Tuesday, 30 December 2025

बीती ताहि बिसार दे

 लघुकथा

बीती ताहि बिसार दे 


विवेक रंजन श्रीवास्तव


     गगन स्टेशन की बेंच पर बैठा था। हाथ में लिफ़ाफ़ा था , जिसे खोल कर अब तक वह जाने कितनी बार पढ़ चुका था, उसे स्वयं भी याद नहीं । राधा उसे छोड़ अपने पिता की पसंद के लड़के से विवाह कर बिदा हो चुकी थी । विवाह की रस्मों के बीच किसी तरह वह गगन के हाथों में यह लिफ़ाफ़ा थमा कर , अपना लंहगा संभालते हुए तेज कदमों से बिना पीछे देखे चली गई थी ।


 तब से राधा का यह आख़िरी पत्र संभाले , गगन मायूस , बिलकुल अकेला रह गया था। गगन ने जैसे जीवन की रफ़्तार ही रोक दी थी । दोस्तों से दूरी बना ली, और अतीत के साये में खोया रहता था।


आज अचानक स्टेशन पर बैठा , जब वह गुमसुम राधा का पत्र अलट पलट रहा था, उसकी निगाह पीछे वेटिंग रूम में लगी एक बड़ी सी सीनरी पर जा टिकी । 


उसने गौर से चित्र को देखा ,उस पेंटिंग में सूरज उग रहा था, पेड़ों से रोशनी छन रही थी, और घुमावदार सड़क पर एक व्यक्ति रोशनी की ओर कदम बढ़ाए हुए था । पीछे कुछ पत्ते गिरे पड़े हुए थे।


    गगन ने मन ही मन एक निर्णय लिया। लिफ़ाफ़ा देखा, फिर उसे स्टेशन के कूड़ेदान में डाल दिया , वह प्लेटफार्म से बाहर आ गया। वह समझ चुका था, जीवन अब भी आगे बढ़ना चाहता है। राधा भी तो शायद यही चाहती थी।    


वह पूरब की दिशा में चल पड़ा था। अपने बालों को सँवार, गगन ने खुद से कहा..

“बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले।” और तेज कदमों से नई ऊर्जा के साथ वह ऑफिस की तरफ बढ़ चला । 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

Monday, 29 December 2025

ऐतिहासिक बलिदान की स्मृति एवं समकालीन प्रासंगिकता

 ऐतिहासिक बलिदान की स्मृति एवं समकालीन प्रासंगिकता


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


भारतीय इतिहास एवं राष्ट्रीय स्मृति में 26 दिसंबर की तिथि एक ऐसे बलिदान की गवाह है, जिसे अब वीर बाल दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। यह दिवस सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी के दो नन्हें साहिबजादों , साहिबजादा जोरावर सिंह (लगभग 9 वर्ष) और साहिबजादा फतेह सिंह (लगभग 6 वर्ष) की अद्वितीय शहादत को समर्पित है। उनका बलिदान केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, अटल साहस और नैतिक दृढ़ता के मूल्यों का  स्थायी प्रतीक है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही अक्षुण्ण है।


वीर बाल दिवस की ऐतिहासिक जड़ें 17वीं शताब्दी के उस संघर्षपूर्ण दौर में हैं, जब गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा स्थापित खालसा पंथ मुगल सत्ता के अत्याचारों का प्रतिरोध कर रहा था। वर्ष 1705 में, आनंदपुर साहिब से निकलते समय गुरु परिवार बिछड़ गया। दोनों छोटे साहिबजादे अपनी दादी माता गुजरी के साथ विश्वासघाती सेवक गंगू द्वारा पकड़वा दिए गए और सरहिंद के नवाब वजीर खान के हवाले कर दिए गए। नवाब ने उन पर जबरन धर्म परिवर्तन का भारी दबाव डाला, परंतु इतनी छोटी आयु में भी उन बालकों ने किसी भी प्रलोभन या भय के आगे झुकने से स्पष्ट इनकार कर दिया। उनकी इस अडिग नैतिक दृढ़ता से क्रोधित होकर, नवाब वजीर खान ने 26 दिसंबर, 1705 को दोनों नन्हें साहिबजादों को जीवित दीवार में चिनवा देने का आदेश दिया, जिससे उन्होंने धर्म एवं सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। 

इस घटना ने भारत के इतिहास में आस्था और साहस की एक अमिट वीर गाथा लिख दी।


इस ऐतिहासिक बलिदान को राष्ट्रीय स्मृति का एक अभिन्न अंग बनाने की दिशा में सदियों बाद , एक महत्वपूर्ण कदम 9 जनवरी, 2022 को उठाया गया। गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाश पर्व के शुभ अवसर पर, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि 26 दिसंबर का दिन अब ‘वीर बाल दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। इस घोषणा का उद्देश्य सिर्फ अतीत को याद करना नहीं, बल्कि साहिबजादों के अद्वितीय साहस और बलिदान के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करना था। इस प्रकार, एक गहन ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्मृति को एक व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ प्रदान किया गया, जो भारत की सामूहिक ऐतिहासिक चेतना का हिस्सा बन गया। इस निर्णय में राजनीति भी ढूंढने की कोशिश हुई ,  पर वीर बालकों की शहादत को जो महत्व आजादी के तुरंत बाद दिया जाना चाहिए था , वह अंततोगत्वा अब दिया जा रहा है।


वीर बाल दिवस की समकालीन प्रासंगिकता इसके उत्सव के स्वरूप में स्पष्ट झलकती है, जो केवल शोक या स्मरण तक सीमित नहीं है, बल्कि एक सक्रिय, भविष्योन्मुखी एवं प्रेरक आयोजन है। इस दिन का केंद्रीय आयोजन महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा किया जाता है, जिसमें प्रधानमंत्री स्वयं भाग लेते हैं एवं देशवासियों, विशेषकर युवाओं को संबोधित करते हैं। इस अवसर पर प्रदान किया जाने वाला ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’ (PMRBP) ऐतिहासिक बलिदान और समकालीन उपलब्धि के बीच एक सार्थक सेतु का काम करता है। भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाने वाला यह प्रतिष्ठित पुरस्कार, 5 से 18 वर्ष की आयु के उन बच्चों को दिया जाता है, जिन्होंने वीरता, खेल, समाज सेवा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण तथा कला एवं संस्कृति जैसे विविध क्षेत्रों में असाधारण उपलब्धि हासिल की है। यह पुरस्कार इस सिद्धांत को मूर्त रूप देता है कि साहस एवं उत्कृष्टता की कोई आयु नहीं होती।


