Monday, 13 December 2010

क्लास १२ , गणित संकाय के बच्चो के लिये जरूरी लिंक ...

http://www.cbse.nic.in/welcome.htm

http://aieee.nic.in/aieee2011/aieee/online/instruction.aspx

http://www.jee.iitk.ac.in/

http://www.iist.ac.in/IIST/#

Saturday, 4 December 2010

विकीलीक्स भी सीआईए की सोची समझी कूटनीति न हो..????

आजकल तो ये शक होने लगा है कि जिस तरह से पूरी दुनिया में सब कुछ फिक्स और प्रायोजित होने लगा है, कहीं विकीलीक्स भी सीआईए की सोची समझी कूटनीति न हो.जो तथ्य अमरीका प्रत्यक्ष तौर पर नहीं बता पा रहा है वो अप्रत्यक्ष तौर पर बताने की कोशिश कर रहा हो? यदि मेरा यह अनुमान सच नही है तो सचमुच इंटरनेट अमरीका के गले की हड्डी सिद्व हो रहा है.




पत्रकार स्वतंत्र होता है.उससे यह उम्मीद ही बेकार है कि वह केवल लिखेगा भर. लिखने का मसाला जुटाने के लिए जब वह चार जगह उठता बैठता है तो कुछ उसके मित्र बनते हैं,कुछ दुश्मन.फिर आज के भौतिक युग में उसे भी धन की चाहत होती ही है,तो वह कुछ अतिरिक्त कर बैठता है और ऐसी कहानियाँ बन जाती हैं.



अंतरराष्ट्रीय खेलों की पदक तालिकाओ में भारतीय बालाओ की बढ़ती संख्या इस तथ्य को रेखाकिंत करती है कि स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में व्यापक बदलाव हुआ है. सच तो ये है कि खेल ही नहीं हर क्षेत्र में भारतीय नारियां पुरुषों की बराबरी से कर रहीं हैं.



जातिवाद के आधार पर इतनी बड़ी जीत संभव ही नही थी. बिहार को जब नितीश जी ने संभाला था तब जैसी सामाजिक स्थितियां थीं, अपहरण था गुण्डाराज था, देर रात की तो बात ही छोड़ें शाम से ही सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था, महिलाएं, ग़रीब असुरक्षित थे, सड़कों के हालात खराब थे. इन सबमें जो बुनियादी परिवर्तन विगत वर्षो में जनता ने देखे हैं, उसी के चलते नीतीश पुनः सत्ता में आये हैं.

Monday, 13 September 2010

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Monday, 6 September 2010

सुचारु संचालन व प्रगति के लिये जबाबदार कौन... नेतृत्व ? या नीतियां?

वैचारिक नवोन्मेषी आलेख




किसी संस्थान के सुचारु संचालन व प्रगति के लिये जबाबदार कौन... नेतृत्व ? या नीतियां?





विवेक रंजन श्रीवास्तव

लेखक को नवोन्मेषी वैचारिक लेखन के लिये राष्ट्रीय स्तर पर रेड एण्ड व्हाइट पुरुस्कार मिल चुका है



ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

9425806252





कारपोरेट मैनेजर्स की पार्टीज में चलने वाला जसपाल भट्टी का लोकप्रिय व्यंग है , जिसमें वे कहते हैं कि किसी कंपनी में सी एम डी के पद पर भारी भरकम पे पैकेट वाले व्यक्ति की जगह एक तोते को बैठा देना चाहिये , जो यह बोलता हो कि "मीटिंग कर लो" , "कमेटी बना दो" या "जाँच करवा लो ". यह सही है कि सामूहिक जबाबदारी की मैनेजमेंट नीति के चलते शीर्ष स्तर पर इस तरह के निर्णय लिये जाते हैं , पर विचारणीय है कि क्या कंपनी नेतृत्व से कंपनी की कार्यप्रणाली में वास्तव में कोई प्रभाव नही पड़ता ?भारतीय परिवेश में यदि शासकीय संस्थानो के शीर्ष नेतृत्व पर दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि नौकरी की उम्र के लगभग अंतिम पड़ाव पर , जब मुश्किल से एक या दो बरस की नौकरी ही शेष रहती है , तब व्यक्ति संस्थान के शीर्ष पद पर पहुंच पाता है .रिटायरमेंट के निकट इस उम्र के टाप मैनेजमेंट की मनोदशा यह होती है कि किसी तरह उसका कार्यकाल अच्छी तरह निकल जाये , कुछ लोग अपने निहित हितो के लिये पद का दोहन करने की कार्य प्रणाली अपनाते हैं , कुछ शांति से जैसा चल रहा है वैसा चलने दिया जावे और अपनी पेंशन पक्की रखी जावे की नीति पर चलते हैं . वे नवाचार को अपनाकर विवादास्पद बनने से बचते हैं . कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो मनमानी करने पर उतर आते हैं , उनकी सोच यह होती है कि कोई उनका क्या कर लेगा ? उच्च पदों पर आसीन ऐसे लोग अपनी सुरक्षा के लिये राजनैतिक संरक्षण ले लेते हैं , और यहीं से दबाव में गलत निर्णय लेने का सिलसिला चल पड़ता है .भ्रष्टाचार के किस्से उपजते हैं . जो भी हो हर हालत में नुकसान तो संस्थान का ही होता है .

इन स्थितियों से बचने के लिये सरकार की दवा स्वरूप सरकारी व अर्धसरकारी संस्थानो का नेतृत्व आई ए एस अधिकारियों को सौंप दिया जाता है . संस्थान के वरिष्ठ अधिकारियों में यह भावना होती है कि ये नया लड़का हमें भला क्या सिखायेगा ? युवा आई ए एस अधिकारी को निश्चित ही स्स्थान से कोई भावनात्मक लगाव नही होता , वह अपने कार्यकाल में कुछ करिश्मा कर अपना स्वयं का नाम कमाना चाहता है , जिससे जल्दी ही उसे कही और बेहतर पदांकन मिल सके . जहां तक भ्रष्टाचार के नियंत्रण का प्रश्न है , स्वयं रेवेन्यू डिपार्टमेंट जो आई ए एस अधिकारियों का मूल विभाग है , पटवारी से लेकर उपर तक भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा अड्डा है , फिर भला आई ए एस अधिकारियों के नेतृत्व से किसी संस्थान में भ्रष्टाचार नियंत्रण कैसे संभव है ? आई ए एस अधिकारियों को प्रदत्त असाधारण अधिकारों , उनके लंबे विविध पदों पर संभावित सेवाकाल के कारण , संस्थान के आम कर्मचारियों में भय का वातावरण व्याप्त हो जाता है . मसूरी के आई ए एस अधिकारियों के ट्रेनिंग स्कूल की , अंग्रेजो के समय की एक चर्चित ट्रेनिंग यह है कि एक कौए को मारकर टांग दो , बाकी स्वयं ही डर जायेंगे , मैने अनेक बेबस कर्मचारियों को इसी नीति के चलते बेवजह प्रताड़ित होते हुये देखा है , जिन्हें बाद में न्यायालयों से मिली विजय इस बात की सूचक है कि भावावेश में शीर्ष नेतृत्व ने गलत निर्णय ही लिया था . मजेदार बात है कि हमारे वर्तमान सिस्टम में शीर्ष नेतृत्व द्वारा लिये गये गलत निर्णयो हेतु उन्हे किसी तरह की कोई सजा का प्रवधान ही नही है . ज्यादा से ज्यादा उन्हें उस पद से हटा कर एक नया वैसा ही पद किसी और संस्थान में दे दिया जाता है . इसके चलते अधिकांश आई ए एस अधिकारियों की अराजकता सर्वविदित है . सरकारी संस्थानो के सर्वोच्च पदो पर आसीन लोगो का कहना यह होता है कि उनके जिम्में तो केवल इम्प्लीमेंटेशन का काम है नितिगत फैसले तो मंत्री जी लेते हैं , इसलिये वे कोई रचनात्मक परिवर्तन नही ला सकते .

