Friday, 24 April 2026

प्रस्तावना काव्य अंजली

 प्रस्तावना

काव्य अंजली


जीवन भी एक धातु की तरह है, जिसे अनुभवों की भट्टी में तपना पड़ता है ताकि वह अपने शुद्धतम और चमकदार स्वरूप में हो । मेरे प्रिय मित्र और वरिष्ठ मेटलर्जिकल इंजीनियर, परमानन्द सिन्हा जी ने ताउम्र धातुओं के गुणधर्मों को समझा और उन्हें वांछित आकार दिया।  'काव्य अंजली' के रूप में वे हमारे सामने एक 'भाव-अभियंता' के रूप में प्रस्तुत हैं । उन्होंने शब्दों का ऐसा एलाय तैयार किया है, जो कठोर सत्य की शक्ति भी रखता है और कविता की चमक भी।

एक मेटलर्जिस्ट के पास वह पारखी नज़र होती है जो अयस्क के भीतर छिपे मूल्यवान तत्व को पहचान लेती है। सिन्हा जी ने समाज और जीवन की आपाधापी के बीच से उन बारीक भावनाओं को चुना है, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। उनकी कविताएँ केवल पंक्तियाँ नहीं, बल्कि उनके जीवन के अनुभवों की 'कास्टिंग' और 'फोर्जिंग' हैं।

इस संग्रह में उन्होंने  कुशलता से 

 रिश्तों की डक्टिलिटी , मतलब पुस्तक की कुछ रचनाओं  में वे अपने उन मित्रों की बात करते हैं जो उम्र के साठ-पैठस वाले पड़ाव पर हैं। वे यहाँ समझाते हैं कि कैसे बढ़ती उम्र के साथ रिश्तों में लचीलापन और मज़बूती बनी रहनी चाहिए। पुरुषों के लिए मित्रों के साथ को 'मायका' कहना, उनकी मौलिक सोच का उदाहरण है।

  जब वे व्यक्ति के आंतरिक आत्मविश्वास और भाषा के प्रति प्रेम को रेखांकित करते हैं। तब वे  स्पष्ट हैं कि जीवन व्यापार नहीं, बल्कि एक मधुर साज है, जिसे सही 'ट्यूनिंग' की आवश्यकता होती है।

 उनकी लेखनी में स्टील सी वह मज़बूती दिखती है जो हर राष्ट्रभक्त  हृदय में होनी चाहिए। सावरकर, सुभाष और आज़ाद जैसे महानायकों का स्मरण करते हुए वे देश की एकता को उस फौलाद की तरह देखते हैं जिसे कोई तोड़ नहीं सकता।

परमानन्द जी ने अपनी इस कृति में भावनाओं का 'हीट ट्रीटमेंट' इतनी कुशलता से किया है कि हर कविता पाठक के मन को छूकर उसे वैचारिक आनंद देती है। वे स्वयं कहते हैं कि "अपना विवेक सदा साथ रहे," और यही विवेक उनकी रचनाओं को एक विशेष 'फिनिशिंग' देता है।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि 'काव्य अंजली' का यह साहित्यिक संकलन पाठकों के अंतर्मन को वैसे ही आलोकित करेगा जैसे भट्टी से निकला हुआ ज्योतिर्मय स्वर्ण दीप ।  संग्रह में एक सौ कविताओं को 

धर्म और संस्कृति,

समाज और देश,

साहित्य और नायक तथा

मित्रता और माधुर्य के

चार खंडों में अलग अलग संग्रहित किया गया है। इस अभिनव प्रयास के लिए परमानन्द सिन्हा जी को कोटि-कोटि बधाई।


— विवेक रंजन श्रीवास्तव 

वरिष्ठ समालोचक , व्यंग्यकार 

ई अभिव्यक्ति पोर्टल के मानसेवी हिंदी संपादक 

A 233, old Minal residency, j k road Bhopal 462023

apaniabhivyakti@gmail.com

Mob 7000375798

Thursday, 23 April 2026

चार प्रेम कविताएं

 चार प्रेम कविताएं 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

A 233, old Minal residency, j k road Bhopal 462023

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1


शीर्षक 


एक कविता 

एक नज़्म 

एक गीत 

एक ग़ज़ल हो तुम 

तरन्नुम में ,

और मैं 

महज कुछ शब्द 

बिखरे हुए,

जिन्हें बना दिया है 

नियति ने 

तुम्हारा शीर्षक।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 2. 

खजुराहो के प्रस्तर


खजुराहो के मन्दिर शिखरों से

जब धूप हौले से फिसलती है नीचे,

और उन आलिंगनबद्ध देहों को सहलाती है

तो निर्जीव पाषाण प्रतिमाओ के बीच मौन संवाद समझ पाता हूं मैं, 

हरे लान पर बैठे हुए ।

मेरे और तुम्हारे बीच के 

वे 'अनकहे चैट्स',

जो हमने टाइप तो किए, 

पर कभी 'सेंड' ही नहीं कर पाए, 

शब्द वे, जो ड्राफ्ट ही रह गए ।

लगता है वे सब इन दीवारों की 

प्रस्तर मूर्तियों में सदियों से जाग रहे हैं।

मूर्तिकार ने इनकी आँखों में 

संकोच नहीं , 

उकेरा है शाश्वत निर्मल प्रेम।

हमारी तरह 'ब्लू टिक' का 

इंतज़ार नहीं है, इन्हें

और न ही 'लास्ट सीन' के समय 

को देख कोई मनगढ़ंत अनुमान ।

बस प्रेम का होना ही

शाश्वत सत्य है यहां।

देखता हूँ इन आलिंगनबद्ध 

युगल प्रस्तर मूर्तियों को

तो मुझे अपनी रग रग में

तुम्हारी छुअन की ,पहली

सिहरन का अहसास होता है, 

जिसे इस 'फास्ट-फॉरवर्ड' भागदौड़ में

शायद हम बहुत पीछे कहीं भुला आए हैं।

ये मौन मूर्तियाँ कर रही हैं 

उद्घोषणा सदियों से 

"प्रेम पाप नहीं",

सृष्टि की किताब में सबसे सुंदर कविता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 



 3. 

