भूमिका
कहानी, जब अपने शिखर पर पहुँचती है, तो वह जीवन के सबसे सामान्य प्रसंगों में छिपे असाधारण अर्थों को इस तरह उजागर करती है कि पाठक अपने अनुभवों को उसके नए प्रकाश में देखने लगे। अच्छी कहानी केवल घटना का ब्यौरा नहीं होती, वह घटनाओं के पीछे काम कर रही मान्यताओं, रिश्तों, इच्छाओं, भय और उम्मीदों की परतें खोलती है। कथानक की सघनता, चरित्रों की जीवंतता, संवादों की स्वाभाविकता, वातावरण की ठोस उपस्थिति और भाषा की सहजता के साथ संवेदनापूर्ण प्रवाह , ये वे मापदंड हैं जिन पर किसी भी कहानी संग्रह को परखा जा सकता है। जब कहानी इन मापदंडों पर खरी उतरती है, तब वह पाठक से केवल सहमति नहीं, आत्ममंथन भी माँगती है, केवल मनोरंजन नहीं, भीतर की चुप दीवारों पर हल्की चोट भी पहुँचाती है। और पाठक को लंबे समय तक स्मृति में रहती है।
कहानी के बदलते स्वरूप की चर्चा करें तो
आज तकनीक, डिजिटल मीडिया, ऑनलाइन पत्रिकाएँ और सोशल प्लेटफॉर्म कहानी लेखन को नई दिशा दे रहे हैं। लघुकथा और फ्लैश फिक्शन जैसे छोटे प्रारूप लोकप्रिय हो रहे हैं, वहीं वैश्विक आदान प्रदान से हिंदी कहानी का दायरा और दृष्टि विस्तृत हुई है।प्रेमचंद युग में कहानी सामाजिक यथार्थ और आदर्शवाद से जुड़ी थी ,शोषण पर प्रहार और सुधार इसकी मुख्य प्रवृत्तियाँ थीं। 1950‑60 के दशक की नई कहानी ने व्यक्ति के अंतर्द्वंद्व, अकेलेपन और अस्तित्वगत संकट को केंद्र में रखा। राजेंद्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर ने यथार्थ को बाहरी नहीं, आंतरिक दृष्टि से देखा। इसके बाद मुक्त शिल्प वाली अकहानी और सचेतन कहानी ने जीवन की विसंगतियों और असंगतियों को स्वर दिया।1980 के बाद हिंदी कहानी ने विविधता का युग देखा। स्त्री, दलित, आदिवासी, लैंगिक अल्पसंख्यक और शहरी मध्यमवर्गीय पात्र प्रमुखता से उभरे। बाज़ारवाद, सांप्रदायिकता, पर्यावरण और पहचान जैसे नए मुद्दे भी कथा वस्तु बने। कहानी समाज सुधारक से प्रश्नकर्ता में बदली।आज कहानी का उद्देश्य मनोरंजन, सामाजिक चेतना और कलात्मक अभिव्यक्ति, तीनों का समन्वय है। हिंदी कहानी ने आदर्शवाद से प्रयोगधर्मिता तक की यात्रा में अपनी जीवंतता सिद्ध की है।
डॉ. अशोक व्यास का कहानी‑संग्रह ‘उम्र की सीमा होती है’ ऐसी ही विभिन्न परिदृश्य समेटती कहानियों का संकलन है, जो बाहरी दृष्टि से सामान्य, मध्यमवर्गीय या कस्बाई जीवन से उठाई गयी स्थितियों के भीतर गहरे नैतिक और भावनात्मक प्रश्नों को टटोल रही हैं।
‘उपेक्षा’ की नीहारिका से आरंभ करें तो यह कहानी केवल एक “मिडिल क्लास” लड़की की सफलता या असफलता की कथा नहीं, वह जन्म से झेली गयी अवांछित स्थिति, बहन भाई के बीच के सूक्ष्म भेदभाव, और लगातार मिले तानों को अध्ययन की जिद और आत्मनिर्भरता में बदल देने की प्रक्रिया दिखाती है। पिता पुत्री के बीच अंतिम संवाद में जो भावनात्मक पिघलाव और स्वीकार्य है, वह इस संग्रह की कहानियों की मूल विशेषता सामने लाता है । लेखक अपनी अभिव्यक्ति में कठोर संरचनाओं की आलोचना करता है, पर व्यक्ति के भीतर परिवर्तन और संवेदना की सम्भावना को हमेशा जीवित रखता है।
