Sunday, 1 February 2026

नाटक कुंवारी नर्मदा

 

नाटक

कुंवारी नर्मदा .


लेखक .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

A1 , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८


नाटक में समाहित संदेश ... नारी अस्मिता व नदियो का सामाजिक महत्व


नाटक मंचन हेतु कलाकारो तथा संसाधनो के विवरण

१ सूत्रधार ... सात रंगो के परिधान में इंद्रधनुष

२ रानी .

३ पर्वत राज मेखल

४ आमात्य

५ राजकुमार सोनभद्र

६ नर्मदा

७ जुहिला


नांदी पाठ ...  

पुरुष स्वर ... हिन्दू संस्कृति में धार्मिक पर्यटन का बड़ा महत्व है , नदियो , पर्वतो , वनस्पतियों तक को देवता स्वरूप में कल्पना कर उनकी परिक्रमा का विधान हमारी संस्कृति की विशेषता है .नदियो का धार्मिक महत्व प्रतिपादित किया गया है , जिससे जन मन में जल के प्रति सदैव श्रद्धा भाव बना रहे . नर्मदा नदी की तो परिक्रमा की परम्परा है . इस प्रदक्षिणा यात्रा में जहाँ रहस्य, रोमांच और खतरे हैं वहीं प्रकृति से सानिध्य और अनुभवों का अद्भुत भंडार भी है। लगभग 1312 किलोमीटर के दोनों तटों पर निरंतर चलते हुए परिक्रमा की जाती है. गंगा को ज्ञान की, यमुना को भक्ति की, ब्रह्मपुत्र को तेज की , गोदावरी को ऐश्वर्य की, कृष्णा को कामना की और लुप्त सरस्वती नदी तक को आज भी विवेक के प्रतिष्ठान के लिए पूजा जाता है . नदियो का यही महत्व जीवन को परमार्थ से जोडता है .प्रकृति और मानव का गहरा संबंध नदियो की परिक्रमा से निरूपित होता है. नर्मदा को चिर कुंवारी नदी कहा जाता है , स्कंद पुराण के अनुसार नर्मदा के अविवाहित रहने का कारण उनका स्वाभिमान है जो स्त्री अस्मिता और स्वाभिमान का प्रतीक है.


मंच पर दृश्य

सूत्रधार .. .. कथा बताती है कि राजा मेखल ने अपनी अत्यंत रूपसी पुत्री नर्मदा के विवाह हेतु यह तय किया कि जो राजकुमार गुलबकावली के दुर्लभ पुष्प उनकी पुत्री के लिए लाएगा वे अपनी पुत्री का विवाह उसी के साथ संपन्न करेंगे। शोणभद्र गुलबकावली के फूल ले आए अत: उनसे राजकुमारी नर्मदा का विवाह तय हुआ. नर्मदा अब तक सोनभद्र से मिली भी नहीं थी , लेकिन उनके रूप, यौवन और पराक्रम की कथाएं सुनकर मन ही मन वे भी उसे चाहने लगी थीं . विवाह होने में समय शेष था . नर्मदा से यह विछोह सहा नही जा रहा था . उनने अपनी दासी जुहिला के हाथों प्रेम संदेश भेजने की सोची. जुहिला को ठिठोली सुझी, उसने राजकुमारी से उसके वस्त्राभूषण मांगे और नर्मदा के वेश में राजकुमार सोनभद्र से मिलने चल पड़ी . सोनभद्र के पास पहुंची तो राजकुमार सोनभद्र उसे ही नर्मदा समझने की भूल कर बैठे. सोनभद्र के प्रस्ताव से जुहिला की नीयत में भी खोट आ गया. वह राजकुमार के प्रणय-निवेदन को वह ठुकरा ना सकी.


नेपथ्य पुरुष स्वर ..इधर जुहिला के लौटने में होती देर से नर्मदा स्वयं सोनभद्र से मिलने चल पड़ी , वहां पहुंचने पर सोनभद्र और जुहिला को एकसाथ देखकर वह अपमान की भीषण आग में जल उठीं. तुरंत वहां से उल्टी दिशा में चल पड़ी फिर कभी ना लौटीं . सोनभद्र अपनी गलती पर पछताता रह गया , लेकिन स्वाभिमान और विद्रोह की प्रतीक नर्मदा चिर कुंवारी रही आईं .इस कथानक को इस नाट्य में प्रदर्शित किया गया है .  


