Tuesday, 30 December 2025

बीती ताहि बिसार दे

 लघुकथा

बीती ताहि बिसार दे 


विवेक रंजन श्रीवास्तव


     गगन स्टेशन की बेंच पर बैठा था। हाथ में लिफ़ाफ़ा था , जिसे खोल कर अब तक वह जाने कितनी बार पढ़ चुका था, उसे स्वयं भी याद नहीं । राधा उसे छोड़ अपने पिता की पसंद के लड़के से विवाह कर बिदा हो चुकी थी । विवाह की रस्मों के बीच किसी तरह वह गगन के हाथों में यह लिफ़ाफ़ा थमा कर , अपना लंहगा संभालते हुए तेज कदमों से बिना पीछे देखे चली गई थी ।


 तब से राधा का यह आख़िरी पत्र संभाले , गगन मायूस , बिलकुल अकेला रह गया था। गगन ने जैसे जीवन की रफ़्तार ही रोक दी थी । दोस्तों से दूरी बना ली, और अतीत के साये में खोया रहता था।


आज अचानक स्टेशन पर बैठा , जब वह गुमसुम राधा का पत्र अलट पलट रहा था, उसकी निगाह पीछे वेटिंग रूम में लगी एक बड़ी सी सीनरी पर जा टिकी । 


उसने गौर से चित्र को देखा ,उस पेंटिंग में सूरज उग रहा था, पेड़ों से रोशनी छन रही थी, और घुमावदार सड़क पर एक व्यक्ति रोशनी की ओर कदम बढ़ाए हुए था । पीछे कुछ पत्ते गिरे पड़े हुए थे।


    गगन ने मन ही मन एक निर्णय लिया। लिफ़ाफ़ा देखा, फिर उसे स्टेशन के कूड़ेदान में डाल दिया , वह प्लेटफार्म से बाहर आ गया। वह समझ चुका था, जीवन अब भी आगे बढ़ना चाहता है। राधा भी तो शायद यही चाहती थी।    


वह पूरब की दिशा में चल पड़ा था। अपने बालों को सँवार, गगन ने खुद से कहा..

“बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले।” और तेज कदमों से नई ऊर्जा के साथ वह ऑफिस की तरफ बढ़ चला । 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

Monday, 29 December 2025

ऐतिहासिक बलिदान की स्मृति एवं समकालीन प्रासंगिकता

 ऐतिहासिक बलिदान की स्मृति एवं समकालीन प्रासंगिकता


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


भारतीय इतिहास एवं राष्ट्रीय स्मृति में 26 दिसंबर की तिथि एक ऐसे बलिदान की गवाह है, जिसे अब वीर बाल दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। यह दिवस सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी के दो नन्हें साहिबजादों , साहिबजादा जोरावर सिंह (लगभग 9 वर्ष) और साहिबजादा फतेह सिंह (लगभग 6 वर्ष) की अद्वितीय शहादत को समर्पित है। उनका बलिदान केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि धार्मिक स्वतंत्रता, अटल साहस और नैतिक दृढ़ता के मूल्यों का  स्थायी प्रतीक है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही अक्षुण्ण है।


वीर बाल दिवस की ऐतिहासिक जड़ें 17वीं शताब्दी के उस संघर्षपूर्ण दौर में हैं, जब गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा स्थापित खालसा पंथ मुगल सत्ता के अत्याचारों का प्रतिरोध कर रहा था। वर्ष 1705 में, आनंदपुर साहिब से निकलते समय गुरु परिवार बिछड़ गया। दोनों छोटे साहिबजादे अपनी दादी माता गुजरी के साथ विश्वासघाती सेवक गंगू द्वारा पकड़वा दिए गए और सरहिंद के नवाब वजीर खान के हवाले कर दिए गए। नवाब ने उन पर जबरन धर्म परिवर्तन का भारी दबाव डाला, परंतु इतनी छोटी आयु में भी उन बालकों ने किसी भी प्रलोभन या भय के आगे झुकने से स्पष्ट इनकार कर दिया। उनकी इस अडिग नैतिक दृढ़ता से क्रोधित होकर, नवाब वजीर खान ने 26 दिसंबर, 1705 को दोनों नन्हें साहिबजादों को जीवित दीवार में चिनवा देने का आदेश दिया, जिससे उन्होंने धर्म एवं सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया। 

इस घटना ने भारत के इतिहास में आस्था और साहस की एक अमिट वीर गाथा लिख दी।


इस ऐतिहासिक बलिदान को राष्ट्रीय स्मृति का एक अभिन्न अंग बनाने की दिशा में सदियों बाद , एक महत्वपूर्ण कदम 9 जनवरी, 2022 को उठाया गया। गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रकाश पर्व के शुभ अवसर पर, प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि 26 दिसंबर का दिन अब ‘वीर बाल दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा। इस घोषणा का उद्देश्य सिर्फ अतीत को याद करना नहीं, बल्कि साहिबजादों के अद्वितीय साहस और बलिदान के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करना था। इस प्रकार, एक गहन ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्मृति को एक व्यापक राष्ट्रीय संदर्भ प्रदान किया गया, जो भारत की सामूहिक ऐतिहासिक चेतना का हिस्सा बन गया। इस निर्णय में राजनीति भी ढूंढने की कोशिश हुई ,  पर वीर बालकों की शहादत को जो महत्व आजादी के तुरंत बाद दिया जाना चाहिए था , वह अंततोगत्वा अब दिया जा रहा है।


वीर बाल दिवस की समकालीन प्रासंगिकता इसके उत्सव के स्वरूप में स्पष्ट झलकती है, जो केवल शोक या स्मरण तक सीमित नहीं है, बल्कि एक सक्रिय, भविष्योन्मुखी एवं प्रेरक आयोजन है। इस दिन का केंद्रीय आयोजन महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा किया जाता है, जिसमें प्रधानमंत्री स्वयं भाग लेते हैं एवं देशवासियों, विशेषकर युवाओं को संबोधित करते हैं। इस अवसर पर प्रदान किया जाने वाला ‘प्रधानमंत्री राष्ट्रीय बाल पुरस्कार’ (PMRBP) ऐतिहासिक बलिदान और समकालीन उपलब्धि के बीच एक सार्थक सेतु का काम करता है। भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाने वाला यह प्रतिष्ठित पुरस्कार, 5 से 18 वर्ष की आयु के उन बच्चों को दिया जाता है, जिन्होंने वीरता, खेल, समाज सेवा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण तथा कला एवं संस्कृति जैसे विविध क्षेत्रों में असाधारण उपलब्धि हासिल की है। यह पुरस्कार इस सिद्धांत को मूर्त रूप देता है कि साहस एवं उत्कृष्टता की कोई आयु नहीं होती।


देशभर में इस दिन का स्मरण एक जीवंत एवं सहभागी अनुभव बनता है। स्कूलों, कॉलेजों एवं शैक्षणिक संस्थानों में निबंध लेखन, वाद-विवाद, क्विज़, कहानी सुनाने, पोस्टर निर्माण और सांस्कृतिक प्रदर्शन जैसी अनेक गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं। गुरुद्वारों में विशेष प्रार्थनाएँ, कीर्तन एवं शहादत की कथाओं का आयोजन होता है। इन सभी आयोजनों का केंद्रीय लक्ष्य केवल इतिहास का पाठ नहीं, बल्कि ऐतिहासिक बलिदान को समकालीन नागरिक मूल्यों, जैसे निडरता, नैतिक बल, कर्तव्यनिष्ठा एवं धार्मिक सहिष्णुता, से जोड़ना है। इस प्रकार, वीर बाल दिवस अतीत की गाथा को वर्तमान की प्रेरणा में रूपांतरित कर देता है।


वीर बाल दिवस भारतीय इतिहास चेतना की उस गहरी परत को उद्घाटित करता है, जहाँ बलिदान राष्ट्र निर्माण की एक मूलभूत इकाई बन जाता है। साहिबजादा जोरावर सिंह और फतेह सिंह का बलिदान उन मानवीय मूल्यों का प्रतीक है, जो किसी भी युग में अपनी प्रासंगिकता नहीं खोते। 2022 में इसकी आधिकारिक घोषणा ने इस कथा को एक राष्ट्रीय संवाद का विषय बना दिया। आज, यह दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि सिद्धांतों के प्रति निष्ठा, अन्याय के प्रति प्रतिरोध और धर्म के प्रति अटल आस्था की भावना ही किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति होती है। साथ ही, यह दिवस भविष्य के निर्माण में युवा शक्ति के महत्व को रेखांकित कर, एक प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण के संकल्प का भी द्योतक है। इस अर्थ में, वीर बाल दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि एक सजग चेतना का नाम है, जो अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान को गढ़ने तथा भविष्य का मार्ग प्रशस्त करने का संकल्प दोहराता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क

Wednesday, 24 December 2025

पुस्तक चर्चा “जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें”

 पुस्तक चर्चा 



डॉ. कमल किशोर दुबे की अभिनव कृति

 “जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें” 


चर्चा विवेक रंजन श्रीवास्तव 


यह किताब मूलतः ,जीवन की गरिमा का पुनः स्मरण कराती हुई ऐसी कृति है, जो व्यक्ति को भीतर से बदलकर उसके जीवन को उद्देश्यपूर्ण और साधनामय बनाने की प्रेरणा देती है। इसमें विद्यार्थी जीवन से वृद्धावस्था तक जीवन यात्रा के हर पड़ाव पर  लेखक ने व्यक्तित्व विकास हेतु आवश्यक आयामों को छोटे छोटे, ,  सारगर्भित आलेखों के माध्यम से उद्घाटित किया है।


जीवन की श्रेष्ठता , केवल सुविधाओं से नहीं, संस्कारों से होती है।

प्राक्कथन में ही लेखक स्पष्ट करते हैं कि मानव जीवन की श्रेष्ठता केवल भौतिक उपलब्धियों, वैभव और ऐश्वर्य से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, मानवता, प्रेम, सेवा, सद्भाव और परोपकार जैसे उच्च शाश्वत मूल्यों के  से बनती है। सनातन दृष्टि से मनुष्य योनि को “देवताओं को भी दुर्लभ” बताकर यह रेखांकित किया गया है कि मानव जीवन कर्म योनि है, जहाँ मनुष्य अपने पुरुषार्थ से जीवन को ईश्वरीय उद्देश्य की ओर मोड़ सकता है।लेखक बार-बार इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि मनुष्य की सच्ची पूँजी उसका आंतरिक संस्कार, उसकी संवेदना और उसकी कर्मशीलता है, न कि केवल स्थिति, पद या बैंक में जमा पूंजी ।

 पुस्तक का केंद्रीय स्वर यह है कि जीवन तभी वास्तव में श्रेष्ठ है, जब वह किसी उच्च उद्देश्य के साथ जिया जाए और उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए व्यक्ति स्वयं को लगातार ढालता और परिष्कृत करता रहे।लेखक के अनुसार, अपने भीतर की कमियों, दुष्प्रवृत्तियों और दुर्बलताओं की पहचान करके उन्हें रूपांतरित करना ही आत्म विकास का वास्तविक प्रारंभ है।


पहला आलेख “सुयोग्य विद्यार्थी कैसे बनें?” इस कृति का स्वर और दिशा दोनों निर्धारित करता है।यहाँ शिक्षा को केवल डिग्री और रोज़गार का साधन न मानकर, चरित्र निर्माण और संस्कार संवर्धन की प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया गया है।लेखक प्राचीन गुरुकुल प्रणाली का उदाहरण देते हैं, जहाँ श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे अवतार भी वशिष्ठ और सांदीपनि जैसे गुरुओं के आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण करते हैं, ताकि यह स्पष्ट हो कि ज्ञान के साथ विनय, स्वावलंबन, प्रेम, करुणा और सामाजिक सद्भाव अनिवार्य अंग हैं। यद्यपि ये आदर्श स्थितियां सामाजिक ताने बाने में आज व्यवहारिक नहीं लगती । लेखक आधुनिक शिक्षा संस्थानों में प्रतियोगिता, वैभव प्रदर्शन और धन केंद्रित दृष्टिकोण की आलोचना करते हैं, जो विनय, दया, त्याग और करुणा जैसे गुणों को पीछे छोड़ देता है।

रामचरितमानस की यह पंक्ति “बरसहिं जलद भूमि नियराये। जथा नवहिं बुध विद्या पाये।”  उद्धृत करके वे बताते हैं कि जिस प्रकार बादल पृथ्वी के समीप आकर बरसते हैं, उसी प्रकार सच्चा विद्वान जितना अधिक ज्ञान पाता है, उतना ही विनम्र होता जाता है।इस तरह पुस्तक में विद्या और विनय के संबंध को विद्यार्थी जीवन के आदर्श स्वरूप का केंद्रीय सूत्र माना गया है।


“विचार संयम या सकारात्मक सोच!” शीर्षक आलेख पुस्तक के वैचारिक ढाँचे का मेरुदंड है। यहाँ महाभारत के वनपर्व से उद्धृत श्लोक के माध्यम से बताया गया है कि वेदों का सार “सत्य” और सत्य का सार “दम” अर्थात् संयम है; और वही संयम “त्याग” के रूप में सज्जनों के आचरण में प्रकट होता है।लेखक विचार संयम को इन्द्रिय संयम की मानसिक अवस्था बताते हैं । इसे आधुनिक भाषा में “पॉज़िटिव थिंकिंग” का भारतीय रूपक कह सकते हैं।


वे विचार-संयम को दो भागों में बाँटते हैं—  

विचार निग्रह: बिखरे हुए विचारों को समेटकर एक दिशा में लगा देना, जिसे वे सकारात्मक सोच का व्यावहारिक रूप बताते हैं। 

 निकृष्ट चिंतन से मुक्त होना: कुविचारों को हटाकर सद्विचारों में नियोजन करना, ताकि मनोभूमि में श्रेष्ठ वैचारिक बीज बोए जा सकें।


लेखक अत्यंत सहज उदाहरण से कहते हैं कि जैसे किसान जोते हुए खेत में उत्तम बीज बोकर उत्कृष्ट फसल पाता है, वैसे ही मनुष्य यदि प्रत्येक दिन आत्मचिंतन के लिए समय निकालकर आलस्य, आवेश, कटुभाषण, निराशा और कायरता जैसी प्रवृत्तियों की समीक्षा करे और उनके प्रतिपक्षी सद्गुणों को स्थापित करने का पुरुषार्थ करे, तो उसका व्यक्तित्व स्वतः उज्ज्वल होने लगेगा।

 इस क्रम में स्वाध्याय, सत्संग और चिंतन मनन को विचार संयम के व्यावहारिक साधन के रूप में रेखांकित किया गया है।


पुस्तक के कई आलेखों का केन्द्रीय विषय आत्मविश्वास और पुरुषार्थ है “आत्मविश्वास सफलता का प्रथम सोपान”, “सफलता का पर्याय , दृढ़-आत्मविश्वास”, “सफलता की सही कसौटी .. पुरुषार्थ” आदि।गीता के प्रसिद्ध श्लोक “उद्धरेदात्मनात्मानं…” को आधार बनाकर लेखक यह प्रतिपादित करते हैं कि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु । इसलिए उसे अपने उद्धार की जिम्मेदारी किसी बाहरी सहारे पर नहीं, अपने आत्मबल पर रखनी चाहिए।


इन आलेखों में दो महत्त्वपूर्ण बिंदु उभरकर सामने आते हैं—  

आत्मविश्वास केवल बाहरी प्रशंसा से नहीं, आत्म मूल्यांकन और अपने ध्येय के प्रति दृढ़ निष्ठा से जन्म लेता है।

सफलता की सही कसौटी परिणाम नहीं, बल्कि ईमानदार पुरुषार्थ और सतत परिश्रम है।  विरासत या अनैतिक साधनों से प्राप्त वैभव को लेखक नैतिक दृष्टि से “असफलता” तक कहने में संकोच नहीं करते।


“सफलता के लिए जीवन में संतुलन बनाएँ” आलेख में ऋतु-परिवर्तन और झूले का उदाहरण देकर लेखक बताते हैं कि जीवन में सुख दुःख, लाभ हानि, अनुकूल प्रतिकूल स्थितियाँ स्वाभाविक उतार चढ़ाव हैं, जिनका संतुलित विवेक से स्वागत करना ही मानसिक स्वास्थ्य का आधार है। यहाँ वे “कमल के पत्ते” की उपमा देते हैं, जो जल में रहते हुए भी उससे ऊपर रहते हैं ।  ठीक वैसे ही जीवन के मध्य में रहते हुए व्यक्ति को भीतर से निर्लिप्त और साक्षीभाव अपनाकर हर्ष और विषाद दोनों को समभाव से ग्रहण करना सीखना चाहिए।


“आशा और उत्साह मनुष्य जीवन के मुख्य सम्बल” तथा “प्रसन्न रहना अथवा उद्विग्न होना, हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर” जैसे आलेख जीवन की भावनात्मक बुनियाद पर  हैं। लेखक आशा को भविष्य की बेहतर संभावना की ऊर्जा और उत्साह को उसे साकार करने का जीवंत संबल बताते हैं, जो व्यक्ति को विषमता, अवसाद और शोक से उबारकर संघर्ष की राह पर सक्षम बनाता है। इतिहास और युद्धभूमि के संदर्भों के माध्यम से यह विचार सामने आता है कि कई बार औषधियों से अधिक आशा ही रोगी के लिए जीवनदायी सिद्ध होती है और निराशा तिनके जैसी समस्या को भी पर्वत बना देती है।


दृष्टिकोण की चर्चा में “गरीबी अमीरी” को सापेक्ष  बताते हुए लेखक संकेत करते हैं कि तुलना का मानक बदलते ही हमारी संतुष्टि या असंतोष की भावना बदल जाती है। यदि हम सदैव अपने से अधिक संपन्न व्यक्ति से तुलना करेंगे, तो स्वयं को दरिद्र महसूस करेंगे; वहीं अपने से कम सुविधा युक्त लोगों को देखकर कृतज्ञता का भाव आएगा। इस प्रकार पुस्तक यह बताती है कि प्रसन्नता बाहरी स्थिति से अधिक, अंदरूनी दृष्टिकोण  है।


“अपने व्यक्तित्व और जीवन को उत्कृष्ट कैसे बनायें?” पुस्तक का एक केंद्रीय और दार्शनिक आलेख है, जिसमें लेखक आस्था, श्रद्धा, स्वभाव, गुण और कर्म के परस्पर संबंध को व्यवस्थित ढंग से स्पष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि व्यक्तित्व का ढाँचा “अंतरात्मा” में जमी आस्थाओं पर निर्भर है ,  वहीं से चिंतन को दिशा मिलती है, और धीरे-धीरे आदतें, स्वभाव और व्यवहार बनते जाते हैं। सुख दुःख, प्रसन्नता उद्विग्नता को वे परिस्थितियों की नहीं, मनःस्थिति की उपज मानते हैं। ठीक वैसे ही जैसे ऋतुएँ बाहरी हैं, पर हमें कैसा महसूस होगा, यह हमारे शरीर और हमारी तैयारी पर निर्भर करता है।


