Saturday, 25 April 2026

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भारतीय अभियांत्रिकी परंपरा से वर्तमान

 अभियंता बंधु 2025


सम्पादकीय


भारतीय अभियांत्रिकी  परंपरा से वर्तमान 



“योगः कर्मसु कौशलम्”

अर्थात कर्म में कौशल ही योग है



कभी कभी इतिहास स्वयं को रचने के लिए मनुष्य का सहारा नहीं लेता, बल्कि मनुष्य को अपने साधन के रूप में प्रयोग करता है। भारत की सभ्यता ने यही किया है। जब मानव ने मिट्टी को आकार देना सीखा, तो भारत ने उससे मंदिर गढ़े। जब जल को नियंत्रित करने की आवश्यकता हुई, तो भारत ने नदियों के तट पर सिंचाई की व्यवस्था बनाई। जब पत्थरों से दीवारें बनीं, तो भारत ने उन दीवारों में नक्काशी से कविता लिख दी। यह वह भूमि है जहाँ अभियंत्रण केवल तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन था। यहाँ अभियंता केवल निर्माता नहीं, भगवान विश्वकर्मा के स्वरूप में सृष्टा माने गए।


मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की विकसित सभ्यता आज भी हमें यह सिखाती हैं कि स्वच्छता और जल-प्रबंधन केवल शहरी सुविधा नहीं, बल्कि सभ्यता की रीढ़ हैं। सिंधु घाटी का नगर नियोजन, समकोणीय गलियाँ, कुएँ, स्नानागार , ये सब हमारे पूर्वज अभियंताओं की प्रतिभा का जीवंत प्रमाण हैं। प्राचीन ग्रंथों में भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख उसी गौरव के साथ हुआ है जिस गौरव से कवि वाल्मीकि और ऋषि व्यास का। हर वर्ष हमारी संस्कृति में हम इंजीनियरिंग संस्थानों में विश्वकर्मा पूजन के आयोजन करते आए हैं।भारतीय अभियंत्रण सदैव कला, विज्ञान और आध्यात्म के संगम पर खड़ा रहा है। हमारे मंदिरों की स्थापत्य कला, लोहे के खंभे जो सदियों से जंगरहित खड़े हैं, या फिर अजन्ता की गुफाओं में शिल्प-सौंदर्य ,  सब यह बताते हैं कि हमारे अभियंता केवल साधन बनाने वाले नहीं, जन आत्मा में बसने वाले कलाकार थे।


समय बदला, औपनिवेशिक युग आया। इंजीनियरिंग का अर्थ केवल गणितीय संरचना तक सीमित कर दिया गया। भारत में अभियंत्रण को अंग्रेज़ी पाठशालाओं के माध्यम से नए रूप में ढाला गया। किंतु भारतीय मस्तिष्क अपनी जड़ों से कट नहीं सका। स्वतंत्रता संग्राम के साथ ही एक नए अभियंत्रण युग का आरंभ हुआ , जो आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। रेलवे, सिंचाई परियोजनाएँ, बांध, इस्पात संयंत्र, औद्योगिक नगर , ये सब नवभारत की नींव थे। पंचवर्षीय योजनाओं में अभियंताओं का स्थान उतना ही महत्वपूर्ण था जितना किसी कवि का संस्कृति के निर्माण में होता है। नेहरूजी ने कहा था ,  बड़े बांध आधुनिक भारत के मंदिर हैं। यह कथन भारतीय अभियंताओं के लिए एक आदरांजलि था।

आज भारतीय अभियंता दुनियां के प्रायः प्रत्येक देश में कही न कही महत्वपूर्ण भूमिकाओं में सक्रिय हैं। 


 1920 में ‘इंस्टिट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया)’ की स्थापना हुई। कोलकाता मुख्यालय से  यह वैधानिक संस्था भारतीय अभियंताओं के लिए एक ऐसा साझा मंच बनी, जहाँ तकनीक और चिंतन दोनों का आदान-प्रदान हुआ। उस समय भारत गुलाम था, फिर भी तकनीकी विचार स्वतंत्र थे। इस संस्था ने इंजीनियरिंग के विविध क्षेत्रों सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, केमिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, माइनिंग, एयरोनॉटिकल, और अनेक शाखाओं को एक सूत्र में पिरोया। यह वह संस्था है जिसने तकनीक को केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाया।


भारत में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में तकनीकी लेखन का बड़ा संकट रहा है। ज्ञान यदि भाषा की दीवारों में कैद हो जाए, तो वह सीमित हो जाता है। इसी कमी को पहचानते हुए ‘इंस्टिट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया)’ ने एक सराहनीय पहल की है । तकनीकी लेखन को भारतीय भाषाओं में प्रतिष्ठित करने की यह पहल महत्वपूर्ण है। यही प्रयास ‘अभियंता बंधु’ जैसी वार्षिकी के रूप में साकार हुआ। अभियंता बंधु केवल एक पत्रिका नहीं, तकनीक की अभिव्यक्ति का एक भाषाई आंदोलन है । भारतीय भाषाओं में तकनीकी विचार और अनुभव साझा करने का सकारात्मक आंदोलन।


पूर्व में संस्था द्वारा हिंदी जर्नल अलग से प्रकाशित किया जाता था। अब उसे ‘अभियंता बंधु’ के एकीकृत रूप में विकसित किया गया है, जो अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी और देश की अनेक भाषाओं में अभियंत्रण ज्ञान के प्रसार का माध्यम बन चुका है। यह रूपांतरण केवल स्वरूप परिवर्तन नहीं, बल्कि दृष्टिकोण परिवर्तन है। यह उस भारत का प्रतीक है जो बहुभाषिक होते हुए भी एक विचार में बंधा हुआ है  ‘ज्ञान सभी के लिए’।