देशभर में इस दिन का स्मरण एक जीवंत एवं सहभागी अनुभव बनता है। स्कूलों, कॉलेजों एवं शैक्षणिक संस्थानों में निबंध लेखन, वाद-विवाद, क्विज़, कहानी सुनाने, पोस्टर निर्माण और सांस्कृतिक प्रदर्शन जैसी अनेक गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं। गुरुद्वारों में विशेष प्रार्थनाएँ, कीर्तन एवं शहादत की कथाओं का आयोजन होता है। इन सभी आयोजनों का केंद्रीय लक्ष्य केवल इतिहास का पाठ नहीं, बल्कि ऐतिहासिक बलिदान को समकालीन नागरिक मूल्यों, जैसे निडरता, नैतिक बल, कर्तव्यनिष्ठा एवं धार्मिक सहिष्णुता, से जोड़ना है। इस प्रकार, वीर बाल दिवस अतीत की गाथा को वर्तमान की प्रेरणा में रूपांतरित कर देता है।


वीर बाल दिवस भारतीय इतिहास चेतना की उस गहरी परत को उद्घाटित करता है, जहाँ बलिदान राष्ट्र निर्माण की एक मूलभूत इकाई बन जाता है। साहिबजादा जोरावर सिंह और फतेह सिंह का बलिदान उन मानवीय मूल्यों का प्रतीक है, जो किसी भी युग में अपनी प्रासंगिकता नहीं खोते। 2022 में इसकी आधिकारिक घोषणा ने इस कथा को एक राष्ट्रीय संवाद का विषय बना दिया। आज, यह दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि सिद्धांतों के प्रति निष्ठा, अन्याय के प्रति प्रतिरोध और धर्म के प्रति अटल आस्था की भावना ही किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति होती है। साथ ही, यह दिवस भविष्य के निर्माण में युवा शक्ति के महत्व को रेखांकित कर, एक प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण के संकल्प का भी द्योतक है। इस अर्थ में, वीर बाल दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि एक सजग चेतना का नाम है, जो अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान को गढ़ने तथा भविष्य का मार्ग प्रशस्त करने का संकल्प दोहराता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क

Wednesday, 24 December 2025

पुस्तक चर्चा “जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें”

 पुस्तक चर्चा 



डॉ. कमल किशोर दुबे की अभिनव कृति

 “जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें” 


चर्चा विवेक रंजन श्रीवास्तव 


यह किताब मूलतः ,जीवन की गरिमा का पुनः स्मरण कराती हुई ऐसी कृति है, जो व्यक्ति को भीतर से बदलकर उसके जीवन को उद्देश्यपूर्ण और साधनामय बनाने की प्रेरणा देती है। इसमें विद्यार्थी जीवन से वृद्धावस्था तक जीवन यात्रा के हर पड़ाव पर  लेखक ने व्यक्तित्व विकास हेतु आवश्यक आयामों को छोटे छोटे, ,  सारगर्भित आलेखों के माध्यम से उद्घाटित किया है।


जीवन की श्रेष्ठता , केवल सुविधाओं से नहीं, संस्कारों से होती है।

प्राक्कथन में ही लेखक स्पष्ट करते हैं कि मानव जीवन की श्रेष्ठता केवल भौतिक उपलब्धियों, वैभव और ऐश्वर्य से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, मानवता, प्रेम, सेवा, सद्भाव और परोपकार जैसे उच्च शाश्वत मूल्यों के  से बनती है। सनातन दृष्टि से मनुष्य योनि को “देवताओं को भी दुर्लभ” बताकर यह रेखांकित किया गया है कि मानव जीवन कर्म योनि है, जहाँ मनुष्य अपने पुरुषार्थ से जीवन को ईश्वरीय उद्देश्य की ओर मोड़ सकता है।लेखक बार-बार इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि मनुष्य की सच्ची पूँजी उसका आंतरिक संस्कार, उसकी संवेदना और उसकी कर्मशीलता है, न कि केवल स्थिति, पद या बैंक में जमा पूंजी ।

 पुस्तक का केंद्रीय स्वर यह है कि जीवन तभी वास्तव में श्रेष्ठ है, जब वह किसी उच्च उद्देश्य के साथ जिया जाए और उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए व्यक्ति स्वयं को लगातार ढालता और परिष्कृत करता रहे।लेखक के अनुसार, अपने भीतर की कमियों, दुष्प्रवृत्तियों और दुर्बलताओं की पहचान करके उन्हें रूपांतरित करना ही आत्म विकास का वास्तविक प्रारंभ है।


पहला आलेख “सुयोग्य विद्यार्थी कैसे बनें?” इस कृति का स्वर और दिशा दोनों निर्धारित करता है।यहाँ शिक्षा को केवल डिग्री और रोज़गार का साधन न मानकर, चरित्र निर्माण और संस्कार संवर्धन की प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया गया है।लेखक प्राचीन गुरुकुल प्रणाली का उदाहरण देते हैं, जहाँ श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे अवतार भी वशिष्ठ और सांदीपनि जैसे गुरुओं के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करते हैं, ताकि यह स्पष्ट हो कि ज्ञान के साथ विनय, स्वावलंबन, प्रेम, करुणा और सामाजिक सद्भाव अनिवार्य अंग हैं। यद्यपि ये आदर्श स्थितियां सामाजिक ताने बाने में आज व्यवहारिक नहीं लगती । लेखक आधुनिक शिक्षा संस्थानों में प्रतियोगिता, वैभव प्रदर्शन और धन केंद्रित दृष्टिकोण की आलोचना करते हैं, जो विनय, दया, त्याग और करुणा जैसे गुणों को पीछे छोड़ देता है।

रामचरितमानस की यह पंक्ति “बरसहिं जलद भूमि नियराये। जथा नवहिं बुध विद्या पाये।”  उद्धृत करके वे बताते हैं कि जिस प्रकार बादल पृथ्वी के समीप आकर बरसते हैं, उसी प्रकार सच्चा विद्वान जितना अधिक ज्ञान पाता है, उतना ही विनम्र होता जाता है।इस तरह पुस्तक में विद्या और विनय के संबंध को विद्यार्थी जीवन के आदर्श स्वरूप का केंद्रीय सूत्र माना गया है।


“विचार संयम या सकारात्मक सोच!” शीर्षक आलेख पुस्तक के वैचारिक ढाँचे का मेरुदंड है। यहाँ महाभारत के वनपर्व से उद्धृत श्लोक के माध्यम से बताया गया है कि वेदों का सार “सत्य” और सत्य का सार “दम” अर्थात् संयम है; और वही संयम “त्याग” के रूप में सज्जनों के आचरण में प्रकट होता है।लेखक विचार संयम को इन्द्रिय संयम की मानसिक अवस्था बताते हैं । इसे आधुनिक भाषा में “पॉज़िटिव थिंकिंग” का भारतीय रूपक कह सकते हैं।