यहाँ लेखक परिष्कार की संभावना पर भी स्पष्ट हैं,  यदि व्यक्ति में भीतर से बदलने की तीव्र आकांक्षा और संकल्प-शक्ति हो, तो वह अपने स्वभाव और कर्म पद्धति को पुनः गढ़ सकता है। “समुद्र की गहराई से मोती” निकालने की उपमा देकर वे बताते हैं कि जीवन रूपी समुद्र में उतरने के लिए बाहरी यंत्रों से अधिक धैर्य, साहस और सतत प्रयास की आवश्यकता है। प्रबल संकल्प, धैर्य और साहस के संघटन को वे सफल व्यक्तित्व निर्माण की त्रिधारा के रूप में स्थापित करते हैं।


कर्म-सिद्धांत पर लिखे गए “कर्म प्रधान विश्व करि राखा” और “कर्मदेव का सम्मान करें” जैसे आलेख पुस्तक को एक स्पष्ट नैतिक आधार प्रदान करते हैं। तुलसीदास की चौपाई “कर्म प्रधान विश्व करि राखा…” के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि संसार में सब कुछ उपलब्ध है, पर कर्महीन व्यक्ति को कुछ नहीं मिलता, और पाप पुण्य दोनों का प्रतिफल तात्कालिक रूप से मनःस्थिति और जीवनानुभव में झलकने लगता है। लेखक सरकारी न्याय व्यवस्था की धीमी फाइलों का व्यंग्यात्मक उदाहरण देकर यह संकेत करते हैं कि ईश्वर की व्यवस्थाएँ “उधारी” पर नहीं चलतीं।  ईर्ष्या, द्वेष, झूठ और अभिमान व्यक्ति को तत्काल “नारकीय” अनुभव में धकेल देते हैं, जबकि स्नेह, करुणा और दया उसे  “स्वर्ग ” जैसा आंतरिक सुख प्रदान करते हैं।


कुल मिलाकर, “जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनायें” एक ऐसी कृति के रूप में सामने आती है जो भारतीय अध्यात्म, वेद, गीता,रामचरितमानस और गायत्री विचारधारा से सार लेकर आधुनिक भाषा एवं शैली में व्यक्तित्व विकास की एक समन्वित जीवन पद्धति प्रस्तुत करती है।

यह केवल ‘क्या करें’ वाली नसीहतनुमा पुस्तक नहीं, बल्कि उदाहरणों, शास्त्रीय संदर्भों और चिंतनशील व्याख्याओं के माध्यम से पाठक को आत्म-संशोधन, सकारात्मक सोच, कर्मठता और प्रेमपूर्ण मनुष्यता की ओर प्रवाहित करने वाला तार्किक प्रवाही निबंध संग्रह है, जो सचमुच “मनुष्य जीवन की श्रेष्ठता का दस्तावेज” कहे जाने योग्य है।

ये भिन्न बात है कि व्यवहार के स्तर पर इसे वर्तमान वैश्विक एक्सपोजर के साथ कितना और कैसे अपनाया जाए यह सवाल उठ खड़ा होता है, जिसके उत्तर पाठक को स्वयं ही ढूंढने होंगे ।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

Tuesday, 23 December 2025

दुनियां की सर्वाधिक लम्बी यातायात सुरंग : हॉलैंड टनल

 हडसन नदी के तल के नीचे दुनियां की सर्वाधिक लम्बी यातायात सुरंग : हॉलैंड टनल


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से 


हॉलैंड टनल हडसन नदी के नीचे मैनहैटन को न्यू जर्सी से जोड़ने वाली दुनिया की पहली यांत्रिक वेंटिलेशन वाली वाहन सुरंग है, जिसका निर्माण 1920 में शुरू हुआ था और 1927 में इसका उद्घाटन हुआ। यह न्यूयॉर्क शहर के हडसन स्क्वायर को जर्सी सिटी से जोड़ती है तथा पोर्ट अथॉरिटी ऑफ न्यूयॉर्क एंड न्यू जर्सी द्वारा संचालित है।


इतिहास

हडसन नदी पर वाहन क्रॉसिंग की योजना 1906 से चली आ रही थी, लेकिन विभिन्न चर्चाओं एवं  विवादों के बाद 1919 में टनल निर्माण पर सहमति बनी।

 मुख्य इंजीनियर क्लिफर्ड मिल्बर्न हॉलैंड के डिजाइन पर 1920 में काम शुरू हुआ, जो 1924 में उनकी मृत्यु से पूर्व तक पूरा न हो सका । 

 उनके बाद मिल्टन फ्रीमैन और ओले सिंगस्टाड ने इस परियोजना को  पूरा किया। 

 13 नवंबर 1927 को इस महत्वपूर्ण टनल मार्ग का उद्घाटन हुआ, जब यह दुनिया की सबसे लंबी जलमग्न वाहन सुरंग बनी। 


लंबाई और संरचना 

उत्तर ट्यूब (वेस्टबाउंड) की लंबाई पोर्टल्स के बीच 2,608 मीटर तथा दक्षिण ट्यूब (ईस्टबाउंड) 8,

2,551 मीटर लंबी है । 

इस तरह हॉलैंड टनल ढाई किलो मीटर से ज्यादा रिवर बेड के भीतर ,एक सदी से यातायात की सफल संरचना है ।

अप्रोच रोड्स सहित इसकी लंबाई और भी ज्यादा हो जाती है।


प्रत्येक ट्यूब का व्यास 29.5 फीट है, जिसमें 20 फीट चौड़ी दो-लेन सड़क है । टनल की ऊंचाई 12.6 फीट  है, तथा यह अधिकतम  जल स्तर से 93 फीट नीचे की अधिकतम गहराई में बनाई गई है।

 स्टील रिंग्स पर 19 इंच कंक्रीट लेप है, तथा दोनों ट्यूब्स आपस में 15 फीट की दूरी पर हैं।


वेंटिलेशन व्यवस्था ..

यह पहली सुरंग है जिसमें पार्श्विक (ट्रांसवर्स) वेंटिलेशन प्रणाली है, जिसमें चार वेंटिलेशन टावर्स (दो-दो प्रत्येक तट पर) हैं। 84 पंखे (42 इनटेक, 42 एग्जॉस्ट) हर 90 सेकंड में सुरंग की हवा बदल देते हैं, जो लगातार वाहनों की आवाजाही से होते कार्बन मोनोऑक्साइड को नियंत्रित रखते है।

 नदी में शाफ्ट्स 107 फीट ऊंचे हैं तथा आपातकालीन निकास भी प्रदान करते हैं।


परिचालन और प्रतिबंध..

यह इंटरस्टेट 78 का हिस्सा है तथा प्रतिदिन लगभग 90,000 वाहन इस टनल मार्ग से गुजरते हैं।

 पूर्व दिशा में ही टोल है, तथा हेजमैट वाले वाहन, तीन से अधिक एक्सल ट्रक तथा ट्रेलर प्रतिबंधित हैं । वाहनों की  चौड़ाई सीमा 8 फीट है।


 आपात सेवाएं पोर्ट अथॉरिटी पुलिस द्वारा दी जाती हैं।


हॉलैंड टनल का निर्माण कार्य 1920 में शुरू हुआ, जब मुख्य इंजीनियर क्लिफर्ड मिल्बर्न हॉलैंड के नेतृत्व में शील्ड मेथड (टनलिंग शील्ड) का उपयोग कर हडसन नदी के तल पर दो समांतर ट्यूबों की खुदाई की गई।इसमें कास्ट आयरन रिंग्स (प्रत्येक 14 स्टील सेगमेंट्स वाली) लगाई गईं, जिन्हें हाइड्रोलिक जैक्स से आगे धकेला गया; चट्टान में 2.5 फीट प्रतिदिन और कीचड़ में 5-6 फीट प्रति दिन की गति से खुदाई का काम चला। 1923 में कैसलस नदी में उतारे गए, और 19 इंच मोटी कंक्रीट लेयर से लेपित ट्यूब्स को 1927 तक पूरा किया गया, जिसमें वेंटिलेशन के लिए चार टावर्स भी बनाए गए।


दुनिया में अन्य नदियों के नीचे इस तरह की यातायात व्यवस्था कम ही है। चैनल टनल (इंग्लैंड-फ्रांस) सबसे लंबी रेल सुरंग है, जिसकी जलमग्न लंबाई 37.9 किमी है और यह 1988-94 में बनी है।

[नॉर्वे की राइफास्ट टनल (14.3 किमी, 293 मीटर गहराई) सबसे गहरी कार सुरंग है, जबकि बांग्लादेश की बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान टनल (3.32 किमी) दक्षिण एशिया की पहली नदी-नीचे सड़क सुरंग है।जर्मनी की एल्बे टनल (3.3 किमी, 1975) और कनाडा की जॉर्ज मैसी टनल (0.629 किमी) इमर्स्ड ट्यूब तकनीक पर आधारित सुरंग हैं।


हडसन नदी के गर्भ में छिपी हॉलैंड टनल न केवल दो महानगरीय क्षेत्रों को जोड़ती है, बल्कि इंजीनियरिंग की एक अनुपम कृति है जो सदी भर पहले से असंभव को संभव बनाती चली आ रही है। 1920 के दशक में जब न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी के बीच नदी पार करना घंटों का सफर था, तब क्लिफर्ड हॉलैंड जैसे दूरदर्शी इंजीनियरों ने इसकी कल्पना की। नदी के तल पर दो समांतर ट्यूबें खोदने का काम शुरू हुआ, जहां विशालकाय शील्ड मशीनें कीचड़ और चट्टानों से जूझतीं, हाइड्रोलिक जैक्स से स्टील रिंग्स को आगे सरकातीं। चार वर्षों की कठिन मेहनत के बाद 1927 में यह उद्घाटित हुई, दुनिया की पहली सुरंग जहां वाहनों की जहरीली गैसों को बाहर निकालने के लिए यांत्रिक वेंटिलेशन प्रणाली बनी ।


आज भी प्रतिदिन नब्बे हजार वाहन इससे गुजरते हैं, जो न्यूयॉर्क के हृदय को जर्सी सिटी से जोड़े रखते हैं। यह टनल केवल एक यातायात मार्ग नहीं, बल्कि मानव संकल्प की प्रतीक है, जहां तकनीक ने प्रकृति की बाधाओं को परास्त कर दिया। दुनिया के अन्य नदी-तले बने चमत्कारों से तुलना करें तो हॉलैंड ही अग्रणी टनल दिखती है । चैनल टनल की भव्य लंबाई या नॉर्वे की राइफास्ट की गहनता भले ही आकर्षित करें, पर हॉलैंड टनल की वेंटिलेशन क्रांति ने ही आधुनिक सुरंगों का आधार तैयार किया। बंगबंधु सुरंग दक्षिण एशिया में नया  अध्याय है, तो एल्बे की बहु-उपयोगिता प्रेरणा देती है, मगर हॉलैंड की कहानी सबसे पुरानी और प्रेरक है । एक युग की आवश्यकता ने कैसे स्थायी विरासत गढ़ी। आज जब हम इससे गुजरते हैं, तो लगता है मानो इतिहास के तकनीकी गलियारों से होकर भविष्य की ओर बढ़ रहे हों।


इंजी विवेक रंजन श्रीवास्तव 

सेवा निवृत मुख्य अभियंता सिविल

फैलो सदस्य इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स 

(आजकल न्यूयार्क में)

भारत टैक्सी ऐप

 भारत टैक्सी ऐप एक महत्वपूर्ण सहकारी , सरकारी पहल


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


भारत टैक्सी एक सरकारी पहल है जो ओला-उबर जैसे निजी ऐप्स का स्वदेशी विकल्प प्रदान करती है। यह सहकारिता मंत्रालय के तहत विकसित सहकारी मॉडल पर आधारित राइड-हेलिंग सेवा है, जो ड्राइवरों को मालिकाना हक देती है। इसका मुख्य लक्ष्य कैब चालकों को निजी कंपनियों के उच्च कमीशन से मुक्त करना है, जिसमें शून्य कमीशन मॉडल अपनाया गया है, जहां यात्रा का भुगतान सीधे ड्राइवर को जाता है।


सहकार टैक्सी कोऑपरेटिव लिमिटेड द्वारा संचालित यह प्लेटफॉर्म ड्राइवरों को शेयरधारक बनाता है, जिससे उनकी आय बढ़ेगी और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी। इसमें पारदर्शी किराया व्यवस्था है, जहां सामान्य स्थिति में कोई सर्ज प्राइसिंग नहीं होती । केवल विशेष परिस्थितियों में डायनामिक प्राइसिंग लागू हो सकती है। सुरक्षा के लिए सत्यापित ड्राइवर, दिल्ली पुलिस से एकीकरण, रीयल-टाइम ट्रैकिंग और 24x7 ग्राहक सहायता जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।


उपयोगकर्ता अनुभव को बेहतर बनाने के लिए बहुभाषी ऐप एंड्रॉयड और iOS पर उपलब्ध है, जिसमें डिजिटल बुकिंग, कार, ऑटो और बाइक विकल्प तथा UMANG और DigiLocker से एकीकरण शामिल है। दिल्ली में 1 जनवरी 2026 से औपचारिक लॉन्च होगा, जहां पहले से 50,000 से अधिक ड्राइवर रजिस्टर्ड हैं, जबकि गुजरात के राजकोट में पायलट चल रहा है। 2026 तक 20 से अधिक शहरों में विस्तार का लक्ष्य है, जो ड्राइवरों को पीएफ, ईएसआई और पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा भी प्रदान करेगा।


यात्रियों को सस्ते, स्थिर किराए और सुरक्षित राइड्स का लाभ मिलेगा, वहीं ड्राइवरों को अधिक कमाई, कम रद्दीकरण और मालिकाना भावना प्राप्त होगी। यह डिजिटल इंडिया की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा, जो निजी एकाधिकार को चुनौती देगा।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

मनरेगा की जगह जी राम जी

 मनरेगा की जगह जी राम जी 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

(सामाजिक लेखन हेतु पुरस्कार प्राप्त)


भारत के ग्रामीण विकास ढांचे में मनरेगा को लंबे समय तक सामाजिक सुरक्षा, रोजगार गारंटी और ग्राम स्तर पर आधारभूत ढांचे के निर्माण का महत्वपूर्ण कानून माना गया। लगभग दो दशकों तक मनरेगा ने ग्रामीण परिवारों को न्यूनतम मजदूरी के साथ स्थानीय स्तर पर काम उपलब्ध कराने में बड़ी भूमिका निभाई। अब केंद्र सरकार ने मनरेगा की जगह विकसित भारत– "गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)", अर्थात ‘वीबी‑जी राम जी’ योजना लागू करने का निर्णय लिया है, जिसे आम बोलचाल में जी राम जी योजना कहा जा रहा है। यह परिवर्तन केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण रोजगार ढांचे के दर्शन, वित्तीय संरचना और शासन‑तंत्र को पुनर्परिभाषित करने वाला कदम है।  

यद्यपि स्पष्ट है कि सत्ता पक्ष ने लोक व्यापी "राम" के रूप में योजना का शार्ट नाम रख कर एक अंतर्निहित भाव तथा दिशा प्रदर्शन में संकोच नहीं किया।


मनरेगा का मूल उद्देश्य ग्रामीण परिवारों की आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करना था, जिसके लिए प्रत्येक पात्र ग्रामीण परिवार को प्रति वर्ष कम से कम सौ दिन का अकुशल शारीरिक श्रम उपलब्ध कराने की कानूनी गारंटी दी गई। इस कानून की वैचारिक पृष्ठभूमि में “रोजगार एक अधिकार” और ग्रामसभा‑केंद्रित भागीदारी का विचार प्रमुख था, इसलिए काम की मांग दर्ज होते ही प्रशासन पर बाध्यकारी दायित्व बन जाता था कि वह समयबद्ध ढंग से रोजगार उपलब्ध कराए या बेरोजगारी भत्ता दे। दूसरी ओर जी राम जी योजना विकसित भारत 2047 की दृष्टि से जुड़ी है, जिसमें 125 दिन की वैधानिक रोजगार‑गारंटी के साथ रोजगार, आजीविका, ढांचागत विकास और डिजिटल निगरानी को एकीकृत करने की महत्वाकांक्षी कल्पना की गई है। यहाँ प्रमुख शब्द अधिकार से अधिक “विकास, एकीकरण और संतृप्ति” बन जाते हैं, जो परिणाम‑केंद्रित और मिशन मोड कार्यान्वयन की दिशा की ओर संकेत करते हैं।  


दोनों व्यवस्थाओं के कानूनी ढांचे पर नज़र डालें तो मनरेगा एक स्वतंत्र कानून के रूप में ग्रामीण नागरिकों को सीधा अधिकार देता था कि वे काम माँगे और न मिलने पर मुआवज़ा प्राप्त करें। इस तरह यह बजटीय सीमा से ऊपर उठकर संविधानिक‑कानूनी दायित्व जैसा स्वरूप ग्रहण कर चुका था।

 जी राम जी योजना नए विधेयक के रूप में मनरेगा को समाप्त करके 125 दिन तक की रोजगार‑गारंटी का नया ढांचा निर्मित करती है, जिसमें राज्यों के लिए कृषि‑सीज़न के दौरान कुछ अवधियों को काम‑मुक्त घोषित करने का विकल्प भी निहित है। पहली नज़र में काम के दिनों की बढ़ोतरी श्रमिकों के लिए लाभकारी दिखाई देती है, लेकिन काम की मांग और रोजगार उपलब्ध कराने के बीच बने मजबूत कानूनी संबंधों की जगह अब संसाधन, सीज़न और आवंटन जैसी बातों को महत्व दिया गया है, जिससे वास्तविक रोजगार‑उपलब्धता पर प्रश्न स्वाभाविक हैं।  


वित्तीय संरचना में भी बड़ा बदलाव दिखाई देता है। मनरेगा के अंतर्गत मजदूरी का पूरा भुगतान केंद्र सरकार वहन करती थी और सामग्री‑व्यय में केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी निश्चित अनुपात में बँटी रहती थी, जिससे योजना मूलतः केंद्र‑वित्तपोषित प्रकृति की थी और राज्यों पर अपेक्षाकृत कम आर्थिक दबाव पड़ता था। 

जी राम जी योजना के साथ यह तस्वीर बदलती है।अब इसे साझा उत्तरदायित्व वाली केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में गढ़ा गया है, जिसमें अधिकांश राज्यों के लिए खर्च का बड़ा हिस्सा साझा करना अनिवार्य होगा। इससे वित्तीय बोझ थोड़ा‑थोड़ा करके राज्यों की ओर खिसकता दिखाई देता है और यह आशंका भी उभरती है कि कमजोर वित्तीय स्थिति वाले राज्य रोजगार‑गारंटी के दायित्व को उतनी मजबूती से निभा नहीं पाएँगे, जितनी एक पूर्णतः केंद्र‑वित्तपोषित कानून की स्थिति में संभवना होती थी।  


मनरेगा की सबसे विशिष्ट विशेषता उसकी मांग‑आधारित प्रकृति थी। ग्राम पंचायत स्तर पर जैसे ही श्रमिकों द्वारा काम की मांग दर्ज होती, स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य और केंद्र तक की पूरी मशीनरी पर दायित्व बनता कि वह अतिरिक्त संसाधन जुटाकर भी उस मांग की पूर्ति करे। 

जी राम जी योजना में इसके स्थान पर वार्षिक मानक आवंटन की व्यवस्था रखी गई है, जिसके भीतर रहते हुए राज्यों को रोजगार सृजन की योजना बनानी है। यदि किसी राज्य में श्रम‑मांग आवंटित सीमा से अधिक हो जाए, तो अतिरिक्त व्यय की बड़ी ज़िम्मेदारी राज्य सरकार पर आ जाती है। इस बदलाव से योजना की अधिकार‑आधारित प्रकृति धीरे‑धीरे बजट‑आधारित दृष्टिकोण में परिवर्तित होती दिखती है, जहाँ गरीब श्रमिक के अधिकार से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि कोष में कितना धन उपलब्ध है?