रानी .. मेखल राज हमारी पुत्री नर्मदा के विवाह के संबंध में आपका क्या अभिमत है ?


पर्वत राज मेखल .. हे रानी , मैंनें सतपुड़ा के सघन जंगल में एक दुर्गम दिव्य स्थान देखा है , जहां पर्याप्त नमी है . वहां अद्भुत चमत्कारी औषधीय गुणो वाले गुलबकावली के पौधे होते हैं. इन पौधो के मदहोश करने वाली भीनी भीनी महक वाले श्वेत पुष्प इतने कोमल होते हैं कि उन्हें उस दुर्गम दिव्य स्थान से तोड़कर वैसे ही खिले हुये कोई साहसी , किन्तु कौशलवान धैर्यवान तेज पुरुष ही यहां तक सुरक्षित ला सकता है . अतः मैंने तय किया है कि जो राजकुमार गुलबकावली के वे दुर्लभ कोमल सुगंधित श्वेत पुष्प मेरी पुत्री नर्मदा के लिए यहां तक लेकर लाएगा ,मैं उस वीर , योग्य , क्षमतावान निपुण पुरुष से ही अपनी सुपुत्री नर्मदा का विवाह उसी राजकुमार के साथ संपन्न करूंगा .


रानी .. महाराज इस निश्चय को सुनाकर मुझे तो आपने और भी चिंता में डाल दिया . ऐसा कोई तीव्र धावी वीर होगा भी जो गुलबकावली के पुष्पगुच्छ यहां तक यथावत ला सके ?


आमात्य ... बाहर देखते हुये .. महाराज ! मुझे यह गुलबकावली की महक कहां से आ रही है ?


राजकुमार सोनभद्र ... गुलबकावली के श्वेत सुगंधित पुष्पों का गुच्छा लिये हुये राज सभा में प्रवेश करते हैं .


आमात्य ..अरे वाह महाराज ! ये तो राजकुमार सोनभद्र हैं . राजकुमार का स्वागत करते हुये ... स्वागतम् राजकुमार सोनभद्र ! पर्वत राज मेखल की सभा में आपका हार्दिक स्वागत है . आपने तो हमारे महाराज के प्रण की लाज रख ली , आप सर्वथा राजकुमारी नर्मदा के लिये सुयोग्य वर हैं .


पर्वत राज मेखल .. अरे वाह .. राजकुमार सोनभद्र ! आपने वह कर दिखाया है , जिसकी मुझे आप जैसे फुर्तीले , वीर , बुद्धिमान राजकुमार से ही अपेक्षा थी . आपने ये गुलबकावली के पुष्प लाकर मेरे हृदय में स्थान बना लिया है . आईये हमारा आतिथ्य स्वीकार कीजीये . आमात्य , राजकुमार शोण के आतिथ्य की समुचित व्यवस्थायें कीजीये और राजपुरोहित जी से कहिये कि वे हमारी नर्मदा के विवाह समारोह की तिथियां तय करें .


सूत्रधार ... विवाह होने में कुछ दिन शेष थे लेकिन नर्मदा से रहा ना गया उसने अपनी दासी जुहिला के हाथों राजकुमार शोण को प्रेम संदेश भेजने की सोची।


नर्मदा .. गंभीर स्वर में ... सखी जुहिला , मैने तुझे कभी अपनी दासी नही हमेशा सखि ही समझा है , इसलिये तुझे अपने धड़कते व्यग्र मन के हाल बताना चाहती हूं .


जुहिला ... शोखी से चहकते हुये .. तो ये बात है ! राजकुमारी जी को प्रेम रोग लागा है . मैं देख ही रही हूं नयनो से नींद गायब है .

 

नर्मदा .. धत .. वो बात नही है , पर मैं क्या करूं जुहिला , मुझे रह रह कर ख्याल आते हैं , वे कैसे होंगे ? मैने तो कभी उन्हें देखा तक नही है .. क्या तुम एक बार मेरा संदेश उन तक पहुंचा सकती हो ? विवाह में तो अभी बहुत दिन हैं , मैं विवाह पूर्व एक बार उनसे रूबरू मिलना चाहती हूं .


जुहिला .. न बाबा न , कही रानी साहिबा को मालूम हुआ तो फिर मेरी तो खैर ही न ली जायेगी .. आप मुझसे यह न करवायें . आप स्वयं ही राजकुमार से मिलने क्यो नही चली जाती .