हर वर्ष यह दायित्व देश के विभिन्न  केंद्रों को सौंपा जाता है। इस वर्ष यह जिम्मेदारी मध्यप्रदेश राज्य केंद्र को मिली है। यह सौभाग्य भी है और जिम्मेदारी भी। भोपाल केंद्र ने इस दायित्व को अभिनव दृष्टि से निभाया है। केवल लेख संग्रह नहीं किया गया, बल्कि भाषा, क्षेत्र और विचार की विविधता को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया गया है। संपादक मंडल में देश के विभिन्न अंचलों, भिन्न भिन्न भाषा भाषी , भिन्न संकाय के अभियंताओं को सम्मिलित कर एक भारत श्रेष्ठ भारत की भावना को साकार करता संपादक मंडल बनाया गया है।


महामहिम राज्यपाल जी, संस्थान के राष्ट्रीय पदाधिकारीगण, वरिष्ठ अभियंता, शिक्षाविद और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के शुभकामना संदेश इस अंक की गरिमा बढ़ाते हैं। सिविल, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल, कंप्यूटर, एनवायरनमेंटल, और मटेरियल साइंस जैसे विषयों पर अद्यतन शोधपरक लेख इसमें समाहित हैं। प्रत्येक लेख न केवल तकनीकी दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि भारतीय अभियंता की सामाजिक जिम्मेदारी को भी प्रतिध्वनित करता है।


आज का अभियंता केवल मशीनों का निर्माता नहीं, समाज का मार्गदर्शक है। डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी, ग्रीन एनर्जी, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नए क्षेत्रों में अभियंत्रण का स्वरूप बदला है, पर उसका लक्ष्य वही है — मानव जीवन को सहज, सुरक्षित और श्रेष्ठ बनाना। तकनीक अब केवल सुविधा नहीं, उत्तरदायित्व बन चुकी है। जिस युग में पर्यावरणीय संतुलन, सतत विकास और कार्बन न्यूट्रैलिटी जैसे शब्द सामान्य चर्चा का विषय बन गए हैं, उस युग में अभियंताओं का योगदान निर्णायक है।


भारत आज चंद्रयान, अदित्य, जीआईएस, और स्वदेशी ड्रोन तकनीक के साथ अंतरिक्ष से लेकर पृथ्वी की गहराइयों तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। यह केवल तकनीकी वैज्ञानिक उपलब्धियाँ नहीं हैं, यह अभियंत्रण की आत्मा का उत्कर्ष है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे अभियानों में अभियंता अग्रिम पंक्ति के योद्धा हैं।


आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी में अभियंता केवल उपकरणों तक सीमित न रहें, बल्कि समाज की नब्ज को पहचानें। जल, ऊर्जा और कचरे का प्रबंधन केवल योजनाओं का विषय नहीं, जीवन की आवश्यकता है। अभियंत्रण यदि संवेदना से जुड़ जाए तो वह चमत्कार कर सकता है। भोपाल केंद्र इस अंक के माध्यम से यही संदेश देना चाहता है , कि तकनीक का उद्देश्य केवल प्रगति नहीं, बल्कि समन्वित विकास और मानवता है।


अभियंता बंधु का यह अंक विविधता में एकता का प्रतिबिंब है। हिंदी, मराठी, बंगाली, तेलुगु, तमिल, गुजराती, उर्दू, ओडिया, पंजाबी हर भाषा में रचित विचार एक ही स्वर में गूंजते हैं  ‘भारत का अभियंता जागृत है’। यह वह भाव है जो तकनीकी सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र-निर्माण की प्रेरणा देता है।


संस्थान का यह प्रयास इस तथ्य का प्रमाण है कि ज्ञान जब अपनी मातृभाषा में व्यक्त होता है, तो वह जन-जन तक पहुँचता है। इंजीनियरिंग प्रयोगशालाओं से निकलकर जब सामान्य जीवन से जुड़ती है, तभी वह सार्थक होती है। यही भारतीय अभियंत्रण की आत्मा है।


आज जब विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन के युग में प्रवेश कर रहा है, तब भारतीय अभियंता को यह याद रखना चाहिए कि बुद्धिमत्ता का मूल मानवता में है। मशीनें केवल साधन हैं, पर उद्देश्य मनुष्य है। भारत की यही परंपरा रही है । यहाँ तकनीक को कभी हृदय से अलग नहीं किया गया। पत्थर तराशने वाले शिल्पकार हों या सॉफ्टवेयर कोड लिखने वाले अभियंता, दोनों में एक ही चेतना बहती रही है शाश्वत सृजन की।


इस वर्ष का ‘अभियंता बंधु’ उसी सृजन चेतना को प्रणाम करता है। इसमें निहित हर लेख, हर विचार, हर शोध उसी परंपरा का विस्तार है जो हड़प्पा से लेकर चंद्रयान तक फैली है।


हम गर्व से कह सकते हैं कि भारत का अभियंता केवल समय का साक्षी नहीं, भविष्य का निर्माता भी है।


भोपाल केंद्र को यह दायित्व मिला, यह हमारे लिए एक सम्मान है। हम इस अंक को उन सभी अभियंताओं को समर्पित करते हैं जो अपने श्रम, बुद्धि और ईमानदारी से भारत के तकनीकी स्वप्न को साकार कर रहे हैं। यह अंक उन्हें प्रणाम है जो चुपचाप देश की प्रगति की आधारशिला रख रहे हैं ,  पुलों के नीचे, प्रयोगशालाओं में, कारखानों में, और कक्षा-कक्षों में।


इंस्टिट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया) का यह प्रयास न केवल तकनीकी जगत के लिए प्रेरक है, बल्कि समाज को यह विश्वास दिलाता है कि भारत का अभियंता हर चुनौती को अवसर में बदलने की क्षमता रखता है।


