घुमंत जातियों की वैवाहिक परंपराएं एवं शिक्षा और आरक्षण के प्रभाव
विवेक रंजन श्रीवास्तव
स्वतंत्र वरिष्ठ लेखक
ए 233, ओल्ड मिनाल रेजिडेंसी, जे के रोड भोपाल 462023
मो 7000375798
भारत की घुमंतु जातियों की विवाह‑परम्परा और वर्तमान संदर्भ को यदि समग्र रूप में देखा जाए, तो यह एक ओर परम्पराओं, जाति‑पंचायत और वधू मूल्य पर आधारित है, तो दूसरी ओर आरक्षण, शिक्षा और स्थायी बसावट की ओर बढ़ते कदमों से बदल भी रही है। घुमंतु समाज आज भी हाशिए पर है, परन्तु नीतिगत हस्तक्षेपों और शिक्षा के प्रसार ने विवाह, स्त्री की स्थिति और नई पीढ़ी के विकल्पों में महत्वपूर्ण बदलाव हुए है।
क्षेत्रीय स्थिति और भौगोलिक फैलाव
भारत में घुमंतु, अर्ध‑घुमंतु और विमुक्त जातियों की संख्या लगभग 500 समुदायों के आसपास आँकी गई है, जिनकी कुल आबादी 7–10 प्रतिशत तक मानी जाती है। इनमें पशुपालक, लोहारी‑कारीगर, मनोरंजन‑सम्बंधी नट, व्यापारी, शिकारी‑संग्रहकर्ता और धार्मिक‑फेरीवाले जैसे अनेक उपसमूह शामिल हैं, जो अलग‑अलग क्षेत्रों में फैले हैं।
उत्तर‑पश्चिमी भारत में रबारी, रायका, गूजर जैसे पशुपालक समुदाय मुख्यतः गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के शुष्क‑अर्धशुष्क क्षेत्रों में ऊँट, भेड़, बकरी आदि के साथ मौसमी प्रवास करते रहे हैं।
मध्य और उत्तर भारत में गाडिया लोहार, बंजारा, कंजर, नट, संसी, डफाली, बाजीगर आदि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा और उत्तराखंड तक फैले हुए हैं। इनका प्रवास काफ़िले, तांडा या डेरा के रूप में बाज़ारों, हाटों और कृषि‑क्षेत्रों के बीच होता रहता है।
दक्षिण और पश्चिम भारत में
लम्बाडा/लम्बाड़ी (बंजारा जाति की उपशाखा), डोम्बारी, लावणी‑सम्बन्धित समूह, तमाशा और लोक‑नाट्य करने वाले घुमंतु कलाकार महाराष्ट्र, तेलंगाना, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में स्थान बदलते पाए जाते हैं।
औपनिवेशिक "क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1871" ने इन समुदायों को अपराधी‑समुदाय के रूप में चिह्नित कर विशेष बस्तियों और थानों की निगरानी में बाँध दिया, जिससे इनके पारम्परिक मार्ग, चरागाह और व्यापारिक नेटवर्क समाप्त हुए ।
स्वतंत्रता के बाद "विमुक्त" घोषित किए जाने के बावजूद इनके प्रवासी उन्मुक्त जीवन पर गंभीर हस्तक्षेप और असर दिखता है।आज भी कई रबारी, गाडिया लोहार और बंजारा समूह अपने पुराने मार्गों पर छोटी‑छोटी दूरियों में ही घूमते हैं या इनकी बड़ी आबादी स्थायी बस्तियों में बस चुकी है, जबकि बहुत सारे घुमंतु परिवार अभी भी अर्ध‑घुमंतु जीवन जीते है। अब ये घुमंतु परंपरागत गाड़ियों, घोड़ों , खच्चर या जानवरों की जगह पेट्रोल चलित मध्यम साइज की गाड़ियों में भी चलते नजर आते हैं।
