मनरेगा की जगह जी राम जी
विवेक रंजन श्रीवास्तव
(सामाजिक लेखन हेतु पुरस्कार प्राप्त)
भारत के ग्रामीण विकास ढांचे में मनरेगा को लंबे समय तक सामाजिक सुरक्षा, रोजगार गारंटी और ग्राम स्तर पर आधारभूत ढांचे के निर्माण का महत्वपूर्ण कानून माना गया। लगभग दो दशकों तक मनरेगा ने ग्रामीण परिवारों को न्यूनतम मजदूरी के साथ स्थानीय स्तर पर काम उपलब्ध कराने में बड़ी भूमिका निभाई। अब केंद्र सरकार ने मनरेगा की जगह विकसित भारत– "गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)", अर्थात ‘वीबी‑जी राम जी’ योजना लागू करने का निर्णय लिया है, जिसे आम बोलचाल में जी राम जी योजना कहा जा रहा है। यह परिवर्तन केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण रोजगार ढांचे के दर्शन, वित्तीय संरचना और शासन‑तंत्र को पुनर्परिभाषित करने वाला कदम है।
यद्यपि स्पष्ट है कि सत्ता पक्ष ने लोक व्यापी "राम" के रूप में योजना का शार्ट नाम रख कर एक अंतर्निहित भाव तथा दिशा प्रदर्शन में संकोच नहीं किया।
मनरेगा का मूल उद्देश्य ग्रामीण परिवारों की आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करना था, जिसके लिए प्रत्येक पात्र ग्रामीण परिवार को प्रति वर्ष कम से कम सौ दिन का अकुशल शारीरिक श्रम उपलब्ध कराने की कानूनी गारंटी दी गई। इस कानून की वैचारिक पृष्ठभूमि में “रोजगार एक अधिकार” और ग्रामसभा‑केंद्रित भागीदारी का विचार प्रमुख था, इसलिए काम की मांग दर्ज होते ही प्रशासन पर बाध्यकारी दायित्व बन जाता था कि वह समयबद्ध ढंग से रोजगार उपलब्ध कराए या बेरोजगारी भत्ता दे। दूसरी ओर जी राम जी योजना विकसित भारत 2047 की दृष्टि से जुड़ी है, जिसमें 125 दिन की वैधानिक रोजगार‑गारंटी के साथ रोजगार, आजीविका, ढांचागत विकास और डिजिटल निगरानी को एकीकृत करने की महत्वाकांक्षी कल्पना की गई है। यहाँ प्रमुख शब्द अधिकार से अधिक “विकास, एकीकरण और संतृप्ति” बन जाते हैं, जो परिणाम‑केंद्रित और मिशन मोड कार्यान्वयन की दिशा की ओर संकेत करते हैं।
दोनों व्यवस्थाओं के कानूनी ढांचे पर नज़र डालें तो मनरेगा एक स्वतंत्र कानून के रूप में ग्रामीण नागरिकों को सीधा अधिकार देता था कि वे काम माँगे और न मिलने पर मुआवज़ा प्राप्त करें। इस तरह यह बजटीय सीमा से ऊपर उठकर संविधानिक‑कानूनी दायित्व जैसा स्वरूप ग्रहण कर चुका था।
जी राम जी योजना नए विधेयक के रूप में मनरेगा को समाप्त करके 125 दिन तक की रोजगार‑गारंटी का नया ढांचा निर्मित करती है, जिसमें राज्यों के लिए कृषि‑सीज़न के दौरान कुछ अवधियों को काम‑मुक्त घोषित करने का विकल्प भी निहित है। पहली नज़र में काम के दिनों की बढ़ोतरी श्रमिकों के लिए लाभकारी दिखाई देती है, लेकिन काम की मांग और रोजगार उपलब्ध कराने के बीच बने मजबूत कानूनी संबंधों की जगह अब संसाधन, सीज़न और आवंटन जैसी बातों को महत्व दिया गया है, जिससे वास्तविक रोजगार‑उपलब्धता पर प्रश्न स्वाभाविक हैं।
वित्तीय संरचना में भी बड़ा बदलाव दिखाई देता है। मनरेगा के अंतर्गत मजदूरी का पूरा भुगतान केंद्र सरकार वहन करती थी और सामग्री‑व्यय में केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी निश्चित अनुपात में बँटी रहती थी, जिससे योजना मूलतः केंद्र‑वित्तपोषित प्रकृति की थी और राज्यों पर अपेक्षाकृत कम आर्थिक दबाव पड़ता था।
जी राम जी योजना के साथ यह तस्वीर बदलती है।अब इसे साझा उत्तरदायित्व वाली केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में गढ़ा गया है, जिसमें अधिकांश राज्यों के लिए खर्च का बड़ा हिस्सा साझा करना अनिवार्य होगा। इससे वित्तीय बोझ थोड़ा‑थोड़ा करके राज्यों की ओर खिसकता दिखाई देता है और यह आशंका भी उभरती है कि कमजोर वित्तीय स्थिति वाले राज्य रोजगार‑गारंटी के दायित्व को उतनी मजबूती से निभा नहीं पाएँगे, जितनी एक पूर्णतः केंद्र‑वित्तपोषित कानून की स्थिति में संभवना होती थी।
मनरेगा की सबसे विशिष्ट विशेषता उसकी मांग‑आधारित प्रकृति थी। ग्राम पंचायत स्तर पर जैसे ही श्रमिकों द्वारा काम की मांग दर्ज होती, स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य और केंद्र तक की पूरी मशीनरी पर दायित्व बनता कि वह अतिरिक्त संसाधन जुटाकर भी उस मांग की पूर्ति करे।
जी राम जी योजना में इसके स्थान पर वार्षिक मानक आवंटन की व्यवस्था रखी गई है, जिसके भीतर रहते हुए राज्यों को रोजगार सृजन की योजना बनानी है। यदि किसी राज्य में श्रम‑मांग आवंटित सीमा से अधिक हो जाए, तो अतिरिक्त व्यय की बड़ी ज़िम्मेदारी राज्य सरकार पर आ जाती है। इस बदलाव से योजना की अधिकार‑आधारित प्रकृति धीरे‑धीरे बजट‑आधारित दृष्टिकोण में परिवर्तित होती दिखती है, जहाँ गरीब श्रमिक के अधिकार से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह हो जाता है कि कोष में कितना धन उपलब्ध है?