हम आशा करते हैं कि यह अंक विचार, शोध और प्रेरणा का स्रोत बनेगा। यह अभियंता समुदाय के साथ-साथ विद्यार्थियों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगा।


अंत में मैं अपने संपादकीय सहयोगियों, लेखकों, अनुवादकों, समीक्षकों और सभी सदस्यों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ जिन्होंने इस अंक को सार्थक बनाया। विशेष रूप से हमारे राज्य केंद्र के अध्यक्ष तथा सचिव जिन्होंने हर मोड पर इस पत्रिका के लिए हर संभव प्रयास किया है।


भारत का अभियंता केवल तकनीक का ज्ञाता नहीं, सृजन का साक्षी है  और अभियंता बंधु उसी सृजन की गाथा है।


– 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

फैलो मेंबर सिविल, 

स्टेट काउंसिंल सदस्य 

एवं 

प्रधान संपादक

अभियंता बंधु वर्ष 2025

Friday, 24 April 2026

प्रस्तावना काव्य अंजली

 प्रस्तावना

काव्य अंजली


जीवन भी एक धातु की तरह है, जिसे अनुभवों की भट्टी में तपना पड़ता है ताकि वह अपने शुद्धतम और चमकदार स्वरूप में हो । मेरे प्रिय मित्र और वरिष्ठ मेटलर्जिकल इंजीनियर, परमानन्द सिन्हा जी ने ताउम्र धातुओं के गुणधर्मों को समझा और उन्हें वांछित आकार दिया।  'काव्य अंजली' के रूप में वे हमारे सामने एक 'भाव-अभियंता' के रूप में प्रस्तुत हैं । उन्होंने शब्दों का ऐसा एलाय तैयार किया है, जो कठोर सत्य की शक्ति भी रखता है और कविता की चमक भी।

एक मेटलर्जिस्ट के पास वह पारखी नज़र होती है जो अयस्क के भीतर छिपे मूल्यवान तत्व को पहचान लेती है। सिन्हा जी ने समाज और जीवन की आपाधापी के बीच से उन बारीक भावनाओं को चुना है, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। उनकी कविताएँ केवल पंक्तियाँ नहीं, बल्कि उनके जीवन के अनुभवों की 'कास्टिंग' और 'फोर्जिंग' हैं।

इस संग्रह में उन्होंने  कुशलता से 

 रिश्तों की डक्टिलिटी , मतलब पुस्तक की कुछ रचनाओं  में वे अपने उन मित्रों की बात करते हैं जो उम्र के साठ-पैठस वाले पड़ाव पर हैं। वे यहाँ समझाते हैं कि कैसे बढ़ती उम्र के साथ रिश्तों में लचीलापन और मज़बूती बनी रहनी चाहिए। पुरुषों के लिए मित्रों के साथ को 'मायका' कहना, उनकी मौलिक सोच का उदाहरण है।

  जब वे व्यक्ति के आंतरिक आत्मविश्वास और भाषा के प्रति प्रेम को रेखांकित करते हैं। तब वे  स्पष्ट हैं कि जीवन व्यापार नहीं, बल्कि एक मधुर साज है, जिसे सही 'ट्यूनिंग' की आवश्यकता होती है।

 उनकी लेखनी में स्टील सी वह मज़बूती दिखती है जो हर राष्ट्रभक्त  हृदय में होनी चाहिए। सावरकर, सुभाष और आज़ाद जैसे महानायकों का स्मरण करते हुए वे देश की एकता को उस फौलाद की तरह देखते हैं जिसे कोई तोड़ नहीं सकता।

परमानन्द जी ने अपनी इस कृति में भावनाओं का 'हीट ट्रीटमेंट' इतनी कुशलता से किया है कि हर कविता पाठक के मन को छूकर उसे वैचारिक आनंद देती है। वे स्वयं कहते हैं कि "अपना विवेक सदा साथ रहे," और यही विवेक उनकी रचनाओं को एक विशेष 'फिनिशिंग' देता है।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि 'काव्य अंजली' का यह साहित्यिक संकलन पाठकों के अंतर्मन को वैसे ही आलोकित करेगा जैसे भट्टी से निकला हुआ ज्योतिर्मय स्वर्ण दीप ।  संग्रह में एक सौ कविताओं को 

धर्म और संस्कृति,

समाज और देश,

साहित्य और नायक तथा

मित्रता और माधुर्य के

चार खंडों में अलग अलग संग्रहित किया गया है। इस अभिनव प्रयास के लिए परमानन्द सिन्हा जी को कोटि-कोटि बधाई।


— विवेक रंजन श्रीवास्तव 

वरिष्ठ समालोचक , व्यंग्यकार 

ई अभिव्यक्ति पोर्टल के मानसेवी हिंदी संपादक 

A 233, old Minal residency, j k road Bhopal 462023

apaniabhivyakti@gmail.com

Mob 7000375798

Thursday, 23 April 2026

चार प्रेम कविताएं

 चार प्रेम कविताएं 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

A 233, old Minal residency, j k road Bhopal 462023

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1


शीर्षक 


एक कविता 

एक नज़्म 

एक गीत 

एक ग़ज़ल हो तुम 

तरन्नुम में ,

और मैं 

महज कुछ शब्द 

बिखरे हुए,

जिन्हें बना दिया है 

नियति ने 

तुम्हारा शीर्षक।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 2. 

