Monday, 5 January 2026

समरसता के आदर्श प्रतीक श्री राम

 समरसता के आदर्श प्रतीक श्री राम


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

भोपाल से 

(इन दिनों न्यूयॉर्क में)


 भारतीय संस्कृति, दर्शन, और सामाजिक चेतना के केंद्र में समरसता प्रमुख  है।  दार्शनिक, और सामाजिक दृष्टियों से श्री राम के समरस  स्वरूप का विश्लेषण वर्तमान समाज के लिए मार्गदर्शक है।

भारतीय संस्कृति का आधार ही समरसता, समानता और सद्भाव है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” का विचार हमारे जीवन के हर क्षेत्र में अंतर्निहित मिलता है। इस दर्शन का सर्वश्रेष्ठ मूर्त रूप यदि किसी चरित्र में दिखाई देता है, तो वह है भगवान श्री राम। श्री राम को लोक मान्यता ने भगवान के स्वरूप में स्थापित किया हुआ है किन्तु वे एक धार्मिक व्यक्तित्व से पूर्व , सामाजिक सांस्कृतिक चेतना के ऐसे आदर्श पुरुष हैं, जिन्होंने जीवन के व्यवहारिक सभी स्तरों पर समरसता, न्याय और मर्यादा की स्थापना का उदाहरण प्रस्तुत किया है । इसी कारण वे “मर्यादा पुरुषोत्तम” कहलाए।


श्री राम का जीवन रामायण में जिस रूप में प्रस्तुत हुआ है, वह किसी संकीर्ण मत या जातिगत दृष्टि का प्रतिनिधित्व नहीं करता, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए सन्देश देता है , कि जीवन का लक्ष्य  धर्मपालन , समाज में सामंजस्य और समरसता स्थापित करना  है। श्री राम का जीवन मार्ग  समरसता की आधारशिला  से प्रारंभ होता है।

श्री राम के जीवन में प्रत्येक निर्णय और आचरण सामाजिक संतुलन का दर्पण है। उन्होंने जहाँ एक ओर पिता की आज्ञा का पालन करते हुए 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया, वहीं दूसरी ओर समाज की मर्यादा, मित्रता, निष्ठा, और सेवा को अपने जीवन का आधार बनाया।


वनवास की यात्रा में श्री राम ने समाज के हर वर्ग से मधुर संबंध स्थापित किये । निषादराज गुह, शबरी, जटायु, हनुमान जैसे पात्रों से उनकी आत्मीयता जाति, वर्ग, या स्थिति से परे थी। यह संकेत देता है कि उनके लिए मनुष्य का मूल्य उसके कर्म और निष्ठा में था, न कि उसकी राजनैतिक अथवा सामाजिक स्थिति में।

वन्य जीवन के दौरान उन्होंने आदिवासी, वानर, भिन्न जाति और भाषाओं के लोगों से समान समरस व्यवहार किया। यह उनका मानवीय दृष्टिकोण था जो आज भी सामाजिक एकता का प्रेरक आदर्श  है।


रामराज्य केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और नैतिकता का प्रतीक था। तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में कहा है कि “रामराज्य” में सब लोग सुखी थे, किसी के साथ अन्याय नहीं होता था। यह उस समय का सबसे बड़ा आदर्श था, जहाँ राजा स्वयं को “सेवक” मानकर प्रजा के कल्याण के लिए उत्तरदायी था। 


राम राज्य में समरसता पर आधारित शासन व्यवस्था थी। राम का शासन , नीति, धर्म और लोकहित के लिए था। उन्होंने कभी स्वार्थ या पक्षपात नहीं किया।  

न्याय और समानता के आदर्श सर्वोपरि थे।राम ने निष्पक्ष न्याय दिया, चाहे अपराधी समाज का कोई भी, किसी भी वर्ग से क्यों न हो।  

लोककल्याण की भावना ही शासन के मूल में स्थापित थी । उन्होंने अपने सुख से पहले प्रजा का हित सोचा। जब लोकमत सीता की अग्निपरीक्षा की मांग करता है, तब राम व्यक्तिगत पीड़ा सहकर भी सार्वजनिक मर्यादा को प्राथमिकता देते हैं।  

सबके लिए समभाव उनकी नीति  थी ।उनके शासन में सभी धर्मों, परंपराओं और परिजनों को समान सम्मान मिला।

यह दृष्टिकोण आज के लोकतांत्रिक आदर्शों का भी मूल है, जहाँ राज्य का केंद्र “लोग” होते हैं, न कि केवल सत्ता। यही कारण है कि महात्मा गांधी ने स्वतंत्र भारत में राम राज्य की परिकल्पना की थी।

विविध समाज के प्रति समान दृष्टि  उनकी विशेषता थी ।

राम का जीवन इस बात का उदाहरण है कि भिन्नता को स्वीकार कर ही समाज में एकता लाई जा सकती है। उन्होंने हर उस व्यक्ति का सम्मान किया जो नैतिकता, दायित्व, और समर्पण के मार्ग पर चलता था।

निषादराज गुह के प्रति उनका प्रेम,  भक्ति और मित्रता की ऐसी मिसाल है, जहाँ जातिगत भेदभाव का नामोनिशान नहीं रहा।  

शबरी के प्रति उनकी करुणा और स्नेह यह दर्शाते हैं कि समरसता का अर्थ केवल समानता नहीं, बल्कि आत्मीयता भी है। उन्होंने शबरी के जूठे बेर खाकर सामाजिक ऊँच-नीच की दीवारें गिरा दीं।  

