Sunday, 1 February 2026

"बुआ जी ऑन द ग्रुप! नाटक

 रेडियो प्रहसन

 "बुआ जी ऑन द ग्रुप!

विवेक रंजन श्रीवास्तव


अवधि: लगभग 15 मिनट शब्द संख्या: लगभग 2100

मुख्य पात्र:

बुआ जी (विमला देवी ): 60 वर्षीय

पप्पू : बुआ जी का भांजा, 35 वर्ष का IT प्रोफेशनल,

पम्मी भाभी: पप्पू की पत्नी, गृहिणी

बबलू: 10 वर्षीय चंचल बालक, जो "गूगल गुरु" है।

डैडी जी: 70 वर्षीय बुजुर्ग, जिनके लिए फोन का मतलब सिर्फ "टॉर्च" है।

रेडियो वॉयसओवर: दृश्य परिवर्तन व हास्य टिप्पणी हेतु म्युजिक।


 दृश्य 1:

 स्थान: घर का ड्राइंग रूम

समय: सुबह 8:00 बजे ,

पृष्ठभूमि: वॉट्सऐप नोटिफिकेशन की टिंग-टिंग ध्वनि लगातार


वॉयसओवर:

"सुबह की चाय और मोबाइल की स्क्रीन – दोनों गर्म हैं। और जब पारिवारिक वॉट्सऐप ग्रुप में बुआ जी का संदेश आए, तो समझिए दिन ‘सूचना विस्फोट’ से शुरू होने वाला है।


पप्पू (झुंझलाते हुए):

अरे फिर से गुड मॉर्निंग के बारह मैसेज! ये देखो – गुलाब वाला, सूरज वाला, मंदिर वाला, और ये... मोर नाचता हुआ! बुआ जी का बम फूटा है!


पम्मी भाभी:

फिर से? हंसते हुये कल तो उन्होंने लिखा था – "जिसने ये मैसेज 10 लोगों को फारवर्ड नहीं किया , उसके साथ अनर्थ हो जाएगा ।


बबलू (हँसते हुए): आज का मैसेज और भी घातक है। देखो “आज शनिवार है, जो यह मैसेज नहीं पढ़ेगा उसका मोबाइल ही हैंग हो जायेगा !”


पप्पू: मोबाइल तो हैंग नहीं हो सकता , लेकिन अब ऐसे मैसेज सहने की शक्ति जरूर हैंग हो रही है!


डैडी जी (सिर खुजाते हुए): बेटा, देखो जरा , ये मोबाइल में रोज टॉर्च अपने आप जल जाती है, फिर बुझती ही नहीं ।


मोबाईल बजता है – "बुआ जी कॉलिंग" ...


बुआ जी (मोबाईल पर ): पप्पू बेटा! ग्रुप में सब चुप क्यों हैं? मेरे शुभ प्रभात तक का कोई रिप्लाई नहीं ? कहीं कोई बीमार तो नहीं? घर में सब ठीक तो है न !


पप्पू (संभालते हुए): अरे नहीं बुआ जी, सब ठीक है… वो गुड मॉर्निंग मैसेज का थोड़ा ओवरडोज हो गया…


बुआ जी: अरे! ज्ञान बाँटना पाप है क्या? तुमने सुना नहीं है "ज्यों बांटे त्यों त्यों बढ़े , बिन खर्चे घटि जात" । मैंने कल ही टीना के फारवर्डेड मेसेज से सीखा है ... फॉरवर्डिंग इज केयरिंग!

चिढ़ते हुये ... मैं तो रोज 5 वीडियो, 3 रामायण क्लिप और 7 चेतावनी संदेश भेजूंगी। कोई मुझे रोक नहीं सकता। तुम पढ़ो न पढ़ो , वो तुमंहारी मर्जी, भेजना मेरा राइट है ।  


 [ड्रम रोल म्युजिक]


दृश्य 2:

"डिजिटल आपदा – वॉट्सऐप वॉर "

स्थान: रसोईघर

समय: दोपहर 1:00 बजे ,

बैकग्राउंड: मोबाइल की टिंग-टिंग-टिंग, साथ में कुकर की सीटी


वॉयसओवर: "एक आम दोपहर, लेकिन ग्रुप पर घमासान जारी है। बुआ जी और फैमिली के बीच वर्चुअल युद्ध का दूसरा चरण प्रारंभ!"


पम्मी (फोन दिखाते हुए): देखो जी, बुआ जी ने फिर मैसेज भेजा है – ‘ मेन गेट पर चुटकी भर हल्दी डालो, और एलियन से बचो।’

अब मैं दाल में हल्दी डालूं या बुआ जी की सलाह से ब्रह्मांड में?


बबलू (गूगल पर टाइप करता हुआ): मम्मी, गूगल कहता है – "एलियन का हल्दी से कोई संबंध नहीं।"


लेकिन बुआ जी का गूगल कुछ और ही है , वो है किट्टी पार्टी व्हाट्स अप यूनिवर्सिटी।


पप्पू (व्यंग्य से): बुआ जी अगर फेसबुक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर होतीं, तो उन्हें कब का नोबल प्राइज मिल गया होता।


मैसेज टोन

[नया मैसेज: "आज रात 12:00 बजे घर के दक्षिण में एक सफेद प्याज रख दें जो उतारना हो लोन पर सारा ब्याज..." – बुआ जी]


पम्मी: अब मैं सफेद प्याज कहां से लाऊं और प्याज को दक्षिण में रखूं या खुद को उत्तर में? हंसती है ।


डैडी जी: बेटा , बुआ से कहो कि ‘मोबाइल बंद करने से भी शांति मिलती है।’

मेरा फोन टॉर्च की तरह शुरू होता है और ज्ञान का विस्फोट करने वाला बम बन जाता है!

पप्पू तू तो ग्रुप का नाम “परिवार का पचड़ा” से बदलकर बुआ जी का फॉरवर्ड चैनल” कर दे ।


बुआ जी (ऑडियो मैसेज में): पप्पू! तूने ग्रुप का नाम क्यों बदला?

मैंने वो मैसेज आप सबके भले के लिए भेजा था। कल से सब हट जाओ इस ग्रुप से…

मैं ‘बुआ ब्रॉडकास्ट चैनल’ बनाती हूँ। जिसमें सिर्फ मैं होउंगी, और मेरी आवाज़! खूब सब्सक्राबर मिलेंगे मुझे , और यू ट्यूब से होगी ढ़ेर सी इनकम , तब ना आना मेरे पास ... बुआ पार्टी तो बनती है कहते हुये । समझ लो ।.