खजुराहो के प्रस्तर


खजुराहो के मन्दिर शिखरों से

जब धूप हौले से फिसलती है नीचे,

और उन आलिंगनबद्ध देहों को सहलाती है

तो निर्जीव पाषाण प्रतिमाओ के बीच मौन संवाद समझ पाता हूं मैं, 

हरे लान पर बैठे हुए ।

मेरे और तुम्हारे बीच के 

वे 'अनकहे चैट्स',

जो हमने टाइप तो किए, 

पर कभी 'सेंड' ही नहीं कर पाए, 

शब्द वे, जो ड्राफ्ट ही रह गए ।

लगता है वे सब इन दीवारों की 

प्रस्तर मूर्तियों में सदियों से जाग रहे हैं।

मूर्तिकार ने इनकी आँखों में 

संकोच नहीं , 

उकेरा है शाश्वत निर्मल प्रेम।

हमारी तरह 'ब्लू टिक' का 

इंतज़ार नहीं है, इन्हें

और न ही 'लास्ट सीन' के समय 

को देख कोई मनगढ़ंत अनुमान ।

बस प्रेम का होना ही

शाश्वत सत्य है यहां।

देखता हूँ इन आलिंगनबद्ध 

युगल प्रस्तर मूर्तियों को

तो मुझे अपनी रग रग में

तुम्हारी छुअन की ,पहली

सिहरन का अहसास होता है, 

जिसे इस 'फास्ट-फॉरवर्ड' भागदौड़ में

शायद हम बहुत पीछे कहीं भुला आए हैं।

ये मौन मूर्तियाँ कर रही हैं 

उद्घोषणा सदियों से 

"प्रेम पाप नहीं",

सृष्टि की किताब में सबसे सुंदर कविता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 



 3. 

कोणार्क का चक्र 


सूर्य मंदिर में 

कोणार्क के उस पहिए पर 

समय ठहरा हुआ है,

उन आलिंगनबद्ध जोड़ों के लिए

पत्थरों की वे नृत्य निमग्न मुद्राएं, 

वे बाहुपाश, आगोशी

सांसों का पत्थर में बदल जाना

जैसे किसी बहुत पुरानी 

'प्लेलिस्ट' का सबसे प्यारा गाना

अनवरत 'लूप' पर बज रहा हो।

हम रिश्तों को 'अपडेट' करते हैं, 

सॉफ्टवेयर के 'वर्जन' बदलते हैं,

पर वे प्रस्तर शिल्प

चिर नवीन हैं, 

उतने ही पवित्र जितने कल थे।

हाँ ! देह का विसर्जन नहीं, 

देह का उत्सव है , कोणार्क शिल्प।

लगता है , तुम्हारा मेरा मिलना भी

किसी ऐसे ही प्राचीन मंदिर की योजना का कोई हिस्सा था।

खंडहर नहीं हैं, गवाह हैं, ये ,

जब दुनिया केवल शोर से भर जाएगी,

जब प्रेम, प्रदर्शन बस रह जाएगा 

एक 'इमोजी' तक सिमट जाएगा,

तब भी ये पत्थर कहते रहेंगे खुली सभा में 

"प्रेम देह से होकर 

आत्मा तक जाने वाला अनंत 

चक्र है।"


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 4. 

भोरमदेव की छांव 


मैकल पर्वत श्रृंखला के साए में, 

भोरमदेव की उन दीवारों पर

उकेरी गई ,मिथुन मूर्तियाँ , 

मुझे हमारी ,

पहली 'कॉफी डेट' की याद दिलाती हैं।

वही झिझक, 

वही नसों में दौड़ती बिजली,

और वही मौन

जो बिन बोले सब कुछ कह देता था। रेतीले पत्थर की प्रतिमाएं 

नहीं हैं बस शिल्प के आभूषणों से सजी धजी, ये सुसज्जित हैं 

प्रेम के शाश्वत संदेश से।

इनके चेहरों पर जो दीप्ति है,

वह 'इंस्टाग्राम फिल्टर' की 

मोहताज नहीं है।

वह लावण्य मौलिक है ।

सोचता हूँ,

हज़ारों साल पहले उस शिल्पी ने 

जब एक अनगढ़ पत्थर पर 

छेनी चलाई होगी,

तो आख़िर कैसे उकेरी होगी यह 

बिल्कुल तुम सी सुगठित नव यौवना 

तुम जरूर रही होगी, तब भी 

और देखा होगा उस शिल्पी ने तुम्हें 

कहीं लुक छिप कर ।

जरूर मैं ही रहा होऊंगा 

वह कलाकार 

क्योंकि 

तुमने ही तो दिया है 

तुम्हारे सर्वस्व पर सिर्फ मुझे अधिकार ।

पुनर्जन्म पर भरोसा हो रहा है मुझे 

भोरमदेव के परिसर में यह 

मूरत देखकर ।

पत्थर अमर हो गए हैं ये 

प्रेम करते हुए,

क्यों हम जीते-जी पत्थर हुए जा रहे हैं।

छोड़ो भी अब नाराजगी

आओ, हम भी एकाकर हो जाएँ,

प्रेम में समर्पण, हारना नहीं है। 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

A 233, old Minal residency, j k road Bhopal 462023

apaniabhivyakti@gmail.com

Mob 7000375798


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 संक्षिप्त परिचय ...

 विवेक रंजन श्रीवास्तव ,वरिष्ठ व्यंग्यकार, स्वतंत्र लेखक ( हिंदी व अंग्रेजी )


२८ जुलाई १९५९ में मण्डला के एक साहित्यिक परिवार में जन्म .

माँ ... स्व दयावती श्रीवास्तव ...सेवा निवृत प्राचार्या

पिता ...स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध ... वरिष्ठ साहित्यकार, कवि अनुवादक

पत्नी ... श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव ... स्वतंत्र लेखिका


इंजीनियरिंग की पोस्ट ग्रेडुएट शिक्षा के बाद विद्युत मण्डल में शासकीय सेवा से मुख्य अभियंता के रूप में सेवा निवृत्त. 


