अभियंता बंधु 2025
सम्पादकीय
भारतीय अभियांत्रिकी परंपरा से वर्तमान
“योगः कर्मसु कौशलम्”
अर्थात कर्म में कौशल ही योग है
कभी कभी इतिहास स्वयं को रचने के लिए मनुष्य का सहारा नहीं लेता, बल्कि मनुष्य को अपने साधन के रूप में प्रयोग करता है। भारत की सभ्यता ने यही किया है। जब मानव ने मिट्टी को आकार देना सीखा, तो भारत ने उससे मंदिर गढ़े। जब जल को नियंत्रित करने की आवश्यकता हुई, तो भारत ने नदियों के तट पर सिंचाई की व्यवस्था बनाई। जब पत्थरों से दीवारें बनीं, तो भारत ने उन दीवारों में नक्काशी से कविता लिख दी। यह वह भूमि है जहाँ अभियंत्रण केवल तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन था। यहाँ अभियंता केवल निर्माता नहीं, भगवान विश्वकर्मा के स्वरूप में सृष्टा माने गए।
मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की विकसित सभ्यता आज भी हमें यह सिखाती हैं कि स्वच्छता और जल-प्रबंधन केवल शहरी सुविधा नहीं, बल्कि सभ्यता की रीढ़ हैं। सिंधु घाटी का नगर नियोजन, समकोणीय गलियाँ, कुएँ, स्नानागार , ये सब हमारे पूर्वज अभियंताओं की प्रतिभा का जीवंत प्रमाण हैं। प्राचीन ग्रंथों में भगवान विश्वकर्मा का उल्लेख उसी गौरव के साथ हुआ है जिस गौरव से कवि वाल्मीकि और ऋषि व्यास का। हर वर्ष हमारी संस्कृति में हम इंजीनियरिंग संस्थानों में विश्वकर्मा पूजन के आयोजन करते आए हैं।भारतीय अभियंत्रण सदैव कला, विज्ञान और आध्यात्म के संगम पर खड़ा रहा है। हमारे मंदिरों की स्थापत्य कला, लोहे के खंभे जो सदियों से जंगरहित खड़े हैं, या फिर अजन्ता की गुफाओं में शिल्प-सौंदर्य , सब यह बताते हैं कि हमारे अभियंता केवल साधन बनाने वाले नहीं, जन आत्मा में बसने वाले कलाकार थे।
समय बदला, औपनिवेशिक युग आया। इंजीनियरिंग का अर्थ केवल गणितीय संरचना तक सीमित कर दिया गया। भारत में अभियंत्रण को अंग्रेज़ी पाठशालाओं के माध्यम से नए रूप में ढाला गया। किंतु भारतीय मस्तिष्क अपनी जड़ों से कट नहीं सका। स्वतंत्रता संग्राम के साथ ही एक नए अभियंत्रण युग का आरंभ हुआ , जो आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। रेलवे, सिंचाई परियोजनाएँ, बांध, इस्पात संयंत्र, औद्योगिक नगर , ये सब नवभारत की नींव थे। पंचवर्षीय योजनाओं में अभियंताओं का स्थान उतना ही महत्वपूर्ण था जितना किसी कवि का संस्कृति के निर्माण में होता है। नेहरूजी ने कहा था , बड़े बांध आधुनिक भारत के मंदिर हैं। यह कथन भारतीय अभियंताओं के लिए एक आदरांजलि था।
आज भारतीय अभियंता दुनियां के प्रायः प्रत्येक देश में कही न कही महत्वपूर्ण भूमिकाओं में सक्रिय हैं।
1920 में ‘इंस्टिट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया)’ की स्थापना हुई। कोलकाता मुख्यालय से यह वैधानिक संस्था भारतीय अभियंताओं के लिए एक ऐसा साझा मंच बनी, जहाँ तकनीक और चिंतन दोनों का आदान-प्रदान हुआ। उस समय भारत गुलाम था, फिर भी तकनीकी विचार स्वतंत्र थे। इस संस्था ने इंजीनियरिंग के विविध क्षेत्रों सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, केमिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, माइनिंग, एयरोनॉटिकल, और अनेक शाखाओं को एक सूत्र में पिरोया। यह वह संस्था है जिसने तकनीक को केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाया।
