Monday, 2 February 2026

कहानी बर्फ में धूप

 कहानी

 बर्फ में धूप

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


डॉक्टर राजिंदर कुमार अपने टोरंटो स्थित अपार्टमेंट की खिड़की से बाहर देख रहे थे। कनाडा की सफेद, चुभती ठंड शीशे के पार दुनिया को जमा देना चाहती थी। सब कुछ बर्फ़ से ढका था। गाड़ियाँ, पेड़, सड़क, दिख रहे थे तो बर्फ पर कदमों के निशान। यह एकांगी, निस्तब्ध सफेद सुंदरता थी, जिसमें उनकी आत्मा की गूँज खो जाती थी। अंदर, हीटर की समान गरमाहट थी, सरकारी पेंशन की नियमितता थी, स्वास्थ्य सेवाओं का भरोसा भी था , एक आत्मनिर्भर, पूर्ण दुनिया, जो अचानक बहुत खोखली लगने लगी थी।


उनकी नज़र सोफे के पास टंगे एक फोटो फ्रेम पर टिक गई। पंजाब के अपने गाँव 'चमकपुर' की एक पुरानी तस्वीर। गर्मी की दोपहर, नहर का पानी चमक रहा है, खेतों में हरियाली लहरा रही है, और दूर, गुरुद्वारे का निशान साहब, चमक रहा है। यह वह गाँव था जिसे उन्होंने पचास साल पहले, डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ आने के बाद छोड़ा था। फिर संघर्ष, फिर सपना, बेहतर जीवन, बेहतर कमाई। राकेश कौर उनके साथ थीं, उनका प्यार , उनका सहारा था। कनाडा आने का फैसला साथ में किया था ,नए सिरे से शुरुआत करने का जोश। राकेश ने ही इस अपार्टमेंट को घर बनाया था, पंजाबी मसालों की खुशबू से, गुरबाणी के शब्दों से, उनकी मंजिल को गर्मजोशी से सराबोर कर दिया था।


पर पाँच साल पहले, राकेश चली गईं , एकाएक, दिल का दौरा पड़ने से। उनके साथ वह धूप भी चली गई जो कनाडा की सबसे अधिक ठंडक में भी धूप से ज़्यादा गर्म प्यार का अहसास थी। राजिंदर अकेले रह गए। इसी अकेलेपन ने, रिटायरमेंट के बाद, उन्हें फिर से जड़ों की तलाश में चमकपुर ने बुला लिया।


लेकिन गाँव बदल चुका था। नहर अब कंक्रीट की नाली थी। पुराने पेड़ कट चुके थे। चौपाल की जगह एक 'यूथ क्लब' ने ले ली थी, जहाँ लड़के मोबाइल पर बिजी रहते। रिश्तेदार मिले, पर उनकी बातचीत का केंद्र बिंदु अक्सर यही होता"कनाडा में तो बहुत पैसा है न?", "हमारे बेटे के लिए वीजा स्पॉन्सर कर दो।" उस 'अपनेपन' की तलाश, जो राजिंदर की यादों में कैद था, वह हवा हो चुकी थी।


एक दिन, स्थानीय 'शब्द साधना साहित्य परिषद' के सचिव, श्री ओमप्रकाश शर्मा, उनसे मिले। बड़े आदर से, फूलमाला पहनाकर।

ओमप्रकाश ने कहा "डॉक्टर साहब! आप तो विदेश से आए हुए साहित्य के महान पारखी हैं! हम आपके नाम पर एक 'राजिंदर कुमार साहित्य रत्न सम्मान' शुरू करना चाहते हैं। देश की सेवा का यह पुनीत अवसर है।"

राजिंदर ने खुश होकर कहा , "ज़रूर, यह तो बहुत अच्छी बात है। मैं कैसे मदद कर सकता हूँ?"

ओमप्रकाश अपनी योजना सफल समझ मुस्कुराते हुए बोले "बस एक छोटी सी संस्थागत फीस है... तीन लाख रुपये। हमारे पास आपका चेक स्वीकार करने की सुविधा भी है।"


राजिंदर का दिल बिना कहे एक पल में काफी कुछ समझ गया । यह पहला झटका नहीं था। कई 'संस्थाओं' के फोन आ चुके थे। उनके 'विदेशी' होने ने, उनकी साहित्यिक रुचि को एक 'लेन-देन' में बदल दिया था। उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। लेकिन फोन आते रहे। कभी सुबह, कभी रात। एक तरफ पंजाब की वह याद, दूसरी तरफ इस तरह की मांगों से उपजी विरक्ति।


और फिर वह दिन आया। भारत में सुबह के दस बजे थे, धूप फैलने का वक्त। पर टोरंटो में अँधेरी, बर्फ़ीली रात के दो बजे थे। फोन की कर्कश घंटी ने नींद तोड़ दी।

अनजान आवाज़, "नमस्ते डॉक्टर साहब, मैं 'काव्य भारती' से बोल रहा हूँ। आपको 'वैश्विक पंजाबी रत्न' से सम्मानित किया जाएगा। बस कुछ प्रबंध खर्च..."