 परमाणु बिजली घर चुटका जिला मण्डला के प्रारंभिक सर्वेक्षण से स्वीकृति तक , अनेक उल्लेखनीय लघु पन बिजली परियोजनाओ , १३२ व ३३ कि वो उपकेंद्रो , केंद्रीय प्रशिक्षण केंद्र जबलपुर ISO प्रमाणित आदि के निर्माण का तकनीकी गौरव .


किताबें 

बिजली का बदलता परिदृश्य ,

 जल जंगल जमीन आदि तकनीकी किताबें . 

हिन्दी में वैज्ञानिक विषयों पर निरंतर लेखन ,

2005 से हिन्दी ब्लागिंग .


१९९२ में नई कविताओ की पहली किताब आक्रोश तार सप्तक अर्ध शती समारोह में भोपाल मे विमोचित , इस पुस्तक को दिव्य काव्य अलंकरण मिला ..


व्यंग्य की किताबें रामभरोसे , 

कौआ कान ले गया , 

मेरे प्रिय व्यंग्य , 

धन्नो बसंती और बसंत , बकवास काम की , 

जय हो भ्रष्टाचार की ,

समस्या का पंजीकरण , खटर पटर, 

चूं चूं की खोज

 व अन्य प्रिंट व किंडल आदि प्लेटफार्म पर .


समस्या का समाधान का अंग्रेजी अनुवाद किंडल पर सुलभ


मिली भगत ,

चटपटे शरारे एवं लाकडाउन नाम से सँयुक्त वैश्विक व्यंग्य संग्रहों का संपादन .


सामूहिक संग्रहों में भागीदारी 

व्यंग्य के नवल स्वर , आलोक पौराणिक व्यंग्य का ए टी एम ,

 बता दूं क्या , 

अब तक 75 , 

इक्कीसवीं सदी के 131 श्रेष्ठ व्यंग्यकार , 

251 श्रेष्ठ व्यंग्यकार , निभा 

व्यंग्य के रंग 

आदि अनेक संग्रहो में सहभागिता


भगत सिंह ,

उधमसिंह ,

रानी दुर्गावती 

पहला आदिवासी रॉबिनहुड टंट्या भील 

आदि महान विभूतियों,

मध्यप्रदेश की पुरातात्विक धरोहर

 पर चर्चित किताबें लिखीं हैं


नाटक की पुस्तकें... जलनाद नाटक संग्रह विश्ववाणी से राष्ट्रिय स्तर पर पुरस्कृत , 

हिन्दोस्तां हमारा , 

जादू शिक्षा का नाटक संग्रह चर्चित व म. प्र. साहित्य अकादमी से सम्मानित, तथा पुरस्कृत


पाठक मंच के माध्यम से नियमित पुस्तक समीक्षक

https://e-abhivyakti.com के साहित्य सम्पादक


म प्र साहित्य अकादमी ,

पाथेय 

मंथन ,

वर्तिका , 

हिन्दी साहित्य सम्मेलन , तुलसी साहित्य अकादमी व अनेक साहित्यिक़ संस्थाओं , से सम्मानित


 सामाजिक लेखन के लिये रेड एण्ड व्हाईट सम्मान से राज्यपाल से सम्मानित .


वर्तिका पंजीकृत साहित्यिक सामाजिक संस्था के राष्ट्रीय संयोजक


टी वी ,

रेडियो , 

यू ट्यूब , 

पत्र पत्रिकाओ में निरंतर प्रकाशन .

वैश्विक एक्सपोजर एवं भागीदारी

ब्लॉग

http://vivekkevyang.blogspot.com व अन्य ब्लॉग


संपर्क...

ए २३३ , ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी , भोपाल , म प्र , ४६२०२३

मो ७०००३७५७९८

apaniabhivyakti@gmail.com

इन दिनों लंदन प्रवास पर हैं

Monday, 20 April 2026

श्री परमानंद सिन्हा की काव्य कृति आकांक्षा की भूमिका

 भूमिका


साहित्य में काव्य की सार्थकता केवल शब्दों के चयन या तुकबंदी में नहीं, बल्कि उन जीवन मूल्यों में निहित होती है जो समाज को संबल प्रदान करते हैं। कविता , अभिव्यक्ति की सर्वाधिक प्राचीन विधा है।  कंठस्थ रहने में सुगमता एवं साहित्य के कलात्मक सौंदर्य के चलते बरसों से काव्य,  साहित्य के शिखर पर है। एक रचनाकार जब अपनी अनुभूतियों को कागज़ पर उतारता है, तो वह स्वयं को व्यक्त ही नहीं करता, बल्कि अपने युग की धड़कनों को स्वर देता है।

 'आकांक्षा' काव्य संग्रह इसी उदात्त परंपरा का निर्वहन करता है, जहाँ कविता मनोरंजन की परिधि से बाहर निकलकर आत्म-चिंतन और नैतिक बोध का माध्यम बनती है। काव्य मूल्यों की कसौटी पर यह संग्रह इसलिए खरा उतरता है क्योंकि इसमें सत्य की कटुता और संवेदना की कोमलता का अद्भुत संतुलन है। जब मैं इन कविताओं से गुजरा  तो मैंने पाया कि रचनाकार मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज रायपुर के सहपाठी , वहां मेरे प्रारंभिक साहित्यिक सफर के सहयात्री भाई परमानंद सिन्हा जी ने जीवन के प्रति एक सकारात्मक और मूल्यपरक दृष्टिकोण अपनाया है, जो आज के अस्थिर परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक तथा महत्वपूर्ण है।


इस संग्रह की समालोचना करते हुए यह स्पष्ट होता है कि कवि ने अपनी रचनाओं में भाव और यथार्थ का जो शाश्वत तथ्यों का ताना-बना बुना है, वह अत्यंत सुदृढ़ है। उदाहरण के लिए, 


