Monday, 15 December 2025

आतंक के परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता की वैश्विक आवश्यकता

 आतंक के परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता की वैश्विक आवश्यकता  


विवेक रंजन श्रीवास्तव, न्यूयॉर्क से


आतंकवाद आज केवल किसी देश या समुदाय की समस्या नहीं, बल्कि पूरी मानवता की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। 2020 के बाद से विश्व ने देखा कि जब एक विचारधारा धार्मिक पहचान के आवरण में हिंसा को वैध ठहराने लगती है, तो सभ्यता का आधार ही खतरे में पड़ जाता है। ओपेक देश मात्र धर्म के आधार पर एक वैश्विक संगठन बना कर वैधानिक  विश्व शक्ति बने हुए हैं। 


2023–25 के बीच इस्लामिक स्टेट (ISIS–K), बोको हराम, और तालिबान समर्थित गुटों ने अफ्रीका, पश्चिम एशिया और यूरोप में नई सक्रियता दिखाई। इसी अवधि में सीरिया, सोमालिया, नाइजीरिया और पाकिस्तान में 70% से अधिक बड़े आतंकवादी हमले दर्ज हुए। ऑस्ट्रेलिया में यहूदी संस्थानों पर हमले, फ्रांस में चर्चों पर हिंसा, और दक्षिण एशिया में धार्मिक नफरत पर आधारित दंगों ने यह सिद्ध किया कि धार्मिक कट्टरता की आग सीमाएं नहीं मानती।  


2001 का 9/11 हमला, 2008 का मुंबई 26/11, और 2015 का पेरिस बैटाक्लान नरसंहार पहले ही इस प्रवृत्ति का धार्मिक चेहरा उजागर कर चुके हैं। 2025 की शुरुआत में न्यूज़ीलैंड और इंडोनेशिया में आतंकी घटनाओं ने चेताया कि यह चुनौती केवल किसी एक देश की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जो धर्म को राजनीतिक और वित्तीय लाभ का उपकरण बना देती है।  संस्था गत, मिल्ट्री या स्टेट के समर्थन के साथ आतंक सभ्य दुनियां के लिए काला धब्बा है।  धर्म के आधार पर चुनावी राजनीति , तुष्टिकरण समाज पर बदनुमा दाग है। आंकड़े बताते हैं कि कट्टरपंथी सोच ड्रग्स , या अपराध के   जरिए आसान धन कमाने से बाज नहीं आती। धार्मिक आधार पर एक दूसरे का समर्थन समाज को टुकड़ों में विघटित करता है। भारत विभाजन इसी का उदाहरण है।


जांच एजेंसियों और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें बताती हैं कि कई आतंकी नेटवर्क अब भी राज्य प्रायोजित संरचनाओं से लाभ लेते हैं। पाकिस्तान की आईएसआई पर 26/11 के बाद से अंतरराष्ट्रीय निगरानी बनी हुई है, पर पर्याप्त कार्रवाई का अभाव आतंक को पनाह देता है। 2024 की यू एन ओ की काउंटर टेररिज्म रिपोर्ट में बताया गया है कि ऑनलाइन कट्टरपंथी प्रचार, क्रिप्टोकरेंसी से आतंक वादी फंडिंग और “लोन वुल्फ” हमलों का वैश्विक खतरा तेजी से बढ़ा है।  


भारत ने इन चुनौतियों से निर्णायक संघर्ष की नीति अपनाई है। आतंक पर जीरो टॉलरेंस नीति के तहत, एनआईए और प्रवर्तन निदेशालय ने आतंक फंडिंग नेटवर्क पर प्रहार किया। 2025 का “ऑपरेशन सिंदूर”, जिसमें पीओके के आतंकी शिविरों को सटीक हमलों से ध्वस्त किया गया, ने भारत की सुरक्षा नीति की वैश्विक पहचान बनाई।  आतंक के विरुद्ध कूटनीतिक मोर्चे पर भारत को अमेरिका, फ्रांस और जापान जैसे देशों का समर्थन मिला।  


फिर भी प्रश्न बना हुआ है क्या केवल सैन्य शक्ति आतंक का स्थायी समाधान दे सकती है? जवाब सरल और स्पष्ट है नहीं।

 आतंकवाद का मूल उन विचारों में है जो असहिष्णुता और धार्मिक श्रेष्ठता की भावना से पोषित होते हैं। जब समाजों की शिक्षा, संस्कृति और राजनीति से बहुलता और समानता की भावना लुप्त होती है, तब आतंक जैसी विचारधाराएँ पनपती हैं।  


इसीलिए आज की दुनिया को  आवश्यकता है एक वैश्विक धर्मनिरपेक्ष चेतना की , जो यह माने कि धर्म का उद्देश्य विभाजन नहीं, मानवता की सुरक्षा है। धर्मनिरपेक्षता का यह दृष्टिकोण न केवल राजनीति बल्कि शिक्षा, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परिलक्षित होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र को भी अपनी आतंक रोधी रणनीतियों में “धार्मिक सुधार, संवाद और सहिष्णुता शिक्षा” को प्रमुख स्तंभ बनाना चाहिए।  


दुनिया तभी आतंक से मुक्त हो सकेगी जब हर देश यह स्वीकार करे कि ईश्वर के अनेक नाम हो सकते हैं, पर मनुष्य मात्र की नैसर्गिक मानवीय गरिमा एक ही है। आतंक की जड़ों को काटने के लिए सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि विचारों की पवित्रता और धर्मनिरपेक्षता की शक्ति  चाहिए। यही धर्म निरपेक्षता वैश्विक शांति का एकमात्र स्थाई मार्ग है।  


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

क्या है ये SIR

क्या है ये SIR ?

