Saturday, 13 December 2025

आकाश की आतिशबाजी

 आकाश की आतिशबाजी


विवेक रंजन श्रीवास्तव 


 उल्का बारिश का विज्ञान रोचक है। 

न्यूयॉर्क शहर की चकाचौंध और व्यस्तता से कोई 60 मील दूर सैंड हुक सी बीच पर आज रात 10 बजे , रुई के फाहे सी बर्फ की बारिश के बीच , माईनस 4 डिग्री तापमान में हम आसमान में होने वाले एक अद्भुत खगोलीय नाटक की प्राकृतिक आसमानी आतिशबाजी देखने गए थे। ये और बात है कि मौसम की धोखेबाजी के चलते उल्का पिंडों की वह चमकीली बारिश देखना संभव नहीं हो पाया। हर वर्ष निश्चित तिथियों पर अंधेरा आसमान प्रकृति के आतिशी प्रदर्शन का मंच बन जाता है जब उल्का बारिश होती है। ये टिमटिमाती, तेज़ी से बिजली की तरह चमकती और गायब हो जाने वाली रेखाएँ जिन्हें आम लोग तारे टूटना समझते है, दरअसल अंतरिक्ष से आई मिट्टी और चट्टान के अवशेष हैं, जो हमारे वायुमंडल में प्रवेश करते ही जल उठते हैं, और तेज रोशनी होती है। 


लेकिन ये "टूटते तारे" आते कहाँ से हैं? और हडसन हार्बर के किनारे अटलांटिक महासागर के छोर से इन्हें देखना इतना खास क्यों है? आइए, इसके पीछे के विज्ञान को समझें।


उल्का बारिश: एक खगोलीय धूल-सफाई जैसा होता है।

हर उल्का बारिश का एक स्रोत कोई धूमकेतु होता है। धूमकेतु, जो बर्फ, धूल और चट्टानों के पिण्ड होते हैं, सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपने पीछे धूल और छोटे पत्थरों की एक व्यापक पट्टी छोड़ जाते हैं। जब पृथ्वी अपने कक्षा में चक्कर लगाते हुए इस धूल के पट्टे से गुज़रती है, तो ये कण हमारे वायुमंडल में तेज़ी से प्रवेश करते हैं।

आम धारणा के विपरीत, उल्काओं का चमकना सिर्फ हवा के घर्षण के कारण नहीं होता। असल में, यह " तरंगों का दबाव" (Ram Pressure) का नतीजा होता है। जब ये कण (जिन्हें उल्कापिण्ड कहते हैं) 30 से 70 किलोमीटर प्रति सेकंड की अकल्पनीय गति से हमारे वायुमंडल में घुसते हैं, तो उनके सामने की हवा अत्यंत संपीड़ित और गर्म हो जाती है (लगभग 1600 डिग्री सेल्सियस तक)। यही गर्म हवा उल्कापिण्ड के पदार्थ को वाष्पीकृत कर देती है और हवा के अणुओं को "आयनित" कर एक चमकदार प्लाज़्मा की पूंछ बना देती है, जिसे हम एक चमकती रेखा के रूप में देखते हैं। अधिकांश उल्कापिण्ड बालू के दाने से भी छोटे होते हैं और इसी प्रक्रिया में पूरी तरह जलकर खाक हो जाते हैं।

"रेडिएंट" का रहस्य: हर उल्का बारिश का नाम उस तारामंडल के नाम पर रखा जाता है, जिस ओर से वे आते हुए प्रतीत होते हैं। इस बिंदु को "रेडिएंट" (उद्गम बिंदु) कहते हैं। उदाहरण के लिए, अगस्त में दिखने वाली पर्सिड्स बारिश पर्सियस तारामंडल की दिशा से आती हुई लगती है। पर्सिड्स हर साल (अगस्त 12-13)को और जेमिनिड्स (दिसंबर 13-14), या क्वाड्रैंटिड्स से , (जनवरी की शुरुआत) में उल्का वर्षा होती है। 

आज हम जेमिनीड्स मेट्योर शावर देखने ही गए थे। 


यह नैसर्गिक नजारा देखने के लिए रात गहरी होने दें , अपनी आँखों को कम से कम 20-30 मिनट के लिए अंधेरे में देखने के लिए अभ्यस्त बनाना ठीक होता है। 

फोन की स्क्रीन से दूर रह कर नंगी आंखों शांत आसमान निहारने पर यदि आसमान साफ हुआ तो हम यह आनंद ले सकते हैं।

कैंपिंग की कुर्सी या कंबल बिछाकर लेट जाएँ, ताकि गर्दन न दर्द करे। सीधे ऊपर की ओर देखें।

उल्का देखना एक ध्यान की प्रक्रिया की तरह है। 5-10 मिनट में एक उल्का देखना भी एक बड़ी सफलता माना जाता है।


हडसन के किनारे बैठकर उल्का बारिश देखना सिर्फ एक सुंदर नज़ारा नहीं, बल्कि विज्ञान और विस्मय का एक सजीव पाठ है। आप वास्तव में देख रहे होते हैं कि हमारा ग्रह, एक विशाल अंतरिक्ष यान की तरह, करोड़ों साल पुराने एक धूमकेतु के मलबे के बादल से गुज़र रहा है। ये चमकती हुई रेखाएँ हमें हमारे सौर मंडल की गतिशील प्रकृति और उस नन्हे-से बिंदु की याद दिलाती हैं, जिसमें हम इस विशाल ब्रह्मांड में रहते हैं।

 अगली बार जब कभी इन तिथियों में आप न्यूयॉर्क में हों और कोई उल्का बारिश की वैज्ञानिक संभावना 

हो, तो हडसन के किनारे की ओर रुख कीजिए, और खुद को इस प्राचीन खगोलीय नृत्य का गवाह बनने दीजिए। यह प्रकृति का अपना, बिना किसी शुल्क का, आतिशबाज़ी का शो है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

न्यूयॉर्क से

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