सुगंधित फूलों के संग,

काटें भी तो बेशुमार है।

खुशियों की नदी बहती है,

पर दुख भी तो अपार है।


 इसी प्रकार,  कवि की लेखनी मर्म स्पर्शी हो जाती है,  वे लिखते हैं


अंधियारे को देखा पिघलते हुये, 

रवि की किरणों को मचलते हुये। 

शीतल सुखद थी, सुबह की बयार, 

पंछी उड़ चले, चह चहाते हुये। 


इन पंक्तियों में छायावादी गीत चेतना परिलक्षित होती है। जो प्रकृति परिवेश का शाब्दिक चित्र बनाती है।


एक मिजाज के गीत एक खंड में संजोकर उन्होंने पाठकों के लिए अलग अलग गुलदस्ते एक साथ प्रस्तुत किए हैं। 

लंबे अंतराल में मनोभावों को शब्दों में प्रस्तुत कविताओं को संग्रह के अंतिम स्वरूप में प्रकाशित कर एक विशद साहित्यिक , संपादन का उनका प्रयास स्तुत्य है। 


संग्रह के काव्य विधान, शैली और भाषा की बात करें तो इसमें एक सहज प्रवाह और माधुर्य है जो पाठक को अंत तक बांधे रखता है। कवि ने क्लिष्ट और बोझिल शब्दावली के स्थान पर ऐसी सुगम भाषा का प्रयोग किया है जो जनमानस से सीधे संवाद करती है। उनकी शैली वर्णनात्मक होते हुए भी प्रतीकों और बिंबों से इस प्रकार सजी हुई है कि कविता पढ़ते समय दृश्य जीवंत हो उठते हैं। 

यहाँ उपमा और रूपक अलंकारों का प्रयोग किसी कृत्रिम साज-सज्जा की तरह सायास नहीं, बल्कि भावों की तीव्रता बढ़ाने के लिए स्वाभाविक रूप से हुआ है। 

छंदों की गति और लय  में एक आंतरिक संगीत है, जो इन रचनाओं को केवल पढ़ने योग्य ही नहीं, बल्कि गुनगुनाने योग्य भी बनाता है। शिल्प और कथ्य का यह सामंजस्य श्री परमानंद सिन्हा जी के काव्य संग्रह 'आकांक्षा' को एक विशिष्ट साहित्यिक पहचान दिलाता है।

अंततः, 'आकांक्षा' काव्य संग्रह कवि की आंतरिक यात्रा और उनके जीवन की  अनुभूतियों का वह निचोड़ है जो समाज के लिए उनकी अप्रतिम भेंट सिद्ध होगा । इस काव्य कृति के माध्यम से कवि ने अपनी रचनात्मकता का जो परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। मैं रचनाकार से यह मंगलमयी आशा करता हूँ कि भविष्य में भी उनकी लेखनी इसी प्रकार सा+हित के  रचनात्मक लोक कल्याणी मार्ग पर प्रशस्त रहेगी। पाठकों को उनसे यह अपेक्षा रहेगी कि वे मानवीय संवेदनाओं के और भी सूक्ष्म धरातलों को अपनी लेखनी से स्पर्श करेंगे और समाज में व्याप्त जड़ता को तोड़ने के लिए निरंतर सृजनरत रहेंगे।  यह साहित्यिक यात्रा निरंतर पल्लवित हो और 'आकांक्षा' पाठकों के हृदय में अपना स्थायी स्थान बनाए, यही मेरी हार्दिक मनोकामना है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

वरिष्ठ समालोचक, व्यंग्यकार 

भोपाल

Wednesday, 8 April 2026

साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा

 साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


लेखकीय भावना के साथ न्याय या निर्देशक का व्यवसायिक रूपांतरण, एक बहुआयामी जटिल प्रश्न रहा है।

साहित्य और सिनेमा के बीच का रिश्ता हमेशा से एक ऐसे पुल की तरह रहा है जिसे पार तो बहुतों ने किया, पर उससे कम ही लोग दर्शकों के मन में वह छबि बना पाए, जो उस दर्शक ने एक पाठक के रूप में स्वयं अपने मन में उपन्यास पढ़कर बनाई थी। एक लेखक और साहित्य-अनुरागी होने के नाते, जब पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था' जैसी कालजयी कहानी या महाकवि जयशंकर प्रसाद की 'कामायनी' के अंशों को फिल्मी पर्दे पर उतरते देखा , तो मन एक अनजानी सी रिक्तता और निराशा से भर जाता है। यह निराशा केवल एक दर्शक की नहीं, बल्कि उस पाठक की है जिसने उन शब्दों के 'प्राण' को अपनी कल्पना में जिया है।

सच तो यह है कि सिनेमा और साहित्य के लक्ष्य एक होकर भी अपनी प्रकृति में पूरी तरह भिन्न हैं। साहित्य जहाँ कल्पना की अनंत आकाशगंगा है,व्यावसायिकता से किंचित परे है ,वहीं सिनेमा उसे कैमरे के लेंस और स्क्रीन के फ्रेम में कैद कर देने वाली एक विवश कला है, जो बॉक्स ऑफिस से जुड़ा हुआ है। किताब में लेखकीय भावों का डिस्टार्शन नहीं होता क्योंकि उसकी प्रस्तुति में सिनेमा की तरह अभिनय , निर्देशन , संपादन ,  लोकेशन , फिल्मांकन, पार्श्व, संगीत , गायन वगैरह  ढेर सारे लोग नहीं होते । 