राजिंदर ने फोन काट दिया। उनकी नींद उचट गई थी। वह खिड़की के पास गए। बाहर, एक निर्मम, खामोश बर्फ़बारी जारी थी। उन्हें लगा जैसे वह खुद दो टुकड़ों में बँट गए हैं। एक टुकड़ा यहाँ, इस बर्फीली नियमितता में फँसा हुआ तो दूसरा टुकड़ा, उस चमकपुर में भटक रहा है जो अब है पर बचा ही नहीं। वह न तो यहाँ के थे, न वहाँ के। एक 'विभक्ति' उनके भीतर घर कर गई।


कई रातों की मानसिक जद्दोजहद के बाद, एक सुबह, जब पहली किरण बर्फ पर पड़ी और सब कुछ हीरे की तरह जगमगा उठा, तो एक शांति उन पर छा गई। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। यह दृश्य उनका था। यह ठंड उन्होंने झेली थी। यहाँ उन्होंने दाँत दर्द से तड़पते मरीजों को राहत दी थी। यहीं राकेश उनके साथ थीं। "प्रारब्ध," उन्होंने धीरे से कहा, "यही हमारी कर्मभूमि बना दी गई। यहाँ हमारा दाना-पानी रहा। अब यही घर है।"


उसी दिन उन्होंने अपनी वसीयत लिखी। कोई भव्यता नहीं। सादगी से। इलेक्ट्रिक भट्टी में शवदाह। और फिर... उनकी चुटकी भर राख नियाग्रा प्रपात के उफनते, गर्जते जल में प्रवाहित कर दी जाए। वह शक्तिशाली, अनंत प्रवाह, जो सब कुछ अपने में समा लेता है । उनकी जीवन यात्रा, उनकी यादें, उनका पंजाब और उनका कनाडा, सब कुछ एक हो जाए।


और एक अंतिम निर्देश, टोरंटो के ही एक गुरुद्वारे में, 'डॉ. राजिंदर कुमार एंड राकेश कौर साहित्य संवाद' नाम से एक वार्षिक कोष स्थापित किया जाए। बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी फीस के, सिर्फ़ शब्दों के लिए, विश्व हिंदी साहित्य के लिए।


डॉक्टर राजिंदर कुमार ने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखा। बर्फ अब भी गिर रही थी। पर अब वह उसकी खामोशी में एक संगीत सुन पा रहे थे। यह उनकी ख़ामोशी थी। यह उनका घर था। और इस बार, देर रात फोन बजने से उनकी नींद उचटने वाली नहीं थी , वे वसीयत कर चुके थे।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

लघु कथा रियल सांता

 लघु कथा 

रियल सांता 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


रात के ठंड भरे अंधेरे में कॉल बेल की आवाज आई। दरवाजा खोला तो सामने एक दुबला सा लड़का खड़ा था। पीठ पर थैला, चेहरे पर पसीना और आंखों में एक जल्दी साफ नजर आ रही थी। उसने पैकेट आगे बढ़ाया और बोला सर आपका ऑर्डर। पैकेट लेकर मैंने दरवाजा बंद कर लिया। भीतर मेज पर रख पैकेट खोला , पिज्जा की भाप मेरे चेहरे से टकराई । टीवी पर चल रही किसी क्रिसमस फिल्म में सांता बच्चों के लिए उपहार रख रहा था। बच्चे सो रहे थे। चिमनी के नीचे सांता के लिए दूध और चाकलेट कटोरी में सजे थे।


मैंने सोचा अभी अभी जो लड़का गया वह ही तो असली सांता है। उसके थैले में हर किसी के लिए खुशी है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसके आने का इंतजार कोई कविता में नहीं लिखता और उसके लिए कोई कटोरी सजाकर दूध और टोस्ट नहीं रखता।


मैं बाहर लपका , उसकी बाइक सड़क के मोड़ पर ओझल हो चुकी थी। मेरे हाथ में गरम पिज्जा था और मन में एक ठंडी सी टीस। क्या कभी हमने इन सच्चे सांता के लिए कोई रिटर्न गिफ्ट रखा है। क्या कभी उनके लिए भी दूध और चाकलेट सजाए हैं। या हम उन्हें सिर्फ डिलीवरी नोटिफिकेशन समझकर स्वाइप कर देते हैं।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

श्रद्धासुमन : नमन ज्ञानरंजन

 श्रद्धासुमन : नमन ज्ञानरंजन 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से 


ज्ञानरंजन हिंदी कहानी के उस युग के प्रवर्तक स्वर हैं जिन्होंने “आम आदमी” को कथा का केंद्र बनाया। उन्होंने हमारे भीतर बसने वाले मौन, असहमति और पीढ़ियों के फासले को इतने स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त किया कि उनकी कहानियाँ समय की डायरी बन गईं। वे दैहिक जीवन से दुनिया छोड़ गए हैं। सबको किसी न किसी दिन जाना ही होता है, किन्तु वे अपने शब्द संवाद में और हमारे संस्मरणों में चिर जीवी बने रहेंगे। 

उन्होंने पहल में मुझे स्थान दिया था, उनके निवास पर जाकर उनसे मिलने के अवसर आए , उनकी सादगी के चित्र सजीव हो रहे हैं। रेलवे प्लेटफार्म पर, किसी समारोह में अनायास कई बार मिले , चरण स्पर्श करने का यत्न करते ही कंधे पकड़ लेते थे।

नमन ज्ञानरंजन 🙏

उनकी लेखनी में कोई कृत्रिमता नहीं थी । उनकी सोच जीवन के छोटे क्षणों में बड़े अर्थ खोजती थी। उनकी कहानी ‘पिता’ याद आ रही है। ऐसी कहानियाँ हमें अपने घर के भीतर झाँकने को विवश करती हैं । उस कमरे तक जहाँ पिता और पुत्र हृदय से नहीं, संकोच से बात करते हैं। समाज जैसे-जैसे ‘तरक्की’ की दौड़ में बढ़ा, पिता का अनुभव ‘अप्रासंगिक’ माना जाने लगा है । यही त्रासदी उनकी कथा पिता का महत्त्वपूर्ण बिंदु है।  

ज्ञानरंजन के निधन के साथ हिंदी कथा साहित्य ने अपना एक साक्षी खो दिया। किंतु उनकी कहानियों का असर जीवित रहने वाला है। वे हमें यह याद दिलाती हैं कि तकनीक या आधुनिकता से नहीं, मनुष्यता से ही पीढ़ियाँ जुड़ी रहती हैं।  

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नीचे मैं उनकी कहानी पिता का जो कथानक स्मरण है दे रहा हूं । 