कोणार्क का चक्र 


सूर्य मंदिर में 

कोणार्क के उस पहिए पर 

समय ठहरा हुआ है,

उन आलिंगनबद्ध जोड़ों के लिए

पत्थरों की वे नृत्य निमग्न मुद्राएं, 

वे बाहुपाश, आगोशी

सांसों का पत्थर में बदल जाना

जैसे किसी बहुत पुरानी 

'प्लेलिस्ट' का सबसे प्यारा गाना

अनवरत 'लूप' पर बज रहा हो।

हम रिश्तों को 'अपडेट' करते हैं, 

सॉफ्टवेयर के 'वर्जन' बदलते हैं,

पर वे प्रस्तर शिल्प

चिर नवीन हैं, 

उतने ही पवित्र जितने कल थे।

हाँ ! देह का विसर्जन नहीं, 

देह का उत्सव है , कोणार्क शिल्प।

लगता है , तुम्हारा मेरा मिलना भी

किसी ऐसे ही प्राचीन मंदिर की योजना का कोई हिस्सा था।

खंडहर नहीं हैं, गवाह हैं, ये ,

जब दुनिया केवल शोर से भर जाएगी,

जब प्रेम, प्रदर्शन बस रह जाएगा 

एक 'इमोजी' तक सिमट जाएगा,

तब भी ये पत्थर कहते रहेंगे खुली सभा में 

"प्रेम देह से होकर 

आत्मा तक जाने वाला अनंत 

चक्र है।"


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 4. 

भोरमदेव की छांव 


मैकल पर्वत श्रृंखला के साए में, 

भोरमदेव की उन दीवारों पर

उकेरी गई ,मिथुन मूर्तियाँ , 

मुझे हमारी ,

पहली 'कॉफी डेट' की याद दिलाती हैं।

वही झिझक, 

वही नसों में दौड़ती बिजली,

और वही मौन

जो बिन बोले सब कुछ कह देता था। रेतीले पत्थर की प्रतिमाएं 

नहीं हैं बस शिल्प के आभूषणों से सजी धजी, ये सुसज्जित हैं 

प्रेम के शाश्वत संदेश से।

इनके चेहरों पर जो दीप्ति है,

वह 'इंस्टाग्राम फिल्टर' की 

मोहताज नहीं है।

वह लावण्य मौलिक है ।

सोचता हूँ,

हज़ारों साल पहले उस शिल्पी ने 

जब एक अनगढ़ पत्थर पर 

छेनी चलाई होगी,

तो आख़िर कैसे उकेरी होगी यह 

बिल्कुल तुम सी सुगठित नव यौवना 

तुम जरूर रही होगी, तब भी 

और देखा होगा उस शिल्पी ने तुम्हें 

कहीं लुक छिप कर ।

जरूर मैं ही रहा होऊंगा 

वह कलाकार 

क्योंकि 

तुमने ही तो दिया है 

तुम्हारे सर्वस्व पर सिर्फ मुझे अधिकार ।

पुनर्जन्म पर भरोसा हो रहा है मुझे 

भोरमदेव के परिसर में यह 

मूरत देखकर ।

पत्थर अमर हो गए हैं ये 

प्रेम करते हुए,

क्यों हम जीते-जी पत्थर हुए जा रहे हैं।

छोड़ो भी अब नाराजगी

आओ, हम भी एकाकर हो जाएँ,

प्रेम में समर्पण, हारना नहीं है। 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

A 233, old Minal residency, j k road Bhopal 462023

apaniabhivyakti@gmail.com

Mob 7000375798


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 संक्षिप्त परिचय ...

 विवेक रंजन श्रीवास्तव ,वरिष्ठ व्यंग्यकार, स्वतंत्र लेखक ( हिंदी व अंग्रेजी )


२८ जुलाई १९५९ में मण्डला के एक साहित्यिक परिवार में जन्म .

माँ ... स्व दयावती श्रीवास्तव ...सेवा निवृत प्राचार्या

पिता ...स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध ... वरिष्ठ साहित्यकार, कवि अनुवादक

पत्नी ... श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव ... स्वतंत्र लेखिका


इंजीनियरिंग की पोस्ट ग्रेडुएट शिक्षा के बाद विद्युत मण्डल में शासकीय सेवा से मुख्य अभियंता के रूप में सेवा निवृत्त. 


 परमाणु बिजली घर चुटका जिला मण्डला के प्रारंभिक सर्वेक्षण से स्वीकृति तक , अनेक उल्लेखनीय लघु पन बिजली परियोजनाओ , १३२ व ३३ कि वो उपकेंद्रो , केंद्रीय प्रशिक्षण केंद्र जबलपुर ISO प्रमाणित आदि के निर्माण का तकनीकी गौरव .


किताबें 

बिजली का बदलता परिदृश्य ,

 जल जंगल जमीन आदि तकनीकी किताबें . 

हिन्दी में वैज्ञानिक विषयों पर निरंतर लेखन ,

2005 से हिन्दी ब्लागिंग .


१९९२ में नई कविताओ की पहली किताब आक्रोश तार सप्तक अर्ध शती समारोह में भोपाल मे विमोचित , इस पुस्तक को दिव्य काव्य अलंकरण मिला ..


व्यंग्य की किताबें रामभरोसे , 

कौआ कान ले गया , 

मेरे प्रिय व्यंग्य , 

धन्नो बसंती और बसंत , बकवास काम की , 

जय हो भ्रष्टाचार की ,

समस्या का पंजीकरण , खटर पटर, 

चूं चूं की खोज

 व अन्य प्रिंट व किंडल आदि प्लेटफार्म पर .


समस्या का समाधान का अंग्रेजी अनुवाद किंडल पर सुलभ


मिली भगत ,

चटपटे शरारे एवं लाकडाउन नाम से सँयुक्त वैश्विक व्यंग्य संग्रहों का संपादन .