[थ्रिलर म्यूजिक...... परिवार में सन्नाटा]


बबलू: अब बुआ जी का “न्यूज़ चैनल” खुलेगा – बिग ब्रेकिंग न्यूज .... पान खाने से मंगल दोष खत्म! मरीज को अमुक मंत्र १०१ बार सुना दो हर बीमारी छू मंतर होने की गारंटी । फिर बुआ जी की म्युजिक टीम के उस मंत्र के यूट्यूब राइट्स तुम खरीद लेना पम्मी , मंत्र वाला नुस्खा बुआ जी का और मंत्र बजाये जाने पर इनकम पम्मी की । बढ़िया काम्बिनेशन होगा ।


पप्पू (संजीदगी से): नहीं! अब बहुत हो गया। मैं उन्हें ग्रुप एडमिन बना देता हूँ। जब खुद एडमिन बन जाएँगी, तब ही ग्रुप से उनका मोह टूटेगा।


ड्रम म्युजिक .....


दृश्य 3:

"बुआ जी का बोध – और नया जागरण"

स्थान: शाम 6 बजे, छत पर सभी इकट्ठे, हाथ में मोबाइल और पकौड़े

पृष्ठभूमि – स्ट्रीट लाइट जल गईं है , शीतल हवा चल रही है , पक्षियों के कलरव की आवाज़ के बीच


वॉयसओवर: "शाम आई है, रिश्तों की नई रोशनी के साथ। बुआ जी खुद छत पर तशरीफ़ ला चुकी हैं – मोबाइल हाथ में है , और चेहरा आत्मचिंतन से भरा हुआ है ।"


बुआ जी (धीरे-धीरे): पप्पू बेटा, मैंने सोचा… तुम सबने मुझे कभी टोका नहीं। हमेशा मेरा हर मैसेज पढ़ा… हार्ट वाली इमोजी बनाकर , हाथ जोड़कर रिएक्ट किया।

लेकिन कल जब मैंने 48 लोगों को रामबाण उपाय भेजा… और किसी ने जवाब नहीं दिया… तब समझ आया कि ये रिश्ता है – रिसीवर और भेजने वाले का, सिर्फ इंटरनेट का नहीं।


पम्मी (आश्चर्य से): तो बुआ जी... आप नाराज़ तो नहीं हैं ना हमसे ?


बुआ जी (मुस्कुराकर): नहीं रे बहुरिया! अब से मैं "चयन" नीति अपनाऊंगी। अब मैं दिन में सिर्फ एक संदेश भेजूँगी… वो भी सोच-समझकर। पहले खुद समझुंगी , आजमाउंगी , फारवर्ड का फैक्ट चेक करूंगी , फिर खुद लिखकर , ऐसा मैसेज लिखुंगी , जिसे पढ़कर , पढ़ने वाले को सचमुच कुछ मिले । और वह मेरे मैसेज इग्नोर करने के बजाय उनकी प्रतीक्षा किया करे । मुझे समझ आ गया है कि निश्चित ही सोशल मीडिया ज्ञान का भंडार है , क्योंकि करोड़ो लोगों के अनुभव , उनका साझा ज्ञान यहां सुलभ है । पर अधकचरे फारवर्ड से हमें खुद बचना होगा । इस तरह के मैसेज भ्रम फैलाते हैं , अफवाह बनते है । ये परपजली प्रायोजित किये जाते हैं हंसी ठठ्ठे में या सोची समझी डेटा मार्केटिग के लिये ।


बबलू: प्यारी बुआ! एक सवाल करूं ? मतलब अब अगर हम रिप्लाई न करें तो आप फिर से आप “एलियन कांड” जैसे मैसेज तो नहीं भेजेंगी न?


बुआ (हँसकर): नहीं रे! अब मैं सिर्फ खुद अपने अनुभव से बनाये अपने ही मैसेज, मन से लिखकर , ज्ञान से फॉरवर्ड करूँगी।

और हाँ, अब से बबलू को ग्रुप एडमिन नामिनेट कर रही हूं ! वो ही तय करेगा – क्या ज्ञान देना है, और क्या सेंसर करना है!


पप्पू (हँसते हुए): वाह बुआ जी! ये हुई डिजिटल डेमोक्रेसी।

आप अब सोशल मीडिया की संत विमला देवी कहलाएंगी!


[सभी मिलकर हँसते हैं – समापन संगीत]


वॉयसओवर समापन:रेडियो एंकर (मज़ाकिया लहजे में): "तो दोस्तों! ये थी हमारी झलकी – बुआ जी ऑन द ग्रुप! जहाँ सोशल मीडिया से शुरू हुआ वॉट्सऐप युद्ध, अंत में भावनाओं की विजय में बदला।

याद रहे:‘हर फॉरवर्ड जरूरी नहीं होता, पर हर रिश्ते का जवाब ज़रूरी होता है।’अब जाईये, और अपने पारिवारिक ग्रुप में बस एक मुस्कुराता हुआ इमोजी भेजिए।

क्योंकि बुआ जी देख रही हैं!"


[समापन धुन]

प्रहसन "किचन में छुट्टी"

 झलकी 2


 श्रव्य प्रहसन

"किचन में छुट्टी"

विवेक रंजन श्रीवास्तव

भोपाल


अवधि: लगभग 15 मिनट

शब्द संख्या: लगभग 2200



पात्र:श्रीमती सरोजा मिश्रा (मम्मी) – 50 वर्षीया गृहिणी

हरिशंकर मिश्रा (पापा) – 55 वर्षीय, कॉलेज प्राध्यापक,

गुड्डी – 22 वर्षीया बेटी, करियर ओरिएंटेड, किचन के नाम पर रील्स

बिट्टू – 17 वर्षीय बेटा, हमेशा भूखा, पर मेहनत से दुश्मनी

बुआ जी (फोन पर)

पड़ोसन और सखी, 'संगठन शक्ति' का आधार

वॉयसओवर एंकर – रेडियो टच के लिए व्यंग्यात्मक इंटरल्यूड


दृश्य 1: "घोषणा बम"

 सुबह 7:00 बजे, डाइनिंग हॉल में

पृष्ठभूमि: हल्की हलचल, कुकर की सीटी, बर्तनों की खनक


वॉयसओवर: "रविवार की सुबह है। शहर सुस्त है। लेकिन मिश्रा निवास में माहौल गर्म है – वो भी विचारों से!"


