'वंदे मातरम्' के 150 साल
नुक्कड़ नाटक: "वंदे मातरम्: एक गीत, एक क्रांति"
लेखक
विवेक रंजन श्रीवास्तव
(मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी से नाटक के लिए हरिकृष्ण प्रेमी सम्मान से सम्मानित प्रबुद्ध लेखक)
A 233, ओल्ड मिनाल रेजिडेंसी
जे के रोड, भोपाल 462023
मोबाइल+917000375798
इन दिनों न्यूयॉर्क में
पात्र:
· आर्या, विक्रम, मीरा: स्कूली बच्चे
· दादाजी: जानकार वरिष्ठ नागरिक
· सहायक कलाकार: बंकिम चंद्र चटर्जी, रवींद्रनाथ टैगोर, स्वतंत्रता सेनानियों की भूमिका में (पृष्ठभूमि में)
मैडम भीकाजी कामा की भूमिका में एक बच्ची
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दृश्य 1: आज का भारत – एक स्कूल प्रांगण
(तीन बच्चे – आर्या, विक्रम और मीरा – स्कूल यूनिफॉर्म में बैठे हैं। वे 'वंदे मातरम्' के बारे में प्रोजेक्ट पर चर्चा कर रहे हैं।)
आर्या: "दोस्तों, कल मेरे शिक्षक जी ने बताया कि 'वंदे मातरम्' की 150वीं जयंती है। यह गीत इतना खास क्यों है? यह तो राष्ट्रगान नहीं है।"
विक्रम: "हाँ, राष्ट्रगान तो 'जन-गण-मन' है। लेकिन शिक्षक जी ने कहा था कि 'वंदे मातरम्' को भी उतना ही सम्मान मिलता है। पर इसकी कहानी क्या है?"
मीरा: "मुझे पता है! यह गीत हमारी आज़ादी की लड़ाई का नारा बना था। चलो, हमारे पड़ोस के दादाजी से पूछते हैं। वे बहुत कुछ जानते हैं।"
(तीनों बच्चे मंच के दूसरी ओर बैठे दादाजी के पास जाते हैं।)
दादाजी: "अरे, तुम तीनों इतने गंभीर क्यों हो? क्या बात है?"
आर्या: "दादाजी, आज हम लोगों को 'वंदे मातरम्' के बारे में जानना है। "
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दृश्य 2:
(दादाजी बच्चों की ओर देखते हुए मुस्कुराते हैं। पीछे की ओर एक अभिनेता सफेद कपड़े में,( बंकिम चंद्र ) कलम और कागज लिए एक डेस्क पर बैठा दिखाई देता है।)
दादाजी: "सुनो, यह कहानी 1875 की है। बंगाल प्रांत के एक छोटे से शहर चिनसुरा में, एक बहुत बड़े लेखक रहते थे – बंकिम चंद्र चटर्जी। वे एक अंग्रेज अधिकारी के साथ झगड़े के बाद बहुत दुखी थे। एक दिन, हुगली नदी के किनारे टहलते हुए, उनके मन में यह विचार आया कि हमारी मातृभूमि तो एक देवी के समान है। उसी क्षण उन्होंने कागज पर इस गीत की पहली पंक्तियाँ लिखीं – 'वंदे मातरम्'।"
विक्रम: "वाह! तो यह कविता ऐसे बनी थी?"
दादाजी: "हाँ। फिर 1882 में उन्होंने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' में उपयोग किया । यह उपन्यास सन्यासियों के विद्रोह के बारे में है, जो मातृभूमि को देवी मानकर पूजा करते थे। इस उपन्यास के नायक 'संतान' इसी गीत को गाकर प्रेरणा लेते थे।"
मीरा: "लेकिन दादाजी, यह गीत तो अब राष्ट्रीय गीत है, यह आनंद मठ किताब से बाहर कैसे आया?"
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दृश्य 3:
(पृष्ठभूमि में, रवींद्रनाथ टैगोर जैसे दिखने वाला एक अभिनेता गाना गाता है। फिर दृश्य बदलकर 1905 का हो जाता है, जहाँ कुछ युवा हाथों में झंडे लिए "वंदे मातरम्" का नारा लगाते हुए मार्च करते दिखाई देते हैं।)
दादाजी: "अच्छा सवाल किया बेटा ! साल 1896 की बात है। महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने कलकत्ता में एक बड़े राजनीतिक सम्मेलन में इसे पहली बार गाया। लेकिन असली मोड़ 1905 में आया, जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन करने की कोशिश की।"
आर्या: आश्चर्य से "बंगाल का विभाजन?"
दादाजी: "हाँ। उस समय लोगों में बहुत गुस्सा था। 7 अगस्त 1905 को हज़ारों विद्यार्थियों ने कलकत्ता के टाउन हॉल की ओर मार्च किया और 'वंदे मातरम्' का नारा लगाया। यह पहली बार था जब यह एक राजनीतिक नारा बना। अंग्रेज सरकार डर गई और इसके गाने पर पाबंदी लगा दी। स्कूलों में इसे गाने वाले विद्यार्थियों पर जुर्माना किया गया।"
विक्रम: "पाबंदी? तो फिर लोगों ने इसे गाना बंद कर दिया होगा ?"
