अस्तित्व का अन्वेषण
विवेक रंजन श्रीवास्तव
"चल उड़ जा रे पंछी अब यह देश हुआ बेगाना" यह पंक्ति केवल भौगोलिक विस्थापन की कथा नहीं कहती, बल्कि आत्मा की उस गहन अनुभूति की ओर संकेत करती है जब वह अपने भौतिक स्वरूप से कटकर वापस मूल स्रोत से जुड़ने का एहसास करती है। पंछी यहाँ मनुष्य की चेतना का प्रतीक है, जो इस भौतिक संसार में स्वयं को परदेसी अनुभव करता है।
मानव जीवन की एक मौलिक विडंबना यह है कि हम एक साथ दो घरों के निवासी हैं , एक इस देह और भूमि का, दूसरा एक अज्ञात अपरिचित लोक का। जब बाहरी दुनिया की भौतिकता, अर्थहीन दौड़ और सतही संबंध आत्मा को संतुष्ट नहीं कर पाते, तब यह "बेगानेपन" की अनुभूति प्रबल होती है। यह वह क्षण है जब आत्मा पुकारती है "चल उड़ जा रे पंछी"।
भारतीय दर्शन में यह भावना " सांसारिक विरक्ति" के रूप में जानी जाती है । जब व्यक्ति इस संसार की अनित्यता को पहचानकर शाश्वत की आध्यात्मिक खोज में निकल पड़ता है। कबीर, मीरा, रैदास सभी ने इसी "बेगानेपन" को अलग-अलग शब्दों में व्यक्त किया। आधुनिक संदर्भ में, यह भावना अक्सर अर्थ के संकट, अलगाव और आध्यात्मिक प्यास के रूप में प्रकट होती है।
वास्तव में पंछी की उड़ान यहाँ भौतिक यात्रा नहीं, बल्कि चेतना के स्तर पर मानसिकता में परिवर्तन का प्रतीक है। यह वह आंतरिक यात्रा है जब हम सांसारिक पहचानों से ऊपर उठकर अपने आत्म स्वरूप को पहचान लेते हैं। यह उड़ान प्रतिदिन ध्यान, आत्म चिंतन और आंतरिक मौन के माध्यम से संभव है।
रोचक है कि जब पंछी अपने वास्तविक घर को पहचान लेता है, तो यही "बेगाना देश" भी सुपरिचित लगने लगता है। क्योंकि आध्यात्मिक जागृति हमें यह दिव्य दृष्टि देती है कि परमात्मा आत्मा से अलग नहीं है, बल्कि उसकी ऊर्जा जीवन में सर्व व्याप्त है। तब उड़ान देश छोड़ने की नहीं, बल्कि उस देश के वास्तविक स्वरूप को देखने की हो जाती है।
"चल उड़ जा रे पंछी" की अंतरात्मा की पुकार हमें आमंत्रित करती है उस आंतरिक यात्रा पर जहाँ हम अपनी दिव्यता को पहचान सकें। यह उड़ान हमें बाहर नहीं, अपने भीतर ले जाती है ,अपने सच्चे स्वरूप की ओर, उस अनंत स्रोत की ओर जो हमारा वास्तविक निवास है। जब हम इस घर को पहचान लेते हैं, तो कोई देश बेगाना नहीं रह जाता, हर स्थान परमात्मा का मंदिर बन जाता है।
आत्मा के परमात्मा में संविलयन की सोच ही इन पंक्तियों का सार है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव
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