वे विचार-संयम को दो भागों में बाँटते हैं—  

विचार निग्रह: बिखरे हुए विचारों को समेटकर एक दिशा में लगा देना, जिसे वे सकारात्मक सोच का व्यावहारिक रूप बताते हैं। 

 निकृष्ट चिंतन से मुक्त होना: कुविचारों को हटाकर सद्विचारों में नियोजन करना, ताकि मनोभूमि में श्रेष्ठ वैचारिक बीज बोए जा सकें।


लेखक अत्यंत सहज उदाहरण से कहते हैं कि जैसे किसान जोते हुए खेत में उत्तम बीज बोकर उत्कृष्ट फसल पाता है, वैसे ही मनुष्य यदि प्रत्येक दिन आत्मचिंतन के लिए समय निकालकर आलस्य, आवेश, कटुभाषण, निराशा और कायरता जैसी प्रवृत्तियों की समीक्षा करे और उनके प्रतिपक्षी सद्गुणों को स्थापित करने का पुरुषार्थ करे, तो उसका व्यक्तित्व स्वतः उज्ज्वल होने लगेगा।

 इस क्रम में स्वाध्याय, सत्संग और चिंतन मनन को विचार संयम के व्यावहारिक साधन के रूप में रेखांकित किया गया है।


पुस्तक के कई आलेखों का केन्द्रीय विषय आत्मविश्वास और पुरुषार्थ है “आत्मविश्वास सफलता का प्रथम सोपान”, “सफलता का पर्याय , दृढ़-आत्मविश्वास”, “सफलता की सही कसौटी .. पुरुषार्थ” आदि।गीता के प्रसिद्ध श्लोक “उद्धरेदात्मनात्मानं…” को आधार बनाकर लेखक यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु । इसलिए उसे अपने उद्धार की जिम्मेदारी किसी बाहरी सहारे पर नहीं, अपने आत्मबल पर रखनी चाहिए।


इन आलेखों में दो महत्त्वपूर्ण बिंदु उभरकर सामने आते हैं—  

आत्मविश्वास केवल बाहरी प्रशंसा से नहीं, आत्म मूल्यांकन और अपने ध्येय के प्रति दृढ़ निष्ठा से जन्म लेता है।

सफलता की सही कसौटी परिणाम नहीं, बल्कि ईमानदार पुरुषार्थ और सतत परिश्रम है।  विरासत या अनैतिक साधनों से प्राप्त वैभव को लेखक नैतिक दृष्टि से “असफलता” तक कहने में संकोच नहीं करते।


“सफलता के लिए जीवन में संतुलन बनाएँ” आलेख में ऋतु-परिवर्तन और झूले का उदाहरण देकर लेखक बताते हैं कि जीवन में सुख दुःख, लाभ हानि, अनुकूल प्रतिकूल स्थितियाँ स्वाभाविक उतार चढ़ाव हैं, जिनका संतुलित विवेक से स्वागत करना ही मानसिक स्वास्थ्य का आधार है। यहाँ वे “कमल के पत्ते” की उपमा देते हैं, जो जल में रहते हुए भी उससे ऊपर रहते हैं ।  ठीक वैसे ही जीवन के मध्य में रहते हुए व्यक्ति को भीतर से निर्लिप्त और साक्षीभाव अपनाकर हर्ष और विषाद दोनों को समभाव से ग्रहण करना सीखना चाहिए।


“आशा और उत्साह मनुष्य जीवन के मुख्य सम्बल” तथा “प्रसन्न रहना अथवा उद्विग्न होना, हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर” जैसे आलेख जीवन की भावनात्मक बुनियाद पर  हैं। लेखक आशा को भविष्य की बेहतर संभावना की ऊर्जा और उत्साह को उसे साकार करने का जीवंत संबल बताते हैं, जो व्यक्ति को विषमता, अवसाद और शोक से उबारकर संघर्ष की राह पर सक्षम बनाता है। इतिहास और युद्धभूमि के संदर्भों के माध्यम से यह विचार सामने आता है कि कई बार औषधियों से अधिक आशा ही रोगी के लिए जीवनदायी सिद्ध होती है और निराशा तिनके जैसी समस्या को भी पर्वत बना देती है।


दृष्टिकोण की चर्चा में “गरीबी अमीरी” को सापेक्ष  बताते हुए लेखक संकेत करते हैं कि तुलना का मानक बदलते ही हमारी संतुष्टि या असंतोष की भावना बदल जाती है। यदि हम सदैव अपने से अधिक संपन्न व्यक्ति से तुलना करेंगे, तो स्वयं को दरिद्र महसूस करेंगे; वहीं अपने से कम सुविधा युक्त लोगों को देखकर कृतज्ञता का भाव आएगा। इस प्रकार पुस्तक यह बताती है कि प्रसन्नता बाहरी स्थिति से अधिक, अंदरूनी दृष्टिकोण  है।


“अपने व्यक्तित्व और जीवन को उत्कृष्ट कैसे बनायें?” पुस्तक का एक केंद्रीय और दार्शनिक आलेख है, जिसमें लेखक आस्था, श्रद्धा, स्वभाव, गुण और कर्म के परस्पर संबंध को व्यवस्थित ढंग से स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि व्यक्तित्व का ढाँचा “अंतरात्मा” में जमी आस्थाओं पर निर्भर है ,  वहीं से चिंतन को दिशा मिलती है, और धीरे-धीरे आदतें, स्वभाव और व्यवहार बनते जाते हैं। सुख दुःख, प्रसन्नता उद्विग्नता को वे परिस्थितियों की नहीं, मनःस्थिति की उपज मानते हैं। ठीक वैसे ही जैसे ऋतुएँ बाहरी हैं, पर हमें कैसा महसूस होगा, यह हमारे शरीर और हमारी तैयारी पर निर्भर करता है।


यहाँ लेखक परिष्कार की संभावना पर भी स्पष्ट हैं,  यदि व्यक्ति में भीतर से बदलने की तीव्र आकांक्षा और संकल्प-शक्ति हो, तो वह अपने स्वभाव और कर्म पद्धति को पुनः गढ़ सकता है। “समुद्र की गहराई से मोती” निकालने की उपमा देकर वे बताते हैं कि जीवन रूपी समुद्र में उतरने के लिए बाहरी यंत्रों से अधिक धैर्य, साहस और सतत प्रयास की आवश्यकता है। प्रबल संकल्प, धैर्य और साहस के संघटन को वे सफल व्यक्तित्व निर्माण की त्रिधारा के रूप में स्थापित करते हैं।


