साहित्य की आत्मा और सिनेमा का पर्दा
विवेक रंजन श्रीवास्तव
लेखकीय भावना के साथ न्याय या निर्देशक का व्यवसायिक रूपांतरण, एक बहुआयामी जटिल प्रश्न रहा है।
साहित्य और सिनेमा के बीच का रिश्ता हमेशा से एक ऐसे पुल की तरह रहा है जिसे पार तो बहुतों ने किया, पर उससे कम ही लोग दर्शकों के मन में वह छबि बना पाए, जो उस दर्शक ने एक पाठक के रूप में स्वयं अपने मन में उपन्यास पढ़कर बनाई थी। एक लेखक और साहित्य-अनुरागी होने के नाते, जब पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की 'उसने कहा था' जैसी कालजयी कहानी या महाकवि जयशंकर प्रसाद की 'कामायनी' के अंशों को फिल्मी पर्दे पर उतरते देखा , तो मन एक अनजानी सी रिक्तता और निराशा से भर जाता है। यह निराशा केवल एक दर्शक की नहीं, बल्कि उस पाठक की है जिसने उन शब्दों के 'प्राण' को अपनी कल्पना में जिया है।
सच तो यह है कि सिनेमा और साहित्य के लक्ष्य एक होकर भी अपनी प्रकृति में पूरी तरह भिन्न हैं। साहित्य जहाँ कल्पना की अनंत आकाशगंगा है,व्यावसायिकता से किंचित परे है ,वहीं सिनेमा उसे कैमरे के लेंस और स्क्रीन के फ्रेम में कैद कर देने वाली एक विवश कला है, जो बॉक्स ऑफिस से जुड़ा हुआ है। किताब में लेखकीय भावों का डिस्टार्शन नहीं होता क्योंकि उसकी प्रस्तुति में सिनेमा की तरह अभिनय , निर्देशन , संपादन , लोकेशन , फिल्मांकन, पार्श्व, संगीत , गायन वगैरह ढेर सारे लोग नहीं होते ।
जब प्रसाद जी लिखते हैं"तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन"तो वह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मानवीय चेतना और श्रद्धा का एक गहन दर्शन है। फिल्मी धुनों में ऐसे गीत 'शब्दनाद' और गांभीर्य को खो देते है , जो मूल कृति की आत्मा थी।
फिल्मकार की कोशिश उसे 'लोकप्रिय' और 'दृश्य-योग्य' बनाने की होती है, जबकि रचना पाठक से एक विशेष मानसिक तैयारी और एकांत की मांग करती है। बाज़ार और बॉक्स ऑफिस की ज़रूरतों ने अक्सर महान कृतियों के मौलिक सौंदर्य की बलि चढ़ाई है।
दशकों से फणीश्वरनाथ रेणु की 'तीसरी कसम' से लेकर अमृता प्रीतम की 'पिंजर', आर.के. नारायण की 'गाइड' और दोस्तोएवस्की की रचनाओं पर आधारित 'साँवरिया' जैसी तमाम साहित्य आधारित फिल्में बनती रही हैं। इनमें से कुछ ने आत्मा को छुआ, तो कुछ केवल बाहरी कलेवर तक सीमित रहीं। 'तीसरी कसम' में जो ग्रामीण संवेदना और हीरामन की निश्छलता उतर पाई, वह शायद इसलिए संभव हुई क्योंकि फिल्म के पीछे शैलेंद्र जैसा कवि-हृदय और रेणु की मिट्टी की समझ थी। इसके विपरीत, जब हम 'देवदास' या 'शतरंज के खिलाड़ी' जैसे रूपांतरणों को देखते हैं, तो द्वंद्व और गहरा हो जाता है। जहाँ सत्यजीत रे प्रेमचंद के व्यंग्य को दृश्यों में ढालने में सफल रहते हैं, वहीं आधुनिक सिनेमा अक्सर शरतचंद्र की उस आंतरिक दरिद्रता और आत्म-पीड़ा को मखमली लिबासों और भव्य झूमरों के नीचे दबा देता है।
फिल्मकार अक्सर कृति के कथानक (Plot) को तो पकड़ लेते हैं, पर उसके 'उद्देश्य' और उस सूक्ष्म सौंदर्य को चित्रित करने में चूक जाते हैं जिसे लेखक ने शब्दों के बीच की रिक्तियों में छिपाया होता है। दृश्य माध्यम की अपनी माँगें हैं। वहाँ संवादों की गति चाहिए, चकाचौंध चाहिए और एक निश्चित समय सीमा का अनुशासन भी। लेकिन साहित्य के पास वह विलासिता है कि वह पाठक को घंटों एक ही विचार या संवेदना में डूबा रहने दे। यही कारण है कि कुछ विरले उदाहरणों को छोड़ दें, तो अधिकांश फ़िल्मी रूपांतरण मूल कृति के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाते।
अंततः, साहित्य एक व्यक्तिगत यात्रा है और सिनेमा एक टीम प्रस्तुति का सामूहिक अनुभव। किसी भी कालजयी रचना का जो 'शब्दनाद' हमारी अंतरात्मा में गूँजता है, उसे पर्दे के कोलाहल में तलाशना शायद एक कठिन अपेक्षा है। सिनेमा साहित्य का अनुवाद करने की कोशिश तो कर सकता है, लेकिन वह उसकी गरिमा और गांभीर्य का पूर्ण विकल्प कभी नहीं बन सकता। जब भी कोई फिल्मकार किसी महान कृति को हाथ लगाता है, तो वह केवल एक कहानी नहीं उठाता, बल्कि वह उन हज़ारों पाठकों की स्मृतियों और भावनाओं को चुनौती देता है जिन्होंने उस कहानी को अपने भीतर जिया है। अफ़सोस कि अक्सर इस चुनौती में फिल्मकार अपनी तकनीक से तो जीत जाता है, पर संवेदना के धरातल पर प्रायः हार जाता है।
जिस तरह अनुवादक को मूल लेखक की आत्मा में परकाया प्रवेश कर उसके भाव पकड़ने होते हैं, उससे भी अधिक दुष्कर कार्य साहित्य का फिल्मांकन है, क्योंकि यहां सारी टीम को रचना की आत्मा में परकाया प्रवेश करना वांछित होता है।
— विवेक रंजन श्रीवास्तव
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