ग्राम पंचायत की भूमिका के संदर्भ में मनरेगा ने ग्रामसभा और पंचायत को योजना‑निर्माण के केंद्र में रखा। गाँव के स्तर पर होने वाली खुली बैठकों में कार्यों की पहचान, प्राथमिकता और अनुमोदन होता, और कम से कम आधा व्यय ग्राम पंचायत के माध्यम से ही खर्च करना अनिवार्य था, जिससे विकेंद्रीकरण और जनभागीदारी को संस्थागत स्वरूप मिला। जी राम जी योजना में भी पंचायतें मौजूद रहेंगी, पर अब उन्हें विकास‑सूचकांकों के आधार पर श्रेणियों में बाँटा जाएगा और उनकी योजनाओं को राष्ट्रीय प्लेटफॉर्मों, जियो‑टैगिंग और डिजिटल मॉनिटरिंग की कड़ी शर्तों से जोड़ा जाएगा। इससे एक ओर पारदर्शिता और सूचनात्मक निगरानी का नया क्षितिज खुलता है, तो दूसरी ओर यह आशंका भी जन्म लेती है कि अत्यधिक केंद्रीकरण और तकनीकी‑निर्भरता कहीं ग्रामसभा‑आधारित स्वायत्तता को कमजोर न कर दे, विशेषकर वहाँ, जहाँ तकनीकी संसाधन और क्षमता अभी सीमित हैं।
कार्य‑स्वरूप की दृष्टि से मनरेगा ने जल संरक्षण, सूखा‑रोधी उपाय, सिंचाई, पारंपरिक जल स्रोतों का नवीनीकरण, भूमि विकास और बाढ़ नियंत्रण जैसे कार्यों के माध्यम से रोजगार‑सृजन को प्राकृतिक संसाधन पुनरुत्थान से जोड़ने की कोशिश की।
जी राम जी योजना इन कार्यों को व्यापक ग्रामीण आधारभूत ढांचे, कृषि‑संबंधित परियोजनाओं और राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे के साथ और अधिक निकटता से जोड़ना चाहती है, ताकि ग्रामीण श्रम‑शक्ति बड़े विकास‑नेटवर्क का अंग बन सके।
यह परिवर्तन संकेत देता है कि अब केवल स्थानीय संसाधन‑संरक्षण ही नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक, कनेक्टिविटी और समग्र उत्पादकता वृद्धि भी ग्रामीण परियोजनाओं की कसौटी बनने जा रही है।
पारदर्शिता और निगरानी के मोर्चे पर मनरेगा ने जॉब कार्ड, मस्टर रोल और सोशल ऑडिट जैसे औज़ार दिए, पर समय के साथ फर्जी जॉब कार्ड, भुगतान में देरी और भ्रष्टाचार के आरोपों से इसकी छवि को बार बार आघात पहुँचता रहा।
जी राम जी योजना की प्रस्तावित संरचना में शुरू से ही जियो‑टैगिंग, डिजिटल मस्टर रोल और ऑनलाइन भुगतान निगरानी जैसे उपायों को अनिवार्य स्थान दिया गया है। उम्मीद यह की जा रही है कि तकनीक‑आधारित निगरानी से दुरुपयोग में कमी आएगी और गरीबों को समय पर काम व मजदूरी मिल सकेगी, लेकिन साथ ही डिजिटल विभाजन, नेटवर्क की कमी और तकनीकी कौशल के अभाव से यह खतरा भी बना रहता है कि सबसे वंचित तबके कहीं फिर से हाशिए पर न चले जाएँ। निश्चित ही भ्रष्टाचार पर तो नई सोच नियंत्रण करेगी , पर इससे प्रथम दृष्टि में रोजगार के अधिकार की बात प्रभावित होती नजर आती है।
अंततः मनरेगा और जी राम जी योजनाओं के बीच अंतर केवल संख्या और प्रावधानों का नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास के दृष्टिकोण का भी अंतर है। एक ओर मनरेगा रोजगार को अधिकार के रूप में स्थापित कर ग्रामसभा‑केंद्रित, विकेंद्रीकृत और मांग‑आधारित मॉडल लेकर आई थी, तो दूसरी ओर जी राम जी योजना उसी ढांचे को विकसित भारत की बड़ी परियोजना से जोड़ते हुए डिजिटल, मानक आवंटन‑आधारित और साझा वित्तीय जिम्मेदारी वाले मॉडल में रूपांतरित करती दिखती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह निरंतरता और परिवर्तन का मिश्रण ग्रामीण गरीबों के वास्तविक रोजगार‑सुरक्षा और सामाजिक न्याय के सपने को कितना पोषित करता है और कहाँ‑कहाँ नई चुनौतियाँ खड़ी करता है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
(सामाजिक लेखन हेतु पुरस्कार प्राप्त)
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