भूमिका
समकालीन विषयों पर व्यंग्य का प्रतिवेदन
व्यंग्य साहित्य मानवीय चेतना का वह दर्पण है, जिसमें समाज अपने सबसे विद्रूप, विरोधाभासी और असुविधाजनक चेहरों का यथार्थ देखता है। यह विधा सदियों से सत्ता, समाज और व्यक्ति , तीनों को कटघरे में खड़ा करते हुए भी उनके विनाश की नहीं, वरन् उनके परिष्कार की अभिलाषा रखती आई है।
कबीर के तीक्ष्ण व्यंग्य-दोहों से लेकर परसाई, शरद जोशी, हरिशंकर व्यास और वर्तमान पीढ़ी तक व्यंग्य का मूल स्वर यही रहा है कि हँसी के सहारे हम अपनी दुर्बलताओं, पाखंडों और भ्रांतियों से आमना-सामना कर सकें। अकबर इलाहाबादी ने अपनी शायरी में समाज को यही आईना दिखाया था।
सूचना विस्फोट, उपभोक्तावाद और तकनीकी वर्चस्व के इस युग में व्यंग्य साहित्य की अनिवार्यता और भी बढ़ गई है। मीडिया, सोशल मीडिया और आडंबरपूर्ण भाषा प्रयोग ने यथार्थ को जितना सँवारा है, उतना ही धुँधला भी किया है। हम स्वयं को सुधारने के बजाय दर्पण साफ करने में उलझे हैं। ऐसे समय में सच्चा व्यंग्य उस धुंध को चीरकर सत्य के उन असुविधाजनक किंतु अनिवार्य पक्षों को उजागर करता है। वह स्मरण कराता है कि आवश्यकता आईना साफ करने की नहीं, स्वयं को निखारने की है।
समकालीन व्यंग्य के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है, वह महज क्षणिक मनोरंजन का माध्यम न रह जाए, अपितु समय की पकड़ और मानवीय संवेदना का समन्वय करते हुए अपनी सार्थकता सिद्ध करे। व्यंग्य यदि केवल चुटकुला बनकर रह जाए, तो वह साहित्य नहीं रहता , और यदि केवल आक्रोश बनकर सिमट जाए, तो पाठक से उसका संवाद समाप्त हो जाता है।
व्यंग्य का भविष्य तभी दीप्तिमान रहेगा, जब तक लेखक समय की नब्ज़ पर हाथ रखकर रचना करता रहेगा, और पाठक हँसते हुए भी अंतःकरण में कहीं एक हल्की-सी चुभन अनुभव करता रहेगा। आने वाले वर्षों में डिजिटल माध्यम, नवीन मंच, श्रव्य-दृश्य प्रस्तुतियाँ, सब व्यंग्य की भाषा और शिल्प में नवीन संभावनाओं का संचार कर रहे हैं। किंतु मूल तत्व वही रहेगा, ईमानदार दृष्टि, मानवीय करुणा और अभिव्यक्ति की कलात्मक मारक क्षमता। जो व्यंग्य व्यक्ति वध की प्रवृत्ति से ऊपर उठकर प्रवृत्ति विमर्श करता है, वही आने वाले समय का प्रामाणिक और सामाजिक रूप से अनुशंसनीय दस्तावेज़ सिद्ध होगा।
व्यंग्य के इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में यदि हम सतीश चंद्र श्रीवास्तव के व्यंग्य संग्रह ‘भरा नहीं जो भाव से…’ को देखें, तो स्पष्ट हो जाता है कि लेखक केवल हँसाने के लिए नहीं, वरन् विचार के लिए बाध्य करने के लिए लिख रहे हैं। गाजीपुर की मिट्टी से निकलकर विधि, हिन्दी और तकनीकी सेवा के त्रिवेणी-संगम से गुज़रा यह रचनाकार आम आदमी और व्यवस्था, दोनों को अंतर्दृष्टि से जानता , समझता है। उसके पास अभिव्यक्ति का कौशल है, भाषा पर अधिकार है, शब्दों का सामर्थ्य है। परिणामतः उनके व्यंग्य न तो निरा कल्पना-विलास हैं, न ही मात्र शिकायत-पत्र; वे समय के लेखकीय प्रतिवेदन हैं।