विवाह‑परम्परा पर क्षेत्रीय स्थितियों का प्रभाव
भौगोलिक और सामाजिक परिस्थिति घुमंतु जातीय विवाह‑संरचना को गहराई से प्रभावित करती है। रेगिस्तानी इलाकों के पशुपालक रबारी‑रायका समुदाय विवाह में पशुओं, ऊन और पारम्परिक पोशाकों के आदान‑प्रदान पर बल देते हैं, जबकि उत्तरी मैदानों के बंजारा‑नट‑गाडिया लोहार समूहों में वधू मूल्य और परिवारों की श्रम‑साझेदारी विवाह में अधिक निर्णायक भूमिका में हैं।
बार‑बार के प्रवास के कारण:
विवाह‑सम्बन्ध प्रायः उन इलाकों के भीतर ही रखे जाते हैं, जहाँ समुदाय की नियमित आवाजाही हो । इससे रिश्तेदारी का निर्वाह प्रगाढ़ रहता है और प्रवास के दौरान आपसी सहारा मिलता है।
स्थायी खेत, ज़मीन और गाँव के अभाव में विवाह समारोह डेरों, अस्थायी बस्तियों या हाट‑बाज़ारों के आसपास ही आयोजित होते हैं। इससे विवाह‑अनुष्ठान अपेक्षाकृत सरल, लेकिन सामुदायिक सहभागिता पर अधिक निर्भर होते हैं।
जहाँ‑जहाँ घुमंतु समूहों की स्थायी बसाहट बढ़ी है , जैसे महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत के कई जिलों में वहाँ विवाह‑परम्पराओं में भी मुख्यधारा ग्रामीण समाज की प्रथाओं (दहेज, बारात, बैंड‑बाजा, बैंक‑कर्ज लेकर खर्च बढ़ाना आदि) के प्रभाव स्पष्ट दिखने लगे हैं।
इसके विपरीत, जिन क्षेत्रों में अब भी मौसमी प्रवास और चरागाह‑निरपेक्ष जीवन अधिक है, वहाँ विवाह अभी भी अपेक्षाकृत कम खर्चीले, वधूमूल्य‑आधारित और उनकी जाति‑पंचायत से नियंत्रित हैं।
शासकीय आरक्षण नीतियाँ: दायरा, सीमाएँ और विवाह‑संदर्भ
स्वतंत्रता के बाद भी विमुक्त‑घुमंतु समुदायों का बड़ा हिस्सा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणियों से अब भी बाहर रह गया है, जिसके कारण इन्हें आरक्षण और कल्याण योजनाओं का लाभ व्यवस्थित रूप से नहीं मिल सका है।
रेंके आयोग (2008) और इदाते आयोग (2018) की रिपोर्टों ने दिखाया कि 269 के आसपास विमुक्त‑घुमंतु समुदाय किसी भी SC/ST/OBC श्रेणी में सूचीबद्ध नहीं हैं। परिणामस्वरूप वे आरक्षण संरचना के "अदृश्य" नागरिक बने हुए हैं।
रेंके आयोग के अनुसार लगभग 10 प्रतिशत आबादी इन समुदायों की है और इनको अलग से 10 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की सिफारिश की गई, भले ही कुल आरक्षण सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर चली जाए। साथ ही एक पृथक संवैधानिक श्रेणी बनाने का सुझाव भी दिया गया।
कई राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात आदि) ने अपनी‑अपनी OBC या विशेष पिछड़ा वर्ग सूचियों में कुछ घुमंतु समुदायों को शामिल किया, परन्तु दस्तावेज़ों और परिचय‑पत्रों के अभाव में वास्तविक जमीनी लाभ सीमित लोगो तक ही रहा।
आरक्षण का विवाह‑परम्पराओं पर प्रभाव अप्रत्यक्ष परन्तु महत्त्वपूर्ण है।
सरकारी नौकरी, छात्रवृत्ति या आरक्षित सीट पाने वाले युवाओं की विवाह हेतु 'माँग' बढ़ जाती है । कई परिवार ऐसे युवाओं के लिए अधिक वधू मूल्य स्वीकार करते हैं, या वधू मूल्य को कम कर देते हैं ताकि "सरकारी नौकरी वाले दामाद" या बहू को परिवार में जोड़ा जा सके।
शिक्षा और नौकरी के कारण बाहरी समाज से सम्पर्क बढ़ने पर कुछ युवाओं में अन्तरजातीय या प्रेम‑विवाह की प्रवृत्ति उभरती है, जिससे जाति‑पंचायत और परिवारों के भीतर तनाव पैदा होता है। हाशिए पर रहने वाली जातियाँ, सामाजिक बहिष्कार के डर से, ऐसे विवाहों पर विशेष कठोरता बरतती हैं।
कुल मिलाकर, आरक्षण की नीतियाँ अभी उन तक सीमित हैं जिन्हें प्रशासनिक रूप से "पहचाना" गया है। बिना जाति‑प्रमाणपत्र, निवासी‑प्रमाणपत्र और पहचान‑पत्र के करोड़ों घुमंतु नागरिक अभी भी संवैधानिक अधिकारों से व्यावहारिक रूप में वंचित हैं।
शिक्षा का विस्तार और विवाह‑संस्कृति में बदलाव
शिक्षा को विमुक्त‑घुमंतु समुदायों के लिए "मृगतृष्णा" कहा गया है । एक अध्ययन के अनुसार इन समुदायों के बच्चों का विद्यालय‑नामांकन सामान्य आबादी की तुलना में बहुत कम और ड्रॉप‑आउट दर अत्यंत ऊँची है।
रेंके आयोग के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 61.8 प्रतिशत घुमंतु परिवारों के पास जाति‑प्रमाणपत्र ही नहीं, और NT‑DNT बच्चों में से केवल 17–28 प्रतिशत तक आरक्षण का लाभ ले पा रहे हैं।
शिक्षा‑विस्तार और विवाह‑परम्परा के बीच कुछ महत्वपूर्ण सम्बन्ध देखने मिलता है।
घुमंतु और विमुक्त समुदायों की महिलाओं में शिक्षा‑स्तर बहुत निम्न है। कई अध्ययनों में दिखा कि घुमंतु महिलाओं की साक्षरता, नामांकन और ऊँची कक्षाओं तक पहुँच, सामान्य समाज की तुलना में बहुत कम है, और नट जैसे समुदायों में यह स्थिति और भी खराब है। इससे बाल‑विवाह, कौमार्य‑परीक्षण, घरेलू हिंसा और तलाक में स्त्री की असहायता की स्थिति बनी रहती है।
जहाँ‑जहाँ लड़कियों की शिक्षा कुछ बढ़ी है ,जैसे महाराष्ट्र, हरियाणा, गुजरात के कुछ क्षेत्रों में , वहाँ विवाह‑उम्र बढ़ने, वधूमूल्य पर बातचीत करने और पति‑चयन में मत व्यक्त करने जैसी प्रक्रियाएँ धीरे‑धीरे दिखाई दे रही हैं, भले ही ये अपवाद हों।
आवासीय विद्यालय, विशेष छात्रावास, घुमंतु‑बहुल क्षेत्रों में मोबाइल स्कूल, छात्रवृत्ति और कौशल‑प्रशिक्षण जैसी पहलों को सरकारी नीति‑दस्तावेज़ों में सुझाया गया है। इनसे जुड़ने वाले युवा और युवतियाँ विवाह के संबंध में अधिक समझ‑बूझ और स्वतंत्रता की चाह व्यक्त कर रहे दिखाई देते हैं।
फिर भी, लगातार प्रवास, स्कूल तक दूरी, भाषा‑समस्या, भेदभाव, और 'अपराधी‑समुदाय' की छवि के कारण घुमंतु बच्चों को विद्यालयों में अपमान और असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। कई माता‑पिता इसलिए भी बच्चों को स्कूल भेजने में हिचकते हैं कि इससे पारम्परिक पेशों , ढुलाई, नाच‑गान, पशुपालन, लोहारी के लिए आवश्यक श्रम‑बल घट जाता है।