ग्राम पंचायत की भूमिका के संदर्भ में मनरेगा ने ग्रामसभा और पंचायत को योजना‑निर्माण के केंद्र में रखा। गाँव के स्तर पर होने वाली खुली बैठकों में कार्यों की पहचान, प्राथमिकता और अनुमोदन होता, और कम से कम आधा व्यय ग्राम पंचायत के माध्यम से ही खर्च करना अनिवार्य था, जिससे विकेंद्रीकरण और जनभागीदारी को संस्थागत स्वरूप मिला। जी राम जी योजना में भी पंचायतें मौजूद रहेंगी, पर अब उन्हें विकास‑सूचकांकों के आधार पर श्रेणियों में बाँटा जाएगा और उनकी योजनाओं को राष्ट्रीय प्लेटफॉर्मों, जियो‑टैगिंग और डिजिटल मॉनिटरिंग की कड़ी शर्तों से जोड़ा जाएगा। इससे एक ओर पारदर्शिता और सूचनात्मक निगरानी का नया क्षितिज खुलता है, तो दूसरी ओर यह आशंका भी जन्म लेती है कि अत्यधिक केंद्रीकरण और तकनीकी‑निर्भरता कहीं ग्रामसभा‑आधारित स्वायत्तता को कमजोर न कर दे, विशेषकर वहाँ, जहाँ तकनीकी संसाधन और क्षमता अभी सीमित हैं।  


कार्य‑स्वरूप की दृष्टि से मनरेगा ने जल संरक्षण, सूखा‑रोधी उपाय, सिंचाई, पारंपरिक जल स्रोतों का नवीनीकरण, भूमि विकास और बाढ़ नियंत्रण जैसे कार्यों के माध्यम से रोजगार‑सृजन को प्राकृतिक संसाधन पुनरुत्थान से जोड़ने की कोशिश की। 

जी राम जी योजना इन कार्यों को व्यापक ग्रामीण आधारभूत ढांचे, कृषि‑संबंधित परियोजनाओं और राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे के साथ और अधिक निकटता से जोड़ना चाहती है, ताकि ग्रामीण श्रम‑शक्ति बड़े विकास‑नेटवर्क का अंग बन सके। 

यह परिवर्तन संकेत देता है कि अब केवल स्थानीय संसाधन‑संरक्षण ही नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक, कनेक्टिविटी और समग्र उत्पादकता वृद्धि भी ग्रामीण परियोजनाओं की कसौटी बनने जा रही है।  


पारदर्शिता और निगरानी के मोर्चे पर मनरेगा ने जॉब कार्ड, मस्टर रोल और सोशल ऑडिट जैसे औज़ार दिए, पर समय के साथ फर्जी जॉब कार्ड, भुगतान में देरी और भ्रष्टाचार के आरोपों से इसकी छवि को बार बार आघात पहुँचता रहा। 

जी राम जी योजना की प्रस्तावित संरचना में शुरू से ही जियो‑टैगिंग, डिजिटल मस्टर रोल और ऑनलाइन भुगतान निगरानी जैसे उपायों को अनिवार्य स्थान दिया गया है। उम्मीद यह की जा रही है कि तकनीक‑आधारित निगरानी से दुरुपयोग में कमी आएगी और गरीबों को समय पर काम व मजदूरी मिल सकेगी, लेकिन साथ ही डिजिटल विभाजन, नेटवर्क की कमी और तकनीकी कौशल के अभाव से यह खतरा भी बना रहता है कि सबसे वंचित तबके कहीं फिर से हाशिए पर न चले जाएँ। निश्चित ही भ्रष्टाचार पर तो नई सोच नियंत्रण करेगी , पर इससे प्रथम दृष्टि में रोजगार के अधिकार की बात प्रभावित होती नजर आती है। 


अंततः मनरेगा और जी राम जी योजनाओं के बीच अंतर केवल संख्या और प्रावधानों का नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास के दृष्टिकोण का भी अंतर है। एक ओर मनरेगा रोजगार को अधिकार के रूप में स्थापित कर ग्रामसभा‑केंद्रित, विकेंद्रीकृत और मांग‑आधारित मॉडल लेकर आई थी, तो दूसरी ओर जी राम जी योजना उसी ढांचे को विकसित भारत की बड़ी परियोजना से जोड़ते हुए डिजिटल, मानक आवंटन‑आधारित और साझा वित्तीय जिम्मेदारी वाले मॉडल में रूपांतरित करती दिखती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह निरंतरता और परिवर्तन का मिश्रण ग्रामीण गरीबों के वास्तविक रोजगार‑सुरक्षा और सामाजिक न्याय के सपने को कितना पोषित करता है और कहाँ‑कहाँ नई चुनौतियाँ खड़ी करता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

(सामाजिक लेखन हेतु पुरस्कार प्राप्त)

विनोद कुमार शुक्ल : एक शब्द यात्री

 विनोद कुमार शुक्ल : एक शब्द यात्री


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


हिंदी के आधुनिक कथा‑साहित्य और कविता में विनोद कुमार शुक्ल उस विरल रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं, जिसने साधारण जीवन की निस्सार दिखाई देने वाली वस्तुओं और स्थितियों में भी अद्भुत काव्यात्मक चमक और जादुई यथार्थ की आभा दिखाई । 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे विनोद कुमार शुक्ल ने लगभग पाँच दशकों से अधिक समय तक लगातार लेखन करते हुए कविता, उपन्यास, कहानी और बच्चों के लिए साहित्य की ऐसी दुनिया रची, जो हिंदी के पारंपरिक ढाँचों से बाहर निकलकर एक बिल्कुल निजी, लेकिन गहरे मानवीय संसार का सृजन करती है। 

वे शिक्षक के रूप में कृषि महाविद्यालय से जुड़े रहे इस संकोची, अल्पभाषी लेखक ने सार्वजनिक मंचों की चकाचौंध से दूर रहकर भी अपने शब्दों की शक्ति से राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक जगत में विशिष्ट प्रतिष्ठा अर्जित की। 


उनकी रचना‑यात्रा का आरंभ कविता से हुआ। पहला कविता‑संग्रह “लगभग जय हिंद” 1971 में प्रकाशित हुआ, जिसने उनके भीतर बसे राजनीतिक‑सामाजिक बोध और देशज संवेदना की अनोखी मिश्रित ध्वनियों से हमारा परिचय कराया। इसके बाद “वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह” जैसे संग्रहों ने संकेत दिया कि वे शब्दों की चलन वाली सांकेतिकता से संतुष्ट नहीं, बल्कि भाषा को एकदम नए संयोजनों में बरतने वाले कवि हैं, जो वाक्य‑विन्यास और उपमा‑संरचना दोनों को उलट‑पलट कर देखने की हिम्मत रखते हैं। बाद के वर्षों में उनकी कविताएँ “आकाश धरती को खटकता है”, “कविता से लंबी कविता” आदि संग्रहों के रूप में सामने आईं, जिनमें प्रकृति, घर‑परिवार, छोटे शहर और साधारण मनुष्यों के जीवन की सूक्ष्मतम हलचलें एक बेहद शांत, धीमी, किंतु भीतर तक उतर जाने वाली आवाज़ में दर्ज होती हैं। 


काव्य के साथ‑साथ विनोद कुमार शुक्ल का कथा‑संसार हिंदी उपन्यास और कहानी की परंपरा में एक बड़ी संरचनात्मक तब्दीली के रूप में देखा जाता है। 1979 में प्रकाशित उनका पहला उपन्यास “नौकर की कमीज़” हिंदी गद्य में एक मील का पत्थर माना जाता है, जिसे बाद में मणी कौल ने इसी नाम से फिल्म में रूपांतरित किया। एक साधारण सरकारी क्लर्क और “नौकर की कमीज़” के बहाने सत्ता, वर्ग, पहचान और आत्मसम्मान की जटिल परतें जिस शांत और लगभग सपाट लगने वाली भाषा में खुलती हैं, वह हिंदी उपन्यास की पारंपरिक कथावस्तु और शिल्प दोनों को तोड़ती दिखाई देती है। कई आलोचकों ने इसे हिंदी में उपन्यास की संरचना को बदल देने वाली कृति कहा। “खिलेगा तो देखेंगे” और “दीवार में एक खिड़की रहती थी” उनके ऐसे उपन्यास हैं, जिनमें शहर, घर, दीवार, खिड़की, पेड़, कमरा जैसी चीज़ें स्वयं पात्रों की तरह व्यवहार करती हैं। “दीवार में एक खिड़की रहती थी” को 1999 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया और इस पर नाट्य रूपांतरण भी हुआ। हाल ही इस उपन्यास पर तीस लाख की रॉयल्टी ने उन्हें एक बार फिर से साहित्य जगत में चर्चित बना दिया था।


उनका कहानी‑संसार भी उतना ही विशिष्ट और प्रयोगधर्मी है। “पेड़ पर कमरा” और “महाविद्यालय” जैसी कहानी‑कृतियों में कॉलेजों, कमरों, पेड़ों, गलियारों और मामूली‑से संवादों के भीतर छुपा हुआ अकेलापन, असुरक्षा, प्रेम, स्मृति और प्रतिरोध एक धीमी, लगभग फुसफुसाती हुई शैली में उजागर होता है। बाद के वर्षों में उन्होंने बच्चों के लिए भी लगातार लिखा । उनकी बाल‑कथाएँ और कविताएँ बचपन की कल्पना, खेल, चीज़ों से बातें करने की प्रवृत्ति और प्रकृति के साथ सरल, निर्भय संवाद को केंद्र में रखती हैं, जिनमें भाषा न तो बचकाना है, न उपदेशपूर्ण, बल्कि एक सहयात्री की तरह अभिव्यक्त होती है। उनकी कई रचनाएँ अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित हुईं। “ब्लू इज़ लाइक ब्लू” जैसे कहानी‑संग्रह और “Treasurer of Piggy Banks” जैसी कविताओं की अंग्रेज़ी पुस्तकों ने नए, युवा पाठकों की पीढ़ी तक उनकी पहुँच को बढ़ाया और उनके जादुई शब्द यथार्थ को वैश्विक पाठकीय संसार से जोड़ा। 


उपलब्धियों की दृष्टि से विनोद कुमार शुक्ल समकालीन हिंदी के सम्मानित लेखकों में गिने जाते हैं। 1999 में उपन्यास “दीवार में एक खिड़की रहती थी” के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला, जिसे आधुनिक हिंदी कथा‑साहित्य की एक क्लासिक कृति के रूप में व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त हुई। 2023 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके समग्र रचनात्मक अवदान को देखते हुए उन्हें PEN/Nabokov Award for Achievement in International Literature से सम्मानित किया गया, जिसने उनके काम को विश्व‑साहित्य के मानचित्र पर विशेष रूप से रेखांकित किया। 2024 के लिए घोषित 59वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें प्रदान किया गया। वे छत्तीसगढ़ से यह सर्वोच्च भारतीय साहित्यिक सम्मान पाने वाले पहले और हिंदी के बारहवें लेखक बने, जहाँ पुरस्कार‑निर्णायकों ने उनकी लेखनी की “सादगी, संवेदनशीलता और विशिष्ट शिल्प” को विशेष रूप से रेखांकित किया। 


दिसंबर 2025 में 89 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ हिंदी जगत ने स्वीकार किया कि यह केवल एक लेखक का जाना नहीं, बल्कि “शुक्ल‑युग” के अंत जैसा है। यह भी विचारणीय है कि उनके जैसा विद्वान जो समाज की संपत्ति माना जाना चाहिए, अपने अंतिम समय में अस्पताल में कोई खास अलग सरकारी इंपॉर्टेंस प्राप्त नहीं कर सका । कई समकालीन लेखकों ने रेखांकित किया कि उन्होंने हिंदी कविता, कहानी और उपन्यास को नए सिरे से रचते हुए उन्हें हस्तक्षेपकारी, प्रयोगधर्मी और गहरे मानवीय स्वर दिया। उनकी रचनाओं में साधारण आदमी के प्रति अटूट संवेदनशीलता, वस्तुओं और क्रियाओं को देखने का अनोखा नजरिया तथा वाक्य‑निर्माण की विशिष्ट स्थापत्य‑कला उन्हें ऐसा लेखक बनाती है, जिसकी पहचान केवल नाम से नहीं, भाषा से हो जाती है। इस अर्थ में उन्होंने हिंदी गद्य की संवेदना और शब्द‑संरचना दोनों को पुनर्निर्मित किया। इसी लिए विनोद कुमार शुक्ल भविष्य में भी इस रूप में याद किए जाएंगे कि उन्होंने हिंदी साहित्य को एक शांत, लगभग संकोची, लेकिन भीतर से बेहद तीखे और जागरूक जादुई यथार्थ की दुनिया दी, जहाँ आम आदमी की गरिमा, प्रकृति से उसका अंतरंग रिश्ता और भाषा की अनंत संभावनाएँ मिलकर शब्दों का एक नया घर बनाती हैं। 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

( लेखक पुरस्कृत वरिष्ठ स्वतंत्र आलोचक , रचनाकार हैं)

Saturday, 20 December 2025

रामचरितमानस में सीता का चरित्र आज के संदर्भ में

 रामचरितमानस में सीता का चरित्र आज के संदर्भ में 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 

A 233,ओल्ड मिनाल रेजिडेंसी, भोपाल 462023



राम चरित मानस न केवल सांस्कृतिक धरोहर है, बल्कि एक जीवंत विमर्श का केंद्र भी, जहाँ आदर्श, आलोचना और पुनर्व्याख्या के तार एक-दूसरे से गुथे हुए हैं।

सीता मिथक से मनुष्यता की नारी यात्रा की प्रतीक जीवंत पात्र हैं।

 रामचरितमानस में सीता केवल राम की अनुगामिनी या त्याग की मूर्ति नहीं, बल्कि भारतीय नारी चेतना का वह प्रतीक हैं , जो मध्यकालीन सामाजिक संरचना से निकलकर आधुनिक स्त्री विमर्श तक फैली हुई हैं। उनके चरित्र में पातिव्रत्य, धैर्य, साहस और नैतिक दृढ़ता का संयोग इतना सूक्ष्म है कि वह एक ओर पारंपरिक मूल्यों को मजबूत करता है, तो दूसरी ओर समकालीन स्त्री अधिकारों के लोकतांत्रिक प्रश्नों को जन्म भी देता है और उनके उत्तर भी बताता है। आज के परिदृश्य में, जहाँ नारी स्वायत्तता, लिंग समानता और व्यक्तिगत गरिमा प्रमुख विमर्श केंद्र हैं, सीता का चरित्र हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या सदियों पुराना आदर्श आधुनिक स्त्री के लिए प्रासंगिक है, या उसे नये परिदृश्य में पुनर्पाठ की आवश्यकता है।

रामचरितमानस में सीता का चित्रण सहज और जीवनानुभूत चरित्र है । पुष्पवाटिका से स्वयंवर, वनवास, लंका में बंदिनी से अयोध्या की रानी तक, हर कथा पक्ष में वे तुलसी की रचना में शील, विनम्रता, सेवा भाव और पति निष्ठा की पराकाष्ठा हैं। तुलसी ने उन्हें अमृतमयी बनाया, जहाँ उनकी व्याकुलता राम के धनुष भंग पर, चित्रकूट में माता पिता से मिलन पर, या लंका में रावण के भांति भांति के प्रलोभन पर भी सदैव मर्यादित रहती है। यह आदर्श मध्ययुगीन समाज के अनुरूप था, जहाँ स्त्री का सर्वोच्च धर्म पतिव्रत्य माना गया। सीता सास,ससुर, देवरों की प्रिय , कठिनाइयों में धैर्यवान गृहिणी हैं, जो कुल की मर्यादा को हमेशा सर्वोपरि रखती हैं। तुलसी का यह विन्यास सामान्य नारी को तत्कालीन समाज में ऊँचा उठाने का प्रयास था, पर उनका पुरुषों से समान अपेक्षाएँ न रखना आधुनिक आलोचना का आधार बनता रहा है। समकालीन आलोचक तुलसीदास की नारी दृष्टि को दोहरी परतों वाला मानते हैं । उज्ज्वल चरित्र (सीता, अनुसूया, तारा) के साथ ही सामान्यीकृत नकारात्मक वक्तव्य, जो पितृ सत्तात्मक पूर्वाग्रह दर्शाते हैं। सीता की अग्निपरीक्षा और वन निर्वासन लोकापवाद के नाम पर होने वाले स्त्री दमन का प्रतीक दिखता है, जहाँ निर्दोष गर्भवती सीता को राज्य के व्यापक हित में राम को त्यागना पड़ता है। यह आदर्श व्यावहारिक रूप से अप्राप्य है, जिससे वास्तविक स्त्रियाँ अपराधबोध की शिकार होती हैं । पुरुषों पर कोई समान कर्तव्य भार प्रतिपादित नहीं है ,जो लैंगिक असंतुलन पैदा करता है। वैश्विक फेमिनिस्ट व्याख्याओं में सीता को शूर्पणखा, अहिल्या जैसी स्त्रियों के साथ जोड़कर साझा पीड़ा का प्रतीक बताया गया है।

किंतु सीता केवल सहनशील नहीं हैं । लंका में रावण के वैभव प्रलोभन का कठोर अस्वीकार, अग्निपरीक्षा में आत्मविश्वास, वाल्मीकि आश्रम में पुत्र पालन और पृथ्वी प्रवेश द्वारा अंतिम विद्रोह उन्हें स्वायत्त नैतिक शक्ति बनाते हैं। यहाँ उनकी लज्जाशीलता तेजस्विता से युक्त है, जो भारतीय संस्कृति में नारी गरिमा को नया आयाम देती है। सीता को अनुगामिनी होते हुए भी राम से स्वतंत्र निर्णय लेने वाली दिखाया गया है। वनवास की मांग, रावण का विरोध ,जो मौन प्रतिरोध का रूप लेता है , महत्वपूर्ण है। शास्त्रीय संदर्भों में वे राम की अर्धांग हैं, पर आधुनिक पुनर्पाठ उन्हें शक्ति स्वरूप बनाते हैं।