कर्म-सिद्धांत पर लिखे गए “कर्म प्रधान विश्व करि राखा” और “कर्मदेव का सम्मान करें” जैसे आलेख पुस्तक को एक स्पष्ट नैतिक आधार प्रदान करते हैं। तुलसीदास की चौपाई “कर्म प्रधान विश्व करि राखा…” के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि संसार में सब कुछ उपलब्ध है, पर कर्महीन व्यक्ति को कुछ नहीं मिलता, और पाप पुण्य दोनों का प्रतिफल तात्कालिक रूप से मनःस्थिति और जीवनानुभव में झलकने लगता है। लेखक सरकारी न्याय व्यवस्था की धीमी फाइलों का व्यंग्यात्मक उदाहरण देकर यह संकेत करते हैं कि ईश्वर की व्यवस्थाएँ “उधारी” पर नहीं चलतीं।  ईर्ष्या, द्वेष, झूठ और अभिमान व्यक्ति को तत्काल “नारकीय” अनुभव में धकेल देते हैं, जबकि स्नेह, करुणा और दया उसे  “स्वर्ग ” जैसा आंतरिक सुख प्रदान करते हैं।


कुल मिलाकर, “जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें” एक ऐसी कृति के रूप में सामने आती है जो भारतीय अध्यात्म, वेद, गीता,रामचरितमानस और गायत्री विचारधारा से सार लेकर आधुनिक भाषा एवं शैली में व्यक्तित्व विकास की एक समन्वित जीवन पद्धति प्रस्तुत करती है।

यह केवल ‘क्या करें’ वाली नसीहतनुमा पुस्तक नहीं, बल्कि उदाहरणों, शास्त्रीय संदर्भों और चिंतनशील व्याख्याओं के माध्यम से पाठक को आत्म-संशोधन, सकारात्मक सोच, कर्मठता और प्रेमपूर्ण मनुष्यता की ओर प्रवाहित करने वाला तार्किक प्रवाही निबंध संग्रह है, जो सचमुच “मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता का दस्तावेज” कहे जाने योग्य है।

ये भिन्न बात है कि व्यवहार के स्तर पर इसे वर्तमान वैश्विक एक्सपोजर के साथ कितना और कैसे अपनाया जाए यह सवाल उठ खड़ा होता है, जिसके उत्तर पाठक को स्वयं ही ढूंढने होंगे ।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Tuesday, 23 December 2025

दुनियां की सर्वाधिक लम्बी यातायात सुरंग : हॉलैंड टनल

 हडसन नदी के तल के नीचे दुनियां की सर्वाधिक लम्बी यातायात सुरंग : हॉलैंड टनल


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से 


हॉलैंड टनल हडसन नदी के नीचे मैनहैटन को न्यू जर्सी से जोड़ने वाली दुनिया की पहली यांत्रिक वेंटिलेशन वाली वाहन सुरंग है, जिसका निर्माण 1920 में शुरू हुआ था और 1927 में इसका उद्घाटन हुआ। यह न्यूयॉर्क शहर के हडसन स्क्वायर को जर्सी सिटी से जोड़ती है तथा पोर्ट अथॉरिटी ऑफ न्यूयॉर्क एंड न्यू जर्सी द्वारा संचालित है।


इतिहास

हडसन नदी पर वाहन क्रॉसिंग की योजना 1906 से चली आ रही थी, लेकिन विभिन्न चर्चाओं एवं  विवादों के बाद 1919 में टनल निर्माण पर सहमति बनी।

 मुख्य इंजीनियर क्लिफर्ड मिल्बर्न हॉलैंड के डिजाइन पर 1920 में काम शुरू हुआ, जो 1924 में उनकी मृत्यु से पूर्व तक पूरा न हो सका । 

 उनके बाद मिल्टन फ्रीमैन और ओले सिंगस्टाड ने इस परियोजना को  पूरा किया। 

 13 नवंबर 1927 को इस महत्वपूर्ण टनल मार्ग का उद्घाटन हुआ, जब यह दुनिया की सबसे लंबी जलमग्न वाहन सुरंग बनी। 


लंबाई और संरचना 

उत्तर ट्यूब (वेस्टबाउंड) की लंबाई पोर्टल्स के बीच 2,608 मीटर तथा दक्षिण ट्यूब (ईस्टबाउंड) 8,

2,551 मीटर लंबी है । 

इस तरह हॉलैंड टनल ढाई किलो मीटर से ज्यादा रिवर बेड के भीतर ,एक सदी से यातायात की सफल संरचना है ।

अप्रोच रोड्स सहित इसकी लंबाई और भी ज्यादा हो जाती है।


प्रत्येक ट्यूब का व्यास 29.5 फीट है, जिसमें 20 फीट चौड़ी दो-लेन सड़क है । टनल की ऊंचाई 12.6 फीट  है, तथा यह अधिकतम  जल स्तर से 93 फीट नीचे की अधिकतम गहराई में बनाई गई है।

 स्टील रिंग्स पर 19 इंच कंक्रीट लेप है, तथा दोनों ट्यूब्स आपस में 15 फीट की दूरी पर हैं।


वेंटिलेशन व्यवस्था ..

यह पहली सुरंग है जिसमें पार्श्विक (ट्रांसवर्स) वेंटिलेशन प्रणाली है, जिसमें चार वेंटिलेशन टावर्स (दो-दो प्रत्येक तट पर) हैं। 84 पंखे (42 इनटेक, 42 एग्जॉस्ट) हर 90 सेकंड में सुरंग की हवा बदल देते हैं, जो लगातार वाहनों की आवाजाही से होते कार्बन मोनोऑक्साइड को नियंत्रित रखते है।

 नदी में शाफ्ट्स 107 फीट ऊंचे हैं तथा आपातकालीन निकास भी प्रदान करते हैं।


परिचालन और प्रतिबंध..