 उसी भाव को पिता पुत्र की वर्तमान पीढ़ी पर अधिरोपित कर श्रद्धांजलि स्वरूप एक नई कहानी लिख कर उन्हें समर्पित करता हूँ।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


ज्ञानरंजन की कहानी — “पिता” का कथा सार


कहानी ‘पिता’ में एक वृद्ध व्यक्ति अपने बेटे के पास शहर आता है। बेटा अब एक आधुनिक, व्यवस्थित, व्यस्त जीवन में है। वह पिता का आदर करता है, पर उस आदर में वह आत्मीयता नहीं नियम और दूरी है।  

पिता छोटे कस्बे के, सहज और भावुक व्यक्ति हैं। शहर की ठंडी दीवारों में उन्हें अपनेपन की जगह नहीं मिलती। टीवी, फ़ोन, ऑफिस की बातें और ‘मॉडर्न’ रहन-सहन के बीच पिता धीरे धीरे खुद को असहज महसूस करने लगते हैं। कहीं कुछ कहना चाहते हैं, पर शब्द नहीं ढूँढ पाते।  

रात को वे बेटे को सोते देखते हैं और सोचते हैं , “यह अब मेरे बस का नहीं रहा।”  

यह वाक्य पूरी कहानी का सार है। “पिता” केवल एक निजी संबंध की कहानी नहीं, बल्कि पीढ़ी के सोच परिवर्तन की कहानी है।  

यह उस मौन पीढ़ी की कथा है जो समझ तो सब जाती है, पर कह नहीं पाती। और उस नई पीढ़ी की भी, जो सुन तो लेती है, पर समझना भूल गई है।  

कहानी का वातावरण अत्यंत सूक्ष्म है । बेटे की व्यस्तता, पिता की निस्तब्धता, घर की ठंडी हवा, और उनके भीतर का अकेलापन । सब मिलकर एक अदृश्य संवाद रचते हैं। 

पुत्र पिता को नई सुविधाओं से आराम पहुंचाना चाहता है, पर आत्म संतोषी पिता को वह पसंद नहीं। 

एक दिन पुत्र खिड़की से देखता है कि पिता खटिया बाहर निकाल कर गर्मी से बचाव के लिए उस पर पानी छिड़क रहे हैं, किन्तु वह चाह कर भी कुछ कर नहीं सकता ।

ज्ञानरंजन का यह शिल्प आज भी पीढ़ीगत विमर्श का जीवंत प्रतीक है।  

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भाव रूपांतरित कथा 


“वाया वीडियो कॉल”

(ज्ञानरंजन की कहानी “पिता” का समकालीन पुनराख्यान)


लेखक : विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से 


हवाई जहाज की खिड़की से नीचे झिलमिलाती बर्फ़ दिख रही थी। बूढ़े पिता ने कौतूहल से उस परतदार सफेदी को देखा । जैसे किसी पुराने समय की चिट्ठियाँ अब बर्फ़ बनकर फैल गई हों।  

वह पहली बार बेटे के देश जा रहे थे,न्यूयॉर्क। बेटे ने महीनों पहले कहा था, “आपको देखे ज़माना हो गया, अब आ जाइए कुछ दिनों को।” टिकिट भेज रहा हूं।


पिता की पीढ़ी के पास अनुभव के समय का सरोवर था । धीरे बहता, विचार करता, जमा होता। बेटे की पीढ़ी के पास समय नहीं, बस “शेड्यूल” था । हर मुलाकात मोबाइल पर ‘कैलेंडर एंट्री’ में दर्ज।  


एयरपोर्ट से घर तक बेटे ने गाड़ी में स्पॉटिफ़ाई पर कोई अंग्रेज़ी गाना लगाया, बीच-बीच में मोबाइल स्क्रीन पर नज़र डालता रहा। पिता खिड़की से बाहर देखते रहे। वही दृश्य जो उन्होंने कई बार कल्पना में देखे थे, उँची इमारतें, चौड़ी सड़कों का स्वप्निल अनुशासन। पर भीतर एक हल्की उदासी उठ रही थी, जिस पर वे विजय प्राप्त करने का भरपूर प्रयास करते , खिड़की से देखते बेटे से पूछते पर बेटे का मोबाइल नोटिफिकेशन, चौराहे के सिग्नल उसे उनसे उन्मुक्त बात करने से रोक देते । 


घर पहुँचे तो बेटे ने रोबोटिक आवाज़ से कहा, “Alexa, लाइट ऑन करो।”  

पिता मुस्कुरा दिए, यह नई दुनिया थी, जहाँ चाय तक आवाज़ से बनती थी और रिश्ते इमोजी से जताए जाते थे।  


रात को, जब बेटा लैपटॉप पर देर तक काम करता रहा, पिता ने चुपचाप खिड़की से बाहर देखा , बर्फ़ गिर रही थी।  

उन्हें याद आया, कैसे कभी गाँव में वह बेटे के लिए स्वयं घोडा बन जाते थे, और वह दौड़ में सबसे आगे निकलने का सपना देखा करता था। अब वही बेटा ऐसी दौड़ में था जिसका अंत किसी को नहीं पता।  


अगली सुबह कॉफी के साथ पिता बोले, 

“तुम्हें कभी अपने बचपन का घर याद आता है?”  

बेटे ने हँसकर कहा, “डैड, अब तो सब कुछ क्लाउड में है, लगता है यादें भी।”  

पिता ने मुस्कुराहट में अपनी भावनाएं छिपा ली।  

बेटे की पत्नी और बच्चे कोई 6 घंटे की ड्राइव पर रहते हैं, शाम को वीडियो कॉल पर बेटा अपनी पत्नी और बच्चों को दिखा रहा था “ भारत से दादाजी आए हैं।”  

पिता स्क्रीन पर झुके बच्चों को देख मुस्कुराए। उन्हें लगा, अब हर रिश्ता “वाया वीडियो कॉल” है निकट मगर असम्पृक्त।  


रात में बेटे ने पास आकर धीमे से उनका हाथ दबाते हुए कहा, “डैड, मुझे पता है आप सोचते हैं मैं दूर चला गया हूँ।”  

पिता ने उसकी ओर देखा बोले “नहीं बेटा! 