दादाजी: "बिल्कुल नहीं! उल्टा, यह गीत और भी ताकतवर बन गया। यह सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं रहा। 1906 में बरिसाल (अब बांग्लादेश) में हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के दस हज़ार से ज़्यादा लोगों ने 'वंदे मातरम्' के झंडे लहराते हुए एक जुलूस निकाला। 1908 में तमिलनाडु के तूतीकोरिन में हज़ारों मिल मज़दूर हड़ताल पर निकले और रात भर यही गीत गाते रहे। यह गीत हर तरफ़ राष्ट्र बोध के भाव के लिए फैल गया।"
मीरा: "क्या यह गीत विदेशों में भी गाया गया?"
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दृश्य 4:
(एक अभिनेत्री (मैडम भीकाजी कामा की भूमिका में) हाथ में एक झंडा लिए खड़ी है, जिस पर "वंदे मातरम्" लिखा है।)
दादाजी: "बिल्कुल! 1907 में, एक वीर महिला, मैडम भीकाजी कामा, ने जर्मनी के स्टटगार्ट शहर में पहली बार भारत का तिरंगा झंडा फहराया। और उस झंडे के बीच में 'वंदे मातरम्' शब्द लिखे थे। यह गीत लंदन, पेरिस , हर जगह भारतीय क्रांतिकारियों की प्रेरणा बनता गया।"
आर्या: "दादाजी, यह गीत तो बहुत लंबा है, क्या इस गीत के सभी हिस्से गाए जाते हैं?"
दादाजी: "नहीं बच्चो। यह एक महत्वपूर्ण बात है। इस गीत के बाद के श्लोकों में हिंदू देवी दुर्गा का ज़िक्र आता है। 1937 में, महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं ने सलाह दी कि सभी धर्मों के लोगों को साथ लाने के लिए, सिर्फ पहले दो श्लोक ही आधिकारिक तौर पर गाए जाएँ, क्योंकि वे सिर्फ मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता के बारे में हैं। इसलिए आज भी हम वही गाते हैं।"
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दृश्य 5:
(बच्चे दादाजी के चारों ओर बैठे हैं।)
विक्रम: "तो दादाजी, आज 2025 में इसकी 150वीं जयंती मनाने का क्या मतलब है?"
दादाजी: "इसका मतलब है, उस भावना को याद करना जो इस गीत में छिपी है । एकता, बलिदान और देशभक्ति का भाव। यह सिर्फ शब्द नहीं, भारत की 'सामूहिक चेतना' है। आज भी संसद का सत्र खत्म होने पर इसका वाद्य संस्करण बजाया जाता है। इस जयंती पर पूरे देश में सांस्कृतिक कार्यक्रम, डाक टिकट जारी किए जा रहे हैं ताकि तुम जैसे नए बच्चे, हर बदलती पीढ़ी इसके इतिहास से जुड़ सके।"
मीरा: "अब समझ आया! यह गीत हमें बताता है कि हमारी मातृभूमि कितनी सुंदर और शक्तिशाली है, और उसके लिए हम सब एक हैं।"
दादाजी: "बिल्कुल सही! अब तुम तीनों मिलकर इस गीत के पहले दो श्लोक गाओ, जैसे उन क्रांतिकारियों ने गाए थे।"
(तीनों बच्चे और दादाजी खड़े हो जाते हैं। पूरा मंच रोशनी से भर जाता है। सभी एक साथ 'वंदे मातरम्' गाते हैं।)
सभी एक साथ:
"वंदे मातरम्!
सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलाम् मातरम्॥
शुभ्रज्योत्स्नाम् पुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्
सुखदाम् वरदाम् मातरम्॥
वंदे मातरम्!"
(पर्दा गिरता है।)
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नाटक मंचन के लिए सुझाव
· कलाकार: कम से कम 5 बच्चे (3 मुख्य, 1 दादाजी, 1 बंकिम चंद्र/टैगोर की भूमिका के लिए)। अन्य समूह दृश्यों के लिए और बच्चे शामिल हो सकते हैं।
· वेशभूषा:
· बच्चे: सामान्य स्कूल यूनिफॉर्म।
· दादाजी: धोती-कुर्ता और चश्मा।
· बंकिम चंद्र चटर्जी: सफेद पोशाक, कलम-दवात।
· ऐतिहासिक दृश्य के कलाकार: साधारण सफेद कपड़े (सन्यासी/विद्यार्थी)।
· मंच सज्जा: सरल। एक तरफ एक बेंच (स्कूल प्रांगण), दूसरी तरफ एक आसन (दादाजी के लिए)। पृष्ठभूमि में 'वंदे मातरम् 150' लिखा हो या भारत का नक्शा हो।
· ध्वनि प्रभाव: नाटक के अंत में 'वंदे मातरम्' गीत का इंस्ट्रुमेंटल संस्करण बजाया जा सकता है।
· संवाद अभ्यास: बच्चों को संवाद सरल और स्वाभाविक ढंग से बोलने के लिए प्रोत्साहित करें। ऐतिहासिक तथ्यों पर ज़ोर दें।
इति
नुक्कड़ नाटक 'वंदे मातरम्'
लेखक
विवेक रंजन श्रीवास्तव
(मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी से नाटक के लिए हरिकृष्ण प्रेमी सम्मान से सम्मानित प्रबुद्ध लेखक)
A 233, ओल्ड मिनाल रेजिडेंसी
जे के रोड, भोपाल 462023
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इन दिनों न्यूयॉर्क में
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