जब प्रसाद जी लिखते हैं"तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन"तो वह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मानवीय चेतना और श्रद्धा का एक गहन दर्शन है।  फिल्मी धुनों में  ऐसे गीत 'शब्दनाद' और गांभीर्य को खो देते है , जो मूल कृति की आत्मा थी।


 फिल्मकार की कोशिश उसे 'लोकप्रिय' और 'दृश्य-योग्य' बनाने की होती है, जबकि रचना पाठक से एक विशेष मानसिक तैयारी और एकांत की मांग करती है। बाज़ार और बॉक्स ऑफिस की ज़रूरतों ने अक्सर महान कृतियों के मौलिक सौंदर्य की बलि चढ़ाई है।

दशकों से फणीश्वरनाथ रेणु की 'तीसरी कसम' से लेकर अमृता प्रीतम की 'पिंजर', आर.के. नारायण की 'गाइड' और दोस्तोएवस्की की रचनाओं पर आधारित 'साँवरिया' जैसी तमाम साहित्य आधारित फिल्में बनती रही हैं। इनमें से कुछ ने आत्मा को छुआ, तो कुछ केवल बाहरी कलेवर तक सीमित रहीं। 'तीसरी कसम' में जो ग्रामीण संवेदना और हीरामन की निश्छलता उतर पाई, वह शायद इसलिए संभव हुई क्योंकि फिल्म के पीछे शैलेंद्र जैसा कवि-हृदय और रेणु की मिट्टी की समझ थी। इसके विपरीत, जब हम 'देवदास' या 'शतरंज के खिलाड़ी' जैसे रूपांतरणों को देखते हैं, तो द्वंद्व और गहरा हो जाता है। जहाँ सत्यजीत रे प्रेमचंद के व्यंग्य को दृश्यों में ढालने में सफल रहते हैं, वहीं आधुनिक सिनेमा अक्सर शरतचंद्र की उस आंतरिक दरिद्रता और आत्म-पीड़ा को मखमली लिबासों और भव्य झूमरों के नीचे दबा देता है।

 फिल्मकार अक्सर कृति के कथानक (Plot) को तो पकड़ लेते हैं, पर उसके 'उद्देश्य' और उस सूक्ष्म सौंदर्य को चित्रित करने में चूक जाते हैं जिसे लेखक ने शब्दों के बीच की रिक्तियों में छिपाया होता है। दृश्य माध्यम की अपनी माँगें हैं। वहाँ संवादों की गति चाहिए, चकाचौंध चाहिए और एक निश्चित समय सीमा का अनुशासन भी। लेकिन साहित्य के पास वह विलासिता है कि वह पाठक को घंटों एक ही विचार या संवेदना में डूबा रहने दे। यही कारण है कि कुछ विरले उदाहरणों को छोड़ दें, तो अधिकांश फ़िल्मी रूपांतरण मूल कृति के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाते।

अंततः, साहित्य एक व्यक्तिगत यात्रा है और सिनेमा एक टीम प्रस्तुति का  सामूहिक अनुभव। किसी भी कालजयी रचना का जो 'शब्दनाद' हमारी अंतरात्मा में गूँजता है, उसे पर्दे के कोलाहल में तलाशना शायद एक कठिन अपेक्षा है। सिनेमा साहित्य का अनुवाद करने की कोशिश तो कर सकता है, लेकिन वह उसकी गरिमा और गांभीर्य का पूर्ण विकल्प कभी नहीं बन सकता। जब भी कोई फिल्मकार किसी महान कृति को हाथ लगाता है, तो वह केवल एक कहानी नहीं उठाता, बल्कि वह उन हज़ारों पाठकों की स्मृतियों और भावनाओं को चुनौती देता है जिन्होंने उस कहानी को अपने भीतर जिया है। अफ़सोस कि अक्सर इस चुनौती में फिल्मकार अपनी तकनीक से तो जीत जाता है, पर संवेदना के धरातल पर प्रायः हार जाता है। 

जिस तरह अनुवादक को मूल लेखक की आत्मा में परकाया प्रवेश कर उसके भाव पकड़ने होते हैं, उससे भी अधिक दुष्कर कार्य साहित्य का फिल्मांकन है, क्योंकि यहां सारी टीम को रचना की आत्मा में परकाया प्रवेश करना वांछित होता है। 

— विवेक रंजन श्रीवास्तव

Tuesday, 7 April 2026

कहानी गर्व गाथा

 कहानी 

गर्व गाथा

लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव


मिलिट्री अकादमी का वह विशाल परेड ग्राउंड... जनवरी की गुनगुनी धूप स्टेडियम के सीने पर कुछ इस तरह उतर रही थी, मानो आकाश स्वयं अपनी स्वर्ण-रश्मियों से देश के प्रहरियों का राजतिलक कर रहा हो। हवा में बूटों की खनक और कड़क कलफ लगी वर्दियों की सरसराहट के बीच एक अनकही बेचैनी और भारी प्रतीक्षा थी। सबकी निगाहें उस मंच पर टिकी थीं, जहाँ से आज शौर्य का एक नया अध्याय घोषित होना था।

सारी परेड के साथ ही मेजर अंजलि अपनी 'सेरेमोनियल ड्रेस' में अविचल खड़ी थीं। उनकी रीढ़ में सेना का अनुशासन था, पर सीने के भीतर एक बहन का हृदय हज़ारों अश्वों की गति से धड़क रहा था। उनका भाई राघव जिसे बचपन में उन्होंने जाने कितनी बार गोद में संभाला था, शौर्य पदक का सबसे बड़ा दावेदार था । उसने आपरेशन सिंदूर में दुश्मन के घर में घुसकर न केवल अपने मिशन को सफल अंजाम दिया था , वहां से अपने घायल साथियों को बचाकर लौटने का कमाल जो किया था ।