पर जो वे नहीं बोले वह था "दूरी केवल मीलों से नहीं, संवाद और मौन से भी मापी जाती है।”  

कुछ देर बाद धीरे से बोले, “देखो, बाहर अब भी बर्फ़ गिर रही है, पर कोई आवाज़ नहीं होती।”  


बेटा चुप था। दोनों ने खिड़की से बाहर की ओर देखा।  

शायद वही मौन अब दोनों पीढ़ियों के बीच था , सफेद, सुंदर और बर्फ़ सा ठंडा।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

कहानी विदाउट पेपर्स

 कहानी 

  विदाउट पेपर्स


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


लॉस एंजेल्स में उस सुबह की धूप, कार्लोस के छोटे से अपार्टमेंट के फर्श पर एक सुनहरी चौखट बना रही थी, मानो प्रकाश स्वयं उसके जीवन की स्थिरता की गवाही देने की असफल कोशिश कर रहा हो। वह अपनी मेज़ पर झुका, एक नए आर्किटेक्चरल ड्राफ्ट की मीनार को अंतिम स्पर्श दे रहा था, जब दरवाज़े पर हुई उस दस्तक ने उसके समूचे अस्तित्व की नींव हिला दी। "ICE, हियर, दरवाज़ा खोलो!" यह आवाज़ उसके सुरक्षित संसार में किसी विस्फोट की तरह गूँजी। बाहर खड़े वर्दी के साथ गन धारी अधिकारियों की पथराई निगाहें और ऑफिसर मिलर के हाथ में थमे वे ठंडे काग़ज़ कार्लोस के बीस साल के 'अमेरिकी जीवन' के लिए मृत्युदंड की तरह लग रहे थे।

उस ठिठके हुए पल में, कार्लोस का मन समय की परतों को चीरता हुआ बीस साल पीछे चला गया। उसे वह मकई के रंग का घर याद आया जहाँ खुशबू का एक अनोखा संगम हुआ करता था, उसकी माँ एलेना द्वारा फिलीपीन लुल्लाबी गाते हुए बनाया गया सोंधा 'पैन्सिट' और पिता एंटोनियो के मेक्सिकन 'कोरिदोस' की धुन पर लपेटे गए 'तमालेस'। दो अलग महाद्वीपों के सपने लॉस एंजेल्स की इसी धूप में मिलकर एक हुए थे। कार्लोस यहीं जन्मा, यहीं पला, पर बारह साल की उम्र की एक बरसाती रात ने सब उजाड़ दिया। एक कार दुर्घटना ने न केवल उसके माता-पिता को छीन लिया, बल्कि एक अनाथ किशोर की पहचान को उन सरकारी फाइलों के ढेर में दफन कर दिया, जहाँ भावनाएं दम तोड़ देती हैं और सिर्फ 'पेपर स्टेटस' जीवित रहता है। 


वे दिन थे जब अमेरिका स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी के प्रिंसिपल्स पर खुले दिल से सबको अपना लेता था। तब न ही किसी सरकारी अधिकारी ने उसकी कोई मदद किसी पेपर वर्क में की , और न ही वर्षों उससे कभी कोई पूछताछ हुई । वह विदाउट पेपर्स ही ससम्मान बना रहा है।

सुबह स्कूल, दोपहर पुस्तकालय और शाम को पिता के पुराने रेस्तराँ में बर्तन धोते हुए उसने अपनी लकीरें खुद खींचीं। उसने आर्किटेक्चर की पढ़ाई की, अपनी प्रतिभा से ऊँची इमारतों के नक्शे बनाए और आज वह डाउनटाउन एलए की एक प्रतिष्ठित फर्म में अच्छा इंप्लॉई था। वह हर साल ईमानदारी से टैक्स भरता था, उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी था। वह इस शहर की हर गली, हर मोड़ और हर बदलते मौसम का गवाह था। 


अफसोस, ICE मतलब यू.एस. इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट के कानून की आँखें अचानक जाग गई, अंधी आँखों के लिए कार्लोस सिर्फ एक 'अनडॉक्यूमेंटेड' केस था। एक ऐसा इंसान जिसे काग़ज़ों की कमी ने उसकी अपनी ही मिट्टी में पराया बना दिया था।


डिटेंशन सेंटर की सलाखों के पीछे बैठा कार्लोस अपनी आत्मा पर खिंचती लकीरों को महसूस कर रहा था। उसे बचपन की वह बात याद आई जब उसने अपनी मिश्रित पहचान पर सवाल किया था और पिता ने कहा था, "तुम फिलीपीनी भी हो, मेक्सिकन भी हो और अमेरिकन भी।" पर आज उसी त्रयी का एक हिस्सा उसे निर्दयता से नकार रहा था। 

अदालत का मंजर किसी डरावने तमाशे जैसा था। उसके वकील की दलीलें, प्रोफेसर जेम्सन की गवाही और उसकी मित्र माया की सिसकियाँ , सब उस जज की बर्फीली खामोशी के सामने निरर्थक थीं। 

"मैं सहानुभूति रखता हूँ," "पर कानून काग़ज़ों से चलता है, और आपके पास कोई कागजी दस्तावेज़ नहीं हैं जो आपको इस देश के नागरिक होने का हकदार बना सकें।"जज के शब्दों में कानून की रोबोटिक गूँज थी।

