ललित निबंध
निंदक नियरे राखिए :लोकतंत्र की आधार नीति
विवेक रंजन श्रीवास्तव
पक्ष और विपक्ष का समन्वय ही लोकतंत्र है। विपक्ष का कार्य पक्ष में निंदा ढूंढकर उसे उजागर करना ही होता है। तथा पक्ष को इस निंदा को आत्मसात कर जन हित में निरंतर विपक्ष की निंदा के अनुसार नीतियों में परिष्कार होता है।
इसी प्रकार मनुष्य का स्वभाव है कि वह सदैव अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है। कोई उसकी स्तुति करे, गुणों की सराहना करे, तो उसका हृदय पुलकित हो उठता है। किंतु जैसे ही कोई उसकी आलोचना करता है, उसके दोषों का उल्लेख करता है, तो वही हृदय क्षुब्ध हो जाता है। परंतु संत कवि कबीरदास ने मनुष्य को उल्टा दृष्टिकोण दिया, उन्होंने कहा,
“निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन साबुन पानी बिन, निर्मल करे सुभाय॥
इस छोटे-से दोहे में उन्होंने मानवीय आत्मशुद्धि का गूढ़ संदेश समझाया है। कबीर कहते हैं कि जो आपकी निंदा करता है, उसे अपने समीप रखना चाहिए, क्योंकि वह बिना किसी साधन के आपकी वृत्तियों को निर्मल करता है। जैसे दर्पण हमें हमारी वास्तविक छवि दिखाता है, वैसे ही निंदक हमारे दोषों को प्रकट करता है।
व्यापक अर्थ में कबीर का यह दोहा लोकतंत्र की मूल नीति भी है।
‘निंदा’ शब्द सामान्यतः नकारात्मक अर्थ में प्रयुक्त होता है। हम जब किसी की निंदा करते हैं, तो अभिप्राय होता है कि
उसके दोष गिनाना । कबीरदास की दृष्टि में वे निंदा को आत्मपरीक्षण का साधन मानते हैं। जो व्यक्ति आपसे असहमति व्यक्त करता है, आलोचना करता है, वह दरअसल आपके भीतर झाँकने का अवसर देता है। यदि हम धैर्यपूर्वक सुनें और विचार करें, तो वही आलोचना हमारे व्यक्तित्व को निखार सकती है।आत्म संशोधन का साधन निंदा है। मनुष्य प्रायः अपने गुणों के प्रति आसक्त रहता है। उसे अपने दोष कम ही दिखाई देते हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति हमें हमारी त्रुटियाँ दिखा दे , तो वह हमारे लिए ‘दर्पण’ के समान हो सकता है। हर सजग व्यक्ति के लिए यह अवसर होता है कि वह स्वयं में निंदा को समझ कर सुधार करे।
जीवन में प्रगति का मूलमंत्र यही है ,स्वयं को जानना, पहचानना और लगातार सँवारना।
निंदक इस मार्ग में गुरु का कार्य करता है, क्योंकि वह हमें हमारी सीमाएँ दिखाता है।कबीर के इस दोहे में आध्यात्मिक साधना की झलक है। साधक जब आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है, तो उसे निरंतर आत्मपरीक्षण की आवश्यकता होती है। निंदा इस आत्मपरीक्षण का एक बाह्य माध्यम है। जब कोई हमारी निंदा करता है, तो भीतर की ‘अहंता’ जाग उठती है। यदि उस क्षण हम संयम से काम लें और अपने भीतर झाँकें, तो अहंकार की परतें धीरे-धीरे हटती जाती हैं। इस प्रकार निंदा आत्मा के परिष्कार का साधन बन जाती है।
समाज में आलोचना का एक संतुलित स्थान होना अत्यंत आवश्यक है। यदि समाज में केवल प्रशंसा ही होती रहे, तो सुधार की भावना नष्ट हो जाएगी।
साहित्य में आलोचना एक सर्वथा मान्य विधा ही है। लेखक अपना सर्वश्रेष्ठ लिखता है, फिर उसे समालोचक को समीक्षा हेतु आदर पूर्वक भेजता है जिससे पाठक के लिए रचना के गुण धर्म स्पष्ट हों । आदर्श समीक्षा लेखक की दृष्टि को परिष्कृत करती है।
घर परिवार में भी बच्चों के विकास क्रम में उनकी गलतियों का सुधार उसकी निंदा के आधार पर ही हो पाता है।
निंदा जनमत को जागरूक बनाती है। लोकतंत्र इसी आलोचनात्मक चेतना पर आधारित है। राजनीतिज्ञ, साहित्यकार, वैज्ञानिक या कलाकार, सभी के लिए समीक्षक का होना अनिवार्य है। समीक्षक यदि निष्पक्ष हो, तो उसके द्वारा ही सृजन का स्तर ऊँचा उठता है।
कबीर का यह दोहा केवल व्यक्तिगत नहीं, सामाजिक अनुशासन का भी संकेत देता है। सच्चे निंदक समाज में सत्य के द्योतक हैं। वे व्यक्ति या संस्था के दोषों को उजागर कर समाज को सजग रखते हैं। यदि निंदक न रहें, तो समाज आत्मसंतोष में डूब जाए और पतन की ओर बढ़े। इस दृष्टि से निंदक समाज के ‘स्वास्थ्य-रक्षक’ हैं।निंदा और द्वेष में अंतर समझना चाहिए। कबीर की ‘निंदा’ का अभिप्राय ‘द्वेष’ या ‘नीचा दिखाने’ से नहीं है। द्वेष से प्रेरित निंदा विष की तरह होती है , वह संबंध तोड़ती है और मन को कलुषित करती है। परंतु सजग और निष्पक्ष निंदा आत्मकल्याण का साधन बनती है।