आज के बाजार प्रधान, वैश्विक समाज में सीता का संयम और निष्ठा उपभोक्तावादी संबंधों के विरुद्ध नैतिक आधार देती हैं, पर अंध अनुकरण खतरनाक है। स्त्री शिक्षा, करियर और स्वतंत्रता के दौर में वे साहस, आत्मसम्मान सिखाती हैं, किंतु त्याग के मॉडल को प्रश्नांकित करने की प्रेरणा भी देती हैं। रामचरितमानस की सीता आधुनिक नारी के लिए प्रेरणादायी, और वंदनीय है, पर समानता के संदर्भ में पुनर्विचार आवश्यक है। साहित्यिक रचनाओं (नाटक, उपन्यास) में उनका पुनरुत्थान स्त्री शक्ति को मजबूत कर रहा है। पारंपरिक व्याख्या में पातिव्रत्य सर्वोच्च धर्म और त्याग की मूर्ति है, जबकि समकालीन पुनर्पाठ में यह निष्ठा के साथ स्वायत्तता सहित है। अग्निपरीक्षा के चरित्र प्रमाण से पितृसत्ता का दमन बन जाती है, और वन निर्वासन मर्यादा रक्षा से अन्याय प्रतिरोध तक पहुँचता है।


रामचरितमानस की सीता परंपरा का पुल हैं। आस्था को मजबूत करती हुईं आलोचना को आमंत्रित करती हुईं। वर्तमान में वे हमें सिखाती हैं कि ग्रंथों को कठोर सत्य न मानकर संवाद के रूप में पढ़ें, मूल्य ग्रहण करें और संरचनात्मक कमियों पर सवाल उठाएँ। यही उनकी शाश्वत प्रासंगिकता है, जो भारतीय साहित्य को जीवंत रखती है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

भोपाल

बाल कहानी रिया

 रिया और वह अदृश्य बोझ


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


रिया के घर में परीक्षाओं का मौसम एक अजीब सन्नाटा ले आता था। जहाँ दूसरे बच्चे कापियों और किताबों में खोए रहते, वहीं रिया के लिए यह समय एक अदृश्य बोझ को ढोने जैसा था। पिछली बार जब वह परीक्षा हॉल के बाहर बेहोश हो गई थी, तब से उसकी माँ की चिंताएँ उसके सिरदर्द से भी बड़ी हो गई थीं।


परीक्षा से एक रात पहले, जब रिया की माँ ने उसके कमरे में देखा, तो वह किताबों के बीच सिर दबाए बैठी थी। "माँ, मेरा सिर..." रिया की आवाज़ मोमबत्ती की लौ जैसी कांप रही थी। पिछली परीक्षा के वक्त भी ऐसा ही हुआ था। डॉक्टर ने चेकअप कर कहा था कि सब कुछ ठीक है, फिर भी यह 'बीमारी' हर परीक्षा के समय वापस आ जाती थी।


अगली सुबह, मां खुद रिया को लेकर स्कूल गईं, और स्कूल की काउंसलर मिस प्रीति से मिलीं। उन्होंने रिया को अपने कमरे में बुलाया। उनका कमरा रंग-बिरंगी किताबों और बच्चों के बनाए चित्रों से भरा हुआ था। "रिया, क्या तुमने कभी ध्यान दिया कि तुम्हारा सिरदर्द कब शुरू होता है?" मिस प्रीति ने पूछा।


रिया ने सोचा, "जब... जब मैं याद करने की कोशिश करती हूँ और शब्द मेरे दिमाग में नहीं आते।"

"और तब तुम क्या सोचती हो?"

"मैं सोचती हूँ कि कक्षा में सब मुझसे बेहतर हैं। मैं अकेली हूँ जो इतना डरती हूं।"


मिस प्रीति मुस्कुराईं। "तुम अकेली नहीं हो, रिया। तुम्हारा शरीर तुम्हारे डर को सुन रहा होता है। जब डर बड़ा हो जाता है, तो शरीर रास्ता ढूँढ़ता है और बीमार होने का बहाना बनाता है।" यह सब सुनना रिया की मम्मी को कुछ अचंभित कर रहा था। 


प्रीति मैडम ने रिया को एक सेब दिया और कहा, "इसे देखो। बाहर से तो सही दिखता है, न?" रिया ने हाँ में सिर हिलाया। "लेकिन अगर इसे बहुत जोर से पकड़ो..." मिस प्रीति ने सेब को हल्का सा दबाया, "...तो अंदर से यह टूटने लगता है। तुम्हारा डर भी ऐसा ही है। दिखता नहीं, पर अंदर से तुम पर दबाव बना रहा है।"


अगले एक हफ्ते तक, रिया और मिस प्रीति ने मिलकर काम किया। उन्होंने एक 'डर का डिब्बा' बनाया , एक छोटा सा कार्डबोर्ड बॉक्स जिसमें रिया अपनी चिंताएँ लिखकर डाल सकती थी। "जब डर कागज पर आ जाता है, तो वह तुम पर हावी नहीं रहता," मिस प्रीति ने समझाया।

सबसे कठिन सबक था साँसों का खेल। "जब लगे कि सब कुछ भूल रही हो, तो तीन गहरी साँसें लो," मिस प्रीति ने सिखाया। "पहली साँस में कहो 'मैं', दूसरी में 'यह कर सकती हूँ', और तीसरी में 'अपनी रफ़्तार से'।"

अगली परीक्षा का दिन आया। जब प्रश्न-पत्र सामने आया, तो रिया का दिल तेजी से धड़कने लगा। वही पुराना डर वापस आ रहा था। तभी उसे मिस प्रीति के सबक याद आ गए। उसने आँखें बंद कीं।


एक गहरी साँस... "मैं..."

दूसरी साँस... "यह कर सकती हूँ..."

तीसरी साँस... "अपनी रफ़्तार से..."


जब उसने आँखें खोलीं, तो डर थोड़ा कम हो चुका था। उसने पहला प्रश्न पढ़ा। वह जानती थी कि उत्तर उसके दिमाग में कहीं है, बस उसे ढूँढ़ने की जरूरत है। पहले दस मिनट कठिन थे, लेकिन धीरे धीरे शब्द कापी पर उतरने लगे।


परीक्षा समाप्त हुई तो रिया ने महसूस किया कि उसका सिर हल्का था। कोई दर्द नहीं। बाहर आकर उसने अपनी माँ को गले लगाया। "माँ, मैंने कर लिया! और मेरा सिरदर्द भी नहीं हुआ।"


उस शाम, रिया ने अपने 'डर के डिब्बे' में एक नया नोट डाला: "आज मैंने जाना कि डर मुझे नहीं, बल्कि मैं डर को नियंत्रित कर सकती हूँ।"


मिस प्रीति ने अगले दिन कक्षा में सभी बच्चों से कहा "याद रखो, परीक्षाएँ तुम्हारी काबिलियत हीननहीं मापतीं। वे यह भी देखती हैं कि तुमने क्या सीखा। और सीखना तो हर गलती के साथ नया होता है।"


रिया ने उस दिन जाना कि तैयारी किताबों से ज्यादा दिल में होती है। और सबसे बड़ी जीत नंबरों में नहीं, बल्कि उस डर पर विजय में होती है जो हमें अपने आप से दूर कर देता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयार्क

Friday, 19 December 2025

बाल कथा मन्नू ने जीता सबका मन

 बाल कहानी 


मन्नू ने जीता मन


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क 


जंगल के एक हरे-भरे कोने में मन्नू नाम का एक  बंदर रहता था। वह बहुत चंचल था। उसका मन हमेशा इधर उधर भटकता रहता, जैसे वृक्ष पर फुदकती गिलहरी हो। एक पल में वह आम के पेड़ पर होता, तो दूसरे ही पल बरगद की लटकती जड़ पकड़ लेता। जो कुछ दिखा, उसकी तरफ बिना समझे दौड़ पड़ना ,मन्नू की आदत थी।


अप्रैल का महीना आया तो जंगल में नए पके आमों की मीठी खुशबू फैली। सभी जानवरों ने तय किया था कि आम सबमें बराबर बाँटे जाएँगे। पर मन्नू का चंचल मन न माना । उसने रात में ही चुपके से  आम तोड़ डाले । अगली सुबह जब यह बात पता चली, तो सब जानवर मन्नू पर बहुत नाराज़ हुए। मन्नू को इससे बहुत दुख हुआ । उसने पेड़ के नीचे बैठे बूढ़े और समझदार  बजरंगी भालू से रोते रोते मदद माँगी।


बजरंगी ने मन्नू को समझाया, "बेटा, जो अपनी चंचल इंद्रियों पर काबू पा लेता है, वही हर मुश्किल पर जीत पाता है। तुम्हारा मन अभी तक तुम्हारे वश में नहीं है। इसे साधो।"


मन्नू ने पूछा, "पर कैसे?"


बजरंगी मुस्कुराए, "चलो, मैं तुम्हें रास्ता दिखाता हूँ।"


पहले उन्होंने मन्नू के सामने रसभरे केले रखे। "इन्हें तीन दिन सिर्फ़ देखो," बजरंगी बोले। पहला दिन बहुत कठिन था। मन्नू का मन ललचाता, लेकिन वह हिला नहीं। दूसरे दिन उसने खुद से कहा, "मैं इसे कर सकता हूँ।" तीसरे दिन तक केले देखकर भी उसका मन शांत रहा। उसने स्वाद की लालसा पर जीत पा ली थी।


फिर बजरंगी ने उसे एक निचली डाल पर बैठने को कहा। "बारिश रुकने तक यहीं रहो," उन्होंने कहा। बादल घिर आए और ठंडी बारिश होने लगी। मन्नू का मन कहने लगा, "ऊपर चलो, वहाँ सुरक्षित जगह है!" पर मन्नू बजरंगी दादा के कहे अनुसार वहीं रुका रहा, शांत और स्थिर। बारिश रुकी, तो उसे खुद लगा जैसे उसने अपनी चुलबुली आदत  पर जीत पा ली हो। बजरंगी भालू ने मन्नू की पीठ थपथपा कर उसकी प्रशंसा की , तो उसका हौसला बढ़ गया।


अंत में, बजरंगी ने उसे एक अँधेरी गुफा में रात बिताने भेजा। अंदर चमगादड़ों की अजीब सी आवाजें थीं। डर के मारे मन्नू का दिल धक-धक कर रहा था। पर उसने गहरी साँस ली और याद किया बजरंगी का कहा,  "डर तभी तक है, जब तक तुम उससे डरते हो।" वह पूरी रात वहाँ रहा। सुबह की पहली किरण के साथ ही उसका डर भी ग़ायब हो गया।


बजरंगी दादा के सबक पूरे करके मन्नू समझ गया कि जीत बाहर नहीं,  अपने भीतर से हासिल होती है।


इसके कुछ ही दिन बाद, जंगल में भयानक आग लग गई। धुआँ और चिंगारियाँ हर तरफ फैलने लगीं। सभी जानवर घबराकर इधर उधर भागने लगे। तभी मन्नू आगे बढ़ा। उसका मन अब पहले जैसा चंचल नहीं था। 

उसमें शांत और स्थिर दिमाग से विपदा से जूझने का हौसला आ गया था।


उसने तेज आवाज़ में कहा, "डरो मत! घबराने से कुछ नहीं होगा, सब मेरे पीछे आओ!" उसने हाथियों के दल से नदी से पानी लाने को कहा, गिलहरियों को छोटे जानवरों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने को कहा, और बाकी सबको रेत और  हरे पत्तों से आग रोकने को कहा। सबने मिलकर काम किया और आग पर काबू पा लिया गया।


अब मन्नू रात को आम खा जाने वाला  चंचल बंदर नहीं रहा , वह जंगल का समझदार नेता बन गया। उसने सबका मन जीत लिया था, पर मन्नू जानता था कि इसके लिए सबसे पहले उसने खुद बजरंगी भालू दादा से अपने मन पर खुद काबू करना सीखा था ।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क

प्रसिद्ध न्यूयॉर्क बॉटेनिकल गार्डन

 विश्व प्रसिद्ध न्यूयॉर्क बॉटेनिकल गार्डन की सैर 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से 


NYBG,  न्यूयॉर्क सिटी के ब्रॉन्क्स में स्थित विश्व प्रसिद्ध बॉटेनिकल गार्डन (वनस्पति उद्यान) अनुसंधान संस्थान और शिक्षा‑केंद्र है । यह विशाल पौध संग्रह, वैज्ञानिक शोध कार्यों और पर्यटकों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए पहचाना जाता है। लगभग 250 एकड़ में फैला यह उद्यान न केवल शहर की हरियाली का एक बड़ा केन्द्र है, बल्कि वैश्विक पादप विविधता के अध्ययन और संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाला संस्थान भी है।


 NYBG: स्थापना, स्वरूप और महत्व  


1891 में स्थापित NYBG को 19वीं सदी के अंत की उस वैज्ञानिक दृष्टि से प्रेरणा मिली जिसमें प्राकृतिक इतिहास, संग्रहालयों और बॉटैनिकल गार्डन्स को आधुनिक ज्ञान व्यवस्था का हिस्सा माना जा रहा था। ब्रॉन्क्स पार्क क्षेत्र के भीतर विकसित इस उद्यान को प्रारम्भ से ही शोध, शिक्षा और सार्वजनिक उद्यान अनुभव को एक साथ जोड़ने वाली संस्था के रूप में सोचा गया, जो आज तक उसकी विशिष्ट पहचान का आधार है।


NYBG को संयुक्त राज्य अमेरिका के National Historic Landmark का दर्जा प्राप्त है, जो इसकी ऐतिहासिक, स्थापत्य और वैज्ञानिक महत्ता का प्रतीक है। उद्यान में लगभग दस लाख से अधिक जीवित पौधों का संग्रह, कई थीमैटिक गार्डेन (जैसे रोज़ गार्डेन, रॉक गार्डेन, नेटिव प्लांट गार्डेन), व्यापक पेड़‑समूह और प्राकृतिक वन क्षेत्र शामिल हैं, जिनके कारण इसे “म्यूज़ियम ऑफ लिविंग प्लांट्स” कहा जाता है।


अनुसंधान और संरक्षण का केंद्र ..


NYBG केवल दर्शनीय उद्यान नहीं, बल्कि दुनिया के प्रमुख स्वतंत्र पादप अनुसंधान संस्थानों में से एक है। यहाँ 7 मिलियन से अधिक सूखे पौध नमूनों वाला हर्बेरियम, उन्नत आणविक जीवविज्ञान प्रयोगशालाएँ, व्यापक अनुसंधान पुस्तकालय और वैश्विक फील्ड प्रोजेक्ट्स की लम्बी श्रृंखला मौजूद है।


संस्थान के वैज्ञानिक , पौधों और कवकों की टैक्सोनॉमी, प्रणाली विज्ञान, जीनोमिक्स, आर्थिक वनस्पति विज्ञान और संरक्षण जीव विज्ञान जैसे विषयों पर लगातार काम करते हैं। लैटिन अमेरिका, कैरीबियन, अफ्रीका और एशिया में चलने वाले फील्ड कार्य के माध्यम से नई प्रजातियाँ दर्ज की जाती हैं, वनस्पति वितरण और पारिस्थितिक तंत्रों के स्वास्थ्य का अध्ययन किया जाता है, तथा संरक्षित क्षेत्रों और समुदाय आधारित संरक्षण के लिए वैज्ञानिक सलाह दी जाती है।


 शिक्षा, प्रकाशन और जन जागरूकता  


NYBG स्कूल से लेकर डॉक्टरेट स्तर तक शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करता है, जिनमें पौध विज्ञान, संरक्षण, उद्यान विद्या और पर्यावरण शिक्षा के विविध पाठ्यक्रम शामिल हैं। परिसर में स्थित NYBG Press “Flora Neotropica Monographs”, “Memoirs of the New York Botanical Garden” और “Advances in Economic Botany” जैसी प्रकाशन श्रृंखलाओं के माध्यम से उच्चस्तरीय विद्वत्तापूर्ण साहित्य प्रकाशित करती है, जो वैश्विक वनस्पति विज्ञान समुदाय के लिए दुनिया भर में मानक संदर्भ का काम करता है।


साथ ही, उद्यान आम दर्शकों के लिए प्रदर्शनी, वर्कशॉप, परिवार उन्मुख कार्यक्रम और मौसम के अनुरूप आयोजनों के ज़रिए पर्यावरण और पौध संरक्षण के प्रति जन सामान्य में संवेदनशीलता विकसित करने की कोशिश करता है।


 इन्हीं सांस्कृतिक कार्यक्रमों में से सर्दियों के मौसम से जुड़ा हॉलीडे ट्रेन शो एक विशेष आकर्षण बन गया है, जिसके साथ रात्रिकालीन गतिविधियाँ भी जोड़ी गई हैं।


सर्दियों का परिदृश्य: खुले उद्यान से भीतर के ग्रीन हाउस में कन्सर्वेटरी तक  


न्यूयॉर्क की सर्दियों में तापमान अक्सर शून्य के आसपास या उससे नीचे चला जाता है, जिससे बाहरी उद्यानों में पुष्प सौंदर्य और हरियाली का अनुभव नगण्य हो जाता है। ऐसे मौसम में NYBG का बड़ा भाग दर्शकों के लिए खुला तो रहता है, लेकिन मुख्य दृश्य आकर्षण का केन्द्र

  विशाल काँच घर ,  परिसर बन जाता है, जहाँ नियंत्रित गरम वातावरण में उष्ण कटिबंधीय, रेगिस्तानी और अन्य पौध संग्रह संरक्षित रहते हैं। जो दर्शकों को आकर्षित करते हैं।


इसी कन्सर्वेटरी में हर साल छुट्टियों के मौसम (आमतौर पर मध्य नवंबर से मध्य जनवरी) में हॉलीडे ट्रेन शो आयोजित किया जाता है। 

इस तरह सर्दियों में जब बाहरी बाग़ में फूल कम और पेड़ नंगे नज़र आते हैं, तब भी उद्यान के भीतर यह रंगीन, रोशनी भरा और कलात्मक रूप से सजाया गया “इनडोर” संसार आगंतुकों को बांधे रखता है।


NYBG Holiday Train Show: अवधारणा और रूपाकार  


Holiday Train Show NYBG का बहुचर्चित वार्षिक प्रदर्शनी कार्यक्रम है, जिसमें मिनी मॉडल ट्रेनों और वनस्पति सामग्री से बनी न्यूयॉर्क सिटी की लघु प्रतिकृतियों का अद्भुत संयोजन प्रस्तुत किया जाता है।

 शो में लगभग आधे मील से अधिक लम्बाई वाले नन्हें ट्रैक पर कई मॉडल ट्रेनें दौड़ती हैं और उनके आसपास स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी, ब्रुकलिन ब्रिज, रॉकफेलर सेंटर, ग्रैंड सेंट्रल टर्मिनल, यांकी स्टेडियम और न्यूयॉर्क के अन्य दर्जनों सैकड़ों  भवनों एवं लैंडमार्क्स के छोटे छोटे हू बहू माडल सजाए जाते हैं।


इन लघु इमारतों और पुलों के ये माडल लकड़ी, छाल, टहनियों, बीज, पत्तों और अन्य प्राकृतिक पौध सामग्री से बनाया जाता है, जिससे पूरा दृश्य सर्दियों के बावजूद “हरित” और जैविक महसूस होता है। यही कलात्मक वानस्पतिक निर्माण इस शो को साधारण मॉडल रेल रोड प्रदर्शनी से अलग और विशिष्ट करता है । यह कला, वास्तुकला, उद्यानविद्या और पर्यावरण संवेदी डिज़ाइन का अनूठा अनुभव बन जाता है।


