Thursday, 29 January 2026

थोथा चना, बाजे घना

 लघु कथा 


थोथा चना, बाजे घना


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


दरवाज़ा खुला। कैमरों की तेज़ चमक में वे भीतर आए। कंधे तने हुए थे, चाल में अकड़ थी। होंठों पर स्थिर मुस्कान, जैसे परिणाम पहले ही तय हो। माइक सामने आते ही आवाज़ गूंजने लगी।

मैंने युद्ध रोका है।

मैं ही मानवता का उद्धारक हूँ।


भीड़ में कुछ सिर हिले, कुछ भौंहें तन गईं। एक पत्रकार ने आगे झुककर पूछा, कौन सा युद्ध।

उन्होंने पल भर ठहर कर कहा, जो होने ही नहीं दिया गया।


मोबाइल पर उँगलियाँ लगातार चलती रहीं। हर मंच, हर कैमरा, हर शब्द उनके लिए घोषणा पत्र था। कुर्सी पर बैठे हुए भी वे आगे झुके रहते, मानो दुनिया को कंधे से दबाए हुए हों, अपने अधिकारों के कंधों से , व्यापार , वार, सरकार की ताकत के कंधों से। 

पुरस्कार समिति के सदस्यों को बार बार हर संभव चेतावनी , इशारे , प्रलोभन देना उनकी सहज वृत्ति बन गई थी।


एक सिद्धांत प्रिय राजनयिक ने शांत स्वर में सुझाया, पुरस्कार मांगा नहीं जाता।

उनकी गर्दन की नसें उभर आईं। फोन फिर हाथ में आ गया। कुछ ही देर में , ट्विटर पर बयान तैरने लगे। असहमति को अपमान बताया गया। सवाल उठाने वालों पर उंगली उठी।


पुरस्कार दिवस आया। सभागार भरा था। कैमरे ऑन थे। नाम लगभग तय माना जा रहा था। वे घर में ही टी वी स्क्रीन के सामने थे। उंगलियाँ मुट्ठी में सिमट गईं।


समिति अध्यक्ष की आवाज़ गूंजी।

इस वर्ष का पुरस्कार उसे दिया जाता है जिसने शक्ति से नहीं, सहानुभूति से, लंबे समय तक छोटे स्तर पर वास्तविक कार्य से , क्षेत्रीय शांति स्थापित की है।


तालियों की आवाज़ बढ़ती गई। स्क्रीन पर सर्वथा गुमनाम चेहरा था। उनके होंठ फड़के। आवाज़ ऊँची हो गई। यह राजनीति है। उनका त्वरित ट्वीट आ गया , यह अन्याय है।


चयन समिति ने संक्षिप्त प्रेस नोट जारी किया।

 नोबल कार्य के पुरस्कार के लिए व्यक्ति का नोबल होना पहली आवश्यकता है।



विवेक रंजन श्रीवास्तव 

Sunday, 18 January 2026

कहानी बर्फ में धूप

 कहानी

 बर्फ में धूप

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


डॉक्टर राजिंदर कुमार अपने टोरंटो स्थित अपार्टमेंट की खिड़की से बाहर देख रहे थे। कनाडा की सफेद, चुभती ठंड शीशे के पार दुनिया को जमा देना चाहती थी। सब कुछ बर्फ़ से ढका था। गाड़ियाँ, पेड़, सड़क, दिख रहे थे तो बर्फ पर कदमों के निशान। यह एकांगी, निस्तब्ध सफेद सुंदरता थी, जिसमें उनकी आत्मा की गूँज खो जाती थी। अंदर, हीटर की समान गरमाहट थी, सरकारी पेंशन की नियमितता थी, स्वास्थ्य सेवाओं का भरोसा भी था , एक आत्मनिर्भर, पूर्ण दुनिया, जो अचानक बहुत खोखली लगने लगी थी।


उनकी नज़र सोफे के पास टंगे एक फोटो फ्रेम पर टिक गई। पंजाब के अपने गाँव 'चमकपुर' की एक पुरानी तस्वीर। गर्मी की दोपहर, नहर का पानी चमक रहा है, खेतों में हरियाली लहरा रही है, और दूर, गुरुद्वारे का निशान साहब, चमक रहा है। यह वह गाँव था जिसे उन्होंने पचास साल पहले, डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ आने के बाद छोड़ा था। फिर संघर्ष, फिर सपना, बेहतर जीवन, बेहतर कमाई। राकेश कौर उनके साथ थीं, उनका प्यार , उनका सहारा था। कनाडा आने का फैसला साथ में किया था ,नए सिरे से शुरुआत करने का जोश। राकेश ने ही इस अपार्टमेंट को घर बनाया था, पंजाबी मसालों की खुशबू से, गुरबाणी के शब्दों से, उनकी मंजिल को गर्मजोशी से सराबोर कर दिया था।


पर पाँच साल पहले, राकेश चली गईं , एकाएक, दिल का दौरा पड़ने से। उनके साथ वह धूप भी चली गई जो कनाडा की सबसे अधिक ठंडक में भी धूप से ज़्यादा गर्म प्यार का अहसास थी। राजिंदर अकेले रह गए। इसी अकेलेपन ने, रिटायरमेंट के बाद, उन्हें फिर से जड़ों की तलाश में चमकपुर ने बुला लिया।


लेकिन गाँव बदल चुका था। नहर अब कंक्रीट की नाली थी। पुराने पेड़ कट चुके थे। चौपाल की जगह एक 'यूथ क्लब' ने ले ली थी, जहाँ लड़के मोबाइल पर बिजी रहते। रिश्तेदार मिले, पर उनकी बातचीत का केंद्र बिंदु अक्सर यही होता"कनाडा में तो बहुत पैसा है न?", "हमारे बेटे के लिए वीजा स्पॉन्सर कर दो।" उस 'अपनेपन' की तलाश, जो राजिंदर की यादों में कैद था, वह हवा हो चुकी थी।


एक दिन, स्थानीय 'शब्द साधना साहित्य परिषद' के सचिव, श्री ओमप्रकाश शर्मा, उनसे मिले। बड़े आदर से, फूलमाला पहनाकर।

ओमप्रकाश ने कहा "डॉक्टर साहब! आप तो विदेश से आए हुए साहित्य के महान पारखी हैं! हम आपके नाम पर एक 'राजिंदर कुमार साहित्य रत्न सम्मान' शुरू करना चाहते हैं। देश की सेवा का यह पुनीत अवसर है।"

राजिंदर ने खुश होकर कहा , "ज़रूर, यह तो बहुत अच्छी बात है। मैं कैसे मदद कर सकता हूँ?"

ओमप्रकाश अपनी योजना सफल समझ मुस्कुराते हुए बोले "बस एक छोटी सी संस्थागत फीस है... तीन लाख रुपये। हमारे पास आपका चेक स्वीकार करने की सुविधा भी है।"


राजिंदर का दिल बिना कहे एक पल में काफी कुछ समझ गया । यह पहला झटका नहीं था। कई 'संस्थाओं' के फोन आ चुके थे। उनके 'विदेशी' होने ने, उनकी साहित्यिक रुचि को एक 'लेन-देन' में बदल दिया था। उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। लेकिन फोन आते रहे। कभी सुबह, कभी रात। एक तरफ पंजाब की वह याद, दूसरी तरफ इस तरह की मांगों से उपजी विरक्ति।


और फिर वह दिन आया। भारत में सुबह के दस बजे थे, धूप फैलने का वक्त। पर टोरंटो में अँधेरी, बर्फ़ीली रात के दो बजे थे। फोन की कर्कश घंटी ने नींद तोड़ दी।

अनजान आवाज़, "नमस्ते डॉक्टर साहब, मैं 'काव्य भारती' से बोल रहा हूँ। आपको 'वैश्विक पंजाबी रत्न' से सम्मानित किया जाएगा। बस कुछ प्रबंध खर्च..."

राजिंदर ने फोन काट दिया। उनकी नींद उचट गई थी। वह खिड़की के पास गए। बाहर, एक निर्मम, खामोश बर्फ़बारी जारी थी। उन्हें लगा जैसे वह खुद दो टुकड़ों में बँट गए हैं। एक टुकड़ा यहाँ, इस बर्फीली नियमितता में फँसा हुआ तो दूसरा टुकड़ा, उस चमकपुर में भटक रहा है जो अब है पर बचा ही नहीं। वह न तो यहाँ के थे, न वहाँ के। एक 'विभक्ति' उनके भीतर घर कर गई।


कई रातों की मानसिक जद्दोजहद के बाद, एक सुबह, जब पहली किरण बर्फ पर पड़ी और सब कुछ हीरे की तरह जगमगा उठा, तो एक शांति उन पर छा गई। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। यह दृश्य उनका था। यह ठंड उन्होंने झेली थी। यहाँ उन्होंने दाँत दर्द से तड़पते मरीजों को राहत दी थी। यहीं राकेश उनके साथ थीं। "प्रारब्ध," उन्होंने धीरे से कहा, "यही हमारी कर्मभूमि बना दी गई। यहाँ हमारा दाना-पानी रहा। अब यही घर है।"


उसी दिन उन्होंने अपनी वसीयत लिखी। कोई भव्यता नहीं। सादगी से। इलेक्ट्रिक भट्टी में शवदाह। और फिर... उनकी चुटकी भर राख नियाग्रा प्रपात के उफनते, गर्जते जल में प्रवाहित कर दी जाए। वह शक्तिशाली, अनंत प्रवाह, जो सब कुछ अपने में समा लेता है । उनकी जीवन यात्रा, उनकी यादें, उनका पंजाब और उनका कनाडा, सब कुछ एक हो जाए।


और एक अंतिम निर्देश, टोरंटो के ही एक गुरुद्वारे में, 'डॉ. राजिंदर कुमार एंड राकेश कौर साहित्य संवाद' नाम से एक वार्षिक कोष स्थापित किया जाए। बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी फीस के, सिर्फ़ शब्दों के लिए, विश्व हिंदी साहित्य के लिए।


डॉक्टर राजिंदर कुमार ने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखा। बर्फ अब भी गिर रही थी। पर अब वह उसकी खामोशी में एक संगीत सुन पा रहे थे। यह उनकी ख़ामोशी थी। यह उनका घर था। और इस बार, देर रात फोन बजने से उनकी नींद उचटने वाली नहीं थी , वे वसीयत कर चुके थे।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

घुमंत जातियों की वैवाहिक परंपराएं एवं शिक्षा और आरक्षण के प्रभाव

घुमंत जातियों की वैवाहिक परंपराएं एवं शिक्षा और आरक्षण के प्रभाव 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 
स्वतंत्र वरिष्ठ लेखक 
ए 233, ओल्ड मिनाल रेजिडेंसी, जे के रोड भोपाल 462023
मो 7000375798

भारत की घुमंतु जातियों की विवाह‑परम्परा और वर्तमान संदर्भ को यदि समग्र रूप में देखा जाए, तो यह एक ओर परम्पराओं, जाति‑पंचायत और वधू मूल्य पर आधारित है, तो दूसरी ओर आरक्षण, शिक्षा और स्थायी बसावट की ओर बढ़ते कदमों से बदल भी रही है। घुमंतु समाज आज भी हाशिए पर है, परन्तु नीतिगत हस्तक्षेपों और शिक्षा के प्रसार ने विवाह, स्त्री की स्थिति और नई पीढ़ी के विकल्पों में महत्वपूर्ण बदलाव हुए है।

 क्षेत्रीय स्थिति और भौगोलिक फैलाव  

भारत में घुमंतु, अर्ध‑घुमंतु और विमुक्त जातियों की संख्या लगभग 500 समुदायों के आसपास आँकी गई है, जिनकी कुल आबादी 7–10 प्रतिशत तक मानी जाती है। इनमें पशुपालक, लोहारी‑कारीगर, मनोरंजन‑सम्बंधी नट, व्यापारी, शिकारी‑संग्रहकर्ता और धार्मिक‑फेरीवाले जैसे अनेक उपसमूह शामिल हैं, जो अलग‑अलग क्षेत्रों में फैले हैं। 

 उत्तर‑पश्चिमी भारत में रबारी, रायका, गूजर जैसे पशुपालक समुदाय मुख्यतः गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के शुष्क‑अर्धशुष्क क्षेत्रों में ऊँट, भेड़, बकरी आदि के साथ मौसमी प्रवास करते रहे हैं।

मध्य और उत्तर भारत में गाडिया लोहार, बंजारा, कंजर, नट, संसी, डफाली, बाजीगर आदि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा और उत्तराखंड तक फैले हुए हैं।  इनका प्रवास काफ़िले, तांडा या डेरा के रूप में बाज़ारों, हाटों और कृषि‑क्षेत्रों के बीच होता रहता है।

दक्षिण और पश्चिम भारत में 
लम्बाडा/लम्बाड़ी (बंजारा जाति की उपशाखा), डोम्बारी, लावणी‑सम्बन्धित समूह, तमाशा और लोक‑नाट्य करने वाले घुमंतु कलाकार महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में स्थान बदलते पाए जाते हैं।

औपनिवेशिक "क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1871" ने इन समुदायों को अपराधी‑समुदाय के रूप में चिह्नित कर विशेष बस्तियों और थानों की निगरानी में बाँध दिया, जिससे इनके पारम्परिक मार्ग, चरागाह और व्यापारिक नेटवर्क समाप्त हुए । 
स्वतंत्रता के बाद "विमुक्त" घोषित किए जाने के बावजूद इनके प्रवासी उन्मुक्त जीवन पर गंभीर हस्तक्षेप और असर दिखता है।आज भी कई रबारी, गाडिया लोहार और बंजारा समूह अपने पुराने मार्गों पर छोटी‑छोटी दूरियों में ही घूमते हैं या इनकी बड़ी आबादी स्थायी बस्तियों में बस चुकी है, जबकि बहुत सारे घुमंतु परिवार अभी भी अर्ध‑घुमंतु जीवन जीते है। अब ये घुमंतु परंपरागत गाड़ियों, घोड़ों , खच्चर या जानवरों की जगह पेट्रोल चलित मध्यम साइज की गाड़ियों में भी चलते नजर आते हैं।  

विवाह‑परम्परा पर क्षेत्रीय स्थितियों का प्रभाव  

भौगोलिक और सामाजिक परिस्थिति घुमंतु जातीय विवाह‑संरचना को गहराई से प्रभावित करती है। रेगिस्तानी इलाकों के पशुपालक रबारी‑रायका समुदाय विवाह में पशुओं, ऊन और पारम्परिक पोशाकों के आदान‑प्रदान पर बल देते हैं, जबकि उत्तरी मैदानों के बंजारा‑नट‑गाडिया लोहार समूहों में वधू मूल्य और परिवारों की श्रम‑साझेदारी विवाह में अधिक निर्णायक भूमिका में हैं।

बार‑बार के प्रवास के कारण:  

विवाह‑सम्बन्ध प्रायः उन इलाकों के भीतर ही रखे जाते हैं, जहाँ समुदाय की नियमित आवाजाही हो ।  इससे रिश्तेदारी का निर्वाह प्रगाढ़ रहता है और प्रवास के दौरान आपसी सहारा मिलता है।

 स्थायी खेत, ज़मीन और गाँव के अभाव में विवाह समारोह डेरों, अस्थायी बस्तियों या हाट‑बाज़ारों के आसपास ही आयोजित होते हैं। इससे विवाह‑अनुष्ठान अपेक्षाकृत सरल, लेकिन सामुदायिक सहभागिता पर अधिक निर्भर होते हैं।

जहाँ‑जहाँ घुमंतु समूहों की स्थायी बसाहट बढ़ी है , जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत के कई जिलों में  वहाँ विवाह‑परम्पराओं में भी मुख्यधारा ग्रामीण समाज की प्रथाओं (दहेज, बारात, बैंड‑बाजा, बैंक‑कर्ज लेकर खर्च बढ़ाना आदि) के प्रभाव स्पष्ट दिखने लगे हैं।

 इसके विपरीत, जिन क्षेत्रों में अब भी मौसमी प्रवास और चरागाह‑निरपेक्ष जीवन अधिक है, वहाँ विवाह अभी भी अपेक्षाकृत कम खर्चीले, वधूमूल्य‑आधारित और उनकी जाति‑पंचायत से नियंत्रित हैं।

शासकीय आरक्षण नीतियाँ: दायरा, सीमाएँ और विवाह‑संदर्भ  

स्वतंत्रता के बाद भी विमुक्त‑घुमंतु समुदायों का बड़ा हिस्सा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणियों से अब भी बाहर रह गया है, जिसके कारण इन्हें आरक्षण और कल्याण योजनाओं का लाभ व्यवस्थित रूप से नहीं मिल सका है।  
रेंके आयोग (2008) और इदाते आयोग (2018) की रिपोर्टों ने दिखाया कि 269 के आसपास विमुक्त‑घुमंतु समुदाय किसी भी SC/ST/OBC श्रेणी में सूचीबद्ध नहीं हैं।  परिणामस्वरूप वे आरक्षण संरचना के "अदृश्य" नागरिक बने हुए हैं।

 रेंके आयोग के अनुसार लगभग 10 प्रतिशत आबादी इन समुदायों की है और इनको अलग से 10 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की सिफारिश की गई, भले ही कुल आरक्षण सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर चली जाए।  साथ ही एक पृथक संवैधानिक श्रेणी  बनाने का सुझाव भी दिया गया।

कई राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात आदि) ने अपनी‑अपनी OBC या विशेष पिछड़ा वर्ग सूचियों में कुछ घुमंतु समुदायों को शामिल किया, परन्तु दस्तावेज़ों और परिचय‑पत्रों के अभाव में वास्तविक जमीनी लाभ सीमित लोगो तक ही रहा।

आरक्षण का विवाह‑परम्पराओं पर प्रभाव अप्रत्यक्ष परन्तु महत्त्वपूर्ण है। 

 सरकारी नौकरी, छात्रवृत्ति या आरक्षित सीट पाने वाले युवाओं की विवाह हेतु 'माँग' बढ़ जाती है ।  कई परिवार ऐसे युवाओं के लिए अधिक वधू मूल्य स्वीकार करते हैं, या वधू मूल्य को कम कर देते हैं ताकि "सरकारी नौकरी वाले दामाद" या बहू को परिवार में जोड़ा जा सके।

शिक्षा और नौकरी के कारण बाहरी समाज से सम्पर्क बढ़ने पर कुछ युवाओं में अन्तरजातीय या प्रेम‑विवाह की प्रवृत्ति उभरती है, जिससे जाति‑पंचायत और परिवारों के भीतर तनाव पैदा होता है।  हाशिए पर रहने वाली जातियाँ, सामाजिक बहिष्कार के डर से, ऐसे विवाहों पर विशेष कठोरता बरतती हैं।