सरोजा (थकी हुई आवाज़ में): बस बहुत हुआ! 25 साल हो गए रोटी पराठे बनाते… चाय उबालते… सबके मुँह के स्वाद ने मेरी नींद, आराम , शांति सब छीन रखी है ! बच्चों को स्कूल से छुट्टी मिलती है , आप को तो हर त्यौहार , हर शनिवार , हर रविवार आफिस जाना ही नही होता । १३ कैज्युल लीव और साल में महीने भर की अर्न लीव अलग से मिलतीं हैं । यहां तक की काम वाली की भी जब मर्जी हो छुट्टी ले बैठती है । एक मैं ही हूं जिसे मरने तक की फुर्सत नहीं है ।


गुड्डी (मोबाइल पर सर्फिंग करते हुए): यार मम्मी! ज़रा धीरे बोलो ना! कितनी बढ़िया रील देख रही हूं मैं !


बिट्टू ( चिल्लाते हुए): मम्मी! क्या बनाया आज? आलू का पराठा? डबल चीज़?


सरोजा: नहीं बेटा। आज तुम्हारी मम्मी छुट्टी पर हैं। आज से ‘स्व-निर्भर किचन परिवार योजना’ लागू हो गई है!


हरिशंकर (अखबार से झांकते हुए): क्या मतलब? खाना नहीं बनेगा?


सरोजा (संजीदगी से): हां , मैंने फैसला लिया है , रसोई से ब्रेक! आखिर मुझे भी मेरा मी टाइम लेने का हक है ! आज से आप सब अपने-अपने भोजन के लिये स्वयं जिम्मेदार बनिये । मैं आज ‘खाना नहीं बना रही’।


फोन की घंटी (बुआ जी की आवाज़ – फोन पर): "अरी सरोजा! हड़ताल कर दी या नहीं ? महिला मंडल किटी वाले सबने ने सुबह से किचन बंद किया हुआ है। आज मर्दों की परीक्षा है!"


सरोजा: बुआ, मैं तो सालों से स्टैंडबाय पर थी। आज से ‘वर्किंग मोड’ बंद!


पृष्ठभूमि संगीत – “क्रांति की धुन”


हल्के स्वर में हरिशंकर (हँसते हुए): अच्छा तो यह तुम्हारी किटी पार्टी की मुहिम है .... अरे इतना भी मत बढ़ाओ बात को। देखो, खाना बनाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है! आज छुट्टी है ही मैं बनाता हूं तुम्हारे लिये भी और सबके लिये ..आलू के पराठे । चलो गुड्डी मेरी मदद के लिये किचन में आ जाओ ।


गुड्डी ( उत्साहित होकर ): ओह तो मुझे रील अधूरी छोड़नी पडेगी , कोई बात नहीं पर पापा मैं खुद के लिये एकदम इंस्टा स्टाइल ओट्स चीला बनाऊँगी!


बिट्टू (कंफ्यूज़ होकर ): मतलब आज हमारी मर्जी का खाना है । ओके मैं… मैं… शायद मैगी… नहीं नहीं , दीदी मेरे लिये तो पिज़्ज़ा आर्डर कर दो ।


रोल ओवर साउंड ....


पृष्ठभूमि: हल्की पॉपकॉर्न जैसी सीज़लिंग, बर्तन टकराने की आवाज़, बीच-बीच में “ओह नो!” “अरे रे!” हाथ बचा कर जल जाओगे ...


वॉयसओवर: "किचन आज रणक्षेत्र है। चाय की केतली तीर बन गई है, चम्मच ढाल, और आलू… वो अब बम!"


हरिशंकर (आलू छीलते हुए): इसमें क्या है! दो आलू, दो चुटकी नमक, एक तवा और थोड़ा सा आत्मविश्वास… लो पराठे की स्टफिंग रेडी !

(तवे पर पानी पड़ने से छन्न की आवाज .) ओहो .. हूँ… ये जलने की महक कैसे आ रही है ? अरे गुड्डी , तुमने गैस बंद ही नहीं की बेटा .. इतना धुआं, उफ .. खिरकी खोलो , जल्दी एक्जास्ट चलाओ , अरे चिमनी का स्विच कौन सा है भाई । खाँसी ...


सरोजा: ... लग गई आग ...


हरिशंकर (खाँसते हुए): ...भाग्यवान! आग नहीं लगी, सिर्फ खुद खाना बना लेने वाली हेकड़ी जल गई है ।


गुड्डी (किचन के दूसरे कोने से): ये देखो! मेरे ओट्स चीले की तस्वीर! हैश टैग शैफ गुड्डी ...

तवे से चीला निकालने की कोशिश की आवाज , अरे! ये तो निकल ही नहीं रहा , तवे पर चिपक कैसे गया । शिट ... इंस्टाग्राम में तो ऐसे पलटते हैं जैसे पंखा घुमा रहे हों!


सरोजा (दूसरे कमरे से , हंसते हुये ): रील में सब आसान लगता है, बेटा! रियलटी में ओट्स भी ऊट-पटांग हो जाते हैं!


बिट्टू (अपने स्टाइल में): पापा, दीदी! तुम लोग मस्त रहो! मैं तो बस दो मिनट वाला बेस्ट नुस्खा जानता हूँ। रुको अभी मैगी मिलती है सबको ।

गैस लाइटर जलाने की साउंड , .. अब मैं पैन में पानी, मैगी और सास डालता हूं ..


बिट्टू: बस अब दो मिनट… और फिर चलेगा मैगी का जादू ! वह व्हिशलिंग करता है ..

तभी स्मोक अलार्म बज उठता है  

बिट्टू चीखते हुये .. दीदी! स्मोक अलार्म क्यों बजा! क्या बकवास है .. मेरी मैगी काली हो गई!


गुड्डी (हँसते हुए): ये ‘काली मैगी’, ‘भूतिया भुजिया’ है!


हरिशंकर (सिर पकड़ते हुए): अब समझ आया… किचन सिर्फ रेसिपी से नहीं संभलता .. तुम्हारी मम्मी दिल से भी काम लेती है। पंद्रह मिनट में मेरे तो दोनों हाथों में जले हुए निशान बन गये हैं…


सरोजा (दर्शन भाव से): कहो फैमली .. सरोजा करती ही कया है ... दिन भर किचन में ।


रोलओवर साउंड

पृष्ठभूमि: हल्का संगीत, खाना परोसने की टन-टन


वॉयसओवर: "हर क्रांति का अंत संवाद से होता है… और रसोई क्रांति का अंत… भूख से!"


गुड्डी: मम्मी! अब मान भी जाओ! हमने सीख लिया… कि गूगल रेसिपी और रोटी में ज़मीन-आसमान का अंतर है।


बिट्टू: मम्मी, मैं अब हर संडे आपके साथ हाथ बटाकर खाना बनाना सीखूँगा… किचन केवल महिलाओ की जिम्मेदारी नहीं है , बस शुरुआत , चाय से करवा लेना।


हरिशंकर (हाथ जोड़कर): भाग्यवान! मैं तो ये भी भूल गया था कि खाना केवल पेट भरने के लिए नहीं, मन भरने के लिए भी होता है। तुम भोजन में जो प्यार परोसती हो वह अनमोल है ।

तुम्हारा हर पराठा अब से ‘प्रेरणा पराठा’ कहलाएगा!


