Tuesday, 23 December 2025

विनोद कुमार शुक्ल : एक शब्द यात्री

 विनोद कुमार शुक्ल : एक शब्द यात्री


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


हिंदी के आधुनिक कथा‑साहित्य और कविता में विनोद कुमार शुक्ल उस विरल रचनाकार के रूप में जाने जाते हैं, जिसने साधारण जीवन की निस्सार दिखाई देने वाली वस्तुओं और स्थितियों में भी अद्भुत काव्यात्मक चमक और जादुई यथार्थ की आभा दिखाई । 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे विनोद कुमार शुक्ल ने लगभग पाँच दशकों से अधिक समय तक लगातार लेखन करते हुए कविता, उपन्यास, कहानी और बच्चों के लिए साहित्य की ऐसी दुनिया रची, जो हिंदी के पारंपरिक ढाँचों से बाहर निकलकर एक बिल्कुल निजी, लेकिन गहरे मानवीय संसार का सृजन करती है। 

वे शिक्षक के रूप में कृषि महाविद्यालय से जुड़े रहे इस संकोची, अल्पभाषी लेखक ने सार्वजनिक मंचों की चकाचौंध से दूर रहकर भी अपने शब्दों की शक्ति से राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक जगत में विशिष्ट प्रतिष्ठा अर्जित की। 


उनकी रचना‑यात्रा का आरंभ कविता से हुआ। पहला कविता‑संग्रह “लगभग जय हिंद” 1971 में प्रकाशित हुआ, जिसने उनके भीतर बसे राजनीतिक‑सामाजिक बोध और देशज संवेदना की अनोखी मिश्रित ध्वनियों से हमारा परिचय कराया। इसके बाद “वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह” जैसे संग्रहों ने संकेत दिया कि वे शब्दों की चलन वाली सांकेतिकता से संतुष्ट नहीं, बल्कि भाषा को एकदम नए संयोजनों में बरतने वाले कवि हैं, जो वाक्य‑विन्यास और उपमा‑संरचना दोनों को उलट‑पलट कर देखने की हिम्मत रखते हैं। बाद के वर्षों में उनकी कविताएँ “आकाश धरती को खटकता है”, “कविता से लंबी कविता” आदि संग्रहों के रूप में सामने आईं, जिनमें प्रकृति, घर‑परिवार, छोटे शहर और साधारण मनुष्यों के जीवन की सूक्ष्मतम हलचलें एक बेहद शांत, धीमी, किंतु भीतर तक उतर जाने वाली आवाज़ में दर्ज होती हैं। 


काव्य के साथ‑साथ विनोद कुमार शुक्ल का कथा‑संसार हिंदी उपन्यास और कहानी की परंपरा में एक बड़ी संरचनात्मक तब्दीली के रूप में देखा जाता है। 1979 में प्रकाशित उनका पहला उपन्यास “नौकर की कमीज़” हिंदी गद्य में एक मील का पत्थर माना जाता है, जिसे बाद में मणी कौल ने इसी नाम से फिल्म में रूपांतरित किया। एक साधारण सरकारी क्लर्क और “नौकर की कमीज़” के बहाने सत्ता, वर्ग, पहचान और आत्मसम्मान की जटिल परतें जिस शांत और लगभग सपाट लगने वाली भाषा में खुलती हैं, वह हिंदी उपन्यास की पारंपरिक कथावस्तु और शिल्प दोनों को तोड़ती दिखाई देती है। कई आलोचकों ने इसे हिंदी में उपन्यास की संरचना को बदल देने वाली कृति कहा। “खिलेगा तो देखेंगे” और “दीवार में एक खिड़की रहती थी” उनके ऐसे उपन्यास हैं, जिनमें शहर, घर, दीवार, खिड़की, पेड़, कमरा जैसी चीज़ें स्वयं पात्रों की तरह व्यवहार करती हैं। “दीवार में एक खिड़की रहती थी” को 1999 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया और इस पर नाट्य रूपांतरण भी हुआ। हाल ही इस उपन्यास पर तीस लाख की रॉयल्टी ने उन्हें एक बार फिर से साहित्य जगत में चर्चित बना दिया था।