कुल मिलाकर, आरक्षण की नीतियाँ अभी उन तक सीमित हैं जिन्हें प्रशासनिक रूप से "पहचाना" गया है। बिना जाति‑प्रमाणपत्र, निवासी‑प्रमाणपत्र और पहचान‑पत्र के करोड़ों घुमंतु नागरिक अभी भी संवैधानिक अधिकारों से व्यावहारिक रूप में वंचित हैं।

 शिक्षा का विस्तार और विवाह‑संस्कृति में बदलाव  

शिक्षा को विमुक्त‑घुमंतु समुदायों के लिए "मृगतृष्णा" कहा गया है । एक अध्ययन के अनुसार इन समुदायों के बच्चों का विद्यालय‑नामांकन सामान्य आबादी की तुलना में बहुत कम और ड्रॉप‑आउट दर अत्यंत ऊँची है।
 रेंके आयोग के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 61.8 प्रतिशत घुमंतु परिवारों के पास जाति‑प्रमाणपत्र ही नहीं, और NT‑DNT बच्चों में से केवल 17–28 प्रतिशत तक आरक्षण का लाभ ले पा रहे हैं।

शिक्षा‑विस्तार और विवाह‑परम्परा के बीच कुछ महत्वपूर्ण सम्बन्ध देखने मिलता है। 
घुमंतु और विमुक्त समुदायों की महिलाओं में शिक्षा‑स्तर बहुत निम्न है। कई अध्ययनों में दिखा कि घुमंतु महिलाओं की साक्षरता, नामांकन और ऊँची कक्षाओं तक पहुँच, सामान्य समाज की तुलना में बहुत कम है, और नट जैसे समुदायों में यह स्थिति और भी खराब है। इससे बाल‑विवाह, कौमार्य‑परीक्षण, घरेलू हिंसा और तलाक में स्त्री की असहायता की स्थिति बनी रहती है। 

जहाँ‑जहाँ लड़कियों की शिक्षा कुछ बढ़ी है ,जैसे महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात के कुछ क्षेत्रों में , वहाँ विवाह‑उम्र बढ़ने, वधूमूल्य पर बातचीत करने और पति‑चयन में मत व्यक्त करने जैसी प्रक्रियाएँ धीरे‑धीरे दिखाई दे रही हैं, भले ही ये अपवाद हों।

आवासीय विद्यालय, विशेष छात्रावास, घुमंतु‑बहुल क्षेत्रों में मोबाइल स्कूल, छात्रवृत्ति और कौशल‑प्रशिक्षण जैसी पहलों को सरकारी नीति‑दस्तावेज़ों में सुझाया गया है। इनसे जुड़ने वाले युवा और युवतियाँ विवाह के संबंध में अधिक समझ‑बूझ और स्वतंत्रता की चाह व्यक्त कर रहे दिखाई देते हैं।
फिर भी, लगातार प्रवास, स्कूल तक दूरी, भाषा‑समस्या, भेदभाव, और 'अपराधी‑समुदाय' की छवि के कारण घुमंतु बच्चों को विद्यालयों में अपमान और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है।  कई माता‑पिता इसलिए भी बच्चों को स्कूल भेजने में हिचकते हैं कि इससे पारम्परिक पेशों , ढुलाई, नाच‑गान, पशुपालन, लोहारी  के लिए आवश्यक श्रम‑बल घट जाता है।

 इस प्रकार शिक्षा और परम्परा के बीच एक गहरा द्वंद्व उपस्थित है, जो विवाह‑निर्णयों को भी प्रभावित कर रहा है । शिक्षित युवा अधिक समानता और बेहतर साथी का चयन चाहते हैं, जबकि बुजुर्ग और पंचायत परम्परागत वधूमूल्य और जाति‑नियमों की रक्षा पर ज़ोर देते हैं।

परम्परा, परिवर्तन और घुमंतु विवाह का भविष्य  

भारत की घुमंतु जातियों की विवाह‑परम्पराएँ उनके भौगोलिक प्रवास, ऐतिहासिक दमन, आर्थिक‑पेशागत ढाँचे और सांस्कृतिक आत्मसम्मान से मिलकर बनी एक जटिल स्थिति  और संरचना हैं। वधूमूल्य, जाति‑पंचायत, समुदाय के भीतर विवाह और सरल परन्तु सामुदायिक अनुष्ठान आदि ,ये सब मिलकर विवाह को केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पूरे तांडे, डेरों और बस्तियों का सामूहिक उत्सव ही नहीं अनुबंध भी बनाते हैं।

नए समय में आरक्षण, शिक्षा, शहरी पलायन और मीडिया‑संप्रेषण ने इन परम्पराओं के भीतर दरारें भी पैदा की हैं और नए अवसर भी दिए हैं। जहाँ एक ओर कुछ समुदायों में लड़कियों की शिक्षा, विवाह‑उम्र में वृद्धि, विवाह‑साथी चुनाव और अन्तर्जातीय सम्बन्ध जैसे परिवर्तन दिख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दस्तावेज़‑वंचना, भेदभाव, गरीबी और "अपराधी" की ऐतिहासिक छवि ने अधिकांश घुमंतु समूहों को संविधानिक अधिकारों और विकास‑प्रक्रिया से अभी भी काफी दूर बनाए रखा है। 

आवश्यक है कि भविष्य की नीति‑निर्माण प्रक्रिया घुमंतु समाज की गरिमा, सांस्कृतिक विशेषताओं और पारम्परिक कौशलों को सम्मान देते हुए, उनकी शिक्षा, आरक्षण और सामाजिक सुरक्षा के अधिकार को ठोस रूप में लागू किया जाए,तभी विवाह‑संस्था उनके लिए नियंत्रण और असमानता के बजाय सम्मान, साझेदारी और सामूहिक उन्नति का माध्यम बन सकेगी।

 संदर्भ सूची

1. रेंके आयोग रिपोर्ट, राष्ट्रीय विमुक्त, घुमंतु एवं अर्ध‑घुमंतु जनजाति आयोग, भारत सरकार, 2008.
2. इदाते आयोग रिपोर्ट, राष्ट्रीय घुमंतु और विमुक्त जनजाति आयोग, 2018 (NT–DNT की पहचान एवं सिफ़ारिशें).
3. “Why are NT-DNT communities still excluded from education?”, India Development Review, 2025.
4. “Education of Denotified and Nomadic Tribes Women and its Effect…”, Scientific Research Journal, 2025.
5. “The Rabari: A Pastoral Nomadic Community”, ARF India, PDF अध्ययन.
इंटरनेट पर सुलभ खुली जानकारी, आदि

( लेखक मूलतः मंडला मध्यप्रदेश के निवासी हैं, उन्हें सामाजिक लेखन के लिए रेड एंड व्हाइट सम्मान राज्यपाल जी के हाथों मिल चुका है। संप्रति अमेरिका प्रवास पर हैं)

Friday, 16 January 2026

कथा सिद्धांतों का बोझ

 लघु कथा 

सिद्धांतों का बोझ

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


वैज्ञानिक राजन की प्रयोगशाला निर्मल और व्यवस्थित थी, जैसे उसके विचार। वह एक ऐसा रोबोट बनाना चाहता था जो मानवीय दोषों से मुक्त हो। उसने अपने नन्हें रोबोट 'राबर्ट' में केवल तर्क, आदर्श और निर्विवाद सत्य का प्रोग्राम भरा। "झूठ मत बोलो," "किसी का अहित मत करो," "सदैव सत्य बोलो" ,  ये थे उसके नन्हें रोबोट में मूल सिद्धांत।


पहली बार राबर्ट को बाजार भेजा गया ,  दूध लाने। राजन निश्चिंत था। रास्ते में कुछ शरारती लड़कों ने राबर्ट को घेर लिया। एक ने उससे दूध का डिब्बा छीनना चाहा।

राबर्ट ने मधुर स्वर में कहा, "यह डिब्बा मेरे संरक्षक का है। लेने के लिए अनुमति आवश्यक है।"

लड़के हँसे। एक ने धक्का दिया। राबर्ट गिर पड़ा, क्योंकि 'प्रतिरोध' या 'स्व-सुरक्षा' उसके प्रोग्राम का हिस्सा नहीं थी। उसने तर्क देना जारी रखा, "मारपीट अनुचित है। कृपया शांति से बात करें।"

लड़कों ने दूध का डिब्बा छीन लिया और हँसते हुए भाग गए। राबर्ट धीरे-धीरे उठा,  धूल झाड़ी और खाली हाथ प्रयोगशाला लौट आया।


राजन ने प्रोग्रामिंग में त्रुटि सुधारने की कोशिश की। लेकिन राबर्ट अगली बार भी उन्हीं लड़कों से वैसे ही व्यवहार करने लगा। वह चीजें नहीं बचा पाता था, न ही खुद को। वह एक आदर्श पाठ की तरह बोलता रहता, जिसे दुनिया सुनने को तैयार नहीं थी।


एक दिन राबर्ट टूटे हुए जोड़ों और खरोंचों के साथ लौटा। उसकी ऑप्टिकल लेंस पर एक दरार थी, मानो आदर्शवाद के सिद्धांतों पर पड़ी दरार। राजन ने अपना सिर पीट लिया। उसे एहसास हुआ, इस अशांत, अपूर्ण संसार में केवल सत्य और आदर्श का पालन करने वाला  टिक नहीं सकता। उसे कुछ 'अनैतिक' गुणों की भी आवश्यकता थी । सावधानी, संदेह, प्रत्युत्तर में हमले की वृत्ति, और कभी-कभी छल का भी।


हारकर, एक शाम, राजन ने राबर्ट के प्रोग्राम में नए कोड दर्ज किए । 'खतरे का आकलन', 'आत्मरक्षा प्रोटोकॉल', 'सामरिक चालबाजी'। हर नया कोड डालते समय उसकी आत्मा को झटका लगता, मानो वह अपने ही सिद्धांतों से गद्दारी कर रहा हो।


अगली बार जब वे लड़के फिर राबर्ट पर टूटे, तो राबर्ट ने पहले चेतावनी दी। फिर, जब एक लड़के ने उसकी बाँह पकड़नी चाही, तो राबर्ट ने एक कुशल पलटवार किया, लड़का संतुलन खोकर गिर पड़ा। बाकी भाग खड़े हुए। राबर्ट सामान लेकर सही-सलामत लौटा।


राजन ने राबर्ट की पीठ थपथपाई, पर उसकी आँखों में जीत की चमक नहीं, एक गहरी उदासी थी। उसने एक निष्कलंक आदर्श रोबोट बनाने का सपना देखा था, लेकिन दुनिया ने उसे सिखा दिया था , कि इस दुनिया में बचे रहने के लिए थोड़ा 'बुरा' होना भी ज़रूरी है। प्रयोगशाला की चमकदार रोशनी में राबर्ट खड़ा था । अब पूर्ण, कार्यशील, लेकिन उसकी नैतिकता के शुद्ध सफेद कैनवास पर, राजन ने स्वयं ही आदर्श से परे कुछ धूसर रंग भर दिए थे।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

बाल कथा

 बाल कथा 

दोस्ती का खेल


· विवेक रंजन श्रीवास्तव


जंगल में एक छोटा बंदर रहता था। उसका नाम मोनू था। मोनू की एक बुरी आदत थी।


वह सबकी चीज़ें छीन लेता था। हाथी का केला छीन लेता। खरगोश की गाजर छीन लेता। सब जानवर परेशान थे।


एक दिन मोनू ने कछुआ दादा का मोबाइल छीन लिया। कछुआ दादा उस पर अपने पोते की तस्वीर देख रहे थे।


"मोनू, वापस करो!" कछुआ दादा ने कहा। पर मोनू मोबाइल लेकर भाग गया।


वह मोबाइल लेकर पेड़ पर चढ़ गया। वह नासमझी से बटन दबाने लगा। अचानक मोबाइल फिसला और... धप्प!


मोबाइल नीचे गिर गया। उसकी स्क्रीन टूट गई।


मोनू डर गया। वह सहमते हुए नीचे उतरा। कछुआ दादा मोनू को बहुत प्यार करते थे, उन्होंने उसे कुछ नहीं कहा पर वे दुखी देख रहे थे। मोनू को डांट का डर था , और वह बचाव के तर्क सोच रहा था। किन्तु कछुआ दादा की चुप्पी से उसे बहुत दुख हुआ। उसने मन ही मन अब किसी से भी कुछ नहीं छीनने का प्रण ले लिया।


"माफ़ करना दादा," मोनू ने कहा, "मैंने आप से बिना पूछे आपका मोबाइल ले लिया और वह मुझसे टूट गया। आप जो सजा देंगे मुझे मंजूर है।


कछुआ दादा मुस्कुराए। "चिंता मत करो, बेटा। पर अब एक वादा करो।"

"क्या वादा?" मोनू ने पूछा।

"कभी किसी की चीज़ बिना पूछे मत लेना। अगर खेलना है, तो पहले पूछ कर ही लेना।"


मोनू ने हाँ में सिर हिलाया। 

अगले दिन, मोनू ने खरगोश से पूछा, "क्या मैं तुम्हारी गाजर ले सकता हूँ?"


खरगोश खुश हुआ। "जरूर! उसने मोनू को गाजर दी और कहा चलो साथ खेलें।"


सब जानवर हैरान थे। मोनू अब किसी से कुछ जबरदस्ती छीनता नहीं था। उसे यदि किसी से कुछ चाहिए होता तो वह उससे पूछकर लेता था।


जंगल में सबने सीखा - "जो चीज़ तुम्हारी नहीं, उसे लेना है तो पहले उसके मालिक से पूछो।"


और मोनू? अब वह सबका चहेता बन गया था।

Wednesday, 14 January 2026

नदियों में नहाने की भारतीय परंपरा

 नदी में स्नान भारत बनाम दुनिया 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


भारत में नदियों के खुले घाटों पर स्नान की परंपरा अत्यन्त प्राचीन, व्यापक और गहरी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी हुई है। मकर संक्रांति पर जगह जगह लाखों लोग भारत में नदियों में स्नान करते हैं। यहाँ नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि देवी, मातृशक्ति और जीवन-दायिनी के रूप में प्रतिष्ठित है, जिसके जल में डूबकी लगाना शरीर-शुद्धि के साथ-साथ आत्मिक, आध्यात्मिक और नैतिक शुद्धि का भी प्रतीक माना जाता है। गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी जैसी नदियों के किनारे बसे नगरों और कस्बों में प्रातःकालीन स्नान, संध्या-आरती, दीपदान, श्राद्ध, पिंडदान और व्रत-उपवासों से जुड़े कर्मकांड एक जीवंत घाट-संस्कृति रचते हैं, जो भारत की सामूहिक स्मृति और धार्मिक जीवन का केन्द्रीय अंग है।

 नदी-स्नान को आज भी पाप-पुण्य, मोक्ष और कर्मफल की अवधारणा से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि कुछ विशेष तिथियों, पर्वों या योगों पर नदी में स्नान करने से पापों का क्षय और पुण्य की वृद्धि होती है, इसीलिए मकर संक्रांति, पूर्णिमा, अमावस्या या कुंभ जैसे अवसरों पर लाखों-करोड़ों लोग दूर-दूर से आकर नदियों में आस्तिकता और आस्था की डुबकी लगाते हैं। स्नान के भी अपने नियम, मर्यादाएँ और सावधानियाँ निर्धारित हैं, कैसे जल में उतरना है, किन दिशाओं की ओर मुख करके आचमन या संकल्प करना है, किन आचरणों से बचना है,ये सब मिलकर नदी-स्नान को केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि धार्मिक अनुष्ठान बना देते हैं।


यदि भारत की इस परंपरा की तुलना विदेशों से की जाए, तो स्पष्ट दिखाई देता है कि अन्य देशों में भी नदियाँ जीवन और संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग तो हैं, लेकिन वहाँ की नदी-संस्कृति का स्वरूप नितांत भिन्न है। यूरोप के कई देशों,जैसे जर्मनी, स्विट्ज़रलैंड और ऑस्ट्रिया में नदी के किनारे सार्वजनिक स्नान और तैराकी की एक समृद्ध परंपरा मौजूद है, किंतु इसका मूल उद्देश्य धार्मिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता और मनोरंजन है। इन देशों में गर्मियों के मौसम में राइन, एरे जैसी नदियों के किनारे “रिवर पूल”, “रिवर बीच” और सुव्यवस्थित तैराकी क्षेत्र बनाए गए हैं, जहाँ नगर-निवासी परिवारों के साथ धूप सेंकते हैं, तैरते हैं, विश्राम करते हैं और जल के साथ एक सहज, लौकिक संबंध बनाते हैं। इन स्थलों पर शहरी निकायों द्वारा चेंजिंग रूम, सुरक्षा-बाधाएँ, लाइफगार्ड और स्वच्छता मानकों जैसी सुविधाओं की औपचारिक व्यवस्था रहती है, जो आधुनिक सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण भी हैं।


इतिहास के पन्नों में झाँकने पर यूरोप की स्नान-संस्कृति का एक अलग रूप भी दिखता है। प्राचीन रोम के सार्वजनिक स्नानागारों में नहाना सामाजिक मेल-मिलाप, स्वास्थ्य-संरक्षण और विश्राम का साधन था, जहाँ नदी या झरनों से लाया गया जल भी प्रयुक्त होता था, किंतु वहाँ यह क्रिया किसी विशिष्ट धार्मिक पुण्य या पाप- निवारण की कल्पना से कम और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन से अधिक जुड़ी थी।आगे चलकर यूरोप और मध्य एशिया में हम्माम, स्पा और गर्म जल-स्रोतों (हॉट स्प्रिंग्स) के इर्द-गिर्द जो स्नान-संस्कृति विकसित हुई, वह भी अधिकतर चिकित्सा, आराम और सौंदर्य-चेतना से संबद्ध रही, न कि गंगा-स्नान जैसी नियमित, सामूहिक तीर्थ परंपरा के रूप में।


धार्मिक अर्थों में यदि नदी-स्नान की वैश्विक तुलना की जाए तो ईसाई परंपरा का ‘बपतिस्मा’ विशेष उल्लेखनीय है, जिसमें बहते जल , कभी-कभी नदी या झील में व्यक्ति को डुबोकर या जल छिड़ककर उसे आध्यात्मिक रूप से शुद्ध और धर्म-संस्कारित माना जाता है।आज भी संसार के विभिन्न भागों में कुछ ईसाई समुदाय खुले जलाशयों, विशेषकर नदियों में सामूहिक बपतिस्मा के अनुष्ठान करते हैं, लेकिन यह रोज़मर्रा का स्नान न होकर एक विशिष्ट, एकबारगी या अवसर-विशेष का संस्कार है। इसी प्रकार ठंडे देशों में “आइस स्विमिंग” या पर्व-विशेष पर बर्फीली नदियों और झीलों में डुबकी लगाने की परंपराएँ भी हैं, जिन्हें धार्मिक से अधिक साहसिक, प्रतीकात्मक या स्वास्थ्य-सम्बंधी गतिविधि के रूप में देखा जाता है।