विवेक रंजन श्रीवास्तव 
न्यूयॉर्क 

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा चलाई जा रही  SIR प्रक्रिया मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन बनाने का एक महत्वपूर्ण कदम है, जो फर्जी वोटरों को हटाने और असली मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

SIR का पूरा नाम Special Intensive Revision है, जिसे हिंदी में विशेष गहन पुनरीक्षण कहा जाता है। यह चुनाव आयोग की एक नियोजित प्रक्रिया है जिसमें मतदाता सूची का ब्लॉक लेवल ऑफिसर (BLO) घर-घर जाकर मतदाता सूची की जांच करते हैं, नाम, पता, उम्र, परिवार के सदस्यों का सत्यापन करते हैं। इसका मुख्य लक्ष्य डुप्लीकेट एंट्री, मृत व्यक्तियों के नाम हटाना , शिफ्ट हुए मतदाताओं या अवैध प्रविष्टियों को हटाना तथा नए बने 18+ उम्र के मतदाताओं को जोड़ना है।

सर का इतिहास..

SIR कोई नई योजना नहीं है, बल्कि दशकों पुरानी प्रक्रिया है जो चुनाव कानून के तहत हर चुनाव से पहले या आवश्यकता पर पहले भी की जाती रही है। बिहार में हाल ही में इसे सफलतापूर्वक लागू किया गया, जहां 64 लाख फर्जी वोटर हटाए गए और इससे वोटिंग प्रतिशत 10% बढ़ा।

वर्ष 2025 में चुनाव आयोग ने इसे पूरे देश में विस्तार दिया, खासकर 23 साल बाद बड़े पैमाने पर यह हो रहा है । लेकिन कुछ राज्य जैसे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विपक्ष ने इसका विरोध किया तथा सुप्रीम कोर्ट में इस व्यवस्था को चुनौती दी।

SIR प्रक्रिया का पहला आधिकारिक कार्यान्वयन सन 1952 में हुआ था, जब भारत के पहले लोकसभा चुनाव हुए और मतदाता सूची को गहन पुनरीक्षण की आवश्यकता पड़ी । उस समय भारत निर्वाचन आयोग , जो 1950 में स्थापित हुआ था, ने इसकी जिम्मेदारी ली थी ।तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन के नेतृत्व में मतदाता सूची शुद्ध करने का यह अभियान संपन्न हुआ था। इसके बाद यह प्रक्रिया समय-समय पर, विशेषकर बड़े चुनावों से पहले, जारी रही, जैसे 2002-2004 के बीच पूरे देश में बड़े पैमाने पर सर को क्रियान्वित किया गया था। 

S I R का तरीका..
BLO या SIR टीम घर घरआती है, अपना पहचान पत्र दिखाती है । आप परिवार के वोटिंग लिस्ट के सदस्यों के नाम, पता, परिवार विवरण, दस्तावेज (आधार, राशन कार्ड, बिजली बिल आदि दस्तावेज से ) सत्यापित करवाते हैं। फॉर्म 6 (नया पंजीकरण), फॉर्म 7 (नाम हटाना), फॉर्म 8 (सुधार) के फार्म भरवाए जाते हैं।
पारदर्शिता के लिए परिवार वंशावली प्रमाण जरूरी होता है। 
बिहार मॉडल पर आधारित, यह वोटर लिस्ट सत्यापन के द्वारा वर्तमान जनसांख्यिकी (शहरीकरण, पलायन) के अनुरूप सही वोटर लिस्ट  बनाता है।

SIR का औचित्य..

लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदाता सूची की शुद्धता अनिवार्य है, क्योंकि गलत वोटर चुनावी निष्पक्षता बाधित करते हैं। 
SIR से मृत , पलायन कर चुके वोटर लिस्ट से समाप्त होते हैं, यदि कोई घुसपैठिए खासकर विदेशी सीमा से जुड़े प्रदेशों में किसी तरह आ गए हैं तो दस्तावेजों के अभाव में उनकी वोटिंग का गलत अधिकार रोक दिया जाता है ।  भारत के वास्तविक नागरिक के वोटिंग अधिकार सुरक्षित रहते हैं । वोटिंग प्रतिशत बढ़ जाता है, क्योंकि बोगस नाम कट जाने से वोटिंग लिस्ट यथार्थ और अद्यतन बन जाती है। विपक्षी आशंकाओं के बावजूद, यह एक रूटीन अभियान है जो वार्षिक संशोधन से आगे जाकर वोट लिस्ट की  गहन सफाई सुनिश्चित करता है, ताकि हर योग्य वोट का अधिकार बरकरार रहे।



विवेक रंजन श्रीवास्तव 
न्यूयॉर्क से

सौंदर्य प्रतियोगितायें : नारी सौंदर्य , बुद्धि और स्वातंत्र्य की प्रतीक

 विश्व सौंदर्य प्रतियोगितायें : नारी सौंदर्य , बुद्धि और स्वातंत्र्य की प्रतीक


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

इन दिनों न्यूयार्क से 


विश्व सौंदर्य प्रतियोगिताओं का इतिहास युवा महिलाओं की सुंदरता, बुद्धिमत्ता और सामाजिक जिम्मेदारी को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करने की एक शानदार यात्रा रही है। पुरुष प्रधान दुनियां में नारी स्वातंत्र्य की प्रतीक बन चुकी मिस वर्ल्ड, मिस यूनिवर्स, मिस इंटरनेशनल और मिस अर्थ, ये चार प्रमुख 'बिग फोर' सौंदर्य प्रतियोगिताएं दशकों से दुनियां भर के देशों की सुंदरियों के बीच प्रतिस्पर्धा का केंद्र रही हैं। इनके संक्षिप्त इतिहास, नवीनतम परिणामों और मिलेजुले आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका  की सुंदरियां इनमें सबसे अधिक बार सफल हुई है। मतलब गणित की भाषा में औसत गणना के अनुसार दुनियां में अमेरिकन लड़कियां सबसे अधिक सुंदर मानी जा सकती हैं।  इन सौंदर्य प्रतियोगिताओ के बारे में 

जानना रुचिकर है। 


मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता: सौंदर्य का परोपकार से सरोकार..