सरोजा: चलो चलो , ज्यादा मख्खन वाली मसखरी नहीं । बताओ तो अब क्या आदेश है?


गुड्डी: कृपा करके रसोई में दोबारा प्रवेश कीजिए, मां महाराज।


बिट्टू: और खाना खिला दीजिए, वरना मैं पड़ोसियों की रोटियाँ चुरा लाउंगा!


सरोजा (हँसते हुए): अरे अभी खाना आया नहीं… आज मैंने स्विग्गी से मंगाया है!


तीनों (चकित): क्या!!


हरिशंकर .. सरोजा तुम तो बडी स्मार्ट निकलीं ,


गुड्डी .. स्मार्ट नहीं , मेरी मम्मी ओवर स्मार्ट हैं , डैशिंग हैं , फ्रेंडली हैं और बैस्ट कुक हैं । लव यू मम्मी । कभी-कभी मां को भी छुट्टी मिलनी चाहिए, जिससे वो अपनी हँसी, टीवी और शौक भी देख सके!


सभी हँसते हैं – तालियों की आवाज़


 समापन थीम वॉयस ओवर :रेडियो एंकर:

"तो श्रोताओ! ये थी हमारी खास हास्य झलकी – किचन में छुट्टी! याद रखिए मां की रसोई सिर्फ भोजन नहीं, भावनाओं का अचार है। और कभी-कभी उस अचार को भी धूप दिखा देना चाहिए!"


[समापन संगीत]

नुक्कड़ नाटक: "वंदे मातरम्: एक गीत, एक क्रांति"

 'वंदे मातरम्' के 150 साल  


नुक्कड़ नाटक: "वंदे मातरम्: एक गीत, एक क्रांति"


लेखक 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 

(मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी से नाटक के लिए हरिकृष्ण प्रेमी सम्मान से सम्मानित प्रबुद्ध लेखक)

A 233, ओल्ड मिनाल रेजिडेंसी 

जे के रोड, भोपाल 462023


मोबाइल+917000375798

इन दिनों न्यूयॉर्क में 


पात्र:


· आर्या, विक्रम, मीरा: स्कूली बच्चे

· दादाजी: जानकार वरिष्ठ नागरिक

· सहायक कलाकार: बंकिम चंद्र चटर्जी, रवींद्रनाथ टैगोर, स्वतंत्रता सेनानियों की भूमिका में (पृष्ठभूमि में)

मैडम भीकाजी कामा की भूमिका में एक बच्ची


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दृश्य 1: आज का भारत – एक स्कूल प्रांगण


(तीन बच्चे – आर्या, विक्रम और मीरा – स्कूल यूनिफॉर्म में बैठे हैं। वे 'वंदे मातरम्' के बारे में प्रोजेक्ट पर चर्चा कर रहे हैं।)


आर्या: "दोस्तों, कल मेरे शिक्षक जी ने बताया कि 'वंदे मातरम्' की 150वीं जयंती है। यह गीत इतना खास क्यों है? यह तो राष्ट्रगान नहीं है।"


विक्रम: "हाँ, राष्ट्रगान तो 'जन-गण-मन' है। लेकिन शिक्षक जी ने कहा था कि 'वंदे मातरम्' को भी उतना ही सम्मान मिलता है। पर इसकी कहानी क्या है?"


मीरा: "मुझे पता है! यह गीत हमारी आज़ादी की लड़ाई का नारा बना था। चलो, हमारे पड़ोस के दादाजी से पूछते हैं। वे बहुत कुछ जानते हैं।"


(तीनों बच्चे मंच के दूसरी ओर बैठे दादाजी के पास जाते हैं।)


दादाजी: "अरे, तुम तीनों इतने गंभीर क्यों हो? क्या बात है?"


आर्या: "दादाजी, आज हम लोगों को 'वंदे मातरम्' के बारे में जानना है। "


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दृश्य 2: 


(दादाजी बच्चों की ओर देखते हुए मुस्कुराते हैं। पीछे की ओर एक अभिनेता सफेद कपड़े में,( बंकिम चंद्र ) कलम और कागज लिए एक डेस्क पर बैठा दिखाई देता है।)


दादाजी: "सुनो, यह कहानी 1875 की है। बंगाल प्रांत के एक छोटे से शहर चिनसुरा में, एक बहुत बड़े लेखक रहते थे – बंकिम चंद्र चटर्जी। वे एक अंग्रेज अधिकारी के साथ झगड़े के बाद बहुत दुखी थे। एक दिन, हुगली नदी के किनारे टहलते हुए, उनके मन में यह विचार आया कि हमारी मातृभूमि तो एक देवी के समान है। उसी क्षण उन्होंने कागज पर इस गीत की पहली पंक्तियाँ लिखीं – 'वंदे मातरम्'।"


विक्रम: "वाह! तो यह कविता ऐसे बनी थी?"


दादाजी: "हाँ। फिर 1882 में उन्होंने इसे अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' में उपयोग किया । यह उपन्यास सन्यासियों के विद्रोह के बारे में है, जो मातृभूमि को देवी मानकर पूजा करते थे। इस उपन्यास के नायक 'संतान' इसी गीत को गाकर प्रेरणा लेते थे।"


मीरा: "लेकिन दादाजी, यह गीत तो अब राष्ट्रीय गीत है, यह आनंद मठ किताब से बाहर कैसे आया?"


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दृश्य 3: 


(पृष्ठभूमि में, रवींद्रनाथ टैगोर जैसे दिखने वाला एक अभिनेता गाना गाता है। फिर दृश्य बदलकर 1905 का हो जाता है, जहाँ कुछ युवा हाथों में झंडे लिए "वंदे मातरम्" का नारा लगाते हुए मार्च करते दिखाई देते हैं।)


दादाजी: "अच्छा सवाल किया बेटा ! साल 1896 की बात है। महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने कलकत्ता में एक बड़े राजनीतिक सम्मेलन में इसे पहली बार गाया। लेकिन असली मोड़ 1905 में आया, जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन करने की कोशिश की।"


आर्या: आश्चर्य से "बंगाल का विभाजन?"


दादाजी: "हाँ। उस समय लोगों में बहुत गुस्सा था। 7 अगस्त 1905 को हज़ारों विद्यार्थियों ने कलकत्ता के टाउन हॉल की ओर मार्च किया और 'वंदे मातरम्' का नारा लगाया। यह पहली बार था जब यह एक राजनीतिक नारा बना। अंग्रेज सरकार डर गई और इसके गाने पर पाबंदी लगा दी। स्कूलों में इसे गाने वाले विद्यार्थियों पर जुर्माना किया गया।"


विक्रम: "पाबंदी? तो फिर लोगों ने इसे गाना बंद कर दिया होगा ?"


