Monday, 2 February 2026

मुट्ठी बंद ख्वाहिशें .. कहानी

 वैश्विक कहानी 


मुट्ठी बंद ख्वाहिशें

विवेक रंजन श्रीवास्तव 

इन दिनों न्यूयार्क में 


लंदन की ठंडी, कोहरे से लिपटी सुबह थी। अनीता अपने स्टूडियो अपार्टमेंट की खिड़की से बाहर नीरस, धुँधली इमारतों को निहार रही थी। उसकी मुट्ठी बंद थी, और उसकी हथेली में एक छोटा-सा, कपड़े का मुलायम खरगोश का पंजा दबा हुआ था। 'रैबिट्स फुट' या 'क्रॉसफिश' कहलाने वाली यह चीज़, उसकी नानी द्वारा उसे दिया गया एक ताबीज था, जो कथित रूप से बदकिस्मती को दूर भगाता था। आज, दस साल बाद, अपने पहले सोलो आर्ट एक्जीबिशन के दिन, उसे इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत महसूस हो रही थी।


अनीता का सफर कोलकाता की तंग गलियों से शुरू हुआ था, जहाँ उसके पिता एक स्कूल टीचर थे और माँ एक साधारण गृहिणी। उनकी ज़िंदगी एक पूरी तरह प्रिडिक्टेबल रूटीन में बंधी हुई थी, लेकिन अनीता की ख्वाहिशें आकाश को छूने वाली थीं। वह चित्रकार बनना चाहती थी। एक ऐसी कलाकार, जिसके कैनवास पर भावनाओं के रंग दुनिया को दिखाई दें। लेकिन उस घर में, जहाँ 'सुरक्षित भविष्य' शब्द सबसे महत्वपूर्ण थे, कला एक शौक थी, करियर नहीं।


उसकी मुट्ठी में उस समय पहली बार एक ख्वाहिश ने जन्म लिया, जब उसने छिप-छिपकर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट्स में दाखिले के लिए फॉर्म भरा। स्वीकृति आई तो घर में एक भूचाल आ गया। "तुम्हारी उम्र हो गई है शादी की," उसकी माँ ने आँसू बहाते हुए कहा था। " फाइन आर्ट्स की ये सब बातें छोड़ो।" लेकिन अनीता अड़ी रही। उसकी मुट्ठी और भी कस गई। उसने न सिर्फ़ JNU में दाखिला लिया, बल्कि छात्रवृत्ति जीतकर लंदन के प्रतिष्ठित स्लेड स्कूल ऑफ फाइन आर्ट में पोस्ट-ग्रेजुएशन के लिए जगह बना ली।


लंदन आना एक और संघर्ष था। यहाँ की ठंडक सिर्फ़ मौसम की नहीं थी, बल्कि उसके परिवेश के लोगों के दिलों में भी उसे दिखती थी। उसे अपनी पहचान के सवालों से जूझना पड़ा। वह न तो पूरी तरह भारतीय रह गई थी, न ही ब्रिटिश बन पाई थी। उसकी कला में यह द्वंद्व साफ़ झलकता था। उसके कैनवास पर मधुबनी की लकीरें पिकासो के क्यूबिज़्म से टकराती थीं। कुछ प्रोफेसर उसे 'एक्जॉटिक' कहते, तो कुछ 'अनरेज़ोल्ड'। उसकी मुट्ठी, उसकी असुरक्षा और जिद का प्रतीक, मुट्ठी हमेशा बंद रहती।


एक दिन, एक आर्ट क्रिटिक, एडवर्ड, उसके स्टूडियो में उसे ढूंढता हुआ आया। बूढ़ा, लेकिन नज़रों में एक अद्भुत चमक। उसने अनीता के कैनवास देखे, जहाँ रंगों के ज़रिए एक अधूरेपन, एक तलाश का भाव था।

"तुम्हारी कला में एक दर्द है," एडवर्ड ने कहा, "लेकिन वह दर्द तुम्हारा अपना खुद का नहीं लगता। लगता है जैसे तुम अपने कैनवस पर दूसरों के दर्द की एकेडमिक नकल कर रही हो।"

अनीता चिढ़ गई। "आप क्या जानते हैं मेरे दर्द के बारे में?"