नर्मदा .. अच्छा तू तो मेरा संदेशा तक ले जाने में डर रही है , और मैं स्वयं सीधे मिलने पहुंच जाऊं ? खूब कही सखी तुमने . बस इतना ही नेह है तेरा मेरे लिये .


जुहिला .. मेरा तो आपके लिये इतना नेह है कि मैं अपनी जान पर खेल जाऊं . पर मैं मानती हूं कि हमारी राजकुमारी नर्मदा अपने होने वाले पति से मिलने की हिम्मत तो रखती हैं .


नर्मदा ... इसे साहस नही दुस्साहस कहते हैं .


जुहिला .. अच्छा दुस्साहस ही सही , चलो एक ठिठोली करते हैं , आप मुझे अपने वस्त्र और आभूषण दीजीये , मैं राजकुमारी नर्मदा के वेश में मिलती हूं राजकुमार शोणभद्र से.

 

जुहिला , नर्मदा से उसका मुकुट व दुपट्टा लेती है , और आईने में स्वयं को निहारते , इठलाते हुये चल पड़ती है . सोनभद्र के पास पहुंचती है .


सूत्रधार ... राजकुमार उसे ही नर्मदा समझने की भूल कर बैठते हैं .... जुहिला की नियत में भी खोट आ जाता है वह राजकुमार के प्रणय-निवेदन को ठुकरा नहीं पाती और स्वयं जुहिला होने की सचाई छिपा कर शोण के अंकपाश में समा जाती है .

प्रकाश संयोजन से दृश्य परिवर्तन


राजकुमार सोनभद्र ... नर्मदा रूपी जुहिला को आता देखकर ..उत्फुल्लता पूर्वक स्वागत है नर्मदे ! स्वागत है मेकल सुते ! स्वागत है मेरी रेवा ! मैं स्वयं तुमसे मिलने को व्याकुल हूं किन्तु राजा मेखल की लोक मर्यादा ने मेरे पग रोक रखे थे . यह तुमने बहुत ही श्रेष्ठ कार्य किया जो तुम स्वयं मुझसे मिलने आ गईं . हे सुभगे .. आओ मेरा हृदय तुम्हें जाने कितनी बार बल्कि सच कहूं तो हर रात्रि तुम्हारी कल्पना कर तुम्हें अपने अंकपाश में ले चुका है , आज मेरा स्वप्न सत्य हुआ आओ हम एक बंधन में समा जायें .


नर्मदा बनी जुहिला .. शर्माते लजाते हुये शोण की बाहों में आ जाती है .


सूत्रधार ... इधर जुहिला की प्रतीक्षा करती नर्मदा के सब्र का बांध टूटने लगा . दासी जुहिला के आने में देरी हुई तो स्वयं नर्मदा सोनभद्र से मिलने चल पड़ीं . वहां पहुंचने पर सोनभद्र और जुहिला को वे एक साथ आबद्ध देखतीं है और अपमान की भीषण आग में जल उठती हैं . तुरंत वहां से उल्टी दिशा में चल पड़ी , सोनभद्र व जुहिला अपनी गलती पर पछताते ही रह गये किन्तु स्वाभिमान और विद्रोह की प्रतीक बनी नर्मदा पलट कर नहीं लौटीं .


नर्मदा ... मंच के दूसरे ओर से प्रवेश करती हैं और जुहिला व शोण को साथ बांहो में आबद्ध देखकर तेजी से लौट पड़ती हैं व आक्रोश में मंच से भीतर चली जाती हैं . तेज ड्रम म्यूजिक ... पर्दा गिरता है .


सूत्रधार .. ... इस प्रतीकात्मक लाक्षणिक कथा का भौगोलिक प्रमाण है. नर्मदा , सोन , और जुहिला तीनो का ही उद्गम अमरकंटक पर्वत का त्रिकूट है . किन्तु सोन व जुहिला का प्रवाह पूर्व दिशा की ओर है . धार्मिक मान्यता के अनुसार जुहिला को दूषित नदी माना जाता है . सोनभद्र को नदी नहीं वरन पुल्लिंग अर्थात नद के रूप में मान्यता प्राप्त है . भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि जुहिला व सोन का जैसीनगर में दशरथ घाट पर संगम है . जुहिला सोन में विलीन हो जाती है . कथा में रूठी राजकुमारी नर्मदा चिरकुंवारी , अकेली पश्चिम की ओर विपरीत दिशा में बहती हुई खम्बात की खाड़ी में समुद्र तक अकेले ही बहती है .



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