प्रस्तावना
काव्य अंजली
जीवन भी एक धातु की तरह है, जिसे अनुभवों की भट्टी में तपना पड़ता है ताकि वह अपने शुद्धतम और चमकदार स्वरूप में हो । मेरे प्रिय मित्र और वरिष्ठ मेटलर्जिकल इंजीनियर, परमानन्द सिन्हा जी ने ताउम्र धातुओं के गुणधर्मों को समझा और उन्हें वांछित आकार दिया। 'काव्य अंजली' के रूप में वे हमारे सामने एक 'भाव-अभियंता' के रूप में प्रस्तुत हैं । उन्होंने शब्दों का ऐसा एलाय तैयार किया है, जो कठोर सत्य की शक्ति भी रखता है और कविता की चमक भी।
एक मेटलर्जिस्ट के पास वह पारखी नज़र होती है जो अयस्क के भीतर छिपे मूल्यवान तत्व को पहचान लेती है। सिन्हा जी ने समाज और जीवन की आपाधापी के बीच से उन बारीक भावनाओं को चुना है, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। उनकी कविताएँ केवल पंक्तियाँ नहीं, बल्कि उनके जीवन के अनुभवों की 'कास्टिंग' और 'फोर्जिंग' हैं।
इस संग्रह में उन्होंने कुशलता से
रिश्तों की डक्टिलिटी , मतलब पुस्तक की कुछ रचनाओं में वे अपने उन मित्रों की बात करते हैं जो उम्र के साठ-पैठस वाले पड़ाव पर हैं। वे यहाँ समझाते हैं कि कैसे बढ़ती उम्र के साथ रिश्तों में लचीलापन और मज़बूती बनी रहनी चाहिए। पुरुषों के लिए मित्रों के साथ को 'मायका' कहना, उनकी मौलिक सोच का उदाहरण है।
जब वे व्यक्ति के आंतरिक आत्मविश्वास और भाषा के प्रति प्रेम को रेखांकित करते हैं। तब वे स्पष्ट हैं कि जीवन व्यापार नहीं, बल्कि एक मधुर साज है, जिसे सही 'ट्यूनिंग' की आवश्यकता होती है।
उनकी लेखनी में स्टील सी वह मज़बूती दिखती है जो हर राष्ट्रभक्त हृदय में होनी चाहिए। सावरकर, सुभाष और आज़ाद जैसे महानायकों का स्मरण करते हुए वे देश की एकता को उस फौलाद की तरह देखते हैं जिसे कोई तोड़ नहीं सकता।
परमानन्द जी ने अपनी इस कृति में भावनाओं का 'हीट ट्रीटमेंट' इतनी कुशलता से किया है कि हर कविता पाठक के मन को छूकर उसे वैचारिक आनंद देती है। वे स्वयं कहते हैं कि "अपना विवेक सदा साथ रहे," और यही विवेक उनकी रचनाओं को एक विशेष 'फिनिशिंग' देता है।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि 'काव्य अंजली' का यह साहित्यिक संकलन पाठकों के अंतर्मन को वैसे ही आलोकित करेगा जैसे भट्टी से निकला हुआ ज्योतिर्मय स्वर्ण दीप । संग्रह में एक सौ कविताओं को
धर्म और संस्कृति,
समाज और देश,
साहित्य और नायक तथा
मित्रता और माधुर्य के
चार खंडों में अलग अलग संग्रहित किया गया है। इस अभिनव प्रयास के लिए परमानन्द सिन्हा जी को कोटि-कोटि बधाई।
— विवेक रंजन श्रीवास्तव
वरिष्ठ समालोचक , व्यंग्यकार
ई अभिव्यक्ति पोर्टल के मानसेवी हिंदी संपादक
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