Thursday, 23 April 2026

चार प्रेम कविताएं

 चार प्रेम कविताएं 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

A 233, old Minal residency, j k road Bhopal 462023

apaniabhivyakti@gmail.com

Mob 7000375798



1


शीर्षक 


एक कविता 

एक नज़्म 

एक गीत 

एक ग़ज़ल हो तुम 

तरन्नुम में ,

और मैं 

महज कुछ शब्द 

बिखरे हुए,

जिन्हें बना दिया है 

नियति ने 

तुम्हारा शीर्षक।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 2. 

खजुराहो के प्रस्तर


खजुराहो के मन्दिर शिखरों से

जब धूप हौले से फिसलती है नीचे,

और उन आलिंगनबद्ध देहों को सहलाती है

तो निर्जीव पाषाण प्रतिमाओ के बीच मौन संवाद समझ पाता हूं मैं, 

हरे लान पर बैठे हुए ।

मेरे और तुम्हारे बीच के 

वे 'अनकहे चैट्स',

जो हमने टाइप तो किए, 

पर कभी 'सेंड' ही नहीं कर पाए, 

शब्द वे, जो ड्राफ्ट ही रह गए ।

लगता है वे सब इन दीवारों की 

प्रस्तर मूर्तियों में सदियों से जाग रहे हैं।

मूर्तिकार ने इनकी आँखों में 

संकोच नहीं , 

उकेरा है शाश्वत निर्मल प्रेम।

हमारी तरह 'ब्लू टिक' का 

इंतज़ार नहीं है, इन्हें

और न ही 'लास्ट सीन' के समय 

को देख कोई मनगढ़ंत अनुमान ।

बस प्रेम का होना ही

शाश्वत सत्य है यहां।

देखता हूँ इन आलिंगनबद्ध 

युगल प्रस्तर मूर्तियों को

तो मुझे अपनी रग रग में

तुम्हारी छुअन की ,पहली

सिहरन का अहसास होता है, 

जिसे इस 'फास्ट-फॉरवर्ड' भागदौड़ में

शायद हम बहुत पीछे कहीं भुला आए हैं।

ये मौन मूर्तियाँ कर रही हैं 

उद्घोषणा सदियों से 

"प्रेम पाप नहीं",

सृष्टि की किताब में सबसे सुंदर कविता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 



 3. 

कोणार्क का चक्र 


सूर्य मंदिर में 

कोणार्क के उस पहिए पर 

समय ठहरा हुआ है,

उन आलिंगनबद्ध जोड़ों के लिए

पत्थरों की वे नृत्य निमग्न मुद्राएं, 

वे बाहुपाश, आगोशी

सांसों का पत्थर में बदल जाना

जैसे किसी बहुत पुरानी 

'प्लेलिस्ट' का सबसे प्यारा गाना

अनवरत 'लूप' पर बज रहा हो।

हम रिश्तों को 'अपडेट' करते हैं, 

सॉफ्टवेयर के 'वर्जन' बदलते हैं,

पर वे प्रस्तर शिल्प

चिर नवीन हैं, 

उतने ही पवित्र जितने कल थे।

हाँ ! देह का विसर्जन नहीं, 

देह का उत्सव है , कोणार्क शिल्प।

लगता है , तुम्हारा मेरा मिलना भी

किसी ऐसे ही प्राचीन मंदिर की योजना का कोई हिस्सा था।

खंडहर नहीं हैं, गवाह हैं, ये ,

जब दुनिया केवल शोर से भर जाएगी,

जब प्रेम, प्रदर्शन बस रह जाएगा 

एक 'इमोजी' तक सिमट जाएगा,

तब भी ये पत्थर कहते रहेंगे खुली सभा में 

"प्रेम देह से होकर 

आत्मा तक जाने वाला अनंत 

चक्र है।"


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 4. 

भोरमदेव की छांव 


मैकल पर्वत श्रृंखला के साए में, 

भोरमदेव की उन दीवारों पर

उकेरी गई ,मिथुन मूर्तियाँ , 

मुझे हमारी ,

पहली 'कॉफी डेट' की याद दिलाती हैं।

वही झिझक, 

वही नसों में दौड़ती बिजली,

और वही मौन

जो बिन बोले सब कुछ कह देता था। रेतीले पत्थर की प्रतिमाएं 

नहीं हैं बस शिल्प के आभूषणों से सजी धजी, ये सुसज्जित हैं 

प्रेम के शाश्वत संदेश से।

इनके चेहरों पर जो दीप्ति है,

वह 'इंस्टाग्राम फिल्टर' की 

मोहताज नहीं है।

वह लावण्य मौलिक है ।

सोचता हूँ,

हज़ारों साल पहले उस शिल्पी ने 

जब एक अनगढ़ पत्थर पर 

छेनी चलाई होगी,

तो आख़िर कैसे उकेरी होगी यह 

बिल्कुल तुम सी सुगठित नव यौवना 

तुम जरूर रही होगी, तब भी 

और देखा होगा उस शिल्पी ने तुम्हें 

कहीं लुक छिप कर ।

जरूर मैं ही रहा होऊंगा 

वह कलाकार 

क्योंकि 

तुमने ही तो दिया है 

तुम्हारे सर्वस्व पर सिर्फ मुझे अधिकार ।

पुनर्जन्म पर भरोसा हो रहा है मुझे 

भोरमदेव के परिसर में यह 

मूरत देखकर ।

पत्थर अमर हो गए हैं ये 

प्रेम करते हुए,

क्यों हम जीते-जी पत्थर हुए जा रहे हैं।

छोड़ो भी अब नाराजगी

आओ, हम भी एकाकर हो जाएँ,

प्रेम में समर्पण, हारना नहीं है। 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

A 233, old Minal residency, j k road Bhopal 462023

apaniabhivyakti@gmail.com

Mob 7000375798


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 संक्षिप्त परिचय ...