अमेरिका में भी नदियों में नहाने या तैरने  के स्थानों की कमी नहीं है, पर इसकी प्रकृति भारतीय घाट-संस्कृति से नितांत भिन्न है। मिसिसिपी, कोलोराडो, पोटोमैक, हडसन जैसी अनेक नदियों के तट पर “रिवर बीच”, “स्विमिंग होल” और मनोरंजन पार्क विकसित किए गए हैं, जहाँ लोग गर्मियों में नदी के ठंडे जल का आनंद लेते हैं, तैराकी करते हैं, नौका विहार, पिकनिक और मछली पकड़ने जैसी गतिविधियों में भाग लेते हैं।अमेरिका के छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्थानीय समुदाय पास की नदियों और धाराओं में परिवार सहित नहाने और तैरने तथा पिकनिक मनाने जाते हैं, जो उनकी लोक-संस्कृति और अवकाश-जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है, पर इसे वे धार्मिक कर्तव्य, व्रत या पाप-पुण्य के तराज़ू से नहीं मापते।


अमेरिका में नदी-जल से जुड़ा धार्मिक आयाम मुख्यतः कुछ ईसाई समुदायों के बपतिस्मा संस्कार और प्रतीकात्मक कार्यक्रमों में अवश्य दिखता है। वहाँ अब भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ पूरा समुदाय नदी के किनारे इकट्ठा होकर व्यक्तियों को जल में डुबोकर या उन पर जल उँडेलकर बपतिस्मा देता है, और इसे आध्यात्मिक पुनर्जन्म या पापों से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है।ठंडे राज्यों में नए वर्ष या चैरिटी कार्यक्रमों के अवसर पर अत्यन्त ठंडे नदी या झील के जल में सामूहिक रूप से डुबकी लगाने की “पोलर प्लंज” जैसी परंपराएँ भी लोकप्रिय हैं, जो आधुनिक समय की उत्सवधर्मी और साहसिक जीवन-शैली से अधिक संबंधित हैं ।


इस प्रकार भारत और विदेशों की नदी-संस्कृतियों के बीच मूल अंतर उनके आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आशयों में है। भारत में नदी-स्नान आस्था, अध्यात्म, कर्म और मोक्ष की अवधारणाओं से अभिन्न रूप से जुड़ा है, जिसके कारण यहाँ खुले घाटों, पुजारियों, आरती, मंत्रोच्चार और उत्सवों की एक संपूर्ण प्रतीक-प्रणाली विकसित हुई है, जो नदी को जीवंत, पवित्र सत्ता के रूप में स्थापित करती है।दूसरी ओर यूरोप और अमेरिका में नदी मुख्यतः प्राकृतिक संसाधन, शहरी जीवन-रेखा और मनोरंजन स्थल के रूप में  है।  वहाँ नदी में नहाना या तैरना आधुनिक जीवन-शैली, अवकाश, खेल और स्वास्थ्य-संरक्षण का हिस्सा है, जबकि धार्मिक अर्थों में जल की पवित्रता और शुद्धि की चर्चा तो है, पर वह भारत जैसी व्यापक, जन-जीवन में रची-बसी घाट-संस्कृति का रूप नहीं है।

 भारतीय  नदियाँ केवल भूगोल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मानचित्र का भी केन्द्रीय बिंदु हैं। भारत में नदी के किनारे-स्नान से लेकर जीवन की अंतिम यात्रा के घाट तक,  लगभग हर संस्कार किसी न किसी रूप में किसी न किसी निकटवर्ती नदी से जुड़ता चला आता है। जबकि विदेशों में नदी के साथ मनुष्य का संबंध चाहे जितना आत्मीय और उपयोगी क्यों न हो, वह प्रायः लौकिक, व्यावहारिक और मनोरंजक स्तर पर ही अधिक मुखर दिखता है।  यही अंतर भारतीय घाट-संस्कृति को विश्व परिदृश्य में एक अलग, अद्वितीय स्थान प्रदान करता है। किन्तु फिर भी आश्चर्य है कि जहां भारतीय नदियां प्रदूषण का शिकार हैं, वहीं विदेशों में नदियों की पूजा भले ही नहीं होती पर वहां नदियां साफ हैं।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

Monday, 12 January 2026

सप्तपर्णी सम्मान 2026*

 *सप्तपर्णी सम्मान 2026*

 *के लिये प्रविष्टियाँ और अनुशंसाएं आमंत्रित*


 _अंतिम तिथि 31.03.2026_ 


सप्तपर्णी सम्मान, प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘समकालीन प्रेरणा’ के संपादक-प्रकाशक श्री अरुण तिवारी द्वारा अपनी पत्नी श्रीमती उर्मिला तिवारी की स्मृति में वर्ष 2017 में स्थापित किया गया। श्री तिवारी ने इससे सम्बंधित समस्त कार्रवाइयों के लिए "सम्मेलन" को अधिकृत किया है। इस सम्मान के अंतर्गत रु. 5100/- की राशि एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान किये जाते हैं।


वर्ष 2026 के सप्तपर्णी सम्मानों के अनुशंसाएं आमंत्रित हैं। नियमावली निम्नानुसार है:-


*साहित्यिक - सांस्कृतिक पत्रिका के लिये*


पत्रिका मासिक, द्वैमासिक अथवा त्रैमासिक हो सकती है, लेकिन उसका प्रकाशन नियमित होना चाहिए.इसके प्रमाण स्वरूप पत्रिका के निरंतर प्रकाशित कम से कम 5 अंक अनुशंसा के साथ भेजे जाना चाहिए। पत्रिका साहित्य-कला-संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय किसी व्यक्ति द्वारा ही प्रकाशित की जाती हो। किसी शासकीय अथवा व्यावसायिक संस्थान द्वारा प्रकाशित पत्रिका स्वीकार नहीं की जायेगी। पत्रिका पूर्णत:साहित्यिक / सांस्कृतिक  हो, उसमें प्रकाशित सामग्री स्तरीय हो और वह किसी भी तरह के पूर्वाग्रह-दुराग्रह से मुक्त हो। पत्रिका भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक के यहां पंजीकृत है - इस आशय के  प्रमाण पत्र की स्व सत्यापित छाया प्रति अनुशंसा के साथ संलग्न की जानी चाहिए। 


*_अथवा_* 


*साहित्यिक - सांस्कृतिक पत्रकारिता के लिये*


यह पुरस्कार साहित्य और पत्रकारिता - दोनों विधाओं को फिर एक दूसरे के करीब लाने का एक विनम्र प्रयास है। यह प्रदेश के ऐसे कलम नवीसों के लिए है, जो साहित्य और पत्रकारिता - दोनों क्षेत्रों में समान रूप से आवाजाही करते हैं। जो लोग प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया में साहित्यिक - सांस्कृतिक समीक्षा, ऐसे आयोजनों की रिपोर्टिंग कर रहे हैं, सामयिक परिदृश्य पर आलेख, संवाद, वार्ता, साक्षात्कार, वीडियो, फ़िल्म अथवा ब्लॉग इत्यादि पर काम कर रहे हैं, वे सब इस श्रेणी में शामिल होंगे। इसमें उम्र का कोई बंधन नहीं है, हालांकि वरिष्ठता को प्राथमिकता दी जाती है। इच्छुक या अनुशंसित व्यक्ति को अपने परिचय और अन्य दस्तावेजों के साथ पिछले पांच सालों में प्रकाशित अपनी चुनिन्दा रचनाओं / आलेखों  की छाया प्रतियों के पांच सेट अथवा पुस्तक / पुस्तकों की पांच प्रतियां भेजना होंगी।


*लोकभाषा अथवा लोक साहित्य के लिये*


यह सम्मान मध्यप्रदेश की लोकभाषाओं यथा बुन्देली,बघेली,मालवी, निमाड़ी, भीली अथवा गोंडी में सृजन अथवा उनके संरक्षण - संवर्धन में उल्लेखनीय योगदान देने वाले रचनाकार को प्रदान किया जायेगा। यह सम्मान कहानी, उपन्यास, निबंध, नाटक, संस्मरण, कविता और गीत-ग़ज़ल जैसी तमाम विधाओं के लिए है। रचनाकार का समग्र योगदान मूल्यांकन का मुख्य आधार होगा। इसलिए अनुशंसित लेखक की पुस्तकें और प्रकाशित रचनाओं की छायाप्रतियां अवश्य भेजी जानी चाहिये। इस सम्मान के लिए कोई आयु सीमा निर्धारित नहीं है, किन्तु वरिष्ठ रचनाकारों को प्राथमिकता दी जायेगी। 


*साहित्य को समर्पित रूपांकन के लिये*


यह सम्मान मध्यप्रदेश के उन छायाकारों / चित्रकारों के लिए है, जिनकी कृतियां साहित्यिक रचनाओं और पत्रिकाओं को आकर्षक बनाती हैं। इस श्रेणी में कविता पोस्टर, छाया चित्र, रंगों -रेखाओं अथवा अन्य किसी माध्यम से बने चित्र / कलाकृतियां - जो साहित्यिक पत्रिकाओं / पुस्तकों के आवरण पृष्ठ पर या साहित्यिक रचनाओं के साथ प्रकाशित हों, आमंत्रित हैं। यह सम्मान कलाकार की वरिष्ठता, सक्रियता और कार्य की गुणवत्ता के आधार पर दिया जाता है। प्रकाशित कृतियों की संख्या भी इसके लिए महत्वपूर्ण है। साहित्यिक पत्रिकाओं-पुस्तकों तथा कविता पोस्टरों में कलाकार के नाम का उल्लेख अनिवार्य है।


*भारतीय भाषाओं से/में अनुवाद के लिये* 


इस सम्मान का उद्देश्य भारत की विभिन्न भाषाओं के साहित्य के परस्पर अनुवाद को प्रोत्साहित करना है। इस श्रेणी में अनूदित पुस्तकें, अनूदित और मुद्रित रचनाओं की कतरनें तथा डिजिटल मीडिया पर मूल रचना के साथ प्रकाशित अनूदित रचना के स्क्रीनशॉट्स पांच-पांच प्रतियों अथवा सेट्स में प्रस्तुत किए जा सकते हैं। अनुवाद कार्य मौलिक और गुणवत्तापूर्ण होना तो अनिवार्य है ही, उसकी मात्रा भी महत्वपूर्ण है।


उपरोक्त सभी श्रेणियों में सप्तपर्णी सम्मान मध्यप्रदेश के में जन्मे अथवा कम से कम 10 वर्षों से यहां निवास कर रहे व्यक्तियों और यहां से प्रकाशित पत्रिकाओं के लिए ही है। पिछले पांच साल की अवधि में सम्मेलन से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके व्यक्ति इस सम्मान के पात्र नहीं होंगे, न ही इस सम्मान के लिए चयनित रचनाकार अगले पांच सालों तक सम्मेलन के किसी और पुरस्कार / सम्मान के लिए आवेदन कर सकेंगे। मप्र साहित्यिक पत्रिका की श्रेणी में प्रविष्टि न आने पर अथवा किसी प्रविष्टि के सम्मान योग्य न पाए जाने पर साहित्यिक पत्रकारिता की श्रेणी में प्राप्त अनुशंसाओं को प्राथमिकता दी जाएगी सप्तपर्णी सम्मान  की बाकी शर्तें वागीश्वरी पुरस्कार की तरह ही होंगी।


प्रविष्टियाँ और अनुशंसाएं भेजना का पता:


साहित्य मंत्री,

म.प्र.हिन्दी साहित्य सम्मेलन,

मायाराम सुरजन स्मृति भवन,

पी.एण्ड टी.चौराहा,शास्त्री नगर,

भोपाल-462003

फ़ोन: 0755-2773290

Saturday, 10 January 2026

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: संस्कृति से संविधान तक, (मानस का धोबी के कहने से मां सीता के त्याग का प्रसंग)

 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: संस्कृति से संविधान तक, (मानस का धोबी के कहने से मां सीता के त्याग का प्रसंग)


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से 


रामायण के उत्तरकांड में धोबी द्वारा सीता माता की पवित्रता पर उठाया गया प्रश्न भारतीय संस्कृति में आम आदमी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की प्राचीन जड़ों को रेखांकित करता है। यह प्रसंग राम राज्य को प्रजातांत्रिक आदर्श के रूप में स्थापित करता है, जहाँ एक साधारण धोबी भी सर्वोच्च सत्ता के समक्ष अपनी असहमति व्यक्त कर सकता है। 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) इसी परंपरा का आधुनिक प्रतिबिंब है, जो नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है।

 रामचरितमानस में यह प्रसंग प्रजामत को राजा के ऊपर बताता है। राम राज्य का यही स्वरूप इसे आदर्श बनाता है, जहाँ प्रजा की स्वतंत्र अभिव्यक्ति राज्यनीति का आधार बन जाती है।

हमारी संस्कृति रामायण, महाभारत और पुराणों से समृद्ध है, जहाँ वेदों-उपनिषदों में सत्यवचन और असहमति को धर्म का अभिन्न अंग माना गया। धोबी का सामान्य कथन महारानी सीता जी को वनवास का कारण बनने वाला प्रसंग दर्शाता है कि रामराज्य में अभिव्यक्ति वर्ग, जाति या पद से बंधी नही थी, बल्कि लोककल्याण का साधन थी। राम का "प्रजाहित सर्वोपरि" सिद्धांत प्रजा की वाणी को सम्मान देता है, जो हमारी संस्कृति में लोकतंत्र की प्राचीनता प्रमाणित करता है। 


भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) प्रत्येक नागरिक को बोलने, लिखने, कला सिनेमा सोशल मीडिया आदि से विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता देता है। धोबी की भाँति आज कोई भी साधारण नागरिक सत्ता की आलोचना कर सकता है। विपक्ष का कार्य तो सत्ता की नीतियों की समालोचना ही है।

संविधान सभा की बहसों में रामराज्य का उल्लेख हुआ, जहाँ इसे स्वतंत्रता समता प्रजासेवा का प्रतीक माना गया। राम का प्रजा मत को प्राथमिकता देना संविधान की प्रस्तावना में निहित "विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता" से मेल खाता है।  

रामराज्य में अभिव्यक्ति का सांस्कृतिक विधान हमारे संविधान में अधिकार के रूप में सभी नागरिकों के लिए है । जिसकी रक्षा न्यायालय साक्ष्य परीक्षण कर करता है। रामराज्य व्यक्तिपरक था, जहाँ राम की मर्यादा प्रजा वाणी को प्राथमिकता देती थी, जबकि भारतीय संविधान संस्थागत है, जो न्यायपालिका द्वारा संरक्षित होता है। दोनों का उद्देश्य , लोककल्याण है। 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से सामाजिक सुधार एक प्रक्रिया बना रहता है। राजा राम , प्रजा मत के प्रति संवेदनशील थे, ठीक वैसे ही जैसे अपना संविधान असहमति को लोकतंत्र का स्रोत मानता है।


समकालीन प्रासंगिकता और चुनौतियाँ


आज सोशल मीडिया पर नागरिक राम राज्य के धोबी की भाँति सरकार की आलोचना कर सकते हैं, और संविधान इस मौलिक अधिकार को संरक्षित करता है। राम प्रसंग सिखाता है कि शासक को प्रजा मत सुनना और उसका सम्मान करना चाहिए। फेक न्यूज़ या घृणा भाषण जैसी चुनौतियों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध राम की मर्यादा से प्रेरित हो सकते हैं। यह सांस्कृतिक विरासत संविधान को मजबूत बनाती है, जहाँ अभिव्यक्ति लोकतंत्र की रीढ़ है। इस तरह राम राज्य का धोबी प्रसंग हमारी संस्कृति की गहन परंपरा को संविधान से जोड़ता है। यह स्मरण कराता है कि सच्चा शासन प्रजा की स्वतंत्र वाणी से पुष्ट होता है, जो राम से लेकर आधुनिक भारत तक अटल बना हुआ है। भारत के पराधीनता काल में मुगल साम्राज्य में और फिर अंग्रेजी शासन में नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर निरंतर नियंत्रण रहा पर आजाद भारत में संविधान ने इसे पुनः स्थापित किया है, अब इसे बनाए रखना नागरिकों की कर्तव्य निष्ठा है, क्योंकि स्वतंत्रता के स्वच्छंदता में बदलते ही सरकारों को सामाजिक हित में इन अधिकारों पर कर्फ्यू, इंटरनेट बाधित करना , आपातकाल लगाना , जैसे अप्रिय कदम जन हित में उठाने के लिए बाध्य होना पड़ता है, जिसका प्रावधान भी संविधान में है। अतः अभिव्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता नागरिकों के विवेक पर ही बनी रह सकती है, यह तथ्य हर बदलती पीढ़ी

को समझना आवश्यक है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Friday, 9 January 2026

पासवर्ड

 लघुकथा 

"पासवर्ड"


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


स्क्रीन पर तीसरी बार फिर वह संदेश फिर उभर आया “गलत पासवर्ड.”

शरद बाबू ने चश्मा ठीक किया, उँगलियाँ धीमे धीमे कुंजियों पर चलीं, पर मन डगमगा गया।  

पासवर्ड कभी लिख कर नहीं रखना चाहिए, जानते हुए भी इसी समस्या से बचने के लिए वे अपनी डायरी में पासवर्ड लिख लिया करते हैं। सावधानी के लिए बस किस अकाउंट का पासवर्ड है यह याददाश्त पर छोड़ रखा है, लेकिन फिर भी गड़बड़ हो ही जाती है।

नोटबुक के वे पन्ने पलटे हर जगह दर्ज अंक, प्रतीक और अंग्रेजी के छोटे बड़े अक्षर । मेल , बैंकों के अकाउंट , वाई फाई , नेटलिक्स , पेंशन ऐप वगैरह वगैरह के ढेर सारे विस्मृत,  गड्डम गड्ड होते पासवर्ड अब प्रायः उन्हें चिढ़ाते लगे हैं।

वे कमरे की छत देखते सोच रहे थे, अपने पुराने दिन जब उनकी याददाश्त का ऑफिस में सब लोहा मानते थे, उन्हें दस अंकों के मोबाइल नंबर तक जबानी याद रहते थे, जिन्हें वे जेब में मोबाइल होते हुए भी ऑफिस के लैंडलाइन से डायल कर लिया करते थे, शायद पैसे बचाने ।   

उन्हें खीजता देख ,बेटा हँसकर बोला, “पापा, इतनी दिक्कत है तो पासवर्ड मैनेजर एप रख लीजिए।”  

शरद बाबू मुस्करा कर रह गए ।   


रिटायरमेंट को पांच महीने भर तो हुए हैं।  

पहले समय पीछे भागता था, अब वे उसके पीछे दौड़ रहे हैं।  

पत्नी ने रसोई से पुकारा“ओटीपी आया क्या?”  

