टांग अड़ाने के मजे
सामयिक घटनाओ पर हिन्दी व्यंग्य पिछली सदी के अंतिम दशको से लिखे जाते रहे हैं . अब ये अधिकांश पत्र पत्रिकाओ के लोकप्रिय स्तंभ बन चुके हैं .तानाशाही व कम्युनिस्ट सरकारो के राज में जहां खबरों पर प्रशासन का पहरा होता है , खबरों की वास्तविक तह का अंदाजा लगाने के लिये भी लोग व्यंग्यकारो को पढ़ते हैं . पाठक संपादकीय पन्नो पर रुचि पूर्वक पिछले दिनो हुई घटनाओ को व्यंग्यकारों के नजरिये से पढ़कर मुस्कराता है ,अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुरूप रचनाकार का इशारा समझता है , कुछ मनन भी करता है .इनके माध्यम से पाठक को बौद्धिक सामग्री मिलती है .ये व्यंग्य लेख पाठक के मानस पटल पर त्वरित रूप से गहरा प्रभाव छोड़ते हैं .
तारीखो के बदलते ही अखबार अवश्य ही रद्दी में तब्दील हो जाता है पर अखबारो में प्रकाशित ऐसे व्यंग्य लेखों का साहित्यिक महत्व बना रहता है . मैने अनुभव किया है कि किंचित बदलाव के साथ घटनाओ की पुनरावृत्ति होती है , और पुराने पढ़े हुये व्यंग्य पुनः सामयिक लगने लगते हैं . यह व्यंग्यकार का कौशल ही होता है कि जब वह किसी घटना का अपनी शैली में लोक व्यापीकरण कर उसे अभिव्यक्त करता है तो वह व्यंग्य , साहित्य बन जाता है . अखबार अल्पजीवी होता है , पर साहित्य का महत्व हमेशा बना रहता है . इसीलिये अखबारों में छपे ऐसे व्यंग्य लेखो के पुस्तकाकार प्रकाशन की जिम्मेदारी लेखक पर आ जाती है . इन व्यंग्य संग्रहो से कोई शोधार्थी कभी सामाजिक घटनाओ के साहित्यिक प्रभाव का पुनर्मूल्यांकन करेगा . बदलती पीढ़ीयों के पाठक जब जब इन संग्रहो के व्यंग्य लेखो के कथ्य को पढ़ेंगे , समझेंगे, उनके परिवेश तथा अनुभवों के साथ बदलते समय के नये बिम्ब बनायेंगें . स्मित मुस्कान , किंचित करुणा , विवशता , युग की व्यथा ,हर बार पाठक को बार बार गुदगुदायेगी , हंसायेगी , रुलायेगी , सोचने पर मजबूर करेगी.
इस पुस्तक में संग्रहित व्यंग्य लेखों के विषय स्वयं में ही दीर्घ जीवी हैं , उदाहरण के लिये भ्रष्टाचार , चुनाव , मंहगाई , बजट , सफाई , स्मार्ट सिटी , हिन्दी साहित्य , आफिस , सोशल मीडीया , होली , आम , कुत्ता , मोबाईल जैसे विषयों पर अनेको मजेदार प्रतीको के साथ व्यंग्य राकेश जी ने लिखे हैं . कहावतों पर तथा लोकप्रिय फिल्मी गानो के मुखड़ो को ट्विस्ट देकर अपनी सरल शैली में आम पाठक के मानसिक धरातल पर उतरकर लिखना राकेश जी की विशेषता है . वे २०३० की स्मार्ट सिटी की कल्पना करके भी तीक्ष्ण व्यंग्यबाण चलाते हैं , तो सड़क के सामान्य गड्ढ़े में भी व्यंग्य ढ़ूढ़ लेते हैं .उनकी यही क्षमता उन्हें समर्थ व्यंग्यकार बनाती है . जिसके चलते पाठक उनका नाम पढ़ते ही पूरा व्यंग्य पढ़े बुना नही रह पाता .
सामान्यतः हिन्दी साहित्य जगत में किसी पत्रिका , स्मारिका या सामूहिक संग्रह के संपादन की ही प्रथा प्रचलित है . व्यक्तिगत पुस्तक के संपादन की जिम्मेदारी प्रायः लेखक स्वयं ही उठा लेते हैं . इसलिये जब सुस्थापित , बहु प्रकाशित , व्यंग्यकार मित्र श्री राकेश सोह्म जी ने उनके इस प्रस्तावित व्यंग्य संग्रह "टांग अड़ाने के मजे" के संपादन का भार मुझे सौंपा तो मैं किंचित चौंका . प्रयोग नवाचारी लगा , इसलिये मना भी नही किया . सुप्रसिद्ध कार्टूनिस्ट राजेश दुबे जी ने इस संग्रह के प्रत्येक व्यंग्य को चित्रो की भाषा में भी अभिव्यक्ति दी है . इस दृष्टि से भी राकेश जी का यह व्यंग्य संग्रह अनोखा है . यद्यपि सचित्र व्यंग्य संग्रह पहले भी अनेकानेक प्रकाशको ने छापे हैं . किन्तु मेरा विश्वास है कि पाठक यह संग्रह एक अनूठा पन लिये हुये पायेंगे .
विवेक रंजन श्रीवास्तव
rederswriteback@gmail.com
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