 विवेक रंजन श्रीवास्तव ,वरिष्ठ व्यंग्यकार, स्वतंत्र लेखक ( हिंदी व अंग्रेजी )


२८ जुलाई १९५९ में मण्डला के एक साहित्यिक परिवार में जन्म .

माँ ... स्व दयावती श्रीवास्तव ...सेवा निवृत प्राचार्या

पिता ...स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध ... वरिष्ठ साहित्यकार, कवि अनुवादक

पत्नी ... श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव ... स्वतंत्र लेखिका


इंजीनियरिंग की पोस्ट ग्रेडुएट शिक्षा के बाद विद्युत मण्डल में शासकीय सेवा से मुख्य अभियंता के रूप में सेवा निवृत्त. 


 परमाणु बिजली घर चुटका जिला मण्डला के प्रारंभिक सर्वेक्षण से स्वीकृति तक , अनेक उल्लेखनीय लघु पन बिजली परियोजनाओ , १३२ व ३३ कि वो उपकेंद्रो , केंद्रीय प्रशिक्षण केंद्र जबलपुर ISO प्रमाणित आदि के निर्माण का तकनीकी गौरव .


किताबें 

बिजली का बदलता परिदृश्य ,

 जल जंगल जमीन आदि तकनीकी किताबें . 

हिन्दी में वैज्ञानिक विषयों पर निरंतर लेखन ,

2005 से हिन्दी ब्लागिंग .


१९९२ में नई कविताओ की पहली किताब आक्रोश तार सप्तक अर्ध शती समारोह में भोपाल मे विमोचित , इस पुस्तक को दिव्य काव्य अलंकरण मिला ..


व्यंग्य की किताबें रामभरोसे , 

कौआ कान ले गया , 

मेरे प्रिय व्यंग्य , 

धन्नो बसंती और बसंत , बकवास काम की , 

जय हो भ्रष्टाचार की ,

समस्या का पंजीकरण , खटर पटर, 

चूं चूं की खोज

 व अन्य प्रिंट व किंडल आदि प्लेटफार्म पर .


समस्या का समाधान का अंग्रेजी अनुवाद किंडल पर सुलभ


मिली भगत ,

चटपटे शरारे एवं लाकडाउन नाम से सँयुक्त वैश्विक व्यंग्य संग्रहों का संपादन .


सामूहिक संग्रहों में भागीदारी 

व्यंग्य के नवल स्वर , आलोक पौराणिक व्यंग्य का ए टी एम ,

 बता दूं क्या , 

अब तक 75 , 

इक्कीसवीं सदी के 131 श्रेष्ठ व्यंग्यकार , 

251 श्रेष्ठ व्यंग्यकार , निभा 

व्यंग्य के रंग 

आदि अनेक संग्रहो में सहभागिता


भगत सिंह ,

उधमसिंह ,

रानी दुर्गावती 

पहला आदिवासी रॉबिनहुड टंट्या भील 

आदि महान विभूतियों,

मध्यप्रदेश की पुरातात्विक धरोहर

 पर चर्चित किताबें लिखीं हैं


नाटक की पुस्तकें... जलनाद नाटक संग्रह विश्ववाणी से राष्ट्रिय स्तर पर पुरस्कृत , 

हिन्दोस्तां हमारा , 

जादू शिक्षा का नाटक संग्रह चर्चित व म. प्र. साहित्य अकादमी से सम्मानित, तथा पुरस्कृत


पाठक मंच के माध्यम से नियमित पुस्तक समीक्षक

https://e-abhivyakti.com के साहित्य सम्पादक


म प्र साहित्य अकादमी ,

पाथेय 

मंथन ,

वर्तिका , 

हिन्दी साहित्य सम्मेलन , तुलसी साहित्य अकादमी व अनेक साहित्यिक़ संस्थाओं , से सम्मानित


 सामाजिक लेखन के लिये रेड एण्ड व्हाईट सम्मान से राज्यपाल से सम्मानित .


वर्तिका पंजीकृत साहित्यिक सामाजिक संस्था के राष्ट्रीय संयोजक


टी वी ,

रेडियो , 

यू ट्यूब , 

पत्र पत्रिकाओ में निरंतर प्रकाशन .

वैश्विक एक्सपोजर एवं भागीदारी

ब्लॉग

http://vivekkevyang.blogspot.com व अन्य ब्लॉग


संपर्क...

ए २३३ , ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी , भोपाल , म प्र , ४६२०२३

मो ७०००३७५७९८

apaniabhivyakti@gmail.com

इन दिनों लंदन प्रवास पर हैं

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