यह इंटरस्टेट 78 का हिस्सा है तथा प्रतिदिन लगभग 90,000 वाहन इस टनल मार्ग से गुजरते हैं।

 पूर्व दिशा में ही टोल है, तथा हेजमैट वाले वाहन, तीन से अधिक एक्सल ट्रक तथा ट्रेलर प्रतिबंधित हैं । वाहनों की  चौड़ाई सीमा 8 फीट है।


 आपात सेवाएं पोर्ट अथॉरिटी पुलिस द्वारा दी जाती हैं।


हॉलैंड टनल का निर्माण कार्य 1920 में शुरू हुआ, जब मुख्य इंजीनियर क्लिफर्ड मिल्बर्न हॉलैंड के नेतृत्व में शील्ड मेथड (टनलिंग शील्ड) का उपयोग कर हडसन नदी के तल पर दो समांतर ट्यूबों की खुदाई की गई।इसमें कास्ट आयरन रिंग्स (प्रत्येक 14 स्टील सेगमेंट्स वाली) लगाई गईं, जिन्हें हाइड्रोलिक जैक्स से आगे धकेला गया; चट्टान में 2.5 फीट प्रतिदिन और कीचड़ में 5-6 फीट प्रति दिन की गति से खुदाई का काम चला। 1923 में कैसलस नदी में उतारे गए, और 19 इंच मोटी कंक्रीट लेयर से लेपित ट्यूब्स को 1927 तक पूरा किया गया, जिसमें वेंटिलेशन के लिए चार टावर्स भी बनाए गए।


दुनिया में अन्य नदियों के नीचे इस तरह की यातायात व्यवस्था कम ही है। चैनल टनल (इंग्लैंड-फ्रांस) सबसे लंबी रेल सुरंग है, जिसकी जलमग्न लंबाई 37.9 किमी है और यह 1988-94 में बनी है।

[नॉर्वे की राइफास्ट टनल (14.3 किमी, 293 मीटर गहराई) सबसे गहरी कार सुरंग है, जबकि बांग्लादेश की बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान टनल (3.32 किमी) दक्षिण एशिया की पहली नदी-नीचे सड़क सुरंग है।जर्मनी की एल्बे टनल (3.3 किमी, 1975) और कनाडा की जॉर्ज मैसी टनल (0.629 किमी) इमर्स्ड ट्यूब तकनीक पर आधारित सुरंग हैं।


हडसन नदी के गर्भ में छिपी हॉलैंड टनल न केवल दो महानगरीय क्षेत्रों को जोड़ती है, बल्कि इंजीनियरिंग की एक अनुपम कृति है जो सदी भर पहले से असंभव को संभव बनाती चली आ रही है। 1920 के दशक में जब न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी के बीच नदी पार करना घंटों का सफर था, तब क्लिफर्ड हॉलैंड जैसे दूरदर्शी इंजीनियरों ने इसकी कल्पना की। नदी के तल पर दो समांतर ट्यूबें खोदने का काम शुरू हुआ, जहां विशालकाय शील्ड मशीनें कीचड़ और चट्टानों से जूझतीं, हाइड्रोलिक जैक्स से स्टील रिंग्स को आगे सरकातीं। चार वर्षों की कठिन मेहनत के बाद 1927 में यह उद्घाटित हुई, दुनिया की पहली सुरंग जहां वाहनों की जहरीली गैसों को बाहर निकालने के लिए यांत्रिक वेंटिलेशन प्रणाली बनी ।


आज भी प्रतिदिन नब्बे हजार वाहन इससे गुजरते हैं, जो न्यूयॉर्क के हृदय को जर्सी सिटी से जोड़े रखते हैं। यह टनल केवल एक यातायात मार्ग नहीं, बल्कि मानव संकल्प की प्रतीक है, जहां तकनीक ने प्रकृति की बाधाओं को परास्त कर दिया। दुनिया के अन्य नदी-तले बने चमत्कारों से तुलना करें तो हॉलैंड ही अग्रणी टनल दिखती है । चैनल टनल की भव्य लंबाई या नॉर्वे की राइफास्ट की गहनता भले ही आकर्षित करें, पर हॉलैंड टनल की वेंटिलेशन क्रांति ने ही आधुनिक सुरंगों का आधार तैयार किया। बंगबंधु सुरंग दक्षिण एशिया में नया  अध्याय है, तो एल्बे की बहु-उपयोगिता प्रेरणा देती है, मगर हॉलैंड की कहानी सबसे पुरानी और प्रेरक है । एक युग की आवश्यकता ने कैसे स्थायी विरासत गढ़ी। आज जब हम इससे गुजरते हैं, तो लगता है मानो इतिहास के तकनीकी गलियारों से होकर भविष्य की ओर बढ़ रहे हों।


इंजी विवेक रंजन श्रीवास्तव 

सेवा निवृत मुख्य अभियंता सिविल

फैलो सदस्य इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स 

(आजकल न्यूयार्क में)

भारत टैक्सी ऐप

 भारत टैक्सी ऐप एक महत्वपूर्ण सहकारी , सरकारी पहल


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


भारत टैक्सी एक सरकारी पहल है जो ओला-उबर जैसे निजी ऐप्स का स्वदेशी विकल्प प्रदान करती है। यह सहकारिता मंत्रालय के तहत विकसित सहकारी मॉडल पर आधारित राइड-हेलिंग सेवा है, जो ड्राइवरों को मालिकाना हक देती है। इसका मुख्य लक्ष्य कैब चालकों को निजी कंपनियों के उच्च कमीशन से मुक्त करना है, जिसमें शून्य कमीशन मॉडल अपनाया गया है, जहां यात्रा का भुगतान सीधे ड्राइवर को जाता है।


सहकार टैक्सी कोऑपरेटिव लिमिटेड द्वारा संचालित यह प्लेटफॉर्म ड्राइवरों को शेयरधारक बनाता है, जिससे उनकी आय बढ़ेगी और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी। इसमें पारदर्शी किराया व्यवस्था है, जहां सामान्य स्थिति में कोई सर्ज प्राइसिंग नहीं होती । केवल विशेष परिस्थितियों में डायनामिक प्राइसिंग लागू हो सकती है। सुरक्षा के लिए सत्यापित ड्राइवर, दिल्ली पुलिस से एकीकरण, रीयल-टाइम ट्रैकिंग और 24x7 ग्राहक सहायता जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।


उपयोगकर्ता अनुभव को बेहतर बनाने के लिए बहुभाषी ऐप एंड्रॉयड और iOS पर उपलब्ध है, जिसमें डिजिटल बुकिंग, कार, ऑटो और बाइक विकल्प तथा UMANG और DigiLocker से एकीकरण शामिल है। दिल्ली में 1 जनवरी 2026 से औपचारिक लॉन्च होगा, जहां पहले से 50,000 से अधिक ड्राइवर रजिस्टर्ड हैं, जबकि गुजरात के राजकोट में पायलट चल रहा है। 2026 तक 20 से अधिक शहरों में विस्तार का लक्ष्य है, जो ड्राइवरों को पीएफ, ईएसआई और पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा भी प्रदान करेगा।