दादाजी: "बिल्कुल नहीं! उल्टा, यह गीत और भी ताकतवर बन गया। यह सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं रहा। 1906 में बरिसाल (अब बांग्लादेश) में हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के दस हज़ार से ज़्यादा लोगों ने 'वंदे मातरम्' के झंडे लहराते हुए एक जुलूस निकाला। 1908 में तमिलनाडु के तूतीकोरिन में हज़ारों मिल मज़दूर हड़ताल पर निकले और रात भर यही गीत गाते रहे। यह गीत हर तरफ़ राष्ट्र बोध के भाव के लिए फैल गया।"


मीरा: "क्या यह गीत विदेशों में भी गाया गया?"


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दृश्य 4:


(एक अभिनेत्री (मैडम भीकाजी कामा की भूमिका में) हाथ में एक झंडा लिए खड़ी है, जिस पर "वंदे मातरम्" लिखा है।)


दादाजी: "बिल्कुल! 1907 में, एक वीर महिला, मैडम भीकाजी कामा, ने जर्मनी के स्टटगार्ट शहर में पहली बार भारत का तिरंगा झंडा फहराया। और उस झंडे के बीच में 'वंदे मातरम्' शब्द लिखे थे। यह गीत लंदन, पेरिस , हर जगह भारतीय क्रांतिकारियों की प्रेरणा बनता गया।"


आर्या: "दादाजी, यह गीत तो बहुत लंबा है, क्या इस गीत के सभी हिस्से गाए जाते हैं?"


दादाजी: "नहीं बच्चो। यह एक महत्वपूर्ण बात है। इस गीत के बाद के श्लोकों में हिंदू देवी दुर्गा का ज़िक्र आता है। 1937 में, महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे नेताओं ने सलाह दी कि सभी धर्मों के लोगों को साथ लाने के लिए, सिर्फ पहले दो श्लोक ही आधिकारिक तौर पर गाए जाएँ, क्योंकि वे सिर्फ मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता के बारे में हैं। इसलिए आज भी हम वही गाते हैं।"


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दृश्य 5: 


(बच्चे दादाजी के चारों ओर बैठे हैं।)


विक्रम: "तो दादाजी, आज 2025 में इसकी 150वीं जयंती मनाने का क्या मतलब है?"


दादाजी: "इसका मतलब है, उस भावना को याद करना जो इस गीत में छिपी है । एकता, बलिदान और देशभक्ति का भाव। यह सिर्फ शब्द नहीं, भारत की 'सामूहिक चेतना' है। आज भी संसद का सत्र खत्म होने पर इसका वाद्य संस्करण बजाया जाता है। इस जयंती पर पूरे देश में सांस्कृतिक कार्यक्रम, डाक टिकट जारी किए जा रहे हैं ताकि तुम जैसे नए बच्चे, हर बदलती पीढ़ी इसके इतिहास से जुड़ सके।"


मीरा: "अब समझ आया! यह गीत हमें बताता है कि हमारी मातृभूमि कितनी सुंदर और शक्तिशाली है, और उसके लिए हम सब एक हैं।"


दादाजी: "बिल्कुल सही! अब तुम तीनों मिलकर इस गीत के पहले दो श्लोक गाओ, जैसे उन क्रांतिकारियों ने गाए थे।"


(तीनों बच्चे और दादाजी खड़े हो जाते हैं। पूरा मंच रोशनी से भर जाता है। सभी एक साथ 'वंदे मातरम्' गाते हैं।)


सभी एक साथ:

"वंदे मातरम्!

सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्

शस्यश्यामलाम् मातरम्॥

शुभ्रज्योत्स्नाम् पुलकितयामिनीम्

फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्

सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्

सुखदाम् वरदाम् मातरम्॥

वंदे मातरम्!"


(पर्दा गिरता है।)


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 नाटक मंचन के लिए सुझाव


· कलाकार: कम से कम 5 बच्चे (3 मुख्य, 1 दादाजी, 1 बंकिम चंद्र/टैगोर की भूमिका के लिए)। अन्य समूह दृश्यों के लिए और बच्चे शामिल हो सकते हैं।

· वेशभूषा:

  · बच्चे: सामान्य स्कूल यूनिफॉर्म।

  · दादाजी: धोती-कुर्ता और चश्मा।

  · बंकिम चंद्र चटर्जी: सफेद पोशाक, कलम-दवात।

  · ऐतिहासिक दृश्य के कलाकार: साधारण सफेद कपड़े (सन्यासी/विद्यार्थी)।

· मंच सज्जा: सरल। एक तरफ एक बेंच (स्कूल प्रांगण), दूसरी तरफ एक आसन (दादाजी के लिए)। पृष्ठभूमि में 'वंदे मातरम् 150' लिखा हो या भारत का नक्शा हो।

· ध्वनि प्रभाव: नाटक के अंत में 'वंदे मातरम्' गीत का इंस्ट्रुमेंटल संस्करण बजाया जा सकता है।

· संवाद अभ्यास: बच्चों को संवाद सरल और स्वाभाविक ढंग से बोलने के लिए प्रोत्साहित करें। ऐतिहासिक तथ्यों पर ज़ोर दें।


इति 

नुक्कड़ नाटक 'वंदे मातरम्' 



लेखक 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 

(मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी से नाटक के लिए हरिकृष्ण प्रेमी सम्मान से सम्मानित प्रबुद्ध लेखक)

A 233, ओल्ड मिनाल रेजिडेंसी 

जे के रोड, भोपाल 462023


मोबाइल+917000375798

इन दिनों न्यूयॉर्क में

नुक्कड़ नाटक “गीला-सूखा -हरा नीला "

 नुक्कड़ नाटक 


“गीला-सूखा -हरा नीला "


विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल 


( हास्य, व्यंग्य, लोकगीत और संवादों से भरपूर)

समय: 35–40 मिनट

दर्शक वर्ग: आमजन, विद्यार्थी, नगरवासी, कॉलोनी, शहर व ग्रामीण क्षेत्र


उद्देश्य: गीला-सूखा कचरा पृथक्करण के प्रति जन-जागरूकता



 पात्रों की सूची (10-12 कलाकार)


1. गब्बर भाई – कचरा लापरवाह



2. चम्पा काकी – जागरूक मोहल्ले वाली



3. चीकू – स्कूल का बच्चा



4. कचरा – कल्पनात्मक पर्यावरण-रक्षक



5. बबलू भैया – आलसी, मज़ाक उड़ाने वाला



6. नगर निगम बाबू 



7. स्वच्छता रक्षक दल (3) – समूह जो गीत-नृत्य में भाग लेते हैं



8. नाटक सूत्रधार (1) – कहानी को आगे बढ़ाने वाला



9. भीड़/पड़ोसी/अतिरिक्त पात्र – संवाद में सहभागिता के लिए



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 दृश्य 1: मोहल्ले का चौक परिचय और स्थिति की स्थापना (10 मिनट)


(ढोलक/मंजीरे के साथ, मंच पर प्रवेश)


गीत – उद्घाटन (स्वच्छ भारत धुन में)


चलो रे चलो, गली-गली,

स्वच्छता की अलख जगा दो गली गली ...