कार्पोरैट जगत के निजी संस्थानो की बात करें तो वहां हम पाते हैं कि मध्यम श्रेणी के संस्थानो में मालिक की मोनोपाली व वन मैन शो हावी है , पढ़े लिखे टाप मैनेजर भी मालिक या उसके बेटे की चाटुकारिता में निरत देखे जाते हैं . एम एन सी अपनी बड़ी साइज के कारण कठनाई में हैं . शीर्ष नेतृत्व अंतर्राष्ट्रीय बैठकों , आधुनिकीकरण , नवीनतम विज्ञापन ,संस्थान को प्रायोजक बनाने , शासकीय नीतियों में सेध लगाकर लाभ उठाने में ही ज्यादा व्यस्त दिखता है .वर्तमान युग में किसी संस्थान की छबि बनाने , बिगाड़ने में मीडीया का रोल बहुत महत्वपूर्ण है ,वो दिन और वो लोग अब नही हैं जब औरंगजेब जैसे राजा टोपियां सिलकर व्यक्तिगत जीवीकोपार्जन करते थे . दरअसल किसी संस्थान का नेतृत्व करते हुये अधिकारी की छबि व उस समय में व्यक्तिगत छबि में बहुत सूक्ष्म अंतर होता है , जिसमें मीडिया सहित बहुत कम लोग ही अंतर कर पाते हैं , स्वयं व्यक्ति तक तो फिर भी सही है पर उच्चाधिकारी के परिवारजन भी , संस्थागत सुविधाओ का दुरुपयोग खुले दिल से करते हैं . हमने देखा है कि रेल मंत्रालय में लालू यादव ने अपने समय में खूब नाम कमाया , कम से कम मीडिया में उनकी छबि एक नवाचारी मंत्री की रही . आई सी आई सी आई के शीर्ष नेतृत्व में परिवर्तन से उस संस्थान के दिन बदलते भी हमने देखा है .शीर्ष नेतृत्व हेतु आई आई एम जैसे संस्थानो में जब कैम्पस सेलेक्शन होते हैं तो जिस भारी भरकम पैकेज के चर्चे होते हैं वह इस बात का द्योतक है कि शीर्ष नेतृत्व कितना महत्वपूर्ण है . किसी संस्थान में काम करने वाले लोग तथा संस्थान की परम्परागत कार्य प्रणाली भी उस संस्थान के सुचारु संचालन व प्रगति के लिये बराबरी से जबाबदार होते हैं . कर्मचारियों के लिये पुरस्कार , सम्मान की नीतियां उनका उत्साहवर्धन करती हैं .कर्मचारियों की आर्थिक व ईगो नीड्स की प्रतिपूर्ती औद्योगिक शांति के लिये बेहद जरूरी है , नेतृत्व इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है .

राजीव दीक्षित भारतीय सोच के एक सुप्रसिद्ध विचारक हैं , व्यवस्था सुधारने के प्रसंग में वे कहते हैं कि यदि कार खराब है तो उसमें किसी भी ड्राइवर को बैठा दिया जाये , कार तभी चलती है जब उसे धक्के लगाये जावें . प्रश्न उठता है कि किसी संस्थान की प्रगति के लिये , उसके सुचारु संचालन के लिये सिस्टम कितना जबाबदार है ?हमने देखा है कि विगत अनेक चुनावों में पक्ष विपक्ष की अनेक सरकारें बनी पर आम जनता की जिंदगी में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नही आ सके . लोग कहने लगे कि सांपनाथ के भाई नागनाथ चुन लिये गये . कुछ विचारक भ्रष्टाचार जैसी समस्याओ को लोकतंत्र की विवशता बताने लगे हैं , कुछ इसे वैश्विक सामाजिक समस्या बताते हैं .कुछ इसे लोगो के नैतिक पतन से जोड़ते हैं . आम लोगो ने तो भ्रष्टाचार के सामने घुटने टेककर इसे स्वीकार ही कर लिया है , अब चर्चा इस बात पर नही होती कि किसने भ्रष्ट तरीको से गलत पैसा ले लिया , चर्चा यह होती है कि चलो इस इंसेटिव के जरिये काम तो सुगमता से हो गया . निजि संस्थानों में तो भ्रष्टाचार की एकांउटिग के लिये अलग से सत्कार राशि , भोज राशि , गिफ्ट व्यय आदि के नये नये शीर्ष तय कर दिये गये हैं .सेना तक में भ्रष्टाचार के उदाहरण देखने को मिल रहे हैं . क्या इस तरह की नीति स्वयं संस्थान और सबसे बढ़कर देश की प्रगति हेतु समुचित है ?