एडवर्ड ने मुस्कुराते हुए कहा, "शायद नहीं। लेकिन इतना जानता हूँ कि असली कला तब जन्म लेती है, जब तुम अपनी मुट्ठी खोल देते हो। डर लगता है कि सब कुछ छूट जाएगा, लेकिन उसी में मुक्ति है।"


यह बात अनीता के दिल में उतर गई। उसने अपने कैनवास के सामने बैठकर, पहली बार अपने दिल की सारी उलझनें, सारे डर, सारी ख्वाहिशें उड़ेल दीं। वह दिन उसकी कला का टर्निंग पॉइंट था।


और आज, उसकी सोलो एक्जीबिशन का दिन था। गैलरी में उसके कैनवास लगे थे, जो अब सिर्फ़ तकनीक का नमूना नहीं, बल्कि एक कलाकार की वैश्विक नजरिए वाली अभिव्यक्ति का आईना थे। एक पेंटिंग में एक लड़की की आकृति थी, जिसकी मुट्ठी बंद थी, और उसकी हथेली से रंगों की एक चमकदार लकीर निकल कर अनंत में विलीन हो रही थी। दूसरे कैनवास पर कोलकाता की गलियाँ और लंदन की सड़कें एक-दूसरे में समा रही थीं ।


भीड़ उमड़ पड़ी थी। आलोचक, कलाप्रेमी, संग्रहकर्ता। सब उसकी कला की सराहना कर रहे थे। तभी उसने देखा, दरवाज़े पर दो परिचित चेहरे खड़े हैं, उसके माता-पिता, हैरान और गर्व से भरे हुए। उसकी माँ की आँखों में आँसू थे। अनीता की साँस रुक सी गई। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि वे आएंगे।


उसकी माँ ने उसे गले लगाया और फुसफुसाया, "माफ़ करना बेटा, हम तुम्हारे सपनों को समझ नहीं पाए। तुमने जो किया, वह बहुत हिम्मत का काम है।"

उसके पिता ने बिना कुछ कहे, उसके सिर पर हाथ रख दिया। उनकी आशीष भरी चुप्पी में हज़ार शब्द छिपे थे।


अनीता ने महसूस किया कि उसकी मुट्ठी, जो सालों से ख्वाहिशों, डर और जिद से बंधी हुई थी, अब धीरे-धीरे खुल रही थी। उसने अपनी हथेली देखी। खरगोश का पंजा अब भी वहाँ था, लेकिन अब वह उसे कसकर नहीं पकड़े थी , बल्कि हल्के से थामे हुए थी।


एडवर्ड ने आकर कहा, "देखा, मैंने कहा था न? मुट्ठी खोलो, तो दुनिया तुम्हारी हथेली में आ जाती है।"


उस रात, जब गैलरी खाली हो गई, अनीता अकेली खड़ी थी। उसने अपनी एक पेंटिंग देखी, जहाँ उसकी बंद मुट्ठी से निकलती रंगीन लकीर अब एक विशाल, चमकते सूरज में तब्दील हो रही थी। उसका कैनवास दुनियां को समेटने को आतुर था । इंडो यूरोपियन फ्यूजन के उसके चित्र उसकी मौलिकता थे ।


उसे एहसास हुआ कि ख्वाहिशें कभी खत्म नहीं होतीं। वह अब भी और बहुत कुछ पाना चाहती थी। लेकिन अब वह डरती नहीं थी। क्योंकि उसे पता चल गया था कि ख्वाहिशों की असली ताकत उन्हें मुट्ठी में बंद करके नहीं, बल्कि उन्हें आज़ाद करके, हकीकत में बदलने में है।


मुट्ठी बंद ख्वाहिशें अब खुली हथेली के सपने बन चुकी थीं। और यही उसकी सबसे बड़ी जीत थी।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

+91 7000375798

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