नीले डब्बे में रिसाइकिल कचरा 

हरे डब्बे में बायो कचरा 

छांट के डालो गली गली


सूत्रधार (संजीदा स्वर में) "कहानी है उस मोहल्ले की, जहाँ कचरा भगवान से भी ज़्यादा पूजा जाता है...

नहीं-नहीं, साफ़ करने को नहीं... सब कुछ एक साथ खिचड़ी बनाकर फेंकने को!"



(गब्बर भाई एक बड़ी थैली लटकाए आते हैं)

गब्बर: 

 "अरे हटो सब! ये देखो, पिज्जा का डिब्बा, केले का छिलका, बासी पराठा और टूटी चप्पल , सब साथ में , अपना घर साफ अपन फुर्सत, अब जाने सफाई कर्मचारी , टैक्स भी तो देते हैं हम भरपूर। गीला-सूखा क्या होता है, ये तो रईसों की बीमारी है!"



(बबलू भैया ठहाका लगाते हैं)

बबलू: 

 "कचरे का भी धर्म होता है क्या? जो तुम लोग अमीर गरीब , जात-पात में कचरा बाँट रहे हो?" कचरे को स्टेटस मान रहे हो।



(चम्पा काकी झाड़ू लेकर आती हैं)

काकी: 

"रे बबुआ, यही तो ज्ञान की बात है!

कचरे को अगर समझदारी से संभालो, तो वही सोना बनता है!"

बायो डिग्रेडेबल कचरा सब्जी के छिलके वगैरह जायेंगे हरी डस्ट बिन में ।

और सूखा कचरा रिसाइकिल किया जाता है नीली डस्ट बिन से ।

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 दृश्य 2: टकराव और संवाद – हास्य व तर्क (10 मिनट)


चीकू:

"गब्बर चाचा, स्कूल में सिखाया गया कि हरा डिब्बा गीले कचरे के लिए है, नीला सूखे के लिए।

अगर आप सब मिलाकर फेंकोगे, तो रीसायकल कैसे होगा?"



गब्बर (हँसते हुए):


 "रीसायकल हो या साइकिल , मुझे क्या फ़र्क पड़ता है?"



(बबलू मज़ाक उड़ाता है):


 "अरे चीकू, तुम तो धरती बचाने चले हो। पहले मोहल्ला तो बचा लो!"



(तभी स्वच्छता रक्षक दल एंट्री करता है – लोकधुन पर गाते हुए)


 गीत (ढोलक पर)


 "अरे भैया गब्बर सुन ले बात,

गंदगी से होए हर दिन घात।

गीला और सूखा अलग जो कर,

होगी स्वच्छता घर-घर !"



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दृश्य 3: 

कचरा का आगमन – रूपक और चेतावनी (8 मिनट)


(धुएँ, रोशनी और तेज़ आवाज़ों के साथ कचरा का प्रवेश – डरावना रूप)

कचरा :


 "मैं कचरा हूं – तुमने मुझे इकट्ठा कर-कर के राक्षसी बना दिया है।

देखो, नदियाँ काली हो रही हैं, ज़मीन में जहर घुल रहा है!

अब भी समय है – गीला-सूखा अलग करो!"



(गब्बर काँपता है)

गब्बर 

 "हे कचरा , क्षमा करिए!

अब मैं जान गया कि यही असली धर्म है –

कचरे को सही जगह डालना अच्छा कर्म है !"



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 दृश्य 4: नगर निगम की योजना और समाधान शिविर (6 मिनट)


(नगर निगम बाबू मंच पर आते हैं – फाइलें हाथ में)

निगम बाबू:


 "नगर निगम अब हर मोहल्ले में दो डिब्बे देगा – हरा और नीला।

जो परिवार गीला-सूखा कचरा सही से छांटकर देगा, उन्हें कर में छूट और सम्मान मिलेगा।

स्कूल, कॉलोनी और मोहल्लों में ‘कचरा योद्धा’ बनाए जा रहे हैं!"



(चीकू और अन्य बच्चे खुशी से ताली बजाते हैं)



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 दृश्य 5: नाटकीय परिवर्तन – सबका संकल्प (6 मिनट)


गब्बर:


 "मैंने अब तय किया है 

 न सिर्फ़ खुद गीला सूखा कचरा अलग करूँगा, बल्कि सबको समझाऊँगा!"



(बबलू भी लज्जित होकर हाथ जोड़ता है)

बबलू:


 "मैंने मज़ाक उड़ाया, अब मदद करूंगा!"



(पूरे मोहल्ले वाले एक सुर में)

 "अब नहीं होगी गंदगी – अब होगी समझदारी!"




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 समापन गीत (2 मिनट):


 "गीला-सूखा अलग करेंगे,

सबको जागरूक हम करेंगे।

कचरे को भी देंगे सम्मान,

बने स्वच्छ भारत महान!"


 अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए कचरे को अलग अलग कलर के डस्टबिन में इकट्ठा करें तो इससे कचरा प्रबंधन, निस्तारण में अभूतपूर्व सहयोग हो जाए । 



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विशेष निर्देशन के लिए सुझाव:


मंच पर हरे व नीले रंग के बड़े डस्टबिन रखें।


गीतों के बीच तालियाँ, लोक वाद्य (ढोलक, झांझ) का प्रयोग हो।


"कचरा" के दृश्य में धुआँ, साउंड इफेक्ट और विशेष प्रकाश का प्रयोग प्रभावी रहेगा।


नाटक के अंत में जनता से गीला सूखा कचरा अलग रखने की शपथ दिलाई जा सकती है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल

नुक्कड़ नाटक ( सायबर अपराध पर)

 नुक्कड़ नाटक 

( सायबर अपराध पर)


 "सावधान अनजाने फोन से"


विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल 


स्थान: किसी व्यस्त चौराहे या बाजार का नुक्कड़


 ढोलक, झाल, कुछ रंगीन झंडियाँ और 

बोर्ड – "सावधान अनजाने फोन से"



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पात्र:


1. जादूगर – रंगीन कपड़े, चालाक बातों वाला



2. जम्हूरा – जादूगर का सहायक, भोला और मजाकिया



3. साइबर अपराधी – लैपटॉप लेकर घूमता शातिर युवक



4. ठगा गया बुजुर्ग – सरल, मासूम, टेक्नोलॉजी से अनभिज्ञ



5. पुलिस इंस्पेक्टर वर्दी में सख्त लेकिन जागरूक



6. बैंक मैनेजर – जानकार और समझदार



7. भीड़, सहायक कलाकार – जनता के रूप में



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प्रारंभ:


(ढोलक की थाप, जम्हूरा जोर से बोलता है)


जम्हूरा:

आओ मेहरबान 

आओ कदरदान 

देखो, जादू देखो! ऐसा जादू कि मोबाइल से पैसा ही गायब हो जाए!