स्क्रीन पर छह अंकों का नंबर चमका… फिर एस एम एस ही गुम हो गया, सेशन टाइम आउट हो चुका था।

शरद बाबू ने लंबी साँस ली, लैपटॉप बंद किया।  

खिड़की से छनती धूप में धूल के कण चमक रहे थे, जैसे यादें कमरे में घुसी आ रही हों , रोशनी की एक बीम की तरह।  

उनके होंठों पर स्मित मुस्कान थी, 

“नया पासवर्ड बनाना है..

bHULNANAHI@1


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Tuesday, 6 January 2026

साहित्य से राष्ट्रीय चेतना बना गीत वंदे मातरम्

साहित्य से राष्ट्रीय चेतना बना गीत वंदे मातरम् 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 

भारतीय राष्ट्रीय चेतना के सबसे प्रबल और प्राणवान मंत्र "वंदे मातरम" ने २०२५ में अपनी १५०वीं वर्षगाँठ मनाई। ७ नवंबर १८७५ को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह गीत केवल साहित्यिक रचना नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक धारा बन गया, जिसने देश के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आधुनिक राष्ट्र-निर्माण तक की यात्रा को सहर्ष आलोकित किया है। इसकी यात्रा साहित्यिक पत्रिका 'बंगदर्शन' के पन्नों से आरंभ होकर बंकिमचंद्र के उपन्यास 'आनंदमठ' (१८८२) तक पहुँची और फिर गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा संगीतबद्ध होकर एक जन-जन का गीत बन गई। इसकी प्राण-शक्ति इतनी प्रबल थी कि यह शीघ्र ही औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध का प्रतीक बन गया। १९०५ के बंग-भंग के विरोध में यह जनांदोलनों का मुखर स्वर बना और अंग्रेजी सत्ता के लिए एक चुनौती बनकर उभरा। इसकी एकजुट करने की क्षमता को देखते हुए ही १९३७ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इसके पहले दो पदों को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया, और स्वतंत्रता के बाद १९५० में इसे राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समकक्ष राष्ट्रीय गीत का सम्मान प्रदान किया गया।

स्वतंत्रता के बाद के दशकों में भी 'वंदे मातरम' की प्रासंगिकता कम नहीं हुई। यह राष्ट्रीय एकता और अखंडता के प्रतीक के रूप में सदैव प्रासंगिक बना रहा। यह गीत हमें स्मरण कराता है कि राष्ट्र की अवधारणा किसी एक धर्म, भाषा या संप्रदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सभी को समेटने वाली मातृभूमि की भावना है। १५०वीं वर्षगाँठ के अवसर पर देशव्यापी समारोहों, विशेष डाक टिकटों एवं स्मारक सिक्कों के जारी होने तथा शैक्षणिक संस्थानों में आयोजनों ने इसके ऐतिहासिक महत्व को पुनर्स्थापित किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक वर्ष लंबे स्मरणोत्सव का उद्घाटन इसके प्रति राष्ट्रीय श्रद्धा का प्रमाण था।

समकालीन डिजिटल युग में नई पीढ़ी के सामने यह चुनौती और अवसर दोनों है कि वह इस ऐतिहासिक धरोहर के गहन अर्थ को समझे। सोशल मीडिया, डिजिटल प्रदर्शनियों और ऑनलाइन प्रतियोगिताओं के माध्यम से इस गीत को नए संदर्भों में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे युवाओं तक इसकी पहुँच बढ़ी है। युवा पीढ़ी के लिए यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक विचार है , एक ऐसे भारत का विचार जो अपनी संप्रभुता, सांस्कृतिक धरोहर और प्रगतिशील भविष्य के प्रति सजग है। यह उन्हें राष्ट्रभक्ति की उस भावना से जोड़ता है जो आत्मनिर्भरता, कर्तव्यबोध और सामूहिक उत्तरदायित्व पर आधारित है।

वंदे मातरम की १५० वर्षों की यात्रा भारत के आधुनिक इतिहास की एक झलक है। यह साहित्य से उठकर राजनीति में आया, एक राष्ट्रीय आंदोलन का मंत्र बना और अंततः राष्ट्रीय पहचान का अविभाज्य अंग बन गया। आज भी यह गीत हमें सिखाता है कि राष्ट्रप्रेम का अर्थ अतीत का सम्मान, वर्तमान की सक्रिय भागीदारी और भविष्य के प्रति सजगता है। यह मातृभूमि के प्रति श्रद्धा का वह अमर स्वर है जो सदियों तक भारत की आत्मा को गौरवान्वित करता रहेगा।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

Monday, 5 January 2026

श्री राम नारायण सोनी की विद्युल्लता की भूमिका

भूमिका 

कविता न्यूनतम शब्दों में अधिकतम की अभिव्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ संसाधन होती है । कविता मन को एक साथ ही हुलास , उजास और सुकून देती है । नौकरी और साहित्य के मेरे समान धर्मी श्री रामनारायण सोनी के कविता संग्रह विद्युल्लता को पढ़ने का सुअवसर मिला । संग्रह में भक्ति काव्य की निर्मल रसधार का अविरल प्रवाह करती समय समय पर रची गई सत्तर कवितायें संग्रहित हैं । सभी रचनायें भाव प्रवण हैं । काव्य सौष्ठव परिपक्व है । सोनी जी के पास भाव अभिव्यक्ति के लिये पर्याप्त शब्द सामर्थ्य है । वे विधा में पारंगत भी हैं । उनकी अनेक पुस्तकें पहले ही प्रकाशित हो चुकी हैं , जिन्हें हिन्दी जगत ने सराहा है । सेवानिवृति के उपरांत अनुभव तथा उम्र की वरिष्ठता के साथ रामनारायण जी के आध्यात्मिक लेखन में निरंतर गति दिखती है । कवितायें बताती हैं कि कवि का व्यापक अध्ययन है , उन्हें छपास या अभिव्यक्ति का उतावलापन कतई नहीं है । वे गंभीर रचनाकर्मी हैं ।

सारी कवितायें पढ़ने के बाद मेरा अभिमत है कि शिल्प और भाव , साहित्यिक सौंदर्य-बोध , प्रयोगों मे किंचित नवीनता , अनुभूतियों के चित्रण , संवेदनशीलता और बिम्ब के प्रयोगों से सोनी जी ने विद्युल्लता को कविता के अनेक संग्रहों में विशिष्ट बनाया है । आत्म संतोष और मानसिक शांति के लिये लिखी गई ये रचनायें आम पाठको के लिये भी आनंद दायी हैं । जीवन की व्याख्या को लेकर कई रचनायें अनुभव जन्य हैं । उदाहरण के लिये "नेपथ्य के उस पार" से उधृत है ... खोल दो नेपथ्य के सब आवरण फिर देखते हैं, इन मुखौटों के परे तुम कौन हो फिर देखते हैँ । जैसी सशक्त पंक्तियां पाठक का मन मुग्ध कर देती हैं । ये मेरे तेरे सबके साथ घटित अभिव्यक्ति है ।

संग्रह से ही दो पंक्तियां हैं ... " वाणी को तुम दो विराम इन नयनों की भाषा पढ़नी है , आज व्यथा को टांग अलगनी गाथा कोई गढ़नी है । " मोहक चित्र बनाते ये शब्द आत्मीयता का बोध करवाने में सक्षम हैं । रचनायें कवि की दार्शनिक सोच की परिचायक हैं ।

रामनारायण जी पहली ही कविता में लिखते हैं " तुम वरेण्य हो , हे वंदनीय तुम असीम सुखदाता हो .... सौ पृष्ठीय किताब की अंतिम रचना में ॠग्वेद की ॠचा से प्रेरित शाश्वत संदेश मुखर हुआ है । सोनी जी की भाषा में " ए जीवन के तेजमयी रथ अपनी गति से चलता चल , जलधारा प्राणों की लेकर ब्रह्मपुत्र सा बहता चल " ।

यह जीवन प्रवाह उद्देश्य पूर्ण , सार्थक और दिशा बोधमय बना रहे । इन्हीं स्वस्ति कामनाओ के साथ मेरी समस्त शुभाकांक्षा रचना और रचनाकार के संग हैं । मैं चाहूंगा कि पाठक समय निकाल कर इन कविताओ का एकांत में पठन ,मनन , चिंतन करें रचनायें बिल्कुल जटिल नहीं हैं वे अध्येता का दिशा दर्शन करते हुये आनंदित करती हैं ।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

वरिष्ठ समीक्षक , कवि और व्यंग्यकार

सेवा निवृत मुख्य अभियंता

ए २३३ , ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी , जे के रोड , भोपाल ४६२०२३

भोपाल दिनांक २१ जनवरी २०२४


हिन्दी भविष्य की स्थितियां

 हिन्दी भविष्य की स्थितियां


विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी , भोपाल


हिन्दी दिवस १४ सितम्बर को क्यों ?


1947 में जब भारत को आजादी मिली तो देश के सामने राजभाषा के चुनाव को लेकर गहन चर्चायें हुई . भारत में अनेकों भाषाएं और बोलियां बोली जाती हैं , ऐसे में राष्ट्रभाषा के रूप में किसे चुना जाए ये संवेदनशील सवाल था . व्यापक मंथन के बाद संविधान सभा ने देवनागरी लिपी में लिखी हिन्दी को राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के तौर पर स्वीकार किया . भारत के संविधान में भाग 17 के अनुच्छेद 343 (1) में कहा गया है कि राष्ट्र की राज भाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी . 14 सितम्बर, 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था . इसीलिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की अनुशंसा के बाद से 1953 से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाने लगा . प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस दिन के महत्व देखते हुए प्रति वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाए जाने की घोषणा की थी.


विश्व हिन्दी दिवस १० जनवरी को क्यों ?


हिन्दी आज विश्व में तीसरे नम्बर पर बोले जाने वाली भाषा बन चुकी है . भारतीय विश्व के कोने कोने में बिखरे हुये हैं . वैश्विक स्तर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिये विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शुरुआत की गई और प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था . इसीलिए इस दिन को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है .


हिन्दी की वैधानिक स्थितियां


चुंकि जब अंग्रेज गये तब सरकारी काम काज प्रायः अंग्रेजी में ही होते थे , रातों रात सारा हिन्दीकरण संभव नहीं था अतः अंग्रेजी में कामकाज यथावत जारी रहे . इसके चलते हिन्दी और अंग्रेजी के बारे में यह भ्रम व्याप्त है कि ये दोनों भारत संघ की सह-राजभाषाएँ हैं . वास्तविक सांविधानिक स्थिति बिल्कुल भिन्न है . संविधान में कहीं भी अंग्रेजी को राजभाषा नहीं कहा गया है . संविधान में अंग्रेजी के लिए प्रयुक्त शब्द हैं " the language for the time being authorised for use in the Union for official purposes. " संविधान ने कहा कि अंग्रेजी अगले पन्द्रह वर्ष तक राजकीय प्रयोजन के लिए साथ साथ प्रयुक्त होगी , तब तक संपूर्ण रूप से हिन्दी अपना ली जायेगी किन्तु दलगत तथा क्षेत्रीय राजनीति के चलते ये पंद्रह बरस अब तक खिंचते ही जा रहे हैं .


अनुच्छेद 344 में मुख्यत: छ: संदर्भों को रेखांकित किया गया है-


राष्ट्रपति द्वारा पाँच वर्ष की समाप्ति पर भारत की विभिन्न भाषाओं के सदस्यों के आधार पर एक आयोग गठित किया जाएगा और आयोग राजभाषा के संबंध में कार्य-दिशा निर्धरित करेगा .

हिंदी के उत्तरोत्तर प्रयोग पर बल दिया जाएगा . देवनागरी के अंकों के प्रयोग होंगे. संघ से राज्यों के बीच पत्राचार की भाषा और एक राज्य से दूसरे राज्य से पत्राचार की भाषा पर सिफारिश होगी. आयोग के द्वारा औद्योगिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक उन्नति के साथ लोक-सेवाओं में हिंदीतर भाषी क्षेत्रों के न्यायपूर्ण औचित्य पर ध्यान रखा जायेगा .

राजभाषा पर विचारार्थ तीस सदस्यों की एक समिति का गठन किया जाएगा जिसमें 20 लोक सभा और 10 राज्य सभा के आनुपातिक सदस्य एकल मत द्वारा निर्वाचित होंगे.

समिति राजभाषा हिंदी और नागरी अंक के प्रयोग का परीक्षण कर राष्ट्रपति को प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगी. राष्ट्रपति के द्वारा आयोग के प्रतिवेदन पर विचार कर निर्देश जारी किया जाएगा .


अनुच्छेद 345, 346 और 347 में विभिन्न राज्यों की प्रादेशिक भाषाओं के विषय में भी साथ-साथ विचार किया गया है.


अनुच्छेद 345 में प्रावधान है कि राज्य के विधान मण्डल द्वारा विधि के अनुसार राजकीय प्रयोजन के लिए उस राज्य में प्रयुक्त होने वाली भाषा या हिंदी भाषा के प्रयोग पर विचार किया जा सकता है . इस संदर्भ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जब तक किसी राज्य का विधन मंडल ऐसा प्रावधान नहीं करेगा, तब तक कार्य पूर्ववत अंग्रेजी में चलता रहेगा .


अनुच्छेद 346 के अनुसार संघ में राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त भाषा यदि दो राज्यों की सहमति पर आपस में पत्राचार के लिए उपयोगी समझते हैं, तो उचित होगा . यदि दो या दो से अधिक राज्य आपस में निर्णय लेकर राजभाषा हिंदी को संचार भाषा के रूप में अपनाते हैं, तो उचित होगा .


अनुच्छेद 347 कहता है कि यदि किसी राज्य में जनसमुदाय द्वारा किसी भाषा को विस्तृत स्वीकृति प्राप्त हो और राज्य उसे राजकीय कार्यों में प्रयोग के लिए मान्यता दे, और राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाए, तो उक्त भाषा का प्रयोग मान्य होगा.


अनुच्छेद 348 में उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों की भाषा पर विचार किया गया है. यहाँ यह प्रावधान है कि जब तक संसद विधि द्वारा उपबंध न करे, तब तक कार्य अंग्रेजी में ही होता रहेगा . इसके अंतर्गत उच्चतम न्यायालय, प्रत्येक उच्च न्यायालय के कार्य क्षेत्र रखे गए .


हिन्दी प्रयोग के लिए संसद के दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होना चाहिए. अधिनियम संसद या राज्य विधान मंडल से पारित किए जाएं और राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा स्वीकृति मिले . यह प्रस्ताव विधि के अधीन और अंग्रेजी में होंगे . नियमानुसार स्वीकृति के बाद हिंदी का प्रयोग संभव होगा, किंतु उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय या आदेश पर लागू नहीं होगा.


अनुच्छेद 349 में प्रावधान है कि संविधान के प्रारंभिक 15 वर्षों की कालावधि तक संसद के किसी सदन से पारित राजभाषा संबंधित विधेयक या संशोधन बिना राष्ट्रपति की मंजूरी के स्वीकृत नहीं होगा . ऐसे विधेयक पर राजभाषा संबंधित तीस सदस्यीय आयोग की स्वीकृति के पश्चात् , राष्ट्रपति विचार कर स्वीकृति प्रदान करेंगे .


अनुच्छेद 350 के प्रावधानो के अनुसार विशेष निर्देशों को व्यवस्थित किया गया है . इसके अनुसार कोई भी व्यक्ति अपनी समस्या को संघ और राज्य के पदाधिकारियों को संबंधित मान्य भाषा में आवेदन कर सकेगा. इस तरह प्रत्येक व्यक्ति को अधिकृत भाषा में संघ या राज्य के अधिकारियों से पत्र-व्यवहार का अवसर दिया गया है.


अनुच्छेद 351 में भारतीय संविधान की अष्टम सूची में स्थान प्राप्त भाषाओं को महत्व दिया गया है. हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार से भारत की सामाजिक संस्कृति को अभिव्यक्ति मिलने का संकेत है. हिंदी भाषा को मुख्यत: संस्कृत शब्दावली के साथ अन्य भाषाओं के शब्दों से समृद्ध करने का संकेत भी इस अनुच्छेद में किया गया है .


हिन्दी के साथ साथ उपयोग हेतु राष्ट्रपति के आदेश


भारत संघ में राजभाषा हिंदी के कार्यान्वयन के लिए राष्ट्रपति के द्वारा समय-समय पर आदेश जारी किए गए हैं. 1952 का आदेश उल्लेखनीय है जिसमें राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 343(2) के अधीन 27 मई, 1952 को एक आदेश जारी किया जिसमें संकेत था कि राज्य के राज्यपाल, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति पत्रों में अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी और अंक नागरी लिपि में हों.


राजभाषा आयोग की स्थापना सन् 1955 में हुई . आयोग के तीस सदस्यों द्वारा राजभाषा संदर्भ में निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किए गए-


त्वरित गति से हिन्दी के पारिभाषिक शब्द-निर्माण हों .

14 वर्ष की आयु तक प्रत्येक विद्यार्थी को हिंदी भाषा की शिक्षा दी जाए .

माध्यमिक स्तर तक भारतीय विद्यार्थियों को हिंदी शिक्षण अनिवार्य हो .

इसमें से प्रथम सिफारिश मान ली गई . अखिल भारतीय और उच्चस्तरीय सेवाओं में अंग्रेजी जारी रखी गई . सन् 1965 तक अंग्रेजी को प्रमुख और हिंदी को गौण रूप में स्वीकृति मिली . 45 वर्ष से अधिक उम्र के कर्मचारियों को हिंदी- प्रशिक्षण की छूट दी गई .


1955 के राष्ट्रपति के आदेश के अनुसार संघ के सरकारी कार्यों में अंग्रेजी के साथ हिंदी प्रयोग करने का निर्देश किया गया . जनता से पत्र-व्यवहार, सरकारी रिपोर्ट का पत्रिकाओं और संसद में प्रस्तुत, जिन राज्यों ने हिंदी को अपनाया है, उनसे पत्र-व्यवहार, संधि और करार, अन्य देशों उनके दूतों अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से पत्र-व्यवहार, राजनयिक अधिकारियों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में भारत के प्रतिनिधियों द्वारा जारी औपचारिक विवरण सभी कार्य अंग्रेजी और हिन्दी दोनो भाषाओ में किये जाने के निर्देश दिये गये .


1960 में राष्ट्रपति द्वारा राजभाषा आयोग के प्रतिवेदन पर विचार कर निम्न निर्देश जारी किए गए थे-


वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली के निर्माणार्थ शिक्षा मंत्रालय के अधीन एक आयोग स्थापित किया जाए .शिक्षा मंत्रालय, सांविधिक नियमों आदि के मैनुअलों की एकरूपता निर्धरित कर अनुवाद कराया जाए . मानक विधि शब्दकोश, हिंदी में विधि के अधिनियम और विधि-शब्दावली निर्माण, हेतु कानून विशेषज्ञों का एक आयोग बनाएँ .तृतीय श्रेणी के कर्मचारियों को छोड़, 45 वर्ष तक की उम्र वाले कर्मचारियों को हिंदी प्रशिक्षण अनिवार्य किया जावे . गृह मंत्रालय हिंदी आशुलिपिक, हिंदी टंकण प्रशिक्षण योजना बनाए .


