Friday, 2 January 2026

भूमिका कहानी संग्रह डॉ जय लक्ष्मी विनायक

 भूमिका


हिंदी कहानी की यात्रा एक सदी से ज्यादा पुरानी है। भारतेन्दु युग की भावुक गद्य रचनाओं से प्रारंभ होकर प्रेमचंद की यथार्थपरक सामाजिक कहानियों, अज्ञेय और मोहन राकेश की आत्मसंधानशीलता, कमलेश्वर और भीष्म साहनी की राजनीतिक चेतना, मन्नू भंडारी और मृदुला गर्ग की स्त्री-संवेदना से होते हुए आज के उस दौर में पहुँची है , जहाँ हर लेखक अपनी निजी जमीन से अनुभवों का बीज लेकर कहानियों का पौधा उगाता है।

वर्तमान कहानी सामाजिक व्यवस्था से मुठभेड़ करती हुई, कभी व्यंग्य में, कभी विमर्श में, तो कभी मौन में अपने पाठक से संवाद करती है। इस युग की लेखिकाएँ अपने समय और समाज को देखकर नहीं, उसे जीकर लिखती हैं। वे अनुभव करती हैं, भीतर तक रिसती हैं और फिर उस मानसिक स्थिति को शब्दों में बदलकर पाठकों के सामने रख देती हैं । बिना शोर के, सहजता से, संवेदना से किए जा रहे ये प्रयास स्तुत्य हैं।


डॉ. जयलक्ष्मी विनायक की यह पुस्तक "संवेदना से अनुभव तक" ऐसी ही सहज, आत्मीय, अनुभव-संजात कहानियों का संकलन है। यहाँ भाषा में केवल अलंकार नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई है। हर कहानी एक खिड़की की तरह खुलती है , जिसके पार कोई ऐसा दृश्य दिखता है जिसे पाठक शायद पहले देख चुका हो, पर कहानी पढ़कर समझता है।


संग्रह में एक कहानी है, "मैरिज डॉट कॉम" । जिसमें लेखिका ने आधुनिक विवाह व्यवस्था के उस कोने को छुआ है जहाँ प्रेम और विश्वास की आड़ में छल और धोखा पनपता है। कथा नायिका रानी जैसी सैकड़ों युवतियाँ आज डिजिटल रिश्तों की दुनिया में भावनात्मक ठगी का शिकार हो रही हैं। लेकिन इस कहानी की सबसे बड़ी उपलब्धि है , उसका अंत। जब धोखेबाज़ सुधीर का असली चेहरा उसके ही भाई अशोक द्वारा सामने आता है, तो यह सिर्फ़ कथा का मोड़ नहीं, बल्कि समाज के उस मुखौटे को हटाने जैसा है जो रिश्तों के नाम पर भावनाओं का शोषण करता है।


इसी तरह "एक चाय की प्याली" पढ़ते हुए मन ठहर जाता है। यहाँ चाय का प्याला मात्र आतिथ्य नहीं, गहन मानवीय संवाद का माध्यम बन जाता है। विनोदिनी एक साधारण महिला , अपने अंदर कितनी असाधारण ताकत समेटे हुए है, यह तब सामने आता है जब हम उसके जीवन के पर्दे के पीछे की कठोर सच्चाई से रूबरू होते हैं। यह कहानी सिखाती है कि हर मुस्कुराता चेहरा भीतर से शांत नहीं होता, पर वह दूसरों को ढाढ़स बंधा सकता है ,यही उसकी संपूर्णता है।


"बाबूलाल" जैसे पात्र हिंदी कहानी में बार बार आये हैं, पर जयलक्ष्मी जी का बाबूलाल उस बिंदु पर हमें चौंकाता है जहाँ वह अपने ढर्रे से हटकर, अपने बच्चों के लिए खुद को बदलता है। यह कहानी एक आलसी, लापरवाह व्यक्ति के भीतर पितृत्व भाव के पुनर्जागरण की कथा है । यही कहानी की शक्ति है, जो किसी मामूली से व्यक्ति में भी असाधारण परिवर्तन का साहस दिखा सकती है।

"सोच" मार्मिक और समसामयिक संदेश देती है ,कि ‘तुलना’ सबसे बड़ा अवसाद है। कुसुम के माध्यम से लेखिका यह दिखाने में सफल होती हैं कि सुख ‘क्या नहीं है’ में नहीं, बल्कि ‘जो है’ उसमें भी पाया जा सकता है। मालविका जैसी चरित्रों के माध्यम से डॉ. जयलक्ष्मी अपने पाठकों को यह यकीन दिलाती हैं कि आत्मसंतोष की विचारधारा है , जो जीवन को हल्का, स्पष्ट और आनंदमय बना सकती है।


संग्रह की सभी कहानियों में नारी-मन की सूक्ष्म परख, सामाजिक यथार्थ की पड़ताल, और सकारात्मक दृष्टिकोण की निर्मल धारा स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। डॉ. जयलक्ष्मी विनायक की भाषा आम आदमी की भाषा है । वह कठिन नहीं है, लेकिन अर्थ से भरपूर है। इन कहानियों में शब्दों से अधिक मौन बोलता है, और भाव पाठक को भीतर तक छू जाते हैं।


"संवेदना से अनुभव तक" केवल कहानियों का संग्रह नहीं, यह जीवन को देखने की, समझने की और उस पर पुनः विचार करने की एक संवेदनशील दृष्टि है । इस संग्रह को पढ़कर पाठक पाएंगे कि कहानी केवल कहानी नहीं होती, वह आईना होती है । 


लेखिका को इस सशक्त और सहज साहित्यिक प्रयास के लिए हार्दिक बधाई। मुझे विश्वास है कि यह संग्रह हर पाठक को उसकी अपनी स्वयं की या उसके परिवेश की घटना याद दिलाएगा । कहीं रुलाएगा, कभी हंसाएगा, और अंततः मंथन के लिए एक विचार छोड़ जाएगा।


अशेष शुभ कामना 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

प्रबुद्ध समीक्षक, व्यंग्यकार 

ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी 

जे के रोड, भोपाल 462023

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