Monday, 20 April 2026

श्री परमानंद सिन्हा की काव्य कृति आकांक्षा की भूमिका

 भूमिका


साहित्य में काव्य की सार्थकता केवल शब्दों के चयन या तुकबंदी में नहीं, बल्कि उन जीवन मूल्यों में निहित होती है जो समाज को संबल प्रदान करते हैं। कविता , अभिव्यक्ति की सर्वाधिक प्राचीन विधा है।  कंठस्थ रहने में सुगमता एवं साहित्य के कलात्मक सौंदर्य के चलते बरसों से काव्य,  साहित्य के शिखर पर है। एक रचनाकार जब अपनी अनुभूतियों को कागज़ पर उतारता है, तो वह स्वयं को व्यक्त ही नहीं करता, बल्कि अपने युग की धड़कनों को स्वर देता है।

 'आकांक्षा' काव्य संग्रह इसी उदात्त परंपरा का निर्वहन करता है, जहाँ कविता मनोरंजन की परिधि से बाहर निकलकर आत्म-चिंतन और नैतिक बोध का माध्यम बनती है। काव्य मूल्यों की कसौटी पर यह संग्रह इसलिए खरा उतरता है क्योंकि इसमें सत्य की कटुता और संवेदना की कोमलता का अद्भुत संतुलन है। जब मैं इन कविताओं से गुजरा  तो मैंने पाया कि रचनाकार मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज रायपुर के सहपाठी , वहां मेरे प्रारंभिक साहित्यिक सफर के सहयात्री भाई परमानंद सिन्हा जी ने जीवन के प्रति एक सकारात्मक और मूल्यपरक दृष्टिकोण अपनाया है, जो आज के अस्थिर परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक तथा महत्वपूर्ण है।


इस संग्रह की समालोचना करते हुए यह स्पष्ट होता है कि कवि ने अपनी रचनाओं में भाव और यथार्थ का जो शाश्वत तथ्यों का ताना-बना बुना है, वह अत्यंत सुदृढ़ है। उदाहरण के लिए, 


सुगंधित फूलों के संग,

काटें भी तो बेशुमार है।

खुशियों की नदी बहती है,

पर दुख भी तो अपार है।


 इसी प्रकार,  कवि की लेखनी मर्म स्पर्शी हो जाती है,  वे लिखते हैं


अंधियारे को देखा पिघलते हुये, 

रवि की किरणों को मचलते हुये। 

शीतल सुखद थी, सुबह की बयार, 

पंछी उड़ चले, चह चहाते हुये। 


इन पंक्तियों में छायावादी गीत चेतना परिलक्षित होती है। जो प्रकृति परिवेश का शाब्दिक चित्र बनाती है।


एक मिजाज के गीत एक खंड में संजोकर उन्होंने पाठकों के लिए अलग अलग गुलदस्ते एक साथ प्रस्तुत किए हैं। 

लंबे अंतराल में मनोभावों को शब्दों में प्रस्तुत कविताओं को संग्रह के अंतिम स्वरूप में प्रकाशित कर एक विशद साहित्यिक , संपादन का उनका प्रयास स्तुत्य है। 


संग्रह के काव्य विधान, शैली और भाषा की बात करें तो इसमें एक सहज प्रवाह और माधुर्य है जो पाठक को अंत तक बांधे रखता है। कवि ने क्लिष्ट और बोझिल शब्दावली के स्थान पर ऐसी सुगम भाषा का प्रयोग किया है जो जनमानस से सीधे संवाद करती है। उनकी शैली वर्णनात्मक होते हुए भी प्रतीकों और बिंबों से इस प्रकार सजी हुई है कि कविता पढ़ते समय दृश्य जीवंत हो उठते हैं। 

यहाँ उपमा और रूपक अलंकारों का प्रयोग किसी कृत्रिम साज-सज्जा की तरह सायास नहीं, बल्कि भावों की तीव्रता बढ़ाने के लिए स्वाभाविक रूप से हुआ है। 

छंदों की गति और लय  में एक आंतरिक संगीत है, जो इन रचनाओं को केवल पढ़ने योग्य ही नहीं, बल्कि गुनगुनाने योग्य भी बनाता है। शिल्प और कथ्य का यह सामंजस्य श्री परमानंद सिन्हा जी के काव्य संग्रह 'आकांक्षा' को एक विशिष्ट साहित्यिक पहचान दिलाता है।

अंततः, 'आकांक्षा' काव्य संग्रह कवि की आंतरिक यात्रा और उनके जीवन की  अनुभूतियों का वह निचोड़ है जो समाज के लिए उनकी अप्रतिम भेंट सिद्ध होगा । इस काव्य कृति के माध्यम से कवि ने अपनी रचनात्मकता का जो परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। मैं रचनाकार से यह मंगलमयी आशा करता हूँ कि भविष्य में भी उनकी लेखनी इसी प्रकार सा+हित के  रचनात्मक लोक कल्याणी मार्ग पर प्रशस्त रहेगी। पाठकों को उनसे यह अपेक्षा रहेगी कि वे मानवीय संवेदनाओं के और भी सूक्ष्म धरातलों को अपनी लेखनी से स्पर्श करेंगे और समाज में व्याप्त जड़ता को तोड़ने के लिए निरंतर सृजनरत रहेंगे।  यह साहित्यिक यात्रा निरंतर पल्लवित हो और 'आकांक्षा' पाठकों के हृदय में अपना स्थायी स्थान बनाए, यही मेरी हार्दिक मनोकामना है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

वरिष्ठ समालोचक, व्यंग्यकार 

भोपाल

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