शीर्षक रचना ‘भरा नहीं जो भाव से…’ से लेकर ‘मामला 90 डिग्री का…’, ‘आता माझी सटकली…’, ‘मेरा तो कुछ भी नहीं…’, ‘चिंता न करें मेघराज’ तक, संग्रह के बत्तीस व्यंग्यों की पाठकीय यात्रा ‘सिंहासन बत्तीसी’ की तरह ही प्रत्येक रचना में उस मनुष्य को पकड़ती है, जो भीड़ में खोते-खोते अचानक अपने चेहरे को पहचानने लगता है। यहाँ हास्य केवल मनोरंजन नहीं है, यह मनुष्य के अंतस में जमी जड़ता पर एक मार्मिक आघात है। मुस्कान के बहाने आत्मचिंतन की ओर धकेलने वाली यह शैली अपने आप में सार्थक है। भाषा लोक मुहावरों, दैनंदिन संवाद, फिल्मी संकेतों और तकनीकी शब्दावली से बुनी गई है, फिर भी प्रतीक-विधान में कथ्य को खोलती है। यही कारण है कि पाठक को लगता है , ये बातें किसी दूरस्थ लेखक ने नहीं, वरन् घर-परिवार और कार्यालय में रोज़ सुनने-बोलने वाले अपने ही किसी सजन ने कही हैं।
इन रचनाओं का शिल्प भी उल्लेखनीय है। कहीं संस्मरण का आभास, कहीं रिपोर्ताज शैली, तो कहीं संवाद-प्रधान कथ्य , और सबके भीतर एक स्थायी व्यंग्य दृष्टि, जो घटनाओं के पृष्ठ में छिपी मानसिकता को सूक्ष्मता से उद्घाटित करती है। चिकित्सा व्यवस्था, प्रशासनिक लापरवाही, तकनीकी जुगाड़, संबंधों में स्वार्थ-साधन, और ‘मैं तो कुछ भी नहीं’ कहकर सब कुछ हड़प लेने वाली मानसिकता, इन सब पर लेखक का कटाक्ष तीक्ष्ण है, पर भाषा कहीं भी विषाक्त नहीं होती। यह उनकी विशिष्ट उपलब्धि है। वे व्यक्ति पर नहीं, प्रवृत्ति पर प्रहार करते हैं , यही व्यंग्य की नैतिक भूमिका है, जो इस संग्रह को मात्र ‘व्यंग्य-संकलन’ से ऊपर उठाकर एक साहित्यिक दस्तावेज़ का दर्जा देती है।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी सामर्थ्य इसकी संवादधर्मी शैली है। लेखक बार-बार पाठक से प्रश्न करता है, उसे साथ लेकर चलता है, और प्रत्येक प्रसंग की परिणति पर मानो उसे आईना थमा देता है , “अब तुम ही बताओ, मामला सच में 90 डिग्री का है या नहीं?” यह शैली इन व्यंग्यों को मंच, रेडियो, दृश्य-माध्यम और गंभीर पाठ, तीनों स्तरों पर समान रूप से प्रभावी बनाती है।
व्यंग्य साहित्य की दिशा, दशा और भविष्य की चर्चा के बीच सतीश चंद्र श्रीवास्तव का यह संग्रह यह आश्वस्ति देता है कि संवेदनशील, अनुभव-संपन्न और शिल्प-सचेत रचनाकार की उपस्थिति में हिन्दी व्यंग्य न केवल जीवित है, वरन् अपने समय का साक्षी और समीक्षक दोनों बना हुआ है। यह पुस्तक उनका द्वितीय व्यंग्य-संग्रह है, जो प्रथम संग्रह ‘मतलब अपना साध रे बंदे’ से दो कदम आगे का प्रस्थान है।
विश्वास है, ‘भरा नहीं जो भाव से…’ पाठक को हँसी भी देगा और हँसी के तुरंत बाद एक मार्मिक, अनिवार्य मौन भी—और यही किसी भी सच्चे व्यंग्य की सबसे बड़ी सफलता है।
मैं इस संग्रह को पाठकों के सकारात्मक प्रतिसाद की हार्दिक कामना करता हूँ।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
वरिष्ठ व्यंग्यकार एवं समालोचक
साहित्य संपादक, ‘ई-अभिव्यक्ति’
मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी सम्मानित
मिनाल रेजिडेंसी, भोपाल
इन दिनों न्यूयॉर्क में
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