Saturday, 13 December 2025

बाल कथा, अच्छी आदत

 

बाल कथा 
अच्छी आदत
विवेक रंजन श्रीवास्तव 

रमा को अपने बेटे राजू की एक आदत बहुत अच्छी लगती थी कि वह स्कूल से आते ही अपना बस्ता उसके पास रख देता और दिन भर की छोटी बड़ी बातें बिना पूछे ही सुनाने लगता। रमा ध्यान से सुनती और कभी कभी उसके बस्ते को भी देख लेती कि कहीं कोई किताब फटी तो नहीं या पेंसिल कम तो नहीं हो गई। उसे लगता था कि बच्चे की पढ़ाई के साथ साथ उसकी आदतों पर भी नजर रखना जरूरी है।

एक दिन रमा ने देखा कि राजू के बस्ते में एक नई पेंसिल है जो उसने घर से नहीं दी थी। उसने सहज भाव से पूछा तो राजू ने मां को टालते हुए कहा कि स्कूल में एक दोस्त ने दे दी थी। रमा ने उस समय कुछ नहीं कहा। अगले दिन फिर उसे राजू के बस्ते में  एक अलग रबर  दिखी। फिर उसके दो दिन बाद एक रंगीन शार्पनर। अब रमा का ध्यान ठहर गया। उसे समझ आ गया कि बात केवल देने लेने की नहीं है, कहीं न कहीं राजू बिना पूछे दूसरों का सामान उठा लाता है।

शाम को उसने राजू को पास बिठाया। गुस्सा नहीं किया, डांटा नहीं, बस प्यार से सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा कि क्या यह सामान उसका है। राजू पहले तो चुप रहा, फिर बोला कि स्कूल में किसी की पेंसिल गिर गई थी तो उसने रख ली, किसी की रबर अच्छी लगी तो उसने ले ली। रमा ने धीरे से  समझाया कि बिना पूछे किसी की चीज लेना गलत होता है, चाहे वह छोटी सी पेंसिल ही क्यों न हो। जिस तरह उसे अपना सामान प्यारा लगता है, उसी तरह दूसरे बच्चों को भी अपना सामान प्यारा लगता है।

अगले दिन रमा खुद राजू के साथ स्कूल गई। उसने अध्यापिका से बात की और राजू से कहा कि वह जिन बच्चों का सामान है, उन्हें पहचान कर वापस करे। राजू का सिर झुका हुआ था, पर रमा की आंखों में उसके लिए प्यार  और भरोसा था। कक्षा में जाकर राजू ने एक एक करके पेंसिल, रबर और शार्पनर जिन बच्चों के थे उन को लौटा दिए और माफी भी मांगी। 
किसी ने उसे डांटा नहीं, बल्कि अध्यापिका ने राजू के लिए पूरी क्लास से ताली बजवाई और कहा कि गलती समझ लेना और उसे सुधार लेना ही अच्छी आदत होती है।

उस दिन स्कूल से लौटते समय राजू का मन शांत था। घर आकर उसने खुद रमा से कहा कि अब वह कभी बिना पूछे किसी की चीज नहीं लेगा। अगर कुछ पसंद आएगा तो मां से कहेगा। रमा ने उसे गले लगा लिया। उसे लगा कि आज उसका बेटा थोड़ा समझदार और बड़ा हो गया है। 
 रमा अब जब कभी राजू का बस्ता देखती तो मन ही मन मुस्करा देती , वह समझती थी कि उसने राजू की एक अच्छी आदत डाल दी थी, जो उसके जीवन भर उसका व्यक्तित्व प्रभावित करेगी । 

विवेक रंजन श्रीवास्तव
आजकल न्यूयॉर्क में 

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