Sunday, 1 February 2026

अमेरिका में भारत

 अमेरिका में भारत 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


अमेरिका में भारत की उपस्थिति किसी एक घटना, स्मारक या एक प्रवासी समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समय के साथ निर्मित एक विस्तृत सांस्कृतिक, वैचारिक और सामाजिक परिदृश्य है। यह उपस्थिति कभी किसी उद्यान में स्थापित प्रतिमा के रूप में दिखाई देती है, कभी विश्वविद्यालय के सभागार में दिए गए व्याख्यानों में, कभी प्रयोगशालाओं में साझा शोध के रूप में और कभी किसी छोटे शहर के सांस्कृतिक केंद्र में बजते तबले या गूंजते भजन में।


न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के नॉर्थ लॉन गार्डन में स्थापित महात्मा गांधी का बस्ट इस उपस्थिति का एक सशक्त प्रतीक है। दिसंबर 2022 में भारत के विदेश मंत्री और संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा अनावरण किया गया यह बस्ट संयुक्त राष्ट्र परिसर में गांधी की पहली स्थायी प्रतिमा है। यह तथ्य विशेष ध्यान देने योग्य है कि गांधी स्वयं कभी अमेरिका नहीं आए, फिर भी भारत के बाहर उनकी सर्वाधिक प्रतिमाएं और स्मारक जिस देश में हैं, वह अमेरिका ही है। यह स्थिति किसी औपचारिक कूटनीतिक निर्णय से अधिक उस वैचारिक स्वीकृति का परिणाम है, जो अमेरिकी समाज ने गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को लेकर विकसित की है। अमेरिकी नागरिक अधिकार आंदोलन से लेकर शांति आंदोलनों में महात्मा गांधी के विचारों की छाया स्पष्ट देखी जा सकती है।


यदि अमेरिका और भारत के वैचारिक संबंधों की ऐतिहासिक शुरुआत को देखा जाए तो स्वामी विवेकानंद की 1893 की शिकागो यात्रा एक निर्णायक क्षण के रूप में सामने आती है। वर्ल्ड्स पार्लियामेंट ऑफ रिलिजन्स में दिया गया उनका संबोधन केवल एक भाषण नहीं था, बल्कि पश्चिमी दुनिया के लिए भारतीय दर्शन का औपचारिक परिचय था। धार्मिक सहिष्णुता, सार्वभौमिकता और मानव एकता पर आधारित उनका दृष्टिकोण अमेरिकी श्रोताओं के लिए नया भी था और आकर्षक भी। इसके बाद विवेकानंद ने अमेरिका के विभिन्न नगरों में प्रवास कर वेदांत दर्शन का प्रचार किया, शिष्यों को दीक्षा दी और संस्थागत रूप से वेदांत सोसाइटियों की नींव रखी। न्यूयॉर्क राज्य के थाउजेंड आइलैंड पार्क में उनकी साधना से जुड़ा स्मारक आज भी इस बात का प्रमाण है कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा ने अमेरिकी भूमि पर स्थायी जड़ें जमा ली हैं।


बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में प्रवासी भारतीय समुदाय ने अमेरिका में जिस तरह अपनी पहचान बनाई, उसने अमेरिका में भारत की छवि को एक नया आयाम दिया। आज अमेरिका में भारतीय मूल की आबादी पचास लाख से अधिक है और यह समुदाय शिक्षा, विज्ञान, चिकित्सा, सूचना प्रौद्योगिकी, व्यापार और सार्वजनिक जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रभावशाली भूमिका निभा रहा है। यह केवल आर्थिक सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास की भी कहानी है। भारतीय समुदाय ने अपने त्योहारों, भाषाओं, कलाओं और सामाजिक मूल्यों को संरक्षित रखते हुए उन्हें अमेरिकी सामाजिक ताने बाने में इस तरह पिरोया है कि वे अलग थलग नहीं, बल्कि सहभागी बन गए हैं। कुछ राज्यों की अमेरिकी सरकार ने दीपावली पर अवकाश की शुरुआत की है।


अमेरिका के अनेक राज्यों में स्थापित इंडिया कम्युनिटी सेंटर और कल्चरल सेंटर इस सांस्कृतिक आत्मविश्वास के जीवंत उदाहरण हैं। कैलिफोर्निया के मिलपीटस स्थित इंडिया कम्युनिटी सेंटर हो या न्यू जर्सी, यूटा और न्यूयॉर्क के सांस्कृतिक केंद्र, ये सभी आधुनिक चौपालों की तरह काम करते हैं। यहां योग कक्षाओं के साथ साथ बच्चों के लिए भाषा शिक्षण, संगीत और नृत्य की कक्षाएं, वरिष्ठ नागरिकों के लिए कार्यक्रम और बड़े पैमाने पर सांस्कृतिक उत्सव आयोजित होते हैं। इन केंद्रों में दूसरी और तीसरी इंडियन डायस्पोरा पीढ़ी यह सीखती है कि भारतीय होना और अमेरिकी होना परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक दूसरे को एक साथ समृद्ध करने वाली पहचानें हैं।