यात्रियों को सस्ते, स्थिर किराए और सुरक्षित राइड्स का लाभ मिलेगा, वहीं ड्राइवरों को अधिक कमाई, कम रद्दीकरण और मालिकाना भावना प्राप्त होगी। यह डिजिटल इंडिया की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा, जो निजी एकाधिकार को चुनौती देगा।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

मनरेगा की जगह जी राम जी

 मनरेगा की जगह जी राम जी 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

(सामाजिक लेखन हेतु पुरस्कार प्राप्त)


भारत के ग्रामीण विकास ढांचे में मनरेगा को लंबे समय तक सामाजिक सुरक्षा, रोजगार गारंटी और ग्राम स्तर पर आधारभूत ढांचे के निर्माण का महत्वपूर्ण कानून माना गया। लगभग दो दशकों तक मनरेगा ने ग्रामीण परिवारों को न्यूनतम मजदूरी के साथ स्थानीय स्तर पर काम उपलब्ध कराने में बड़ी भूमिका निभाई। अब केंद्र सरकार ने मनरेगा की जगह विकसित भारत– "गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)", अर्थात ‘वीबी‑जी राम जी’ योजना लागू करने का निर्णय लिया है, जिसे आम बोलचाल में जी राम जी योजना कहा जा रहा है। यह परिवर्तन केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण रोजगार ढांचे के दर्शन, वित्तीय संरचना और शासन‑तंत्र को पुनर्परिभाषित करने वाला कदम है।  

यद्यपि स्पष्ट है कि सत्ता पक्ष ने लोक व्यापी "राम" के रूप में योजना का शार्ट नाम रख कर एक अंतर्निहित भाव तथा दिशा प्रदर्शन में संकोच नहीं किया।


मनरेगा का मूल उद्देश्य ग्रामीण परिवारों की आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करना था, जिसके लिए प्रत्येक पात्र ग्रामीण परिवार को प्रति वर्ष कम से कम सौ दिन का अकुशल शारीरिक श्रम उपलब्ध कराने की कानूनी गारंटी दी गई। इस कानून की वैचारिक पृष्ठभूमि में “रोजगार एक अधिकार” और ग्रामसभा‑केंद्रित भागीदारी का विचार प्रमुख था, इसलिए काम की मांग दर्ज होते ही प्रशासन पर बाध्यकारी दायित्व बन जाता था कि वह समयबद्ध ढंग से रोजगार उपलब्ध कराए या बेरोजगारी भत्ता दे। दूसरी ओर जी राम जी योजना विकसित भारत 2047 की दृष्टि से जुड़ी है, जिसमें 125 दिन की वैधानिक रोजगार‑गारंटी के साथ रोजगार, आजीविका, ढांचागत विकास और डिजिटल निगरानी को एकीकृत करने की महत्वाकांक्षी कल्पना की गई है। यहाँ प्रमुख शब्द अधिकार से अधिक “विकास, एकीकरण और संतृप्ति” बन जाते हैं, जो परिणाम‑केंद्रित और मिशन मोड कार्यान्वयन की दिशा की ओर संकेत करते हैं।  


दोनों व्यवस्थाओं के कानूनी ढांचे पर नज़र डालें तो मनरेगा एक स्वतंत्र कानून के रूप में ग्रामीण नागरिकों को सीधा अधिकार देता था कि वे काम माँगे और न मिलने पर मुआवज़ा प्राप्त करें। इस तरह यह बजटीय सीमा से ऊपर उठकर संविधानिक‑कानूनी दायित्व जैसा स्वरूप ग्रहण कर चुका था।

 जी राम जी योजना नए विधेयक के रूप में मनरेगा को समाप्त करके 125 दिन तक की रोजगार‑गारंटी का नया ढांचा निर्मित करती है, जिसमें राज्यों के लिए कृषि‑सीज़न के दौरान कुछ अवधियों को काम‑मुक्त घोषित करने का विकल्प भी निहित है। पहली नज़र में काम के दिनों की बढ़ोतरी श्रमिकों के लिए लाभकारी दिखाई देती है, लेकिन काम की मांग और रोजगार उपलब्ध कराने के बीच बने मजबूत कानूनी संबंधों की जगह अब संसाधन, सीज़न और आवंटन जैसी बातों को महत्व दिया गया है, जिससे वास्तविक रोजगार‑उपलब्धता पर प्रश्न स्वाभाविक हैं।  


वित्तीय संरचना में भी बड़ा बदलाव दिखाई देता है। मनरेगा के अंतर्गत मजदूरी का पूरा भुगतान केंद्र सरकार वहन करती थी और सामग्री‑व्यय में केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी निश्चित अनुपात में बँटी रहती थी, जिससे योजना मूलतः केंद्र‑वित्तपोषित प्रकृति की थी और राज्यों पर अपेक्षाकृत कम आर्थिक दबाव पड़ता था। 

जी राम जी योजना के साथ यह तस्वीर बदलती है।अब इसे साझा उत्तरदायित्व वाली केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में गढ़ा गया है, जिसमें अधिकांश राज्यों के लिए खर्च का बड़ा हिस्सा साझा करना अनिवार्य होगा। इससे वित्तीय बोझ थोड़ा‑थोड़ा करके राज्यों की ओर खिसकता दिखाई देता है और यह आशंका भी उभरती है कि कमजोर वित्तीय स्थिति वाले राज्य रोजगार‑गारंटी के दायित्व को उतनी मजबूती से निभा नहीं पाएँगे, जितनी एक पूर्णतः केंद्र‑वित्तपोषित कानून की स्थिति में संभवना होती थी।  


मनरेगा की सबसे विशिष्ट विशेषता उसकी मांग‑आधारित प्रकृति थी। ग्राम पंचायत स्तर पर जैसे ही श्रमिकों द्वारा काम की मांग दर्ज होती, स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य और केंद्र तक की पूरी मशीनरी पर दायित्व बनता कि वह अतिरिक्त संसाधन जुटाकर भी उस मांग की पूर्ति करे। 

जी राम जी योजना में इसके स्थान पर वार्षिक मानक आवंटन की व्यवस्था रखी गई है, जिसके भीतर रहते हुए राज्यों को रोजगार सृजन की योजना बनानी है। यदि किसी राज्य में श्रम‑मांग आवंटित सीमा से अधिक हो जाए, तो अतिरिक्त व्यय की बड़ी ज़िम्मेदारी राज्य सरकार पर आ जाती है। इस बदलाव से योजना की अधिकार‑आधारित प्रकृति धीरे‑धीरे बजट‑आधारित दृष्टिकोण में परिवर्तित होती दिखती है, जहाँ गरीब श्रमिक के अधिकार से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि कोष में कितना धन उपलब्ध है?