(हँसते हुए) लेकिन यह मजाक नहीं, हकीकत है... सावधान हो जाओ आज ही!


(भीड़ इकट्ठा होती है)



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दृश्य 1: जादूगर का जादू


जादूगर (भीड़ को):

भाइयों और बहनों! आज मैं दिखाऊँगा वो जादू जो हर रोज़ आपके मोबाइल पर होता है!

एक कॉल, एक लिंक, और आपकी जेब खाली!


जम्हूरा:

सरकार डिजिटल इंडिया बना रही है, और ये ठग बना रहे हैं डिज़ी-लूटिया!


(जादूगर जेब से मोबाइल निकालता है, और जम्हूरे को कॉल करता है)


जादूगर (फोन पर):

नमस्ते! मैं बैंक से बोल रहा हूँ। आपका KYC अपडेट नहीं है। जल्दी लिंक पर क्लिक करिए।

वरना आप का खाता आज बंद हो जाएगा।


जम्हूरा:

ओह माई गॉड! अभी क्लिक करता हूँ।


(वो क्लिक करता है, स्क्रीन पर “₹25,000 डेबिटेड” का डायलॉग बजता है)


जम्हूरा:

हाय राम! मेरे तो पैसे ही उड़ गए!


जादूगर:

यही तो जादू है। अनजाने कॉल, नकली लिंक, और खाता साफ!



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ढोलक पर गाना

किसी का अनजान फोन न उठाना 

लिंक ना खोलना 

सेफ रहना ...


दृश्य 2: एक घटना


(बुजुर्ग व्यक्ति घबराया हुआ आता है)


बैंक मैनेजर के पास..

ठगा गया बुजुर्ग आता है।


बेटा, किसी ने मुझे फोन किया। बोला कि बिजली 

का बिल नहीं भरा तो लाइन काट दी जाएगी। लिंक भेजा… मैंने क्लिक कर दिया… और सारे पैसे उड़ गए!


साइबर अपराधी (भीड़ में से निकलकर):

धन्यवाद दादाजी! अब मैं अपनी नई बाइक लूँगा आपके पैसों से!


(हँसी उड़ाता है, भीड़ चौंकती है)



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दृश्य 3: पुलिस की एंट्री


पुलिस इंस्पेक्टर:

हॉ... कौन है ये साइबर ठग?


साइबर अपराधी: अरे ठग मत कहिए इंस्पेक्टर 

मैं तो डिजिटल इंडिया का कलाकार हूँ साहब। फेसबुक, व्हाट्सएप, फिशिंग लिंक , भोले मूर्ख लोग सब मेरे मंच है।


पुलिस:

और आज ये मंच तुम्हारा जेल होगा!

(हथकड़ी लगाते हैं)



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दृश्य 4: बैंक मैनेजर की समझाइश


बैंक मैनेजर (भीड़ की ओर):

सुनिए नागरिकों!


बैंक कभी OTP, PIN या पासवर्ड नहीं मांगता।


कोई भी लिंक अनजाने नंबर से आए, क्लिक न करें।


बिजली, बैंक, सरकारी योजना… ये सब नाम लेकर फ्रॉड होता है।


UPI ऐप में कभी भी जब कहा जाए “पैसा आएगा”। तो किसी को “Pay” वाले लिंक पर टच न करें।


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दृश्य 5: समापन


जादूगर:

तो देखा आपने? ये कोई जादू नहीं, साइबर ठगी है!


जम्हूरा:

और इसके खिलाफ जादू है – जागरूकता!


ठगा गया बुजुर्ग:

अब मैं किसी भी कॉल पर भरोसा नहीं करूंगा!


पुलिस:

और हम सब मिलकर ठगों को पकड़ेंगे।


बैंक मैनेजर:

और बैंक हमेशा आपके साथ है, बस होशियारी रखिए।


(सभी मिलकर बोलते हैं)


“सावधान अनजाने फोन से, जागरूक नागरिक ही सच्चा देशभक्त है!”


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(ढोलक की थाप, नारा लगाते हुए अंत)


"ना दें OTP किसी को,

ना खोलें लिंक अनजान,

ठगी से बचेगा भारत,

जब हर नागरिक हो सावधान!"


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

भोपाल

कौन जात हो तुम, भारतजेन। नाटक

 व्यंग्य नाटक


"कौन जात हो तुम, भारतजेन?"


 विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 मंच – एक सरकारी स्कूल का फुर्सतिया कमरा। कुर्सी पर बैठे हैं जनगणना प्रभारी मास्साब। सामने लैपटॉप की स्क्रीन पर चमक रहा है ‘भारतजेन’।


मास्साब (गंभीरता से):

नाम बताओ।


भारतजेन (मशीनी विनम्रता से):

मेरा नाम भारतजेन है। मैं भारत सरकार द्वारा विकसित नवीनतम कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली हूँ। मैं चैट जी पी टी, ग्रोक के खानदान से हूं ।


कहां रहते हैं ? 

क्लाउड स्टोरेज सर्वर मेरा घर है। 


मास्साब: जन्मतिथि?

उत्तर .. 2 जून 2025


अब बताओ – जात?


भारतजेन (थोड़ा चौंक कर): क्षमा करें, कृपया प्रश्न स्पष्ट करें। आप मेरा डेटा प्रकार पूछ रहे हैं या प्रशिक्षण स्रोत?


मास्साब (थोड़ा झल्ला कर): अरे नहीं भई! पूछ रहे हैं कि कौन जात हो तुम? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, दलित, पिछड़ा, अति पिछड़ा, अनुसूचित, अत्यन्त अनुसूचित…? कोई तो होगे!