प्रदर्शनी की संरचना और दर्शक अनुभव  


 घुमावदार गलियारों, ऊँचे नीचे प्लेटफॉर्मों और बहुस्तरीय ट्रैक के रूप में बिजली से चलती तरह तरह की नन्हीं ट्रेन के माडल  , इतिहास , संस्कृति, कला को प्रदर्शित करते हैं।  आगंतुक दर्शक निर्धारित मार्ग पर धीरे‑धीरे चलते हुए  बदलते दृश्य देखते हैं।

नियंत्रित तापमान के कारण , ठंड में भी भीतर एक सुखद गर्म वातावरण रहता है, जबकि काँच के पार बाहर बर्फ, कोहरा और सर्दी का परिदृश्य दिखता है ।


आमतौर पर Holiday Train Show देखने में 45 मिनट से एक घंटे तक का समय लगता है, बच्चों के लिए चलती फिरती ट्रेनें, चमकती रोशनियाँ और शहर की नामचीन परिचित इमारतों के छोटे छोटे संस्करण विशेष आकर्षण होते हैं, जबकि वयस्कों के लिए इन इमारतों की सूक्ष्म कलात्मकता और वनस्पति सामग्री से बने होना रुचिकर होता है।

Holiday Train Show आम तौर पर मध्य नवंबर से जनवरी के दूसरे सप्ताह तक चलता है, ताकि थैंक्सगिविंग, क्रिसमस और न्यू ईयर की पूरी छुट्टी , ऋतु परिवर्तन को कंजर्वेटरी में समेटा जा सके। प्रवेश के लिए टाइम्ड एंट्री टिकट प्रणाली अपनाई जाती है, यानी आगंतुकों को पहले से ऑनलाइन समय विशिष्ट स्लॉट बुक करना होता है और उसी समय खंड के भीतर प्रदर्शनी स्थल में प्रवेश दिया जाता है।


सर्दियों में दिन छोटे हो जाने और शाम जल्दी ढलने के कारण NYBG ने ट्रेन शो के साथ‑साथ रात्रिकालीन ट्रेन शो के विस्तारित समय के साथ‑साथ संगीत, गरम पेय, स्नैक्स, कभी‑कभी लाइव एंटरटेनमेंट और वयस्कों के लिए पेय पदार्थ आदि शामिल किए हैं, जिन्हें “फेस्टिव नाइट आउट” के रूप में प्रचारित किया जाता है।


ये नाइट इवेंट्स इस बात का उदाहरण हैं कि कैसे एक वैज्ञानिक और शैक्षिक संस्थान अपने संसाधनों का उपयोग करके शहर के सांस्कृतिक और रात्रिकालीन जीवन में भी रचनात्मक योगदान दे सकता है।इन कार्यक्रमों से प्राप्त अतिरिक्त राजस्व का उपयोग उद्यान की अनुसंधान, संरक्षण और शिक्षा गतिविधियों को मजबूत करने में किया जाता है, जिससे मनोरंजन और संस्थागत मिशन के बीच व्यावहारिक संतुलन बनता है।


एक ओर जहाँ गर्मियों और वसंत में लोग NYBG को मुख्य रूप से फूलों, पेड़ों और बाहरी उद्यानों के लिए देखने आते हैं, वहीं सर्दियों में वे उसी स्थान को प्रकाश, ट्रेनें, संगीत और अंदरूनी वनस्पति स्थापत्य के माध्यम से नए रूप में अनुभव करते हैं। इस तरह ट्रेनों और रोशनियों का शो, उद्यान के वैज्ञानिक शैक्षिक चरित्र को कम किए बिना, उसे शहर के विस्तृत सांस्कृतिक कैलेंडर का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है।


समग्र रूप से देखें तो New York Botanical Garden एक ऐसा संस्थान है जो वनस्पति विज्ञान, संरक्षण और शिक्षा के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर सम्मानित है, और साथ ही स्थानीय समुदाय के लिए प्रकृति‑केन्द्रित सांस्कृतिक अनुभव भी प्रस्तुत करता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

Thursday, 18 December 2025

अमेरिका का प्रशासन

 अमेरिका का प्रशासन तंत्र 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


अमेरिका में प्रशासन  लोकतंत्र की जीवंत व्यवस्था है ।  हर संस्था दूसरी संस्था पर नजर रखती है और कोई भी स्वयं को सर्वशक्तिमान मानने का साहस नहीं कर पाता। इस तंत्र की आत्मा शक्ति के विकेंद्रीकरण में बसती है और यही कारण है कि प्रशासन वहां किसी एक व्यक्ति की इच्छा से नहीं बल्कि संस्थागत संतुलन से चलता है। राष्ट्रपति देश का सर्वोच्च निर्वाचित प्रतिनिधि होता है पर वह सम्राट नहीं होता बल्कि एक जिम्मेदार प्रबंधक की भूमिका में रहता है जिसे हर कदम पर संविधान और संस्थाओं की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है।


अमेरिकी प्रशासन की बुनियाद संघीय ढांचे पर टिकी है जहां केंद्र और राज्यों के बीच अधिकार स्पष्ट रूप से विभाजित हैं। केंद्र सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा विदेश नीति मुद्रा और अंतरराज्यीय मामलों को देखती है जबकि शिक्षा पुलिस स्वास्थ्य और स्थानीय विकास जैसे विषय राज्यों के हाथ में रहते हैं। यह व्यवस्था भारतीय पाठक को थोड़ी अजीब लग सकती है क्योंकि यहां एक ही देश में कानूनों और नीतियों का रंग राज्य दर राज्य बदल जाता है। यहां तक कि इनकम टैक्स भी राज्य सरकार तय करती हैं। इसी विविधता में अमेरिका की प्रशासनिक जीवंतता छिपी है। एक राज्य में जो नीति सफल मानी जाती है वह दूसरे राज्य में असफल भी हो सकती है और इस असफलता से सीख लेकर नया प्रयोग शुरू हो जाता है।


कार्यपालिका के रूप में राष्ट्रपति का कार्यालय प्रशासन का चेहरा है। राष्ट्रपति अपने मंत्रिमंडल के माध्यम से विभिन्न विभागों को संचालित करता है। हर मंत्री अपने क्षेत्र का विशेषज्ञ माना जाता है और उसे नियुक्ति से पहले संसद की स्वीकृति की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यहां प्रशासनिक पद केवल राजनैतिक वफादारी का इनाम नहीं होते बल्कि सार्वजनिक जांच के बाद दिए जाते हैं। यही कारण है कि किसी एक गलती पर मंत्री या उच्च अधिकारी को त्यागपत्र देना असामान्य नहीं माना जाता।


विधायिका के रूप में United States Congress अमेरिकी लोकतंत्र का वह मंच है जहां बहस केवल औपचारिकता नहीं बल्कि नीति निर्माण का हथियार होती है। कांग्रेस के दोनों सदन राष्ट्रपति की शक्तियों पर नियंत्रण रखते हैं। बजट पारित न हो तो सरकार ठप हो सकती है और राष्ट्रपति का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम कागजों में सिमट सकता है। यहां विधायिका और कार्यपालिका के बीच टकराव को लोकतंत्र की कमजोरी नहीं बल्कि उसकी ताकत माना जाता है क्योंकि इसी टकराव से संतुलन पैदा होता है।


न्यायपालिका के रूप में Supreme Court of the United States अमेरिकी प्रशासन का नैतिक प्रहरी है। सर्वोच्च न्यायालय केवल विवादों का निपटारा नहीं करता बल्कि यह तय करता है कि सरकार का कोई कदम संविधान की आत्मा के अनुरूप है या नहीं। राष्ट्रपति के आदेश से लेकर संसद के कानून तक सब न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं। यही कारण है कि अमेरिका में अदालत का निर्णय सरकार की नीतियों को पलट देने की क्षमता रखता है और सरकार उसे सिर झुकाकर स्वीकार करती है।


प्रशासनिक व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण विशेषता नौकरशाही का अपेक्षाकृत पेशेवर और स्थायी स्वरूप है। सरकारें बदलती हैं पर प्रशासनिक ढांचा चलता रहता है। नीति निर्धारण में विशेषज्ञता का सम्मान किया जाता है और आंकड़ों के बिना निर्णय को गंभीरता से नहीं लिया जाता। यहां फाइलें लाल फीते में उलझती जरूर हैं पर पारदर्शिता का दबाव इतना अधिक है कि देर सबेर जवाब देना ही पड़ता है। सूचना का अधिकार केवल कानून नहीं बल्कि नागरिक स्वभाव बन चुका है।


अमेरिकी प्रशासन में मीडिया और नागरिक समाज भी अनौपचारिक किंतु प्रभावशाली स्तंभ की तरह काम करते हैं। किसी सरकारी निर्णय पर सवाल उठाना देशद्रोह नहीं बल्कि नागरिक कर्तव्य माना जाता है। पत्रकार जांच करते हैं,  अदालतें सुनती हैं और प्रशासन सफाई देता है। यह सतत संवाद प्रशासन को अहंकारी बनने से रोकता है।


कुल मिलाकर अमेरिका का सरकारी प्रशासन तंत्र किसी आदर्श लोक की व्यवस्था नहीं बल्कि निरंतर आत्मसुधार की प्रक्रिया है। वहां भी विवाद हैं , ध्रुवीकरण है और सत्ता संघर्ष है पर इन सबके बीच संस्थाओं की मजबूती यह सुनिश्चित करती है कि व्यवस्था व्यक्ति से बड़ी बनी रहे। शायद यही अमेरिकी प्रशासन की सबसे बड़ी सीख है कि लोकतंत्र का सौंदर्य आदेश में नहीं बल्कि संतुलित अव्यवस्था में छिपा होता है।


 अमेरिका में जिला प्रशासन सुनते ही भारतीय मन अनायास ही कलेक्टर की कुर्सी खोजने लगता है पर वहां यह कुर्सी मौजूद ही नहीं है। अमेरिकी प्रशासनिक व्यवस्था में जिला का अर्थ काउंटी से होता है और काउंटी किसी एक सर्वशक्तिमान अधिकारी के अधीन नहीं बल्कि निर्वाचित और पेशेवर पदों के सामूहिक संतुलन से चलती है। यहां जिला प्रशासन व्यक्ति केंद्रित नहीं बल्कि प्रणाली केंद्रित है और यही इसका सबसे बड़ा अंतर  है।


अमेरिका की प्रत्येक काउंटी में अलग अलग प्रकार के निर्वाचित अधिकारी होते हैं। कहीं काउंटी एग्जीक्यूटिव होता है ,कहीं बोर्ड ऑफ सुपरवाइजर नामक निर्वाचित समूह शासन करता है। कानून व्यवस्था का जिम्मा शेरिफ के पास होता है जो जनता द्वारा चुना जाता है  ।  इसीलिए वह सीधे जनता के प्रति जवाबदेह होता है न कि किसी सचिवालय के प्रति या राजनैतिक व्यक्ति के लिए । कर वसूली रजिस्ट्रेशन और रिकॉर्ड प्रबंधन जैसे कार्य काउंटी क्लर्क और ट्रेजरर जैसे अधिकारी संभालते हैं जो या तो निर्वाचित होते हैं या पेशेवर नियुक्ति से आते हैं। इस व्यवस्था में किसी एक अधिकारी के पास वह सर्वाधिकार नहीं होता जो भारत में कलेक्टर के पास निहित होते हैं।


यहां प्रशासनिक शक्ति का विकेंद्रीकरण इतना गहरा है कि एक ही जिले में कई छोटी  प्रशासनिक इकाई दिखती हैं। शिक्षा का जिम्मा स्कूल बोर्ड संभालते हैं स्वास्थ्य सेवाएं अलग एजेंसियों के अधीन होती हैं और भूमि उपयोग योजना के लिए अलग विभाग होता है। इस बिखराव को अराजकता नहीं बल्कि जवाबदेही का औजार माना जाता है। यदि सड़क खराब है तो जनता जानती है कि किस विभाग से सवाल करना है और यदि पुलिस से शिकायत है तो शेरिफ सीधे मतदाताओं के सामने जवाबदेह है।


अमेरिका का सरकारी कर्मचारी भारतीय बाबू की तरह सर्वज्ञ नहीं होता बल्कि अपने सीमित दायरे का विशेषज्ञ माना जाता है। उसकी ताकत अधिकार में नहीं बल्कि प्रक्रिया में होती है। नियम पुस्तिकाएं यहां भी मोटी हैं पर उनका पालन व्यक्तिगत कृपा से नहीं बल्कि सिस्टम के दबाव से होता है। नागरिक को फाइल आगे बढ़ाने के लिए अधिकारी के मूड की नहीं बल्कि निर्धारित प्रक्रिया की जानकारी होना अधिक जरूरी होता है। यही कारण है कि रिश्वत जैसी अवधारणा यहां नैतिक अपराध से अधिक कानूनी आत्महत्या मानी जाती है।


काउंटी प्रशासन का चेहरा अक्सर एक इमारत तक सीमित नहीं रहता। नागरिक सेवाएं ऑनलाइन पोर्टल से लेकर सामुदायिक केंद्रों तक फैली हैं। आम नागरिक को यह एहसास कम होता है कि वह किसी बड़े अधिकारी से मिल रहा है बल्कि अधिक यह लगता है कि वह एक सेवा प्रणाली का उपयोग कर रहा है। यह दूरी और यही सहजता प्रशासन को अहंकार से बचाती है। अधिकारी जानता है कि उसकी कुर्सी स्थायी नहीं है और जनता जानती है कि उसका सवाल अनसुना नहीं किया जा सकता।


यदि उदाहरण के तौर पर Los Angeles County को देखें तो यह अपने आप में एक छोटे देश जितनी आबादी और बजट संभालती है फिर भी वहां प्रशासन किसी एक कलेक्टर के आदेश से नहीं बल्कि सैकड़ों पेशेवर निर्णयों और निर्वाचित संस्थाओं के तालमेल से चलता है। यह मॉडल बताता है कि बड़े प्रशासन का मतलब बड़ा अधिकारी नहीं बल्कि मजबूत संस्थाएं होता है।


कुल मिलाकर अमेरिका में जिला प्रशासन शक्ति का प्रदर्शन नहीं बल्कि जिम्मेदारी का अभ्यास है। वहां अधिकारी जनता से डरता नहीं पर जनता की उपेक्षा भी नहीं कर सकता। शायद यही सबसे बड़ा फर्क है कि प्रशासन वहां शासन का प्रतीक नहीं बल्कि सेवा की प्रक्रिया बनकर रहता है और इसी कारण वह सार्वजनिक रूप से कम दिखता है पर अधिक प्रभावी होता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

Wednesday, 17 December 2025

पुणतांबेकर के साहित्य में समाज

 आलेख 


डॉ. शंकर पुणतांबेकर के साहित्य में समाज


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

व्यंग्यकार, समालोचक 

आजकल न्यूयॉर्क में 


स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात का भारतीय समाज गहन अंतर्विरोधों से ग्रस्त था। एक ओर लोकतंत्र, समाजवाद, न्याय और प्रगति के महान आदर्श थे, तो दूसरी ओर भ्रष्टाचार, जातिवाद, सत्ता-लोलुपता और आर्थिक विषमता का कठोर यथार्थ। इसी युग में डॉ. शंकर पुणतांबेकर ने अपनी लेखनी उठाई। उनके लिए व्यंग्य कोरी मनोरंजन की विधा नहीं रही , बल्कि सामाजिक सुधार का एक गंभीर रचनात्मक औज़ार था। उनकी परिभाषा में, “व्यंग्य वही सच्चा होता है, जो हँसाने के साथ साथ सोचने पर भी मजबूर करे।” यह दृष्टि उनके समग्र लेखन का मूलमंत्र बनी। मूलतः एक मराठी भाषी होते हुए भी हिंदी को अपनी साहित्य साधना का माध्यम बनाने वाले पुणतांबेकर जी ने उपन्यास, कहानी, निबंध, नाटक और एक अनूठे ‘व्यंग्य अमरकोश’ के माध्यम से समकालीन विसंगतियों पर करारे प्रहार किए। उनका लेखन स्वतंत्रता के बाद के भारत के ‘मोहभंग’ और जनसाधारण की पीड़ा का दर्पण है, जिसमें समाज का बदरंग चेहरा बिना किसी लाग लपेट के सामने लाने में वे सफल रहे हैं।


स्वतंत्रोत्तर भारत का राजनीतिक यथार्थ: पाखंड, सत्ता और मोहभंग


पुणतांबेकर जी के व्यंग्य का प्राथमिक लक्ष्य स्वतंत्र भारत की राजनीतिक व्यवस्था थी, जहाँ आजादी से पहले जनसेवा के आदर्श का स्थान देखते देखते सत्ता संघर्ष और भ्रष्टाचार ने ले लिया था। उन्होंने नेताओं के चरित्र और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के खोखलेपन को बेनकाब किया।


नेतृत्व का पतन और खोखले आदर्श: उनकी रचनाओं में नेता ‘जनसेवक’ के छद्म वेश में भौतिक सुख-सुविधाओं में डूबे दिखाई देते हैं। वे व्यंग्यपूर्वक टिप्पणी करते हैं कि “हर बीरबल को अकबर नहीं मिलता,” अर्थात् हर सच्चे और बुद्धिमान सलाहकार को उचित मंच नहीं मिल पाता, जबकि सत्ता अवसरवादियों के हाथों में सिमटती चली जाती है। स्वतंत्रता सेनानियों के आदर्शों से नई पीढ़ी के नेताओं के विच्छेद को वे गहरी पीड़ा के साथ चित्रित करते हैं।


लोकतंत्र की विडंबना: ‘आम आदमी’ जैसी लघुकथाओं के माध्यम से उन्होंने लोकतंत्र की मूल विडंबना को उजागर किया है, जहाँ मतदाता चुनाव के समय ‘राजा’ बना दिया जाता है, किंतु सत्ता मिलते ही उसकी उपेक्षा शुरू हो जाती है। सरकारी योजनाओं का लाभ उसे तब तक नहीं मिल पाता, जब तक कि भ्रष्ट प्रशासनिक तंत्र और नेता उसे ‘लूट’ न लें।


अपराधीकृत राजनीति का चित्रण: उनके उपन्यास ‘एक मंत्री स्वर्गलोक में’ में राजनीतिक दुराचरण और भ्रष्टाचार को स्वर्ग की पौराणिक पृष्ठभूमि में रखकर एक तीखा व्यंग्यात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। यह रचना दर्शाती है कि कैसे राजनीति सिद्धांतों से हटकर व्यक्तिगत लाभ का माध्यम बन गई।


 सामाजिक संरचनाओं का विखंडन: जाति, धर्म और रूढ़ियाँ


संविधानिक समानता के बावजूद, स्वतंत्रोत्तर भारत के सामाजिक जीवन में जाति और धर्म के पुराने बंधन गहरे पैठे हुए थे। पुणतांबेकर जी ने इन सामाजिक विषमताओं और धार्मिक पाखंड पर भी अपनी कलम चलाई है।


जातिगत भेदभाव और पाखंड: 

उनकी रचनाओं में उच्च जातियों के द्वारा दलितों के प्रति कथित सहानुभूति के पीछे छिपे पाखंड को बेपर्दा किया गया है। ‘दरखास्त’ जैसे नाटकों में एक दलित युवक की नौकरी के लिए होने वाले बेबस संघर्ष को दर्शाया गया है, जो औपचारिक समानता और वास्तविक भेदभाव के अंतर को स्पष्ट करता है।