सामूहिक संग्रहों में भागीदारी 

व्यंग्य के नवल स्वर , आलोक पौराणिक व्यंग्य का ए टी एम ,

 बता दूं क्या , 

अब तक 75 , 

इक्कीसवीं सदी के 131 श्रेष्ठ व्यंग्यकार , 

251 श्रेष्ठ व्यंग्यकार , निभा 

व्यंग्य के रंग 

आदि अनेक संग्रहो में सहभागिता


भगत सिंह ,

उधमसिंह ,

रानी दुर्गावती 

पहला आदिवासी रॉबिनहुड टंट्या भील 

आदि महान विभूतियों,

मध्यप्रदेश की पुरातात्विक धरोहर

 पर चर्चित किताबें लिखीं हैं


नाटक की पुस्तकें... जलनाद नाटक संग्रह विश्ववाणी से राष्ट्रिय स्तर पर पुरस्कृत , 

हिन्दोस्तां हमारा , 

जादू शिक्षा का नाटक संग्रह चर्चित व म. प्र. साहित्य अकादमी से सम्मानित, तथा पुरस्कृत


पाठक मंच के माध्यम से नियमित पुस्तक समीक्षक

https://e-abhivyakti.com के साहित्य सम्पादक


म प्र साहित्य अकादमी ,

पाथेय 

मंथन ,

वर्तिका , 

हिन्दी साहित्य सम्मेलन , तुलसी साहित्य अकादमी व अनेक साहित्यिक़ संस्थाओं , से सम्मानित


 सामाजिक लेखन के लिये रेड एण्ड व्हाईट सम्मान से राज्यपाल से सम्मानित .


वर्तिका पंजीकृत साहित्यिक सामाजिक संस्था के राष्ट्रीय संयोजक


टी वी ,

रेडियो , 

यू ट्यूब , 

पत्र पत्रिकाओ में निरंतर प्रकाशन .

वैश्विक एक्सपोजर एवं भागीदारी

ब्लॉग

http://vivekkevyang.blogspot.com व अन्य ब्लॉग


संपर्क...

ए २३३ , ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी , भोपाल , म प्र , ४६२०२३

मो ७०००३७५७९८

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इन दिनों लंदन प्रवास पर हैं

Monday, 20 April 2026

श्री परमानंद सिन्हा की काव्य कृति आकांक्षा की भूमिका

 भूमिका


साहित्य में काव्य की सार्थकता केवल शब्दों के चयन या तुकबंदी में नहीं, बल्कि उन जीवन मूल्यों में निहित होती है जो समाज को संबल प्रदान करते हैं। कविता , अभिव्यक्ति की सर्वाधिक प्राचीन विधा है।  कंठस्थ रहने में सुगमता एवं साहित्य के कलात्मक सौंदर्य के चलते बरसों से काव्य,  साहित्य के शिखर पर है। एक रचनाकार जब अपनी अनुभूतियों को कागज़ पर उतारता है, तो वह स्वयं को व्यक्त ही नहीं करता, बल्कि अपने युग की धड़कनों को स्वर देता है।

 'आकांक्षा' काव्य संग्रह इसी उदात्त परंपरा का निर्वहन करता है, जहाँ कविता मनोरंजन की परिधि से बाहर निकलकर आत्म-चिंतन और नैतिक बोध का माध्यम बनती है। काव्य मूल्यों की कसौटी पर यह संग्रह इसलिए खरा उतरता है क्योंकि इसमें सत्य की कटुता और संवेदना की कोमलता का अद्भुत संतुलन है। जब मैं इन कविताओं से गुजरा  तो मैंने पाया कि रचनाकार मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज रायपुर के सहपाठी , वहां मेरे प्रारंभिक साहित्यिक सफर के सहयात्री भाई परमानंद सिन्हा जी ने जीवन के प्रति एक सकारात्मक और मूल्यपरक दृष्टिकोण अपनाया है, जो आज के अस्थिर परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक तथा महत्वपूर्ण है।


इस संग्रह की समालोचना करते हुए यह स्पष्ट होता है कि कवि ने अपनी रचनाओं में भाव और यथार्थ का जो शाश्वत तथ्यों का ताना-बना बुना है, वह अत्यंत सुदृढ़ है। उदाहरण के लिए, 


सुगंधित फूलों के संग,

काटें भी तो बेशुमार है।

खुशियों की नदी बहती है,

पर दुख भी तो अपार है।


 इसी प्रकार,  कवि की लेखनी मर्म स्पर्शी हो जाती है,  वे लिखते हैं


अंधियारे को देखा पिघलते हुये, 

रवि की किरणों को मचलते हुये। 

शीतल सुखद थी, सुबह की बयार, 

पंछी उड़ चले, चह चहाते हुये। 


इन पंक्तियों में छायावादी गीत चेतना परिलक्षित होती है। जो प्रकृति परिवेश का शाब्दिक चित्र बनाती है।


एक मिजाज के गीत एक खंड में संजोकर उन्होंने पाठकों के लिए अलग अलग गुलदस्ते एक साथ प्रस्तुत किए हैं। 

लंबे अंतराल में मनोभावों को शब्दों में प्रस्तुत कविताओं को संग्रह के अंतिम स्वरूप में प्रकाशित कर एक विशद साहित्यिक , संपादन का उनका प्रयास स्तुत्य है। 


संग्रह के काव्य विधान, शैली और भाषा की बात करें तो इसमें एक सहज प्रवाह और माधुर्य है जो पाठक को अंत तक बांधे रखता है। कवि ने क्लिष्ट और बोझिल शब्दावली के स्थान पर ऐसी सुगम भाषा का प्रयोग किया है जो जनमानस से सीधे संवाद करती है। उनकी शैली वर्णनात्मक होते हुए भी प्रतीकों और बिंबों से इस प्रकार सजी हुई है कि कविता पढ़ते समय दृश्य जीवंत हो उठते हैं। 

यहाँ उपमा और रूपक अलंकारों का प्रयोग किसी कृत्रिम साज-सज्जा की तरह सायास नहीं, बल्कि भावों की तीव्रता बढ़ाने के लिए स्वाभाविक रूप से हुआ है। 