ग्राम पंचायत की भूमिका के संदर्भ में मनरेगा ने ग्रामसभा और पंचायत को योजना‑निर्माण के केंद्र में रखा। गाँव के स्तर पर होने वाली खुली बैठकों में कार्यों की पहचान, प्राथमिकता और अनुमोदन होता, और कम से कम आधा व्यय ग्राम पंचायत के माध्यम से ही खर्च करना अनिवार्य था, जिससे विकेंद्रीकरण और जनभागीदारी को संस्थागत स्वरूप मिला। जी राम जी योजना में भी पंचायतें मौजूद रहेंगी, पर अब उन्हें विकास‑सूचकांकों के आधार पर श्रेणियों में बाँटा जाएगा और उनकी योजनाओं को राष्ट्रीय प्लेटफॉर्मों, जियो‑टैगिंग और डिजिटल मॉनिटरिंग की कड़ी शर्तों से जोड़ा जाएगा। इससे एक ओर पारदर्शिता और सूचनात्मक निगरानी का नया क्षितिज खुलता है, तो दूसरी ओर यह आशंका भी जन्म लेती है कि अत्यधिक केंद्रीकरण और तकनीकी‑निर्भरता कहीं ग्रामसभा‑आधारित स्वायत्तता को कमजोर न कर दे, विशेषकर वहाँ, जहाँ तकनीकी संसाधन और क्षमता अभी सीमित हैं।  


कार्य‑स्वरूप की दृष्टि से मनरेगा ने जल संरक्षण, सूखा‑रोधी उपाय, सिंचाई, पारंपरिक जल स्रोतों का नवीनीकरण, भूमि विकास और बाढ़ नियंत्रण जैसे कार्यों के माध्यम से रोजगार‑सृजन को प्राकृतिक संसाधन पुनरुत्थान से जोड़ने की कोशिश की। 

जी राम जी योजना इन कार्यों को व्यापक ग्रामीण आधारभूत ढांचे, कृषि‑संबंधित परियोजनाओं और राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे के साथ और अधिक निकटता से जोड़ना चाहती है, ताकि ग्रामीण श्रम‑शक्ति बड़े विकास‑नेटवर्क का अंग बन सके। 

यह परिवर्तन संकेत देता है कि अब केवल स्थानीय संसाधन‑संरक्षण ही नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक, कनेक्टिविटी और समग्र उत्पादकता वृद्धि भी ग्रामीण परियोजनाओं की कसौटी बनने जा रही है।  


पारदर्शिता और निगरानी के मोर्चे पर मनरेगा ने जॉब कार्ड, मस्टर रोल और सोशल ऑडिट जैसे औज़ार दिए, पर समय के साथ फर्जी जॉब कार्ड, भुगतान में देरी और भ्रष्टाचार के आरोपों से इसकी छवि को बार बार आघात पहुँचता रहा। 

जी राम जी योजना की प्रस्तावित संरचना में शुरू से ही जियो‑टैगिंग, डिजिटल मस्टर रोल और ऑनलाइन भुगतान निगरानी जैसे उपायों को अनिवार्य स्थान दिया गया है। उम्मीद यह की जा रही है कि तकनीक‑आधारित निगरानी से दुरुपयोग में कमी आएगी और गरीबों को समय पर काम व मजदूरी मिल सकेगी, लेकिन साथ ही डिजिटल विभाजन, नेटवर्क की कमी और तकनीकी कौशल के अभाव से यह खतरा भी बना रहता है कि सबसे वंचित तबके कहीं फिर से हाशिए पर न चले जाएँ। निश्चित ही भ्रष्टाचार पर तो नई सोच नियंत्रण करेगी , पर इससे प्रथम दृष्टि में रोजगार के अधिकार की बात प्रभावित होती नजर आती है। 


अंततः मनरेगा और जी राम जी योजनाओं के बीच अंतर केवल संख्या और प्रावधानों का नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास के दृष्टिकोण का भी अंतर है। एक ओर मनरेगा रोजगार को अधिकार के रूप में स्थापित कर ग्रामसभा‑केंद्रित, विकेंद्रीकृत और मांग‑आधारित मॉडल लेकर आई थी, तो दूसरी ओर जी राम जी योजना उसी ढांचे को विकसित भारत की बड़ी परियोजना से जोड़ते हुए डिजिटल, मानक आवंटन‑आधारित और साझा वित्तीय जिम्मेदारी वाले मॉडल में रूपांतरित करती दिखती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह निरंतरता और परिवर्तन का मिश्रण ग्रामीण गरीबों के वास्तविक रोजगार‑सुरक्षा और सामाजिक न्याय के सपने को कितना पोषित करता है और कहाँ‑कहाँ नई चुनौतियाँ खड़ी करता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

(सामाजिक लेखन हेतु पुरस्कार प्राप्त)

विनोद कुमार शुक्ल : एक शब्द यात्री

 विनोद कुमार शुक्ल : एक शब्द यात्री


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


हिंदी के आधुनिक कथा‑साहित्य और कविता में विनोद कुमार शुक्ल उस विरल रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं, जिसने साधारण जीवन की निस्सार दिखाई देने वाली वस्तुओं और स्थितियों में भी अद्भुत काव्यात्मक चमक और जादुई यथार्थ की आभा दिखाई । 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे विनोद कुमार शुक्ल ने लगभग पाँच दशकों से अधिक समय तक लगातार लेखन करते हुए कविता, उपन्यास, कहानी और बच्चों के लिए साहित्य की ऐसी दुनिया रची, जो हिंदी के पारंपरिक ढाँचों से बाहर निकलकर एक बिल्कुल निजी, लेकिन गहरे मानवीय संसार का सृजन करती है। 

वे शिक्षक के रूप में कृषि महाविद्यालय से जुड़े रहे इस संकोची, अल्पभाषी लेखक ने सार्वजनिक मंचों की चकाचौंध से दूर रहकर भी अपने शब्दों की शक्ति से राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक जगत में विशिष्ट प्रतिष्ठा अर्जित की। 


उनकी रचना‑यात्रा का आरंभ कविता से हुआ। पहला कविता‑संग्रह “लगभग जय हिंद” 1971 में प्रकाशित हुआ, जिसने उनके भीतर बसे राजनीतिक‑सामाजिक बोध और देशज संवेदना की अनोखी मिश्रित ध्वनियों से हमारा परिचय कराया। इसके बाद “वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह” जैसे संग्रहों ने संकेत दिया कि वे शब्दों की चलन वाली सांकेतिकता से संतुष्ट नहीं, बल्कि भाषा को एकदम नए संयोजनों में बरतने वाले कवि हैं, जो वाक्य‑विन्यास और उपमा‑संरचना दोनों को उलट‑पलट कर देखने की हिम्मत रखते हैं। बाद के वर्षों में उनकी कविताएँ “आकाश धरती को खटकता है”, “कविता से लंबी कविता” आदि संग्रहों के रूप में सामने आईं, जिनमें प्रकृति, घर‑परिवार, छोटे शहर और साधारण मनुष्यों के जीवन की सूक्ष्मतम हलचलें एक बेहद शांत, धीमी, किंतु भीतर तक उतर जाने वाली आवाज़ में दर्ज होती हैं। 


काव्य के साथ‑साथ विनोद कुमार शुक्ल का कथा‑संसार हिंदी उपन्यास और कहानी की परंपरा में एक बड़ी संरचनात्मक तब्दीली के रूप में देखा जाता है। 1979 में प्रकाशित उनका पहला उपन्यास “नौकर की कमीज़” हिंदी गद्य में एक मील का पत्थर माना जाता है, जिसे बाद में मणी कौल ने इसी नाम से फिल्म में रूपांतरित किया। एक साधारण सरकारी क्लर्क और “नौकर की कमीज़” के बहाने सत्ता, वर्ग, पहचान और आत्मसम्मान की जटिल परतें जिस शांत और लगभग सपाट लगने वाली भाषा में खुलती हैं, वह हिंदी उपन्यास की पारंपरिक कथावस्तु और शिल्प दोनों को तोड़ती दिखाई देती है। कई आलोचकों ने इसे हिंदी में उपन्यास की संरचना को बदल देने वाली कृति कहा। “खिलेगा तो देखेंगे” और “दीवार में एक खिड़की रहती थी” उनके ऐसे उपन्यास हैं, जिनमें शहर, घर, दीवार, खिड़की, पेड़, कमरा जैसी चीज़ें स्वयं पात्रों की तरह व्यवहार करती हैं। “दीवार में एक खिड़की रहती थी” को 1999 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया और इस पर नाट्य रूपांतरण भी हुआ। हाल ही इस उपन्यास पर तीस लाख की रॉयल्टी ने उन्हें एक बार फिर से साहित्य जगत में चर्चित बना दिया था।


उनका कहानी‑संसार भी उतना ही विशिष्ट और प्रयोगधर्मी है। “पेड़ पर कमरा” और “महाविद्यालय” जैसी कहानी‑कृतियों में कॉलेजों, कमरों, पेड़ों, गलियारों और मामूली‑से संवादों के भीतर छुपा हुआ अकेलापन, असुरक्षा, प्रेम, स्मृति और प्रतिरोध एक धीमी, लगभग फुसफुसाती हुई शैली में उजागर होता है। बाद के वर्षों में उन्होंने बच्चों के लिए भी लगातार लिखा । उनकी बाल‑कथाएँ और कविताएँ बचपन की कल्पना, खेल, चीज़ों से बातें करने की प्रवृत्ति और प्रकृति के साथ सरल, निर्भय संवाद को केंद्र में रखती हैं, जिनमें भाषा न तो बचकाना है, न उपदेशपूर्ण, बल्कि एक सहयात्री की तरह अभिव्यक्त होती है। उनकी कई रचनाएँ अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित हुईं। “ब्लू इज़ लाइक ब्लू” जैसे कहानी‑संग्रह और “Treasurer of Piggy Banks” जैसी कविताओं की अंग्रेज़ी पुस्तकों ने नए, युवा पाठकों की पीढ़ी तक उनकी पहुँच को बढ़ाया और उनके जादुई शब्द यथार्थ को वैश्विक पाठकीय संसार से जोड़ा। 


उपलब्धियों की दृष्टि से विनोद कुमार शुक्ल समकालीन हिंदी के सम्मानित लेखकों में गिने जाते हैं। 1999 में उपन्यास “दीवार में एक खिड़की रहती थी” के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला, जिसे आधुनिक हिंदी कथा‑साहित्य की एक क्लासिक कृति के रूप में व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त हुई। 2023 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके समग्र रचनात्मक अवदान को देखते हुए उन्हें PEN/Nabokov Award for Achievement in International Literature से सम्मानित किया गया, जिसने उनके काम को विश्व‑साहित्य के मानचित्र पर विशेष रूप से रेखांकित किया। 2024 के लिए घोषित 59वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें प्रदान किया गया। वे छत्तीसगढ़ से यह सर्वोच्च भारतीय साहित्यिक सम्मान पाने वाले पहले और हिंदी के बारहवें लेखक बने, जहाँ पुरस्कार‑निर्णायकों ने उनकी लेखनी की “सादगी, संवेदनशीलता और विशिष्ट शिल्प” को विशेष रूप से रेखांकित किया। 


दिसंबर 2025 में 89 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ हिंदी जगत ने स्वीकार किया कि यह केवल एक लेखक का जाना नहीं, बल्कि “शुक्ल‑युग” के अंत जैसा है। यह भी विचारणीय है कि उनके जैसा विद्वान जो समाज की संपत्ति माना जाना चाहिए, अपने अंतिम समय में अस्पताल में कोई खास अलग सरकारी इंपॉर्टेंस प्राप्त नहीं कर सका । कई समकालीन लेखकों ने रेखांकित किया कि उन्होंने हिंदी कविता, कहानी और उपन्यास को नए सिरे से रचते हुए उन्हें हस्तक्षेपकारी, प्रयोगधर्मी और गहरे मानवीय स्वर दिया। उनकी रचनाओं में साधारण आदमी के प्रति अटूट संवेदनशीलता, वस्तुओं और क्रियाओं को देखने का अनोखा नजरिया तथा वाक्य‑निर्माण की विशिष्ट स्थापत्य‑कला उन्हें ऐसा लेखक बनाती है, जिसकी पहचान केवल नाम से नहीं, भाषा से हो जाती है। इस अर्थ में उन्होंने हिंदी गद्य की संवेदना और शब्द‑संरचना दोनों को पुनर्निर्मित किया। इसी लिए विनोद कुमार शुक्ल भविष्य में भी इस रूप में याद किए जाएंगे कि उन्होंने हिंदी साहित्य को एक शांत, लगभग संकोची, लेकिन भीतर से बेहद तीखे और जागरूक जादुई यथार्थ की दुनिया दी, जहाँ आम आदमी की गरिमा, प्रकृति से उसका अंतरंग रिश्ता और भाषा की अनंत संभावनाएँ मिलकर शब्दों का एक नया घर बनाती हैं। 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

( लेखक पुरस्कृत वरिष्ठ स्वतंत्र आलोचक , रचनाकार हैं)