धार्मिक आडंबरों पर प्रहार: 

उनकी रचना ‘रावण तुम बाहर आओ’ में धार्मिक कर्मकांडों और अंधविश्वासों की मनमानी व्याख्याओं पर करारा प्रहार किया गया है। वे दिखाते हैं कि कैसे धर्म, ईमानदारी और नैतिकता से अलग होकर केवल एक दिखावे और सामाजिक वर्चस्व के साधन के रूप में कार्य करने लगा है।

विडंबना है कि धर्म का यह विकृत रूप आज भी वैसा ही घना कोहरा बना दिखता है, जो पुणतांबेकर जी की प्रासंगिकता को स्पष्ट करता है।


व्यापक सामाजिक दृष्टि: 

उनकी दृष्टि केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं थी। ‘एक नफरत कथा’ जैसी रचनाओं में उन्होंने साम्प्रदायिकता की जहरीली मानसिकता पर भी व्यंग्य किया है, जो स्वतंत्र भारत के लिए एक गंभीर चुनौती बनी हुई है।


शैलीगत विशिष्टताएँ एवं साहित्यिक अवदान


पुणतांबेकर जी का व्यंग्य न केवल उनकी विषयवस्तु, बल्कि उनकी शैलीगत मौलिकता के कारण भी हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान रखता है।


परसाई स्कूल की बौद्धिक विरासत: 

उन पर हरिशंकर परसाई के विचारों एवं रचनात्मकता का गहरा प्रभाव था और उन्हें ‘परसाई स्कूल’ का एक महत्वपूर्ण लेखक माना जाता है। वे तार्किक विवेचन, बौद्धिक गहराई और सामाजिक विषयों पर एक गंभीर तथा निर्भीक दृष्टिकोण रखते थे।


भाषा एवं रूप का नवाचार: 

उनकी भाषा सरल, प्रवाहमयी किंतु अत्यंत प्रभावशाली है। मराठी भाषा की लय ने उनकी हिंदी को एक विशिष्ट मोड़ दिया। उन्होंने व्यंग्य कोश (‘व्यंग्य अमरकोश’) जैसी एक अनूठी विधा का सृजन किया, जिसमें लगभग 9500 शब्दों की व्यंग्यपूर्ण व्याख्या की गई है। यह कोश केवल शब्दार्थ नहीं देता, बल्कि उन शब्दों के पीछे छिपे सामाजिक विरोधाभास को उजागर करता है।


रूपकात्मक शक्ति: 

उनकी रचना ‘चित्र’ इस बात का उत्कृष्ट उदाहरण है कि कैसे वे जटिल वैश्विक-राजनीतिक एवं सामाजिक विमर्श (जैसे शीत युद्ध, धर्म का राजनीतिकरण, नस्लभेद) को एक सांकेतिक और रूपकात्मक कथा के माध्यम से प्रस्तुत करने में सक्षम थे। एक चित्रकार के माध्यम से गोर्बाचेव, शंकराचार्य और नेल्सन मंडेला से हुई काल्पनिक वार्तालाप यह दर्शाती है कि कैसे कला एवं नीति में ‘वर्ण’ और ‘रंग’ के बीच का अंतर समाज के गहरे सत्य को उद्घाटित करता है।


 निष्कर्ष: एक स्थायी प्रासंगिकता


डॉ. शंकर पुणतांबेकर का व्यंग्य साहित्य स्वतंत्रोत्तर भारत के सामाजिक राजनीतिक परिदृश्य का एक ऐसा विश्वसनीय अभिलेख है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी कम नहीं हुई है। उन्होंने केवल लक्षण बताए ही नहीं, बल्कि रोग के मूल कारणों , मानवीय लोभ, सत्ता का नशा, नैतिकता का ह्रास और बौद्धिक अवसरवाद की पहचान करवाई। 

उनका यह कथन कि "हास्य’, दर्द भूलने का नशा जगाता है, तो ‘व्यंग्य’, नशा भूलने का दर्द जगाता है,” उनकी समग्र साहित्यिक दृष्टि को रेखांकित करता है। आज जब राजनीति, धर्म और समाज के क्षेत्र में पाखंड के नए नए रूप सामने आ रहे हैं, पुणतांबेकर जी का साहित्य आत्ममंथन और सतर्कता का आह्वान करता है। वे हिंदी व्यंग्य की ऐसी कड़ी हैं, जिसने व्यंग्य को हल्के फुल्के मनोरंजन के स्तर से उठाकर एक गंभीर सामाजिक बौद्धिक विमर्श का दर्जा दिलाया। इस अर्थ में, उनका रचना संसार न केवल अतीत का दर्पण है, बल्कि वर्तमान के विश्लेषण और भविष्य के निर्माण के लिए एक अनिवार्य मानदंड भी है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

अपनी पुस्तक यात्रा

विवेक रंजन श्रीवास्तव 


चूं चूं की खोज व्यंग्य संग्रह से पहले प्रकाशित , लेखक की पुस्तकें


*१९९२ में नई कविताओ की पहली किताब "आक्रोश" दिव्य काव्य अलंकरण से सम्मानित 


* व्यंग्य की किताबें


2 * "रामभरोसे "


 3*"कौआ कान ले गया "


 4*"मेरे प्रिय व्यंग्य" , 


5*"धन्नो बसंती और बसंत" , 


6*"बकवास काम की" ,


7*"जय हो भ्रष्टाचार की" ,


8*"समस्या का पंजीकरण" (अंग्रेजी अनुवाद किंडल पर सुलभ),


9*"खटर पटर" 


जीवनी आधारित उपन्यासिका ..

10 क्रांतिकारी अमर शहीद भगत सिंह , 

11 उधमसिंह , 

12 रानी दुर्गावती

13 "भारत का पहला आदिवासी रॉबिनहुड टंट्या मामा "

 आदि महान विभूतियों पर चर्चित किताबें 



नाटक..

14 *"जलनाद " विश्ववाणी हिंदी संस्थान से पुरस्कृत , 


15 "हिन्दोस्तां हमारा" ,

 नाटक संग्रह, म. प्र. साहित्य अकादमी से सम्मानित,


16 "जादू शिक्षा का" नाटक 



पर्यटन...


17 "काशी काबा दोनों पूरब में हैं जहां से "(अमेरिका यात्रा के वृत्तांत) 


18 "मध्य प्रदेश की पुरातात्विक धरोहर" 


आलोचना

19 " व्यंग्य कल आज और कल "


20 "बात किताब की"


विज्ञान 

21" जल जंगल जमीन"

22 " बिजली का बदलता परिदृश्य"


संपादन ..


1 *"मिली भगत" वैश्विक व्यंग्य संकलन, 


2*" लाकडाउन "( करोना काल के व्यंग्य संकलन)

 

3*"चटपटे शरारे "( राही रैंकिंग के व्यंग्यकारों का संयुक्त व्यंग्य संकलन 


अन्य संग्रहों में सहभागिता..


1व्यंग्य के नवल स्वर , 2आलोक पौराणिक व्यंग्य का ए टी एम ,

 3 बता दूं क्या , 

4 अब तक 75 ,

 5 इक्कीसवीं सदी के

 6 ..131 श्रेष्ठ व्यंग्यकार ,

 7.. 251 श्रेष्ठ व्यंग्यकार , 8..निभा  



पाठक मंच , तथा ई अभिव्यक्ति के माध्यम से नियमित पुस्तक समीक्षक


https://e-abhivyakti.com के साहित्य सम्पादक


म प्र साहित्य अकादमी ,

पाथेय , मंथन ,वर्तिका , हिन्दी साहित्य सम्मेलन , तुलसी साहित्य अकादमी व अनेक साहित्यिक़ संस्थाओं , से समय समय पर सम्मानित,

सामाजिक लेखन के लिये रेड एण्ड व्हाईट सम्मान से सम्मानित .


वर्तिका पंजीकृत साहित्यिक सामाजिक संस्था के वैश्विक संयोजक


टी वी , रेडियो , यू ट्यूब , पत्र पत्रिकाओ में निरंतर प्रकाशन .


ब्लॉग

http://vivekkevyang.blogspot.com व अन्य ब्लॉग


संपर्क...

readerswriteback@gmail.com

ब्रेन ड्रेन, गेन या वेस्ट

 

 वैचारिक आलेख 

ब्रेन ड्रेन , ब्रेन गेन या ब्रेन वेस्ट ? 

विवेक रंजन श्रीवास्तव 



कड़े वीजा प्रतिबंध प्रतिभा के लोक व्यापीकरण पर कुठाराघात है और इस पूरे परिदृश्य को यदि किसी एक मुहावरे में समेटना हो तो वह है न घर का न घाट का। यह मुहावरा केवल भावनात्मक पीड़ा का संकेत नहीं देता बल्कि आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में प्रतिभा के साथ हो रहे बौद्धिक अन्याय की सटीक व्याख्या भी करता है। आज का मेधावी युवा सीमाओं से परे सोचता है पर नीतियां उसे बार बार याद दिलाती हैं कि वह किसी न किसी फाइल का अस्थायी नाम मात्र है।


वैश्वीकरण ने यह विश्वास जगाया था कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होगी और प्रतिभा वहां फलेगी जहां उसे सबसे उपजाऊ जमीन मिलेगी। परंतु व्यवहार में यह सपना कड़े वीजा नियमों की दीवार से टकरा कर चूर हो जाता है। विशेष रूप से वे युवा जो उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाते हैं और वर्षों की साधना के बाद उस मुकाम तक पहुंचते हैं जहां वे समाज को वास्तविक लाभ दे सकते हैं वहीं उन्हें बताया जाता है कि अब समय पूरा हुआ और लौट जाना चाहिए। यह वह क्षण होता है जब वे न उस देश के रह जाते हैं जिसने उन्हें गढ़ा और न उस देश के जहां से वे चले थे।


आई आई टी जैसे संस्थानों से निकले मेधावी छात्र जब अमेरिका जैसे देशों में शोध और तकनीक के क्षेत्र में प्रशिक्षण पाते हैं तो प्रारंभिक वर्षों में वे सीखने वाले होते हैं। समाज उनसे बहुत अपेक्षा नहीं करता। पर पांच छह वर्षों के बाद वही युवा नवाचार के वाहक बनते हैं नई सोच नए समाधान और नई दृष्टि लेकर खड़े होते हैं। दुर्भाग्य यह है कि यही वह समय होता है जब वीजा की समय सीमा उनकी राह रोक लेती है। परिणामस्वरूप वे उस समाज को कुछ दे ही नहीं पाते जिसके संसाधनों से उन्होंने सीखा और जिस समाज ने उन्हें अवसर दिया।


वापसी का विकल्प कागजों में सरल लगता है पर जीवन में उतना ही कठिन सिद्ध होता है। वर्षों विदेश में रहने के बाद उनका अपने देश से पेशेवर संपर्क कमजोर हो चुका होता है। तकनीकी परिवेश बदल चुका होता है संस्थागत ढांचे नए समीकरणों में बंध चुके होते हैं। वे लौटते तो हैं पर स्वागत में अवसरों की पगडंडी नहीं मिलती। वहां वे बाहरी हो जाते हैं और यहां पहले से ही बाहरी थे। इस तरह वे सचमुच न घर के रह जाते हैं न घाट के।


इस स्थिति में सबसे बड़ा नुकसान समाज का होता है। न तो मेजबान देश उस परिपक्व प्रतिभा का लाभ उठा पाता है और न ही मूल देश उसे समुचित स्थान दे पाता है। यह न तो ब्रेन ड्रेन है न ब्रेन गेन बल्कि ब्रेन वेस्ट है। वर्षों की शिक्षा प्रशिक्षण और अनुभव एक ऐसे खालीपन में गिर जाता है जहां उसका उपयोग संभव नहीं हो पाता। प्रतिभा का लोक व्यापीकरण जो ज्ञान को समाज के व्यापक हित में प्रवाहित करने की प्रक्रिया है वह यहीं आकर रुक जाती है।


विडंबना यह है कि वीजा नीतियों को अक्सर रोजगार सुरक्षा और राष्ट्रीय हित के नाम पर कठोर बनाया जाता है। पर यह नहीं सोचा जाता कि उच्च कौशल वाली प्रतिभा रोजगार छीनती नहीं बल्कि नए अवसर पैदा करती है। जब ऐसी प्रतिभा को वीजा के कारण बाहर किया जाता है तो समाज अपने ही भविष्य को संकुचित करता है। यह वैसा ही है जैसे फल से लदे पेड़ को इसलिए काट दिया जाए कि उसकी जड़ें कहीं और की मिट्टी से आई थीं।


अंततः यह प्रश्न केवल आव्रजन नीति का नहीं बल्कि दृष्टिकोण का है। यदि प्रतिभा को साझा मानवीय पूंजी माना जाए तो उसे न घर का न घाट का बनने से बचाया जा सकता है। अन्यथा हम ऐसे समय के साक्षी बनते रहेंगे जहां सबसे योग्य लोग सबसे अधिक असहाय होंगे और समाज यह कहते हुए आगे बढ़ जाएगा कि नियम तो नियम हैं। पर इतिहास गवाह है कि जब नियम मानव संभावनाओं से बड़े हो जाते हैं तब विकास ठहर जाता है और सभ्यता अपने ही बनाए तटों के बीच फंसी रह जाती है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

Monday, 15 December 2025

आतंक के परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता की वैश्विक आवश्यकता

 आतंक के परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता की वैश्विक आवश्यकता  


विवेक रंजन श्रीवास्तव, न्यूयॉर्क से


आतंकवाद आज केवल किसी देश या समुदाय की समस्या नहीं, बल्कि पूरी मानवता की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। 2020 के बाद से विश्व ने देखा कि जब एक विचारधारा धार्मिक पहचान के आवरण में हिंसा को वैध ठहराने लगती है, तो सभ्यता का आधार ही खतरे में पड़ जाता है। ओपेक देश मात्र धर्म के आधार पर एक वैश्विक संगठन बना कर वैधानिक  विश्व शक्ति बने हुए हैं। 


2023–25 के बीच इस्लामिक स्टेट (ISIS–K), बोको हराम, और तालिबान समर्थित गुटों ने अफ्रीका, पश्चिम एशिया और यूरोप में नई सक्रियता दिखाई। इसी अवधि में सीरिया, सोमालिया, नाइजीरिया और पाकिस्तान में 70% से अधिक बड़े आतंकवादी हमले दर्ज हुए। ऑस्ट्रेलिया में यहूदी संस्थानों पर हमले, फ्रांस में चर्चों पर हिंसा, और दक्षिण एशिया में धार्मिक नफरत पर आधारित दंगों ने यह सिद्ध किया कि धार्मिक कट्टरता की आग सीमाएं नहीं मानती।  


2001 का 9/11 हमला, 2008 का मुंबई 26/11, और 2015 का पेरिस बैटाक्लान नरसंहार पहले ही इस प्रवृत्ति का धार्मिक चेहरा उजागर कर चुके हैं। 2025 की शुरुआत में न्यूज़ीलैंड और इंडोनेशिया में आतंकी घटनाओं ने चेताया कि यह चुनौती केवल किसी एक देश की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जो धर्म को राजनीतिक और वित्तीय लाभ का उपकरण बना देती है।  संस्था गत, मिल्ट्री या स्टेट के समर्थन के साथ आतंक सभ्य दुनियां के लिए काला धब्बा है।  धर्म के आधार पर चुनावी राजनीति , तुष्टिकरण समाज पर बदनुमा दाग है। आंकड़े बताते हैं कि कट्टरपंथी सोच ड्रग्स , या अपराध के   जरिए आसान धन कमाने से बाज नहीं आती। धार्मिक आधार पर एक दूसरे का समर्थन समाज को टुकड़ों में विघटित करता है। भारत विभाजन इसी का उदाहरण है।


जांच एजेंसियों और संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें बताती हैं कि कई आतंकी नेटवर्क अब भी राज्य प्रायोजित संरचनाओं से लाभ लेते हैं। पाकिस्तान की आईएसआई पर 26/11 के बाद से अंतरराष्ट्रीय निगरानी बनी हुई है, पर पर्याप्त कार्रवाई का अभाव आतंक को पनाह देता है। 2024 की यू एन ओ की काउंटर टेररिज्म रिपोर्ट में बताया गया है कि ऑनलाइन कट्टरपंथी प्रचार, क्रिप्टोकरेंसी से आतंक वादी फंडिंग और “लोन वुल्फ” हमलों का वैश्विक खतरा तेजी से बढ़ा है।  


भारत ने इन चुनौतियों से निर्णायक संघर्ष की नीति अपनाई है। आतंक पर जीरो टॉलरेंस नीति के तहत, एनआईए और प्रवर्तन निदेशालय ने आतंक फंडिंग नेटवर्क पर प्रहार किया। 2025 का “ऑपरेशन सिंदूर”, जिसमें पीओके के आतंकी शिविरों को सटीक हमलों से ध्वस्त किया गया, ने भारत की सुरक्षा नीति की वैश्विक पहचान बनाई।  आतंक के विरुद्ध कूटनीतिक मोर्चे पर भारत को अमेरिका, फ्रांस और जापान जैसे देशों का समर्थन मिला।  


फिर भी प्रश्न बना हुआ है क्या केवल सैन्य शक्ति आतंक का स्थायी समाधान दे सकती है? जवाब सरल और स्पष्ट है नहीं।

 आतंकवाद का मूल उन विचारों में है जो असहिष्णुता और धार्मिक श्रेष्ठता की भावना से पोषित होते हैं। जब समाजों की शिक्षा, संस्कृति और राजनीति से बहुलता और समानता की भावना लुप्त होती है, तब आतंक जैसी विचारधाराएँ पनपती हैं।  


इसीलिए आज की दुनिया को  आवश्यकता है एक वैश्विक धर्मनिरपेक्ष चेतना की , जो यह माने कि धर्म का उद्देश्य विभाजन नहीं, मानवता की सुरक्षा है। धर्मनिरपेक्षता का यह दृष्टिकोण न केवल राजनीति बल्कि शिक्षा, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परिलक्षित होना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र को भी अपनी आतंक रोधी रणनीतियों में “धार्मिक सुधार, संवाद और सहिष्णुता शिक्षा” को प्रमुख स्तंभ बनाना चाहिए।  


दुनिया तभी आतंक से मुक्त हो सकेगी जब हर देश यह स्वीकार करे कि ईश्वर के अनेक नाम हो सकते हैं, पर मनुष्य मात्र की नैसर्गिक मानवीय गरिमा एक ही है। आतंक की जड़ों को काटने के लिए सिर्फ हथियार नहीं, बल्कि विचारों की पवित्रता और धर्मनिरपेक्षता की शक्ति  चाहिए। यही धर्म निरपेक्षता वैश्विक शांति का एकमात्र स्थाई मार्ग है।  


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

क्या है ये SIR

क्या है ये SIR ?