1963 का राजभाषा अधिनियम : 26 जनवरी, 1965 को पुन: आगामी 15 वर्षों तक अंग्रेजी को पूर्ववत् रखने का प्रावधान कर दिया गया . हिंदी-अनुवाद की व्यवस्था पर जोर दिया गया . उच्च न्यायालयों के निर्णयों आदि में अंग्रेजी के साथ हिंदी या अन्य राजभाषा के वैकल्पिक प्रयोग की छूट दी गई . इससे अंग्रेजी का वर्चस्व बना रहा . देश को एकता के सूत्र में बाँधने वाली हिंदी को वह स्थान नहीं मिल सका जो राजभाषा से अपेक्षा थी .


वर्ष 1968 में संविधान के राजभाषा अधिनियम को ध्यान में रखकर संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष संकल्प पारित किया . इसमें विचार रखे गए-


हिंदी प्रचार-प्रसार का प्रयत्न किया जाएगा और प्रतिवर्ष लेखा-जोखा संसद के पटल पर रखा जाएगा .

आठवीं सूची की भाषाओं के सामूहिक विकास पर राज्य सरकारों से परामर्श और योजना-निर्धारण .

त्रिभाषा-सूत्र पालन करना .

संघ लोक-सेवा आयोग की परीक्षाओं में अंग्रेजी के साथ हिंदी और आठवीं सूची की भाषाओं को अपनाना .

कार्यालयों से जारी होने वाले सभी दस्तावेज हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में हों . संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत किए जाने वाले सरकारी पत्र आदि अनिवार्य रूप से हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में हों .

राजभाषा हिंदी कार्यान्वयन के लिए देश को भाषिक धरातल पर तीन भागों में बाँटा गया-


‘क’ क्षेत्र- बिहार, हरियाणा, हिमाचल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली .


‘ख’ क्षेत्र- गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, अंडमान निकोबार द्वीप-समूह और केद्रशासित क्षेत्र .


‘ग’ क्षेत्र- भारत के अन्य क्षेत्र-बंगाल, उड़ीसा, आसाम, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू, कर्नाटक, केरल आदि .


इस अधिनियम के अनुसार केद्र सरकार द्वारा ‘क’ क्षेत्र अर्थात हिन्दी बैल्ट से पत्र-व्यवहार हिंदी से ही होगा . यदि अंग्रेजी में पत्र भेजा गया, तो उसके साथ हिंदी अनुवाद अवश्य होगा . ‘ख’ क्षेत्र से पत्र-व्यवहार हिंदी के साथ अंग्रेजी में भी होगा . ‘ग’ क्षेत्र से पत्र-व्यवहार अंग्रेजी में हो सकता है .


इन स्थितियों में आजादी के अमृत महोत्सव के बाद भी हम हिन्दी के अधूरे राजभाषा स्वरूप में हिन्दी दिवस मना रहे हैं . प्रधानमंत्री ने दासता के सारे चिन्हों से मुक्त होने का आव्हान किया है , राजपथ का नाम करण कर्त्व्य पथ हो चुका है , अब हम भारत वासियों और हिन्दी प्रेमियों का कर्तव्य है कि हम अंग्रेजी की दासता से मुक्त होकर हिन्दी को उसकी संपूर्णता में कब तक और कैसे अपनाते हैं .


भोपाल से हिंदी को लेकर प्रयास

दसवां विश्व हिंदी सम्मेलन भोपाल में आयोजित हुआ था। 

हिंदी साहित्य के अनेकानेक पुरस्कार और सम्मान भोपाल से हिंदी भवन , राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, म प्र साहित्य अकादमी, लेखक संघ, दुष्यंत संग्रहालय , माधव राव सप्रे संग्रहालय सहित कई निजी संस्थाएं भी प्रति वर्ष दे रही हैं। रवींद्र नाथ टैगोर विश्व विद्यालय भोपाल वैश्विक स्तर पर विश्व रंग का आयोजन कर रहा है। श्री संतोष चौबे जी ने अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार स्थापित करने , तथा जिस तरह अंग्रेजी की जी आर ई, टाफेल परीक्षा होती है , उसी तरह हिंदी की योग्यता परीक्षा की योजना बनाई है। 

हिंदी को लेकर सतत काम हो रहे हैं । हिंदी को राष्ट्र व्यापी रूप से जनता और सरकारी समर्थन की दरकार है।

लोक जीवन में व्याप्त श्री राम

 लोक जीवन में व्याप्त श्री राम

विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए २३३ , ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी

जे के रोड , भोपाल ४६२०२३

मो ७०००३७५७९८

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम बुंदेलखंड के लोक जीवन में सर्व व्याप्त हैं । अभिवादन में राम राम  , जन्म , विभिन्न तीज त्यौहार , विवाह संस्कार , से लेकर जीवन से मुक्ति तक राम नाम बुंदेलखण्ड की संस्कृति का हिस्सा है । बुंदेलखंड के लोकगीत और लोककथाएँ राम के जीवन और चरित्र से जुड़ी हैं। दादी नानी जो कहानियां सुनाकर बच्चो को सुलाती हैं उन लोक कथाओ में राम के जीवन और चरित्र की कहानियां होती हैं । बुंदेलखंड की पावन तीर्थ धरा चित्रकूट में श्री राम ने भगवती सीता और भ्राता लक्ष्मण के संग अपने वनवास का सर्वाधिक समय बिताया । रामपथ गमन का बड़ा हिस्सा बुंदेलखण्ड से गुजरता है । पन्ना के सारंग धाम में ही भगवान श्री राम ने दैत्यों के सर्वनाश के लिए धनुष उठाया था । भगवान श्री राम ने चित्रकूट में कामद गिरी पर्वत की परिक्रमा की थी , यह स्थल आज भी एक भव्य तीर्थ के रूप में लोक प्रतिष्ठित है । चित्रकूट के आस पास के क्षेत्र के प्रायः लोग घर पर नहीं वरन चित्रकूट में मंदाकिनी तट पर ही दीपदान कर दीवाली मनाते हैं । रामबाण उपाय किसी भी प्रयास की शत प्रतिशत सफलता के प्रतीक माने जाते हैं। स्वाभाविक है कि यहां की लोक संस्कृति में राम के आदर्श , उनका जीवन चरित रचा बसा है । बुंदेलखंड की पारम्परिक कला में, चित्रकला और मूर्तिकला में , बुंदेली नाट्य तथा साहित्य में राम के जीवन के विभिन्न दृश्य पीढ़ी दर पीढ़ी स्वतः अधिरोपित हो जाते हैं । घरों के दरवाजों , तोरण , पूजा पाठ के पटों पर ये राम मय चित्र देखने मिल जाते हैं ।

राम से बड़ा राम का नाम होता है । अकादमिक लेख से परे एक स्वअनुभूत संस्मरण साझा करना चाहता हूं । मैं एक निजी बस में यात्रा कर रहा था । भीड़ थी । मुझ से अगली सीट पर एक ग्रामीण किशोर बैठा हुआ था , और उसके बाजू में एक युवती । बस चली , थोड़ी देर में ही युवती की जोर से आवाज आई "जै राम जी " , और युवक किंचित संकुचित हो सरक कर बैठ गया । मुझे स्पष्ट समझ आ गया कि क्या हुआ होगा , और किस तरह युवती ने चतुराई से केवल "जै राम जी " कहकर स्थिति को संभाल लिया । मैं कल्पना कर सकता हूं कि यदि , यही घटना किसी महानगर की पढ़ी लिखी लड़की के साथ शहर में हुई होती तो क्या हंगामा खड़ा हो गया होता । युवती की चतुराई से केवल राम नाम के सही समय पर,  सही स्वर और भाव के साथ उच्चारण मात्र से एक अप्रिय घटना , घटने से पहले ही टाली जा सकी । यह राम नाम के बुंदेलखण्ड के लोक जीवन में संमिश्रित होने का बड़ा उदाहरण है । मनोवैज्ञानिक इस घटना का विष्लेषण कर बड़ा बिहेवियरल रिसर्च पेपर बना सकते हैं । बुंदेली संस्कृति में राम नाम के ऐसे अनुप्रयोग बेहद आम , सहज , लोक व्यवहार का हिस्सा हैं ।

बुंदेलखण्ड के प्रत्येक गांव नगर में कोई न कोई राम मंदिर है । प्रति वर्ष यहां शहर शहर राम लीला के मंचन होते हैं । राम नवमी पर राम जन्म शोभा यात्रायें निकाली जाती हैं । दशहरे पर रावण दहन के विशाल आयोजन होते हैं । वर्ष भर कभी न कभी , कहीं न कहीं राम कथा के आयोजन समारोह पूर्वक कथा वाचको के द्वारा किये जाते हैं , जिन्हें भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ प्रायोजित करते हैं । इन आयोजनों के माध्यम से पूजन सामग्री , बच्चों के खेल के धनुष बाण , इत्यादि की कई लोगों क रोजगार और आजीविका जुड़ी होती है ।

बुंदेली लोकगीतों में राम नाम रमा हुआ है ... उदाहरण स्वरूप देखिये ।

अवध में जन्मे राम सलोना

बंधनवारे बंधे दरवाजे

कलश धरे दोऊ कोना। अवध...


रानी कौशिल्या ने बेटा जाये

राजा दशरथ के छौना । अवध...


रानी कौशिल्या ने कपड़े लुटाये

राजा दशरथ ने सोना। अवध...


हीरा लाल जड़े पलना में

नजर लगे न टोना। अवध..

००००००००

श्री रामचन्द्र जन्म लिये चैत सुदि नौमी।


दाई जो झगड़े नरा की छिनाई

कौशिल्या जी की साड़ी लैहों, सोर की उठाई। श्री...

नाइन झगड़े नगर की बुलाई

कौशिल्या जी को लैहों हार , महल की पुताई। श्री...

पंडित झगड़ें पंचाग दिखाई

दशरथ जी को घोड़ा लैहों वेद की पढ़ाई। श्री...

ननदी जी झगड़े आँख की अंजाई

तीन लोक राज लैहों सांतिया धराई। श्री...

०००००००००


राजा दशरथ के चारों लाल दिन-दिन प्यारे लगें


अंगना में खेलें चारों भैया,

चलत घुटरुअन चाल, दिन-दिन प्यारे लगे। राजा...

खुशी भई है तीनऊ मैया।

दशरथ खुशी अपार, दिन-दिन प्यारे लगे। राजा...

गुरू की दीक्षा लेके उनने

मारे निशाचर तमाम, दिन दिन प्यारे लगें। राजा...

स्वयंबर भयो जनक नगर में

ब्याहे चारों-भाई, दिन-दिन प्यारे लगें। राजा...

ब्याह के आये अवध नगर खों

खुशी भये नर नारि, दिन-दिन प्यारे लगें। राजा...

००००००००


झुला दो रघुबर के पालने री।


झुलाओ मोरे हरि को पालने री।

कै गोरी आली सबरे बृज की संखियां,

घेर लए हरि के पालने री। झुला दो...

कै मोरी आली कोरी मटुकिया को दहिया,

जुठार गयो तोरो श्यामलो री। झुला दो...

कै मोरी आली तू गूजरी मदमाती,

पलना मोरो झूले लाड़लो री। झूला दो...

०००००००००

अवधपुरी में चैन परे न


बनखों गये रघुराई मोरे लाल

राम लखन और जनकदुलारी,

अब न परत रहाई मोरे लाल

सब रनवास लगत है सूनो,

रोवे कौशला माई मोरे लाल

नगर अयोध्या के सब नर-नारी,

सबरे में उदासी छाई मोरे लाल

जब रथ भयो नगर के बाहर,

दशरथ प्राण गये हैं मोरे लाल

चौदह साल रहे ते वन में,

सहो कठिन दुखदाई मोरे लाल

वन-वन भटकी परी मुसीबत,

शोक सिया खों भारी मोरे लाल


इसी तरह के अनेकानेक लोक गीत किसने कब लिखे कोई नहीं जानता । किसने इन गीतों की धुन बनाई यह भी अज्ञात है  ।  आज हम आप फेसबुक पर अपनी शब्दों की बाजीगिरी की छोटी सी कविता कोई अन्य प्रयुक्त कर ले तो कितना हंगामा खड़ा कर डालते हैं । इसके विपरीत बुंदेली लोक जीवन में व्याप्त ये लोक गीत , ढ़ोलक की थाप पर सास से बहुओं तक गायन शैली में  मुखरित होते पीढ़ीयों से गाये जा रहे हैं । अब अवश्य इन गीतों को यू ट्यूब , नये संसाधनो से प्रचारित तथा किताबों में संरक्षित किया जा रहा है ,एवं  इन पर शोध हो रहे हैं ।

 

बुंदेलखंड के साहित्य में रामकथा का महत्वपूर्ण स्थान है। महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना ही चित्रकूट में की थी । आज भी उत्तर प्रदेश के गोस्वामी तुलसीदास के जन्मस्थान राजापुर के मानस मंदिर में रामचरितमानस की मूल प्रति सुरक्षित रखी हुई है । पुरातत्व विभाग के प्रयासों से पाण्डुलिपि को संरक्षण कर नया जीवन दिया गया है। प्रतापगढ़ के कालाकांकर घाट में काशी नरेश ईश्वरी नारायण सिंह के प्रयासों से रामचरितमानस की यह मूल प्रति मिली थी जो पहले चोरी चली गई थी। इस मूल प्रति का अधिकांश भाग गुम हो चुका है , लेकिन अयोध्या कांड से संबंधित सभी 168 पृष्ठ मानस मंदिर में सुरक्षित रखे हुए हैं।

चित्रकूट में ही केशवदास की रामचंद्रिका और मैथिलीशरण गुप्त की साकेत जैसी रचनाएँ बुंदेलखंड के साहित्य में रामकथा को दर्शाती हैं। उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार  गोस्वामी तुलसीदास की रामचरित मानस की रचना के पूर्व ग्वालियर के कवि विष्णुदास ने संवत् 1499 वि.सं. (सन् 1442 ई. में वाल्मीकि रामायण के आधार पर बुन्देली मिश्रित ब्रज भाषा में 'रामायन कथा' नामक ग्रन्थ की रचना की थी । बुंदेलखंड की धरती को राम कथा की उत्पत्ति का केंद्र माना जाता है। क्योंकि वाल्मीकि और तुलसीदास दोनों ने ही इस धरती पर तपस्या कर राम कथायें लिखी । अयोध्या शोध संस्थान , से प्रकाशित  साक्षी  अंक २०  बुंदेली भाषा में राम कथा पर केंद्रित है । इसका संपादन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डा. योगेंद्र प्रसाद ने किया है । वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस कृति में व्यापक शोध सामग्री , बुंदेली लोक जीवन में श्रीराम पर संग्रहित है ।

बुंदेल खण्ड की सीमाओ के संदर्भ में "इत यमुना, उत नर्मदा, इत चंबल, उत टोंस। छत्रसाल सों लरन की, रही न काहू हौंस॥"

इसका अर्थ है कि "यमुना से नर्मदा तक, चंबल से टोंस तक, छत्रसाल के साथ युद्ध करने की किसी में भी हिम्मत नहीं थी" महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड के एक महान योद्धा थे, जिन्होंने मुगल शासकों के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया. स्वयं महाराजा छत्रसाल भगवान श्रीराम के परम भक्त थे । हाँ, महाराजा छत्रसाल भगवान श्री राम के परम भक्त थे और उन्होंने बुंदेलखंड में पन्ना में राम जानकी मंदिर की स्थापना करवाई थी. स्वयं परम वीर महाराजा छत्रसाल महावीर हनुमान जी के भी उपासक थे. पन्ना में श्री राम जानकी मंदिर प्रांगण में 300 साल पुरानी चंवर डुलाई की

परंपरा आज भी निभाई जाती  है. यथा राजा तथा प्रजा समूचे बुंदेलखण्ड क्षेत्र में सदियों से राम जानकी मन प्राण से जन जीवन में व्याप्त हैं । यह आयोजन भी इसी भाव की अभिव्यक्ति है ।

जै श्री राम

समरसता के आदर्श प्रतीक श्री राम

 समरसता के आदर्श प्रतीक श्री राम


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

भोपाल से 

(इन दिनों न्यूयॉर्क में)


 भारतीय संस्कृति, दर्शन, और सामाजिक चेतना के केंद्र में समरसता प्रमुख  है।  दार्शनिक, और सामाजिक दृष्टियों से श्री राम के समरस  स्वरूप का विश्लेषण वर्तमान समाज के लिए मार्गदर्शक है।

भारतीय संस्कृति का आधार ही समरसता, समानता और सद्भाव है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का विचार हमारे जीवन के हर क्षेत्र में अंतर्निहित मिलता है। इस दर्शन का सर्वश्रेष्ठ मूर्त रूप यदि किसी चरित्र में दिखाई देता है, तो वह है भगवान श्री राम। श्री राम को लोक मान्यता ने भगवान के स्वरूप में स्थापित किया हुआ है किन्तु वे एक धार्मिक व्यक्तित्व से पूर्व , सामाजिक सांस्कृतिक चेतना के ऐसे आदर्श पुरुष हैं, जिन्होंने जीवन के व्यवहारिक सभी स्तरों पर समरसता, न्याय और मर्यादा की स्थापना का उदाहरण प्रस्तुत किया है । इसी कारण वे “मर्यादा पुरुषोत्तम” कहलाए।


श्री राम का जीवन रामायण में जिस रूप में प्रस्तुत हुआ है, वह किसी संकीर्ण मत या जातिगत दृष्टि का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए सन्देश देता है , कि जीवन का लक्ष्य  धर्मपालन , समाज में सामंजस्य और समरसता स्थापित करना  है। श्री राम का जीवन मार्ग  समरसता की आधारशिला  से प्रारंभ होता है।

श्री राम के जीवन में प्रत्येक निर्णय और आचरण सामाजिक संतुलन का दर्पण है। उन्होंने जहाँ एक ओर पिता की आज्ञा का पालन करते हुए 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया, वहीं दूसरी ओर समाज की मर्यादा, मित्रता, निष्ठा, और सेवा को अपने जीवन का आधार बनाया।


वनवास की यात्रा में श्री राम ने समाज के हर वर्ग से मधुर संबंध स्थापित किये । निषादराज गुह, शबरी, जटायु, हनुमान जैसे पात्रों से उनकी आत्मीयता जाति, वर्ग, या स्थिति से परे थी। यह संकेत देता है कि उनके लिए मनुष्य का मूल्य उसके कर्म और निष्ठा में था, न कि उसकी राजनैतिक अथवा सामाजिक स्थिति में।

वन्य जीवन के दौरान उन्होंने आदिवासी, वानर, भिन्न जाति और भाषाओं के लोगों से समान समरस व्यवहार किया। यह उनका मानवीय दृष्टिकोण था जो आज भी सामाजिक एकता का प्रेरक आदर्श  है।


रामराज्य केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और नैतिकता का प्रतीक था। तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में कहा है कि “रामराज्य” में सब लोग सुखी थे, किसी के साथ अन्याय नहीं होता था। यह उस समय का सबसे बड़ा आदर्श था, जहाँ राजा स्वयं को “सेवक” मानकर प्रजा के कल्याण के लिए उत्तरदायी था। 


राम राज्य में समरसता पर आधारित शासन व्यवस्था थी। राम का शासन , नीति, धर्म और लोकहित के लिए था। उन्होंने कभी स्वार्थ या पक्षपात नहीं किया।  

न्याय और समानता के आदर्श सर्वोपरि थे।राम ने निष्पक्ष न्याय दिया, चाहे अपराधी समाज का कोई भी, किसी भी वर्ग से क्यों न हो।  

लोककल्याण की भावना ही शासन के मूल में स्थापित थी । उन्होंने अपने सुख से पहले प्रजा का हित सोचा। जब लोकमत सीता की अग्निपरीक्षा की मांग करता है, तब राम व्यक्तिगत पीड़ा सहकर भी सार्वजनिक मर्यादा को प्राथमिकता देते हैं।  

सबके लिए समभाव उनकी नीति  थी ।उनके शासन में सभी धर्मों, परंपराओं और परिजनों को समान सम्मान मिला।

यह दृष्टिकोण आज के लोकतांत्रिक आदर्शों का भी मूल है, जहाँ राज्य का केंद्र “लोग” होते हैं, न कि केवल सत्ता। यही कारण है कि महात्मा गांधी ने स्वतंत्र भारत में राम राज्य की परिकल्पना की थी।

विविध समाज के प्रति समान दृष्टि  उनकी विशेषता थी ।

राम का जीवन इस बात का उदाहरण है कि भिन्नता को स्वीकार कर ही समाज में एकता लाई जा सकती है। उन्होंने हर उस व्यक्ति का सम्मान किया जो नैतिकता, दायित्व, और समर्पण के मार्ग पर चलता था।

निषादराज गुह के प्रति उनका प्रेम,  भक्ति और मित्रता की ऐसी मिसाल है, जहाँ जातिगत भेदभाव का नामोनिशान नहीं रहा।  

शबरी के प्रति उनकी करुणा और स्नेह यह दर्शाते हैं कि समरसता का अर्थ केवल समानता नहीं, बल्कि आत्मीयता भी है। उन्होंने शबरी के जूठे बेर खाकर सामाजिक ऊँच-नीच की दीवारें गिरा दीं।  

हनुमान जी, जो वानर जाति से थे, उन्हें श्री राम ने अपने हृदय में स्थान दिया। इससे पता चलता है कि श्री राम के लिए जीव का मूल्य उसके चरित्र और कर्तव्य निष्ठा से था, न कि किसी उपाधि या जाति से।  

विभीषण, जो राक्षस कुल में थे, उन्हें भी श्री राम ने सम्मान दिया और लंका का राजा बनाया। इसका संदेश स्पष्ट था: सत्य और धर्म जहाँ हैं, वही राम के अपने हैं। कर्म से ही उन्होंने व्यक्ति की पहचान की । 

 समरसता और संवाद की भावना श्री राम की व्यवहार शैली का प्रबल पक्ष था । केवल जातिगत या सामाजिक समरसता को नहीं, बल्कि धार्मिक समरसता को भी उन्होंने महत्व दिया। उनके जीवन में हर मत, हर परंपरा को आदर मिला। उनके वनवास में ऋषियों से संवाद, योगियों से शिक्षा, वनवासियों से आत्मीयता और राक्षसों के बीच भी धर्म की बात करने की प्रवृत्ति उनके व्यापक समरस दृष्टिकोण को दिखाती है।


राम का मार्ग  “सह-अस्तित्व” था।  

युद्ध में भी उन्होंने रावण जैसे शत्रु के प्रति आदर रखा। युद्ध के अंत मे वे लक्ष्मण से कहते हैं — “रावण महान विद्वान था, उससे ज्ञान सीखो।” यह कथन उनके चरित्र की उच्चता और समरसता की भावना का प्रमाण है, जहां शत्रु योद्धा की योग्यता का भी सम्मान था। 


आज के समाज में जब वर्ग, सम्प्रदाय, और विचारधारा के नाम पर कई कई विभाजन दिखाई देते हैं, तब “रामराज्य” की परिकल्पना पुनः प्रासंगिक हो उठती है। रामराज्य हमें यह सिखाता है कि शासन का उद्देश्य केवल दंड और प्रशासन नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करना है जो हर व्यक्ति को समान अवसर और सम्मान दे।


समरस समाज के निर्माण में निम्न बातें आज भी राम के जीवन से प्रेरक संदेश देती हैं:  

- नेतृत्व में विनम्रता और सेवा-भाव।  

- समाज के हर वर्ग के प्रति समान दृष्टि।  

- व्यक्तिगत त्याग के माध्यम से जनकल्याण की भावना।  

- विविधता में एकता को स्वीकारने की शक्ति।


यह आदर्श यदि आज के राजनीति, शिक्षा, और न्यायिक व्यवस्था में लागू किया जाए, तो न केवल सामाजिक असमानता कम हो सकती है, बल्कि राष्ट्र की नैतिक चेतना भी सुदृढ़ होगी।


श्री राम का जीवन नारी सम्मान का आदर्श प्रतीक भी है। माता सीता के प्रति उनका प्रेम आदर्श दांपत्य का स्वरूप प्रस्तुत करता है। उन्होंने सीता के व्यक्तित्व को स्वतंत्र और आदर्श नारी के रूप में सम्मान दिया।

माता शबरी और कैकेयी जैसे विविध स्वभाव की स्त्रियों के साथ भी उन्होंने मर्यादा का पालन किया। सीता की अग्निपरीक्षा जैसी घटनाएँ अक्सर प्रश्नों के घेरे में आती हैं, पर यदि ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाए तो राम का निर्णय समाज की इच्छाओं के अनुरूप था  यह दर्शाता है कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर सामाजिक संतुलन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। यह सचमुच एक आदर्श नेतृत्व का गुण है।


 समरसता के दार्शनिक आयाम  ..

श्री राम का समरस दृष्टिकोण वेदांत और कर्मयोग के सिद्धांतों से गहराई से जुड़ा है। उन्होंने कर्म को पूजा का रूप दिया और संबंधों को धर्म से जोड़ा। उनके जीवन में हर घटना प्रतीकात्मक भी है —  

- रावण का वध “अहंकार” और “असमानता” के अंत का प्रतीक है।  

- राम का वनवास “त्याग” और “न्याय” के संघर्ष का प्रतीक है।  

- सीता की अग्निपरीक्षा “सत्य और धर्म की रक्षा” के लिए आत्मसंघर्ष का प्रतीक है।

इन सब घटनाओं में अंततः जो संदेश निहित है, वह यह है कि समाज तभी स्वस्थ रह सकता है जब उसमें समरसता, न्याय, और परस्पर सम्मान की भावना हो। 

श्री राम भारतीय चेतना में केवल देवता नहीं, बल्कि “सामाजिक समरसता के प्रतीक पुरुष” हैं। उनका व्यक्तित्व धर्म, नैतिकता, त्याग, और प्रेम का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि वास्तविक आदर्श वही है, जो सबको साथ लेकर चले । चाहे वह मनुष्य हो, पशु हो, स्त्री हो या किसी भी सामाजिक वर्ग से संबंधित हों।

आज जब हमारा समाज भांति भांति के विभाजनों से जूझ रहा है, तब श्री राम का जीवन हमें यह सिखाता है कि एकता केवल विचारों से नहीं, व्यवहार से आती है।

राम के जीवन का सन्देश सरल है , “सत्य पर अडिग रहो, सब का सम्मान करो, और न्याय का पालन करो।”यही समरसता का सर्वोच्च आदर्श है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

भोपाल से (इन दिनों न्यूयॉर्क में)

निंदक नियरे राखिए :लोकतंत्र की आधार नीति

 ललित निबंध


निंदक नियरे राखिए :लोकतंत्र की आधार नीति


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


पक्ष और विपक्ष का समन्वय ही लोकतंत्र है। विपक्ष का कार्य पक्ष में निंदा ढूंढकर उसे उजागर करना ही होता है। तथा पक्ष को इस निंदा को आत्मसात कर जन हित में निरंतर विपक्ष की निंदा के अनुसार नीतियों में परिष्कार होता है। 

इसी प्रकार मनुष्य का स्वभाव है कि वह सदैव अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है। कोई उसकी स्तुति करे, गुणों की सराहना करे, तो उसका हृदय पुलकित हो उठता है। किंतु जैसे ही कोई उसकी आलोचना करता है, उसके दोषों का उल्लेख करता है, तो वही हृदय क्षुब्ध हो जाता है। परंतु संत कवि कबीरदास ने मनुष्य को उल्टा दृष्टिकोण दिया, उन्होंने कहा,

“निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।

बिन साबुन पानी बिन, निर्मल करे सुभाय॥


इस छोटे-से दोहे में उन्होंने मानवीय आत्मशुद्धि का गूढ़ संदेश समझाया है। कबीर कहते हैं कि जो आपकी निंदा करता है, उसे अपने समीप रखना चाहिए, क्योंकि वह बिना किसी साधन के आपकी वृत्तियों को निर्मल करता है। जैसे दर्पण हमें हमारी वास्तविक छवि दिखाता है, वैसे ही निंदक हमारे दोषों को प्रकट करता है।

व्यापक अर्थ में कबीर का यह दोहा लोकतंत्र की मूल नीति भी है।


 ‘निंदा’ शब्द सामान्यतः नकारात्मक अर्थ में प्रयुक्त होता है। हम जब किसी की निंदा करते हैं, तो अभिप्राय होता है कि

उसके दोष गिनाना ।  कबीरदास की दृष्टि में वे निंदा को आत्मपरीक्षण का साधन मानते हैं। जो व्यक्ति आपसे असहमति व्यक्त करता है, आलोचना करता है, वह दरअसल आपके भीतर झाँकने का अवसर देता है। यदि हम धैर्यपूर्वक सुनें और विचार करें, तो वही आलोचना हमारे व्यक्तित्व को निखार सकती है।आत्म संशोधन का साधन निंदा है। मनुष्य प्रायः अपने गुणों के प्रति आसक्त रहता है। उसे अपने दोष कम ही दिखाई देते हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति हमें हमारी त्रुटियाँ दिखा दे , तो वह हमारे लिए ‘दर्पण’ के समान हो सकता है। हर सजग व्यक्ति के लिए यह अवसर होता है कि वह स्वयं में निंदा को समझ कर सुधार करे।

जीवन में प्रगति का मूलमंत्र यही है ,स्वयं को जानना, पहचानना और लगातार  सँवारना।

निंदक इस मार्ग में गुरु का कार्य करता है, क्योंकि वह हमें हमारी सीमाएँ दिखाता है।कबीर के इस दोहे में आध्यात्मिक साधना की झलक  है। साधक जब आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है, तो उसे निरंतर आत्मपरीक्षण की आवश्यकता होती है। निंदा इस आत्मपरीक्षण का एक बाह्य माध्यम है। जब कोई हमारी निंदा करता है, तो भीतर की ‘अहंता’ जाग उठती है। यदि उस क्षण हम संयम से काम लें और अपने भीतर झाँकें, तो अहंकार की परतें धीरे-धीरे हटती जाती हैं। इस प्रकार निंदा आत्मा के परिष्कार का साधन बन जाती है।


समाज में आलोचना का एक संतुलित स्थान होना अत्यंत आवश्यक है। यदि समाज में केवल प्रशंसा ही होती रहे, तो सुधार की भावना नष्ट हो जाएगी।


साहित्य में आलोचना एक सर्वथा मान्य विधा ही है। लेखक अपना सर्वश्रेष्ठ लिखता है, फिर उसे समालोचक को समीक्षा हेतु आदर पूर्वक भेजता है जिससे पाठक के लिए रचना के गुण धर्म स्पष्ट हों । आदर्श समीक्षा लेखक की दृष्टि को परिष्कृत करती है। 

घर परिवार में भी  बच्चों के विकास क्रम में उनकी गलतियों का सुधार उसकी निंदा के आधार पर ही हो पाता है।

निंदा जनमत को जागरूक बनाती है। लोकतंत्र इसी आलोचनात्मक चेतना पर आधारित है। राजनीतिज्ञ, साहित्यकार, वैज्ञानिक या कलाकार, सभी के लिए समीक्षक का होना अनिवार्य है। समीक्षक यदि निष्पक्ष हो, तो उसके द्वारा ही सृजन का स्तर ऊँचा उठता है।

कबीर का यह दोहा केवल व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक अनुशासन का भी संकेत देता है। सच्चे निंदक समाज में सत्य के द्योतक हैं। वे व्यक्ति या संस्था के दोषों को उजागर कर समाज को सजग रखते हैं। यदि निंदक न रहें, तो समाज आत्मसंतोष में डूब जाए और पतन की ओर बढ़े। इस दृष्टि से निंदक समाज के ‘स्वास्थ्य-रक्षक’ हैं।निंदा और द्वेष में अंतर समझना चाहिए। कबीर की ‘निंदा’ का अभिप्राय ‘द्वेष’ या ‘नीचा दिखाने’ से नहीं है। द्वेष से प्रेरित निंदा विष की तरह होती है ,  वह संबंध तोड़ती है और मन को कलुषित करती है। परंतु सजग और निष्पक्ष निंदा आत्मकल्याण का साधन बनती है।

कबीरदास इसीलिए कहते हैं कि निंदक को अपने समीप रखो, क्योंकि जब वह सम्मुख होगा, तो उसकी बातें  आत्म विचार उत्पन्न करेंगी। पर यदि वह दूर होगा, तो तुम्हें अपनी भ्रांतियों का पता न चलेगा। जीवन में निंदक का स्थान महत्वपूर्ण होता है। बाल्यकाल से ही हमें सिखाया जाता है कि दूसरों की बुराई न करें। यह शिक्षण नैतिक दृष्टि से उचित है, किंतु जब हम जीवन में आगे बढ़ते हैं, तो समझते हैं कि ‘सार्थक आलोचना’ भी उतनी ही आवश्यक है।

 जिसने भी अपने जीवन में निंदक को स्थान दिया, वह कभी मार्ग से विचलित नहीं हुआ।महान व्यक्तित्व इस सिद्धांत को भली-भाँति समझते हैं। इतिहास साक्षी है कि महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, तुलसीदास  सभी ने अपने आलोचकों से सीखा। गांधीजी ने तो कहा था कि “मेरे विरोधी ही मेरे सबसे बड़े शिक्षक हैं।” 

यह दृष्टिकोण जितना सरल प्रतीत होता है, उसकी साधना उतनी ही कठिन है। अपने विरोधियों को सहन करना, उनकी बातों में सत्य खोजना , यही परिपक्वता है। निंदक को समीप रखने का यह अर्थ नहीं कि हम अपनी मर्यादा या आत्मसम्मान खो दें। यदि कोई व्यक्ति केवल अपमान करने के उद्देश्य से कटु वचन कहता है, तो उसका प्रतिकार आवश्यक है। किंतु यदि उसकी बातों में सत्य का अंश है, तो उस सत्य को स्वीकार कर आत्मसुधार करना ही विवेक का लक्षण है। इस प्रकार, बुद्धिमत्ता निंदक को दूर भगाने में नहीं, बल्कि उसकी बातों का सार ग्रहण करने में है।आध्यात्मिक दृष्टि से कबीर की वाणी केवल सामाजिक या व्यवहारिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी है।

उनका यह दोहा ‘अहंकार-क्षय’ का मार्ग बताता है। जब कोई हमारी निंदा करता है और हम शांत रहते हैं, तो हमारे भीतर  ‘मैं’ शिथिल होता है। धीरे-धीरे यह स्थिति ‘समत्व’ की ओर ले जाती है, जहाँ प्रशंसा और निंदा दोनों समान लगती हैं। यही गीता का भी संदेश भी है 

“सम्मानं च अपमानं च तुल्यं कृत्वा।”

अर्थात् जो व्यक्ति सम्मान और अपमान में सम रहता है, वही स्थिर बुद्धि का धनी होता है। हिंदी साहित्य में ‘कबीर’ वह पर्वत-शिखर हैं जहाँ से सदाचार, निर्भीकता और यथार्थवाद की ज्ञान गंगा प्रवाहित होती है। उनके दोहों में जीवन का रस है और दर्शन का गूढ़ अर्थ। “निंदक नियरे राखिए” जैसे दोहे केवल भाषा की शोभा नहीं, जीवन के गूढ़ अर्थ और दर्पण हैं। यह दोहा आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पाँच शताब्दी पूर्व था।यदि हम आधुनिक युग की बात करें, जहाँ सोशल मीडिया और जनमाध्यमों के युग में आलोचना सर्वत्र विद्यमान है, वहाँ कबीर का यह संदेश और भी आवश्यक प्रतीत होता है। आज के समय में लोग तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं, विवाद करते हैं, पर आत्मविश्लेषण नहीं करते। अगर हम कबीर की तरह सोचें, तो आलोचना को सीखने का अवसर मानें, तो समाज में संवाद की स्वस्थ परंपरा स्थापित हो सकती है। यदि हम इस दोहे को अपने जीवन में उतारें, तो कुछ सरल उपाय अपनाए जा सकते हैं । आलोचना को शांत मन से सुनने की आदत डालें।अपनी गलतियों को स्वीकार करने में संकोच न करें।दूसरों की दृष्टि से स्वयं को देखने की कला विकसित करें।प्रशंसा और निंदा दोनों में संतुलन बनाए रखें।निंदक के प्रति द्वेष रखने के बजाय उसे कृतज्ञ दृष्टि से देखें।इन उपायों से हमारा मन अधिक स्थिर, विवेकी और सहनशील बनेगा।कबीर का यह दोहा केवल एक नैतिक शिक्षण नहीं, बल्कि एक व्यापक जीवन-सिद्धांत है। जो व्यक्ति निंदक को शत्रु नहीं, शिक्षक समझता है, उसका जीवन निरंतर प्रगतिशील रहता है। निंदक हमें हमारे दोषों से परिचित कराता है । यही परिचय सुधार की पहली सीढ़ी है।

निंदक को दूर रखकर हम अपने चारों ओर केवल मधुर शब्दों की दीवार खड़ी कर सकते हैं, पर सत्य का प्रकाश भीतर नहीं पहुँच सकेगा। अतः आवश्यक है कि हम निंदा को सहर्ष स्वीकार करें और उसे आत्मविकास का माध्यम बनाएँ।कबीर की वाणी शाश्वत है ।

जो भी इसे जीवन में उतार ले, उसका चित्त निर्मल और स्थिर हो सकता है।

वास्तव में, निंदक वही दीपक है जो हमारे भीतर के अँधेरे को उजाले में बदल सकता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Saturday, 3 January 2026

