बाल कथा
दोस्ती का खेल
· विवेक रंजन श्रीवास्तव
जंगल में एक छोटा बंदर रहता था। उसका नाम मोनू था। मोनू की एक बुरी आदत थी।
वह सबकी चीज़ें छीन लेता था। हाथी का केला छीन लेता। खरगोश की गाजर छीन लेता। सब जानवर परेशान थे।
एक दिन मोनू ने कछुआ दादा का मोबाइल छीन लिया। कछुआ दादा उस पर अपने पोते की तस्वीर देख रहे थे।
"मोनू, वापस करो!" कछुआ दादा ने कहा। पर मोनू मोबाइल लेकर भाग गया।
वह मोबाइल लेकर पेड़ पर चढ़ गया। वह नासमझी से बटन दबाने लगा। अचानक मोबाइल फिसला और... धप्प!
मोबाइल नीचे गिर गया। उसकी स्क्रीन टूट गई।
मोनू डर गया। वह सहमते हुए नीचे उतरा। कछुआ दादा मोनू को बहुत प्यार करते थे, उन्होंने उसे कुछ नहीं कहा पर वे दुखी देख रहे थे। मोनू को डांट का डर था , और वह बचाव के तर्क सोच रहा था। किन्तु कछुआ दादा की चुप्पी से उसे बहुत दुख हुआ। उसने मन ही मन अब किसी से भी कुछ नहीं छीनने का प्रण ले लिया।
"माफ़ करना दादा," मोनू ने कहा, "मैंने आप से बिना पूछे आपका मोबाइल ले लिया और वह मुझसे टूट गया। आप जो सजा देंगे मुझे मंजूर है।
कछुआ दादा मुस्कुराए। "चिंता मत करो, बेटा। पर अब एक वादा करो।"
"क्या वादा?" मोनू ने पूछा।
"कभी किसी की चीज़ बिना पूछे मत लेना। अगर खेलना है, तो पहले पूछ कर ही लेना।"
मोनू ने हाँ में सिर हिलाया।
अगले दिन, मोनू ने खरगोश से पूछा, "क्या मैं तुम्हारी गाजर ले सकता हूँ?"
खरगोश खुश हुआ। "जरूर! उसने मोनू को गाजर दी और कहा चलो साथ खेलें।"
सब जानवर हैरान थे। मोनू अब किसी से कुछ जबरदस्ती छीनता नहीं था। उसे यदि किसी से कुछ चाहिए होता तो वह उससे पूछकर लेता था।
जंगल में सबने सीखा - "जो चीज़ तुम्हारी नहीं, उसे लेना है तो पहले उसके मालिक से पूछो।"
और मोनू? अब वह सबका चहेता बन गया था।
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