विवेक रंजन श्रीवास्तव 
न्यूयॉर्क 

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा चलाई जा रही  SIR प्रक्रिया मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन बनाने का एक महत्वपूर्ण कदम है, जो फर्जी वोटरों को हटाने और असली मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

SIR का पूरा नाम Special Intensive Revision है, जिसे हिंदी में विशेष गहन पुनरीक्षण कहा जाता है। यह चुनाव आयोग की एक नियोजित प्रक्रिया है जिसमें मतदाता सूची का ब्लॉक लेवल ऑफिसर (BLO) घर-घर जाकर मतदाता सूची की जांच करते हैं, नाम, पता, उम्र, परिवार के सदस्यों का सत्यापन करते हैं। इसका मुख्य लक्ष्य डुप्लीकेट एंट्री, मृत व्यक्तियों के नाम हटाना , शिफ्ट हुए मतदाताओं या अवैध प्रविष्टियों को हटाना तथा नए बने 18+ उम्र के मतदाताओं को जोड़ना है।

सर का इतिहास..

SIR कोई नई योजना नहीं है, बल्कि दशकों पुरानी प्रक्रिया है जो चुनाव कानून के तहत हर चुनाव से पहले या आवश्यकता पर पहले भी की जाती रही है। बिहार में हाल ही में इसे सफलतापूर्वक लागू किया गया, जहां 64 लाख फर्जी वोटर हटाए गए और इससे वोटिंग प्रतिशत 10% बढ़ा।

वर्ष 2025 में चुनाव आयोग ने इसे पूरे देश में विस्तार दिया, खासकर 23 साल बाद बड़े पैमाने पर यह हो रहा है । लेकिन कुछ राज्य जैसे पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विपक्ष ने इसका विरोध किया तथा सुप्रीम कोर्ट में इस व्यवस्था को चुनौती दी।

SIR प्रक्रिया का पहला आधिकारिक कार्यान्वयन सन 1952 में हुआ था, जब भारत के पहले लोकसभा चुनाव हुए और मतदाता सूची को गहन पुनरीक्षण की आवश्यकता पड़ी । उस समय भारत निर्वाचन आयोग , जो 1950 में स्थापित हुआ था, ने इसकी जिम्मेदारी ली थी ।तत्कालीन मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन के नेतृत्व में मतदाता सूची शुद्ध करने का यह अभियान संपन्न हुआ था। इसके बाद यह प्रक्रिया समय-समय पर, विशेषकर बड़े चुनावों से पहले, जारी रही, जैसे 2002-2004 के बीच पूरे देश में बड़े पैमाने पर सर को क्रियान्वित किया गया था। 

S I R का तरीका..
BLO या SIR टीम घर घरआती है, अपना पहचान पत्र दिखाती है । आप परिवार के वोटिंग लिस्ट के सदस्यों के नाम, पता, परिवार विवरण, दस्तावेज (आधार, राशन कार्ड, बिजली बिल आदि दस्तावेज से ) सत्यापित करवाते हैं। फॉर्म 6 (नया पंजीकरण), फॉर्म 7 (नाम हटाना), फॉर्म 8 (सुधार) के फार्म भरवाए जाते हैं।
पारदर्शिता के लिए परिवार वंशावली प्रमाण जरूरी होता है। 
बिहार मॉडल पर आधारित, यह वोटर लिस्ट सत्यापन के द्वारा वर्तमान जनसांख्यिकी (शहरीकरण, पलायन) के अनुरूप सही वोटर लिस्ट  बनाता है।

SIR का औचित्य..

लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदाता सूची की शुद्धता अनिवार्य है, क्योंकि गलत वोटर चुनावी निष्पक्षता बाधित करते हैं। 
SIR से मृत , पलायन कर चुके वोटर लिस्ट से समाप्त होते हैं, यदि कोई घुसपैठिए खासकर विदेशी सीमा से जुड़े प्रदेशों में किसी तरह आ गए हैं तो दस्तावेजों के अभाव में उनकी वोटिंग का गलत अधिकार रोक दिया जाता है ।  भारत के वास्तविक नागरिक के वोटिंग अधिकार सुरक्षित रहते हैं । वोटिंग प्रतिशत बढ़ जाता है, क्योंकि बोगस नाम कट जाने से वोटिंग लिस्ट यथार्थ और अद्यतन बन जाती है। विपक्षी आशंकाओं के बावजूद, यह एक रूटीन अभियान है जो वार्षिक संशोधन से आगे जाकर वोट लिस्ट की  गहन सफाई सुनिश्चित करता है, ताकि हर योग्य वोट का अधिकार बरकरार रहे।



विवेक रंजन श्रीवास्तव 
न्यूयॉर्क से

सौंदर्य प्रतियोगितायें : नारी सौंदर्य , बुद्धि और स्वातंत्र्य की प्रतीक

 विश्व सौंदर्य प्रतियोगितायें : नारी सौंदर्य , बुद्धि और स्वातंत्र्य की प्रतीक


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

इन दिनों न्यूयार्क से 


विश्व सौंदर्य प्रतियोगिताओं का इतिहास युवा महिलाओं की सुंदरता, बुद्धिमत्ता और सामाजिक जिम्मेदारी को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करने की एक शानदार यात्रा रही है। पुरुष प्रधान दुनियां में नारी स्वातंत्र्य की प्रतीक बन चुकी मिस वर्ल्ड, मिस यूनिवर्स, मिस इंटरनेशनल और मिस अर्थ, ये चार प्रमुख 'बिग फोर' सौंदर्य प्रतियोगिताएं दशकों से दुनियां भर के देशों की सुंदरियों के बीच प्रतिस्पर्धा का केंद्र रही हैं। इनके संक्षिप्त इतिहास, नवीनतम परिणामों और मिलेजुले आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका  की सुंदरियां इनमें सबसे अधिक बार सफल हुई है। मतलब गणित की भाषा में औसत गणना के अनुसार दुनियां में अमेरिकन लड़कियां सबसे अधिक सुंदर मानी जा सकती हैं।  इन सौंदर्य प्रतियोगिताओ के बारे में 

जानना रुचिकर है। 


मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता: सौंदर्य का परोपकार से सरोकार..


1951 में यूनाइटेड किंगडम में शुरू हुई मिस वर्ल्ड दुनिया की सबसे पुरानी सौंदर्य प्रतियोगिता है, जो सुंदरता के साथ परोपकार पर जोर देती है। 2025 में थाईलैंड की ओपल सुचाता इस प्रतियोगिता की विजेता बनीं। वेनेजुएला और भारत ने 6-6 बार यह खिताब जीता, जबकि अमेरिका ने  3 बार यह टाइटिल जीता है। जिन भारतीय सुंदरियों ने मिस वर्ल्ड का खिताब जीता है उनके नाम हैं, रीता फारिया (1966), ऐश्वर्या राय(1994), डायना हेडन (1997), युक्ता मुखी (1999), प्रियंका चोपड़ा (2000), और मानुषी छिल्लर (2017 ) ।


मिस यूनिवर्स: वैश्विक ग्लैमर की प्रतीक प्रतियोगिता के रूप में जानी जाती है।


1952 में अमेरिका द्वारा स्थापित मिस यूनिवर्स प्रतियोगिता ने सौंदर्य को वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय बनाया है। 2025 तक अमेरिकन सुंदरियों ने 9 बार इसमें जीत हासिल की, वेनेजुएला की सुंदरियों ने 7 बार तथा भारत ने 3 मिस यूनिवर्स खिताब जीते हैं। भारत ने 1994 में सुष्मिता सेन, 2000 में लारा दत्ता और 2021 में हरनाज संधू के साथ 3 बार मिस यूनिवर्स का ताज जीता है।



मिस इंटरनेशनल और मिस अर्थ: सौंदर्य प्रतियोगिता के आधुनिक आयाम के रूप में प्रतिष्ठित हुई हैं। 


1960 से जापान में आयोजित मिस इंटरनेशनल शारीरिक सौंदर्य के साथ बुद्धिमत्ता पर भी फोकस करती है।  2025 में कोलंबिया की कैटालिना डुक ने यह ताज पहना।


 मिस अर्थ (2001 से) सौंदर्य के साथ पर्यावरण पर केंद्रित सौंदर्य प्रतियोगिता है। इनमें फिलीपींस और वेनेजुएला का प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

आतंकवाद: साए में छिपा खतरा

 वैश्विक आतंकवाद: साए में छिपा खतरा


विवेक रंजन श्रीवास्तव


आतंकवाद आज दुनिया का सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। डेटा बताते हैं कि ज्यादातर बड़ी आतंकी घटनाओं का तार एक ही धर्म, चरमपंथ से जुड़ता दिखता है, और ये घटनाएं अक्सर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक जैसे देशों से लिंक होती हैं। इन घटनाओं के इतिहास, जांच रिपोर्टों, दुनिया की आतंक-विरोधी पहल और भारत की जीरो टॉलरेंस नीति का विस्तार से विश्लेषण करें

, तो हम देखते हैं कि आतंकी घटनाओं का काला इतिहास 

दोहराव से बचाना है तो विश्व को समग्र पहल करना जरूरी है। 


आतंकवाद का वैश्विक इतिहास 21वीं सदी में इस्लामिक समूहों के वर्चस्व वाला है। 2001 का अमेरिका में 9/11 हमला, जिसमें अल-कायदा ने अमेरिका पर 2977 लोगों की हत्या की, ने दुनिया को हिला दिया। उसी तरह 2008 का मुंबई 26/11 हमला, जहां लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों ने 175 निर्दोषों को मार डाला, पाकिस्तान से सीधा कनेक्शन दिखाता है। 2005 का 7/7 लंदन बम धमाका (52 मृत्यु), 2015 का पेरिस बैटाक्लान (130 मृत्यु, आईएसआईएस), और 2014 का पेशावर स्कूल हमला (140 बच्चे मारे गए, तालिबान) जैसी घटनाएं इस पैटर्न को सबूत सहित मजबूत करती हैं। आंकड़े बताते हैं कि 85% ऐसी घटनाएं मुस्लिम बहुल देशों में हुईं, हालांकि गैर-इस्लामिक उदाहरण जैसे कांगो में लॉर्ड्स रेसिस्टेंस आर्मी या इंडोनेशिया में क्रिश्चियन मिलिटेंट्स भी हैं, लेकिन संख्या में बहुत कम। स्पष्ट आंकड़े हैं कि दुनिया भर में समाज में ड्रग्स , आपराधिक व्यवसाय से आजीविका कमाने में भी इसी धर्म जाति वर्ग के लोग बहुतायत में हैं। अतः ऐसे वर्ग के मूल सिद्धांत, संस्कृति, संस्कारों पर सुधार के आधार भूत कार्य आवश्यक हो चले हैं। उन्हें आजादी के नाम पर गलत दिशा में बढ़ने देना उनकी पीढ़ियों के प्रति नैसर्गिक अन्याय ही समझ आता है। 


अपराधों, आतंकी घटनाओं की जांच रिपोर्टों से निकली सच्चाई 

 राज्य प्रायोजित आतंकी समर्थन को उजागर करती हैं। मुंबई 26/11 की जांच में डेविड हेडली ने पाक आईएसआई और लश्कर की साजिश खोली, लेकिन दोषियों को सजा मिलना मुश्किल रहा। 9/11 आयोग ने ओसामा बिन लादेन और अल-कायदा को जिम्मेदार ठहराया, जबकि पेरिस हमलों की रिपोर्ट आईएसआईएस के वैश्विक नेटवर्क से जोड़ती है। ये रिपोर्टें पाकिस्तान जैसे देशों को आतंकी फैक्ट्री बताती हैं, जहां राजनीतिक दबाव से न्याय अधर में लटक जाता है।

 

विश्व समुदाय ने संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में काउंटर-टेररिज्म स्ट्रैटेजी (2006) अपनाई, जो रोकथाम, क्षमता निर्माण, कानूनी कार्रवाई और मानवाधिकार पर आधारित है। यूएनएससी रेजोल्यूशन, सीटीआईटीएफ और आईएमओ जैसे संगठन वित्तीय ट्रैकिंग व समुद्री सुरक्षा पर काम करते हैं। लेकिन ये प्रयास इस्लामिक चरमपंथ पर ज्यादा फोकस्ड हैं, जबकि गैर-राज्य समूहों की विविधता को नजरअंदाज करने से चुनौतियां बनी रहती हैं।


 भारत की आतंक पर जीरो टॉलरेंस नीति आक्रामक कदम है। मोदी सरकार में आतंक पर शून्य सहनशीलता अपनाई, एनआईए को मजबूत कर जम्मू-कश्मीर में फंडिंग रोकी। 2025 का ऑपरेशन सिंदूर, जहां पाकिस्तानी कैंपों पर हवाई हमले कर लश्कर, जैश और हिजबुल को ध्वस्त किया, इसकी मिसाल है। सर्जिकल स्ट्राइक्स और इंडस वाटर संधि निलंबन जैसे कदम पाकिस्तान को सबक सिखाते हैं, जो वैश्विक समर्थन पा रहे हैं। पर क्या परिणाम संतोषजनक हैं? 


समीक्षात्मक नजरिया: कारण और भविष्य..

आतंक का एक धर्म से लिंक नजर आता है, यह आंकड़ों से साफ है, लेकिन जड़ें भू-राजनीति, गरीबी और सरकारी या मिलिट्री के समर्थन में हैं। भारत की नीति सफल रही, पर वैश्विक प्रयासों में समन्वय की कमी है। सभी विचारधाराओं पर संतुलित फोकस जरूरी, वरना पूर्वाग्रह पनपेगा। यह खतरा तब तक रहेगा, जब तक अपराध , ड्रग्स , आतंक के स्रोत देशों पर वैश्विक दबाव न बने , और उन धर्मों के मूल्यों , उनकी सोच , उनकी शिक्षा में सही तब्दीली नहीं होती।


विवेक रंजन श्रीवास्तव

परदेस में कीमत

 परदेस में मूल्य निर्धारण 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


पर्यटन इन दिनों विश्व स्तर पर बहुत सहज है। इस स्थिति में दूसरे देश में चीज़ों की कीमत समझने का सबसे सही तरीका सिर्फ़ अपनी मुद्रा में कन्वर्ट करना नहीं, बल्कि वहाँ की आमदनी और जीवन स्तर के संदर्भ में सोचना है। जिस तरह भारत में 80, 100 रुपये की एक अच्छी चाट आम शहरी के लिए सामान्य मानी जाती है, उसी तरह अमेरिका में लगभग 10 डॉलर की एक प्लेट चाट वहाँ के मध्यमवर्गीय व्यक्ति के लिए उतनी ही सामान्य बात है। जब भारतीय पर्यटक किसी विदेशी रेस्तराँ के मेन्यू पर 10 या 15 डॉलर देखते हैं और तुरंत दिमाग में उसे 900 या 1200 रुपये में बदल देते हैं, तो स्वाभाविक रूप से कीमत बहुत अधिक लगती है, लेकिन यह तुलना अधूरी है, क्योंकि यह केवल मुद्रा के गणित को देखती है, उस समाज की आय और खर्च की वास्तविकता को ध्यान में रखे बिना सही मूल्यांकन संभव नहीं होगा।


किसी भी देश में कॉस्ट ऑफ लिविंग दो चीज़ों से मिलकर बनती है, रोज़मर्रा के खर्च और वहाँ की आमदनी। भारत में एक औसत व्यक्ति का मासिक व्यक्तिगत खर्च डॉलर में बदलने पर भले कुछ सौ डॉलर दिखे, पर इसी के साथ यह भी सच है कि औसत आय अपेक्षाकृत कम है, इसलिए 500 या 1000 रुपये का अतिरिक्त खर्च सोचे समझे बिना करना हर किसी के बस की बात नहीं होती। दूसरी ओर, अमेरिका, यूके, यूएई, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों में वही व्यक्तिगत खर्च डॉलर या पाउंड में देखने पर भारत की तुलना में कई गुना अधिक नज़र आता है, लेकिन उनकी टैक्स के बाद की औसत सैलरी भी अक्सर भारत के मुकाबले कई गुना अधिक होती है। इसीलिए जो चीज़ भारत के नज़रिए से फिजूलखर्ची लग सकती है, वही उन देशों के निवासी के लिए सिर्फ़ एक साधारण, रोज़मर्रा का व्यय होती है।


भारत से सीधी तुलना करें तो यूएई, यूके, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकप्रिय देशों में जीवन यापन का औसत खर्च लगभग तीन से छह गुना तक अधिक दिखाई देता है। किराया, ट्रांसपोर्ट, बाहर खाना, सेवाएँ, सबकी कीमतें भारत से ज्यादा दिखती हैं।  विशेष तौर पर लंदन, दुबई, न्यूयॉर्क, सिडनी या टोरंटो जैसे बड़े शहर इस दृष्टि से और भी महँगे पड़ते हैं। किंतु वही चित्र तब संतुलित दिखने लगता है, जब यह देखा जाए कि इन देशों में औसत नेट सैलरी से किसी व्यक्ति का डेढ़ से दो महीने तक का व्यक्तिगत खर्च निकल सकता है। यानी वहाँ का निवासी, यदि अपने शहर की स्टैंडर्ड नौकरी पर है, तो उसे 10 डॉलर की कॉफी या 15 डॉलर के लंच से उतना झटका नहीं लगता, जितना वह रकम सीधे भारत की अर्थव्यवस्था में डालकर सोचने पर लगती है। इस अंतर को अनदेखा करके केवल कन्वर्ज़न करने से हर कीमत अस्वाभाविक रूप से महँगी लगने लगती है।


यूएई का उदाहरण लें तो दुबई जैसे शहर में किराया, बिजली, पानी और रोज़मर्रा के सामान की कीमतें भारत के औसत से कई गुना ऊपर हैं, लेकिन वहाँ बहुत से पेशों में टैक्स फ्री या कम टैक्स वाली उच्च आय मिलती है, जो इन खर्चों को संतुलित कर देती है। लंदन में सार्वजनिक परिवहन, किराया और बाहर खाना सब महँगे हैं, पर एक सामान्य प्रोफ़ेशनल की आय ऐसी है कि इन खर्चों के बाद भी उसके पास बचत की पर्याप्त गुंजाइश रह जाती है। अमेरिका में भोजन, सेवाएँ और स्वास्थ्य सुविधाएँ भारत के मुकाबले बेहद महँगी मानी जाएँगी, फिर भी एक औसत कामकाजी व्यक्ति की सैलरी उनकी भरपाई कर पाती है। कनाडा में मौसम कठोर है, और कई चीजें आयात पर निर्भर हैं, इसलिए खर्च ऊँचे हैं, पर सामाजिक सुरक्षा और वेतन स्तर उन्हें वहां के लोगों के लिए व्यावहारिक बनाते हैं। ऑस्ट्रेलिया में खाने पीने और सेवा क्षेत्र की कीमतें भारत से कहीं ऊपर हैं, मगर न्यूनतम वेतन और औसत आय दोनों इन्हें वहां के निवासीयों  हेतु सामान्य बनाते हैं।