भारत में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में तकनीकी लेखन का बड़ा संकट रहा है। ज्ञान यदि भाषा की दीवारों में कैद हो जाए, तो वह सीमित हो जाता है। इसी कमी को पहचानते हुए ‘इंस्टिट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया)’ ने एक सराहनीय पहल की है । तकनीकी लेखन को भारतीय भाषाओं में प्रतिष्ठित करने की यह पहल महत्वपूर्ण है। यही प्रयास ‘अभियंता बंधु’ जैसी वार्षिकी के रूप में साकार हुआ। अभियंता बंधु केवल एक पत्रिका नहीं, तकनीक की अभिव्यक्ति का एक भाषाई आंदोलन है । भारतीय भाषाओं में तकनीकी विचार और अनुभव साझा करने का सकारात्मक आंदोलन।
पूर्व में संस्था द्वारा हिंदी जर्नल अलग से प्रकाशित किया जाता था। अब उसे ‘अभियंता बंधु’ के एकीकृत रूप में विकसित किया गया है, जो अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी और देश की अनेक भाषाओं में अभियंत्रण ज्ञान के प्रसार का माध्यम बन चुका है। यह रूपांतरण केवल स्वरूप परिवर्तन नहीं, बल्कि दृष्टिकोण परिवर्तन है। यह उस भारत का प्रतीक है जो बहुभाषिक होते हुए भी एक विचार में बंधा हुआ है ‘ज्ञान सभी के लिए’।
हर वर्ष यह दायित्व देश के विभिन्न केंद्रों को सौंपा जाता है। इस वर्ष यह जिम्मेदारी मध्यप्रदेश राज्य केंद्र को मिली है। यह सौभाग्य भी है और जिम्मेदारी भी। भोपाल केंद्र ने इस दायित्व को अभिनव दृष्टि से निभाया है। केवल लेख संग्रह नहीं किया गया, बल्कि भाषा, क्षेत्र और विचार की विविधता को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास किया गया है। संपादक मंडल में देश के विभिन्न अंचलों, भिन्न भिन्न भाषा भाषी , भिन्न संकाय के अभियंताओं को सम्मिलित कर एक भारत श्रेष्ठ भारत की भावना को साकार करता संपादक मंडल बनाया गया है।
महामहिम राज्यपाल जी, संस्थान के राष्ट्रीय पदाधिकारीगण, वरिष्ठ अभियंता, शिक्षाविद और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के शुभकामना संदेश इस अंक की गरिमा बढ़ाते हैं। सिविल, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल, कंप्यूटर, एनवायरनमेंटल, और मटेरियल साइंस जैसे विषयों पर अद्यतन शोधपरक लेख इसमें समाहित हैं। प्रत्येक लेख न केवल तकनीकी दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि भारतीय अभियंता की सामाजिक जिम्मेदारी को भी प्रतिध्वनित करता है।
आज का अभियंता केवल मशीनों का निर्माता नहीं, समाज का मार्गदर्शक है। डिजिटल इंडिया, स्मार्ट सिटी, ग्रीन एनर्जी, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे नए क्षेत्रों में अभियंत्रण का स्वरूप बदला है, पर उसका लक्ष्य वही है — मानव जीवन को सहज, सुरक्षित और श्रेष्ठ बनाना। तकनीक अब केवल सुविधा नहीं, उत्तरदायित्व बन चुकी है। जिस युग में पर्यावरणीय संतुलन, सतत विकास और कार्बन न्यूट्रैलिटी जैसे शब्द सामान्य चर्चा का विषय बन गए हैं, उस युग में अभियंताओं का योगदान निर्णायक है।
भारत आज चंद्रयान, अदित्य, जीआईएस, और स्वदेशी ड्रोन तकनीक के साथ अंतरिक्ष से लेकर पृथ्वी की गहराइयों तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। यह केवल तकनीकी वैज्ञानिक उपलब्धियाँ नहीं हैं, यह अभियंत्रण की आत्मा का उत्कर्ष है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे अभियानों में अभियंता अग्रिम पंक्ति के योद्धा हैं।
आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी में अभियंता केवल उपकरणों तक सीमित न रहें, बल्कि समाज की नब्ज को पहचानें। जल, ऊर्जा और कचरे का प्रबंधन केवल योजनाओं का विषय नहीं, जीवन की आवश्यकता है। अभियंत्रण यदि संवेदना से जुड़ जाए तो वह चमत्कार कर सकता है। भोपाल केंद्र इस अंक के माध्यम से यही संदेश देना चाहता है , कि तकनीक का उद्देश्य केवल प्रगति नहीं, बल्कि समन्वित विकास और मानवता है।
अभियंता बंधु का यह अंक विविधता में एकता का प्रतिबिंब है। हिंदी, मराठी, बंगाली, तेलुगु, तमिल, गुजराती, उर्दू, ओडिया, पंजाबी हर भाषा में रचित विचार एक ही स्वर में गूंजते हैं ‘भारत का अभियंता जागृत है’। यह वह भाव है जो तकनीकी सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्र-निर्माण की प्रेरणा देता है।
संस्थान का यह प्रयास इस तथ्य का प्रमाण है कि ज्ञान जब अपनी मातृभाषा में व्यक्त होता है, तो वह जन-जन तक पहुँचता है। इंजीनियरिंग प्रयोगशालाओं से निकलकर जब सामान्य जीवन से जुड़ती है, तभी वह सार्थक होती है। यही भारतीय अभियंत्रण की आत्मा है।
आज जब विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वचालन के युग में प्रवेश कर रहा है, तब भारतीय अभियंता को यह याद रखना चाहिए कि बुद्धिमत्ता का मूल मानवता में है। मशीनें केवल साधन हैं, पर उद्देश्य मनुष्य है। भारत की यही परंपरा रही है । यहाँ तकनीक को कभी हृदय से अलग नहीं किया गया। पत्थर तराशने वाले शिल्पकार हों या सॉफ्टवेयर कोड लिखने वाले अभियंता, दोनों में एक ही चेतना बहती रही है शाश्वत सृजन की।
इस वर्ष का ‘अभियंता बंधु’ उसी सृजन चेतना को प्रणाम करता है। इसमें निहित हर लेख, हर विचार, हर शोध उसी परंपरा का विस्तार है जो हड़प्पा से लेकर चंद्रयान तक फैली है।
हम गर्व से कह सकते हैं कि भारत का अभियंता केवल समय का साक्षी नहीं, भविष्य का निर्माता भी है।
भोपाल केंद्र को यह दायित्व मिला, यह हमारे लिए एक सम्मान है। हम इस अंक को उन सभी अभियंताओं को समर्पित करते हैं जो अपने श्रम, बुद्धि और ईमानदारी से भारत के तकनीकी स्वप्न को साकार कर रहे हैं। यह अंक उन्हें प्रणाम है जो चुपचाप देश की प्रगति की आधारशिला रख रहे हैं , पुलों के नीचे, प्रयोगशालाओं में, कारखानों में, और कक्षा-कक्षों में।
इंस्टिट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (इंडिया) का यह प्रयास न केवल तकनीकी जगत के लिए प्रेरक है, बल्कि समाज को यह विश्वास दिलाता है कि भारत का अभियंता हर चुनौती को अवसर में बदलने की क्षमता रखता है।
हम आशा करते हैं कि यह अंक विचार, शोध और प्रेरणा का स्रोत बनेगा। यह अभियंता समुदाय के साथ-साथ विद्यार्थियों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगा।
अंत में मैं अपने संपादकीय सहयोगियों, लेखकों, अनुवादकों, समीक्षकों और सभी सदस्यों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ जिन्होंने इस अंक को सार्थक बनाया। विशेष रूप से हमारे राज्य केंद्र के अध्यक्ष तथा सचिव जिन्होंने हर मोड पर इस पत्रिका के लिए हर संभव प्रयास किया है।
भारत का अभियंता केवल तकनीक का ज्ञाता नहीं, सृजन का साक्षी है और अभियंता बंधु उसी सृजन की गाथा है।
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विवेक रंजन श्रीवास्तव
फैलो मेंबर सिविल,
स्टेट काउंसिंल सदस्य
एवं
प्रधान संपादक
अभियंता बंधु वर्ष 2025
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