1951 में यूनाइटेड किंगडम में शुरू हुई मिस वर्ल्ड दुनिया की सबसे पुरानी सौंदर्य प्रतियोगिता है, जो सुंदरता के साथ परोपकार पर जोर देती है। 2025 में थाईलैंड की ओपल सुचाता इस प्रतियोगिता की विजेता बनीं। वेनेजुएला और भारत ने 6-6 बार यह खिताब जीता, जबकि अमेरिका ने  3 बार यह टाइटिल जीता है। जिन भारतीय सुंदरियों ने मिस वर्ल्ड का खिताब जीता है उनके नाम हैं, रीता फारिया (1966), ऐश्वर्या राय(1994), डायना हेडन (1997), युक्ता मुखी (1999), प्रियंका चोपड़ा (2000), और मानुषी छिल्लर (2017 ) ।


मिस यूनिवर्स: वैश्विक ग्लैमर की प्रतीक प्रतियोगिता के रूप में जानी जाती है।


1952 में अमेरिका द्वारा स्थापित मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता ने सौंदर्य को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया है। 2025 तक अमेरिकन सुंदरियों ने 9 बार इसमें जीत हासिल की, वेनेजुएला की सुंदरियों ने 7 बार तथा भारत ने 3 मिस यूनिवर्स खिताब जीते हैं। भारत ने 1994 में सुष्मिता सेन, 2000 में लारा दत्ता और 2021 में हरनाज संधू के साथ 3 बार मिस यूनिवर्स का ताज जीता है।



मिस इंटरनेशनल और मिस अर्थ: सौंदर्य प्रतियोगिता के आधुनिक आयाम के रूप में प्रतिष्ठित हुई हैं। 


1960 से जापान में आयोजित मिस इंटरनेशनल शारीरिक सौंदर्य के साथ बुद्धिमत्ता पर भी फोकस करती है।  2025 में कोलंबिया की कैटालिना डुक ने यह ताज पहना।


 मिस अर्थ (2001 से) सौंदर्य के साथ पर्यावरण पर केंद्रित सौंदर्य प्रतियोगिता है। इनमें फिलीपींस और वेनेजुएला का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

आतंकवाद: साए में छिपा खतरा

 वैश्विक आतंकवाद: साए में छिपा खतरा


विवेक रंजन श्रीवास्तव


आतंकवाद आज दुनिया का सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। डेटा बताते हैं कि ज्यादातर बड़ी आतंकी घटनाओं का तार एक ही धर्म, चरमपंथ से जुड़ता दिखता है, और ये घटनाएं अक्सर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक जैसे देशों से लिंक होती हैं। इन घटनाओं के इतिहास, जांच रिपोर्टों, दुनिया की आतंक-विरोधी पहल और भारत की जीरो टॉलरेंस नीति का विस्तार से विश्लेषण करें

, तो हम देखते हैं कि आतंकी घटनाओं का काला इतिहास 

दोहराव से बचाना है तो विश्व को समग्र पहल करना जरूरी है। 


आतंकवाद का वैश्विक इतिहास 21वीं सदी में इस्लामिक समूहों के वर्चस्व वाला है। 2001 का अमेरिका में 9/11 हमला, जिसमें अल-कायदा ने अमेरिका पर 2977 लोगों की हत्या की, ने दुनिया को हिला दिया। उसी तरह 2008 का मुंबई 26/11 हमला, जहां लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों ने 175 निर्दोषों को मार डाला, पाकिस्तान से सीधा कनेक्शन दिखाता है। 2005 का 7/7 लंदन बम धमाका (52 मृत्यु), 2015 का पेरिस बैटाक्लान (130 मृत्यु, आईएसआईएस), और 2014 का पेशावर स्कूल हमला (140 बच्चे मारे गए, तालिबान) जैसी घटनाएं इस पैटर्न को सबूत सहित मजबूत करती हैं। आंकड़े बताते हैं कि 85% ऐसी घटनाएं मुस्लिम बहुल देशों में हुईं, हालांकि गैर-इस्लामिक उदाहरण जैसे कांगो में लॉर्ड्स रेसिस्टेंस आर्मी या इंडोनेशिया में क्रिश्चियन मिलिटेंट्स भी हैं, लेकिन संख्या में बहुत कम। स्पष्ट आंकड़े हैं कि दुनिया भर में समाज में ड्रग्स , आपराधिक व्यवसाय से आजीविका कमाने में भी इसी धर्म जाति वर्ग के लोग बहुतायत में हैं। अतः ऐसे वर्ग के मूल सिद्धांत, संस्कृति, संस्कारों पर सुधार के आधार भूत कार्य आवश्यक हो चले हैं। उन्हें आजादी के नाम पर गलत दिशा में बढ़ने देना उनकी पीढ़ियों के प्रति नैसर्गिक अन्याय ही समझ आता है। 