छंदों की गति और लय  में एक आंतरिक संगीत है, जो इन रचनाओं को केवल पढ़ने योग्य ही नहीं, बल्कि गुनगुनाने योग्य भी बनाता है। शिल्प और कथ्य का यह सामंजस्य श्री परमानंद सिन्हा जी के काव्य संग्रह 'आकांक्षा' को एक विशिष्ट साहित्यिक पहचान दिलाता है।

अंततः, 'आकांक्षा' काव्य संग्रह कवि की आंतरिक यात्रा और उनके जीवन की  अनुभूतियों का वह निचोड़ है जो समाज के लिए उनकी अप्रतिम भेंट सिद्ध होगा । इस काव्य कृति के माध्यम से कवि ने अपनी रचनात्मकता का जो परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। मैं रचनाकार से यह मंगलमयी आशा करता हूँ कि भविष्य में भी उनकी लेखनी इसी प्रकार सा+हित के  रचनात्मक लोक कल्याणी मार्ग पर प्रशस्त रहेगी। पाठकों को उनसे यह अपेक्षा रहेगी कि वे मानवीय संवेदनाओं के और भी सूक्ष्म धरातलों को अपनी लेखनी से स्पर्श करेंगे और समाज में व्याप्त जड़ता को तोड़ने के लिए निरंतर सृजनरत रहेंगे।  यह साहित्यिक यात्रा निरंतर पल्लवित हो और 'आकांक्षा' पाठकों के हृदय में अपना स्थायी स्थान बनाए, यही मेरी हार्दिक मनोकामना है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

वरिष्ठ समालोचक, व्यंग्यकार 

भोपाल

Wednesday, 8 April 2026

साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा

 साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


लेखकीय भावना के साथ न्याय या निर्देशक का व्यवसायिक रूपांतरण, एक बहुआयामी जटिल प्रश्न रहा है।

साहित्य और सिनेमा के बीच का रिश्ता हमेशा से एक ऐसे पुल की तरह रहा है जिसे पार तो बहुतों ने किया, पर उससे कम ही लोग दर्शकों के मन में वह छबि बना पाए, जो उस दर्शक ने एक पाठक के रूप में स्वयं अपने मन में उपन्यास पढ़कर बनाई थी। एक लेखक और साहित्य-अनुरागी होने के नाते, जब पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था' जैसी कालजयी कहानी या महाकवि जयशंकर प्रसाद की 'कामायनी' के अंशों को फिल्मी पर्दे पर उतरते देखा , तो मन एक अनजानी सी रिक्तता और निराशा से भर जाता है। यह निराशा केवल एक दर्शक की नहीं, बल्कि उस पाठक की है जिसने उन शब्दों के 'प्राण' को अपनी कल्पना में जिया है।

सच तो यह है कि सिनेमा और साहित्य के लक्ष्य एक होकर भी अपनी प्रकृति में पूरी तरह भिन्न हैं। साहित्य जहाँ कल्पना की अनंत आकाशगंगा है,व्यावसायिकता से किंचित परे है ,वहीं सिनेमा उसे कैमरे के लेंस और स्क्रीन के फ्रेम में कैद कर देने वाली एक विवश कला है, जो बॉक्स ऑफिस से जुड़ा हुआ है। किताब में लेखकीय भावों का डिस्टार्शन नहीं होता क्योंकि उसकी प्रस्तुति में सिनेमा की तरह अभिनय , निर्देशन , संपादन ,  लोकेशन , फिल्मांकन, पार्श्व, संगीत , गायन वगैरह  ढेर सारे लोग नहीं होते । 


जब प्रसाद जी लिखते हैं"तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन"तो वह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मानवीय चेतना और श्रद्धा का एक गहन दर्शन है।  फिल्मी धुनों में  ऐसे गीत 'शब्दनाद' और गांभीर्य को खो देते है , जो मूल कृति की आत्मा थी।


 फिल्मकार की कोशिश उसे 'लोकप्रिय' और 'दृश्य-योग्य' बनाने की होती है, जबकि रचना पाठक से एक विशेष मानसिक तैयारी और एकांत की मांग करती है। बाज़ार और बॉक्स ऑफिस की ज़रूरतों ने अक्सर महान कृतियों के मौलिक सौंदर्य की बलि चढ़ाई है।

दशकों से फणीश्वरनाथ रेणु की 'तीसरी कसम' से लेकर अमृता प्रीतम की 'पिंजर', आर.के. नारायण की 'गाइड' और दोस्तोएवस्की की रचनाओं पर आधारित 'साँवरिया' जैसी तमाम साहित्य आधारित फिल्में बनती रही हैं। इनमें से कुछ ने आत्मा को छुआ, तो कुछ केवल बाहरी कलेवर तक सीमित रहीं। 'तीसरी कसम' में जो ग्रामीण संवेदना और हीरामन की निश्छलता उतर पाई, वह शायद इसलिए संभव हुई क्योंकि फिल्म के पीछे शैलेंद्र जैसा कवि-हृदय और रेणु की मिट्टी की समझ थी। इसके विपरीत, जब हम 'देवदास' या 'शतरंज के खिलाड़ी' जैसे रूपांतरणों को देखते हैं, तो द्वंद्व और गहरा हो जाता है। जहाँ सत्यजीत रे प्रेमचंद के व्यंग्य को दृश्यों में ढालने में सफल रहते हैं, वहीं आधुनिक सिनेमा अक्सर शरतचंद्र की उस आंतरिक दरिद्रता और आत्म-पीड़ा को मखमली लिबासों और भव्य झूमरों के नीचे दबा देता है।