आई सी ई कानूनन गलत नहीं थी , जज साहब सही थे । सही है कि कार्लोस इस मिट्टी में रचा बसा बढ़ा था , लेकिन वह गलत था , उसके पास कागजी नागरिकता नहीं थी । 

विदाउट पेपर्स कार्लोस ने विदाई के उन तीस दिनों में अपने जीवन को एक छोटे से सूटकेस में समेट लिया। अपने अपार्टमेंट की हर चीज़ को अलविदा कहते हुए उसे लगा जैसे वह अपने अतीत को दफना रहा हो। वह पुराना गिटार जिस पर पिता ने उसे पहला सुर सिखाया था, और माँ का लाया वह रेशमी पारंपरिक कपड़ा, ये ही अब उसकी कुल यादगार संपत्ति थे। हवाईअड्डे की खिड़की से उसने आखिरी बार उस स्काईलाइन को देखा जिसे उसने कभी अपनी पहली स्केचबुक में उकेरा था। उसने फिलीपींस जाने का फैसला किया था, शायद माँ की जन्मभूमि उसे कोई कोना दे दे, पर उसका दिल चिल्लाकर कह रहा था कि उसकी मातृभूमि तो इसी हवा और इन्हीं सड़कों में बसी थी।

जहाज के टेक-ऑफ करते ही कार्लोस ने अपनी स्केचबुक खोली। अंतिम पन्ने पर उसने एक ऐसी इमारत का खाका खींचा था जिसकी कोई सरहद नहीं थी "संग्रहालय वैश्विक हृदय का।" नीचे उसने कांपते हाथों से लिखा। 


 विवेक रंजन श्रीवास्तव

मुट्ठी बंद ख्वाहिशें .. कहानी

 वैश्विक कहानी 


मुट्ठी बंद ख्वाहिशें

विवेक रंजन श्रीवास्तव 

इन दिनों न्यूयार्क में 


लंदन की ठंडी, कोहरे से लिपटी सुबह थी। अनीता अपने स्टूडियो अपार्टमेंट की खिड़की से बाहर नीरस, धुँधली इमारतों को निहार रही थी। उसकी मुट्ठी बंद थी, और उसकी हथेली में एक छोटा-सा, कपड़े का मुलायम खरगोश का पंजा दबा हुआ था। 'रैबिट्स फुट' या 'क्रॉसफिश' कहलाने वाली यह चीज़, उसकी नानी द्वारा उसे दिया गया एक ताबीज था, जो कथित रूप से बदकिस्मती को दूर भगाता था। आज, दस साल बाद, अपने पहले सोलो आर्ट एक्जीबिशन के दिन, उसे इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत महसूस हो रही थी।


अनीता का सफर कोलकाता की तंग गलियों से शुरू हुआ था, जहाँ उसके पिता एक स्कूल टीचर थे और माँ एक साधारण गृहिणी। उनकी ज़िंदगी एक पूरी तरह प्रिडिक्टेबल रूटीन में बंधी हुई थी, लेकिन अनीता की ख्वाहिशें आकाश को छूने वाली थीं। वह चित्रकार बनना चाहती थी। एक ऐसी कलाकार, जिसके कैनवास पर भावनाओं के रंग दुनिया को दिखाई दें। लेकिन उस घर में, जहाँ 'सुरक्षित भविष्य' शब्द सबसे महत्वपूर्ण थे, कला एक शौक थी, करियर नहीं।


उसकी मुट्ठी में उस समय पहली बार एक ख्वाहिश ने जन्म लिया, जब उसने छिप-छिपकर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट्स में दाखिले के लिए फॉर्म भरा। स्वीकृति आई तो घर में एक भूचाल आ गया। "तुम्हारी उम्र हो गई है शादी की," उसकी माँ ने आँसू बहाते हुए कहा था। " फाइन आर्ट्स की ये सब बातें छोड़ो।" लेकिन अनीता अड़ी रही। उसकी मुट्ठी और भी कस गई। उसने न सिर्फ़ JNU में दाखिला लिया, बल्कि छात्रवृत्ति जीतकर लंदन के प्रतिष्ठित स्लेड स्कूल ऑफ फाइन आर्ट में पोस्ट-ग्रेजुएशन के लिए जगह बना ली।


लंदन आना एक और संघर्ष था। यहाँ की ठंडक सिर्फ़ मौसम की नहीं थी, बल्कि उसके परिवेश के लोगों के दिलों में भी उसे दिखती थी। उसे अपनी पहचान के सवालों से जूझना पड़ा। वह न तो पूरी तरह भारतीय रह गई थी, न ही ब्रिटिश बन पाई थी। उसकी कला में यह द्वंद्व साफ़ झलकता था। उसके कैनवास पर मधुबनी की लकीरें पिकासो के क्यूबिज़्म से टकराती थीं। कुछ प्रोफेसर उसे 'एक्जॉटिक' कहते, तो कुछ 'अनरेज़ोल्ड'। उसकी मुट्ठी, उसकी असुरक्षा और जिद का प्रतीक, मुट्ठी हमेशा बंद रहती।


एक दिन, एक आर्ट क्रिटिक, एडवर्ड, उसके स्टूडियो में उसे ढूंढता हुआ आया। बूढ़ा, लेकिन नज़रों में एक अद्भुत चमक। उसने अनीता के कैनवास देखे, जहाँ रंगों के ज़रिए एक अधूरेपन, एक तलाश का भाव था।

"तुम्हारी कला में एक दर्द है," एडवर्ड ने कहा, "लेकिन वह दर्द तुम्हारा अपना खुद का नहीं लगता। लगता है जैसे तुम अपने कैनवस पर दूसरों के दर्द की एकेडमिक नकल कर रही हो।"

अनीता चिढ़ गई। "आप क्या जानते हैं मेरे दर्द के बारे में?"