खाने पीने की बात करें तो भारत में एक साधारण ऑफिस गोअर का लंच 250, 300 रुपये में अच्छे से निपट सकता है, वहीं यूएई या कनाडा के किसी शहर में कोई साधारण कैज़ुअल लंच 10, 15 डॉलर तक का हो सकता है। भारतीय पर्यटक इसे तुरंत रुपये में बदलकर देखता है और मन ही मन सोचता है कि एक दोपहर के खाने पर ही इतना पैसा, लेकिन वहीं के स्थानीय निवासी की मासिक आय को ध्यान में रखें, तो यह खर्च उसकी आमदनी के अनुपात में उतना ही है, जितना भारत में किसी मॉल, फूडकोर्ट या अच्छे ढाबे पर 250, 300 रुपये खर्च करना। कॉफी के साथ भी यही कहानी दोहराई जाती है, भारत में 100 रुपये की कॉफी, विदेश में 4, 5 डॉलर में मिलती है। रुपये में बदलकर देखें तो यह दो, तीन गुना महँगी लगती है, मगर स्थानीय आय के अनुपात में यह किसी भी ऑफिस गोअर के लिए उतनी ही साधारण छोटी सी ट्रीट है, जितनी भारत में किसी चाय नाश्ते पर 40, 50 रुपये खर्च करना।


पर्यटक के लिए सबसे व्यावहारिक नज़रिया यह है कि हर कीमत को अपनी घरेलू मुद्रा में बदल बदलकर चौंकने के बजाय दैनिक बजट के रूप में देखे। यदि भारत में कोई व्यक्ति दिन भर के खाने पीने पर लगभग 800, 1000 रुपये खर्च करता है, तो अमेरिका या यूके जाते समय उसे यह देखना चाहिए कि वहाँ उसी तरह के सरल, लेकिन आरामदायक दिन के लिए कितना बजट उचित होगा, उदाहरण के लिए 30, 40 डॉलर प्रतिदिन। इस तुलना में केवल अंकों का खेल नहीं, बल्कि स्थानीय आय और वहाँ का सामान्य जीवन स्तर भी शामिल होना चाहिए। साथ ही, हर जगह खर्च कम रखने के व्यावहारिक तरीके मौजूद हैं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेना, सुपरमार्केट से तैयार या अर्ध तैयार भोजन खरीदना, ऐसे हॉस्टल या सर्विस्ड अपार्टमेंट चुनना जहाँ किचन की सुविधा हो, और अत्यधिक पर्यटक केन्द्रित महँगे इलाकों की बजाय थोड़ा अंदरूनी, स्थानीय मोहल्लों के कैफ़े, रेस्तराँ आज़माना। इस तरह, अत्यधिक महँगे दिखने वाले देशों में भी यात्रा का कुल खर्च काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।


सबसे दिलचस्प और उपयोगी मानसिक अभ्यास यह है कि जब भी किसी बोर्ड पर 10, 15 डॉलर या 8, 12 पाउंड की कीमत देखकर झटका लगे, तो अपने आप से एक छोटा सा प्रश्न पूछा जाए, यदि मेरी तनख़्वाह भी इस देश की औसत सैलरी जितनी होती, तो क्या यह दाम उतना ही चुभता। बहुत बार इसका उत्तर नहीं होगा, और वही क्षण होता है जब समझ में आता है कि दिक्कत वास्तविक कीमत से ज़्यादा, हमारे तुलना करने  की मानसिकता में है। करेंसी कन्वर्ज़न का यह जाल जितना आकर्षक दिखता है, उतना ही भ्रामक भी है। उससे बाहर निकलकर, जब कोई भारतीय यात्री यूएई, लंदन, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या कनाडा की कीमतों को उनकी स्थानीय आमदनी और जीवन स्तर के संदर्भ में देखना शुरू कर देता है, तो उसकी यात्रा न केवल कम तनावपूर्ण होती है, बल्कि एक तरह से आर्थिक और सांस्कृतिक समझ को भी गहरा करती है। तब 10 डॉलर की चाट केवल 950 रुपये की फिजूल खर्ची नहीं, बल्कि एक नए समाज के जीवन स्तर की छोटी सी झलक बन जाती है, और यात्रा का अनुभव सचमुच ज्ञानवर्धक और रोचक हो उठता है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

Saturday, 13 December 2025

आकाश की आतिशबाजी

 आकाश की आतिशबाजी


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 उल्का बारिश का विज्ञान रोचक है। 

न्यूयॉर्क शहर की चकाचौंध और व्यस्तता से कोई 60 मील दूर सैंड हुक सी बीच पर आज रात 10 बजे , रुई के फाहे सी बर्फ की बारिश के बीच , माईनस 4 डिग्री तापमान में हम आसमान में होने वाले एक अद्भुत खगोलीय नाटक की प्राकृतिक आसमानी आतिशबाजी देखने गए थे। ये और बात है कि मौसम की धोखेबाजी के चलते उल्का पिंडों की वह चमकीली बारिश देखना संभव नहीं हो पाया। हर वर्ष निश्चित तिथियों पर अंधेरा आसमान प्रकृति के आतिशी प्रदर्शन का मंच बन जाता है जब उल्का बारिश होती है। ये टिमटिमाती, तेज़ी से बिजली की तरह चमकती और गायब हो जाने वाली रेखाएँ जिन्हें आम लोग तारे टूटना समझते है, दरअसल अंतरिक्ष से आई मिट्टी और चट्टान के अवशेष हैं, जो हमारे वायुमंडल में प्रवेश करते ही जल उठते हैं, और तेज रोशनी होती है। 


लेकिन ये "टूटते तारे" आते कहाँ से हैं? और हडसन हार्बर के किनारे अटलांटिक महासागर के छोर से इन्हें देखना इतना खास क्यों है? आइए, इसके पीछे के विज्ञान को समझें।


उल्का बारिश: एक खगोलीय धूल-सफाई जैसा होता है।

हर उल्का बारिश का एक स्रोत कोई धूमकेतु होता है। धूमकेतु, जो बर्फ, धूल और चट्टानों के पिण्ड होते हैं, सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपने पीछे धूल और छोटे पत्थरों की एक व्यापक पट्टी छोड़ जाते हैं। जब पृथ्वी अपने कक्षा में चक्कर लगाते हुए इस धूल के पट्टे से गुज़रती है, तो ये कण हमारे वायुमंडल में तेज़ी से प्रवेश करते हैं।

आम धारणा के विपरीत, उल्काओं का चमकना सिर्फ हवा के घर्षण के कारण नहीं होता। असल में, यह " तरंगों का दबाव" (Ram Pressure) का नतीजा होता है। जब ये कण (जिन्हें उल्कापिण्ड कहते हैं) 30 से 70 किलोमीटर प्रति सेकंड की अकल्पनीय गति से हमारे वायुमंडल में घुसते हैं, तो उनके सामने की हवा अत्यंत संपीड़ित और गर्म हो जाती है (लगभग 1600 डिग्री सेल्सियस तक)। यही गर्म हवा उल्कापिण्ड के पदार्थ को वाष्पीकृत कर देती है और हवा के अणुओं को "आयनित" कर एक चमकदार प्लाज़्मा की पूंछ बना देती है, जिसे हम एक चमकती रेखा के रूप में देखते हैं। अधिकांश उल्कापिण्ड बालू के दाने से भी छोटे होते हैं और इसी प्रक्रिया में पूरी तरह जलकर खाक हो जाते हैं।

"रेडिएंट" का रहस्य: हर उल्का बारिश का नाम उस तारामंडल के नाम पर रखा जाता है, जिस ओर से वे आते हुए प्रतीत होते हैं। इस बिंदु को "रेडिएंट" (उद्गम बिंदु) कहते हैं। उदाहरण के लिए, अगस्त में दिखने वाली पर्सिड्स बारिश पर्सियस तारामंडल की दिशा से आती हुई लगती है। पर्सिड्स हर साल (अगस्त 12-13)को और जेमिनिड्स (दिसंबर 13-14), या क्वाड्रैंटिड्स से , (जनवरी की शुरुआत) में उल्का वर्षा होती है। 

आज हम जेमिनीड्स मेट्योर शावर देखने ही गए थे। 


यह नैसर्गिक नजारा देखने के लिए रात गहरी होने दें , अपनी आँखों को कम से कम 20-30 मिनट के लिए अंधेरे में देखने के लिए अभ्यस्त बनाना ठीक होता है। 

फोन की स्क्रीन से दूर रह कर नंगी आंखों शांत आसमान निहारने पर यदि आसमान साफ हुआ तो हम यह आनंद ले सकते हैं।

कैंपिंग की कुर्सी या कंबल बिछाकर लेट जाएँ, ताकि गर्दन न दर्द करे। सीधे ऊपर की ओर देखें।

उल्का देखना एक ध्यान की प्रक्रिया की तरह है। 5-10 मिनट में एक उल्का देखना भी एक बड़ी सफलता माना जाता है।


हडसन के किनारे बैठकर उल्का बारिश देखना सिर्फ एक सुंदर नज़ारा नहीं, बल्कि विज्ञान और विस्मय का एक सजीव पाठ है। आप वास्तव में देख रहे होते हैं कि हमारा ग्रह, एक विशाल अंतरिक्ष यान की तरह, करोड़ों साल पुराने एक धूमकेतु के मलबे के बादल से गुज़र रहा है। ये चमकती हुई रेखाएँ हमें हमारे सौर मंडल की गतिशील प्रकृति और उस नन्हे-से बिंदु की याद दिलाती हैं, जिसमें हम इस विशाल ब्रह्मांड में रहते हैं।

 अगली बार जब कभी इन तिथियों में आप न्यूयॉर्क में हों और कोई उल्का बारिश की वैज्ञानिक संभावना 

हो, तो हडसन के किनारे की ओर रुख कीजिए, और खुद को इस प्राचीन खगोलीय नृत्य का गवाह बनने दीजिए। यह प्रकृति का अपना, बिना किसी शुल्क का, आतिशबाज़ी का शो है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

पलायन पर विराम के लिए जरूरी बात

 गाँव से पलायन पर विराम के लिए जरूरी बात


विवेक रंजन श्रीवास्तव

 ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी , भोपाल 


है अपना हिंदुस्तान कहाँ , वह बसा हमारे गाँवों में !


 दुनिया में हमारे गांवो की विशिष्ट पहचान यहां की आत्मीयता,सचाई और प्रेम है .

विकास का अर्थ आर्थिक उन्नति से ही लगाया जाता है , हमारे गाँवो का ऐसा विकास होना चाहिये कि आर्थिक उन्नति तो हो किन्तु हमारे ग्रामवासियों के ये जो नैतिक और चारित्रिक गुण हैं , वे बने रहें . गांवो के आर्थिक विकास के लिये कृषि तथा मानवीय श्रम दो प्रमुख साधन प्रचुरता में हैं . इन्हीं दोनो से उत्पादन में वृद्धि व विकास संभव है . उत्पादकता बढ़ाने के लिये बौद्धिक आधार आवश्यक है , जो अच्छी शिक्षा से ही संभव है .

आज वांछित सुविधाओं के अभाव में गांव व्यापक रूप से पलायन का दर्द झेल रहे हैं। किसान बड़े बड़े खेत बेचकर शहर में फ्लैट में रह रहे हैं, नई पीढ़ी खुद के खेत में मेहनत कर अनिश्चित आमदनी की अपेक्षा , शहर में किसी की नौकरी करके बंधी हुई तनख्वाह में गुजारा करना चाह रहा है। छठ पूजा , ग्रीष्म अवकाश , दीपावली या अन्य त्यौहारों पर महानगरों से गांवों की ओर भागती भीड़ बताती है कि अभी भी लोगों की जड़े गांवों में ही हैं , और यदि गांवों का समुचित विकास नीतिगत रूप से किया जाए तो वर्तमान पलायन रुक सकता है।

 पुस्तकीय ज्ञान व तकनीक , शिक्षा के दो महत्वपूर्ण पहलू हैं . ग्राम विकास के लिये तकनीकी शिक्षा के साथ साथ चरित्रवान व्यक्ति बनाने वाली शिक्षा दी जानी चाहिये . वर्तमान स्वरूप में शिक्षित व्यक्ति में शारीरिक श्रम से बचने की प्रवृत्ति भी स्वतः विकसित हो जाती है , यही कारण है कि किंचित भी शिक्षित युवा शहरो की ओर पलायन कर रहा है . आज ऐसी शिक्षा की जरूरत है जो सुशिक्षित बनाये पर व्यक्ति शारीरिक श्रम करने से न हिचके.

स्थानीय परिस्थितियो के अनुरूप प्रत्येक ग्राम के विकास की अवधारणा भिन्न ही होगी । जिसे ग्राम सभा की मान्यता के द्वारा हर ग्रामवासी का उसका अपना कार्यक्रम बनाना होगा . 

गांव के विकास के लिए जहाँ भुमि उपजाऊ है वहां खेती, फलों फूलो बागवानी नर्सरी को बढ़ावा , व कृषि से जुड़े पशुपालन का विकास किया जाना चाहिए।

वन्य क्षेत्रो में वनो से प्राप्त उत्पादो से संबंधित योजनायें व कुटिर उद्योगो को और बढ़ावा दिया जाना जरूरी है।

शहरो से लगे हुये गांवो में शासकीय कार्यालयो में से कुछ गांव में प्रारंभ किया जाना चाहिए , जिससे शहर गांवों की ओर जाए तथा शहरो व गांवो का सामंजस्य बढ़े ।

पर्यटन क्षेत्रो से लगे गाँवो में पर्यटको के लिये ग्रामीण आतिथ्य की सुविधा सुलभ करवाना चाहिए ।

विशेष अवधारणा के साथ समूचे गांव को एक रूपता देकर विशिष्ट बनाकर दुनिया के सामने प्रस्तुत किया जाए जिससे ग्रामीणों में गर्व की अनुभूति हो और पलायन रुके । उदाहरण स्वरूप जैसे जयपुर पिंक सिटी के रूप में मशहूर है , किसी गांव के सारे घर एक से बनाये जा सकते हैं , उन्हें एक रंग दिया जा सकता है और उसकी विशेष पहचान बनाई जा सकती है , वहां की सांस्कृतिक छटा के प्रति , ग्रामीण व्यंजनो के प्रति प्रचार के द्वारा लोगो का ध्यान खींचा जा सकता है . वहां के वैशिष्ट्य को रेखांकित किया जाना चाहिए।

कार्पोरेट ग्रुपों द्वारा गांवों में अपने कार्यालय खोलने पर उन्हें करों में छूट देकर कुछ गांवो की विकास योजनायें बनाई जा सकती हैं ।

इत्यादि अनेक प्रयोग संभव हैं,पर हर स्थिति में ग्राम संस्कृति का अपनापन , प्रेम व भाईचारे को अक्षुण्य बनाये रखते हुये , गांव से पलायन रोकते हुये गाँवो में सड़क ,बिजली ,संचार ,

स्वच्छ पेय जल , स्वास्थ्य सुविधाओ की उपलब्धता की सुनिश्चितता व स्थानीय भागीदारी से ही गांवो का सच्चा विकास संभव है. इन्हीं प्रयासों से गांवों का अस्तित्व बचा रहेगा और परोक्ष रूप से स्वतः ही गांवों से पलायन पर विराम लगेगा । 

 ग्रामीण जीवन को बेहतर और आत्मनिर्भर बनाने के लिए निम्न बिंदुओं पर कार्य हों 


1. रोजगार के अवसर बढ़ाना

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की कमी पलायन का एक बड़ा कारण है। इसे रोकने के लिए:

- छोटे उद्योग और कुटीर उद्योग: गांवों में छोटे उद्योग, जैसे हस्तशिल्प या खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, शुरू करने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए।

- कृषि-आधारित व्यवसाय: दूध, शहद, या जैविक खेती जैसे व्यवसायों को बढ़ावा देना।

- प्रशिक्षण केंद्र: सरकार और निजी क्षेत्र मिलकर युवाओं को कौशल प्रशिक्षण दे सकते हैं, ताकि वे स्थानीय स्तर पर रोजगार पा सके

- 2. कृषि को लाभकारी बनाना

कृषि ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन इसके लाभकारी न होने से लोग शहरों की ओर पलायन करते हैं। इसके लिए:

- उचित मूल्य: किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य सुनिश्चित करना।

- आधुनिक तकनीक: ड्रिप इरिगेशन, बीज सुधार, और जैविक खेती जैसी तकनीकों को बढ़ावा देना।

- बाजार पहुंच: कोल्ड स्टोरेज और परिवहन सुविधाओं के जरिए बाजार तक आसान पहुंच।

- फसल बीमा और सब्सिडी: प्राकृतिक आपदाओं से नुकसान की भरपाई के लिए बीमा और सब्सिडी प्रदान करना।


 3. शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं

शिक्षा और स्वास्थ्य की कमी भी पलायन का कारण है। इसे बेहतर करने के लिए:

- शिक्षा: गांवों में गुणवत्तापूर्ण स्कूल और कॉलेज स्थापित करना, ताकि बच्चों को शहर न जाना पड़े।

- स्वास्थ्य: प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और अस्पतालों का विकास, जिससे लोग इलाज के लिए शहरों पर निर्भर न रहें।


4. बुनियादी ढांचे का विकास

ग्रामीण जीवन को आकर्षक बनाने के लिए मूलभूत सुविधाएं जरूरी हैं:

- सड़क और परिवहन: बेहतर सड़कें गांवों को बाजार और शहरों से जोड़ेंगी।

- बिजली और पानी: नियमित बिजली और स्वच्छ पानी की आपूर्ति।

- इंटरनेट: डिजिटल कनेक्टिविटी से लोग घर बैठे ऑनलाइन काम कर सकेंगे।

5. स्वरोजगार और स्टार्टअप को बढ़ावा

ग्रामीण युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए:

- ऋण और मेंटरशिप: छोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए सस्ते ऋण और विशेषज्ञ मार्गदर्शन।

- संभावित क्षेत्र: हस्तशिल्प, जैविक खेती, या ग्रामीण पर्यटन जैसे क्षेत्रों में स्टार्टअप को प्रोत्साहन।


6. सामुदायिक भागीदारी

ग्रामीण विकास में समुदाय की भूमिका अहम है:

- ग्राम पंचायतों को सशक्त करना: स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की शक्ति बढ़ाना।

- जुड़ाव बढ़ाना: लोगों को अपने गांव की प्रगति में भागीदार बनाना, जिससे उनका भावनात्मक लगाव बना रहे।


7. पर्यावरण और पर्यटन का विकास

गांवों की प्राकृतिक सुंदरता को आय का स्रोत बनाया जा सकता है:

- ग्रामीण पर्यटन: प्राकृतिक स्थलों, संस्कृति, और परंपराओं को बढ़ावा देकर पर्यटकों को आकर्षित करना।

- हरित गांव: पर्यावरण संरक्षण से गांवों को स्वच्छ और आकर्षक बनाना।


सहयोग की आवश्यकता

इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सरकार, गैर-सरकारी संगठन (NGO),और ग्रामीण समुदाय के बीच मजबूत सहयोग जरूरी है। सरकार नीतियां और संसाधन प्रदान कर सकती है, NGO तकनीकी सहायता और जागरूकता बढ़ा सकते हैं, और समुदाय स्थानीय स्तर पर कार्यान्वयन में योगदान दे सकता है।

जब गांवों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध होंगी, साथ ही लोग आत्मनिर्भर बनेंगे, तो पलायन स्वाभाविक रूप से कम होगा। ये उपाय न केवल ग्रामीण जीवन को बेहतर बनाएंगे, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करेंगे।


 विवेक रंजन श्रीवास्तव