 फिल्मकार अक्सर कृति के कथानक (Plot) को तो पकड़ लेते हैं, पर उसके 'उद्देश्य' और उस सूक्ष्म सौंदर्य को चित्रित करने में चूक जाते हैं जिसे लेखक ने शब्दों के बीच की रिक्तियों में छिपाया होता है। दृश्य माध्यम की अपनी माँगें हैं। वहाँ संवादों की गति चाहिए, चकाचौंध चाहिए और एक निश्चित समय सीमा का अनुशासन भी। लेकिन साहित्य के पास वह विलासिता है कि वह पाठक को घंटों एक ही विचार या संवेदना में डूबा रहने दे। यही कारण है कि कुछ विरले उदाहरणों को छोड़ दें, तो अधिकांश फ़िल्मी रूपांतरण मूल कृति के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाते।

अंततः, साहित्य एक व्यक्तिगत यात्रा है और सिनेमा एक टीम प्रस्तुति का  सामूहिक अनुभव। किसी भी कालजयी रचना का जो 'शब्दनाद' हमारी अंतरात्मा में गूँजता है, उसे पर्दे के कोलाहल में तलाशना शायद एक कठिन अपेक्षा है। सिनेमा साहित्य का अनुवाद करने की कोशिश तो कर सकता है, लेकिन वह उसकी गरिमा और गांभीर्य का पूर्ण विकल्प कभी नहीं बन सकता। जब भी कोई फिल्मकार किसी महान कृति को हाथ लगाता है, तो वह केवल एक कहानी नहीं उठाता, बल्कि वह उन हज़ारों पाठकों की स्मृतियों और भावनाओं को चुनौती देता है जिन्होंने उस कहानी को अपने भीतर जिया है। अफ़सोस कि अक्सर इस चुनौती में फिल्मकार अपनी तकनीक से तो जीत जाता है, पर संवेदना के धरातल पर प्रायः हार जाता है। 

जिस तरह अनुवादक को मूल लेखक की आत्मा में परकाया प्रवेश कर उसके भाव पकड़ने होते हैं, उससे भी अधिक दुष्कर कार्य साहित्य का फिल्मांकन है, क्योंकि यहां सारी टीम को रचना की आत्मा में परकाया प्रवेश करना वांछित होता है। 

— विवेक रंजन श्रीवास्तव

Tuesday, 7 April 2026

कहानी गर्व गाथा

 कहानी 

गर्व गाथा

लेखक: विवेक रंजन श्रीवास्तव


मिलिट्री अकादमी का वह विशाल परेड ग्राउंड... जनवरी की गुनगुनी धूप स्टेडियम के सीने पर कुछ इस तरह उतर रही थी, मानो आकाश स्वयं अपनी स्वर्ण-रश्मियों से देश के प्रहरियों का राजतिलक कर रहा हो। हवा में बूटों की खनक और कड़क कलफ लगी वर्दियों की सरसराहट के बीच एक अनकही बेचैनी और भारी प्रतीक्षा थी। सबकी निगाहें उस मंच पर टिकी थीं, जहाँ से आज शौर्य का एक नया अध्याय घोषित होना था।

सारी परेड के साथ ही मेजर अंजलि अपनी 'सेरेमोनियल ड्रेस' में अविचल खड़ी थीं। उनकी रीढ़ में सेना का अनुशासन था, पर सीने के भीतर एक बहन का हृदय हज़ारों अश्वों की गति से धड़क रहा था। उनका भाई राघव जिसे बचपन में उन्होंने जाने कितनी बार गोद में संभाला था, शौर्य पदक का सबसे बड़ा दावेदार था । उसने आपरेशन सिंदूर में दुश्मन के घर में घुसकर न केवल अपने मिशन को सफल अंजाम दिया था , वहां से अपने घायल साथियों को बचाकर लौटने का कमाल जो किया था ।


अचानक लाउडस्पीकर पर गूँजी उस गंभीर आवाज़ ने फिजा में प्राण फूँक दिए,  "लेफ्टिनेंट राघव ... 'ऑपरेशन सिंदूर' में अदम्य साहस के लिए... शत्रु की भीषण गोलाबारी के बीच अपने मिशन डिस्ट्रॉय मिलिटेंट को पूरा कर , चार घायल साथियों को सुरक्षित वापस निकाल लाने हेतु उन्हें 'शौर्य चक्र' से सम्मानित किया जाता है।

सारा परेड ग्राउंड हर्ष में डूब गया।  

घोषणा समाप्त होते ही वह दृश्य उपस्थित हुआ जिसने अकादमी के इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया। अंजलि ने सैन्य गरिमा और बहन के लाड़ को एकाकार करते हुए, बिना एक पल गँवाए राघव को अपनी मज़बूत भुजाओं में भरा और उन्हें अपने कंधों पर उठा लिया। तालियों की गड़गड़ाहट ने आसमान को छू लिया। सैनिकों की एड़ियाँ एक साथ चटककर जैसे इस अभिनव सम्मान को सलामी दे रही थीं।


माइक से घोषणा हुई,  लेफ्टिनेंट राघव को उनके अनुभव साझा करने हेतु मंच पर आमंत्रित किया गया। 


 राघव जब मंच पर पहुँचे, तो उनकी आँखों में नमी थी पर मस्तक गर्व से उन्नत था।

राघव ने माइक संभाला। पूरा मैदान पिन-ड्रॉप साइलेंस में डूब गया। उनकी आवाज़ में एक ठहरी हुई गंभीरता थी, 

"उस रात 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान जब दुश्मन की मशीनगनें आग उगल रही थीं और बारूद की गंध ने साँस लेना दूभर कर रखा था, तब दो घंटे तक मौत हमसे बस चंद फुट की दूरी पर खड़ी मुस्कुरा रही थी। एक पल को लगा कि शायद आज जिंदगी का वह आखिरी पन्ना लिखा जाएगा जिसे दादाजी 'सिपाही की अधूरी दास्तान' कहते थे। पर तभी मुझे अपने उन चार घायल साथियों की सिसकियाँ सुनाई दीं, जो अपनी आखिरी साँसों में भी मुझ पर भरोसा टिकाए हुए थे।"