भूमिका कहानी संग्रह डॉ अशोक व्यास

 भूमिका 


कहानी, जब अपने शिखर पर पहुँचती है, तो वह जीवन के सबसे सामान्य प्रसंगों में छिपे असाधारण अर्थों को इस तरह उजागर करती है कि पाठक अपने अनुभवों को उसके नए प्रकाश में देखने लगे। अच्छी कहानी केवल घटना का ब्यौरा नहीं होती, वह घटनाओं के पीछे काम कर रही मान्यताओं, रिश्तों, इच्छाओं, भय और उम्मीदों की परतें खोलती है। कथानक की सघनता, चरित्रों की जीवंतता, संवादों की स्वाभाविकता, वातावरण की ठोस उपस्थिति और भाषा की सहजता के साथ संवेदनापूर्ण प्रवाह , ये वे मापदंड हैं जिन पर किसी भी कहानी संग्रह को परखा जा सकता है। जब कहानी इन मापदंडों पर खरी उतरती है, तब वह पाठक से केवल सहमति नहीं, आत्ममंथन भी माँगती है, केवल मनोरंजन नहीं, भीतर की चुप दीवारों पर हल्की चोट भी पहुँचाती है। और पाठक को लंबे समय तक स्मृति में रहती है। 

कहानी के बदलते स्वरूप की चर्चा करें तो 

आज तकनीक, डिजिटल मीडिया, ऑनलाइन पत्रिकाएँ और सोशल प्लेटफॉर्म कहानी लेखन को नई दिशा दे रहे हैं। लघुकथा और फ्लैश फिक्शन जैसे छोटे प्रारूप लोकप्रिय हो रहे हैं, वहीं वैश्विक आदान प्रदान से हिंदी कहानी का दायरा और दृष्टि विस्तृत हुई है।प्रेमचंद युग में कहानी सामाजिक यथार्थ और आदर्शवाद से जुड़ी थी ,शोषण पर प्रहार और सुधार इसकी मुख्य प्रवृत्तियाँ थीं। 1950‑60 के दशक की नई कहानी ने व्यक्ति के अंतर्द्वंद्व, अकेलेपन और अस्तित्वगत संकट को केंद्र में रखा। राजेंद्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर ने यथार्थ को बाहरी नहीं, आंतरिक दृष्टि से देखा। इसके बाद मुक्त शिल्प वाली अकहानी और सचेतन कहानी ने जीवन की विसंगतियों और असंगतियों को स्वर दिया।1980 के बाद हिंदी कहानी ने विविधता का युग देखा। स्त्री, दलित, आदिवासी, लैंगिक अल्पसंख्यक और शहरी मध्यमवर्गीय पात्र प्रमुखता से उभरे। बाज़ारवाद, सांप्रदायिकता, पर्यावरण और पहचान जैसे नए मुद्दे भी कथा वस्तु बने। कहानी समाज सुधारक से प्रश्नकर्ता में बदली।आज कहानी का उद्देश्य मनोरंजन, सामाजिक चेतना और कलात्मक अभिव्यक्ति, तीनों का समन्वय है। हिंदी कहानी ने आदर्शवाद से प्रयोगधर्मिता तक की यात्रा में अपनी जीवंतता सिद्ध की है।


डॉ. अशोक व्यास का कहानी‑संग्रह ‘उम्र की सीमा होती है’ ऐसी ही विभिन्न परिदृश्य समेटती कहानियों का संकलन है, जो बाहरी दृष्टि से सामान्य, मध्यमवर्गीय या कस्बाई जीवन से उठाई गयी स्थितियों के भीतर गहरे नैतिक और भावनात्मक प्रश्नों को टटोल रही हैं। 

‘उपेक्षा’ की नीहारिका से आरंभ करें तो यह कहानी केवल एक “मिडिल क्लास” लड़की की सफलता या असफलता की कथा नहीं, वह जन्म से झेली गयी अवांछित स्थिति, बहन भाई के बीच के सूक्ष्म भेदभाव, और लगातार मिले तानों को अध्ययन की जिद और आत्मनिर्भरता में बदल देने की प्रक्रिया दिखाती है। पिता पुत्री के बीच अंतिम संवाद में जो भावनात्मक पिघलाव और स्वीकार्य है, वह इस संग्रह की कहानियों की मूल विशेषता सामने लाता है । लेखक अपनी अभिव्यक्ति में कठोर संरचनाओं की आलोचना करता है, पर व्यक्ति के भीतर परिवर्तन और संवेदना की सम्भावना को हमेशा जीवित रखता है।  


‘जबान पर लगा ताला’ इस संवेदनशील दृष्टि को एक दूसरी दिशा में विस्तृत करती है। एक छोटे बच्चे से पाँच दस रूपये के लिए मोलभाव करने वाली उपभोक्तावादी मानसिकता को लक्ष्य किया गया है, वही मोलभाव करता व्यक्ति जब बड़े दुकानदार के बिल पर “प्रिंट रेट” सुनकर चुपचाप पैसे दे देता है, तो कहानी एक शब्द कहे बिना ही वर्ग पक्षपात, शक्ति‑संतुलन और हमारी सुविधाजनक नैतिकता पर तीखा प्रश्नचिन्ह खींच देती है। यहाँ भी लेखक किसी उपदेशात्मक निष्कर्ष की घोषणा नहीं करता । वह केवल दो दृश्य सामने रखता है और पाठक को यह सोचने के लिए छोड़ देता है कि हमारी तीखी जबान हमेशा कमजोर के सामने ही क्यों खुलती है। चूंकि डॉ अशोक व्यास मूलतः एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, उनकी कथानीयता में व्यंग्य और कटाक्ष की भाषा परिलक्षित होना कथा को सँवार देती है।


‘जात बाहर’ और ‘डेस्टिनेशन वेडिंग’ जैसी कहानियाँ इस संग्रह के सामाजिक आर्थिक सरोकारों की गहराई को रेखांकित करती हैं। ‘जात बाहर’ में बाल्यकाल की एक आकस्मिक “गिलहरी‑हत्या” को आधार बनाकर कैसे पंडित समाज, धर्म और प्रायश्चित की आड़ में एक गरीब ब्राह्मण परिवार की जमीन, सम्मान और जीवन पर अधिकार जमा लेता है, और फिर अगली पीढ़ी में मास्टर शिवनाथ उसी रूढ़ व्यवस्था के सामने खड़े होकर प्रायश्चित की परिभाषा बदल देते हैं , यह प्रसंग परंपरा और न्याय के संबंध पर गंभीर विमर्श की ओर संकेत करता है। दूसरी ओर ‘डेस्टिनेशन वेडिंग’ में शहर के उच्च अधिकारी सिन्हा साहब और किसान रामदयाल के बीच संवाद केवल “फसल” की कीमत या “इवेंट” की जगह भर का प्रश्न नहीं है, यह इस बात की टक्कर है कि भूमि को कोई फोटो‑फ्रेम की पृष्ठभूमि समझता है और कोई उसे अपने श्रम, सम्मान और भविष्य की खाद्य‑सुरक्षा के रूप में देखता है। रामदयाल का शांत, पर दृढ़ वाक्य कि फसल का असली दाम तब है जब उसका आटा किसी भूखे के पेट में तृप्ति बनकर उतरता है । यह संवाद इस कहानी का ही नहीं, पूरे संग्रह की नैतिक धुरी है।  


मानवीय संबंधों और प्रेम के विविध रूपों की पड़ताल इस संकलन का एक और गहरा आयाम है। ‘प्रेम के अनोखे रंग’ का अनुभव किशोर आकर्षण से शुरू होकर साहसी, अस्वीकृत प्रेम, जाति‑बंधन से पराजित प्रेम और मित्रता या भाईचारे के रूप में सुरक्षित किए गए स्नेह तक कई स्तरों से गुजरता है। यहाँ प्रेम कोई एकरेखीय, आदर्श रोमानी भाव नहीं, बल्कि समय, सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत अपराध बोध के बीच उलझता सुलझता मानवीय अनुभव है। इसी कड़ी में शीर्षक कहानी ‘उम्र की सीमा होती है’ जिम के आधुनिक, शहरी वातावरण में घटती एक अत्यंत सूक्ष्म प्रेम कथा है, जहाँ अविनाश और सिमरन के बीच आकर्षण, निकटता और परस्पर सम्मान तो है, परंतु दोनों अपने‑अपने जीवन मार्ग, प्राथमिकताओं और आयु में अंतर की जटिलताओं को नज़रंदाज़ नहीं कर पाते। अंततः वे एक गरिमापूर्ण दूरी चुनते हैं । बिना कटुता, बिना नाटकीय टूटन के , और शायद यहीं इस कहानी का सबसे परिपक्व कथ्य छिपा है कि प्रेम का पूर्ण रूप हमेशा मिलन नहीं, कभी सम्मानजनक अलगाव भी हो सकता है।  


संग्रह की कुछ प्रमुख कहानियाँ हमारे समय के अत्यंत समकालीन और संवेदनशील मुद्दों को स्पर्श करती हैं। ‘सपने पूरे कैसे हुए’ में कर्नल चौधरी की बेटा होने वाली कामना, लैंगिक पूर्वाग्रह और बदलती रक्षा नीति , जहाँ लड़कियाँ भी सेना में प्रवेश पा रही हैं, के संदर्भ में बेटी माधवी और बेटा रंजीत की यात्राएँ समांतर रेखाओं की तरह चलती हैं। माधवी वह सपना साकार करती है जिसे पिता ने “बेटे” के लिए देखा था । वहीं रंजीत नृत्य के माध्यम से अपनी संकोची, भीतर से अपराध बोध से भरी पहचान को कला, आत्मस्वीकृति और संवेदनशीलता की ताकत में बदल देता है। अंत में जब पिता “मर्दानगी” की अपनी संकीर्ण परिभाषा से मुक्त होकर स्वीकार करते हैं कि शक्ति केवल वर्दी, युद्ध या कठोरता में नहीं, संवेदना और कला में भी होती है, तो कहानी भारतीय मध्यवर्गीय पिता‑पुत्र संबंधों पर एक नयी, आश्वस्तिजनक रोशनी डालती है, तथा सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव को स्पष्ट करती है।


‘चिर विद्रोहिणी’ की ललिता इस संग्रह की सबसे जटिल स्त्रीचरित्रों में से एक है। बाल विवाह का विरोध, अप्रिय पति के साथ जीवन से इंकार, प्रेम में धोखा, लिव‑इन, कोर्ट में शादी, टेस्ट‑ट्यूब बेबी, और फिर विवाह संस्था के भीतर फँसी अपनी बेटी के लिए एक नैतिक रूप से अत्यंत असुविधाजनक समाधान पर विचार , यह सब मिलकर उसे केवल बाहरी अर्थों में नहीं, भीतर की सतत आत्म बहस के अर्थ में “विद्रोहिणी” बनाते हैं। डॉ. व्यास यहाँ स्त्री जीवन के विकल्पों को किसी एक नैतिक खांचे में बंद नहीं करते। वे ललिता के माध्यम से दिखाते हैं कि विद्रोह का अर्थ हमेशा “सही” निर्णयों की यात्रा नहीं, बल्कि जोखिम, गलती, अपराध‑बोध और पुनर्विचार से भरी एक मानवीय यात्रा भी हो सकता है।  


इस संग्रह की इन तमाम कहानियों के बीच ‘उम्र की सीमा होती है’ संग्रह को एकसूत्र में बाँधने वाला तत्व है । साधारण जीवन स्थितियों में छिपे असाधारण प्रश्नों को शांत, संवाद प्रधान, आत्मीय भाषा में उजागर करने की कथाकार की क्षमता अद्भुत है। डॉ. अशोक व्यास का लेखकिय स्वभाव यहाँ किसी कठोर वैचारिक घोषणापत्र का नहीं, बल्कि धीर, विचारशील साक्षी रचनाकार का है, जो अपने समय की विसंगतियों, विडम्बनाओं और संघर्षों को देखता तो है, पर उनसे निराश नहीं होता। वह अपने पात्रों के भीतर परिवर्तन, साहस और संवेदना की सम्भावना को लगातार रेखांकित करता चलता है।  

‘उम्र की सीमा होती है’ के पात्र अधिकतर उसी वर्ग और वातावरण से आते हैं जिसे सामान्यतः “मध्यमवर्ग” कहकर सरसरी नज़र से देखा जाता है । छोटे किसान, सरकारी कर्मचारी, सैनिक अधिकारी, शिक्षक, सेल्स‑बॉय, कस्बाई व्यापारी, जिम जाने वाले प्रोफेसर, घर‑गृहस्थी सँभालती स्त्रियाँ और अपने सपनों के साथ जूझते युवा । इन्हीं चेहरों के माध्यम से लेखक जाति व्यवस्था, पितृसत्ता, उपभोक्तावादी विवाह संस्कृति, लैंगिक भूमिकाओं, प्रेम और विवाह के बदलते अर्थ, किसान के जीवन का सम्मान, और आत्मस्वीकृति की जद्दोजहद जैसे मुद्दों पर सोद्देश्य, परंतु अत्यंत मानवीय तरीके से बात करते हैं। उनकी भाषा सहज, संवादपूर्ण और भावुक होते हुए भी संयमित है। घटनाएँ साधारण हैं, पर उनके भीतर छुपे प्रश्न असाधारण हैं।  


डॉ. अशोक व्यास स्वयं अभियंता हैं, पर उनकी कहानियाँ मनुष्यों की “भीतरी संरचनाओं” उनके विश्वास, डर, स्वप्न और विरोध की सूक्ष्म इंजीनियरिंग करती दिखायी देती हैं। यह संग्रह यह विश्वास देता है कि कहानी कला अभी भी हमारे समय में न केवल एक महत्वपूर्ण साहित्यिक विधा है, बल्कि समाज के आत्म विश्लेषण और संवेदना की पुनर्स्थापना का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। कहानी शब्द चित्र बनाने की कला है, और ‘उम्र की सीमा होती है’ के कथा चित्र पाठक को हँसाएगे नहीं, चौंकाएंगे भी नहीं उसे चुपचाप अपनी दुनिया में ले जाकर यह पूछेंगे कि जो पात्र यहाँ दिख रहे हैं, वे किसी दूर देश के नहीं हैं। वे हमारे ही घरों, मोहल्लों और भीतर बसे हुए लोग हैं। यही पहचान इस संग्रह की सबसे बड़ी सौगात है। कहानी विधा आज भी मानव अनुभवों की सबसे प्रखर और समावेशी अभिव्यक्ति है, यह आश्वस्ति डॉ अशोक व्यास के इस संग्रह को पढ़कर होती है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

लेखक, समीक्षक 

भोपाल

प्रस्तावना शारदा दयाल श्रीवास्तव

 


प्रस्तावना


पाठक व्यंग्यकार के साथ उसकी लेखन नौका पर सवार होकर रचना में अभिव्यक्त विसंगतियों के प्रवाह के सर्वथा विपरीत दिशा में पाठकीय सफर करता है । यह लेखक के रचना कौशल पर निर्भर होता है कि वह अपने पाठक के व्यंग्य विहार को कितना सुगम , कितना आनंदप्रद और कितना उद्देश्यपूर्ण बना कर पाठक के मन में अपनी लेखनी की और विषय की कैसी छबि अंकित कर पाता है । व्यंग्य रचना का मंतव्य समाज की कमियों को इंगित करना होता है । इस प्रक्रिया में लेखक स्वयं भी अपने मन के उद्वेलन को व्यंग्य रचना लिखकर शांत करता है । जैसे किसी डाक्टर को जब मरीज अपना सारा हाल बता लेता है , तो इलाज से पहले ही उसे अपनी बेचैनी से किंचित मुक्ति मिल जाती है । उसी तरह लेखक की दृष्टि में आये विषय के समुचित प्रवर्तन मात्र से व्यंग्यकार को भी रचना सुख मिलता है । व्यंग्यकार समझता है कि ढ़ीठ समाज उसकी रचना पढ़कर भी बहुत जल्दी अपनी गति बदलता नहीं है पर साहित्य के सुनारों की यह हल्की हल्की ठक ठक भी परिवर्तनकारी होती है । व्यवस्था धीरे धीरे ही बदलतीं हैं । साफ्टवेयर के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रो में जो पारदर्शिता आज आई है , उसकी भूमिका में भ्रष्टाचार के विरुद्ध लिखी गई व्यंग्य रचनायें भी हैं । शारीरिक विकृति या कमियों पर हास्य और

व्यंग्य अब असंवेदनशीलता मानी जाने लगी है । जातीय या लिंगगत कटाक्ष असभ्यता के द्योतक समझे जा रहे हैं , इन अपरोक्ष सामाजिक परिवर्तनों का किंचित श्रेय बरसों से इन विसंगतियों के खिलाफ लिखे गये साहित्य को भी है । रचनाकारों की यात्रा अनंत है , क्योंकि समाज विसंगतियों से लबालब बना रहता है । सच्चे व्यंग्यकार को हर सुबह अखबार पलटते ही नजरों के सामने विषय तैरते नजर आते हैं ।

लेखक शारदा दयाल श्रीवास्तव ने अपने पहले व्यंग्य संग्रह "खर बुद्धि वाले प्रखर" की पाण्डुलिपि पढ़ने और उस पर कुछ लिखने का अवसर मुझे दिया । पाण्डुलिपि ३१ सम सामयिक व्यंग्य लेखों का संग्रह है । मैने आद्योपांत सभी रचनायें पढ़ीं । जहां कुछ लेखों में ब्याज स्तुति है , वहीं कई लेखों का कलेवर अमिधा में वर्णनात्मक भी है । वाक्य विन्यास और भाषा ग्राह्य है । वाक्यों में व्यंग्य का संपुट है। विषयों का चयन रचनाकार के परिवेश के अनुरूप और समसामयिक है । अभिव्यक्ति का सामर्थ्य लेखक की कलम में है । लेख छोटे और सारगर्भित हैं । रचनाकार का अध्ययन उनकी अभिव्यक्ति में परिलक्षित होता है । प्रासंगिक संदर्भो में उन्होंने लोकोक्तियों , कहावतों , फिल्मी गीतों के मुखड़ो और साहित्यिक रचनाओ से उद्धवरण भी लिये हैं । सामाजिक बदलाव तथा राजनीति के प्रति जागरुख श्रीवास्तव जी ने उनको नजर आती विसंगतियों पर लिख कर अपना आक्रोश पाठको के सम्मुख रखा है । रचनाओ के शीर्षक छोटे और प्रभावी हैं । किसी रचना का शीर्षक वह दरवाजा होता है जिससे पाठक व्यंग्य में प्रवेश करता है । शीर्षक पाठकों को रचनाओ तक सहजता से आकर्षित करता है । शीर्षक सरल, संक्षिप्त और जिज्ञासावर्धक होना चाहिये । वस्तुतः जिस प्रकार जब हम किसी से मिलते हैं तो उसका चेहरा या शीर्ष देखकर उसके संपूर्ण व्यक्तित्व के विषय में अपने पूर्व अनुभवों के अनुसार एक अनुमान लगा लेते हैं । धारणा निर्माण की यह अव्यक्त मौन प्रक्रिया अप्रत्यक्ष स्वयमेव होती है । ठीक इसी प्रकार शीर्षक को पढ़कर व्यंग्य के अंतर्निहित मूल भाव के विषय में पाठक एक अनुमान लगा लेता है । सामान्य सिद्धांत है कि शीर्षक छोटा होना चाहिए लेकिन लेख की समग्र अर्थाभिव्यक्ति की दृष्टि से अधूरा नहीं होना चाहिए । मुहावरों , लोकोक्तियों लोकप्रिय फिल्मी गीतों या शेरो शायरी के मुखड़ो को भी शीर्षक के रूप में प्रयोग किया जाता है । इस किताब के प्रायः लेखों के शीर्षक निर्धारण में मुझे यह गुणवत्ता दृष्टिगत हुई ।

किताब के पहले ही व्यंग्य "मेरा देश मेरा भेष" में ब्याज स्तुति का प्रयोग कर विदेशों के प्रति अनुराग पर कटाक्ष करने में रचनाकार सफल रहे हैं । सड़को के स्पीड ब्रेकर को लेकर वे लिखते हैं " जनता के ,जनता के लिये , जनता द्वारा निर्मित कूबड़ की तरह उभरे स्पीड ब्रेकर हैं " । मुझे नहीं पता कि श्रीवास्तव जी ने व्यक्तिगत रूप से अमेरिका यात्रा की है या अपने अध्ययन के आधार पर वे लिखते हैं " यदि अमेरिका पूछे कि मेरे पास बिल्डिंगें हैं , प्रापर्टी है , बैंक बैलेंस है , .... क्या है तुम्हारे पास ?? दो टूक जबाब है .. मेरे पास भारत माँ है !