अपराधों, आतंकी घटनाओं की जांच रिपोर्टों से निकली सच्चाई 

 राज्य प्रायोजित आतंकी समर्थन को उजागर करती हैं। मुंबई 26/11 की जांच में डेविड हेडली ने पाक आईएसआई और लश्कर की साजिश खोली, लेकिन दोषियों को सजा मिलना मुश्किल रहा। 9/11 आयोग ने ओसामा बिन लादेन और अल-कायदा को जिम्मेदार ठहराया, जबकि पेरिस हमलों की रिपोर्ट आईएसआईएस के वैश्विक नेटवर्क से जोड़ती है। ये रिपोर्टें पाकिस्तान जैसे देशों को आतंकी फैक्ट्री बताती हैं, जहां राजनीतिक दबाव से न्याय अधर में लटक जाता है।

 

विश्व समुदाय ने संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में काउंटर-टेररिज्म स्ट्रैटेजी (2006) अपनाई, जो रोकथाम, क्षमता निर्माण, कानूनी कार्रवाई और मानवाधिकार पर आधारित है। यूएनएससी रेजोल्यूशन, सीटीआईटीएफ और आईएमओ जैसे संगठन वित्तीय ट्रैकिंग व समुद्री सुरक्षा पर काम करते हैं। लेकिन ये प्रयास इस्लामिक चरमपंथ पर ज्यादा फोकस्ड हैं, जबकि गैर-राज्य समूहों की विविधता को नजरअंदाज करने से चुनौतियां बनी रहती हैं।


 भारत की आतंक पर जीरो टॉलरेंस नीति आक्रामक कदम है। मोदी सरकार में आतंक पर शून्य सहनशीलता अपनाई, एनआईए को मजबूत कर जम्मू-कश्मीर में फंडिंग रोकी। 2025 का ऑपरेशन सिंदूर, जहां पाकिस्तानी कैंपों पर हवाई हमले कर लश्कर, जैश और हिजबुल को ध्वस्त किया, इसकी मिसाल है। सर्जिकल स्ट्राइक्स और इंडस वाटर संधि निलंबन जैसे कदम पाकिस्तान को सबक सिखाते हैं, जो वैश्विक समर्थन पा रहे हैं। पर क्या परिणाम संतोषजनक हैं? 


समीक्षात्मक नजरिया: कारण और भविष्य..

आतंक का एक धर्म से लिंक नजर आता है, यह आंकड़ों से साफ है, लेकिन जड़ें भू-राजनीति, गरीबी और सरकारी या मिलिट्री के समर्थन में हैं। भारत की नीति सफल रही, पर वैश्विक प्रयासों में समन्वय की कमी है। सभी विचारधाराओं पर संतुलित फोकस जरूरी, वरना पूर्वाग्रह पनपेगा। यह खतरा तब तक रहेगा, जब तक अपराध , ड्रग्स , आतंक के स्रोत देशों पर वैश्विक दबाव न बने , और उन धर्मों के मूल्यों , उनकी सोच , उनकी शिक्षा में सही तब्दीली नहीं होती।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

परदेस में कीमत

 परदेस में मूल्य निर्धारण 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


पर्यटन इन दिनों विश्व स्तर पर बहुत सहज है। इस स्थिति में दूसरे देश में चीज़ों की कीमत समझने का सबसे सही तरीका सिर्फ़ अपनी मुद्रा में कन्वर्ट करना नहीं, बल्कि वहाँ की आमदनी और जीवन स्तर के संदर्भ में सोचना है। जिस तरह भारत में 80, 100 रुपये की एक अच्छी चाट आम शहरी के लिए सामान्य मानी जाती है, उसी तरह अमेरिका में लगभग 10 डॉलर की एक प्लेट चाट वहाँ के मध्यमवर्गीय व्यक्ति के लिए उतनी ही सामान्य बात है। जब भारतीय पर्यटक किसी विदेशी रेस्तराँ के मेन्यू पर 10 या 15 डॉलर देखते हैं और तुरंत दिमाग में उसे 900 या 1200 रुपये में बदल देते हैं, तो स्वाभाविक रूप से कीमत बहुत अधिक लगती है, लेकिन यह तुलना अधूरी है, क्योंकि यह केवल मुद्रा के गणित को देखती है, उस समाज की आय और खर्च की वास्तविकता को ध्यान में रखे बिना सही मूल्यांकन संभव नहीं होगा।


किसी भी देश में कॉस्ट ऑफ लिविंग दो चीज़ों से मिलकर बनती है, रोज़मर्रा के खर्च और वहाँ की आमदनी। भारत में एक औसत व्यक्ति का मासिक व्यक्तिगत खर्च डॉलर में बदलने पर भले कुछ सौ डॉलर दिखे, पर इसी के साथ यह भी सच है कि औसत आय अपेक्षाकृत कम है, इसलिए 500 या 1000 रुपये का अतिरिक्त खर्च सोचे समझे बिना करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। दूसरी ओर, अमेरिका, यूके, यूएई, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों में वही व्यक्तिगत खर्च डॉलर या पाउंड में देखने पर भारत की तुलना में कई गुना अधिक नज़र आता है, लेकिन उनकी टैक्स के बाद की औसत सैलरी भी अक्सर भारत के मुकाबले कई गुना अधिक होती है। इसीलिए जो चीज़ भारत के नज़रिए से फिजूलखर्ची लग सकती है, वही उन देशों के निवासी के लिए सिर्फ़ एक साधारण, रोज़मर्रा का व्यय होती है।