एडवर्ड ने मुस्कुराते हुए कहा, "शायद नहीं। लेकिन इतना जानता हूँ कि असली कला तब जन्म लेती है, जब तुम अपनी मुट्ठी खोल देते हो। डर लगता है कि सब कुछ छूट जाएगा, लेकिन उसी में मुक्ति है।"


यह बात अनीता के दिल में उतर गई। उसने अपने कैनवास के सामने बैठकर, पहली बार अपने दिल की सारी उलझनें, सारे डर, सारी ख्वाहिशें उड़ेल दीं। वह दिन उसकी कला का टर्निंग पॉइंट था।


और आज, उसकी सोलो एक्जीबिशन का दिन था। गैलरी में उसके कैनवास लगे थे, जो अब सिर्फ़ तकनीक का नमूना नहीं, बल्कि एक कलाकार की वैश्विक नजरिए वाली अभिव्यक्ति का आईना थे। एक पेंटिंग में एक लड़की की आकृति थी, जिसकी मुट्ठी बंद थी, और उसकी हथेली से रंगों की एक चमकदार लकीर निकल कर अनंत में विलीन हो रही थी। दूसरे कैनवास पर कोलकाता की गलियाँ और लंदन की सड़कें एक-दूसरे में समा रही थीं ।


भीड़ उमड़ पड़ी थी। आलोचक, कलाप्रेमी, संग्रहकर्ता। सब उसकी कला की सराहना कर रहे थे। तभी उसने देखा, दरवाज़े पर दो परिचित चेहरे खड़े हैं, उसके माता-पिता, हैरान और गर्व से भरे हुए। उसकी माँ की आँखों में आँसू थे। अनीता की साँस रुक सी गई। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि वे आएंगे।


उसकी माँ ने उसे गले लगाया और फुसफुसाया, "माफ़ करना बेटा, हम तुम्हारे सपनों को समझ नहीं पाए। तुमने जो किया, वह बहुत हिम्मत का काम है।"

उसके पिता ने बिना कुछ कहे, उसके सिर पर हाथ रख दिया। उनकी आशीष भरी चुप्पी में हज़ार शब्द छिपे थे।


अनीता ने महसूस किया कि उसकी मुट्ठी, जो सालों से ख्वाहिशों, डर और जिद से बंधी हुई थी, अब धीरे-धीरे खुल रही थी। उसने अपनी हथेली देखी। खरगोश का पंजा अब भी वहाँ था, लेकिन अब वह उसे कसकर नहीं पकड़े थी , बल्कि हल्के से थामे हुए थी।


एडवर्ड ने आकर कहा, "देखा, मैंने कहा था न? मुट्ठी खोलो, तो दुनिया तुम्हारी हथेली में आ जाती है।"


उस रात, जब गैलरी खाली हो गई, अनीता अकेली खड़ी थी। उसने अपनी एक पेंटिंग देखी, जहाँ उसकी बंद मुट्ठी से निकलती रंगीन लकीर अब एक विशाल, चमकते सूरज में तब्दील हो रही थी। उसका कैनवास दुनियां को समेटने को आतुर था । इंडो यूरोपियन फ्यूजन के उसके चित्र उसकी मौलिकता थे ।


उसे एहसास हुआ कि ख्वाहिशें कभी खत्म नहीं होतीं। वह अब भी और बहुत कुछ पाना चाहती थी। लेकिन अब वह डरती नहीं थी। क्योंकि उसे पता चल गया था कि ख्वाहिशों की असली ताकत उन्हें मुट्ठी में बंद करके नहीं, बल्कि उन्हें आज़ाद करके, हकीकत में बदलने में है।


मुट्ठी बंद ख्वाहिशें अब खुली हथेली के सपने बन चुकी थीं। और यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

+91 7000375798

लाकडाउन में डाउनलोड हुए रिश्ते.. कहानी

 

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लाकडाउन में डाउनलोड हुए रिश्ते 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


   मैरीलैंड अमेरिका में , छोटी पर सजीव टाउनशिप से ऑपरेट होती थी वह अमेरिकन सॉफ्टवेयर कंपनी जहां थोड़ा सा स्टाफ था, पर दुनियां भर की शिपिंग कंपनियों के सर्वर वहां से सर्व किए जाते थे। कम ही भारतीय थे इस कंपनी में पर जो थे बड़े जिम्मेदार पदों पर थे । अखिलेश और प्रमिला दोनों ही भारतीय थे , इसलिए एक दूसरे को जानते थे। अनायास लॉकडाउन की सुनसान शामों में जब पूरी दुनिया थम सी गई थी, अखिलेश और प्रमिला के बीच एक नई दुनिया बसने लगी थी। शुरुआत तो महज विदेश में बसे दो भारतीय , सह कर्मियों की सहमति से सहूलियत भरा साथ था - एक ही भाषा बोलने वाले, एक जैसा शाकाहारी खाना पसंद करने वाले। पर धीरे-धीरे वह छोटा सा अपार्टमेंट उनकी दुनिया बनता चला गया।


अखिलेश जब पहली बार प्रमिला के हाथ का बना राजमा चावल खा रहा था, तो उसकी आँखों में घर के स्वाद की झलक चमक आई थी - "सालों हो गए माँ के हाथ का स्वाद भूले हुए।" प्रमिला ने मुस्कुराकर कहा था , "खाना तो बस बहाना है, असली भूख तो घर की यादों की होती है।"


वे दोनों शारीरिक रूप से एकदम अलग थे अखिलेश सामान्य देह यष्टी का, छरहरा , युवक , प्रमिला थोड़ी भारी-भरकम, मजबूत। पर एक अपार्टमेंट में बंद जैसे-जैसे दिन बीते, उन्होंने पाया कि शरीर के बाहरी खोल से कहीं गहरे, वे दोनों एक ही तरह के थे । दोनों के भीतर एक अधूरापन था जो विदेश की इस निर्जन भूमि में और गहरा हो गया था।