अचानक लाउडस्पीकर पर गूँजी उस गंभीर आवाज़ ने फिजा में प्राण फूँक दिए,  "लेफ्टिनेंट राघव ... 'ऑपरेशन सिंदूर' में अदम्य साहस के लिए... शत्रु की भीषण गोलाबारी के बीच अपने मिशन डिस्ट्रॉय मिलिटेंट को पूरा कर , चार घायल साथियों को सुरक्षित वापस निकाल लाने हेतु उन्हें 'शौर्य चक्र' से सम्मानित किया जाता है।

सारा परेड ग्राउंड हर्ष में डूब गया।  

घोषणा समाप्त होते ही वह दृश्य उपस्थित हुआ जिसने अकादमी के इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया। अंजलि ने सैन्य गरिमा और बहन के लाड़ को एकाकार करते हुए, बिना एक पल गँवाए राघव को अपनी मज़बूत भुजाओं में भरा और उन्हें अपने कंधों पर उठा लिया। तालियों की गड़गड़ाहट ने आसमान को छू लिया। सैनिकों की एड़ियाँ एक साथ चटककर जैसे इस अभिनव सम्मान को सलामी दे रही थीं।


माइक से घोषणा हुई,  लेफ्टिनेंट राघव को उनके अनुभव साझा करने हेतु मंच पर आमंत्रित किया गया। 


 राघव जब मंच पर पहुँचे, तो उनकी आँखों में नमी थी पर मस्तक गर्व से उन्नत था।

राघव ने माइक संभाला। पूरा मैदान पिन-ड्रॉप साइलेंस में डूब गया। उनकी आवाज़ में एक ठहरी हुई गंभीरता थी, 

"उस रात 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान जब दुश्मन की मशीनगनें आग उगल रही थीं और बारूद की गंध ने साँस लेना दूभर कर रखा था, तब दो घंटे तक मौत हमसे बस चंद फुट की दूरी पर खड़ी मुस्कुरा रही थी। एक पल को लगा कि शायद आज जिंदगी का वह आखिरी पन्ना लिखा जाएगा जिसे दादाजी 'सिपाही की अधूरी दास्तान' कहते थे। पर तभी मुझे अपने उन चार घायल साथियों की सिसकियाँ सुनाई दीं, जो अपनी आखिरी साँसों में भी मुझ पर भरोसा टिकाए हुए थे।"

राघव ने एक क्षण का विराम लिया और सामने खड़ी अपनी माँ और पिता की ओर देखा। 

" हमारी टुकड़ी अपने मिशन को सफलता पूर्वक अंजाम दे चुकी थी ,  मैंने सोचा, अगर मैं आज शहीद हो गया, तो मेरी वीरता केवल यादों में सिमट जाएगी। पर अगर मैं लड़कर लौट आया, तो मैं अपने देश की आँखों में वह चमक देख पाऊँगा जो जीत से आती है। मैंने मौत से नहीं, जीवन से आँखें मिलाईं। मैंने तय किया कि मैं मरूँगा नहीं, बल्कि अपने जवानों को ज़िंदा लेकर घर लौटूंगा। क्योंकि असली विजय तिरंगे में लिपट कर लौटने में नहीं, बल्कि तिरंगे को आसमान की ऊँचाइयों तक फहराते रहने में है।"

दूर खड़ी माँ रेखा अपने आँचल से गर्व के आँसू पोंछ रही थीं। पास ही खड़े कर्नल सूर्यप्रताप 

 की वर्दी पर लगे पदक आज सूर्य की रोशनी में अधिक दीप्तिमान हो रहे थे। उनका गला रुँध गया था। यह उस पिता का संतोष था जिसका बेटा 'लड़कर' और 'जीतकर' लौटा था।


तीन वर्ष बाद...

वही परेड ग्राउंड, वही सुनहरी धूप। पर इस बार परिदृश्य बदला हुआ था। राघव अब कैप्टन थे। आज वे स्वयं किसी के कंधे पर सवार नहीं थे, बल्कि उन्होंने एक युवा लेफ्टिनेंट, विक्रम को अपने कंधों पर उठा रखा था। विक्रम ने एक जलती हुई बस्ती से तीन मासूम नागरिकों को जान पर खेलकर आग से  बचाकर   सुरक्षित  निकाला था।

पास में खड़े विक्रम के पिता, जो एक साधारण किसान थे, अपनी फटी बिवाइयों वाले हाथों से आँखों की नमी पोंछ रहे थे। राघव ने विक्रम को नीचे उतारा और उन के हाथों को चूमते हुए कहा, "बाबूजी, मुस्कुराएं,  आपका बेटा आज एक विजेता बनकर घर लौटेगा। यही इस वर्दी की सबसे बड़ी जीत है।"

लेफ्टिनेंट कर्नल बन चुकी अंजलि गर्व से शौर्य के अभिषेक की इस परंपरा को आगे बढ़ते देख रही थीं। उन्होंने मन ही मन दोहराया"वीरता का वास्तविक उत्सव शहादत के शोक में नहीं, बल्कि शौर्य के जीवंत उल्लास में है।"

 परेड ग्राउंड पर बना वह चित्र मात्र एक परिवार की कहानी नहीं थी। वह हर उस भारतीय घर की नई प्रतिज्ञा थी जहाँ वर्दी को केवल कफ़न नहीं, बल्कि शान का लिबास माना जाता है। वह एक ऐसी चेतना बन चुकी थी, जहाँ हम शहीदों को नमन तो करते हैं, पर अपने जीवित वीरों को कंधों पर उठाकर यह उद्घोष करते हैं कि, सैनिक की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका वह जीवन है, जो उसने अपने देश के गौरव को अपनी आँखों से देखने के लिए बचा कर रखा है।


— विवेक रंजन श्रीवास्तव