समीक्षा
अकाब
उपन्यास
लेखक प्रबोध कुमार गोविल
दिशा प्रकाशन दिल्ली
मूल्य २०० रु
पृष्ठ १२८

हिन्दी में समसामयिक मुद्दो पर कम ही उपन्यास  लिखे जा रहे हैं . ऐसे समय में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के ट्विन टावर पर अलकायदा के हमले के संदर्भ को लेकर कहानी बुनते हुये , ग्लोबल विलेज बनती दुनियां से पात्र चयन कर "अकाब" लिखा गया है . जिसमें जापान से प्रारंभ नायक की यात्रा , न्यूयार्क और जम्मू काश्मीर तक का सफर करती है . एक मूलतः जापानी मसाज बाय के जीवन परिदृश्य को  कहानी में बखूबी उतारा गया है . भाषा रोचक है .वर्णन इस तरह है कि पाठक के सम्मुख घटना चित्र खिंचता चला जाता है .  वैश्विक परिदृश्य में उन्मुक्त फिल्मी सितारा स्त्री के चरित्र का वर्णन सजीव है .
न्यूयार्क शहर का वर्णन करते हुये लेखक लिखता है " पत्थरो के साम्राज्य में शीशे जड़कर सभ्यता की पराकाष्ठा मिट्टी को भुलाये बैठी थी " कांक्रीट के नये जंगलो के संदर्भ में यह वर्णन दुबई से लेकर मुम्बई और न्यूयार्क से लेकर टोकियो तक खरा है . पर लिखने का यह सामर्थ्य तभी संभव है जब लेखक ने स्वयं विश्व भ्रमण किया हो  और भीतर तक महानगरो में गुमशुदा मिट्टी को महसूसा हो . इसी तरह वे लिखते हैं " चंद्रमा इन बिल्डिगो के गुंजलक के बीच ताक झांककर ही दिख पाता था . शहर आसमान के चांद का मोहताज भी नहीं था . जिसने भी बहुमंजिला इमारतो में रुपहली बिजली की चमक दमक देखी है वह इन शब्दो के भावार्थ समझ सकता है . जिस उपन्यास के पात्रो के नाम तनिष्क , मसरू ओस्से , आसानिका , सेलिना और शेख साहब, जान अल्तमश  हों , आप समझ सकते हैं उसकी कहानी वैश्विक कैनवास पर ही लिखी  होगी .प्रबोध एक जगह लिखते हैं " एसिया के कुछ देशों की प्रवृत्ति थी कि यहां यूरोप या अमेरिका के देशों में स्थापित मूल्य ज्यादा प्रामाणिक माने जाते हैं . " यह लेखक का अनुभूत यथार्थ जान पड़ता है . ट्विन टावर पर अलकायदा के हमले के संदर्भ में वर्णन है " विश्व की दो सभ्यताओं के बीच वैमनस्य की पराकाष्ठा के इस हादसे में हजारों लोगों ने अपनी जान बेवजह गंवाई . " स्टेच्यू आफ लिबर्टी के शहर में हुआ यह संकीर्ण मानसिकता का हमला सचमुच सभ्यता पर पोती गई कालिख थी . आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक जनमत इसी हमले के बाद बन सका है .  काश्मीर में नायक को मसरू ओस्से की पूर्व में कभी भी न मिली हुयी पत्नी व बेटी से मिल जाना कहानी की नाटकीयता है .मसाज प्रक्रिया के उन्मुक्त वर्णन में बरती गई साब्दिक शालीनता उपन्यास के साहित्यिक स्तर को बनाये रखती है . अस्तु उपन्यास का विन्यास , कथा , रोचक है .  उपन्यास एक बार पठनीय है . लेखक व दिशा प्रकाशन इसके लिये बधाई के पात्र हैं  . मैं दिशा प्रकाशन के मधुदीप जी से लम्बे समय से सुपरिचित हूं . अकाब पक्षी का प्रतीक विमानो के लिये किया गया है , वे ही विमान जो दूरीयो को घण्टो में समेटकर सारी पृ्थ्वी को जोड़ रहे हैं पर जिनका इस्तेमाल ओसामा बिन लादेन ने ट्विन टावर पर हमले के लिये किया था .
vivek ranjan shrivastava

Sunday, 19 January, 2020


गाडरवाड़ा में चेतना का राष्ट्रीय पुस्तक पुरस्कार आयोजन

शक्कर नदी के तट पर बसा , ओशो की जन्मभूमि , अरहर दाल और गुड़ उत्पादन के लिए प्रसिद्ध गाडरवाड़ा शहर साहित्य के लिए भी सुप्रसिद्ध है । चेतना संस्था के युवा साथी श्री कुशलेन्द्र श्रीवास्तव , श्री विजय बेशर्म , नरेन्द्र श्रीवास्तव , व टीम ने राष्ट्रीय स्तर पर किताबों के लिए पुरस्कार समारोह का आयोजन किया ।
विवेक रंजन श्रीवास्तव मुख्य अतिथि के रुप मे सम्मानित किये गए ।   सिमट रही शक्कर नदी को पुनः उर्जित करने का सुझाव मुख्य अतिथि ने दिया , जिसे व्यापक सराहना मिली । आयोजन में साहित्य भी भेंट किया गया , जो महत्वपूर्ण रहा , माला , शाल तो प्रत्येक कार्यक्रम में लिए दिए जाते ही हैं । श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव की कृति अनुगुंजन सबको भेंट स्वरूप प्रदान की गई ।

Sunday, 29 December, 2019

किताबों का सफर नामा

वर्ष 1994 में मेरी पहली नई कविता की  किताब आई थी "आक्रोश " .

इसके बाद लगातार विभिन्न सांस्कृतिक साहित्यिक कार्यक्रमों के आयोजनों से जुड़ा रहा . महिष्मति महोत्सव , फ़िल्म स्टार नाइट जैसे भव्य  आयोजन सफलता पूर्वक हुए , रेवा तरंग , दिव्य नर्मदा जैसी  स्मारिकाएँ व पत्रिकाएं सम्पादन से जुड़ा रहा ।

2000 में कान्हा पर एक काफी टेबल बुक  आई।

2006 में व्यंग्य की किताब " रामभरोसे "  आई। पुरस्कृत हुई।

2007 में नाटक संग्रह " हिन्दोस्तां हमारा " आया ।साहित्य अकादमी ने रु31000 का हरिकृष्ण प्रेमी सम्मान इसके लिए दिया ।

2009 में व्यंग्य संग्रह " कौआ कान ले गया " छपा । इसे भी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ ।

वर्ष 2013 में किताब "  बिजली का बदलता परिदृश्य '  प्रकाशित हुआ ।बाद में  इसका दूसरा संस्करण भी छपा ।

2015 में "मेरे प्रिय व्यंग्य लेख"  सीरीज में मेरी किताब भी छपी ।

2015 में ही "जल जंगल और जमीन " जयपुर से छपी। स्कूलों में खूब खरीदी गई ।

इस बीच कुछ E बुक्स डेली हंट एप पर  भी आईं ।
अनेक सामूहिक संग्रहो में समय समय पर कुछ न कुछ मित्र बुलाकर छापते रहे हैं।
उसी प्रकाशक ने मांगकर 2015  में ही  मेरा पुरस्कार प्राप्त नाटक "  जादू शिक्षा का" छापा ।

2019 में रवीना प्रकाशन दिल्ली के चन्द्रहास जी से परिचय हुआ , सुपरिणाम रहा , वैश्विक व्यंग्य संग्रह " मिली भगत ".

अब 2020 में आने को है मेरा व्यंग्य संग्रह " खटर पटर ".