‘जबान पर लगा ताला’ इस संवेदनशील दृष्टि को एक दूसरी दिशा में विस्तृत करती है। एक छोटे बच्चे से पाँच दस रूपये के लिए मोलभाव करने वाली उपभोक्तावादी मानसिकता को लक्ष्य किया गया है, वही मोलभाव करता व्यक्ति जब बड़े दुकानदार के बिल पर “प्रिंट रेट” सुनकर चुपचाप पैसे दे देता है, तो कहानी एक शब्द कहे बिना ही वर्ग पक्षपात, शक्ति‑संतुलन और हमारी सुविधाजनक नैतिकता पर तीखा प्रश्नचिन्ह खींच देती है। यहाँ भी लेखक किसी उपदेशात्मक निष्कर्ष की घोषणा नहीं करता । वह केवल दो दृश्य सामने रखता है और पाठक को यह सोचने के लिए छोड़ देता है कि हमारी तीखी जबान हमेशा कमजोर के सामने ही क्यों खुलती है। चूंकि डॉ अशोक व्यास मूलतः एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, उनकी कथानीयता में व्यंग्य और कटाक्ष की भाषा परिलक्षित होना कथा को सँवार देती है।
‘जात बाहर’ और ‘डेस्टिनेशन वेडिंग’ जैसी कहानियाँ इस संग्रह के सामाजिक आर्थिक सरोकारों की गहराई को रेखांकित करती हैं। ‘जात बाहर’ में बाल्यकाल की एक आकस्मिक “गिलहरी‑हत्या” को आधार बनाकर कैसे पंडित समाज, धर्म और प्रायश्चित की आड़ में एक गरीब ब्राह्मण परिवार की जमीन, सम्मान और जीवन पर अधिकार जमा लेता है, और फिर अगली पीढ़ी में मास्टर शिवनाथ उसी रूढ़ व्यवस्था के सामने खड़े होकर प्रायश्चित की परिभाषा बदल देते हैं , यह प्रसंग परंपरा और न्याय के संबंध पर गंभीर विमर्श की ओर संकेत करता है। दूसरी ओर ‘डेस्टिनेशन वेडिंग’ में शहर के उच्च अधिकारी सिन्हा साहब और किसान रामदयाल के बीच संवाद केवल “फसल” की कीमत या “इवेंट” की जगह भर का प्रश्न नहीं है, यह इस बात की टक्कर है कि भूमि को कोई फोटो‑फ्रेम की पृष्ठभूमि समझता है और कोई उसे अपने श्रम, सम्मान और भविष्य की खाद्य‑सुरक्षा के रूप में देखता है। रामदयाल का शांत, पर दृढ़ वाक्य कि फसल का असली दाम तब है जब उसका आटा किसी भूखे के पेट में तृप्ति बनकर उतरता है । यह संवाद इस कहानी का ही नहीं, पूरे संग्रह की नैतिक धुरी है।
मानवीय संबंधों और प्रेम के विविध रूपों की पड़ताल इस संकलन का एक और गहरा आयाम है। ‘प्रेम के अनोखे रंग’ का अनुभव किशोर आकर्षण से शुरू होकर साहसी, अस्वीकृत प्रेम, जाति‑बंधन से पराजित प्रेम और मित्रता या भाईचारे के रूप में सुरक्षित किए गए स्नेह तक कई स्तरों से गुजरता है। यहाँ प्रेम कोई एकरेखीय, आदर्श रोमानी भाव नहीं, बल्कि समय, सामाजिक दबाव और व्यक्तिगत अपराध बोध के बीच उलझता सुलझता मानवीय अनुभव है। इसी कड़ी में शीर्षक कहानी ‘उम्र की सीमा होती है’ जिम के आधुनिक, शहरी वातावरण में घटती एक अत्यंत सूक्ष्म प्रेम कथा है, जहाँ अविनाश और सिमरन के बीच आकर्षण, निकटता और परस्पर सम्मान तो है, परंतु दोनों अपने‑अपने जीवन मार्ग, प्राथमिकताओं और आयु में अंतर की जटिलताओं को नज़रंदाज़ नहीं कर पाते। अंततः वे एक गरिमापूर्ण दूरी चुनते हैं । बिना कटुता, बिना नाटकीय टूटन के , और शायद यहीं इस कहानी का सबसे परिपक्व कथ्य छिपा है कि प्रेम का पूर्ण रूप हमेशा मिलन नहीं, कभी सम्मानजनक अलगाव भी हो सकता है।
संग्रह की कुछ प्रमुख कहानियाँ हमारे समय के अत्यंत समकालीन और संवेदनशील मुद्दों को स्पर्श करती हैं। ‘सपने पूरे कैसे हुए’ में कर्नल चौधरी की बेटा होने वाली कामना, लैंगिक पूर्वाग्रह और बदलती रक्षा नीति , जहाँ लड़कियाँ भी सेना में प्रवेश पा रही हैं, के संदर्भ में बेटी माधवी और बेटा रंजीत की यात्राएँ समांतर रेखाओं की तरह चलती हैं। माधवी वह सपना साकार करती है जिसे पिता ने “बेटे” के लिए देखा था । वहीं रंजीत नृत्य के माध्यम से अपनी संकोची, भीतर से अपराध बोध से भरी पहचान को कला, आत्मस्वीकृति और संवेदनशीलता की ताकत में बदल देता है। अंत में जब पिता “मर्दानगी” की अपनी संकीर्ण परिभाषा से मुक्त होकर स्वीकार करते हैं कि शक्ति केवल वर्दी, युद्ध या कठोरता में नहीं, संवेदना और कला में भी होती है, तो कहानी भारतीय मध्यवर्गीय पिता‑पुत्र संबंधों पर एक नयी, आश्वस्तिजनक रोशनी डालती है, तथा सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव को स्पष्ट करती है।
‘चिर विद्रोहिणी’ की ललिता इस संग्रह की सबसे जटिल स्त्रीचरित्रों में से एक है। बाल विवाह का विरोध, अप्रिय पति के साथ जीवन से इंकार, प्रेम में धोखा, लिव‑इन, कोर्ट में शादी, टेस्ट‑ट्यूब बेबी, और फिर विवाह संस्था के भीतर फँसी अपनी बेटी के लिए एक नैतिक रूप से अत्यंत असुविधाजनक समाधान पर विचार , यह सब मिलकर उसे केवल बाहरी अर्थों में नहीं, भीतर की सतत आत्म बहस के अर्थ में “विद्रोहिणी” बनाते हैं। डॉ. व्यास यहाँ स्त्री जीवन के विकल्पों को किसी एक नैतिक खांचे में बंद नहीं करते। वे ललिता के माध्यम से दिखाते हैं कि विद्रोह का अर्थ हमेशा “सही” निर्णयों की यात्रा नहीं, बल्कि जोखिम, गलती, अपराध‑बोध और पुनर्विचार से भरी एक मानवीय यात्रा भी हो सकता है।
इस संग्रह की इन तमाम कहानियों के बीच ‘उम्र की सीमा होती है’ संग्रह को एकसूत्र में बाँधने वाला तत्व है । साधारण जीवन स्थितियों में छिपे असाधारण प्रश्नों को शांत, संवाद प्रधान, आत्मीय भाषा में उजागर करने की कथाकार की क्षमता अद्भुत है। डॉ. अशोक व्यास का लेखकिय स्वभाव यहाँ किसी कठोर वैचारिक घोषणापत्र का नहीं, बल्कि धीर, विचारशील साक्षी रचनाकार का है, जो अपने समय की विसंगतियों, विडम्बनाओं और संघर्षों को देखता तो है, पर उनसे निराश नहीं होता। वह अपने पात्रों के भीतर परिवर्तन, साहस और संवेदना की सम्भावना को लगातार रेखांकित करता चलता है।
‘उम्र की सीमा होती है’ के पात्र अधिकतर उसी वर्ग और वातावरण से आते हैं जिसे सामान्यतः “मध्यमवर्ग” कहकर सरसरी नज़र से देखा जाता है । छोटे किसान, सरकारी कर्मचारी, सैनिक अधिकारी, शिक्षक, सेल्स‑बॉय, कस्बाई व्यापारी, जिम जाने वाले प्रोफेसर, घर‑गृहस्थी सँभालती स्त्रियाँ और अपने सपनों के साथ जूझते युवा । इन्हीं चेहरों के माध्यम से लेखक जाति व्यवस्था, पितृसत्ता, उपभोक्तावादी विवाह संस्कृति, लैंगिक भूमिकाओं, प्रेम और विवाह के बदलते अर्थ, किसान के जीवन का सम्मान, और आत्मस्वीकृति की जद्दोजहद जैसे मुद्दों पर सोद्देश्य, परंतु अत्यंत मानवीय तरीके से बात करते हैं। उनकी भाषा सहज, संवादपूर्ण और भावुक होते हुए भी संयमित है। घटनाएँ साधारण हैं, पर उनके भीतर छुपे प्रश्न असाधारण हैं।
डॉ. अशोक व्यास स्वयं अभियंता हैं, पर उनकी कहानियाँ मनुष्यों की “भीतरी संरचनाओं” उनके विश्वास, डर, स्वप्न और विरोध की सूक्ष्म इंजीनियरिंग करती दिखायी देती हैं। यह संग्रह यह विश्वास देता है कि कहानी कला अभी भी हमारे समय में न केवल एक महत्वपूर्ण साहित्यिक विधा है, बल्कि समाज के आत्म विश्लेषण और संवेदना की पुनर्स्थापना का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। कहानी शब्द चित्र बनाने की कला है, और ‘उम्र की सीमा होती है’ के कथा चित्र पाठक को हँसाएगे नहीं, चौंकाएंगे भी नहीं उसे चुपचाप अपनी दुनिया में ले जाकर यह पूछेंगे कि जो पात्र यहाँ दिख रहे हैं, वे किसी दूर देश के नहीं हैं। वे हमारे ही घरों, मोहल्लों और भीतर बसे हुए लोग हैं। यही पहचान इस संग्रह की सबसे बड़ी सौगात है। कहानी विधा आज भी मानव अनुभवों की सबसे प्रखर और समावेशी अभिव्यक्ति है, यह आश्वस्ति डॉ अशोक व्यास के इस संग्रह को पढ़कर होती है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
लेखक, समीक्षक
भोपाल
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