इस प्रकार शिक्षा और परम्परा के बीच एक गहरा द्वंद्व उपस्थित है, जो विवाह‑निर्णयों को भी प्रभावित कर रहा है । शिक्षित युवा अधिक समानता और बेहतर साथी का चयन चाहते हैं, जबकि बुजुर्ग और पंचायत परम्परागत वधूमूल्य और जाति‑नियमों की रक्षा पर ज़ोर देते हैं।
परम्परा, परिवर्तन और घुमंतु विवाह का भविष्य
भारत की घुमंतु जातियों की विवाह‑परम्पराएँ उनके भौगोलिक प्रवास, ऐतिहासिक दमन, आर्थिक‑पेशागत ढाँचे और सांस्कृतिक आत्मसम्मान से मिलकर बनी एक जटिल स्थिति और संरचना हैं। वधूमूल्य, जाति‑पंचायत, समुदाय के भीतर विवाह और सरल परन्तु सामुदायिक अनुष्ठान आदि ,ये सब मिलकर विवाह को केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पूरे तांडे, डेरों और बस्तियों का सामूहिक उत्सव ही नहीं अनुबंध भी बनाते हैं।
नए समय में आरक्षण, शिक्षा, शहरी पलायन और मीडिया‑संप्रेषण ने इन परम्पराओं के भीतर दरारें भी पैदा की हैं और नए अवसर भी दिए हैं। जहाँ एक ओर कुछ समुदायों में लड़कियों की शिक्षा, विवाह‑उम्र में वृद्धि, विवाह‑साथी चुनाव और अन्तर्जातीय सम्बन्ध जैसे परिवर्तन दिख रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दस्तावेज़‑वंचना, भेदभाव, गरीबी और "अपराधी" की ऐतिहासिक छवि ने अधिकांश घुमंतु समूहों को संविधानिक अधिकारों और विकास‑प्रक्रिया से अभी भी काफी दूर बनाए रखा है।
आवश्यक है कि भविष्य की नीति‑निर्माण प्रक्रिया घुमंतु समाज की गरिमा, सांस्कृतिक विशेषताओं और पारम्परिक कौशलों को सम्मान देते हुए, उनकी शिक्षा, आरक्षण और सामाजिक सुरक्षा के अधिकार को ठोस रूप में लागू किया जाए,तभी विवाह‑संस्था उनके लिए नियंत्रण और असमानता के बजाय सम्मान, साझेदारी और सामूहिक उन्नति का माध्यम बन सकेगी।
संदर्भ सूची
1. रेंके आयोग रिपोर्ट, राष्ट्रीय विमुक्त, घुमंतु एवं अर्ध‑घुमंतु जनजाति आयोग, भारत सरकार, 2008.
2. इदाते आयोग रिपोर्ट, राष्ट्रीय घुमंतु और विमुक्त जनजाति आयोग, 2018 (NT–DNT की पहचान एवं सिफ़ारिशें).
3. “Why are NT-DNT communities still excluded from education?”, India Development Review, 2025.
4. “Education of Denotified and Nomadic Tribes Women and its Effect…”, Scientific Research Journal, 2025.
5. “The Rabari: A Pastoral Nomadic Community”, ARF India, PDF अध्ययन.
इंटरनेट पर सुलभ खुली जानकारी, आदि
( लेखक मूलतः मंडला मध्यप्रदेश के निवासी हैं, उन्हें सामाजिक लेखन के लिए रेड एंड व्हाइट सम्मान राज्यपाल जी के हाथों मिल चुका है। संप्रति अमेरिका प्रवास पर हैं)
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