उनका कहानी‑संसार भी उतना ही विशिष्ट और प्रयोगधर्मी है। “पेड़ पर कमरा” और “महाविद्यालय” जैसी कहानी‑कृतियों में कॉलेजों, कमरों, पेड़ों, गलियारों और मामूली‑से संवादों के भीतर छुपा हुआ अकेलापन, असुरक्षा, प्रेम, स्मृति और प्रतिरोध एक धीमी, लगभग फुसफुसाती हुई शैली में उजागर होता है। बाद के वर्षों में उन्होंने बच्चों के लिए भी लगातार लिखा । उनकी बाल‑कथाएँ और कविताएँ बचपन की कल्पना, खेल, चीज़ों से बातें करने की प्रवृत्ति और प्रकृति के साथ सरल, निर्भय संवाद को केंद्र में रखती हैं, जिनमें भाषा न तो बचकाना है, न उपदेशपूर्ण, बल्कि एक सहयात्री की तरह अभिव्यक्त होती है। उनकी कई रचनाएँ अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित हुईं। “ब्लू इज़ लाइक ब्लू” जैसे कहानी‑संग्रह और “Treasurer of Piggy Banks” जैसी कविताओं की अंग्रेज़ी पुस्तकों ने नए, युवा पाठकों की पीढ़ी तक उनकी पहुँच को बढ़ाया और उनके जादुई शब्द यथार्थ को वैश्विक पाठकीय संसार से जोड़ा। 


उपलब्धियों की दृष्टि से विनोद कुमार शुक्ल समकालीन हिंदी के सम्मानित लेखकों में गिने जाते हैं। 1999 में उपन्यास “दीवार में एक खिड़की रहती थी” के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला, जिसे आधुनिक हिंदी कथा‑साहित्य की एक क्लासिक कृति के रूप में व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त हुई। 2023 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके समग्र रचनात्मक अवदान को देखते हुए उन्हें PEN/Nabokov Award for Achievement in International Literature से सम्मानित किया गया, जिसने उनके काम को विश्व‑साहित्य के मानचित्र पर विशेष रूप से रेखांकित किया। 2024 के लिए घोषित 59वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें प्रदान किया गया। वे छत्तीसगढ़ से यह सर्वोच्च भारतीय साहित्यिक सम्मान पाने वाले पहले और हिंदी के बारहवें लेखक बने, जहाँ पुरस्कार‑निर्णायकों ने उनकी लेखनी की “सादगी, संवेदनशीलता और विशिष्ट शिल्प” को विशेष रूप से रेखांकित किया। 


दिसंबर 2025 में 89 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ हिंदी जगत ने स्वीकार किया कि यह केवल एक लेखक का जाना नहीं, बल्कि “शुक्ल‑युग” के अंत जैसा है। यह भी विचारणीय है कि उनके जैसा विद्वान जो समाज की संपत्ति माना जाना चाहिए, अपने अंतिम समय में अस्पताल में कोई खास अलग सरकारी इंपॉर्टेंस प्राप्त नहीं कर सका । कई समकालीन लेखकों ने रेखांकित किया कि उन्होंने हिंदी कविता, कहानी और उपन्यास को नए सिरे से रचते हुए उन्हें हस्तक्षेपकारी, प्रयोगधर्मी और गहरे मानवीय स्वर दिया। उनकी रचनाओं में साधारण आदमी के प्रति अटूट संवेदनशीलता, वस्तुओं और क्रियाओं को देखने का अनोखा नजरिया तथा वाक्य‑निर्माण की विशिष्ट स्थापत्य‑कला उन्हें ऐसा लेखक बनाती है, जिसकी पहचान केवल नाम से नहीं, भाषा से हो जाती है। इस अर्थ में उन्होंने हिंदी गद्य की संवेदना और शब्द‑संरचना दोनों को पुनर्निर्मित किया। इसी लिए विनोद कुमार शुक्ल भविष्य में भी इस रूप में याद किए जाएंगे कि उन्होंने हिंदी साहित्य को एक शांत, लगभग संकोची, लेकिन भीतर से बेहद तीखे और जागरूक जादुई यथार्थ की दुनिया दी, जहाँ आम आदमी की गरिमा, प्रकृति से उसका अंतरंग रिश्ता और भाषा की अनंत संभावनाएँ मिलकर शब्दों का एक नया घर बनाती हैं। 


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

( लेखक पुरस्कृत वरिष्ठ स्वतंत्र आलोचक , रचनाकार हैं)

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