भारत से सीधी तुलना करें तो यूएई, यूके, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकप्रिय देशों में जीवन यापन का औसत खर्च लगभग तीन से छह गुना तक अधिक दिखाई देता है। किराया, ट्रांसपोर्ट, बाहर खाना, सेवाएँ, सबकी कीमतें भारत से ज्यादा दिखती हैं।  विशेष तौर पर लंदन, दुबई, न्यूयॉर्क, सिडनी या टोरंटो जैसे बड़े शहर इस दृष्टि से और भी महँगे पड़ते हैं। किंतु वही चित्र तब संतुलित दिखने लगता है, जब यह देखा जाए कि इन देशों में औसत नेट सैलरी से किसी व्यक्ति का डेढ़ से दो महीने तक का व्यक्तिगत खर्च निकल सकता है। यानी वहाँ का निवासी, यदि अपने शहर की स्टैंडर्ड नौकरी पर है, तो उसे 10 डॉलर की कॉफी या 15 डॉलर के लंच से उतना झटका नहीं लगता, जितना वह रकम सीधे भारत की अर्थव्यवस्था में डालकर सोचने पर लगती है। इस अंतर को अनदेखा करके केवल कन्वर्ज़न करने से हर कीमत अस्वाभाविक रूप से महँगी लगने लगती है।


यूएई का उदाहरण लें तो दुबई जैसे शहर में किराया, बिजली, पानी और रोज़मर्रा के सामान की कीमतें भारत के औसत से कई गुना ऊपर हैं, लेकिन वहाँ बहुत से पेशों में टैक्स फ्री या कम टैक्स वाली उच्च आय मिलती है, जो इन खर्चों को संतुलित कर देती है। लंदन में सार्वजनिक परिवहन, किराया और बाहर खाना सब महँगे हैं, पर एक सामान्य प्रोफ़ेशनल की आय ऐसी है कि इन खर्चों के बाद भी उसके पास बचत की पर्याप्त गुंजाइश रह जाती है। अमेरिका में भोजन, सेवाएँ और स्वास्थ्य सुविधाएँ भारत के मुकाबले बेहद महँगी मानी जाएँगी, फिर भी एक औसत कामकाजी व्यक्ति की सैलरी उनकी भरपाई कर पाती है। कनाडा में मौसम कठोर है, और कई चीजें आयात पर निर्भर हैं, इसलिए खर्च ऊँचे हैं, पर सामाजिक सुरक्षा और वेतन स्तर उन्हें वहां के लोगों के लिए व्यावहारिक बनाते हैं। ऑस्ट्रेलिया में खाने पीने और सेवा क्षेत्र की कीमतें भारत से कहीं ऊपर हैं, मगर न्यूनतम वेतन और औसत आय दोनों इन्हें वहां के निवासीयों  हेतु सामान्य बनाते हैं।


खाने पीने की बात करें तो भारत में एक साधारण ऑफिस गोअर का लंच 250, 300 रुपये में अच्छे से निपट सकता है, वहीं यूएई या कनाडा के किसी शहर में कोई साधारण कैज़ुअल लंच 10, 15 डॉलर तक का हो सकता है। भारतीय पर्यटक इसे तुरंत रुपये में बदलकर देखता है और मन ही मन सोचता है कि एक दोपहर के खाने पर ही इतना पैसा, लेकिन वहीं के स्थानीय निवासी की मासिक आय को ध्यान में रखें, तो यह खर्च उसकी आमदनी के अनुपात में उतना ही है, जितना भारत में किसी मॉल, फूडकोर्ट या अच्छे ढाबे पर 250, 300 रुपये खर्च करना। कॉफी के साथ भी यही कहानी दोहराई जाती है, भारत में 100 रुपये की कॉफी, विदेश में 4, 5 डॉलर में मिलती है। रुपये में बदलकर देखें तो यह दो, तीन गुना महँगी लगती है, मगर स्थानीय आय के अनुपात में यह किसी भी ऑफिस गोअर के लिए उतनी ही साधारण छोटी सी ट्रीट है, जितनी भारत में किसी चाय नाश्ते पर 40, 50 रुपये खर्च करना।


पर्यटक के लिए सबसे व्यावहारिक नज़रिया यह है कि हर कीमत को अपनी घरेलू मुद्रा में बदल बदलकर चौंकने के बजाय दैनिक बजट के रूप में देखे। यदि भारत में कोई व्यक्ति दिन भर के खाने पीने पर लगभग 800, 1000 रुपये खर्च करता है, तो अमेरिका या यूके जाते समय उसे यह देखना चाहिए कि वहाँ उसी तरह के सरल, लेकिन आरामदायक दिन के लिए कितना बजट उचित होगा, उदाहरण के लिए 30, 40 डॉलर प्रतिदिन। इस तुलना में केवल अंकों का खेल नहीं, बल्कि स्थानीय आय और वहाँ का सामान्य जीवन स्तर भी शामिल होना चाहिए। साथ ही, हर जगह खर्च कम रखने के व्यावहारिक तरीके मौजूद हैं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेना, सुपरमार्केट से तैयार या अर्ध तैयार भोजन खरीदना, ऐसे हॉस्टल या सर्विस्ड अपार्टमेंट चुनना जहाँ किचन की सुविधा हो, और अत्यधिक पर्यटक केन्द्रित महँगे इलाकों की बजाय थोड़ा अंदरूनी, स्थानीय मोहल्लों के कैफ़े, रेस्तराँ आज़माना। इस तरह, अत्यधिक महँगे दिखने वाले देशों में भी यात्रा का कुल खर्च काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।


