कहानी
विदाउट पेपर्स
विवेक रंजन श्रीवास्तव
लॉस एंजेल्स में उस सुबह की धूप, कार्लोस के छोटे से अपार्टमेंट के फर्श पर एक सुनहरी चौखट बना रही थी, मानो प्रकाश स्वयं उसके जीवन की स्थिरता की गवाही देने की असफल कोशिश कर रहा हो। वह अपनी मेज़ पर झुका, एक नए आर्किटेक्चरल ड्राफ्ट की मीनार को अंतिम स्पर्श दे रहा था, जब दरवाज़े पर हुई उस दस्तक ने उसके समूचे अस्तित्व की नींव हिला दी। "ICE, हियर, दरवाज़ा खोलो!" यह आवाज़ उसके सुरक्षित संसार में किसी विस्फोट की तरह गूँजी। बाहर खड़े वर्दी के साथ गन धारी अधिकारियों की पथराई निगाहें और ऑफिसर मिलर के हाथ में थमे वे ठंडे काग़ज़ कार्लोस के बीस साल के 'अमेरिकी जीवन' के लिए मृत्युदंड की तरह लग रहे थे।
उस ठिठके हुए पल में, कार्लोस का मन समय की परतों को चीरता हुआ बीस साल पीछे चला गया। उसे वह मकई के रंग का घर याद आया जहाँ खुशबू का एक अनोखा संगम हुआ करता था, उसकी माँ एलेना द्वारा फिलीपीन लुल्लाबी गाते हुए बनाया गया सोंधा 'पैन्सिट' और पिता एंटोनियो के मेक्सिकन 'कोरिदोस' की धुन पर लपेटे गए 'तमालेस'। दो अलग महाद्वीपों के सपने लॉस एंजेल्स की इसी धूप में मिलकर एक हुए थे। कार्लोस यहीं जन्मा, यहीं पला, पर बारह साल की उम्र की एक बरसाती रात ने सब उजाड़ दिया। एक कार दुर्घटना ने न केवल उसके माता-पिता को छीन लिया, बल्कि एक अनाथ किशोर की पहचान को उन सरकारी फाइलों के ढेर में दफन कर दिया, जहाँ भावनाएं दम तोड़ देती हैं और सिर्फ 'पेपर स्टेटस' जीवित रहता है।
वे दिन थे जब अमेरिका स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी के प्रिंसिपल्स पर खुले दिल से सबको अपना लेता था। तब न ही किसी सरकारी अधिकारी ने उसकी कोई मदद किसी पेपर वर्क में की , और न ही वर्षों उससे कभी कोई पूछताछ हुई । वह विदाउट पेपर्स ही ससम्मान बना रहा है।
सुबह स्कूल, दोपहर पुस्तकालय और शाम को पिता के पुराने रेस्तराँ में बर्तन धोते हुए उसने अपनी लकीरें खुद खींचीं। उसने आर्किटेक्चर की पढ़ाई की, अपनी प्रतिभा से ऊँची इमारतों के नक्शे बनाए और आज वह डाउनटाउन एलए की एक प्रतिष्ठित फर्म में अच्छा इंप्लॉई था। वह हर साल ईमानदारी से टैक्स भरता था, उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस भी था। वह इस शहर की हर गली, हर मोड़ और हर बदलते मौसम का गवाह था।
अफसोस, ICE मतलब यू.एस. इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट के कानून की आँखें अचानक जाग गई, अंधी आँखों के लिए कार्लोस सिर्फ एक 'अनडॉक्यूमेंटेड' केस था। एक ऐसा इंसान जिसे काग़ज़ों की कमी ने उसकी अपनी ही मिट्टी में पराया बना दिया था।
डिटेंशन सेंटर की सलाखों के पीछे बैठा कार्लोस अपनी आत्मा पर खिंचती लकीरों को महसूस कर रहा था। उसे बचपन की वह बात याद आई जब उसने अपनी मिश्रित पहचान पर सवाल किया था और पिता ने कहा था, "तुम फिलीपीनी भी हो, मेक्सिकन भी हो और अमेरिकन भी।" पर आज उसी त्रयी का एक हिस्सा उसे निर्दयता से नकार रहा था।
अदालत का मंजर किसी डरावने तमाशे जैसा था। उसके वकील की दलीलें, प्रोफेसर जेम्सन की गवाही और उसकी मित्र माया की सिसकियाँ , सब उस जज की बर्फीली खामोशी के सामने निरर्थक थीं।
"मैं सहानुभूति रखता हूँ," "पर कानून काग़ज़ों से चलता है, और आपके पास कोई कागजी दस्तावेज़ नहीं हैं जो आपको इस देश के नागरिक होने का हकदार बना सकें।"जज के शब्दों में कानून की रोबोटिक गूँज थी।
आई सी ई कानूनन गलत नहीं थी , जज साहब सही थे । सही है कि कार्लोस इस मिट्टी में रचा बसा बढ़ा था , लेकिन वह गलत था , उसके पास कागजी नागरिकता नहीं थी ।
विदाउट पेपर्स कार्लोस ने विदाई के उन तीस दिनों में अपने जीवन को एक छोटे से सूटकेस में समेट लिया। अपने अपार्टमेंट की हर चीज़ को अलविदा कहते हुए उसे लगा जैसे वह अपने अतीत को दफना रहा हो। वह पुराना गिटार जिस पर पिता ने उसे पहला सुर सिखाया था, और माँ का लाया वह रेशमी पारंपरिक कपड़ा, ये ही अब उसकी कुल यादगार संपत्ति थे। हवाईअड्डे की खिड़की से उसने आखिरी बार उस स्काईलाइन को देखा जिसे उसने कभी अपनी पहली स्केचबुक में उकेरा था। उसने फिलीपींस जाने का फैसला किया था, शायद माँ की जन्मभूमि उसे कोई कोना दे दे, पर उसका दिल चिल्लाकर कह रहा था कि उसकी मातृभूमि तो इसी हवा और इन्हीं सड़कों में बसी थी।
जहाज के टेक-ऑफ करते ही कार्लोस ने अपनी स्केचबुक खोली। अंतिम पन्ने पर उसने एक ऐसी इमारत का खाका खींचा था जिसकी कोई सरहद नहीं थी "संग्रहालय वैश्विक हृदय का।" नीचे उसने कांपते हाथों से लिखा।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
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