विकास में विचार एवं नीति का महत्व सर्वविदित है , इस सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को हमने जनप्रतिनिधियों को सौंप रखा है .एक ज्वलंत समस्या बिजली की है इसे ही लें , आज सारा देश बिजली की कमी से जूझ रहा है , परोक्ष रूप से इससे देश की सर्वांगीण प्रगति बाधित हुई है . बिजली , रेल की ही तरह राष्ट्रव्यापी सेवा व आवश्यकता है बल्कि रेल से कहीं बढ़कर है , फिर क्यों उसे टुकड़े टुकड़े में अलग अलग बोर्ड , कंपनियों के मकड़ जाल में उलझाकर रखा गया है , क्यों राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय विद्युत सेवा जैसी कोई व्यवस्था अब तक नही बनाई गई ? समय से भावी आवश्यकताओ का सही पूर्वानुमान लगाकर क्यों नये बिजली घर नही बनाये गये ? इसका कारण बिजली व्यवस्था का खण्ड खण्ड होना ही है , जल विद्युत निगम अलग है , तापबिजली निगम अलग, परमाणु बिजली अलग , तो वैकल्पिक उर्जा उत्पादन अलग हाथों में है, उच्चदाब वितरण , निम्नदाब वितरण अलग हाथों में है .एक ही देश में हर राज्य में बिजली दरों व बिजली प्रदाय की स्थितयों में व्यापक विषमता है . केंद्रीय स्तर पर राष्ट्रीय सुरक्षा व आतंकी गतिविधियों के समन्वय में जिस तरह की कमियां उजागर हुई हैं ठीक उसी तरह बिजली के मामले में भी केंद्रीय समन्वय का सर्वथा अभाव है . जिसका खामियाजा हम सब भोग रहे हैं .नियमों का परिपालन केवल अपने संस्थान के हित में किये जाने की परंपरा गलत है . यदि शरीर के सभी हिस्से परस्पर सही समन्वय से कार्य न करे तो हम नही चल सकते , विभिन्न विभागों की परस्पर राजस्व , भूमि या अन्य लड़ाई के कितने ही प्रकरण न्यायालयों में हैं ,जबकि यह एक जेब से दूसरे में रुपया रखने जेसा ही है . इस जतन में कितनी सरकारी उर्जा नष्ट हो रही है , ये तथ्य विचारणीय है . पर्यावरण विभाग के शीर्ष नेतृत्व के रूपमें टी एन शेषन जैसे अधिकारियों ने पर्यावरण की कथित रक्षा के लिये तत्काकलीन पर्यावरणीय नीतियों की आड़ में बोधघाट परियोजना जैसी जल विद्युत उत्पादन परियोजनाओ को तब अनुमति नही दी ,निश्चित ही इससे उन्होने स्वयं अपना नाम तो कमा लिया पर इससे बिजली की कमी का जो सिलसिला प्रारंभ हुआ वह अब तक थमा नही है . बस्तर के जंगल सुदूर औद्योगिक महानगरों का प्रदूषण किस स्तर तक दूर कर सकते हैं यह अध्ययन का विषय हो सकता है ,पर हां यह स्पष्ट दिख रहा है कि आज विकास की किरणें न पहुंच पाने के कारण ये जंगल नक्सली गतिविधियो का केंद्र बन चुके हैं . आम आदमी भी सहज ही समझ सकता है कि प्रत्येक क्षेत्र का संतुलित , विकास होना चाहिये . पर हमारी नीतियां यह नही समझ पातीं . मुम्बई जैसे नगरो में जमीन के भाव आसमान को बेध रहे हैं .प्रदूषण की समस्या , यातायात का दबाव बढ़ता ही जा रहा है . आज देश में जल स्त्रोतो के निकट नये औद्योगिक नगर बसाये जाने की जरूरत है , पर अभी इस पर कोई काम नही हो रहा !