राघव ने एक क्षण का विराम लिया और सामने खड़ी अपनी माँ और पिता की ओर देखा। 

" हमारी टुकड़ी अपने मिशन को सफलता पूर्वक अंजाम दे चुकी थी ,  मैंने सोचा, अगर मैं आज शहीद हो गया, तो मेरी वीरता केवल यादों में सिमट जाएगी। पर अगर मैं लड़कर लौट आया, तो मैं अपने देश की आँखों में वह चमक देख पाऊँगा जो जीत से आती है। मैंने मौत से नहीं, जीवन से आँखें मिलाईं। मैंने तय किया कि मैं मरूँगा नहीं, बल्कि अपने जवानों को ज़िंदा लेकर घर लौटूंगा। क्योंकि असली विजय तिरंगे में लिपट कर लौटने में नहीं, बल्कि तिरंगे को आसमान की ऊँचाइयों तक फहराते रहने में है।"

दूर खड़ी माँ रेखा अपने आँचल से गर्व के आँसू पोंछ रही थीं। पास ही खड़े कर्नल सूर्यप्रताप 

 की वर्दी पर लगे पदक आज सूर्य की रोशनी में अधिक दीप्तिमान हो रहे थे। उनका गला रुँध गया था। यह उस पिता का संतोष था जिसका बेटा 'लड़कर' और 'जीतकर' लौटा था।


तीन वर्ष बाद...

वही परेड ग्राउंड, वही सुनहरी धूप। पर इस बार परिदृश्य बदला हुआ था। राघव अब कैप्टन थे। आज वे स्वयं किसी के कंधे पर सवार नहीं थे, बल्कि उन्होंने एक युवा लेफ्टिनेंट, विक्रम को अपने कंधों पर उठा रखा था। विक्रम ने एक जलती हुई बस्ती से तीन मासूम नागरिकों को जान पर खेलकर आग से  बचाकर   सुरक्षित  निकाला था।

पास में खड़े विक्रम के पिता, जो एक साधारण किसान थे, अपनी फटी बिवाइयों वाले हाथों से आँखों की नमी पोंछ रहे थे। राघव ने विक्रम को नीचे उतारा और उन के हाथों को चूमते हुए कहा, "बाबूजी, मुस्कुराएं,  आपका बेटा आज एक विजेता बनकर घर लौटेगा। यही इस वर्दी की सबसे बड़ी जीत है।"

लेफ्टिनेंट कर्नल बन चुकी अंजलि गर्व से शौर्य के अभिषेक की इस परंपरा को आगे बढ़ते देख रही थीं। उन्होंने मन ही मन दोहराया"वीरता का वास्तविक उत्सव शहादत के शोक में नहीं, बल्कि शौर्य के जीवंत उल्लास में है।"

 परेड ग्राउंड पर बना वह चित्र मात्र एक परिवार की कहानी नहीं थी। वह हर उस भारतीय घर की नई प्रतिज्ञा थी जहाँ वर्दी को केवल कफ़न नहीं, बल्कि शान का लिबास माना जाता है। वह एक ऐसी चेतना बन चुकी थी, जहाँ हम शहीदों को नमन तो करते हैं, पर अपने जीवित वीरों को कंधों पर उठाकर यह उद्घोष करते हैं कि, सैनिक की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका वह जीवन है, जो उसने अपने देश के गौरव को अपनी आँखों से देखने के लिए बचा कर रखा है।


— विवेक रंजन श्रीवास्तव

Monday, 2 March 2026

भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र

 भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र


विवेक रंजन श्रीवास्तव


हिंदी ललित निबंध के संसार में पंडित विद्यानिवास मिश्र एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से मिट्टी की सोंधी गंध और वेदों की ऋचाओं को एक साथ पिरोया है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने जिस ललित निबंध की आधारशिला रखी थी, मिश्र जी ने उसे अपने अद्भुत पांडित्य और लोक-अनुभवो को शब्दों से एक विशाल प्रासाद में परिवर्तित कर दिया। उनका लेखन केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस अविरल धारा का प्रवाह है, जो गाँवों की पगडंडियों से होती हुई दर्शन के शिखर तक पहुँचती है।

उनके निबंध अनुभूति और शिल्प का संगम हैं।

मिश्र जी के निबंधों का 'ललित' पक्ष उनके आत्मपरक दृष्टिकोण में निहित है। उनके निबंधों में 'मैं' का अहंकार नहीं, बल्कि 'मैं' की आत्मीयता घुली होती है। जब वे 'कदम की फूली डाल' या 'आम्र-मंजरी' की बात करते हैं, तो वे केवल प्रकृति का वर्णन नहीं कर रहे होते, बल्कि वे पाठक को अपने साथ उस संवेदन-धरातल पर ले जाते हैं जहाँ तर्क पीछे छूट जाता है और केवल प्रवाही रसात्मकता शेष रहती है।

उनकी असाधारण स्मृतयो का रोचक वर्णन लालित्य की बहुत बड़ी विशेषता है। वे वर्तमान की किसी छोटी-सी घटना जैसे बारिश की बूंदों का गिरना , को भी निबंध में इतिहास और पुराणों की महान परंपराओं से जोड़ देते हैं। उनके लेखन में शब्द 'अर्थ' ही नहीं देते, बल्कि 'ध्वनि' और 'दृश्य' भी पैदा करते हैं। उनके निबंधों में एक प्रकार की 'तरलता' है, जो पाठक के मन में किसी पुराने राग की तरह गूंजती रहती है।

लोक और शास्त्र का अनूठा अद्वैत

विद्यानिवास मिश्र के लेखन की  विशिष्टता है ।उनके निबंधों में लोक और शास्त्र का समन्वय है। जहाँ एक ओर वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और पाणिनी के व्याकरण की सूक्ष्मताओं से परिचित थे, वहीं दूसरी ओर उनके हृदय में लोक-गीतों और ग्रामीण अंचल की स्मृतियाँ रची-बसी थीं। उनके निबंधों में उपनिषदों के सूत्र और कबीर की साखियाँ एक ही धरातल पर आकर संवाद करती हैं। वे अक्सर कहते थे कि भारत की आत्मा महलों में नहीं, बल्कि उन लोरियो में सुरक्षित है जो एक माँ अपने बच्चे को सुलाते समय गाती है।