हनुमान जी, जो वानर जाति से थे, उन्हें श्री राम ने अपने हृदय में स्थान दिया। इससे पता चलता है कि श्री राम के लिए जीव का मूल्य उसके चरित्र और कर्तव्य निष्ठा से था, न कि किसी उपाधि या जाति से।  

विभीषण, जो राक्षस कुल में थे, उन्हें भी श्री राम ने सम्मान दिया और लंका का राजा बनाया। इसका संदेश स्पष्ट था: सत्य और धर्म जहाँ हैं, वही राम के अपने हैं। कर्म से ही उन्होंने व्यक्ति की पहचान की । 

 समरसता और संवाद की भावना श्री राम की व्यवहार शैली का प्रबल पक्ष था । केवल जातिगत या सामाजिक समरसता को नहीं, बल्कि धार्मिक समरसता को भी उन्होंने महत्व दिया। उनके जीवन में हर मत, हर परंपरा को आदर मिला। उनके वनवास में ऋषियों से संवाद, योगियों से शिक्षा, वनवासियों से आत्मीयता और राक्षसों के बीच भी धर्म की बात करने की प्रवृत्ति उनके व्यापक समरस दृष्टिकोण को दिखाती है।


राम का मार्ग  “सह-अस्तित्व” था।  

युद्ध में भी उन्होंने रावण जैसे शत्रु के प्रति आदर रखा। युद्ध के अंत मे वे लक्ष्मण से कहते हैं — “रावण महान विद्वान था, उससे ज्ञान सीखो।” यह कथन उनके चरित्र की उच्चता और समरसता की भावना का प्रमाण है, जहां शत्रु योद्धा की योग्यता का भी सम्मान था। 


आज के समाज में जब वर्ग, सम्प्रदाय, और विचारधारा के नाम पर कई कई विभाजन दिखाई देते हैं, तब “रामराज्य” की परिकल्पना पुनः प्रासंगिक हो उठती है। रामराज्य हमें यह सिखाता है कि शासन का उद्देश्य केवल दंड और प्रशासन नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करना है जो हर व्यक्ति को समान अवसर और सम्मान दे।


समरस समाज के निर्माण में निम्न बातें आज भी राम के जीवन से प्रेरक संदेश देती हैं:  

- नेतृत्व में विनम्रता और सेवा-भाव।  

- समाज के हर वर्ग के प्रति समान दृष्टि।  

- व्यक्तिगत त्याग के माध्यम से जनकल्याण की भावना।  

- विविधता में एकता को स्वीकारने की शक्ति।


यह आदर्श यदि आज के राजनीति, शिक्षा, और न्यायिक व्यवस्था में लागू किया जाए, तो न केवल सामाजिक असमानता कम हो सकती है, बल्कि राष्ट्र की नैतिक चेतना भी सुदृढ़ होगी।


श्री राम का जीवन नारी सम्मान का आदर्श प्रतीक भी है। माता सीता के प्रति उनका प्रेम आदर्श दांपत्य का स्वरूप प्रस्तुत करता है। उन्होंने सीता के व्यक्तित्व को स्वतंत्र और आदर्श नारी के रूप में सम्मान दिया।

माता शबरी और कैकेयी जैसे विविध स्वभाव की स्त्रियों के साथ भी उन्होंने मर्यादा का पालन किया। सीता की अग्निपरीक्षा जैसी घटनाएँ अक्सर प्रश्नों के घेरे में आती हैं, पर यदि ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाए तो राम का निर्णय समाज की इच्छाओं के अनुरूप था  यह दर्शाता है कि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर उठकर सामाजिक संतुलन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। यह सचमुच एक आदर्श नेतृत्व का गुण है।


 समरसता के दार्शनिक आयाम  ..

श्री राम का समरस दृष्टिकोण वेदांत और कर्मयोग के सिद्धांतों से गहराई से जुड़ा है। उन्होंने कर्म को पूजा का रूप दिया और संबंधों को धर्म से जोड़ा। उनके जीवन में हर घटना प्रतीकात्मक भी है —  

- रावण का वध “अहंकार” और “असमानता” के अंत का प्रतीक है।  

- राम का वनवास “त्याग” और “न्याय” के संघर्ष का प्रतीक है।  

- सीता की अग्निपरीक्षा “सत्य और धर्म की रक्षा” के लिए आत्मसंघर्ष का प्रतीक है।

इन सब घटनाओं में अंततः जो संदेश निहित है, वह यह है कि समाज तभी स्वस्थ रह सकता है जब उसमें समरसता, न्याय, और परस्पर सम्मान की भावना हो। 

श्री राम भारतीय चेतना में केवल देवता नहीं, बल्कि “सामाजिक समरसता के प्रतीक पुरुष” हैं। उनका व्यक्तित्व धर्म, नैतिकता, त्याग, और प्रेम का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि वास्तविक आदर्श वही है, जो सबको साथ लेकर चले । चाहे वह मनुष्य हो, पशु हो, स्त्री हो या किसी भी सामाजिक वर्ग से संबंधित हों।

आज जब हमारा समाज भांति भांति के विभाजनों से जूझ रहा है, तब श्री राम का जीवन हमें यह सिखाता है कि एकता केवल विचारों से नहीं, व्यवहार से आती है।

राम के जीवन का सन्देश सरल है , “सत्य पर अडिग रहो, सब का सम्मान करो, और न्याय का पालन करो।”यही समरसता का सर्वोच्च आदर्श है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

भोपाल से (इन दिनों न्यूयॉर्क में)

No comments: