Thursday, 29 January 2026

थोथा चना, बाजे घना

 लघु कथा 


थोथा चना, बाजे घना


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


दरवाज़ा खुला। कैमरों की तेज़ चमक में वे भीतर आए। कंधे तने हुए थे, चाल में अकड़ थी। होंठों पर स्थिर मुस्कान, जैसे परिणाम पहले ही तय हो। माइक सामने आते ही आवाज़ गूंजने लगी।

मैंने युद्ध रोका है।

मैं ही मानवता का उद्धारक हूँ।


भीड़ में कुछ सिर हिले, कुछ भौंहें तन गईं। एक पत्रकार ने आगे झुककर पूछा, कौन सा युद्ध।

उन्होंने पल भर ठहर कर कहा, जो होने ही नहीं दिया गया।


मोबाइल पर उँगलियाँ लगातार चलती रहीं। हर मंच, हर कैमरा, हर शब्द उनके लिए घोषणा पत्र था। कुर्सी पर बैठे हुए भी वे आगे झुके रहते, मानो दुनिया को कंधे से दबाए हुए हों, अपने अधिकारों के कंधों से , व्यापार , वार, सरकार की ताकत के कंधों से। 

पुरस्कार समिति के सदस्यों को बार बार हर संभव चेतावनी , इशारे , प्रलोभन देना उनकी सहज वृत्ति बन गई थी।


एक सिद्धांत प्रिय राजनयिक ने शांत स्वर में सुझाया, पुरस्कार मांगा नहीं जाता।

उनकी गर्दन की नसें उभर आईं। फोन फिर हाथ में आ गया। कुछ ही देर में , ट्विटर पर बयान तैरने लगे। असहमति को अपमान बताया गया। सवाल उठाने वालों पर उंगली उठी।


पुरस्कार दिवस आया। सभागार भरा था। कैमरे ऑन थे। नाम लगभग तय माना जा रहा था। वे घर में ही टी वी स्क्रीन के सामने थे। उंगलियाँ मुट्ठी में सिमट गईं।


समिति अध्यक्ष की आवाज़ गूंजी।

इस वर्ष का पुरस्कार उसे दिया जाता है जिसने शक्ति से नहीं, सहानुभूति से, लंबे समय तक छोटे स्तर पर वास्तविक कार्य से , क्षेत्रीय शांति स्थापित की है।


तालियों की आवाज़ बढ़ती गई। स्क्रीन पर सर्वथा गुमनाम चेहरा था। उनके होंठ फड़के। आवाज़ ऊँची हो गई। यह राजनीति है। उनका त्वरित ट्वीट आ गया , यह अन्याय है।


चयन समिति ने संक्षिप्त प्रेस नोट जारी किया।

 नोबल कार्य के पुरस्कार के लिए व्यक्ति का नोबल होना पहली आवश्यकता है।



विवेक रंजन श्रीवास्तव 

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