 

मिश्र जी की कृतियाँ कालजयी हैं। उनमें तथ्यात्मक वैचारिक विस्तार है। ये निबंध भारतीय जीवन-दर्शन के कोश बन गए हैं। उनका निबंध संग्रह 'तुम चंदन हम पानी' भक्ति और समर्पण की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार 'आँगन का पंछी और बनजारा मन' में उन्होंने मनुष्य की उस छटपटाहट को स्वर दिया है जो एक ओर अपनी जड़ों , आँगन से बँधना चाहता है और दूसरी ओर अनंत ज्ञान की खोज में 'बनजारा' बनकर भटकना चाहता है।


उनका सबसे चर्चित निबंध 'मेरे राम का मुकुट भीग रहा है' आधुनिक हिंदी साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है। एक संगीत कार्यक्रम से देर रात घर लौटते अपने पुत्र और अतिथि कन्या की प्रतीक्षा में बैठी एक माँ की ममतामयी चिंता को उन्होंने जिस प्रकार कौशल्या की राम के प्रति चिंता से जोड़ा, वह अद्भुत है। यह निबंध प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि जब तक इस देश में 'मुकुट के भीगने' अर्थात, संस्कृति और मर्यादा के संकट की चिंता जीवित है, तब तक हमारी संवेदनाएँ मृत नहीं हो सकती ।


कुशल संपादक और पत्रकारिता के प्रतिमान


पंडित जी का संपादन कर्म उनके लेखन जितना ही प्रभावशाली था। उन्होंने 'नवभारत टाइम्स' जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादक के रूप में हिंदी पत्रकारिता को एक नई गरिमा और वैचारिक गहराई प्रदान की। उनके संपादन में भाषा की शुद्धता और वैचारिक प्रखरता का विशेष ध्यान रखा जाता था। उन्होंने 'साहित्य अमृत' पत्रिका के माध्यम से नए रचनाकारों को एक मंच दिया और साहित्यिक पत्रकारिता के उच्च मानक स्थापित किए। वे मानते थे कि समाचार केवल सूचना नहीं होते  बल्कि उनकी प्रस्तुति ऐसी हो जिससे वो समाज के मानस को संस्कारित करने का माध्यम बने।

 पंडित विद्यानिवास मिश्र का अवदान यह है कि उन्होंने हिंदी निबंध को रूखेपन और कोरे बौद्धिक विलाप से बाहर निकाला। उन्होंने सिद्ध किया कि परंपरा जड़ नहीं होती, बल्कि वह एक बहती हुई नदी है जो नए युग के साथ मिलकर अपना मार्ग बनाती है। आज के वैश्वीकरण के दौर में, जब व्यक्ति अपनी पहचान खो रहा है, मिश्र जी का साहित्य हमें पुनः अपनी मिट्टी की सुगंध और अपने संस्कारों के उजियारे की ओर ले जाता है। वे आजीवन एक ऐसे 'सांस्कृतिक यात्री' बने रहे, जिनकी यात्रा का गंतव्य भारत की शाश्वत मेधा की खोज था।

विवेक रंजन श्रीवास्तव

Thursday, 12 February 2026

समकालीन विषयों पर व्यंग्य का प्रतिवेदन भूमिका सतीश श्रीवास्तव के व्यंग्य संग्रह पर

 भूमिका


समकालीन विषयों पर व्यंग्य का प्रतिवेदन


व्यंग्य साहित्य मानवीय चेतना का वह दर्पण है, जिसमें समाज अपने सबसे विद्रूप, विरोधाभासी और असुविधाजनक चेहरों का यथार्थ देखता है। यह विधा सदियों से सत्ता, समाज और व्यक्ति , तीनों को कटघरे में खड़ा करते हुए भी उनके विनाश की नहीं, वरन् उनके परिष्कार की अभिलाषा रखती आई है।


कबीर के तीक्ष्ण व्यंग्य-दोहों से लेकर परसाई, शरद जोशी, हरिशंकर व्यास और वर्तमान पीढ़ी तक व्यंग्य का मूल स्वर यही रहा है कि हँसी के सहारे हम अपनी दुर्बलताओं, पाखंडों और भ्रांतियों से आमना-सामना कर सकें। अकबर इलाहाबादी ने अपनी शायरी में समाज को यही आईना दिखाया था।


सूचना विस्फोट, उपभोक्तावाद और तकनीकी वर्चस्व के इस युग में व्यंग्य साहित्य की अनिवार्यता और भी बढ़ गई है। मीडिया, सोशल मीडिया और आडंबरपूर्ण भाषा प्रयोग ने यथार्थ को जितना सँवारा है, उतना ही धुँधला भी किया है। हम स्वयं को सुधारने के बजाय दर्पण साफ करने में उलझे हैं। ऐसे समय में सच्चा व्यंग्य उस धुंध को चीरकर सत्य के उन असुविधाजनक किंतु अनिवार्य पक्षों को उजागर करता है। वह स्मरण कराता है कि आवश्यकता आईना साफ करने की नहीं, स्वयं को निखारने की है।


समकालीन व्यंग्य के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है, वह महज क्षणिक मनोरंजन का माध्यम न रह जाए, अपितु समय की पकड़ और मानवीय संवेदना का समन्वय करते हुए अपनी सार्थकता सिद्ध करे। व्यंग्य यदि केवल चुटकुला बनकर रह जाए, तो वह साहित्य नहीं रहता , और यदि केवल आक्रोश बनकर सिमट जाए, तो पाठक से उसका संवाद समाप्त हो जाता है।


व्यंग्य का भविष्य तभी दीप्तिमान रहेगा, जब तक लेखक समय की नब्ज़ पर हाथ रखकर रचना करता रहेगा, और पाठक हँसते हुए भी अंतःकरण में कहीं एक हल्की-सी चुभन अनुभव करता रहेगा। आने वाले वर्षों में डिजिटल माध्यम, नवीन मंच, श्रव्य-दृश्य प्रस्तुतियाँ, सब व्यंग्य की भाषा और शिल्प में नवीन संभावनाओं का संचार कर रहे हैं। किंतु मूल तत्व वही रहेगा, ईमानदार दृष्टि, मानवीय करुणा और अभिव्यक्ति की कलात्मक मारक क्षमता। जो व्यंग्य व्यक्ति वध की प्रवृत्ति से ऊपर उठकर प्रवृत्ति विमर्श करता है, वही आने वाले समय का प्रामाणिक और सामाजिक रूप से अनुशंसनीय दस्तावेज़ सिद्ध होगा।


व्यंग्य के इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में यदि हम सतीश चंद्र श्रीवास्तव के व्यंग्य संग्रह ‘भरा नहीं जो भाव से…’ को देखें, तो स्पष्ट हो जाता है कि लेखक केवल हँसाने के लिए नहीं, वरन् विचार के लिए बाध्य करने के लिए लिख रहे हैं। गाजीपुर की मिट्टी से निकलकर विधि, हिन्दी और तकनीकी सेवा के त्रिवेणी-संगम से गुज़रा यह रचनाकार आम आदमी और व्यवस्था, दोनों को अंतर्दृष्टि से जानता , समझता है। उसके पास अभिव्यक्ति का कौशल है, भाषा पर अधिकार है, शब्दों का सामर्थ्य है। परिणामतः उनके व्यंग्य न तो निरा कल्पना-विलास हैं, न ही मात्र शिकायत-पत्र; वे समय के लेखकीय प्रतिवेदन हैं।


शीर्षक रचना ‘भरा नहीं जो भाव से…’ से लेकर ‘मामला 90 डिग्री का…’, ‘आता माझी सटकली…’, ‘मेरा तो कुछ भी नहीं…’, ‘चिंता न करें मेघराज’ तक, संग्रह के बत्तीस व्यंग्यों की पाठकीय यात्रा ‘सिंहासन बत्तीसी’ की तरह ही प्रत्येक रचना में उस मनुष्य को पकड़ती है, जो भीड़ में खोते-खोते अचानक अपने चेहरे को पहचानने लगता है। यहाँ हास्य केवल मनोरंजन नहीं है, यह मनुष्य के अंतस में जमी जड़ता पर एक मार्मिक आघात है। मुस्कान के बहाने आत्मचिंतन की ओर धकेलने वाली यह शैली अपने आप में सार्थक है। भाषा लोक मुहावरों, दैनंदिन संवाद, फिल्मी संकेतों और तकनीकी शब्दावली से बुनी गई है, फिर भी प्रतीक-विधान में कथ्य को खोलती है। यही कारण है कि पाठक को लगता है , ये बातें किसी दूरस्थ लेखक ने नहीं, वरन् घर-परिवार और कार्यालय में रोज़ सुनने-बोलने वाले अपने ही किसी सजन ने कही हैं।


इन रचनाओं का शिल्प भी उल्लेखनीय है। कहीं संस्मरण का आभास, कहीं रिपोर्ताज शैली, तो कहीं संवाद-प्रधान कथ्य , और सबके भीतर एक स्थायी व्यंग्य दृष्टि, जो घटनाओं के पृष्ठ में छिपी मानसिकता को सूक्ष्मता से उद्घाटित करती है। चिकित्सा व्यवस्था, प्रशासनिक लापरवाही, तकनीकी जुगाड़, संबंधों में स्वार्थ-साधन, और ‘मैं तो कुछ भी नहीं’ कहकर सब कुछ हड़प लेने वाली मानसिकता, इन सब पर लेखक का कटाक्ष तीक्ष्ण है, पर भाषा कहीं भी विषाक्त नहीं होती। यह उनकी विशिष्ट उपलब्धि है। वे व्यक्ति पर नहीं, प्रवृत्ति पर प्रहार करते हैं , यही व्यंग्य की नैतिक भूमिका है, जो इस संग्रह को मात्र ‘व्यंग्य-संकलन’ से ऊपर उठाकर एक साहित्यिक दस्तावेज़ का दर्जा देती है।


इस पुस्तक की सबसे बड़ी सामर्थ्य इसकी संवादधर्मी शैली है। लेखक बार-बार पाठक से प्रश्न करता है, उसे साथ लेकर चलता है, और प्रत्येक प्रसंग की परिणति पर मानो उसे आईना थमा देता है , “अब तुम ही बताओ, मामला सच में 90 डिग्री का है या नहीं?” यह शैली इन व्यंग्यों को मंच, रेडियो, दृश्य-माध्यम और गंभीर पाठ, तीनों स्तरों पर समान रूप से प्रभावी बनाती है।


व्यंग्य साहित्य की दिशा, दशा और भविष्य की चर्चा के बीच सतीश चंद्र श्रीवास्तव का यह संग्रह यह आश्वस्ति देता है कि संवेदनशील, अनुभव-संपन्न और शिल्प-सचेत रचनाकार की उपस्थिति में हिन्दी व्यंग्य न केवल जीवित है, वरन् अपने समय का साक्षी और समीक्षक दोनों बना हुआ है। यह पुस्तक उनका द्वितीय व्यंग्य-संग्रह है, जो प्रथम संग्रह ‘मतलब अपना साध रे बंदे’ से दो कदम आगे का प्रस्थान है।


विश्वास है, ‘भरा नहीं जो भाव से…’ पाठक को हँसी भी देगा और हँसी के तुरंत बाद एक मार्मिक, अनिवार्य मौन भी—और यही किसी भी सच्चे व्यंग्य की सबसे बड़ी सफलता है।


मैं इस संग्रह को पाठकों के सकारात्मक प्रतिसाद की हार्दिक कामना करता हूँ।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

वरिष्ठ व्यंग्यकार एवं समालोचक

साहित्य संपादक, ‘ई-अभिव्यक्ति’

मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी सम्मानित

मिनाल रेजिडेंसी, भोपाल

इन दिनों न्यूयॉर्क में

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