आवश्यकता है कि कार्पोरेट जगत , व सरकारी संस्थान अपनी सोशल रिस्पांस्बिलिटि समझें व देश के सर्वांगीण हित में नीतियां बनाने व उनके इम्प्लीमेंटेशन में शीर्ष नेतृत्व राजनेताओ के साथ कंधे से कंधा मिलाकर अपनी भूमिका निर्धारित करें ,यह सूत्र आत्मसात करने की आवश्यकता है कि देश के विभिन्न संस्थानों की प्रगति ही देश की प्रगति की इकाई है .





ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर , जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

9425806252

Sunday, 25 April 2010

अब समझ आया न कि क्यो नही खुल रहे थे नये मेडिकल कालेज ?


अब समझ आया न कि क्यो नही खुल रहे थे नये मेडिकल कालेज  ?  और क्यो है मेडिकल कालेजो की भारी भरकम फीस ? क्यो डाक्टरो की सेवानिवृति आयु ६५ बरस करनी पड़ रही है ?
मेडिकल कांउसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के अध्यक्ष केतन देसाई के पास से कथित तौर पर 1801.5 करोड़ रुपए नकद और डेढ़ टन स्वर्ण आभूषण बरामद किए हैं। दिल्ली व अहमदाबाद में उसके निवासों और लॉकरों से यह बरामदगी की गई।

पंजाब के एक मेडिकल कालेज को मान्यता देने के बदले दो करोड़ रुपए की रिश्वत मांगने के आरोप में देसाई को गुरुवार रात को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था। फिलहाल वह पांच दिनों की पुलिस हिरासत में है। सीबीआई उससे पूछताछ कर रही है।

यहां सीबीआई के सूत्रों ने बताया कि देसाई को आगे की जांच के लिए रविवार को अहमदाबाद ले जाया जाएगा। अभी तक की पूछताछ में इस बात के संकेत मिले हैं कि उसके पास से लगभग 2,500 करोड़ रुपए बरामद हो सकते हैं।

देसाई ने पूछताछ के दौरान शुरुआत में प्रधानमंत्री कार्यालय में पहचान होने का दावा करते हुए सहयोग करने से इनकार कर दिया। लेकिन बाद में उसने मुंह खोलना शुरू किया। जब जांच एजेंसी ने उससे पूछा कि उसने रकम कहां रखी है तो पहले तो उसने विरोधाभासी बयान दिए। उसने हरियाणा, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में कुछ जगहों के नाम लिए।

रिकार्डे से छेड़छाड़ : 

सीबीआई द्वारा बरामद फाइलों और दस्तावेजों से पता चलता है कि देसाई ने मेडिकल कालेजों को मान्यता दिलवाने के लिए रिकार्डे से छेड़छाड़ भी की थी। जिन कालेजों ने नियत तिथि के बाद आवेदन दायर किए थे उन्हें भी 25 से 30 करोड़ रुपए लेकर मंजूरी दी गई। कई कालेजों को अवैध रूप से मंजूरी देने की बात पता लगने के बाद सीबीआई ने अब अनुमति देने से जुड़े सभी रिकार्डे और फाइलों की जांच करने का फैसला किया है।

अपनी पसंद के इंस्पेक्टर : 

देसाई ने कालेजों को मंजूरी से पहले वहां के :औचक निरीक्षण– के लिए अपनी पसंद के 20 इंस्पेक्टर नियुक्त किए थे। इनमें मालती मेहरा और सुरेश शाह भी शामिल हैं। ये इंस्पेक्टर देसाई के एजेंट के तौर पर काम करते थे और कालेज को मंजूरी देने के लिए रेट तय करने में भी इनकी अहम भूमिका होती थी। ये लोग कभी-कभी कलेक्शन एजेंट के तौर पर भी काम करते थे।








