Monday, 2 March 2026

भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र

 भारतीय अस्मिता के शब्दशिल्पी: पंडित विद्यानिवास मिश्र


विवेक रंजन श्रीवास्तव


हिंदी ललित निबंध के संसार में पंडित विद्यानिवास मिश्र एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से मिट्टी की सोंधी गंध और वेदों की ऋचाओं को एक साथ पिरोया है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने जिस ललित निबंध की आधारशिला रखी थी, मिश्र जी ने उसे अपने अद्भुत पांडित्य और लोक-अनुभवो को शब्दों से एक विशाल प्रासाद में परिवर्तित कर दिया। उनका लेखन केवल शब्दों का विन्यास नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस अविरल धारा का प्रवाह है, जो गाँवों की पगडंडियों से होती हुई दर्शन के शिखर तक पहुँचती है।

उनके निबंध अनुभूति और शिल्प का संगम हैं।

मिश्र जी के निबंधों का 'ललित' पक्ष उनके आत्मपरक दृष्टिकोण में निहित है। उनके निबंधों में 'मैं' का अहंकार नहीं, बल्कि 'मैं' की आत्मीयता घुली होती है। जब वे 'कदम की फूली डाल' या 'आम्र-मंजरी' की बात करते हैं, तो वे केवल प्रकृति का वर्णन नहीं कर रहे होते, बल्कि वे पाठक को अपने साथ उस संवेदन-धरातल पर ले जाते हैं जहाँ तर्क पीछे छूट जाता है और केवल प्रवाही रसात्मकता शेष रहती है।

उनकी असाधारण स्मृतयो का रोचक वर्णन लालित्य की बहुत बड़ी विशेषता है। वे वर्तमान की किसी छोटी-सी घटना जैसे बारिश की बूंदों का गिरना , को भी निबंध में इतिहास और पुराणों की महान परंपराओं से जोड़ देते हैं। उनके लेखन में शब्द 'अर्थ' ही नहीं देते, बल्कि 'ध्वनि' और 'दृश्य' भी पैदा करते हैं। उनके निबंधों में एक प्रकार की 'तरलता' है, जो पाठक के मन में किसी पुराने राग की तरह गूंजती रहती है।

लोक और शास्त्र का अनूठा अद्वैत

विद्यानिवास मिश्र के लेखन की  विशिष्टता है ।उनके निबंधों में लोक और शास्त्र का समन्वय है। जहाँ एक ओर वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और पाणिनी के व्याकरण की सूक्ष्मताओं से परिचित थे, वहीं दूसरी ओर उनके हृदय में लोक-गीतों और ग्रामीण अंचल की स्मृतियाँ रची-बसी थीं। उनके निबंधों में उपनिषदों के सूत्र और कबीर की साखियाँ एक ही धरातल पर आकर संवाद करती हैं। वे अक्सर कहते थे कि भारत की आत्मा महलों में नहीं, बल्कि उन लोरियो में सुरक्षित है जो एक माँ अपने बच्चे को सुलाते समय गाती है।

 

मिश्र जी की कृतियाँ कालजयी हैं। उनमें तथ्यात्मक वैचारिक विस्तार है। ये निबंध भारतीय जीवन-दर्शन के कोश बन गए हैं। उनका निबंध संग्रह 'तुम चंदन हम पानी' भक्ति और समर्पण की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार 'आँगन का पंछी और बनजारा मन' में उन्होंने मनुष्य की उस छटपटाहट को स्वर दिया है जो एक ओर अपनी जड़ों , आँगन से बँधना चाहता है और दूसरी ओर अनंत ज्ञान की खोज में 'बनजारा' बनकर भटकना चाहता है।


उनका सबसे चर्चित निबंध 'मेरे राम का मुकुट भीग रहा है' आधुनिक हिंदी साहित्य की एक अमूल्य धरोहर है। एक संगीत कार्यक्रम से देर रात घर लौटते अपने पुत्र और अतिथि कन्या की प्रतीक्षा में बैठी एक माँ की ममतामयी चिंता को उन्होंने जिस प्रकार कौशल्या की राम के प्रति चिंता से जोड़ा, वह अद्भुत है। यह निबंध प्रतीकात्मक रूप से बताता है कि जब तक इस देश में 'मुकुट के भीगने' अर्थात, संस्कृति और मर्यादा के संकट की चिंता जीवित है, तब तक हमारी संवेदनाएँ मृत नहीं हो सकती ।


कुशल संपादक और पत्रकारिता के प्रतिमान


पंडित जी का संपादन कर्म उनके लेखन जितना ही प्रभावशाली था। उन्होंने 'नवभारत टाइम्स' जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्र के संपादक के रूप में हिंदी पत्रकारिता को एक नई गरिमा और वैचारिक गहराई प्रदान की। उनके संपादन में भाषा की शुद्धता और वैचारिक प्रखरता का विशेष ध्यान रखा जाता था। उन्होंने 'साहित्य अमृत' पत्रिका के माध्यम से नए रचनाकारों को एक मंच दिया और साहित्यिक पत्रकारिता के उच्च मानक स्थापित किए। वे मानते थे कि समाचार केवल सूचना नहीं होते  बल्कि उनकी प्रस्तुति ऐसी हो जिससे वो समाज के मानस को संस्कारित करने का माध्यम बने।

 पंडित विद्यानिवास मिश्र का अवदान यह है कि उन्होंने हिंदी निबंध को रूखेपन और कोरे बौद्धिक विलाप से बाहर निकाला। उन्होंने सिद्ध किया कि परंपरा जड़ नहीं होती, बल्कि वह एक बहती हुई नदी है जो नए युग के साथ मिलकर अपना मार्ग बनाती है। आज के वैश्वीकरण के दौर में, जब व्यक्ति अपनी पहचान खो रहा है, मिश्र जी का साहित्य हमें पुनः अपनी मिट्टी की सुगंध और अपने संस्कारों के उजियारे की ओर ले जाता है। वे आजीवन एक ऐसे 'सांस्कृतिक यात्री' बने रहे, जिनकी यात्रा का गंतव्य भारत की शाश्वत मेधा की खोज था।

विवेक रंजन श्रीवास्तव

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