कबीरदास इसीलिए कहते हैं कि निंदक को अपने समीप रखो, क्योंकि जब वह सम्मुख होगा, तो उसकी बातें आत्म विचार उत्पन्न करेंगी। पर यदि वह दूर होगा, तो तुम्हें अपनी भ्रांतियों का पता न चलेगा। जीवन में निंदक का स्थान महत्वपूर्ण होता है। बाल्यकाल से ही हमें सिखाया जाता है कि दूसरों की बुराई न करें। यह शिक्षण नैतिक दृष्टि से उचित है, किंतु जब हम जीवन में आगे बढ़ते हैं, तो समझते हैं कि ‘सार्थक आलोचना’ भी उतनी ही आवश्यक है।
जिसने भी अपने जीवन में निंदक को स्थान दिया, वह कभी मार्ग से विचलित नहीं हुआ।महान व्यक्तित्व इस सिद्धांत को भली-भाँति समझते हैं। इतिहास साक्षी है कि महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, तुलसीदास सभी ने अपने आलोचकों से सीखा। गांधीजी ने तो कहा था कि “मेरे विरोधी ही मेरे सबसे बड़े शिक्षक हैं।”
यह दृष्टिकोण जितना सरल प्रतीत होता है, उसकी साधना उतनी ही कठिन है। अपने विरोधियों को सहन करना, उनकी बातों में सत्य खोजना , यही परिपक्वता है। निंदक को समीप रखने का यह अर्थ नहीं कि हम अपनी मर्यादा या आत्मसम्मान खो दें। यदि कोई व्यक्ति केवल अपमान करने के उद्देश्य से कटु वचन कहता है, तो उसका प्रतिकार आवश्यक है। किंतु यदि उसकी बातों में सत्य का अंश है, तो उस सत्य को स्वीकार कर आत्मसुधार करना ही विवेक का लक्षण है। इस प्रकार, बुद्धिमत्ता निंदक को दूर भगाने में नहीं, बल्कि उसकी बातों का सार ग्रहण करने में है।आध्यात्मिक दृष्टि से कबीर की वाणी केवल सामाजिक या व्यवहारिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक भी है।
उनका यह दोहा ‘अहंकार-क्षय’ का मार्ग बताता है। जब कोई हमारी निंदा करता है और हम शांत रहते हैं, तो हमारे भीतर ‘मैं’ शिथिल होता है। धीरे-धीरे यह स्थिति ‘समत्व’ की ओर ले जाती है, जहाँ प्रशंसा और निंदा दोनों समान लगती हैं। यही गीता का भी संदेश भी है
“सम्मानं च अपमानं च तुल्यं कृत्वा।”
अर्थात् जो व्यक्ति सम्मान और अपमान में सम रहता है, वही स्थिर बुद्धि का धनी होता है। हिंदी साहित्य में ‘कबीर’ वह पर्वत-शिखर हैं जहाँ से सदाचार, निर्भीकता और यथार्थवाद की ज्ञान गंगा प्रवाहित होती है। उनके दोहों में जीवन का रस है और दर्शन का गूढ़ अर्थ। “निंदक नियरे राखिए” जैसे दोहे केवल भाषा की शोभा नहीं, जीवन के गूढ़ अर्थ और दर्पण हैं। यह दोहा आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पाँच शताब्दी पूर्व था।यदि हम आधुनिक युग की बात करें, जहाँ सोशल मीडिया और जनमाध्यमों के युग में आलोचना सर्वत्र विद्यमान है, वहाँ कबीर का यह संदेश और भी आवश्यक प्रतीत होता है। आज के समय में लोग तुरंत प्रतिक्रिया देते हैं, विवाद करते हैं, पर आत्मविश्लेषण नहीं करते। अगर हम कबीर की तरह सोचें, तो आलोचना को सीखने का अवसर मानें, तो समाज में संवाद की स्वस्थ परंपरा स्थापित हो सकती है। यदि हम इस दोहे को अपने जीवन में उतारें, तो कुछ सरल उपाय अपनाए जा सकते हैं । आलोचना को शांत मन से सुनने की आदत डालें।अपनी गलतियों को स्वीकार करने में संकोच न करें।दूसरों की दृष्टि से स्वयं को देखने की कला विकसित करें।प्रशंसा और निंदा दोनों में संतुलन बनाए रखें।निंदक के प्रति द्वेष रखने के बजाय उसे कृतज्ञ दृष्टि से देखें।इन उपायों से हमारा मन अधिक स्थिर, विवेकी और सहनशील बनेगा।कबीर का यह दोहा केवल एक नैतिक शिक्षण नहीं, बल्कि एक व्यापक जीवन-सिद्धांत है। जो व्यक्ति निंदक को शत्रु नहीं, शिक्षक समझता है, उसका जीवन निरंतर प्रगतिशील रहता है। निंदक हमें हमारे दोषों से परिचित कराता है । यही परिचय सुधार की पहली सीढ़ी है।
निंदक को दूर रखकर हम अपने चारों ओर केवल मधुर शब्दों की दीवार खड़ी कर सकते हैं, पर सत्य का प्रकाश भीतर नहीं पहुँच सकेगा। अतः आवश्यक है कि हम निंदा को सहर्ष स्वीकार करें और उसे आत्मविकास का माध्यम बनाएँ।कबीर की वाणी शाश्वत है ।
जो भी इसे जीवन में उतार ले, उसका चित्त निर्मल और स्थिर हो सकता है।
वास्तव में, निंदक वही दीपक है जो हमारे भीतर के अँधेरे को उजाले में बदल सकता है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
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