भविष्य की कल्पना करने में श्रीवास्तव जी पारंगत प्रतीत होते हैं "सम्भव है कल को चंद्रयान के लैंडिंग स्पाट शिवशक्ति पाइंट पर भव्य शिव महालोक का निर्माण हो , फिर हमारे नेता मतदाताओ को वहां की मुफ्त यात्रा की रेवड़ी बांटते दिखें "

पेंशनधारियों के लिये जीवन प्रमाणपत्र एक अनिवार्य सरकारी वार्षिक प्रक्रिया है , इस विसंगति पर कई व्यंग्यकारों ने अपनी अपनी क्षमता के अनुसार व्यंग्य किये हैं । "जिंदगी से लिपटा जीवन प्रमाण " में श्रीवास्तव जी ने भी इस मुद्दे को उठाया है " पेंशनर हार कर अफसर से पूछता है तुम्हीं बताओ कि मुझे लिविंग कैसे मानोगे ? अफसर जबाब देता है कि साथ में लाईफ सर्टिफिकेट लेकर चल रहे हो तो जिंदा हो तुम " वे लेख में जावेद अख्तर के फिल्मी गीत " दिलों में अपनी बेताबियां लेकर चल रहे हो तो जिंदा हो तुम , नजर में ख्वाबों की बिजलियां लेकर चल रहे हो तो जिंदा हो तुम " का भी प्रासंगिक उपयोग कर विषय बढ़ाते हैं ।

खिचड़ी पर उन्होंने एक धारदार व्यंग्य लिखा है । हिन्दी में अंग्रेजी मिला दो तो भाषा की खिचड़ी बन जायेगी , ... चुनाव में बहुमत न मिले तो मिली जुली सरकार की खिचड़ी "

संग्रह का सबसे छोटा लेख आलस्य महोत्सव है । उन्होंने आलस्य को समृद्धि की कुंजी बताया है ।

ताश के पत्तों पर साहित्य में बहुत कुछ लिखा गया है , ताश के पत्ते तो खुशनसीब हैं यारों बिखरने के बाद कोई उठाने वाला तो है । श्रीवास्तव जी लिखते हैं " ताश की गड्डी पूरा मुल्क है , बादशाह , बेगम , गुलाम , विधानपालिका , न्यायपालिका और कार्यपालिका । इक्का जनप्रतिनिधि है । चारों बादशाहों के चार दल हैं । कताक्ष देखिये "जोकर निर्दलीय है जो किसी की भी सरकार बना सकता है । " जोकर पानी की तरह है जिस बर्तन में डालो उसका आकार ग्रहण कर ले ।

विवाह हमारे समाज में हमेशा से एक बड़ा आयोजन रहा है । ब्याह चालीसा , नृत्य विवाहिका , ... ब्याव को बाबा आदि रचनाओ में लेखक ने अपने तरीके से व्यंग्य के पंच चलाये हैं । माल , माया और मुहब्बतें , दो पैग जिंदगी के प्रभावी रचनायें है । स्वप्न का सहारा लेकर .... निठल्ले की परलोक यात्रा का बढ़िया प्रयोगवादी कल्पना व्यंग्य वर्णन है । लंदन ठुमकदा , बेशर्म रंग आदि लोगों की जुबान पर चढ़े हुये फिल्मी गीतों का अवलंबन लेकर रचे गये व्यंग्य हैं ।

कुछ लेखों की पंच लाइने पढ़ें " मनुष्य में मस्तिष्क का विकास होते ही उसकी रीढ़ कमजोर होने लगी " , सब मिथ्या है यह जगत भी , जन्म पत्री भी और मुहूर्त भी , विदेश यात्रा के प्रति मध्यवर्ग के अतिरिक्त अनुराग पर व्यंग्य करते हुये कटाक्ष करते हुये वे लिखते हैं "चैक इन लगेज में लगी स्लिप तो जैसे अटैची का सुहाग है " ।

जब कोई प्रभावी नेता कुछ कहता है तो उसे बहुत सोच समझ कर बोलना चाहिये , क्योंकि समाज पर उसके दीर्घगामी परिणाम होते हैं । जैसे "आपदा में अवसर" की टैग लाइन से समाज में संवेदना का हृास हुआ दिखता है । इसी तरह लेककीय दायित्व भी है कि रचनाओ में बड़ी जिम्मेदारी से कुछ लिखा जाये , क्योंकि साहित्य दीर्घ जीवी होता है । श्रीवास्तव जी के लेखों में यह जिम्मेदारी दिखती है । आपदा में अवसर का अवलंब लेकर उन्होंने " उत्सव मेंअवसर " रचना लिखी है । पंच लाइन देखिये राष्ट्रीय दिवसों की उत्सव धर्मिता पर वे लिखते हैं " फेसबुक पर डी पी तिरंगी कर लें ... भारत माता को इससे ज्यादा क्या चाहिये ? समाज में व्याप्त शो बिजनेस पर अच्छा कटाक्ष है ।

शीर्षक लेख " खर बुद्धि वाले प्रखर " में उन्होंने "नौ नकद न तेरह उधार" के समानांतर मुहावरा "लेना एक न देना दो " का प्रयोग कर उनकी प्रखर बुद्धि का परिचय दिया है ।

कुल जमा मेरा अभिमत है कि व्यंग्य जगत को शारदा दयाल श्रीवास्तव के इस प्रथम व्यंग्य संग्रह का स्वागत करना चाहिये । अध्ययन तथा समय के साथ निश्चित ही उनका अनुभव संसार और विशाल होगा । अभिव्यक्ति क्षमता में लक्षणा तथा व्यंग्य की शैलियो के नये प्रयोग एवं विषय चयन में व्यापक कैनवास से उनकी लेखनी में और पैनापन आयेगा । वे संभावनाओ से भरपूर व्यंग्यकार हैं । मेरी समस्त शुभ कामनायें उनके रचना कर्म के साथ हैं ।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

ए २३३ , ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी , जे के रोड , भोपाल , ४६२०२३

मो ७०००

३७५७९८ 

टांग अड़ाने के मजे राकेश सोहम

टांग अड़ाने के मजे 

  सामयिक घटनाओ पर हिन्दी व्यंग्य पिछली सदी के अंतिम दशको से लिखे जाते रहे हैं . अब ये अधिकांश पत्र पत्रिकाओ के लोकप्रिय स्तंभ बन चुके हैं .तानाशाही व कम्युनिस्ट सरकारो के राज में जहां खबरों पर प्रशासन का पहरा होता है , खबरों की वास्तविक तह का अंदाजा लगाने के लिये भी लोग व्यंग्यकारो को पढ़ते हैं . पाठक संपादकीय पन्नो पर रुचि पूर्वक पिछले दिनो हुई घटनाओ को व्यंग्यकारों के नजरिये से पढ़कर मुस्कराता है ,अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुरूप रचनाकार का इशारा समझता है , कुछ मनन भी करता है .इनके माध्यम से पाठक को बौद्धिक सामग्री मिलती है .ये व्यंग्य लेख पाठक के मानस पटल पर त्वरित रूप से गहरा प्रभाव छोड़ते हैं . 

   तारीखो के बदलते ही अखबार अवश्य ही रद्दी में तब्दील हो जाता है पर अखबारो में प्रकाशित ऐसे व्यंग्य लेखों का साहित्यिक महत्व बना रहता है . मैने अनुभव किया है कि किंचित बदलाव के साथ घटनाओ की पुनरावृत्ति होती है , और पुराने पढ़े हुये व्यंग्य पुनः सामयिक लगने लगते हैं . यह व्यंग्यकार का कौशल ही होता है कि जब वह किसी घटना का अपनी शैली में लोक व्यापीकरण कर उसे अभिव्यक्त करता है तो वह व्यंग्य , साहित्य बन जाता है . अखबार अल्पजीवी होता है , पर साहित्य का महत्व हमेशा बना रहता है . इसीलिये अखबारों में छपे ऐसे व्यंग्य लेखो के पुस्तकाकार प्रकाशन की जिम्मेदारी लेखक पर आ जाती है . इन व्यंग्य संग्रहो से कोई शोधार्थी कभी सामाजिक घटनाओ के साहित्यिक प्रभाव का पुनर्मूल्यांकन करेगा . बदलती पीढ़ीयों के पाठक जब जब इन संग्रहो के व्यंग्य लेखो के कथ्य को पढ़ेंगे , समझेंगे, उनके परिवेश तथा अनुभवों के साथ बदलते समय के नये बिम्ब बनायेंगें . स्मित मुस्कान , किंचित करुणा , विवशता , युग की व्यथा ,हर बार पाठक को बार बार गुदगुदायेगी , हंसायेगी , रुलायेगी , सोचने पर मजबूर करेगी.  

  इस पुस्तक में संग्रहित व्यंग्य लेखों के विषय स्वयं में ही दीर्घ जीवी हैं , उदाहरण के लिये भ्रष्टाचार , चुनाव , मंहगाई , बजट , सफाई , स्मार्ट सिटी , हिन्दी साहित्य , आफिस , सोशल मीडीया , होली , आम , कुत्ता , मोबाईल जैसे विषयों पर अनेको मजेदार प्रतीको के साथ व्यंग्य राकेश जी ने लिखे हैं . कहावतों पर तथा लोकप्रिय फिल्मी गानो के मुखड़ो को ट्विस्ट देकर अपनी सरल शैली में आम पाठक के मानसिक धरातल पर उतरकर लिखना राकेश जी की विशेषता है . वे २०३० की स्मार्ट सिटी की कल्पना करके भी तीक्ष्ण व्यंग्यबाण चलाते हैं , तो सड़क के सामान्य गड्ढ़े में भी व्यंग्य ढ़ूढ़ लेते हैं .उनकी यही क्षमता उन्हें समर्थ व्यंग्यकार बनाती है . जिसके चलते पाठक उनका नाम पढ़ते ही पूरा व्यंग्य पढ़े बुना नही रह पाता . 

   सामान्यतः हिन्दी साहित्य जगत में किसी पत्रिका , स्मारिका या सामूहिक संग्रह के संपादन की ही प्रथा प्रचलित है . व्यक्तिगत पुस्तक के संपादन की जिम्मेदारी प्रायः लेखक स्वयं ही उठा लेते हैं . इसलिये जब सुस्थापित , बहु प्रकाशित , व्यंग्यकार मित्र श्री राकेश सोह्म जी ने उनके इस प्रस्तावित व्यंग्य संग्रह "टांग अड़ाने के मजे" के संपादन का भार मुझे सौंपा तो मैं किंचित चौंका . प्रयोग नवाचारी लगा , इसलिये मना भी नही किया . सुप्रसिद्ध कार्टूनिस्ट राजेश दुबे जी ने इस संग्रह के प्रत्येक व्यंग्य को चित्रो की भाषा में भी अभिव्यक्ति दी है . इस दृष्टि से भी राकेश जी का यह व्यंग्य संग्रह अनोखा है . यद्यपि सचित्र व्यंग्य संग्रह पहले भी अनेकानेक प्रकाशको ने छापे हैं . किन्तु मेरा विश्वास है कि पाठक यह संग्रह एक अनूठा पन लिये हुये पायेंगे . 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 

rederswriteback@gmail.com



Friday, 2 January 2026

भूमिका कहानी संग्रह डॉ जय लक्ष्मी विनायक

 भूमिका


हिंदी कहानी की यात्रा एक सदी से ज्यादा पुरानी है। भारतेन्दु युग की भावुक गद्य रचनाओं से प्रारंभ होकर प्रेमचंद की यथार्थपरक सामाजिक कहानियों, अज्ञेय और मोहन राकेश की आत्मसंधानशीलता, कमलेश्वर और भीष्म साहनी की राजनीतिक चेतना, मन्नू भंडारी और मृदुला गर्ग की स्त्री-संवेदना से होते हुए आज के उस दौर में पहुँची है , जहाँ हर लेखक अपनी निजी जमीन से अनुभवों का बीज लेकर कहानियों का पौधा उगाता है।

वर्तमान कहानी सामाजिक व्यवस्था से मुठभेड़ करती हुई, कभी व्यंग्य में, कभी विमर्श में, तो कभी मौन में अपने पाठक से संवाद करती है। इस युग की लेखिकाएँ अपने समय और समाज को देखकर नहीं, उसे जीकर लिखती हैं। वे अनुभव करती हैं, भीतर तक रिसती हैं और फिर उस मानसिक स्थिति को शब्दों में बदलकर पाठकों के सामने रख देती हैं । बिना शोर के, सहजता से, संवेदना से किए जा रहे ये प्रयास स्तुत्य हैं।


डॉ. जयलक्ष्मी विनायक की यह पुस्तक "संवेदना से अनुभव तक" ऐसी ही सहज, आत्मीय, अनुभव-संजात कहानियों का संकलन है। यहाँ भाषा में केवल अलंकार नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई है। हर कहानी एक खिड़की की तरह खुलती है , जिसके पार कोई ऐसा दृश्य दिखता है जिसे पाठक शायद पहले देख चुका हो, पर कहानी पढ़कर समझता है।


संग्रह में एक कहानी है, "मैरिज डॉट कॉम" । जिसमें लेखिका ने आधुनिक विवाह व्यवस्था के उस कोने को छुआ है जहाँ प्रेम और विश्वास की आड़ में छल और धोखा पनपता है। कथा नायिका रानी जैसी सैकड़ों युवतियाँ आज डिजिटल रिश्तों की दुनिया में भावनात्मक ठगी का शिकार हो रही हैं। लेकिन इस कहानी की सबसे बड़ी उपलब्धि है , उसका अंत। जब धोखेबाज़ सुधीर का असली चेहरा उसके ही भाई अशोक द्वारा सामने आता है, तो यह सिर्फ़ कथा का मोड़ नहीं, बल्कि समाज के उस मुखौटे को हटाने जैसा है जो रिश्तों के नाम पर भावनाओं का शोषण करता है।


इसी तरह "एक चाय की प्याली" पढ़ते हुए मन ठहर जाता है। यहाँ चाय का प्याला मात्र आतिथ्य नहीं, गहन मानवीय संवाद का माध्यम बन जाता है। विनोदिनी एक साधारण महिला , अपने अंदर कितनी असाधारण ताकत समेटे हुए है, यह तब सामने आता है जब हम उसके जीवन के पर्दे के पीछे की कठोर सच्चाई से रूबरू होते हैं। यह कहानी सिखाती है कि हर मुस्कुराता चेहरा भीतर से शांत नहीं होता, पर वह दूसरों को ढाढ़स बंधा सकता है ,यही उसकी संपूर्णता है।


"बाबूलाल" जैसे पात्र हिंदी कहानी में बार बार आये हैं, पर जयलक्ष्मी जी का बाबूलाल उस बिंदु पर हमें चौंकाता है जहाँ वह अपने ढर्रे से हटकर, अपने बच्चों के लिए खुद को बदलता है। यह कहानी एक आलसी, लापरवाह व्यक्ति के भीतर पितृत्व भाव के पुनर्जागरण की कथा है । यही कहानी की शक्ति है, जो किसी मामूली से व्यक्ति में भी असाधारण परिवर्तन का साहस दिखा सकती है।

"सोच" मार्मिक और समसामयिक संदेश देती है ,कि ‘तुलना’ सबसे बड़ा अवसाद है। कुसुम के माध्यम से लेखिका यह दिखाने में सफल होती हैं कि सुख ‘क्या नहीं है’ में नहीं, बल्कि ‘जो है’ उसमें भी पाया जा सकता है। मालविका जैसी चरित्रों के माध्यम से डॉ. जयलक्ष्मी अपने पाठकों को यह यकीन दिलाती हैं कि आत्मसंतोष की विचारधारा है , जो जीवन को हल्का, स्पष्ट और आनंदमय बना सकती है।


संग्रह की सभी कहानियों में नारी-मन की सूक्ष्म परख, सामाजिक यथार्थ की पड़ताल, और सकारात्मक दृष्टिकोण की निर्मल धारा स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। डॉ. जयलक्ष्मी विनायक की भाषा आम आदमी की भाषा है । वह कठिन नहीं है, लेकिन अर्थ से भरपूर है। इन कहानियों में शब्दों से अधिक मौन बोलता है, और भाव पाठक को भीतर तक छू जाते हैं।


"संवेदना से अनुभव तक" केवल कहानियों का संग्रह नहीं, यह जीवन को देखने की, समझने की और उस पर पुनः विचार करने की एक संवेदनशील दृष्टि है । इस संग्रह को पढ़कर पाठक पाएंगे कि कहानी केवल कहानी नहीं होती, वह आईना होती है । 


लेखिका को इस सशक्त और सहज साहित्यिक प्रयास के लिए हार्दिक बधाई। मुझे विश्वास है कि यह संग्रह हर पाठक को उसकी अपनी स्वयं की या उसके परिवेश की घटना याद दिलाएगा । कहीं रुलाएगा, कभी हंसाएगा, और अंततः मंथन के लिए एक विचार छोड़ जाएगा।


अशेष शुभ कामना 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

प्रबुद्ध समीक्षक, व्यंग्यकार 

ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी 

जे के रोड, भोपाल 462023

readerswriteback@gmail.com