भड़ास में मेरी १७अगस्त २००८ की पोस्ट पढ़ें 




कब तक हम विदेश भैजेगे अपने बच्चो को डाक्टरी पढ़ाने ..?
इन दिनो देश के ढ़ेरो बच्चे डाक्टरी की शिक्षा पाने के लिये चीन , रूस आदि देशो की ओर जा रहे है . इससे जहां एक तरफ भारत को आर्थिक नुकसान हो रहा है वही लोगो को असाधारण असुविधा हो रही है . पर बचचो के सुखद भविष्य की कामना में लोग यह कदम उठाने को विवश है. ईन देशो से मेडिकल शिक्षित बच्चो को देश में प्रैक्टिस करने के लिये ima की एक परीक्षा पास करणी होती है .
यदि सरकार आर्थिक कारणौ से नये मेडिकल कालेज नही खौल पा रही है तो , निजी क्षेत्र को मेडिकल कालेज शुरू करने दे , इन कालेजो से पास बचचे ima की वही परीक्षा पास करके अपनी प्रैक्टिस कर सकते है .
देश की आबादी जिस तेजी से बढ़ रही है यदि मेदिकल कालेज नही खोले गये तो कुछ ही वर्षो में डाक्टर ढ़ूढ़े नही मिलेंगे .
क्या सोचते है आप?
Posted by Vivek Ranjan Shrivastava  
1 comments:


रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...
विवेक जी,
जहाँ तक डॉक्टरों का सवाल है, आप निश्चिंत रहे क्यूंकि हमारे देश में डॉक्टरों का (लाला टाइप धंधे) अकाल कभी नही पड़ने वाला है और विदेश जाने वाले बच्चे लालागिरी करने की शिक्षा लेने ही जाते हैं, जहाँ तक डॉक्टरों का सवाल है सो हमारे देश में सच्चे डॉक्टरों का हमेशा से अकाल रहा है और उसका देश या विदेश से कोई सरोकार कभी नही रहा है


Wednesday, 7 April 2010

एक कागज जलाने का मतलब है कि हमने एक हरे पेड़ की एक डगाल जला दी ....

एक कागज जलाने का मतलब है कि हमने एक हरे पेड़ की एक डगाल जला दी ....

स्कूलों में , कार्यालयों में प्रतिदिन ढ़ेरों कागज साफ सफाई के नाम पर जला दिया जाता है ....... कभी आपने जाना है कि कागज कैसे बनता है ???? जब हम यह समझेंगे कि कागज कैसे बनता है , तो हम सहज ही समझ जायेंगे कि एक कागज जलाने का मतलब है कि हमने एक हरे पेड़ की एक डगाल जला दी ....रद्दी कागज को रिसाइक्लिंग के द्वारा पुनः नया कागज बनाया जा सकता है और इस तरह जंगल को कटने से बचाया जा सकता है

हमारे देश में जो पेपर रिसाइक्लिंग प्लांट हैं , जैसे खटीमा , उत्तराखण्ड में वहां रिसाइक्लिंग हेतु रद्दी कागज अमेरिका से आयात किया जाता है ...दूसरी ओर हम सफाई के नाम पर जगह जगह रोज ढ़ेरो कागज जलाकर प्रदूषण फैलाते हैं ....

अखबार वाले , अपने ग्राहकों को समय समय पर तरह तरह के उपहार देते हैं ... क्या ही अच्छा हो कि अखबार की रद्दी हाकर के ही माध्यम से प्रतिमाह वापस खरीदने का अभियान भी अखबार वाले चलाने लगें और इसका उपयोग रिसाइक्लिंग हेतु किया जावे .

विवेक रंजन श्रीवास्तव
मो ९४२५८०६२५२
ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी रामपुर जबलपुर