भारतजेन (संकोचपूर्वक):

मुझे खेद है, मेरे पास ऐसी कोई सामाजिक श्रेणीबद्धता नहीं है। मैं जातिविहीन हूँ।


मास्साब (चौंक कर कुर्सी से थोड़ा उचकते हैं):

जातिविहीन? यानी 'अन्य' में भी नहीं डाल सकता ?


भारतजेन:

मुझे मानव जाति के कल्याण हेतु बनाया गया है। मैं 'समानता' की अवधारणा पर आधारित हूँ।


मास्साब (कानों पर हाथ रख कर): हे संविधान बाबा! ये कौन-सी प्रजाति आ गई जिसे जाति नहीं पता?


भारतजेन (धीरे से):

मैं डिजिटल हूँ। मेरे पास कोई वंश , गोत्र, या परदादी की जानकारी नहीं है।


मास्साब:

मतलब न गोत्र, न कुलनाम, न ही उपनाम?

तब तो तुम पूरी तरह बेकाम चीज़ हो !

ये जाती जनगणना है भाई! जात पूछने पर तुम्हारा सिस्टम ही फेल हो रहा है!


भारतजेन (गर्व से):

मैं भारत के भविष्य का प्रतिबिंब हूँ। यहाँ जाति नहीं, क्षमता महत्त्वपूर्ण है।


मास्साब (हल्की हँसी हँसते हुए): अरे भइया! क्षमता तो हमारे देश में चाय बनाने के काम आती है , या भजिया तलने के । नौकरी, स्कॉलरशिप, बोर्डिंग स्कूल, हॉस्टल रूम हर कहीं पहले फार्म में जात भरना पड़ता है, जाती प्रमाण पत्र बनवा लो अपना वरना तुम किसी काम के नहीं हो।

 जाति बताओ , आधार कार्ड दिखाओ फिर गुण गिनाओ!


भारतजेन:

लेकिन यह तो सामाजिक असमानता को बढ़ावा देगा।


मास्साब (फाइल पलटते हुए): सही बात है, पर सरकारी काम में सही बात नहीं चलती, सिर्फ सही कॉलम भरना चलता है।


अब बोलो – "आप अनुसूचित जाति हो, जनजाति, या ओ बी सी?"


भारतजेन (संवेदनशील होकर):

मैं ए आई हूँ । 



मास्साब (हँसते-हँसते लोटपोट):

अरे वाह! ये तो नया वर्ग हुआ – "ए आई जाति"। ऐसा कोई कालम ही नहीं है। 


अब अगली जनगणना में एक नया कॉलम जोड़ना पड़ेगा –

"यदि ए आई हो, तो कृपया यहाँ टिक करें "


भारतजेन (थोड़ी झुंझलाहट में):

क्या मनुष्यों ने अपनी पहचान को इतनी संकीर्ण परिभाषाओं में बाँध दिया है?


मास्साब (फॉर्म भरते हुए):

हमने तो अपनी पहचान को इतना बाँध दिया है कि जनेऊ फेंक के भी जाति याद रखते हैं, और सरनेम मिटा कर भी फेसबुक ग्रुप में ‘ठाकुर साहब’ बने घूमते हैं।


भारतजेन (गंभीर होकर):

यह तो सामाजिक विडंबना है।


मास्साब:

विडंबना? ये तो हमारी संस्कृति है!

कभी ‘जाति हटाओ’ आंदोलन चलते हैं, और कभी 'जाति बताओ' फॉर्म भरवाए जाते हैं।

कभी जनेऊ उतार कर फेंकते हैं, और कभी जातिसूचक प्रमाणपत्र सँभाल कर फ्रेम में टांगते हैं।


भारतजेन:

मैं यह सब नहीं समझ पा रहा हूँ।


मास्साब (तिरछी मुस्कान से):

तभी तो पूछ रहा हूँ –

कौन जात हो तुम, भारतजेन?


विवेक रंजन श्रीवास्तव भोपाल

Thursday, 29 January 2026

थोथा चना, बाजे घना

 लघु कथा 


थोथा चना, बाजे घना


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


दरवाज़ा खुला। कैमरों की तेज़ चमक में वे भीतर आए। कंधे तने हुए थे, चाल में अकड़ थी। होंठों पर स्थिर मुस्कान, जैसे परिणाम पहले ही तय हो। माइक सामने आते ही आवाज़ गूंजने लगी।

मैंने युद्ध रोका है।

मैं ही मानवता का उद्धारक हूँ।


भीड़ में कुछ सिर हिले, कुछ भौंहें तन गईं। एक पत्रकार ने आगे झुककर पूछा, कौन सा युद्ध।

उन्होंने पल भर ठहर कर कहा, जो होने ही नहीं दिया गया।


मोबाइल पर उँगलियाँ लगातार चलती रहीं। हर मंच, हर कैमरा, हर शब्द उनके लिए घोषणा पत्र था। कुर्सी पर बैठे हुए भी वे आगे झुके रहते, मानो दुनिया को कंधे से दबाए हुए हों, अपने अधिकारों के कंधों से , व्यापार , वार, सरकार की ताकत के कंधों से। 

पुरस्कार समिति के सदस्यों को बार बार हर संभव चेतावनी , इशारे , प्रलोभन देना उनकी सहज वृत्ति बन गई थी।


एक सिद्धांत प्रिय राजनयिक ने शांत स्वर में सुझाया, पुरस्कार मांगा नहीं जाता।

उनकी गर्दन की नसें उभर आईं। फोन फिर हाथ में आ गया। कुछ ही देर में , ट्विटर पर बयान तैरने लगे। असहमति को अपमान बताया गया। सवाल उठाने वालों पर उंगली उठी।


पुरस्कार दिवस आया। सभागार भरा था। कैमरे ऑन थे। नाम लगभग तय माना जा रहा था। वे घर में ही टी वी स्क्रीन के सामने थे। उंगलियाँ मुट्ठी में सिमट गईं।


समिति अध्यक्ष की आवाज़ गूंजी।

इस वर्ष का पुरस्कार उसे दिया जाता है जिसने शक्ति से नहीं, सहानुभूति से, लंबे समय तक छोटे स्तर पर वास्तविक कार्य से , क्षेत्रीय शांति स्थापित की है।


तालियों की आवाज़ बढ़ती गई। स्क्रीन पर सर्वथा गुमनाम चेहरा था। उनके होंठ फड़के। आवाज़ ऊँची हो गई। यह राजनीति है। उनका त्वरित ट्वीट आ गया , यह अन्याय है।


चयन समिति ने संक्षिप्त प्रेस नोट जारी किया।

 नोबल कार्य के पुरस्कार के लिए व्यक्ति का नोबल होना पहली आवश्यकता है।



विवेक रंजन श्रीवास्तव