अमेरिका के हिंदू मंदिर, जैन मंदिर और गुरुद्वारे भी केवल पूजा स्थल नहीं रह गए हैं। वे सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों के केंद्र बन चुके हैं। आरती के बाद शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुति, त्योहारों के अवसर पर नाटक और भजन, भाषा कक्षाएं और सामुदायिक चर्चा सभाएं इन स्थलों को एक व्यापक सामाजिक मंच में बदल देती हैं। इस प्रक्रिया में भारतीय परंपरा धार्मिक दायरे से बाहर निकलकर सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन का अंग बन जाती है। इस्कॉन , अक्षरधाम , कुछ भारतीय प्रवचन कर्ता गुरु अमेरिका में अनेक स्थानों पर महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। 


महात्मा गांधी के साथ साथ डॉ भीमराव आंबेडकर की प्रतिमाएं भी अमेरिका में भारत की वैचारिक उपस्थिति को रेखांकित करती हैं। मैरीलैंड में स्थापित आंबेडकर की विशाल प्रतिमा सामाजिक न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों की उस परंपरा को सामने लाती है, जो भारत और अमेरिका दोनों लोकतंत्रों की साझा विरासत है। यह संकेत करती है कि अमेरिका में भारत केवल आध्यात्मिक या सांस्कृतिक प्रतीकों तक सीमित नहीं, बल्कि आधुनिक लोकतांत्रिक चिंतन का भी प्रतिनिधि है।


अमेरिकी संग्रहालयों में भारतीय कला और इतिहास की उपस्थिति इस कथा का एक और महत्वपूर्ण अध्याय है। न्यूयॉर्क का मेट्रोपोलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट और सैन फ्रांसिस्को का एशियन आर्ट म्यूजियम भारतीय मूर्तिकला, चित्रकला और वस्त्र कला के समृद्ध संग्रहों के माध्यम से भारत को एक दृश्य पाठशाला की तरह प्रस्तुत करते हैं। इन दीर्घाओं में भारत केवल अतीत की सभ्यता नहीं, बल्कि जीवंत सौंदर्य परंपरा के रूप में दिखाई देता है, जो आधुनिक कला संवादों से भी जुड़ती है।


सांस्कृतिक प्रतीकों से आगे बढ़कर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत और अमेरिका की साझेदारी अमेरिका में भारत की एक कम दिखाई देने वाली, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण उपस्थिति है। इंडो यूएस साइंस एंड टेक्नोलॉजी फोरम, संयुक्त स्वच्छ ऊर्जा अनुसंधान केंद्र और अंतरिक्ष विज्ञान में इसरो और नासा के सहयोग ने दोनों देशों के वैज्ञानिक समुदायों को गहराई से जोड़ा है। प्रयोगशालाओं में काम करते भारतीय इंजीनियरिंग विशेषज्ञ और अमेरिकी वैज्ञानिक यह साबित करते हैं कि यह संबंध केवल अतीत या संस्कृति पर आधारित नहीं, बल्कि भविष्य के निर्माण में भी साझेदार है।

अमेरिका के मॉल्स में सहज ही मेड इन इंडिया कपड़े तथा अन्य वस्तुओं की उपलब्धता है। 

इन सभी तथ्यों को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि " अमेरिका में भारत" कोई एकरेखीय कहानी नहीं है। यह गांधी और विवेकानंद से शुरू होकर प्रवासी समुदाय, सांस्कृतिक केंद्रों, मंदिरों, संग्रहालयों और प्रयोगशालाओं तक निरंतर फैलती एक बहुआयामी यात्रा है। एक ओर दुनिया का सबसे पुराना आधुनिक लोकतंत्र और दूसरी ओर दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, दोनों के बीच यह संवाद कभी विचारों के आदान प्रदान के रूप में सामने आता है, कभी सांस्कृतिक उत्सवों में और कभी साझा वैज्ञानिक परियोजनाओं में।


अमेरिका में भारत इसीलिए केवल स्मृति नहीं, बल्कि एक जीवित अनुभव है। यह अनुभव हर उस स्थान पर मौजूद है जहां भारतीय मूल्य, विचार और रचनात्मकता अमेरिकी समाज के साथ संवाद करती है और उसे समृद्ध करती है। यही संवाद इस पारस्परिक सम्बन्ध को निरंतर गतिशील और भविष्य उन्मुख बनाता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

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