सबसे दिलचस्प और उपयोगी मानसिक अभ्यास यह है कि जब भी किसी बोर्ड पर 10, 15 डॉलर या 8, 12 पाउंड की कीमत देखकर झटका लगे, तो अपने आप से एक छोटा सा प्रश्न पूछा जाए, यदि मेरी तनख़्वाह भी इस देश की औसत सैलरी जितनी होती, तो क्या यह दाम उतना ही चुभता। बहुत बार इसका उत्तर नहीं होगा, और वही क्षण होता है जब समझ में आता है कि दिक्कत वास्तविक कीमत से ज़्यादा, हमारे तुलना करने  की मानसिकता में है। करेंसी कन्वर्ज़न का यह जाल जितना आकर्षक दिखता है, उतना ही भ्रामक भी है। उससे बाहर निकलकर, जब कोई भारतीय यात्री यूएई, लंदन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या कनाडा की कीमतों को उनकी स्थानीय आमदनी और जीवन स्तर के संदर्भ में देखना शुरू कर देता है, तो उसकी यात्रा न केवल कम तनावपूर्ण होती है, बल्कि एक तरह से आर्थिक और सांस्कृतिक समझ को भी गहरा करती है। तब 10 डॉलर की चाट केवल 950 रुपये की फिजूल खर्ची नहीं, बल्कि एक नए समाज के जीवन स्तर की छोटी सी झलक बन जाती है, और यात्रा का अनुभव सचमुच ज्ञानवर्धक और रोचक हो उठता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

Saturday, 13 December 2025

आकाश की आतिशबाजी

 आकाश की आतिशबाजी


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 उल्का बारिश का विज्ञान रोचक है। 

न्यूयॉर्क शहर की चकाचौंध और व्यस्तता से कोई 60 मील दूर सैंड हुक सी बीच पर आज रात 10 बजे , रुई के फाहे सी बर्फ की बारिश के बीच , माईनस 4 डिग्री तापमान में हम आसमान में होने वाले एक अद्भुत खगोलीय नाटक की प्राकृतिक आसमानी आतिशबाजी देखने गए थे। ये और बात है कि मौसम की धोखेबाजी के चलते उल्का पिंडों की वह चमकीली बारिश देखना संभव नहीं हो पाया। हर वर्ष निश्चित तिथियों पर अंधेरा आसमान प्रकृति के आतिशी प्रदर्शन का मंच बन जाता है जब उल्का बारिश होती है। ये टिमटिमाती, तेज़ी से बिजली की तरह चमकती और गायब हो जाने वाली रेखाएँ जिन्हें आम लोग तारे टूटना समझते है, दरअसल अंतरिक्ष से आई मिट्टी और चट्टान के अवशेष हैं, जो हमारे वायुमंडल में प्रवेश करते ही जल उठते हैं, और तेज रोशनी होती है। 


लेकिन ये "टूटते तारे" आते कहाँ से हैं? और हडसन हार्बर के किनारे अटलांटिक महासागर के छोर से इन्हें देखना इतना खास क्यों है? आइए, इसके पीछे के विज्ञान को समझें।


उल्का बारिश: एक खगोलीय धूल-सफाई जैसा होता है।

हर उल्का बारिश का एक स्रोत कोई धूमकेतु होता है। धूमकेतु, जो बर्फ, धूल और चट्टानों के पिण्ड होते हैं, सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपने पीछे धूल और छोटे पत्थरों की एक व्यापक पट्टी छोड़ जाते हैं। जब पृथ्वी अपने कक्षा में चक्कर लगाते हुए इस धूल के पट्टे से गुज़रती है, तो ये कण हमारे वायुमंडल में तेज़ी से प्रवेश करते हैं।

आम धारणा के विपरीत, उल्काओं का चमकना सिर्फ हवा के घर्षण के कारण नहीं होता। असल में, यह " तरंगों का दबाव" (Ram Pressure) का नतीजा होता है। जब ये कण (जिन्हें उल्कापिण्ड कहते हैं) 30 से 70 किलोमीटर प्रति सेकंड की अकल्पनीय गति से हमारे वायुमंडल में घुसते हैं, तो उनके सामने की हवा अत्यंत संपीड़ित और गर्म हो जाती है (लगभग 1600 डिग्री सेल्सियस तक)। यही गर्म हवा उल्कापिण्ड के पदार्थ को वाष्पीकृत कर देती है और हवा के अणुओं को "आयनित" कर एक चमकदार प्लाज़्मा की पूंछ बना देती है, जिसे हम एक चमकती रेखा के रूप में देखते हैं। अधिकांश उल्कापिण्ड बालू के दाने से भी छोटे होते हैं और इसी प्रक्रिया में पूरी तरह जलकर खाक हो जाते हैं।

"रेडिएंट" का रहस्य: हर उल्का बारिश का नाम उस तारामंडल के नाम पर रखा जाता है, जिस ओर से वे आते हुए प्रतीत होते हैं। इस बिंदु को "रेडिएंट" (उद्गम बिंदु) कहते हैं। उदाहरण के लिए, अगस्त में दिखने वाली पर्सिड्स बारिश पर्सियस तारामंडल की दिशा से आती हुई लगती है। पर्सिड्स हर साल (अगस्त 12-13)को और जेमिनिड्स (दिसंबर 13-14), या क्वाड्रैंटिड्स से , (जनवरी की शुरुआत) में उल्का वर्षा होती है। 

आज हम जेमिनीड्स मेट्योर शावर देखने ही गए थे। 


यह नैसर्गिक नजारा देखने के लिए रात गहरी होने दें , अपनी आँखों को कम से कम 20-30 मिनट के लिए अंधेरे में देखने के लिए अभ्यस्त बनाना ठीक होता है। 

फोन की स्क्रीन से दूर रह कर नंगी आंखों शांत आसमान निहारने पर यदि आसमान साफ हुआ तो हम यह आनंद ले सकते हैं।

कैंपिंग की कुर्सी या कंबल बिछाकर लेट जाएँ, ताकि गर्दन न दर्द करे। सीधे ऊपर की ओर देखें।

उल्का देखना एक ध्यान की प्रक्रिया की तरह है। 5-10 मिनट में एक उल्का देखना भी एक बड़ी सफलता माना जाता है।


हडसन के किनारे बैठकर उल्का बारिश देखना सिर्फ एक सुंदर नज़ारा नहीं, बल्कि विज्ञान और विस्मय का एक सजीव पाठ है। आप वास्तव में देख रहे होते हैं कि हमारा ग्रह, एक विशाल अंतरिक्ष यान की तरह, करोड़ों साल पुराने एक धूमकेतु के मलबे के बादल से गुज़र रहा है। ये चमकती हुई रेखाएँ हमें हमारे सौर मंडल की गतिशील प्रकृति और उस नन्हे-से बिंदु की याद दिलाती हैं, जिसमें हम इस विशाल ब्रह्मांड में रहते हैं।

 अगली बार जब कभी इन तिथियों में आप न्यूयॉर्क में हों और कोई उल्का बारिश की वैज्ञानिक संभावना 

हो, तो हडसन के किनारे की ओर रुख कीजिए, और खुद को इस प्राचीन खगोलीय नृत्य का गवाह बनने दीजिए। यह प्रकृति का अपना, बिना किसी शुल्क का, आतिशबाज़ी का शो है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

पलायन पर विराम के लिए जरूरी बात

 गाँव से पलायन पर विराम के लिए जरूरी बात


विवेक रंजन श्रीवास्तव

 ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी , भोपाल 


है अपना हिंदुस्तान कहाँ , वह बसा हमारे गाँवों में !


 दुनिया में हमारे गांवो की विशिष्ट पहचान यहां की आत्मीयता,सचाई और प्रेम है .

विकास का अर्थ आर्थिक उन्नति से ही लगाया जाता है , हमारे गाँवो का ऐसा विकास होना चाहिये कि आर्थिक उन्नति तो हो किन्तु हमारे ग्रामवासियों के ये जो नैतिक और चारित्रिक गुण हैं , वे बने रहें . गांवो के आर्थिक विकास के लिये कृषि तथा मानवीय श्रम दो प्रमुख साधन प्रचुरता में हैं . इन्हीं दोनो से उत्पादन में वृद्धि व विकास संभव है . उत्पादकता बढ़ाने के लिये बौद्धिक आधार आवश्यक है , जो अच्छी शिक्षा से ही संभव है .

आज वांछित सुविधाओं के अभाव में गांव व्यापक रूप से पलायन का दर्द झेल रहे हैं। किसान बड़े बड़े खेत बेचकर शहर में फ्लैट में रह रहे हैं, नई पीढ़ी खुद के खेत में मेहनत कर अनिश्चित आमदनी की अपेक्षा , शहर में किसी की नौकरी करके बंधी हुई तनख्वाह में गुजारा करना चाह रहा है। छठ पूजा , ग्रीष्म अवकाश , दीपावली या अन्य त्यौहारों पर महानगरों से गांवों की ओर भागती भीड़ बताती है कि अभी भी लोगों की जड़े गांवों में ही हैं , और यदि गांवों का समुचित विकास नीतिगत रूप से किया जाए तो वर्तमान पलायन रुक सकता है।

 पुस्तकीय ज्ञान व तकनीक , शिक्षा के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं . ग्राम विकास के लिये तकनीकी शिक्षा के साथ साथ चरित्रवान व्यक्ति बनाने वाली शिक्षा दी जानी चाहिये . वर्तमान स्वरूप में शिक्षित व्यक्ति में शारीरिक श्रम से बचने की प्रवृत्ति भी स्वतः विकसित हो जाती है , यही कारण है कि किंचित भी शिक्षित युवा शहरो की ओर पलायन कर रहा है . आज ऐसी शिक्षा की जरूरत है जो सुशिक्षित बनाये पर व्यक्ति शारीरिक श्रम करने से न हिचके.

स्थानीय परिस्थितियो के अनुरूप प्रत्येक ग्राम के विकास की अवधारणा भिन्न ही होगी । जिसे ग्राम सभा की मान्यता के द्वारा हर ग्रामवासी का उसका अपना कार्यक्रम बनाना होगा . 

गांव के विकास के लिए जहाँ भुमि उपजाऊ है वहां खेती, फलों फूलो बागवानी नर्सरी को बढ़ावा , व कृषि से जुड़े पशुपालन का विकास किया जाना चाहिए।

वन्य क्षेत्रो में वनो से प्राप्त उत्पादो से संबंधित योजनायें व कुटिर उद्योगो को और बढ़ावा दिया जाना जरूरी है।

शहरो से लगे हुये गांवो में शासकीय कार्यालयो में से कुछ गांव में प्रारंभ किया जाना चाहिए , जिससे शहर गांवों की ओर जाए तथा शहरो व गांवो का सामंजस्य बढ़े ।

पर्यटन क्षेत्रो से लगे गाँवो में पर्यटको के लिये ग्रामीण आतिथ्य की सुविधा सुलभ करवाना चाहिए ।

विशेष अवधारणा के साथ समूचे गांव को एक रूपता देकर विशिष्ट बनाकर दुनिया के सामने प्रस्तुत किया जाए जिससे ग्रामीणों में गर्व की अनुभूति हो और पलायन रुके । उदाहरण स्वरूप जैसे जयपुर पिंक सिटी के रूप में मशहूर है , किसी गांव के सारे घर एक से बनाये जा सकते हैं , उन्हें एक रंग दिया जा सकता है और उसकी विशेष पहचान बनाई जा सकती है , वहां की सांस्कृतिक छटा के प्रति , ग्रामीण व्यंजनो के प्रति प्रचार के द्वारा लोगो का ध्यान खींचा जा सकता है . वहां के वैशिष्ट्य को रेखांकित किया जाना चाहिए।

कार्पोरेट ग्रुपों द्वारा गांवों में अपने कार्यालय खोलने पर उन्हें करों में छूट देकर कुछ गांवो की विकास योजनायें बनाई जा सकती हैं ।

इत्यादि अनेक प्रयोग संभव हैं,पर हर स्थिति में ग्राम संस्कृति का अपनापन , प्रेम व भाईचारे को अक्षुण्य बनाये रखते हुये , गांव से पलायन रोकते हुये गाँवो में सड़क ,बिजली ,संचार ,

स्वच्छ पेय जल , स्वास्थ्य सुविधाओ की उपलब्धता की सुनिश्चितता व स्थानीय भागीदारी से ही गांवो का सच्चा विकास संभव है. इन्हीं प्रयासों से गांवों का अस्तित्व बचा रहेगा और परोक्ष रूप से स्वतः ही गांवों से पलायन पर विराम लगेगा । 

 ग्रामीण जीवन को बेहतर और आत्मनिर्भर बनाने के लिए निम्न बिंदुओं पर कार्य हों 


1. रोजगार के अवसर बढ़ाना

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की कमी पलायन का एक बड़ा कारण है। इसे रोकने के लिए:

- छोटे उद्योग और कुटीर उद्योग: गांवों में छोटे उद्योग, जैसे हस्तशिल्प या खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, शुरू करने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए।

- कृषि-आधारित व्यवसाय: दूध, शहद, या जैविक खेती जैसे व्यवसायों को बढ़ावा देना।

- प्रशिक्षण केंद्र: सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर युवाओं को कौशल प्रशिक्षण दे सकते हैं, ताकि वे स्थानीय स्तर पर रोजगार पा सके

- 2. कृषि को लाभकारी बनाना

कृषि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन इसके लाभकारी न होने से लोग शहरों की ओर पलायन करते हैं। इसके लिए:

- उचित मूल्य: किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य सुनिश्चित करना।

- आधुनिक तकनीक: ड्रिप इरिगेशन, बीज सुधार, और जैविक खेती जैसी तकनीकों को बढ़ावा देना।

- बाजार पहुंच: कोल्ड स्टोरेज और परिवहन सुविधाओं के जरिए बाजार तक आसान पहुंच।

- फसल बीमा और सब्सिडी: प्राकृतिक आपदाओं से नुकसान की भरपाई के लिए बीमा और सब्सिडी प्रदान करना।


 3. शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं

शिक्षा और स्वास्थ्य की कमी भी पलायन का कारण है। इसे बेहतर करने के लिए:

- शिक्षा: गांवों में गुणवत्तापूर्ण स्कूल और कॉलेज स्थापित करना, ताकि बच्चों को शहर न जाना पड़े।

- स्वास्थ्य: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और अस्पतालों का विकास, जिससे लोग इलाज के लिए शहरों पर निर्भर न रहें।


4. बुनियादी ढांचे का विकास

ग्रामीण जीवन को आकर्षक बनाने के लिए मूलभूत सुविधाएं जरूरी हैं:

- सड़क और परिवहन: बेहतर सड़कें गांवों को बाजार और शहरों से जोड़ेंगी।

- बिजली और पानी: नियमित बिजली और स्वच्छ पानी की आपूर्ति।

- इंटरनेट: डिजिटल कनेक्टिविटी से लोग घर बैठे ऑनलाइन काम कर सकेंगे।

5. स्वरोजगार और स्टार्टअप को बढ़ावा

ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए:

- ऋण और मेंटरशिप: छोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए सस्ते ऋण और विशेषज्ञ मार्गदर्शन।

- संभावित क्षेत्र: हस्तशिल्प, जैविक खेती, या ग्रामीण पर्यटन जैसे क्षेत्रों में स्टार्टअप को प्रोत्साहन।


6. सामुदायिक भागीदारी

ग्रामीण विकास में समुदाय की भूमिका अहम है:

- ग्राम पंचायतों को सशक्त करना: स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की शक्ति बढ़ाना।

- जुड़ाव बढ़ाना: लोगों को अपने गांव की प्रगति में भागीदार बनाना, जिससे उनका भावनात्मक लगाव बना रहे।


7. पर्यावरण और पर्यटन का विकास

गांवों की प्राकृतिक सुंदरता को आय का स्रोत बनाया जा सकता है:

- ग्रामीण पर्यटन: प्राकृतिक स्थलों, संस्कृति, और परंपराओं को बढ़ावा देकर पर्यटकों को आकर्षित करना।

- हरित गांव: पर्यावरण संरक्षण से गांवों को स्वच्छ और आकर्षक बनाना।


सहयोग की आवश्यकता

इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सरकार, गैर-सरकारी संगठन (NGO),और ग्रामीण समुदाय के बीच मजबूत सहयोग जरूरी है। सरकार नीतियां और संसाधन प्रदान कर सकती है, NGO तकनीकी सहायता और जागरूकता बढ़ा सकते हैं, और समुदाय स्थानीय स्तर पर कार्यान्वयन में योगदान दे सकता है।

जब गांवों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध होंगी, साथ ही लोग आत्मनिर्भर बनेंगे, तो पलायन स्वाभाविक रूप से कम होगा। ये उपाय न केवल ग्रामीण जीवन को बेहतर बनाएंगे, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेंगे।


 विवेक रंजन श्रीवास्तव