एक शाम जब अखिलेश बुखार से तप रहा था, प्रमिला ने पूरी रात उसके सिर पर पानी की पट्टी रखी। 

कंपनी में काम ठप्प सा था , वर्क फ्राम होम, पर लगभग नो वर्क। दूसरे दिन जब प्रमिला की नौकरी जाने का अव्यक्त डर उसे सता रहा था, अखिलेश ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा "हम दोनों साथ हैं, कोई बात नहीं।"


फिर वह रात आई जब बारिश की फुहारें खिड़की से टकरा रही थीं और दोनों एक ही सोफे पर बैठे कोई बोल्ड अंग्रेजी फिल्म देख रहे थे। अचानक सब कुछ बदल गया। कोई योजना नहीं थी, कोई इरादा नहीं। बस दो अकेले दिल एक दूसरे की गर्माहट में सिमट गए। सुबह जब आँख खुली तो दोनों की आँखों में एक सवाल था , शर्म, डर, पर एक अजीब सी सुकून वाली शांति भी थी ।


अगले कुछ दिन अजीब से बीते। फिर एक रात रसोई में खड़े-खड़े अखिलेश ने कहा , "प्रमिला, मैं चाहता हूँ कि हमारा रिश्ता वैध हो। तुम्हारे बिना अब इस देश में मेरा कोई घर नहीं।"


शादी छोटी-सी हुई, बस चार लोग। पर जब वे वीडियो कॉल पर घर वालों से बात कर रहे थे, तो प्रमिला की माँ रोने लगी , "बेटी, तूने तो हमें बताया तक नहीं!" अखिलेश के पिता ने धैर्य से समझौता करते हुए आशीष देते हुए कहा "बेटा, वहाँ तो तुम दोनों ही एक दूसरे के परिवार हो।"


आज जब वे उस शहर के दूसरे छोर पर अपने छोटे से अपार्टमेंट में रहते हैं, तो प्रमिला अक्सर कहती है "वो लॉकडाउन हमारे लिए अभिशाप नहीं, वरदान बनकर आया था। उसने हमें सिखाया कि प्यार शरीर की बनावट नहीं, दिलों का मेल होता है।"


और अखिलेश मुस्कुराकर कहता है "और ये भी कि सबसे स्वादिष्ट खाना वो होता है जो दिल से बनाया जाए।" दोनों की हँसी कमरे में गूँज उठती है, जैसे उस कोरोना काल की उदासी को भी हरा देने का इरादा रखती हो।" लाकडाउन में डाउनलोड हुए रिश्ते में नए फूल खिल आए। 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

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ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी 

जे के रोड भोपाल 

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Sunday, 1 February 2026

अमेरिका में भारत

 अमेरिका में भारत 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


अमेरिका में भारत की उपस्थिति किसी एक घटना, स्मारक या एक प्रवासी समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समय के साथ निर्मित एक विस्तृत सांस्कृतिक, वैचारिक और सामाजिक परिदृश्य है। यह उपस्थिति कभी किसी उद्यान में स्थापित प्रतिमा के रूप में दिखाई देती है, कभी विश्वविद्यालय के सभागार में दिए गए व्याख्यानों में, कभी प्रयोगशालाओं में साझा शोध के रूप में और कभी किसी छोटे शहर के सांस्कृतिक केंद्र में बजते तबले या गूंजते भजन में।


न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के नॉर्थ लॉन गार्डन में स्थापित महात्मा गांधी का बस्ट इस उपस्थिति का एक सशक्त प्रतीक है। दिसंबर 2022 में भारत के विदेश मंत्री और संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा अनावरण किया गया यह बस्ट संयुक्त राष्ट्र परिसर में गांधी की पहली स्थायी प्रतिमा है। यह तथ्य विशेष ध्यान देने योग्य है कि गांधी स्वयं कभी अमेरिका नहीं आए, फिर भी भारत के बाहर उनकी सर्वाधिक प्रतिमाएं और स्मारक जिस देश में हैं, वह अमेरिका ही है। यह स्थिति किसी औपचारिक कूटनीतिक निर्णय से अधिक उस वैचारिक स्वीकृति का परिणाम है, जो अमेरिकी समाज ने गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को लेकर विकसित की है। अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन से लेकर शांति आंदोलनों में महात्मा गांधी के विचारों की छाया स्पष्ट देखी जा सकती है।


यदि अमेरिका और भारत के वैचारिक संबंधों की ऐतिहासिक शुरुआत को देखा जाए तो स्वामी विवेकानंद की 1893 की शिकागो यात्रा एक निर्णायक क्षण के रूप में सामने आती है। वर्ल्ड्स पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन्स में दिया गया उनका संबोधन केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि पश्चिमी दुनिया के लिए भारतीय दर्शन का औपचारिक परिचय था। धार्मिक सहिष्णुता, सार्वभौमिकता और मानव एकता पर आधारित उनका दृष्टिकोण अमेरिकी श्रोताओं के लिए नया भी था और आकर्षक भी। इसके बाद विवेकानंद ने अमेरिका के विभिन्न नगरों में प्रवास कर वेदांत दर्शन का प्रचार किया, शिष्यों को दीक्षा दी और संस्थागत रूप से वेदांत सोसाइटियों की नींव रखी। न्यूयॉर्क राज्य के थाउजेंड आइलैंड पार्क में उनकी साधना से जुड़ा स्मारक आज भी इस बात का प्रमाण है कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा ने अमेरिकी भूमि पर स्थायी जड़ें जमा ली हैं।


बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में प्रवासी भारतीय समुदाय ने अमेरिका में जिस तरह अपनी पहचान बनाई, उसने अमेरिका में भारत की छवि को एक नया आयाम दिया। आज अमेरिका में भारतीय मूल की आबादी पचास लाख से अधिक है और यह समुदाय शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, सूचना प्रौद्योगिकी, व्यापार और सार्वजनिक जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है। यह केवल आर्थिक सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास की भी कहानी है। भारतीय समुदाय ने अपने त्योहारों, भाषाओं, कलाओं और सामाजिक मूल्यों को संरक्षित रखते हुए उन्हें अमेरिकी सामाजिक ताने बाने में इस तरह पिरोया है कि वे अलग थलग नहीं, बल्कि सहभागी बन गए हैं। कुछ राज्यों की अमेरिकी सरकार ने दीपावली पर अवकाश की शुरुआत की है।


अमेरिका के अनेक राज्यों में स्थापित इंडिया कम्युनिटी सेंटर और कल्चरल सेंटर इस सांस्कृतिक आत्मविश्वास के जीवंत उदाहरण हैं। कैलिफोर्निया के मिलपीटस स्थित इंडिया कम्युनिटी सेंटर हो या न्यू जर्सी, यूटा और न्यूयॉर्क के सांस्कृतिक केंद्र, ये सभी आधुनिक चौपालों की तरह काम करते हैं। यहां योग कक्षाओं के साथ साथ बच्चों के लिए भाषा शिक्षण, संगीत और नृत्य की कक्षाएं, वरिष्ठ नागरिकों के लिए कार्यक्रम और बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक उत्सव आयोजित होते हैं। इन केंद्रों में दूसरी और तीसरी इंडियन डायस्पोरा पीढ़ी यह सीखती है कि भारतीय होना और अमेरिकी होना परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक दूसरे को एक साथ समृद्ध करने वाली पहचानें हैं।


अमेरिका के हिंदू मंदिर, जैन मंदिर और गुरुद्वारे भी केवल पूजा स्थल नहीं रह गए हैं। वे सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों के केंद्र बन चुके हैं। आरती के बाद शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति, त्योहारों के अवसर पर नाटक और भजन, भाषा कक्षाएं और सामुदायिक चर्चा सभाएं इन स्थलों को एक व्यापक सामाजिक मंच में बदल देती हैं। इस प्रक्रिया में भारतीय परंपरा धार्मिक दायरे से बाहर निकलकर सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का अंग बन जाती है। इस्कॉन , अक्षरधाम , कुछ भारतीय प्रवचन कर्ता गुरु अमेरिका में अनेक स्थानों पर महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। 


महात्मा गांधी के साथ साथ डॉ भीमराव आंबेडकर की प्रतिमाएं भी अमेरिका में भारत की वैचारिक उपस्थिति को रेखांकित करती हैं। मैरीलैंड में स्थापित आंबेडकर की विशाल प्रतिमा सामाजिक न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों की उस परंपरा को सामने लाती है, जो भारत और अमेरिका दोनों लोकतंत्रों की साझा विरासत है। यह संकेत करती है कि अमेरिका में भारत केवल आध्यात्मिक या सांस्कृतिक प्रतीकों तक सीमित नहीं, बल्कि आधुनिक लोकतांत्रिक चिंतन का भी प्रतिनिधि है।


अमेरिकी संग्रहालयों में भारतीय कला और इतिहास की उपस्थिति इस कथा का एक और महत्वपूर्ण अध्याय है। न्यूयॉर्क का मेट्रोपोलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट और सैन फ्रांसिस्को का एशियन आर्ट म्यूजियम भारतीय मूर्तिकला, चित्रकला और वस्त्र कला के समृद्ध संग्रहों के माध्यम से भारत को एक दृश्य पाठशाला की तरह प्रस्तुत करते हैं। इन दीर्घाओं में भारत केवल अतीत की सभ्यता नहीं, बल्कि जीवंत सौंदर्य परंपरा के रूप में दिखाई देता है, जो आधुनिक कला संवादों से भी जुड़ती है।


सांस्कृतिक प्रतीकों से आगे बढ़कर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत और अमेरिका की साझेदारी अमेरिका में भारत की एक कम दिखाई देने वाली, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण उपस्थिति है। इंडो यूएस साइंस एंड टेक्नोलॉजी फोरम, संयुक्त स्वच्छ ऊर्जा अनुसंधान केंद्र और अंतरिक्ष विज्ञान में इसरो और नासा के सहयोग ने दोनों देशों के वैज्ञानिक समुदायों को गहराई से जोड़ा है। प्रयोगशालाओं में काम करते भारतीय इंजीनियरिंग विशेषज्ञ और अमेरिकी वैज्ञानिक यह साबित करते हैं कि यह संबंध केवल अतीत या संस्कृति पर आधारित नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण में भी साझेदार है।

अमेरिका के मॉल्स में सहज ही मेड इन इंडिया कपड़े तथा अन्य वस्तुओं की उपलब्धता है। 

इन सभी तथ्यों को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि " अमेरिका में भारत" कोई एकरेखीय कहानी नहीं है। यह गांधी और विवेकानंद से शुरू होकर प्रवासी समुदाय, सांस्कृतिक केंद्रों, मंदिरों, संग्रहालयों और प्रयोगशालाओं तक निरंतर फैलती एक बहुआयामी यात्रा है। एक ओर दुनिया का सबसे पुराना आधुनिक लोकतंत्र और दूसरी ओर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, दोनों के बीच यह संवाद कभी विचारों के आदान प्रदान के रूप में सामने आता है, कभी सांस्कृतिक उत्सवों में और कभी साझा वैज्ञानिक परियोजनाओं में।


अमेरिका में भारत इसीलिए केवल स्मृति नहीं, बल्कि एक जीवित अनुभव है। यह अनुभव हर उस स्थान पर मौजूद है जहां भारतीय मूल्य, विचार और रचनात्मकता अमेरिकी समाज के साथ संवाद करती है और उसे समृद्ध करती है। यही संवाद इस पारस्परिक सम्बन्ध को निरंतर गतिशील और भविष्य उन्मुख बनाता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव